आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 38
पाण्डवों की विदा और हस्तिनापुर वापसी
जनमेजय पूछते हैं कि मृतकों के दर्शन के बाद धृतराष्ट्र और युधिष्ठिर ने क्या किया। व्यास धृतराष्ट्र से कहते हैं कि युधिष्ठिर को लौटा दो, और वृद्ध राजा उन्हें जाने को कहते हैं; युधिष्ठिर और फिर सहदेव वन में ही रुकने की विनती करते हैं, पर गान्धारी और कुन्ती उन्हें जाने का आग्रह करती हैं। पाण्डव बड़ों से विदा लेकर धृतराष्ट्र की प्रदक्षिणा करते हैं और पत्नियों सहित हस्तिनापुर लौट जाते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (15.38.1)
दृष्ट्वा पुत्रांस्तथा पौत्रान्सानुबन्धाञ्जनाधिपः । धृतराष्ट्रः किमकरोद्राजा चैव युधिष्ठिरः ॥
dṛṣṭvā putrāṃstathā pautrānsānubandhāñjanādhipaḥ | dhṛtarāṣṭraḥ kimakarodrājā caiva yudhiṣṭhiraḥ
अपने पुत्रों और पौत्रों को उनके सम्बन्धियों सहित देखकर प्रजापति धृतराष्ट्र ने क्या किया, और राजा युधिष्ठिर ने क्या किया?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (15.38.2)
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं पुत्राणां दर्शनं पुनः । वीतशोकः स राजर्षिः पुनराश्रममागमत् ॥
taddṛṣṭvā mahadāścaryaṃ putrāṇāṃ darśanaṃ punaḥ | vītaśokaḥ sa rājarṣiḥ punarāśramamāgamat
पुत्रों के फिर से दर्शन का वह महान् आश्चर्य देखकर शोक से मुक्त हुए राजर्षि फिर अपने आश्रम को लौट आए।
श्लोक 3 (15.38.3)
इतरस्तु जनः सर्वस्ते चैव परमर्षयः । प्रतिजग्मुर्यथाकामं धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञया ॥
itarastu janaḥ sarvaste caiva paramarṣayaḥ | pratijagmuryathākāmaṃ dhṛtarāṣṭrābhyanujñayā
शेष सब लोग और वे महर्षि भी धृतराष्ट्र की अनुमति से अपनी इच्छा के अनुसार लौट गए।
श्लोक 4 (15.38.4)
पाण्डवास्तु महात्मानो लघुभूयिष्ठसैनिकाः । अनुजग्मुर्महात्मानं सदारास्तं महीपतिम् ॥
pāṇḍavāstu mahātmāno laghubhūyiṣṭhasainikāḥ | anujagmurmahātmānaṃ sadārāstaṃ mahīpatim
महात्मा पाण्डव थोड़े-से सैनिकों और अपनी पत्नियों के साथ उन महात्मा राजा के पीछे-पीछे गए।
श्लोक 5 (15.38.5)
तमाश्रमगतं धीमान्ब्रह्मर्षिर्लोकपूजितः । द्वैपायनोऽभ्युपागम्य राजानमिदमब्रवीत् ॥
tamāśramagataṃ dhīmānbrahmarṣirlokapūjitaḥ | dvaipāyano'bhyupāgamya rājānamidamabravīt
जब वे आश्रम में थे, तब संसार के पूज्य बुद्धिमान् ब्रह्मर्षि द्वैपायन उनके पास आकर राजा से यह बोले —
व्यास उवाच
श्लोक 6 (15.38.6)
धृतराष्ट्र महाबाहो शृणु कौरवनन्दन । श्रुतास्ते ज्ञानवृद्धानामृषीणां पुण्यकर्मणाम् ॥
dhṛtarāṣṭra mahābāho śṛṇu kauravanandana | śrutāste jñānavṛddhānāmṛṣīṇāṃ puṇyakarmaṇām
हे महाबाहु धृतराष्ट्र, कुरुनन्दन! सुनो। तुमने ज्ञान में वृद्ध और पुण्यकर्मा ऋषियों से सुना है,
श्लोक 7 (15.38.7)
ऋद्धाभिजनवृद्धानां वेदवेदाङ्गवेदिनाम् । धर्मज्ञानां पुराणानां वदतां विविधाः कथाः ॥
ṛddhābhijanavṛddhānāṃ vedavedāṅgavedinām | dharmajñānāṃ purāṇānāṃ vadatāṃ vividhāḥ kathāḥ
जो समृद्ध और उच्च कुल में उत्पन्न तथा वयोवृद्ध हैं, वेद-वेदाङ्गों के ज्ञाता हैं, धर्म और पुराणों को जानते हैं, उन वक्ताओं की नाना प्रकार की कथाएँ।
श्लोक 8 (15.38.8)
मा स्म शोके मनः कार्षीर्दिष्टे न व्यथते बुधः । श्रुतं देवरहस्यं ते नारदाद्देवदर्शनात् ॥
mā sma śoke manaḥ kārṣīrdiṣṭe na vyathate budhaḥ | śrutaṃ devarahasyaṃ te nāradāddevadarśanāt
शोक में मन मत लगाओ; विवेकी पुरुष दैव के विधान से व्यथित नहीं होता। देवताओं को देखने वाले नारद से तुम देवताओं का रहस्य सुन चुके हो।
श्लोक 9 (15.38.9)
गतास्ते क्षत्रधर्मेण शस्त्रपूतां गतिं शुभाम् । यथा दृष्टास्त्वया पुत्रास्तथा कामविहारिणः ॥
gatāste kṣatradharmeṇa śastrapūtāṃ gatiṃ śubhām | yathā dṛṣṭāstvayā putrāstathā kāmavihāriṇaḥ
वे क्षत्रिय-धर्म के अनुसार शस्त्रों से पवित्र हुई शुभ गति को प्राप्त हुए; जैसा तुमने अपने पुत्रों को देखा, वे इच्छानुसार विचरने वाले हैं।
श्लोक 10 (15.38.10)
युधिष्ठिरः स्वयं धीमान्भवन्तमनुरुध्यते । सहितो भ्रातृभिः सर्वैः सदारः ससुहृज्जनः ॥
yudhiṣṭhiraḥ svayaṃ dhīmānbhavantamanurudhyate | sahito bhrātṛbhiḥ sarvaiḥ sadāraḥ sasuhṛjjanaḥ
बुद्धिमान् युधिष्ठिर अपने सब भाइयों, पत्नी और सुहृदों के साथ स्वयं तुम्हारा मन रखने के लिए यहाँ रुका हुआ है।
श्लोक 11 (15.38.11)
विसर्जयैनं यात्वेष स्वराज्यमनुशासताम् । मासः समधिकस्तेषामतीतो वसतां वने ॥
visarjayainaṃ yātveṣa svarājyamanuśāsatām | māsaḥ samadhikasteṣāmatīto vasatāṃ vane
इसे विदा करो; यह जाकर अपने राज्य का शासन करे। वन में रहते हुए इन लोगों का एक मास से अधिक बीत चुका है।
श्लोक 12 (15.38.12)
एतद्धि नित्यं यत्नेन पदं रक्ष्यं नराधिप । बहुप्रत्यर्थिकं ह्येतद्राज्यं नाम कुरूद्वह ॥
etaddhi nityaṃ yatnena padaṃ rakṣyaṃ narādhipa | bahupratyarthikaṃ hyetadrājyaṃ nāma kurūdvaha
हे नराधिप! इस पद की सदा प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए; हे कुरुश्रेष्ठ! राज्य नाम की यह वस्तु बहुत-से शत्रुओं वाली होती है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (15.38.13)
इत्युक्तः कौरवो राजा व्यासेनामितबुद्धिना । युधिष्ठिरमथाहूय वाग्मी वचनमब्रवीत् ॥
ityuktaḥ kauravo rājā vyāsenāmitabuddhinā | yudhiṣṭhiramathāhūya vāgmī vacanamabravīt
अपार बुद्धि वाले व्यास के इस प्रकार कहने पर कुरुराज ने युधिष्ठिर को बुलाकर वाक्पटुता से कहा।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 14 (15.38.14)
अजातशत्रो भद्रं ते शृणु मे भ्रातृभिः सह । त्वत्प्रसादान्महीपाल शोको नास्मान्प्रबाधते ॥
ajātaśatro bhadraṃ te śṛṇu me bhrātṛbhiḥ saha | tvatprasādānmahīpāla śoko nāsmānprabādhate
हे अजातशत्रु! तुम्हारा कल्याण हो। भाइयों सहित मेरी बात सुनो। हे महीपाल! तुम्हारी कृपा से शोक हमें नहीं सताता।
श्लोक 15 (15.38.15)
रमे चाहं त्वया पुत्र पुरेव गजसाहये । नाथेनानुगतो विद्वन्प्रियेषु परिवर्तिना ॥
rame cāhaṃ tvayā putra pureva gajasāhaye | nāthenānugato vidvanpriyeṣu parivartinā
पुत्र! मैं तुम्हारे साथ वैसे ही प्रसन्न रहता हूँ जैसे पहले हस्तिनापुर में रहता था — हे विद्वान्! तुम मेरे नाथ बनकर मेरे प्रिय कार्यों में लगे रहते हो।
श्लोक 16 (15.38.16)
प्राप्तं पुत्रफलं त्वत्तः प्रीतिर्मे परमा त्वयि । न मे मन्युर्महाबाहो गम्यतां मा चिरं कृथाः ॥
prāptaṃ putraphalaṃ tvattaḥ prītirme paramā tvayi | na me manyurmahābāho gamyatāṃ mā ciraṃ kṛthāḥ
मुझे तुमसे पुत्र का फल मिल चुका है, तुम पर मेरी परम प्रीति है। हे महाबाहो! मुझे कोई क्रोध नहीं है; जाओ, देर मत करो।
श्लोक 17 (15.38.17)
भवन्तं चेह संप्रेक्ष्य तपो मे परिहीयते । उपयुक्तं शरीरं च त्वां दृष्ट्वा धारितं पुनः ॥
bhavantaṃ ceha saṃprekṣya tapo me parihīyate | upayuktaṃ śarīraṃ ca tvāṃ dṛṣṭvā dhāritaṃ punaḥ
तुम्हें यहाँ देखकर मेरा तप घटता है; और यह जर्जर शरीर तुम्हें देखकर फिर टिका रहा है।
श्लोक 18 (15.38.18)
मातरौ ते तथैवेमे शीर्णपर्णकृताशने । मम तुल्यव्रते पुत्र न चिरं वर्तयिष्यतः ॥
mātarau te tathaiveme śīrṇaparṇakṛtāśane | mama tulyavrate putra na ciraṃ vartayiṣyataḥ
और तुम्हारी ये दोनों माताएँ भी, जो सूखे पत्तों का आहार करती हैं और मेरे समान व्रत रखती हैं, अधिक दिन नहीं जिएँगी।
श्लोक 19 (15.38.19)
दुर्योधनप्रभृतयो दृष्टा लोकान्तरं गताः । व्यासस्य तपसो वीर्याद्भवतश्च समागमात् ॥
duryodhanaprabhṛtayo dṛṣṭā lokāntaraṃ gatāḥ | vyāsasya tapaso vīryādbhavataśca samāgamāt
दुर्योधन आदि को हमने देखा; वे व्यास के तप के प्रभाव से और तुम्हारे मिलने से परलोक को चले गए।
श्लोक 20 (15.38.20)
प्रयोजनं चिरं वृत्तं जीवितस्य ममानघ । उग्रं तपः समास्थास्येत्वमनुज्ञातुमर्हसि ॥
prayojanaṃ ciraṃ vṛttaṃ jīvitasya mamānagha | ugraṃ tapaḥ samāsthāsyetvamanujñātumarhasi
हे निष्पाप! मेरे जीवन का प्रयोजन बहुत पहले पूरा हो चुका है। मैं उग्र तप करूँगा; तुम्हें मुझे आज्ञा देनी चाहिए।
श्लोक 21 (15.38.21)
त्वय्यद्य पिण्डः कीर्तिश्च कुलं चेदं प्रतिष्ठितम् । श्वोवाऽद्य वा महाबाहो गम्यतां माचिरं कृथाः ॥
tvayyadya piṇḍaḥ kīrtiśca kulaṃ cedaṃ pratiṣṭhitam | śvovā'dya vā mahābāho gamyatāṃ māciraṃ kṛthāḥ
आज तुम्हीं में पिण्ड, कीर्ति और यह कुल प्रतिष्ठित है। हे महाबाहो! आज या कल जाओ, देर मत करो।
श्लोक 22 (15.38.22)
राजनीतिः सुबहुशः श्रुता ते भरतर्षभ । संदेष्टव्यं न पश्यामि कृतमेतावता विभो ॥
rājanītiḥ subahuśaḥ śrutā te bharatarṣabha | saṃdeṣṭavyaṃ na paśyāmi kṛtametāvatā vibho
हे भरतश्रेष्ठ! राजनीति तुमने बहुत सुनी है; मुझे तुम्हें और कुछ सिखाने को नहीं दीखता। हे विभो! इतना ही बहुत है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (15.38.23)
इत्युक्तवचनं तं तु नृपो राजानमब्रवीत् । न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् ॥
ityuktavacanaṃ taṃ tu nṛpo rājānamabravīt | na māmarhasi dharmajña parityaktumanāgasam
इस प्रकार कहे जाने पर राजा युधिष्ठिर ने राजा से कहा — "हे धर्मज्ञ! मुझ निरपराध को आपको त्यागना उचित नहीं है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 24 (15.38.24)
कामं गच्छन्तु मे सर्वे भ्रातरोऽनुचरास्तथा । भवन्तमहमन्विष्ये मातरौ च यतव्रतः ॥
kāmaṃ gacchantu me sarve bhrātaro'nucarāstathā | bhavantamahamanviṣye mātarau ca yatavrataḥ
चाहें तो मेरे सब भाई और सेवक चले जाएँ; मैं नियमों का पालन करता हुआ आपकी और अपनी दोनों माताओं की सेवा करूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (15.38.25)
तमुवाचाथ गान्धारी मैवं पुत्र शृणुष्व च । त्वय्यधीनं कुरुकुलं पिण्डश्च श्वशुरस्य मे ॥
tamuvācātha gāndhārī maivaṃ putra śṛṇuṣva ca | tvayyadhīnaṃ kurukulaṃ piṇḍaśca śvaśurasya me
तब गान्धारी ने उससे कहा — "पुत्र! ऐसा मत कहो, सुनो। कुरुकुल तुम्हारे ही अधीन है और मेरे श्वशुर का पिण्ड भी।
गान्धार्युवाच
श्लोक 26 (15.38.26)
गम्यतां पुत्र पर्याप्तमेतावत्पूजिता वयम् । राजा यदाह तत्कार्यं त्वया पुत्र पितुर्वचः ॥
gamyatāṃ putra paryāptametāvatpūjitā vayam | rājā yadāha tatkāryaṃ tvayā putra piturvacaḥ
पुत्र! जाओ; इतना बहुत है, हमारा सत्कार हो चुका। राजा जो कहें वही तुम्हें करना चाहिए, पुत्र; वह तुम्हारे पिता का वचन है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (15.38.27)
इत्युक्तः स तु गान्धार्या कुन्तीमिदमभाषत । स्नेहबाष्पाकुले नेत्रे परिमृज्य विनीतवत् ॥
ityuktaḥ sa tu gāndhāryā kuntīmidamabhāṣata | snehabāṣpākule netre parimṛjya vinītavat
गान्धारी के ऐसा कहने पर उसने स्नेह के आँसुओं से भरी आँखें पोंछकर विनय के साथ कुन्ती से यह कहा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 28 (15.38.28)
विसर्जयति मां राजा गान्धारी च यशस्विनी । भवत्यां बद्धचित्तस्तु कथं यास्यामि दुःखितः ॥
visarjayati māṃ rājā gāndhārī ca yaśasvinī | bhavatyāṃ baddhacittastu kathaṃ yāsyāmi duḥkhitaḥ
"राजा और यशस्विनी गान्धारी मुझे विदा कर रहे हैं, पर मेरा चित्त आप में बँधा है; मैं दुःखी होकर कैसे जाऊँ?
श्लोक 29 (15.38.29)
न चोत्सहे तपोविघ्नं कर्तुं ते धर्मचारिणि । तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत् ॥
na cotsahe tapovighnaṃ kartuṃ te dharmacāriṇi | tapaso hi paraṃ nāsti tapasā vindate mahat
हे धर्मचारिणी! मैं आपके तप में विघ्न डालने का साहस नहीं कर सकता। तप से बढ़कर कुछ नहीं है; तप से महान् फल प्राप्त होता है।
श्लोक 30 (15.38.30)
ममापि न तथा राज्ञि राज्ये बुद्धिर्यथा पुरा । तपस्येवानुरक्तं मे मनः सर्वात्मना तथा ॥
mamāpi na tathā rājñi rājye buddhiryathā purā | tapasyevānuraktaṃ me manaḥ sarvātmanā tathā
हे रानी! अब मेरी बुद्धि राज्य में वैसी नहीं रही जैसी पहले थी; मेरा मन सब प्रकार से तप में ही अनुरक्त है।
श्लोक 31 (15.38.31)
शून्येयं च मही कृत्स्ना न मे प्रीतिकरी शुभे । बान्धवा नः परिक्षीणा बलं नो न यथा पुरा ॥
śūnyeyaṃ ca mahī kṛtsnā na me prītikarī śubhe | bāndhavā naḥ parikṣīṇā balaṃ no na yathā purā
हे शुभे! यह सारी पृथ्वी सूनी है और मुझे प्रसन्न नहीं करती। हमारे बन्धु नष्ट हो गए, और हमारा बल भी पहले जैसा नहीं रहा।
श्लोक 32 (15.38.32)
पाञ्चालाः सुभृशं क्षीणाः कन्यामात्रावशेषिताः । न तेषां कुलकर्तारं कञ्चित्पश्याम्यहं शुभे ॥
pāñcālāḥ subhṛśaṃ kṣīṇāḥ kanyāmātrāvaśeṣitāḥ | na teṣāṃ kulakartāraṃ kañcitpaśyāmyahaṃ śubhe
पाञ्चाल बहुत क्षीण हो गए हैं, केवल कन्याएँ ही बची हैं; हे शुभे! मुझे उनके कुल को चलाने वाला कोई नहीं दीखता।
श्लोक 33 (15.38.33)
सर्वे हि भस्मसान्नीतास्ते द्रोणेन रणाजिरे । अवशिष्टाश्च निहता द्रोणपुत्रेण वै निशि । चेदयश्चैव मत्स्याश्च दृष्टपूर्वास्तथैव नः ॥
sarve hi bhasmasānnītāste droṇena raṇājire | avaśiṣṭāśca nihatā droṇaputreṇa vai niśi | cedayaścaiva matsyāśca dṛṣṭapūrvāstathaiva naḥ
वे सब रणभूमि में द्रोण द्वारा भस्म कर दिए गए, और जो बचे थे उन्हें द्रोणपुत्र ने रात में मार डाला। चेदि और मत्स्य भी हमने केवल पहले ही देखे थे।
श्लोक 34 (15.38.34)
केवलं वृष्णिचक्रं च वासुदेवपरिग्रहात् । यद्दृष्ट्वा स्थातुमिच्छामि धर्मार्थं नार्थहेतुतः ॥
kevalaṃ vṛṣṇicakraṃ ca vāsudevaparigrahāt | yaddṛṣṭvā sthātumicchāmi dharmārthaṃ nārthahetutaḥ
केवल वृष्णियों का समूह बचा है, क्योंकि उसे वासुदेव का संरक्षण प्राप्त है; उसे देखकर मैं रुकना चाहता हूँ — धर्म के लिए, धन के लिए नहीं।
श्लोक 35 (15.38.35)
शिवेन पश्य नः सर्वान्दुर्लभं तव दर्शनम् । भविष्यत्यंब राजा हि तीव्रं चारप्स्यते तपः ॥
śivena paśya naḥ sarvāndurlabhaṃ tava darśanam | bhaviṣyatyaṃba rājā hi tīvraṃ cārapsyate tapaḥ
हम सबको कल्याण-दृष्टि से देखिए; आपके दर्शन दुर्लभ होंगे। क्योंकि हे माता! राजा कठोर तप आरम्भ करेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 36 (15.38.36)
एतच्छ्रुत्वा महाबाहुः सहदेवो युधांपतिः । युधिष्ठिरमुवाचेदं बाष्पव्याकुललोचनः ॥
etacchrutvā mahābāhuḥ sahadevo yudhāṃpatiḥ | yudhiṣṭhiramuvācedaṃ bāṣpavyākulalocanaḥ
यह सुनकर महाबाहु योद्धाओं के स्वामी सहदेव ने आँसुओं से भरी आँखों से युधिष्ठिर से यह कहा —
सहदेव उवाच
श्लोक 37 (15.38.37)
नोत्सहेऽहं परित्यक्तुं मातरं भरतर्षभ । प्रतियातु भवान्क्षिप्रं तपस्तप्स्याम्यहं वने ॥
notsahe'haṃ parityaktuṃ mātaraṃ bharatarṣabha | pratiyātu bhavānkṣipraṃ tapastapsyāmyahaṃ vane
"हे भरतश्रेष्ठ! मैं माता को छोड़ने का साहस नहीं कर सकता। आप शीघ्र लौट जाइए; मैं वन में तप करूँगा।
श्लोक 38 (15.38.38)
इहैव शोषयिष्यामि तपसेदं कलेवरम् । पादशुश्रूषणेरक्तो राज्ञो मात्रोस्तथाऽनयोः ॥
ihaiva śoṣayiṣyāmi tapasedaṃ kalevaram | pādaśuśrūṣaṇerakto rājño mātrostathā'nayoḥ
यहीं रहकर मैं तप से इस शरीर को सुखा दूँगा और राजा तथा इन दोनों माताओं के चरणों की सेवा में लगा रहूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 39 (15.38.39)
तमुवाच ततः कुन्ती परिष्वज्य महाभुजम् । गम्यतां पुत्र मैवं त्वं वोचः कुरु वचो मम ॥
tamuvāca tataḥ kuntī pariṣvajya mahābhujam | gamyatāṃ putra maivaṃ tvaṃ vocaḥ kuru vaco mama
तब कुन्ती ने उस महाभुज को गले लगाकर कहा — "पुत्र! जाओ; तुम ऐसा मत कहो; मेरी बात मानो।
कुन्त्युवाच
श्लोक 40 (15.38.40)
आगमा वः शिवाः सन्तु स्वस्था भवत पुत्रकाः । उपरोधो भवेदेवमस्माकं तपसः कृते ॥
āgamā vaḥ śivāḥ santu svasthā bhavata putrakāḥ | uparodho bhavedevamasmākaṃ tapasaḥ kṛte
तुम्हारे आने-जाने कल्याणकारी हों; पुत्रो! स्वस्थ रहो। नहीं तो हमारे तप में विघ्न पड़ेगा।
श्लोक 41 (15.38.41)
त्वत्स्नेहपाशबद्धा च हीयेयं तपसः परात् । तस्मात्पुत्रक गच्छ त्वं शिष्टमल्पं च नः प्रभो ॥
tvatsnehapāśabaddhā ca hīyeyaṃ tapasaḥ parāt | tasmātputraka gaccha tvaṃ śiṣṭamalpaṃ ca naḥ prabho
तुम्हारे स्नेह के पाश में बँधी हुई मैं परम तप से गिर जाऊँगी। इसलिए पुत्र, तुम जाओ; हे प्रभो! हमारा शेष जीवन थोड़ा ही है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 42 (15.38.42)
एवं संस्तंभितं वाक्यैः कुन्त्या बहुविधैर्मनः । सहदेवस्य राजेन्द्र राज्ञश्चैव विशेषतः ॥
evaṃ saṃstaṃbhitaṃ vākyaiḥ kuntyā bahuvidhairmanaḥ | sahadevasya rājendra rājñaścaiva viśeṣataḥ
इस प्रकार कुन्ती के अनेक वचनों से सहदेव का और विशेषतः राजा का मन स्थिर हो गया, हे राजेन्द्र।
श्लोक 43 (15.38.43)
ते मात्रा समनुज्ञाता राज्ञा च कुरुपुङ्गवाः । अभिवाद्य कुरुश्रेष्ठमामन्त्रयितुमारभन् ॥
te mātrā samanujñātā rājñā ca kurupuṅgavāḥ | abhivādya kuruśreṣṭhamāmantrayitumārabhan
माता और राजा की अनुमति पाकर वे कुरुश्रेष्ठ कुरुओं में ज्येष्ठ को प्रणाम करके उनसे विदा माँगने लगे।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 44 (15.38.44)
राज्यं प्रति गमिष्यामः शिवेन प्रतिनन्दितः । अनुज्ञातास्त्वया राजन्गमिष्यामो विकल्मषाः ॥
rājyaṃ prati gamiṣyāmaḥ śivena pratinanditaḥ | anujñātāstvayā rājangamiṣyāmo vikalmaṣāḥ
"हम आपके कल्याणकारी आशीर्वाद से अभिनन्दित होकर अपने राज्य को लौटेंगे; हे राजन्! आपकी आज्ञा पाकर हम निष्पाप होकर जाएँगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 45 (15.38.45)
एवमुक्तः स राजर्षिर्धर्मराज्ञा महात्मना । अनुजज्ञे जयाशीर्भिः पूजयित्वा युधिष्ठिरम् ॥
evamuktaḥ sa rājarṣirdharmarājñā mahātmanā | anujajñe jayāśīrbhiḥ pūjayitvā yudhiṣṭhiram
महात्मा धर्मराज के इस प्रकार कहने पर उन राजर्षि ने विजय के आशीर्वादों से युधिष्ठिर का सत्कार करके उन्हें जाने की अनुमति दी।
श्लोक 46 (15.38.46)
भीमं च बलिनां श्रेष्ठं सान्त्वयामास पार्थिवः । स चास्य सम्यङ्मेधावी प्रत्यपद्यत वीर्यवान् ॥
bhīmaṃ ca balināṃ śreṣṭhaṃ sāntvayāmāsa pārthivaḥ | sa cāsya samyaṅmedhāvī pratyapadyata vīryavān
राजा ने बलवानों में श्रेष्ठ भीम को भी सान्त्वना दी, और बुद्धिमान् तथा पराक्रमी भीम ने उसे भली-भाँति स्वीकार किया।
श्लोक 47 (15.38.47)
अर्जुनं च समाश्लिष्य यंमौ च भरतर्षभौ । अनुजज्ञे स कौरव्यः परिष्वज्याभिनन्द्य च ॥
arjunaṃ ca samāśliṣya yaṃmau ca bharatarṣabhau | anujajñe sa kauravyaḥ pariṣvajyābhinandya ca
अर्जुन को और भरतश्रेष्ठ दोनों जुड़वाँ भाइयों को गले लगाकर तथा उनका अभिनन्दन करके कुरुवंशी राजा ने उन्हें जाने की अनुमति दी।
श्लोक 48 (15.38.48)
गान्धार्या चाभ्यनुज्ञाताः कृतपादाभिवादनाः । जनन्या समुपाघ्राताः परिष्वक्ताश्च ते नृपम् ॥
gāndhāryā cābhyanujñātāḥ kṛtapādābhivādanāḥ | jananyā samupāghrātāḥ pariṣvaktāśca te nṛpam
गान्धारी से आज्ञा पाकर, उनके चरणों में प्रणाम करके, माता से मस्तक सूँघे और आलिंगन किए जाने के बाद वे सब राजा के सामने आए।
श्लोक 49 (15.38.49)
चक्रुः प्रदक्षिणं सर्वे वत्सा इव निवारणे । पुनः पुनर्निरीक्षन्तः प्रचक्रुस्ते प्रदक्षिणम् ॥
cakruḥ pradakṣiṇaṃ sarve vatsā iva nivāraṇe | punaḥ punarnirīkṣantaḥ pracakruste pradakṣiṇam
सबने उनकी प्रदक्षिणा की, जैसे थन से रोके गए बछड़े हों; बार-बार पीछे देखते हुए उन्होंने फिर प्रदक्षिणा की।
श्लोक 50 (15.38.50)
द्रौपदीप्रमुखाश्चैव सर्वाः कौरवयोषितः । न्यायतः श्वशुरे वृत्तिं प्रयुज्य प्रययुस्ततः ॥
draupadīpramukhāścaiva sarvāḥ kauravayoṣitaḥ | nyāyataḥ śvaśure vṛttiṃ prayujya prayayustataḥ
द्रौपदी को आगे करके कुरुकुल की सब स्त्रियाँ अपने श्वशुर के प्रति यथोचित व्यवहार निभाकर तब चल पड़ीं।
श्लोक 51 (15.38.51)
श्वश्रूभ्यां समनुज्ञाताः परिष्वज्याभिनन्दिताः । संदिष्टाश्चेतिकर्तव्यं प्रययुर्भर्तृभिः सह ॥
śvaśrūbhyāṃ samanujñātāḥ pariṣvajyābhinanditāḥ | saṃdiṣṭāścetikartavyaṃ prayayurbhartṛbhiḥ saha
दोनों सासों से आज्ञा पाकर, उनसे गले मिलकर और आशीर्वाद पाकर, तथा करने योग्य बातों की सीख लेकर वे अपने पतियों के साथ चल दीं।
श्लोक 52 (15.38.52)
ततः प्रजज्ञे निनदः सूतानां युज्यतामिति । उष्ट्राणां क्रोशतां चापि हयानां हेषतामपि ॥
tataḥ prajajñe ninadaḥ sūtānāṃ yujyatāmiti | uṣṭrāṇāṃ krośatāṃ cāpi hayānāṃ heṣatāmapi
तब सारथियों की "रथ जोतो!" की पुकार उठी, साथ ही ऊँटों का चिल्लाना और घोड़ों का हिनहिनाना भी।
श्लोक 53 (15.38.53)
ततो युधिष्ठिरो राजा सदारः सहसैनिकः । नगरं हास्तिनपुरं पुनरायात्सबान्धवः ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā sadāraḥ sahasainikaḥ | nagaraṃ hāstinapuraṃ punarāyātsabāndhavaḥ
तब राजा युधिष्ठिर अपनी पत्नी, सैनिकों और बन्धुओं सहित हस्तिनापुर नगर को लौट आए।