आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 26
पाण्डवों का धृतराष्ट्र के आश्रम में पहुँचना
पाण्डव, उनके सेवक-जन और कुरुकुल की स्त्रियाँ वाहन छोड़कर पैदल धृतराष्ट्र के आश्रम की ओर चलती हैं। तपस्वियों से ज्ञात होता है कि राजा यमुना गए हैं; वे उसी मार्ग से जाकर बड़ों को देखते हैं। सहदेव सबसे पहले कुन्ती के पास पहुँचता है, पाण्डव पुत्रहीन दम्पति के चरणों में गिरते हैं, धृतराष्ट्र स्वर और स्पर्श से उन्हें पहचानकर सान्त्वना देते हैं, और युधिष्ठिर सब लोगों का नाम-गोत्र सहित परिचय कराते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (15.26.1)
ततस्ते पाण्डवा दूरादवतीर्य पदातयः । अभिजग्मुर्नरपतेराश्रमं विनयानताः ॥
tataste pāṇḍavā dūrādavatīrya padātayaḥ | abhijagmurnarapaterāśramaṃ vinayānatāḥ
तब पाण्डव दूर से ही उतर पड़े और विनय से झुके हुए पैदल ही राजा के आश्रम की ओर चले।
श्लोक 2 (15.26.2)
स च योधजनः सर्वो ये च राष्ट्रनिवासिनः । स्त्रियश्च कुरुमुख्यानां पद्भिरेवान्वयुस्तदा ॥
sa ca yodhajanaḥ sarvo ye ca rāṣṭranivāsinaḥ | striyaśca kurumukhyānāṃ padbhirevānvayustadā
सब योद्धा, राज्य के निवासी और कुरुकुल के प्रमुख पुरुषों की स्त्रियाँ भी उस समय पैदल ही उनके पीछे चलीं।
श्लोक 3 (15.26.3)
आश्रमं ते ततो जग्मुर्धृतराष्ट्रस्य पाण्डवाः । शून्यं मृगगणाकीर्णं कदलीवनशोभितम् ॥
āśramaṃ te tato jagmurdhṛtarāṣṭrasya pāṇḍavāḥ | śūnyaṃ mṛgagaṇākīrṇaṃ kadalīvanaśobhitam
पाण्डव धृतराष्ट्र के उस आश्रम में पहुँचे, जो सूना था, मृगों के झुंडों से भरा था और केले के वनों से सुशोभित था।
श्लोक 4 (15.26.4)
ततस्तत्र समाजग्मुस्तापसा नियतव्रताः । पाण्डवानागतान्द्रष्टुं कौतूहलसमन्विताः ॥
tatastatra samājagmustāpasā niyatavratāḥ | pāṇḍavānāgatāndraṣṭuṃ kautūhalasamanvitāḥ
तब वहाँ दृढ़ व्रत वाले तपस्वी, कौतूहल से भरकर, आए हुए पाण्डवों को देखने के लिए एकत्र हुए।
श्लोक 5 (15.26.5)
तानपृच्छत्ततो राजा क्वासौ कौरववंशभृत् । पिता ज्येष्ठो गतोऽस्माकमिति बाष्पपरिप्लुतः ॥
tānapṛcchattato rājā kvāsau kauravavaṃśabhṛt | pitā jyeṣṭho gato'smākamiti bāṣpapariplutaḥ
आँसुओं में डूबे हुए राजा ने उनसे पूछा, "कुरुवंश को धारण करने वाले हमारे ज्येष्ठ पिता कहाँ गए हैं?"
श्लोक 6 (15.26.6)
ते तमूचुस्ततो वाक्यं यमुनामवगाहितुम् । पुष्पाणामुदकुंभस्य चार्थे गत इति प्रभो ॥
te tamūcustato vākyaṃ yamunāmavagāhitum | puṣpāṇāmudakuṃbhasya cārthe gata iti prabho
उन्होंने उससे कहा, "प्रभो! वे यमुना में स्नान करने तथा फूल और जल का घड़ा लाने के लिए गए हैं।"
श्लोक 7 (15.26.7)
तैराख्यातेन मार्गेण ततस्ते जग्मुरञ्जसा । ददृशुश्चाविदूरे तान्सर्वानथ पदातयः ॥
tairākhyātena mārgeṇa tataste jagmurañjasā | dadṛśuścāvidūre tānsarvānatha padātayaḥ
उनके बताए मार्ग से पाण्डव शीघ्र आगे बढ़े और पैदल चलते हुए थोड़ी ही दूर पर उन सबको देखा।
श्लोक 8 (15.26.8)
ततस्ते सत्वरा जग्मुः पितुर्दर्शनकाङ्क्षिणः । सहदेवस्तु वेगेन प्राधावद्यत्र सा पृथा ॥
tataste satvarā jagmuḥ piturdarśanakāṅkṣiṇaḥ | sahadevastu vegena prādhāvadyatra sā pṛthā
तब पिता के दर्शन की इच्छा से वे तेज़ी से आगे गए, और सहदेव वेग से दौड़कर वहाँ पहुँचा जहाँ कुन्ती थी।
श्लोक 9 (15.26.9)
सुस्वरं रुरुदे धीमान्मातुः पादावुपस्पृशन् । सा च बाष्पाकुलमुखी ददर्श दयितं सुतम् ॥
susvaraṃ rurude dhīmānmātuḥ pādāvupaspṛśan | sā ca bāṣpākulamukhī dadarśa dayitaṃ sutam
बुद्धिमान् सहदेव माता के चरण छूकर ऊँचे स्वर में रो पड़ा, और आँसुओं से भरे मुख वाली कुन्ती ने अपने प्रिय पुत्र को देखा।
श्लोक 10 (15.26.10)
बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य समुन्नाम्य च पुत्रकम् । गान्धार्याः कथयामास सहदेवमुपस्थितम् ॥
bāhubhyāṃ sampariṣvajya samunnāmya ca putrakam | gāndhāryāḥ kathayāmāsa sahadevamupasthitam
दोनों भुजाओं से आलिंगन कर और पुत्र को ऊपर उठाकर उसने गान्धारी को बताया कि सहदेव आया है।
श्लोक 11 (15.26.11)
अनन्तरं च राजानं भीमसेनमथार्जुनम् । नकुलं च पृथा दृष्ट्वा त्वरमाणोपचक्रमे ॥
anantaraṃ ca rājānaṃ bhīmasenamathārjunam | nakulaṃ ca pṛthā dṛṣṭvā tvaramāṇopacakrame
उसके बाद राजा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन और नकुल को देखकर कुन्ती शीघ्रता से उनकी ओर चल पड़ी।
श्लोक 12 (15.26.12)
सा ह्यग्रे गच्छति तयोर्दपत्योर्हतपुत्रयोः । कर्षन्ती तौ ततस्ते तां दृष्ट्वा संन्यपतन्भुवि । तयोस्तु पादयो राजन्न्यपतन्हतपुत्रयोः ॥
sā hyagre gacchati tayordapatyorhataputrayoḥ | karṣantī tau tataste tāṃ dṛṣṭvā saṃnyapatanbhuvi | tayostu pādayo rājannyapatanhataputrayoḥ
वह पुत्रहीन उस दम्पति के आगे-आगे चल रही थी और दोनों को खींचती हुई ला रही थी; उसे देखकर पाण्डव भूमि पर गिर पड़े। हे राजन्! वे उन पुत्रहीन दोनों के चरणों में गिर पड़े।
श्लोक 13 (15.26.13)
राजा तान्स्वरयोगेन स्पर्शेन च महामनाः । प्रत्यभिज्ञाय मेधावी समाश्वासयत प्रभुः ॥
rājā tānsvarayogena sparśena ca mahāmanāḥ | pratyabhijñāya medhāvī samāśvāsayata prabhuḥ
महामना बुद्धिमान् राजा ने स्वर और स्पर्श से उन्हें पहचानकर उन्हें सान्त्वना दी।
श्लोक 14 (15.26.14)
ततस्ते बाष्पमुत्सृज्य गान्धारीसहितं नृपम् । उपतस्थुर्महात्मानो मातरं च यथाविधि ॥
tataste bāṣpamutsṛjya gāndhārīsahitaṃ nṛpam | upatasthurmahātmāno mātaraṃ ca yathāvidhi
तब उन महात्माओं ने आँसू बहाकर गान्धारी सहित राजा की और अपनी माता की विधिपूर्वक सेवा-वन्दना की।
श्लोक 15 (15.26.15)
सर्वेषां तोयकलशाञ्जगृहुस्ते स्वयं तदा । पाण्डवा लब्धसंज्ञास्ते मात्रा चाश्वासिताः पुनः ॥
sarveṣāṃ toyakalaśāñjagṛhuste svayaṃ tadā | pāṇḍavā labdhasaṃjñāste mātrā cāśvāsitāḥ punaḥ
तब उन्होंने स्वयं सबके जल के घड़े उठा लिए; और होश में आए हुए पाण्डवों को माता ने फिर सान्त्वना दी।
श्लोक 16 (15.26.16)
तथा नार्यो नृसिंहानां सोऽवरोधजनस्तदा । पौरजानपदाश्चैव ददृशुस्तं जनाधिपम् ॥
tathā nāryo nṛsiṃhānāṃ so'varodhajanastadā | paurajānapadāścaiva dadṛśustaṃ janādhipam
इसी प्रकार उन पुरुषसिंहों की स्त्रियों ने, अन्तःपुर के जनों ने तथा नगर और देहात के लोगों ने भी उस राजा के दर्शन किए।
श्लोक 17 (15.26.17)
निवेदयामास तदा जनं तन्नामगोत्रतः । युधिष्ठिरो नरपतिः स चैनं प्रत्यपूजयत् ॥
nivedayāmāsa tadā janaṃ tannāmagotrataḥ | yudhiṣṭhiro narapatiḥ sa cainaṃ pratyapūjayat
तब राजा युधिष्ठिर ने उन लोगों का नाम और गोत्र बताकर उनका परिचय कराया, और उस वृद्ध राजा ने उनका आदर-सत्कार किया।
श्लोक 18 (15.26.18)
स तैः परिवृतो मेने हर्षबाष्पाविलेक्षणः । राजाऽऽत्मानं गृहगतं पुरेव गजसाह्वये ॥
sa taiḥ parivṛto mene harṣabāṣpāvilekṣaṇaḥ | rājā''tmānaṃ gṛhagataṃ pureva gajasāhvaye
उनसे घिरे हुए राजा की आँखें हर्ष के आँसुओं से धुँधली हो गईं, और उसे लगा मानो वह हस्तिनापुर में अपने घर में ही हो।
श्लोक 19 (15.26.19)
अभिवादितो वधूभिश्च कृष्णाद्याभिः स पार्थिवः । गान्धार्या सहितो धीमान्कुन्त्या च प्रत्यनन्दत ॥
abhivādito vadhūbhiśca kṛṣṇādyābhiḥ sa pārthivaḥ | gāndhāryā sahito dhīmānkuntyā ca pratyanandata
कृष्णा (द्रौपदी) आदि पुत्रवधुओं से अभिवादित होकर बुद्धिमान् राजा ने गान्धारी और कुन्ती के साथ आनन्द मनाया।
श्लोक 20 (15.26.20)
ततश्चाश्रममागच्छत्सिद्धचारणसेवितम् । दिदृक्षुभिः समाकीर्णं नभस्तारागणैरिव ॥
tataścāśramamāgacchatsiddhacāraṇasevitam | didṛkṣubhiḥ samākīrṇaṃ nabhastārāgaṇairiva
तब वह उस आश्रम में आया, जहाँ सिद्ध और चारण आया करते थे और जो दर्शन के इच्छुक जनों से वैसे ही भरा था जैसे आकाश तारों के समूहों से।