आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 21
नारद द्वारा तप से स्वर्ग पाने वाले राजाओं का वर्णन
नारद, पर्वत, देवल, द्वैपायन, शतयूप तथा अन्य मुनि धृतराष्ट्र से मिलने आते हैं और कुन्ती उनका सत्कार करती हैं। बातचीत के बीच नारद पुराने समय के उन राजाओं का वर्णन करते हैं जिन्होंने राजपाट छोड़कर वन में तप से इन्द्रलोक पाया, और भविष्यवाणी करते हैं कि व्यास की कृपा से धृतराष्ट्र गान्धारी के साथ वही गति पाएँगे, कुन्ती अपने पति पाण्डु के लोक को जाएँगी और विदुर तथा सञ्जय भी मुक्त होंगे। राजा और ब्राह्मण नारद का सम्मान करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (15.21.1)
ततस्तत्र मुनिश्रेष्ठा राजानं द्रष्टुमभ्ययुः । नारदः पर्वतश्चैव देवलश्च महातपाः ॥
tatastatra muniśreṣṭhā rājānaṃ draṣṭumabhyayuḥ | nāradaḥ parvataścaiva devalaśca mahātapāḥ
तब मुनियों में श्रेष्ठ नारद, पर्वत और महातपस्वी देवल राजा से मिलने वहाँ आए।
श्लोक 2 (15.21.2)
द्वैपायनः सशिष्यश्च सिद्धाश्चान्ये मनीषिणः । शतयूपश्च राजर्षिर्वृद्धः परमधार्मिकः ॥
dvaipāyanaḥ saśiṣyaśca siddhāścānye manīṣiṇaḥ | śatayūpaśca rājarṣirvṛddhaḥ paramadhārmikaḥ
शिष्यों सहित द्वैपायन, अन्य मनीषी सिद्ध, और परम धर्मात्मा वृद्ध राजर्षि शतयूप भी आए।
श्लोक 3 (15.21.3)
तेषां कुन्ती महाराज पूजां चक्रे यथाविधि । ते चापि तुतुषुस्तस्यास्तापसाः परिचर्यया ॥
teṣāṃ kuntī mahārāja pūjāṃ cakre yathāvidhi | te cāpi tutuṣustasyāstāpasāḥ paricaryayā
हे महाराज! कुन्ती ने उनका विधिपूर्वक पूजन किया और वे तपस्वी उसकी सेवा से सन्तुष्ट हुए।
श्लोक 4 (15.21.4)
तत्र धर्म्याः कथास्तात चक्रुस्ते परमर्षयः । रमयन्तो महात्मानं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ॥
tatra dharmyāḥ kathāstāta cakruste paramarṣayaḥ | ramayanto mahātmānaṃ dhṛtarāṣṭraṃ janādhipam
हे तात! वहाँ उन परम ऋषियों ने महात्मा नरेश धृतराष्ट्र को प्रसन्न करते हुए धर्मसम्बन्धी कथाएँ कहीं।
श्लोक 5 (15.21.5)
कथान्तरे तु कस्मिंश्चिद्देवर्षिर्नारदस्ततः । कथामिमामकथयत्सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान् ॥
kathāntare tu kasmiṃściddevarṣirnāradastataḥ | kathāmimāmakathayatsarvapratyakṣadarśivān
बातचीत के बीच एक अवसर पर, सब कुछ प्रत्यक्ष देखने वाले देवर्षि नारद ने यह कथा सुनाई।
नारद उवाच
श्लोक 6 (15.21.6)
पुरा प्रजापतिसमो राजाऽऽसीदकुतोभयः । सहस्रचित्य इत्युक्तः शतयूपपितामहः ॥
purā prajāpatisamo rājā''sīdakutobhayaḥ | sahasracitya ityuktaḥ śatayūpapitāmahaḥ
बहुत पहले प्रजापति के समान, निर्भय एक राजा थे, जिन्हें सहस्रचित्य कहा जाता था; वे शतयूप के पितामह थे।
श्लोक 7 (15.21.7)
स पुत्रे राज्यमासज्य ज्येष्ठे परमधार्मिके । सहस्रचित्यो धर्मात्मा प्रविवेश वनं नृपः ॥
sa putre rājyamāsajya jyeṣṭhe paramadhārmike | sahasracityo dharmātmā praviveśa vanaṃ nṛpaḥ
अपने परम धर्मात्मा ज्येष्ठ पुत्र को राज्य सौंपकर धर्मात्मा राजा सहस्रचित्य ने वन में प्रवेश किया।
श्लोक 8 (15.21.8)
स गत्वा तपसः पारं दीप्तस्य वसुधाधिपः । पुरंदरस्य संस्थानं प्रतिपेदे महाद्युतिः ॥
sa gatvā tapasaḥ pāraṃ dīptasya vasudhādhipaḥ | puraṃdarasya saṃsthānaṃ pratipede mahādyutiḥ
तेजस्वी तप का पार पाकर वह महाद्युतिमान् पृथ्वीपति पुरन्दर (इन्द्र) के धाम को प्राप्त हुआ।
श्लोक 9 (15.21.9)
दृष्टपूर्वः स बहुशो राजन्सम्पतता मया । महेन्द्रसदने राजा तपसा दग्धकिल्बिषः ॥
dṛṣṭapūrvaḥ sa bahuśo rājansampatatā mayā | mahendrasadane rājā tapasā dagdhakilbiṣaḥ
हे राजन्! आकाश-मार्ग से जाते हुए मैंने उसे महेन्द्र के भवन में अनेक बार देखा है; तप से उसके पाप जल चुके थे।
श्लोक 10 (15.21.10)
तथा शैलालयो राजा भगदत्तपितामहः । तपोबलेनैव नृपो महेन्द्रसदनं गतः ॥
tathā śailālayo rājā bhagadattapitāmahaḥ | tapobalenaiva nṛpo mahendrasadanaṃ gataḥ
इसी प्रकार भगदत्त के पितामह राजा शैलालय भी तपोबल से ही महेन्द्र के भवन को गए।
श्लोक 11 (15.21.11)
तथा पृषध्रो राजाऽऽसीद्राजन्वज्रधरोपमः । स चापि तपसा लेभे नाकपृष्ठमितो गतः ॥
tathā pṛṣadhro rājā''sīdrājanvajradharopamaḥ | sa cāpi tapasā lebhe nākapṛṣṭhamito gataḥ
पृषध्र नाम के राजा भी थे, हे राजन्, जो वज्रधारी इन्द्र के समान थे; उन्होंने भी तप से यहाँ से जाकर स्वर्ग पाया।
श्लोक 12 (15.21.12)
अस्मिन्नरण्ये नृपते मांधातुरपि चात्मजः । पुरुकुत्सो नृपः सिद्धिं महतीं समवाप्तवान् ॥
asminnaraṇye nṛpate māṃdhāturapi cātmajaḥ | purukutso nṛpaḥ siddhiṃ mahatīṃ samavāptavān
हे नरेश! इसी वन में मान्धाता के पुत्र राजा पुरुकुत्स ने महान् सिद्धि प्राप्त की।
श्लोक 13 (15.21.13)
भार्या समभवद्यस्य नर्मदा सरितां वरा । सोस्मिन्नरण्ये नृपतिस्तपस्तप्त्वा दिवं गतः ॥
bhāryā samabhavadyasya narmadā saritāṃ varā | sosminnaraṇye nṛpatistapastaptvā divaṃ gataḥ
जिनकी पत्नी नदियों में श्रेष्ठ नर्मदा थी, वे राजा इसी वन में तप करके स्वर्ग को गए।
श्लोक 14 (15.21.14)
शशलोमा च राजाऽऽसीद्राजन्परमधार्मिकः । सम्यगस्मिन्वने तप्त्वा ततो दिवमवाप्तवान् ॥
śaśalomā ca rājā''sīdrājanparamadhārmikaḥ | samyagasminvane taptvā tato divamavāptavān
हे राजन्! शशलोमा नाम के परम धर्मात्मा राजा हुए; उन्होंने भी इस वन में भली-भाँति तप करके स्वर्ग पाया।
श्लोक 15 (15.21.15)
द्वैपायनप्रसादाच्च त्वमपीदं तपोवनम् । राजन्नवाप्य दुष्प्रापां सिद्धिमग्र्यां गमिष्यसि ॥
dvaipāyanaprasādācca tvamapīdaṃ tapovanam | rājannavāpya duṣprāpāṃ siddhimagryāṃ gamiṣyasi
हे राजन्! द्वैपायन की कृपा से तुम भी इस तपोवन को पाकर दुर्लभ और परम सिद्धि को प्राप्त करोगे।
श्लोक 16 (15.21.16)
त्वं चापि राजशार्दूल तपसोन्ते श्रिया वृतः । गान्धारीसहितो गन्ता गतिं तेषां महात्मनां ॥
tvaṃ cāpi rājaśārdūla tapasonte śriyā vṛtaḥ | gāndhārīsahito gantā gatiṃ teṣāṃ mahātmanāṃ
हे राजश्रेष्ठ! तप के अन्त में तुम भी तेज से घिरे हुए, गान्धारी के साथ, उन महात्माओं की गति को प्राप्त होगे।
श्लोक 17 (15.21.17)
पाण्डुः स्मरति ते नित्यं बलहन्तुः समीपगः । त्वां सदैव महाराज श्रेयसा स च योक्ष्यति ॥
pāṇḍuḥ smarati te nityaṃ balahantuḥ samīpagaḥ | tvāṃ sadaiva mahārāja śreyasā sa ca yokṣyati
बल का वध करने वाले इन्द्र के समीप रहने वाले पाण्डु तुम्हें सदा स्मरण करते हैं; हे महाराज! वे तुम्हें सदा कल्याण से जोड़ेंगे।
श्लोक 18 (15.21.18)
तव शुश्रूषया चैव गान्धार्याश्च यशस्विनी । भर्तुः सलोकतां कुन्ती गमिष्यति वधूस्तव ॥
tava śuśrūṣayā caiva gāndhāryāśca yaśasvinī | bhartuḥ salokatāṃ kuntī gamiṣyati vadhūstava
तुम्हारी और गान्धारी की सेवा के प्रभाव से तुम्हारी बहू यशस्विनी कुन्ती अपने पति के लोक को जाएगी।
श्लोक 19 (15.21.19)
युधिष्ठिरस्य जननी स हि धर्मः सनातनः । वयमेतत्प्रपश्यामो नृपते दिव्यवक्षुषाः ॥
yudhiṣṭhirasya jananī sa hi dharmaḥ sanātanaḥ | vayametatprapaśyāmo nṛpate divyavakṣuṣāḥ
युधिष्ठिर की माता के लिए यही सनातन धर्म है। हे राजन्! यह हम दिव्य दृष्टि से देख रहे हैं।
श्लोक 20 (15.21.20)
प्रवेक्ष्यति महात्मानं विदुरश्च युधिष्ठिरम् । संजयस्तदनुध्यानादितः स्वर्गमवाप्स्यति ॥
pravekṣyati mahātmānaṃ viduraśca yudhiṣṭhiram | saṃjayastadanudhyānāditaḥ svargamavāpsyati
विदुर महात्मा युधिष्ठिर में प्रवेश करेंगे, और सञ्जय उनके ध्यान के प्रभाव से यहाँ से स्वर्ग को प्राप्त होंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (15.21.21)
एतच्छ्रुत्वा कौरवेन्द्रो महात्मा । सार्धं पत्न्या प्रीतिमान्सम्बभूव । विद्वान्वाक्यं नारदस्य प्रशस्य । चक्रे पूजां चातुलां नारदाय ॥
etacchrutvā kauravendro mahātmā | sārdhaṃ patnyā prītimānsambabhūva | vidvānvākyaṃ nāradasya praśasya | cakre pūjāṃ cātulāṃ nāradāya
यह सुनकर महात्मा कौरवेन्द्र पत्नी-सहित प्रसन्न हुए; उन विद्वान् ने नारद के वचनों की प्रशंसा की और नारद का अनुपम सत्कार किया।
श्लोक 22 (15.21.22)
ततः सर्वे नारदं विप्रसङ्घाः । सम्पूजयामासुरतीव राजन् । राज्ञः प्रीत्या धृतराष्ट्रस्य ते वै । पुनःपुनः सम्प्रहृष्टास्तदानीम् ॥
tataḥ sarve nāradaṃ viprasaṅghāḥ | sampūjayāmāsuratīva rājan | rājñaḥ prītyā dhṛtarāṣṭrasya te vai | punaḥpunaḥ samprahṛṣṭāstadānīm
हे राजन्! तब ब्राह्मणों के सब समूहों ने धृतराष्ट्र के प्रति प्रेम के कारण नारद का बड़ा सम्मान किया और वे बार-बार हर्षित होते रहे।