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आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 35

मृत योद्धाओं का स्वजनों से मिलन और प्रस्थान

पूरी रात मृत योद्धा और उनके परिजन क्रोध और शोक से मुक्त होकर आनन्द से एक-दूसरे से मिलते हैं। प्रातःकाल व्यास उन सबको उनके-उनके लोकों को विदा करते हैं, और जो विधवाएँ पतियों के साथ जाना चाहती हैं वे गंगा में प्रवेश करके उनसे जा मिलती हैं। अध्याय के अन्त में इस वृत्तान्त को सुनने का फल बताया गया है।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (15.35.1)

ततस्ते पुरुषश्रेष्ठाः समाजग्मुः परस्परम् । विगतक्रोधमात्सर्याः सर्वे विगतकल्मषाः ॥

tataste puruṣaśreṣṭhāḥ samājagmuḥ parasparam | vigatakrodhamātsaryāḥ sarve vigatakalmaṣāḥ

तब वे पुरुषश्रेष्ठ क्रोध और ईर्ष्या से रहित तथा सब प्रकार के पाप से मुक्त होकर एक-दूसरे से मिले।

श्लोक 2 (15.35.2)

विधिं परममास्थाय ब्रह्मर्षिविहितं शुभम् । संहृष्टमनसः सर्वे देवलोक इवामराः ॥

vidhiṃ paramamāsthāya brahmarṣivihitaṃ śubham | saṃhṛṣṭamanasaḥ sarve devaloka ivāmarāḥ

ब्रह्मर्षि के विधान किए हुए उस उत्तम और शुभ मार्ग का आश्रय लेकर सब मन में हर्षित थे, मानो देवलोक में देवता हों।

श्लोक 3 (15.35.3)

पुत्रः पित्रा च मात्रा च भार्याश्च पतिभिः सह । भ्रात्रा भ्राता सखा चैव सख्या राजन्समागताः ॥

putraḥ pitrā ca mātrā ca bhāryāśca patibhiḥ saha | bhrātrā bhrātā sakhā caiva sakhyā rājansamāgatāḥ

हे राजन्! पुत्र अपने पिता और माता से, पत्नियाँ अपने पतियों से, भाई भाई से और मित्र मित्र से आ मिले।

श्लोक 4 (15.35.4)

पाण्डवास्तु महेष्वासं कर्णं सौभद्रमेव च । सम्प्रहर्षात्समाजग्मुर्द्रौपदेयांश्च सर्वशः ॥

pāṇḍavāstu maheṣvāsaṃ karṇaṃ saubhadrameva ca | sampraharṣātsamājagmurdraupadeyāṃśca sarvaśaḥ

पाण्डव बड़े हर्ष से महाधनुर्धर कर्ण, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पुत्रों, सभी से मिले।

श्लोक 5 (15.35.5)

ततस्ते प्रीयमाणा वै कर्णेन सह पाण्डवाः । समेत्य पृथिवीपाल सौहृदे च स्थिताऽभवन् ॥

tataste prīyamāṇā vai karṇena saha pāṇḍavāḥ | sametya pṛthivīpāla sauhṛde ca sthitā'bhavan

हे पृथ्वीपाल! तब कर्ण के साथ प्रसन्न होकर पाण्डव मिले और मित्रभाव में स्थित हो गए।

श्लोक 6 (15.35.6)

परस्परं समागम्य योधास्ते भरतर्षभ । मुनेः प्रसादात्ते ह्येवं क्षत्रिया नष्टमन्यवः ॥

parasparaṃ samāgamya yodhāste bharatarṣabha | muneḥ prasādātte hyevaṃ kṣatriyā naṣṭamanyavaḥ

हे भरतश्रेष्ठ! वे योद्धा एक-दूसरे से मिले; मुनि की कृपा से वे क्षत्रिय क्रोध से रहित हो गए।

श्लोक 7 (15.35.7)

असौहृदं परित्यज्य सौहृदे पर्यवस्थिताः । एवं समागताः सर्वे गुरुभिर्बान्धवैः सह ॥

asauhṛdaṃ parityajya sauhṛde paryavasthitāḥ | evaṃ samāgatāḥ sarve gurubhirbāndhavaiḥ saha

वैर त्यागकर वे मित्रभाव में स्थित हो गए। इस प्रकार सब अपने गुरुजनों और बन्धुओं के साथ मिले,

श्लोक 8 (15.35.8)

पुत्रैश्च पुरुषव्याघ्राः कुरवोऽन्ये च पार्थिवाः । तां रात्रिमखिलामेवं विहृत्य प्रीतमानसाः ॥

putraiśca puruṣavyāghrāḥ kuravo'nye ca pārthivāḥ | tāṃ rātrimakhilāmevaṃ vihṛtya prītamānasāḥ

तथा अपने पुत्रों के साथ भी, हे पुरुषसिंहो! कुरुजन और अन्य राजा उस सारी रात इस प्रकार प्रसन्न मन से विहार करके

श्लोक 9 (15.35.9)

मेनिरे परितोषेण नृपाः स्वर्गसदो यथा । नात्र शोको भयं त्रासो नारतिर्नायशोऽभवत् ॥

menire paritoṣeṇa nṛpāḥ svargasado yathā | nātra śoko bhayaṃ trāso nāratirnāyaśo'bhavat

सन्तोष के कारण अपने को स्वर्गवासियों के समान मानने लगे। वहाँ न शोक था, न भय, न त्रास, न अरुचि और न अपयश।

श्लोक 10 (15.35.10)

परस्परं समागम्य योधानां भरतर्षभ । समागतास्ताः पितृभिर्भ्रातृभिः पतिभिः सुतैः । मुदं परमिकां प्राप्य नार्यो दुःखमथात्यजन् ॥

parasparaṃ samāgamya yodhānāṃ bharatarṣabha | samāgatāstāḥ pitṛbhirbhrātṛbhiḥ patibhiḥ sutaiḥ | mudaṃ paramikāṃ prāpya nāryo duḥkhamathātyajan

हे भरतश्रेष्ठ! जब योद्धा आपस में मिल रहे थे, तब स्त्रियाँ भी अपने पिताओं, भाइयों, पतियों और पुत्रों से मिलकर परम आनन्द पाकर अपना दुःख त्याग बैठीं।

श्लोक 11 (15.35.11)

देवलोकं गता ये च ये च ब्रह्मसदो गताः । ये चापि वारुणं लोकं ये च गोलोकमाश्रिताः ॥

devalokaṃ gatā ye ca ye ca brahmasado gatāḥ | ye cāpi vāruṇaṃ lokaṃ ye ca golokamāśritāḥ

जो देवलोक को गए थे, जो ब्रह्मलोक में गए थे, जो वरुणलोक को पहुँचे थे और जिन्होंने गोलोक का आश्रय लिया था;

श्लोक 12 (15.35.12)

तथा वैवस्वतं लोकं ये च यक्षानुपागताः । राक्षसांश्च पिशाचांश्च कुरूंश्चापि तथोत्तरान् ॥

tathā vaivasvataṃ lokaṃ ye ca yakṣānupāgatāḥ | rākṣasāṃśca piśācāṃśca kurūṃścāpi tathottarān

जो यमलोक को गए थे, जो यक्षों, राक्षसों और पिशाचों के पास गए थे और जो उत्तरकुरु में पहुँचे थे;

श्लोक 13 (15.35.13)

विचित्राश्च गतीरन्ये ये प्राप्ताः कर्मभिर्नराः । सर्वे ते तद्वयोरूपवेषास्तत्र समभ्ययुः ॥

vicitrāśca gatīranye ye prāptāḥ karmabhirnarāḥ | sarve te tadvayorūpaveṣāstatra samabhyayuḥ

तथा जो अन्य मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार विविध गतियों को प्राप्त हुए थे — वे सब अपनी पहले जैसी आयु, रूप और वेश में वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 14 (15.35.14)

एकां रात्रिं विहृत्यैवं ते वीरास्ताश्च योषितः । आमन्त्र्यान्योन्यमाश्लिष्य ततो जग्मुर्यथागतं ॥

ekāṃ rātriṃ vihṛtyaivaṃ te vīrāstāśca yoṣitaḥ | āmantryānyonyamāśliṣya tato jagmuryathāgataṃ

इस प्रकार एक रात साथ बिताकर वे वीर और वे स्त्रियाँ एक-दूसरे से विदा लेकर और गले मिलकर जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

श्लोक 15 (15.35.15)

ततो विसर्जयामास लोकांस्तान्मुनिपुङ्गवः । क्षणेनान्तर्हिताश्चैव प्रेक्षतामेव तेऽभवन् ॥

tato visarjayāmāsa lokāṃstānmunipuṅgavaḥ | kṣaṇenāntarhitāścaiva prekṣatāmeva te'bhavan

तब मुनिश्रेष्ठ ने उन लोकों के निवासियों को विदा किया, और वे देखते-देखते ही क्षण भर में अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 16 (15.35.16)

अवगाह्य महात्मानः पुण्यां भागीरथीं नदीम् । सरथाः सध्वजाश्चैव स्वानि वेश्मानि भेजिरे ॥

avagāhya mahātmānaḥ puṇyāṃ bhāgīrathīṃ nadīm | sarathāḥ sadhvajāścaiva svāni veśmāni bhejire

उन महात्माओं ने पवित्र भागीरथी नदी में स्नान किया और रथों तथा ध्वजाओं सहित अपने-अपने निवासों को चले गए।

श्लोक 17 (15.35.17)

देवलोकं ययुः केचित्केचिद्ब्रह्मसदस्तथा । केचिच्च वारुणं लोकं केचित्कौबेरमाप्नुवन् ॥

devalokaṃ yayuḥ kecitkecidbrahmasadastathā | kecicca vāruṇaṃ lokaṃ kecitkauberamāpnuvan

कोई देवलोक को गए, कोई ब्रह्मलोक को, कोई वरुणलोक को और कोई कुबेर के लोक को पहुँचे।

श्लोक 18 (15.35.18)

ततो वैवस्वतं लोकं केचिच्चैवाप्नुवन्नृपाः । राक्षसानां पिशाचानां केचिच्चाप्युत्तरान्कुरून् ॥

tato vaivasvataṃ lokaṃ keciccaivāpnuvannṛpāḥ | rākṣasānāṃ piśācānāṃ keciccāpyuttarānkurūn

फिर कुछ राजा यमलोक को गए, कुछ राक्षसों और पिशाचों के लोकों को, और कुछ उत्तरकुरु को गए।

श्लोक 19 (15.35.19)

विचित्रगतयः सर्वे यानवाप्यामरैः सह । आजग्मुस्ते महात्मानः सवाहाः सपदानुगाः ॥

vicitragatayaḥ sarve yānavāpyāmaraiḥ saha | ājagmuste mahātmānaḥ savāhāḥ sapadānugāḥ

विविध गतियों को पाने वाले वे सब महात्मा, जिन्होंने देवताओं के साथ अपने-अपने लोक प्राप्त किए थे, अपने वाहनों और अनुचरों सहित आए थे।

श्लोक 20 (15.35.20)

गतेषु तेषु सर्वेषु सलिलस्थो महामुनिः । धर्मशीलो महातेजाः कुरूणां हितकृत्सदा । ततः प्रोवाच ताः सर्वाः क्षत्रिया निहतेश्वराः ॥

gateṣu teṣu sarveṣu salilastho mahāmuniḥ | dharmaśīlo mahātejāḥ kurūṇāṃ hitakṛtsadā | tataḥ provāca tāḥ sarvāḥ kṣatriyā nihateśvarāḥ

उन सबके चले जाने पर जल में खड़े हुए धर्मशील, महातेजस्वी और कुरुओं के सदा हितकारी महामुनि ने, पति खो चुकी उन सब क्षत्राणियों से कहा —

व्यास उवाच

श्लोक 21 (15.35.21)

या याः पतिकृताँल्लोकानिच्छन्ति परमस्त्रियः । ता जाह्नवीजलं क्षिप्रमवगाहन्त्वतन्द्रिताः ॥

yā yāḥ patikṛtām̐llokānicchanti paramastriyaḥ | tā jāhnavījalaṃ kṣipramavagāhantvatandritāḥ

तुममें से जो-जो उत्तम स्त्रियाँ अपने पतियों द्वारा प्राप्त लोकों को पाना चाहती हों, वे बिना आलस्य के शीघ्र जाह्नवी के जल में स्नान करें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (15.35.22)

ततस्तस्य वचः श्रुत्वा श्रद्दधाना वराङ्गनाः । श्वशुरं समनुज्ञाप्य विविशुर्जाह्नवीजलम् ॥

tatastasya vacaḥ śrutvā śraddadhānā varāṅganāḥ | śvaśuraṃ samanujñāpya viviśurjāhnavījalam

उनकी यह बात सुनकर श्रद्धा से भरी हुई उन सुन्दर स्त्रियों ने अपने श्वशुर से आज्ञा ली और जाह्नवी के जल में प्रवेश किया।

श्लोक 23 (15.35.23)

विमुक्ता मानुषैर्देहैस्ततस्ता भर्तृभिः सह । समाजग्मुस्तदा साध्व्यः सर्वा एवं विशाम्पते ॥

vimuktā mānuṣairdehaistatastā bhartṛbhiḥ saha | samājagmustadā sādhvyaḥ sarvā evaṃ viśāmpate

हे प्रजापालक! मानव शरीरों से मुक्त होकर वे सब पतिव्रता स्त्रियाँ तब अपने पतियों से जा मिलीं।

श्लोक 24 (15.35.24)

एवं क्रमेण सर्वास्ताः शीलवत्यः पतिव्रताः । प्रविश्य तोयं निर्मुक्ता जग्मुर्भर्तृसलोकताम् ॥

evaṃ krameṇa sarvāstāḥ śīlavatyaḥ pativratāḥ | praviśya toyaṃ nirmuktā jagmurbhartṛsalokatām

इस प्रकार क्रम से वे सब शीलवती पतिव्रता स्त्रियाँ जल में प्रवेश करके मुक्त हुईं और अपने पतियों के समान लोक को प्राप्त हुईं।

श्लोक 25 (15.35.25)

दिव्यरूपसमायुक्ता दिव्याभरणभूषिताः । दिव्यमाल्यांबरधरा यथाऽऽसां पतयस्तथा ॥

divyarūpasamāyuktā divyābharaṇabhūṣitāḥ | divyamālyāṃbaradharā yathā''sāṃ patayastathā

वे दिव्य रूप से युक्त, दिव्य आभूषणों से सजी और दिव्य माला तथा वस्त्र धारण किए हुए थीं, ठीक वैसी ही जैसे उनके पति थे।

श्लोक 26 (15.35.26)

ताः शीलगुणसम्पन्ना विमानस्था गतक्लमाः । सर्वाः सर्वगुणोपेताः स्वस्थानं प्रतिपेदिरे ॥

tāḥ śīlaguṇasampannā vimānasthā gataklamāḥ | sarvāḥ sarvaguṇopetāḥ svasthānaṃ pratipedire

शील और गुणों से सम्पन्न, विमानों में बैठी हुई और थकान से रहित वे सब, सब गुणों से युक्त होकर अपने-अपने स्थान को चली गईं।

श्लोक 27 (15.35.27)

यस्य यस्य तु यः कामस्तस्मिन्काले बभूव ह । तंतं विसृष्टवान्व्यासो वरदो धर्मवत्सलः ॥

yasya yasya tu yaḥ kāmastasminkāle babhūva ha | taṃtaṃ visṛṣṭavānvyāso varado dharmavatsalaḥ

जिस-जिसकी जो इच्छा थी, उस समय वही पूरी हुई; वरदायक और धर्म-प्रेमी व्यास ने हर किसी को उसका मनोरथ प्रदान किया।

श्लोक 28 (15.35.28)

तच्छ्रुत्वा नरदेवानां पुनरागमनं नराः । जहृषुर्मुदिताश्चासन्नानादेशगता अपि ॥

tacchrutvā naradevānāṃ punarāgamanaṃ narāḥ | jahṛṣurmuditāścāsannānādeśagatā api

राजाओं के इस प्रकार लौट आने की बात सुनकर लोग हर्षित और प्रसन्न हुए, चाहे वे दूसरे-दूसरे देशों में ही क्यों न रहते हों।

श्लोक 29 (15.35.29)

ते नष्टभयसङ्कल्पा नरा विगतकल्मषाः । बभूवुः पौरवाः सर्वे तद्दृष्ट्वाऽऽश्चर्यमुत्तमम् ॥

te naṣṭabhayasaṅkalpā narā vigatakalmaṣāḥ | babhūvuḥ pauravāḥ sarve taddṛṣṭvā''ścaryamuttamam

उस परम आश्चर्य को देखकर पुरुवंश के सब लोग भय और चिन्ता से रहित तथा पाप से मुक्त हो गए।

श्लोक 30 (15.35.30)

प्रियैः समागमं तेषां यः सम्यक् शृणुयान्नरः । प्रियाणि लभते नित्यमिह च प्रेत्य चैव सः । इष्टबान्धवसंयोगमनायासमनामयम् ॥

priyaiḥ samāgamaṃ teṣāṃ yaḥ samyak śṛṇuyānnaraḥ | priyāṇi labhate nityamiha ca pretya caiva saḥ | iṣṭabāndhavasaṃyogamanāyāsamanāmayam

जो मनुष्य उनके अपने प्रियजनों से इस मिलन को भली-भाँति सुनता है, उसे इस लोक में और परलोक में भी सदा प्रिय वस्तुएँ मिलती हैं, तथा क्लेश और रोग से रहित इष्ट बन्धुओं का संयोग प्राप्त होता है।

श्लोक 31 (15.35.31)

यश्चैतच्छ्रावयेद्विद्वान्विदुषो धर्मवित्तमः । स यशः प्राप्नुयाल्लोके परत्र च शुभां गतिम् ॥

yaścaitacchrāvayedvidvānviduṣo dharmavittamaḥ | sa yaśaḥ prāpnuyālloke paratra ca śubhāṃ gatim

और जो विद्वान् धर्मज्ञों में श्रेष्ठ होकर इसे विद्वानों को सुनाता है, वह लोक में यश पाता है और परलोक में शुभ गति।

श्लोक 32 (15.35.32)

स्वाध्याययुक्ता मनुजास्तपोयुक्ताश्च भारत । साध्वाचारा दमोपेता दाननिर्धूतकल्मषाः ॥

svādhyāyayuktā manujāstapoyuktāśca bhārata | sādhvācārā damopetā dānanirdhūtakalmaṣāḥ

हे भारत! स्वाध्याय और तप में लगे हुए, सदाचारी, संयमी, तथा दान से पापों को धो डालने वाले,

श्लोक 33 (15.35.33)

ऋजवः शुचयः शान्ता हिंसानृतविवर्जिताः । आस्तिकाः श्रद्दधानाश्च धृतिमन्तश्च मानवाः । श्रुत्वाऽऽश्चर्यमिदं पर्व ह्यवाप्स्यन्ति परां गतिम् ॥

ṛjavaḥ śucayaḥ śāntā hiṃsānṛtavivarjitāḥ | āstikāḥ śraddadhānāśca dhṛtimantaśca mānavāḥ | śrutvā''ścaryamidaṃ parva hyavāpsyanti parāṃ gatim

सरल, पवित्र, शान्त, हिंसा और असत्य से रहित, आस्तिक, श्रद्धावान् और धैर्यवान् मनुष्य इस आश्चर्यमय पर्व को सुनकर परम गति को प्राप्त करेंगे।

श्लोक 34 (15.35.34)

पुनस्ते दर्शनं प्राप्ताः पुनश्च परिकीर्तिताः । पुनःपुनः प्रयच्छन्ति शृण्वतामभयं सदा ॥

punaste darśanaṃ prāptāḥ punaśca parikīrtitāḥ | punaḥpunaḥ prayacchanti śṛṇvatāmabhayaṃ sadā

वे फिर दर्शन को प्राप्त हुए और फिर उनका कीर्तन किया गया; वे बार-बार सुनने वालों को सदा अभय प्रदान करते हैं।

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