आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 37
जनमेजय को परीक्षित के पुनः दर्शन
पुत्रों को देखकर धृतराष्ट्र को राजधर्म और उपनिषद्-ज्ञान की प्राप्ति होती है और विदुर तपोबल से सिद्धि पाते हैं। जनमेजय व्यास से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें भी उनके पिता के दर्शन कराए जाएँ; व्यास परीक्षित को शमीक, शृङ्गी और मृत मन्त्रियों सहित स्वर्ग से ले आते हैं। अवभृथ स्नान के बाद जनमेजय आस्तीक से बात करते हैं, उनका सत्कार करते हैं और वैशम्पायन से वनवास की शेष कथा सुनाने को कहते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (15.37.1)
अदृष्ट्वा तु नृपः पुत्रान्दर्शनं प्रतिलब्धवान् । ऋषेः प्रसादात्पुत्राणां स्वरूपाणां कुरूद्वह ॥
adṛṣṭvā tu nṛpaḥ putrāndarśanaṃ pratilabdhavān | ṛṣeḥ prasādātputrāṇāṃ svarūpāṇāṃ kurūdvaha
जो राजा अपने पुत्रों को देख नहीं पाता था, उसने ऋषि की कृपा से, हे कुरुवंशी, अपने पुत्रों को उनके अपने रूप में फिर देख लिया।
श्लोक 2 (15.37.2)
स राजा राजधर्मांश्च ब्रह्मोपनिषदं तथा । अवाप्तवान्नरश्रेष्ठो बुद्धिनिश्चयमेव च ॥
sa rājā rājadharmāṃśca brahmopaniṣadaṃ tathā | avāptavānnaraśreṣṭho buddhiniścayameva ca
उन नरश्रेष्ठ राजा ने राजधर्मों, ब्रह्मविषयक उपनिषद् और बुद्धि के दृढ़ निश्चय को प्राप्त किया।
श्लोक 3 (15.37.3)
विदुरश्च महाप्राज्ञो ययौ सिद्धिं तपोबलात् । धृतराष्ट्रः समासाद्य व्यासं चैव तपस्विनम् ॥
viduraśca mahāprājño yayau siddhiṃ tapobalāt | dhṛtarāṣṭraḥ samāsādya vyāsaṃ caiva tapasvinam
महाप्राज्ञ विदुर तपोबल से सिद्धि को प्राप्त हुए, और धृतराष्ट्र भी तपस्वी व्यास के समीप पहुँचकर।
जनमेजय उवाच
श्लोक 4 (15.37.4)
ममापि वरदो व्यासो दर्शयेत्पितरं यदि । तद्रूपवेषवयसं श्रद्दध्यां सर्वमेव तत् ॥
mamāpi varado vyāso darśayetpitaraṃ yadi | tadrūpaveṣavayasaṃ śraddadhyāṃ sarvameva tat
यदि वरदायक व्यास मुझे भी मेरे पिता को उसी रूप, वेश और आयु में दिखा दें, तो मैं यह सब मान लूँगा।
श्लोक 5 (15.37.5)
प्रियं मे स्यात्कृतार्थश्च स्यामहं कृतनिश्चयः । प्रसादादृषिमुख्यस्य मम कामः समृद्ध्यताम् ॥
priyaṃ me syātkṛtārthaśca syāmahaṃ kṛtaniścayaḥ | prasādādṛṣimukhyasya mama kāmaḥ samṛddhyatām
यह मुझे प्रिय होगा; मैं कृतार्थ हो जाऊँगा और मेरा संकल्प पूरा हो जाएगा। ऋषिश्रेष्ठ की कृपा से मेरी कामना सफल हो।
सौतिरुवाच
श्लोक 6 (15.37.6)
इत्युक्तवचने तस्मिन्नृपे व्यासः प्रतापवान् । प्रसादमकरोद्धीमानानयच्च परिक्षितम् ॥
ityuktavacane tasminnṛpe vyāsaḥ pratāpavān | prasādamakaroddhīmānānayacca parikṣitam
राजा के इस प्रकार कहने पर प्रतापी और बुद्धिमान् व्यास ने कृपा की और परीक्षित को बुला लिया।
श्लोक 7 (15.37.7)
ततस्तद्रूपवयसमागतं नृपतिं दिवः । श्रीमन्तं पितरं राजा ददर्श स परीक्षितम् ॥
tatastadrūpavayasamāgataṃ nṛpatiṃ divaḥ | śrīmantaṃ pitaraṃ rājā dadarśa sa parīkṣitam
तब राजा ने अपने पिता श्रीमान् परीक्षित को देखा, जो उसी रूप और आयु के साथ स्वर्ग से आए थे।
श्लोक 8 (15.37.8)
शमीकं च महात्मानं पुत्रं तं चास्य शृङ्गिणम् । अमात्या ये च निहता राज्ञस्तांश्च ददर्श ह ॥
śamīkaṃ ca mahātmānaṃ putraṃ taṃ cāsya śṛṅgiṇam | amātyā ye ca nihatā rājñastāṃśca dadarśa ha
उन्होंने महात्मा शमीक को, उनके पुत्र शृङ्गी को और राजा के उन मन्त्रियों को भी देखा जो मारे गए थे।
श्लोक 9 (15.37.9)
ततः सोऽवभृथे राजा मुदितो जनमेजयः । पितरं स्नापयामास स्वयं सस्नौ च पार्थिवः ॥
tataḥ so'vabhṛthe rājā mudito janamejayaḥ | pitaraṃ snāpayāmāsa svayaṃ sasnau ca pārthivaḥ
तब अवभृथ-स्नान के समय प्रसन्न राजा जनमेजय ने अपने पिता को स्वयं स्नान कराया और स्वयं भी स्नान किया।
श्लोक 10 (15.37.10)
परीक्षिदपि तत्रैव बभूव स तिरोहितः । स्नात्वा स नृपतिर्विप्रमास्तीकमिदमब्रवीत् । यायावरकुलोत्पन्नं जरत्कारुसुतं तदा ॥
parīkṣidapi tatraiva babhūva sa tirohitaḥ | snātvā sa nṛpatirvipramāstīkamidamabravīt | yāyāvarakulotpannaṃ jaratkārusutaṃ tadā
परीक्षित भी वहीं अदृश्य हो गए। स्नान करके राजा ने तब यायावर कुल में उत्पन्न जरत्कारु के पुत्र ब्राह्मण आस्तीक से यह कहा —
जनमेजय उवाच
श्लोक 11 (15.37.11)
आस्तीक विविधाश्चर्यो यज्ञेऽयमिति मे मतिः । यदद्यायं पिता प्राप्तो मम शोकप्रणाशनः ॥
āstīka vividhāścaryo yajñe'yamiti me matiḥ | yadadyāyaṃ pitā prāpto mama śokapraṇāśanaḥ
"हे आस्तीक! मेरा विचार है कि यह यज्ञ अनेक आश्चर्यों से भरा हुआ है, क्योंकि आज मेरे शोक को हरने वाले मेरे पिता यहाँ आ पहुँचे।"
आस्तीक उवाच
श्लोक 12 (15.37.12)
ऋषिर्द्वैपायनो यत्र पुराणस्तपसो निधिः । यज्ञे कुरुकुलश्रेष्ठ तस्य लोकावुभौ जितौ ॥
ṛṣirdvaipāyano yatra purāṇastapaso nidhiḥ | yajñe kurukulaśreṣṭha tasya lokāvubhau jitau
हे कुरुकुलश्रेष्ठ! जिसके यज्ञ में तप के निधि, पुराणपुरुष ऋषि द्वैपायन उपस्थित हों, उसने दोनों लोक जीत लिए।
श्लोक 13 (15.37.13)
श्रुतं विचित्रमाख्यानं त्वया पाण्डवनन्दन । सर्पाश्च भस्मसान्नीता गताश्च पदवीं पितुः ॥
śrutaṃ vicitramākhyānaṃ tvayā pāṇḍavanandana | sarpāśca bhasmasānnītā gatāśca padavīṃ pituḥ
हे पाण्डवनन्दन! आपने एक विचित्र आख्यान सुना है — सर्प भस्म कर दिए गए और अपने पिता के मार्ग पर चले गए।
श्लोक 14 (15.37.14)
कथंचित्तक्षको मुक्तः सत्यत्वात्तव पार्थिव । ऋषयः पूजिताः सर्वे गतिर्दृष्टा महात्मनः ॥
kathaṃcittakṣako muktaḥ satyatvāttava pārthiva | ṛṣayaḥ pūjitāḥ sarve gatirdṛṣṭā mahātmanaḥ
हे राजन्! आपकी सत्यनिष्ठा के कारण तक्षक किसी तरह बच गया; सब ऋषियों का सत्कार हुआ और उन महात्मा की गति देख ली गई।
श्लोक 15 (15.37.15)
प्राप्तः सुविपुलो धर्मः श्रुत्वा पापविनाशनम् । विमुक्तो हृदयग्रन्थिरुदारजनदर्शनात् ॥
prāptaḥ suvipulo dharmaḥ śrutvā pāpavināśanam | vimukto hṛdayagranthirudārajanadarśanāt
पाप का नाश करने वाला वृत्तान्त सुनकर बहुत बड़ा धर्म प्राप्त हुआ है, और उदार जनों के दर्शन से हृदय की गाँठ खुल गई है।
श्लोक 16 (15.37.16)
ये च पक्षधरा धर्मे सद्वृत्तरुचयश्च ये । यान्दृष्ट्वा हीयते पापं तेभ्यः कार्या नमस्क्रिया ॥
ye ca pakṣadharā dharme sadvṛttarucayaśca ye | yāndṛṣṭvā hīyate pāpaṃ tebhyaḥ kāryā namaskriyā
जो धर्म के पक्ष को धारण करते हैं और सदाचार में रुचि रखते हैं, जिन्हें देखकर पाप घट जाता है, उन्हें नमस्कार करना चाहिए।
सौतिरुवाच
श्लोक 17 (15.37.17)
एतच्छ्रुत्वा द्विजश्रेष्ठात्स राजा जनमेजयः । पूजयामास तमृषिमनुमान्य पुनःपुनः ॥
etacchrutvā dvijaśreṣṭhātsa rājā janamejayaḥ | pūjayāmāsa tamṛṣimanumānya punaḥpunaḥ
द्विजश्रेष्ठ से यह सुनकर राजा जनमेजय ने उन ऋषि का बार-बार आदर करके उनका सत्कार किया।
श्लोक 18 (15.37.18)
पप्रच्छ तमृषिं चापि वैशम्पायनमच्युतम् । कथावशेषं धर्मज्ञो वनवासस्य सत्तम ॥
papraccha tamṛṣiṃ cāpi vaiśampāyanamacyutam | kathāvaśeṣaṃ dharmajño vanavāsasya sattama
और धर्मज्ञ राजा ने उन अविचल ऋषि वैशम्पायन से, हे सत्तम, वनवास की शेष कथा पूछी।