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आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 39

नारद द्वारा धृतराष्ट्र के निधन का समाचार

नारद युधिष्ठिर के पास आते हैं और धृतराष्ट्र के विषय में पूछे जाने पर बताते हैं कि गङ्गाद्वार में गान्धारी और कुन्ती के साथ कठोर तप करते हुए अन्धे राजा दावाग्नि में भस्म हो गए; उन्होंने भागना स्वीकार नहीं किया और योग में बैठे रहे, जबकि सञ्जय बच निकले और हिमालय चले गए। पाण्डव, अन्तःपुर की स्त्रियाँ और पुरवासी विलाप करने लगते हैं और अन्त में युधिष्ठिर आँसू रोककर बोलने को तैयार होते हैं।

अध्याय 38अध्याय-सूचीअध्याय 40

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (15.39.1)

तेषु चोपनिवृत्तेषु पाण्डवेषु यदृच्छया । देवर्षिर्नारदो राजन्नाजगाम युधिष्ठिरम् ॥

teṣu copanivṛtteṣu pāṇḍaveṣu yadṛcchayā | devarṣirnārado rājannājagāma yudhiṣṭhiram

पाण्डवों के लौट आने पर, हे राजन्, देवर्षि नारद अकस्मात् युधिष्ठिर के पास आ पहुँचे।

श्लोक 2 (15.39.2)

तमभ्यर्च्य महाबाहुः कुरुराजो युधिष्ठिरः । आसीनं परिविश्वस्तं प्रोवाच वदतांवरः ॥

tamabhyarcya mahābāhuḥ kururājo yudhiṣṭhiraḥ | āsīnaṃ pariviśvastaṃ provāca vadatāṃvaraḥ

महाबाहु कुरुराज युधिष्ठिर ने उनका सत्कार किया और वक्ताओं में श्रेष्ठ उन्होंने विश्वासपूर्वक बैठे हुए नारद से कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 3 (15.39.3)

चिरात्तु नानुपश्यामि भगवन्तमुपस्थितम् । कच्चित्ते कुशलं विप्र शुभं वा प्रत्युपस्थितम् ॥

cirāttu nānupaśyāmi bhagavantamupasthitam | kaccitte kuśalaṃ vipra śubhaṃ vā pratyupasthitam

भगवन्! बहुत समय बाद मैं आपको अपने सामने उपस्थित देख रहा हूँ। हे विप्र! आपका कुशल तो है न, अथवा आपको कोई शुभ अवसर प्राप्त हुआ है?

श्लोक 4 (15.39.4)

के देशाः परिदृष्टास्ते किं च कार्यं करोमि ते । तद्ब्रूहि द्विजमुख्यस्त्वं ह्यस्माकं च प्रियोऽतिथिः ॥

ke deśāḥ paridṛṣṭāste kiṃ ca kāryaṃ karomi te | tadbrūhi dvijamukhyastvaṃ hyasmākaṃ ca priyo'tithiḥ

आपने कौन-कौन से देश देखे हैं, और मैं आपके लिए क्या करूँ? यह बताइए; आप द्विजों में श्रेष्ठ हैं और हमारे प्रिय अतिथि हैं।

नारद उवाच

श्लोक 5 (15.39.5)

चिरदृष्टोसि मेऽत्येवमागतोऽहं तपोवनात् । परिदृष्टानि तीर्थानि गङ्गा चैव मया नृप ॥

ciradṛṣṭosi me'tyevamāgato'haṃ tapovanāt | paridṛṣṭāni tīrthāni gaṅgā caiva mayā nṛpa

हे राजन्! आपको देखे हुए मुझे बहुत समय हो गया; मैं अपने तपोवन से आया हूँ। हे नरेश! मैंने तीर्थों के दर्शन किए हैं और गङ्गा के भी।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 6 (15.39.6)

वदन्ति पुरुषा मेऽद्य गङ्गातीरनिवासिनः । धृतराष्ट्रं महात्मानमास्थितं परमं तपः ॥

vadanti puruṣā me'dya gaṅgātīranivāsinaḥ | dhṛtarāṣṭraṃ mahātmānamāsthitaṃ paramaṃ tapaḥ

गङ्गा के किनारे रहने वाले लोग आज मुझसे कहते हैं कि महात्मा धृतराष्ट्र ने परम तप अपना लिया है।

श्लोक 7 (15.39.7)

अपि दृष्टस्त्वया तत्र कुशली स कुरूद्वहः । गान्धारी च पृथा चैव सूतपुत्रश्च संजयः ॥

api dṛṣṭastvayā tatra kuśalī sa kurūdvahaḥ | gāndhārī ca pṛthā caiva sūtaputraśca saṃjayaḥ

क्या आपने वहाँ उन कुरुश्रेष्ठ को कुशलपूर्वक देखा? और गान्धारी, पृथा तथा सूतपुत्र सञ्जय को भी?

श्लोक 8 (15.39.8)

कथं च वर्तते चाद्य पिता मम स पार्थिवः । श्रोतुमिच्छामि भगवन्यदि दृष्टस्त्वया नृपः ॥

kathaṃ ca vartate cādya pitā mama sa pārthivaḥ | śrotumicchāmi bhagavanyadi dṛṣṭastvayā nṛpaḥ

मेरे वे पिता, राजा धृतराष्ट्र, अब कैसे हैं? भगवन्! यदि आपने उन्हें देखा हो तो मैं सुनना चाहता हूँ।

नारद उवाच

श्लोक 9 (15.39.9)

स्थिरीभूय महाराज शृणु वृत्तं यथातथम् । यथाश्रुतं च दृष्टं च मया तस्मिंस्तपोवने ॥

sthirībhūya mahārāja śṛṇu vṛttaṃ yathātatham | yathāśrutaṃ ca dṛṣṭaṃ ca mayā tasmiṃstapovane

हे महाराज! धैर्य धारण कीजिए और जैसा हुआ वैसा सब सुनिए, जैसा मैंने उस तपोवन में सुना और देखा।

श्लोक 10 (15.39.10)

वनवासनिवृत्तेषु भवत्सु कुरुनन्दन । कुरुक्षेत्रात्पिता तुभ्य गङ्गाद्वारं ययौ नृप ॥

vanavāsanivṛtteṣu bhavatsu kurunandana | kurukṣetrātpitā tubhya gaṅgādvāraṃ yayau nṛpa

हे कुरुनन्दन! आपके वनवास से लौट आने पर आपके पिता कुरुक्षेत्र से गङ्गाद्वार चले गए।

श्लोक 11 (15.39.11)

गान्धार्या सहितो धीमान्वध्वा कुन्त्या समन्वितः । संजयेन च सूतेन साग्निहोत्रः सयाजकः ॥

gāndhāryā sahito dhīmānvadhvā kuntyā samanvitaḥ | saṃjayena ca sūtena sāgnihotraḥ sayājakaḥ

वे बुद्धिमान् राजा गान्धारी, बहू कुन्ती और सूत सञ्जय के साथ अग्निहोत्र की अग्नियाँ और याजकों को लेकर गए।

श्लोक 12 (15.39.12)

आतस्थे स तपस्तीव्रं पिता तव तपोधनः । अग्निं मुखे समाधाय वायुभक्षोऽभवन्मुनिः ॥

ātasthe sa tapastīvraṃ pitā tava tapodhanaḥ | agniṃ mukhe samādhāya vāyubhakṣo'bhavanmuniḥ

वहाँ तपोधन आपके पिता ने कठोर तप आरम्भ किया; मुख में अग्नि को धारण करके वे मुनि केवल वायु पर रहने लगे।

श्लोक 13 (15.39.13)

वने स मुनिभिः सर्वैः पूज्यमानो महातपाः । त्वगस्थिमात्रशेषः स षण्मासानभवन्नृपः ॥

vane sa munibhiḥ sarvaiḥ pūjyamāno mahātapāḥ | tvagasthimātraśeṣaḥ sa ṣaṇmāsānabhavannṛpaḥ

वन में सब मुनियों से सम्मानित वे महातपस्वी राजा छह महीनों में केवल त्वचा और हड्डियों के ढाँचे रह गए।

श्लोक 14 (15.39.14)

गान्धारी तु जलाहारी कुन्ती मासोपवासिनी । संजयः षष्ठभुक्तेन वर्तयामास भारत ॥

gāndhārī tu jalāhārī kuntī māsopavāsinī | saṃjayaḥ ṣaṣṭhabhuktena vartayāmāsa bhārata

हे भारत! गान्धारी केवल जल पर रहती थीं, कुन्ती एक-एक मास का उपवास करती थीं और सञ्जय छठे समय के भोजन से निर्वाह करते थे।

श्लोक 15 (15.39.15)

अग्नींस्तु याजकास्तत्र जुहुवुर्विधिवत्प्रभो । दृश्यतोऽदृश्यतश्चैव वने तस्मिन्नृपस्य वै ॥

agnīṃstu yājakāstatra juhuvurvidhivatprabho | dṛśyato'dṛśyataścaiva vane tasminnṛpasya vai

हे प्रभो! उस वन में याजक राजा की ओर से विधिपूर्वक अग्नियों में आहुति देते थे, चाहे राजा उन्हें देखते हों या न देखते हों।

श्लोक 16 (15.39.16)

अनिकेतोथ राजा स बभूव वनगोचरः । ते चापि सहिते देव्यौ संजयश्च तमन्वयुः ॥

aniketotha rājā sa babhūva vanagocaraḥ | te cāpi sahite devyau saṃjayaśca tamanvayuḥ

फिर वे राजा बिना घर के वनचारी हो गए, और दोनों देवियाँ साथ-साथ तथा सञ्जय उनके पीछे चलते रहे।

श्लोक 17 (15.39.17)

संजयो नृपतेर्नेता समेषु विषमेषु च । गान्धार्याश्च पृथा चैव चक्षुरासीदनिन्दिता ॥

saṃjayo nṛpaternetā sameṣu viṣameṣu ca | gāndhāryāśca pṛthā caiva cakṣurāsīdaninditā

सञ्जय समतल और ऊबड़-खाबड़ भूमि में राजा का मार्गदर्शन करते थे, और निर्दोष पृथा गान्धारी की आँखें बनी हुई थीं।

श्लोक 18 (15.39.18)

ततः कदाचिद्गङ्गायाः कच्छे स नृपसत्तमः । गङ्गायामाप्लुतो धीमानाश्रमाभिमुखो ययौ ॥

tataḥ kadācidgaṅgāyāḥ kacche sa nṛpasattamaḥ | gaṅgāyāmāpluto dhīmānāśramābhimukho yayau

फिर एक दिन गङ्गा के तट पर उन नृपश्रेष्ठ बुद्धिमान् राजा ने गङ्गा में स्नान किया और अपने आश्रम की ओर चल पड़े।

श्लोक 19 (15.39.19)

अथ वायुः समुद्भुतो दावाग्निरभवन्महान् । ददाह तद्वनं सर्वं परिगृह्य समन्ततः ॥

atha vāyuḥ samudbhuto dāvāgnirabhavanmahān | dadāha tadvanaṃ sarvaṃ parigṛhya samantataḥ

तभी वायु उठी और एक भारी दावाग्नि प्रकट हुई; उसने चारों ओर से घेरकर उस सारे वन को जला डाला।

श्लोक 20 (15.39.20)

दह्यत्सु मृगयूथेषु द्विजिह्वेषु समन्ततः । वराहाणां च यूथेषु संश्रयत्सु जलाशयान् ॥

dahyatsu mṛgayūtheṣu dvijihveṣu samantataḥ | varāhāṇāṃ ca yūtheṣu saṃśrayatsu jalāśayān

चारों ओर मृगों के झुण्ड जल रहे थे, साँप भी जल रहे थे, और सूअरों के झुण्ड जलाशयों की शरण ले रहे थे।

श्लोक 21 (15.39.21)

सम्प्रदीप्ते वने तस्मिन्प्राप्ते व्यसन उत्तमे । निराहारतया राजा मन्दप्राणविचेष्टितः । असमर्थोऽपसरणे सुकृशे मातरौ च ते ॥

sampradīpte vane tasminprāpte vyasana uttame | nirāhāratayā rājā mandaprāṇaviceṣṭitaḥ | asamartho'pasaraṇe sukṛśe mātarau ca te

जब वह वन धधक उठा और भारी विपत्ति आ पड़ी, तब निराहार रहने से क्षीण प्राण और चेष्टा वाले राजा वहाँ से हटने में असमर्थ थे, और आपकी दोनों अत्यन्त दुर्बल माताएँ भी।

श्लोक 22 (15.39.22)

ततः स नृपतिर्दृष्ट्वा वह्निमायान्तमन्तिकात् । इदमाह ततः सूतं संजयं जयतांवरः ॥

tataḥ sa nṛpatirdṛṣṭvā vahnimāyāntamantikāt | idamāha tataḥ sūtaṃ saṃjayaṃ jayatāṃvaraḥ

तब राजा ने अग्नि को पास आते देखकर विजेताओं में श्रेष्ठ सूत सञ्जय से यह कहा।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 23 (15.39.23)

गच्छ संजय यत्राग्निर्न त्वां दहति कर्हिचित् । वयमत्राग्निना युक्ता गमिष्यामः परां गतिम् ॥

gaccha saṃjaya yatrāgnirna tvāṃ dahati karhicit | vayamatrāgninā yuktā gamiṣyāmaḥ parāṃ gatim

सञ्जय! तुम वहाँ चले जाओ जहाँ अग्नि तुम्हें कभी न जला सके। हम यहीं अग्नि से संयुक्त होकर परम गति को जाएँगे।

नारद उवाच

श्लोक 24 (15.39.24)

तमुवाच किलोद्विग्नः संजयो वदतांवरः । राजन्मृत्युरनिष्टोऽयं भविता ते वृथाऽग्निना ॥

tamuvāca kilodvignaḥ saṃjayo vadatāṃvaraḥ | rājanmṛtyuraniṣṭo'yaṃ bhavitā te vṛthā'gninā

तब वक्ताओं में श्रेष्ठ सञ्जय ने अत्यन्त व्याकुल होकर उनसे कहा, "राजन्! अग्नि से यह आपकी मृत्यु अनिष्ट होगी और व्यर्थ होगी।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 25 (15.39.25)

न चोपायं प्रपश्यामि मोक्षणे जातवेदसः । यदत्रानन्तरं कार्यं तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥

na copāyaṃ prapaśyāmi mokṣaṇe jātavedasaḥ | yadatrānantaraṃ kāryaṃ tadbhavānvaktumarhati

अग्नि से छूटने का कोई उपाय मुझे नहीं दिखाई देता। अब आगे क्या करना चाहिए, यह आप ही बताइए।

नारद उवाच

श्लोक 26 (15.39.26)

इत्युक्तः संजयेनेदं पुनराह स पार्थिवः । नैष मृत्युरनिष्टो नो निःसृतानां गृहात्स्वयम् ॥

ityuktaḥ saṃjayenedaṃ punarāha sa pārthivaḥ | naiṣa mṛtyuraniṣṭo no niḥsṛtānāṃ gṛhātsvayam

सञ्जय के यह कहने पर राजा ने फिर कहा, "अपने आप घर से निकले हुए हम लोगों के लिए यह मृत्यु अनिष्ट नहीं है।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 27 (15.39.27)

जलमग्निस्तथा वायुरथवाऽपि विकर्षणम् । तापसानां प्रशस्यं ते गच्छ संजय माचिरम् ॥

jalamagnistathā vāyurathavā'pi vikarṣaṇam | tāpasānāṃ praśasyaṃ te gaccha saṃjaya māciram

जल, अग्नि, वायु अथवा उपवास तपस्वियों के लिए प्रशंसनीय हैं। सञ्जय! तुम देर मत करो, जाओ।"

नारद उवाच

श्लोक 28 (15.39.28)

इत्युक्त्वा संजयं राजा समाधाय मनस्तथा । प्राङ्मुखः सह गान्धार्या कुन्त्या चोपाविशत्तदा ॥

ityuktvā saṃjayaṃ rājā samādhāya manastathā | prāṅmukhaḥ saha gāndhāryā kuntyā copāviśattadā

सञ्जय से यह कहकर राजा ने मन को एकाग्र किया और गान्धारी तथा कुन्ती के साथ पूर्व की ओर मुख करके बैठ गए।

श्लोक 29 (15.39.29)

संजयस्तं तथा दृष्ट्वा प्रदक्षिणमथाकरोत् । उवाच चैनं मेधावी युङ्क्ष्वात्मानमिति प्रभो ॥

saṃjayastaṃ tathā dṛṣṭvā pradakṣiṇamathākarot | uvāca cainaṃ medhāvī yuṅkṣvātmānamiti prabho

उन्हें इस प्रकार देखकर सञ्जय ने उनकी प्रदक्षिणा की और उस मेधावी ने उनसे कहा, "प्रभो! अपने को योग में लगाइए।"

श्लोक 30 (15.39.30)

ऋषिपुत्रो मनीषी स राजा चक्रेऽस्य तद्वचः । सन्निरुध्येन्द्रियग्राममासीत्काष्ठोपमस्तदा ॥

ṛṣiputro manīṣī sa rājā cakre'sya tadvacaḥ | sannirudhyendriyagrāmamāsītkāṣṭhopamastadā

ऋषिपुत्र उन बुद्धिमान् राजा ने सञ्जय का वह वचन माना और इन्द्रियों के समूह को भलीभाँति रोककर वे उस समय काठ के समान निश्चल हो गए।

श्लोक 31 (15.39.31)

गान्धारी च महाभागा जननी च पृथा तव । दावाग्निना समायुक्ते स च राजा पिता तव ॥

gāndhārī ca mahābhāgā jananī ca pṛthā tava | dāvāgninā samāyukte sa ca rājā pitā tava

महाभागा गान्धारी, आपकी माता पृथा और आपके पिता वे राजा, तीनों दावाग्नि से घिर गए।

श्लोक 32 (15.39.32)

संजयस्तु महाप्राज्ञस्तस्माद्दावादमुच्यत । गङ्गाकूले मया दृष्टस्तापसैः परिवारितः ॥

saṃjayastu mahāprājñastasmāddāvādamucyata | gaṅgākūle mayā dṛṣṭastāpasaiḥ parivāritaḥ

परन्तु महाप्राज्ञ सञ्जय उस दावानल से बच गए; मैंने उन्हें गङ्गा के किनारे तपस्वियों से घिरा हुआ देखा।

श्लोक 33 (15.39.33)

स तानामन्त्र्य तेजस्वी निवेद्यैतच्च सर्वशः । प्रययौ संजयो धीमान्हिमवन्तं महीधरम् ॥

sa tānāmantrya tejasvī nivedyaitacca sarvaśaḥ | prayayau saṃjayo dhīmānhimavantaṃ mahīdharam

उन तेजस्वी, बुद्धिमान् सञ्जय ने उनसे विदा लेकर और यह सब उन्हें बताकर हिमालय पर्वत की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 34 (15.39.34)

एवं स निधनं प्राप्तः कुरुराजो महामनाः । गान्धारी च पृथा चैव जनन्यौ ते विशाम्पते ॥

evaṃ sa nidhanaṃ prāptaḥ kururājo mahāmanāḥ | gāndhārī ca pṛthā caiva jananyau te viśāmpate

हे विशाम्पते! इस प्रकार महामना कुरुराज का निधन हुआ, और आपकी दोनों माताओं, गान्धारी तथा पृथा का भी।

श्लोक 35 (15.39.35)

यदृच्छयाऽनुव्रजता मया राज्ञः कलेवरम् । तयोश्च देव्योरुभयोर्मया दृष्टानि भारत ॥

yadṛcchayā'nuvrajatā mayā rājñaḥ kalevaram | tayośca devyorubhayormayā dṛṣṭāni bhārata

हे भारत! संयोग से उनके पीछे-पीछे जाते हुए मैंने राजा का शरीर और उन दोनों देवियों के शरीर देखे।

श्लोक 36 (15.39.36)

ततस्तपोवने तस्मिन्समाजग्मुस्तपोधनाः । श्रुत्वा राज्ञस्तदा निष्ठां न त्वशोचन्गतीश्च ते ॥

tatastapovane tasminsamājagmustapodhanāḥ | śrutvā rājñastadā niṣṭhāṃ na tvaśocangatīśca te

तब उस तपोवन में तपस्वी इकट्ठे हुए; राजा की इस परिणति को सुनकर उन्होंने उनकी गति पर शोक नहीं किया।

श्लोक 37 (15.39.37)

तत्राश्रौषमहं सर्वमेतत्पुरुषसत्तम । यथा च नृपतिर्दग्धो देव्यौ ते चेति पाण्डव ॥

tatrāśrauṣamahaṃ sarvametatpuruṣasattama | yathā ca nṛpatirdagdho devyau te ceti pāṇḍava

हे पुरुषश्रेष्ठ! वहीं मैंने यह सब सुना कि राजा और आपकी दोनों माताएँ कैसे जल गईं, हे पाण्डव।

श्लोक 38 (15.39.38)

न शोचितव्यं राजेन्द्र स्वर्गस्थः पृथिवीपतिः । प्राप्तवानग्निसंयोगं गान्धारी जननी च ते ॥

na śocitavyaṃ rājendra svargasthaḥ pṛthivīpatiḥ | prāptavānagnisaṃyogaṃ gāndhārī jananī ca te

राजेन्द्र! आपको शोक नहीं करना चाहिए; पृथ्वीपति स्वर्ग में हैं। उन्होंने अग्नि का संयोग प्राप्त किया, और गान्धारी तथा आपकी माता ने भी।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 39 (15.39.39)

एतच्छ्रुत्वा च सर्वेषां पाण्डवानां महात्मनाम् । निर्याणं धृतराष्ट्रस्य शोकः समभवन्महान् ॥

etacchrutvā ca sarveṣāṃ pāṇḍavānāṃ mahātmanām | niryāṇaṃ dhṛtarāṣṭrasya śokaḥ samabhavanmahān

धृतराष्ट्र के निधन का यह समाचार सुनकर सभी महात्मा पाण्डवों को महान् शोक हुआ।

श्लोक 40 (15.39.40)

अन्तःपुराणां च तदा महानार्तस्वरोऽभवत् । पौराणां च महाराज श्रुत्वा राज्ञस्तदा गतिम् ॥

antaḥpurāṇāṃ ca tadā mahānārtasvaro'bhavat | paurāṇāṃ ca mahārāja śrutvā rājñastadā gatim

हे महाराज! राजा की गति सुनकर अन्तःपुर की स्त्रियों में और पुरवासियों में भी महान् आर्तनाद उठा।

श्लोक 41 (15.39.41)

अहो धिगिति राजा तु विक्रुश्य भृशदुःखितः । ऊर्ध्वबाहुः स्मरन्मातुः प्ररुरोद युधिष्ठिरः ॥

aho dhigiti rājā tu vikruśya bhṛśaduḥkhitaḥ | ūrdhvabāhuḥ smaranmātuḥ praruroda yudhiṣṭhiraḥ

"हाय, धिक्कार है!" कहकर अत्यन्त दुःखी राजा युधिष्ठिर भुजाएँ उठाकर माता को स्मरण करते हुए रोने लगे।

श्लोक 42 (15.39.42)

भीमसेनपुरोगाश्च भ्रातरः सर्व एव ते । रुरुदुर्दुःखसंतप्ता वर्णयन्तः पृथां तदा ॥

bhīmasenapurogāśca bhrātaraḥ sarva eva te | rurudurduḥkhasaṃtaptā varṇayantaḥ pṛthāṃ tadā

भीमसेन आदि सभी भाई भी दुःख से सन्तप्त होकर पृथा के गुणों का स्मरण करते हुए रोने लगे।

श्लोक 43 (15.39.43)

अन्तःपुरेषु च तदा सुमहान्रुदितस्वनः । प्रादुरासीन्महाराज पृथां श्रुत्वा तथागताम् ॥

antaḥpureṣu ca tadā sumahānruditasvanaḥ | prādurāsīnmahārāja pṛthāṃ śrutvā tathāgatām

हे महाराज! पृथा की ऐसी गति सुनकर अन्तःपुर में रोने का भारी शब्द उठा।

श्लोक 44 (15.39.44)

तं च वृद्धं तथा दग्धं हतपुत्रं नराधिपम् । अन्वशोचन्त ते सर्वे गान्धारीं च तपस्विनीम् ॥

taṃ ca vṛddhaṃ tathā dagdhaṃ hataputraṃ narādhipam | anvaśocanta te sarve gāndhārīṃ ca tapasvinīm

उन सबने वृद्ध, पुत्रहीन और दग्ध हुए उन राजा के लिए तथा तपस्विनी गान्धारी के लिए भी शोक किया।

श्लोक 45 (15.39.45)

तस्मिन्नुपरते शब्दे मुहूर्तादिव भारत । निगृह्य बाष्पं धैर्येण धर्मराजोऽब्रवीदिदम् ॥

tasminnuparate śabde muhūrtādiva bhārata | nigṛhya bāṣpaṃ dhairyeṇa dharmarājo'bravīdidam

हे भारत! वह शब्द शान्त हो जाने पर थोड़ी देर बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने धैर्य से आँसू रोककर यह कहा।

अध्याय 38अध्याय-सूचीअध्याय 40