आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 36
मृतकों के पुनः दर्शन का रहस्य
अपने पूर्वजों के लौटने से प्रसन्न जनमेजय पूछते हैं कि देह त्याग चुके लोग फिर उसी रूप में कैसे दिखाई दे सकते हैं। वैशम्पायन उत्तर देते हैं कि कोई कर्म नष्ट नहीं होता, महाभूत और आत्मा अविनाशी हैं और शरीर अपने कर्मों के अनुसार रूप पाते हैं। अन्त में वे बताते हैं कि विवेकी जन वियोग पर शोक क्यों नहीं करते।
सौतिरुवाच
श्लोक 1 (15.36.1)
एतच्छ्रुत्वा नृपो विद्वान्हृष्टोऽभूज्जनमेजयः । पितामहानां सर्वेषां गमनागमनं तदा ॥
etacchrutvā nṛpo vidvānhṛṣṭo'bhūjjanamejayaḥ | pitāmahānāṃ sarveṣāṃ gamanāgamanaṃ tadā
यह सुनकर विद्वान् राजा जनमेजय अपने सब पितामहों के उस समय के जाने और आने से बहुत प्रसन्न हुए।
श्लोक 2 (15.36.2)
अब्रवीच्च मुदा युक्तः पुनरागमनं प्रति । कथं न त्यक्तदेहानां पुनस्तद्रूपदर्शनम् ॥
abravīcca mudā yuktaḥ punarāgamanaṃ prati | kathaṃ na tyaktadehānāṃ punastadrūpadarśanam
और आनन्द से भरकर उन्होंने उनके लौट आने के विषय में कहा — "जिन्होंने देह त्याग दी है, उनका फिर उसी रूप में दर्शन कैसे हो सकता है?"
श्लोक 3 (15.36.3)
इत्युक्तः स द्विजश्रेष्ठो व्यासशिष्यः प्रतापवान् । प्रोवाच वदतांश्रेष्ठस्तं नृपं जनमेजयम् ॥
ityuktaḥ sa dvijaśreṣṭho vyāsaśiṣyaḥ pratāpavān | provāca vadatāṃśreṣṭhastaṃ nṛpaṃ janamejayam
इस प्रकार कहे जाने पर वक्ताओं में श्रेष्ठ, व्यास के प्रतापी शिष्य उन द्विजश्रेष्ठ ने राजा जनमेजय को उत्तर दिया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (15.36.4)
अविप्रणाशः सर्वेषां कर्मणामिति निश्चयः । कर्मजानि शरीराणि शरीराकृतयस्तथा ॥
avipraṇāśaḥ sarveṣāṃ karmaṇāmiti niścayaḥ | karmajāni śarīrāṇi śarīrākṛtayastathā
यह निश्चित है कि कोई कर्म कभी नष्ट नहीं होता। शरीर कर्म से उत्पन्न होते हैं, और शरीरों के आकार भी वैसे ही।
श्लोक 5 (15.36.5)
महाभूतानि नित्यानि भूताधिपतिसंश्रयात् । तेषां च नित्यसंवासो न विनाशो वियुज्यताम् ॥
mahābhūtāni nityāni bhūtādhipatisaṃśrayāt | teṣāṃ ca nityasaṃvāso na vināśo viyujyatām
महाभूत नित्य हैं, क्योंकि वे प्राणियों के अधिपति के आश्रित हैं; उनका साथ-साथ रहना सदा का है, उनके लिए वियोग ही होता है, विनाश नहीं।
श्लोक 6 (15.36.6)
अनाशाय कृतं कर्म तस्य चेष्टः फलागमः । आत्मा चैभिः समायुक्तः सुखदुःखमुपाश्नुते ॥
anāśāya kṛtaṃ karma tasya ceṣṭaḥ phalāgamaḥ | ātmā caibhiḥ samāyuktaḥ sukhaduḥkhamupāśnute
कर्म नष्ट होने के लिए नहीं किया जाता; उसका फल कर्ता को अवश्य मिलता है। इनसे संयुक्त आत्मा सुख और दुःख का अनुभव करता है।
श्लोक 7 (15.36.7)
अविनाश्यस्तथा नित्यं क्षेत्रज्ञ इति निश्चयः । भूतानामात्मभावो यो ध्रुवोऽसौ संविजानताम् ॥
avināśyastathā nityaṃ kṣetrajña iti niścayaḥ | bhūtānāmātmabhāvo yo dhruvo'sau saṃvijānatām
इसी प्रकार यह भी निश्चित है कि क्षेत्रज्ञ अविनाशी और नित्य है; जो ठीक से जानते हैं, उनके लिए प्राणियों का आत्मभाव अटल है।
श्लोक 8 (15.36.8)
यावन्न क्षीयते कर्म तावत्तस्य स्वरूपता । क्षीणकर्मा नरो लोके रूपान्यत्वमुपाश्नुते ॥
yāvanna kṣīyate karma tāvattasya svarūpatā | kṣīṇakarmā naro loke rūpānyatvamupāśnute
जब तक कर्म क्षीण नहीं होता, तब तक प्राणी का वही स्वरूप बना रहता है; कर्म क्षीण हो जाने पर मनुष्य इस लोक में दूसरा रूप धारण करता है।
श्लोक 9 (15.36.9)
नानाभूतास्तथैकत्वं शरीरं प्राप्य संहताः । भवन्ति ते तथा नित्याः पृथग्भावं विजानताम् ॥
nānābhūtāstathaikatvaṃ śarīraṃ prāpya saṃhatāḥ | bhavanti te tathā nityāḥ pṛthagbhāvaṃ vijānatām
अनेक भूत शरीर पाकर एकत्व को प्राप्त हो संगठित होते हैं; फिर भी जो उनके पृथक् भाव को जानते हैं, उनके लिए वे उसी प्रकार नित्य रहते हैं।
श्लोक 10 (15.36.10)
अश्वमेधश्रुतिश्चेयमश्वसंज्ञपनं प्रति । लोकान्तरगता नित्यं प्राणा नित्या हि वाजिनः ॥
aśvamedhaśrutiśceyamaśvasaṃjñapanaṃ prati | lokāntaragatā nityaṃ prāṇā nityā hi vājinaḥ
अश्वमेध में अश्व के संज्ञपन के विषय में यह श्रुति है — प्राण, जो "वाजी" कहे गए हैं, दूसरे लोकों में जाते हैं और नित्य हैं।
श्लोक 11 (15.36.11)
अहं हितं वदाम्येतत्प्रियं चेत्तव पार्थिव । देवयाना हि पन्थानः श्रुतास्ते यज्ञसंस्तरे ॥
ahaṃ hitaṃ vadāmyetatpriyaṃ cettava pārthiva | devayānā hi panthānaḥ śrutāste yajñasaṃstare
हे राजन्! यदि तुम्हें प्रिय लगे तो मैं तुम्हारे हित की यह बात कहता हूँ — यज्ञ के विधान में तुमने देवताओं तक पहुँचाने वाले मार्गों के विषय में सुना है।
श्लोक 12 (15.36.12)
सुकृतो यत्र यज्ञस्ते तत्र देवा हितास्तव । यदा समन्विता देवाः पशूनां गमनेश्वराः ॥
sukṛto yatra yajñaste tatra devā hitāstava | yadā samanvitā devāḥ paśūnāṃ gamaneśvarāḥ
जहाँ तुम्हारा यज्ञ भली-भाँति सम्पन्न होता है, वहाँ देवता तुम्हारे हितैषी होते हैं — जब देवता पशुओं की गति के स्वामी होकर उपस्थित होते हैं,
श्लोक 13 (15.36.13)
गतिमन्तश्च तेनेष्ट्वा नान्ये नित्या भवन्त्युत । नित्येऽस्मिन्पञ्चके वर्गे नित्ये चात्मनि पूरुषः ॥
gatimantaśca teneṣṭvā nānye nityā bhavantyuta | nitye'sminpañcake varge nitye cātmani pūruṣaḥ
और उसके द्वारा यज्ञ करके जो गति पाते हैं — दूसरे इस प्रकार नित्य नहीं हो जाते। इस नित्य पंचक-वर्ग में और नित्य आत्मा में स्थित पुरुष —
श्लोक 14 (15.36.14)
अस्य नाशं समायोगं यः पश्यति वृथामतिः । वियोगे शोचतेऽत्यर्थं स बाल इति मे मतिः ॥
asya nāśaṃ samāyogaṃ yaḥ paśyati vṛthāmatiḥ | viyoge śocate'tyarthaṃ sa bāla iti me matiḥ
जो मूढ़बुद्धि इसमें नाश देखता है, या इसके मात्र संयोग को देखता है, और वियोग होने पर अत्यन्त शोक करता है, वह बालक है — ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 15 (15.36.15)
वियोगे दोषदर्शी यः संयोगं स विसर्जयेत् । असङ्गे सङ्गमो नास्ति दुःखं भावि वियोगजम् ॥
viyoge doṣadarśī yaḥ saṃyogaṃ sa visarjayet | asaṅge saṅgamo nāsti duḥkhaṃ bhāvi viyogajam
जो वियोग में दोष देखता है, उसे संयोग ही छोड़ देना चाहिए; जहाँ आसक्ति नहीं, वहाँ संयोग नहीं होता, और आगे आने वाला दुःख वियोग से ही उत्पन्न होता है।
श्लोक 16 (15.36.16)
परापरज्ञस्त्वपरो नाभिमानादुदीक्षितः । अपरज्ञः परां बुद्धिं स्पृष्ट्वा मोहाद्विमुच्यते ॥
parāparajñastvaparo nābhimānādudīkṣitaḥ | aparajñaḥ parāṃ buddhiṃ spṛṣṭvā mohādvimucyate
जो परा और अपरा दोनों को जानता है, वह उनसे अलग होकर अभिमान से नहीं देखा जाता; किन्तु केवल अपरा को जानने वाला भी परम बुद्धि का स्पर्श पाकर मोह से छूट जाता है।
श्लोक 17 (15.36.17)
अदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनं गतः । नाहं तं वेद्मि नासौ मां न च मेऽस्ति विरागता ॥
adarśanādāpatitaḥ punaścādarśanaṃ gataḥ | nāhaṃ taṃ vedmi nāsau māṃ na ca me'sti virāgatā
अदृश्य से आया हुआ वह फिर अदृश्य में चला गया — "मैं उसे नहीं जानता, वह मुझे नहीं जानता, फिर भी मुझमें विरक्ति नहीं है।"
श्लोक 18 (15.36.18)
येनयेन शरीरेण करोत्ययमनीश्वरः । तेनतेन शरीरेण तदवश्यमुपाश्नुते । मानसं मनसाऽऽप्नोति शरीरं च शरीरवान् ॥
yenayena śarīreṇa karotyayamanīśvaraḥ | tenatena śarīreṇa tadavaśyamupāśnute | mānasaṃ manasā''pnoti śarīraṃ ca śarīravān
यह विवश जीव जिस-जिस शरीर से कर्म करता है, उसी-उसी शरीर से उसका फल अवश्य भोगता है; शरीरधारी मन से मानसिक फल पाता है और शरीर से शारीरिक।