आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 34
मृत योद्धा गङ्गा से उठ खड़े होते हैं
संध्या होने पर सब लोग गङ्गा के तट पर व्यास के पास एकत्र होते हैं। व्यास पवित्र जल में उतरकर मृतकों का आवाहन करते हैं, और बड़े कोलाहल के साथ दोनों सेनाओं के राजा और योद्धा — भीष्म, द्रोण, कर्ण, दुर्योधन आदि — हज़ारों की संख्या में नदी से उठ खड़े होते हैं; वे तेजस्वी हैं, दिव्य वस्त्र पहने हैं और वैर से मुक्त हैं। व्यास धृतराष्ट्र को दिव्य दृष्टि देते हैं और गान्धारी अपनी शक्ति से देखती हैं; सारा समुदाय यह आश्चर्य देखता है और धृतराष्ट्र प्रसन्न होते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (15.34.1)
ततो निशायां प्राप्तायां कृतसायाह्निकक्रियाः । व्यासमभ्यगमन्सर्वे ये तत्रासन्समागताः ॥
tato niśāyāṃ prāptāyāṃ kṛtasāyāhnikakriyāḥ | vyāsamabhyagamansarve ye tatrāsansamāgatāḥ
फिर रात होने पर, सायंकालीन कर्म पूरे करके, वहाँ एकत्र हुए सब लोग व्यास के पास गए।
श्लोक 2 (15.34.2)
धृतराष्ट्रस्तु धर्मात्मा पाण्डवैः सहितस्तदा । शुचिरेकमनाः सार्धमृषिभिस्तैरुपाविशत् ॥
dhṛtarāṣṭrastu dharmātmā pāṇḍavaiḥ sahitastadā | śucirekamanāḥ sārdhamṛṣibhistairupāviśat
धर्मात्मा धृतराष्ट्र पाण्डवों के साथ पवित्र और एकाग्र मन से उन ऋषियों के साथ बैठ गए।
श्लोक 3 (15.34.3)
गान्धार्या सह नार्यस्तु सहिताः समुपाविशन् । पौरजानपदश्चापि जनः सर्वो यथा वयः ॥
gāndhāryā saha nāryastu sahitāḥ samupāviśan | paurajānapadaścāpi janaḥ sarvo yathā vayaḥ
स्त्रियाँ गान्धारी के साथ एक साथ बैठीं, और नगर तथा जनपद के लोग भी, सब अपनी आयु के अनुसार।
श्लोक 4 (15.34.4)
ततो व्यासो महातेजाः पुण्यं भागीरथीजलम् । अवतीर्याजुहावाथ सर्वाल्लोकान्महामुनिः ॥
tato vyāso mahātejāḥ puṇyaṃ bhāgīrathījalam | avatīryājuhāvātha sarvāllokānmahāmuniḥ
तब महातेजस्वी महामुनि व्यास ने भागीरथी के पवित्र जल में उतरकर सब लोकों का आवाहन किया —
श्लोक 5 (15.34.5)
पाण्डवानां च ये योधाः कौरवाणां च सर्वशः । राजानश्च महाभागा नानादेशनिवासिनः । प्रतीक्ष्य तस्थुस्ते सर्वे तेषामागमनं प्रति ॥
pāṇḍavānāṃ ca ye yodhāḥ kauravāṇāṃ ca sarvaśaḥ | rājānaśca mahābhāgā nānādeśanivāsinaḥ | pratīkṣya tasthuste sarve teṣāmāgamanaṃ prati
पाण्डवों और कौरवों के जो योद्धा सब ओर के थे, और अनेक देशों में रहने वाले महाभाग राजा। वे सब उनके आने की प्रतीक्षा में खड़े रहे।
श्लोक 6 (15.34.6)
ततः सुतुमुलः शब्दो जलान्ते जनमेजय । प्रादुरासीद्यथायोगं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥
tataḥ sutumulaḥ śabdo jalānte janamejaya | prādurāsīdyathāyogaṃ kurupāṇḍavasenayoḥ
फिर हे जनमेजय! जल के भीतर से बड़ा भारी कोलाहल उठा, जैसा कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं में हुआ करता था।
श्लोक 7 (15.34.7)
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे भीष्मद्रोणपुरोगमाः । ससैन्याः सलिलात्तस्मात्समुत्तस्थुः सहस्रशः ॥
tataste pārthivāḥ sarve bhīṣmadroṇapurogamāḥ | sasainyāḥ salilāttasmātsamuttasthuḥ sahasraśaḥ
फिर भीष्म और द्रोण को आगे किए वे सब राजा अपनी सेनाओं सहित हज़ारों की संख्या में उस जल से उठ खड़े हुए।
श्लोक 8 (15.34.8)
विराटद्रुपदौ चैव सहपुत्रौ ससैनिकौ । द्रौपदेयाश्च सौभद्रो राक्षसश्च घटोत्कचः ॥
virāṭadrupadau caiva sahaputrau sasainikau | draupadeyāśca saubhadro rākṣasaśca ghaṭotkacaḥ
विराट और द्रुपद, पुत्रों और सैनिकों सहित; द्रौपदी के पुत्र, सौभद्र और राक्षस घटोत्कच;
श्लोक 9 (15.34.9)
कर्णदुर्योधनौ चैव शकुनिश्च महारथः । दुःशासनादयश्चैव धार्तराष्ट्रा महाबलाः ॥
karṇaduryodhanau caiva śakuniśca mahārathaḥ | duḥśāsanādayaścaiva dhārtarāṣṭrā mahābalāḥ
कर्ण और दुर्योधन, महारथी शकुनि; दुःशासन आदि महाबली धृतराष्ट्रपुत्र;
श्लोक 10 (15.34.10)
जारासन्धिर्भगदत्तो जलसन्धश्च वीर्यवान् । भूरिश्रवाः शलः शल्यो वृषसेनश्च सानुजः ॥
jārāsandhirbhagadatto jalasandhaśca vīryavān | bhūriśravāḥ śalaḥ śalyo vṛṣasenaśca sānujaḥ
जरासन्ध का पुत्र, भगदत्त और पराक्रमी जलसन्ध; भूरिश्रवा, शल, शल्य और छोटे भाइयों सहित वृषसेन;
श्लोक 11 (15.34.11)
लक्ष्मणो राजपुत्रश्च धृष्टद्युम्नस्सहात्मजः । शिखण्डिपुत्राः सर्वे च धृष्टकेतुश्च सानुजः ॥
lakṣmaṇo rājaputraśca dhṛṣṭadyumnassahātmajaḥ | śikhaṇḍiputrāḥ sarve ca dhṛṣṭaketuśca sānujaḥ
राजकुमार लक्ष्मण, और पुत्रों सहित धृष्टद्युम्न; शिखण्डी के सभी पुत्र, और छोटे भाई सहित धृष्टकेतु;
श्लोक 12 (15.34.12)
अचलो वृषकश्चैव राक्षसश्चाप्यलायुधः । बाह्लिकः सोमदत्तश्च चेकितानश्च पार्थिवः ॥
acalo vṛṣakaścaiva rākṣasaścāpyalāyudhaḥ | bāhlikaḥ somadattaśca cekitānaśca pārthivaḥ
अचल और वृषक, राक्षस अलायुध; बाह्लीक, सोमदत्त और राजा चेकितान।
श्लोक 13 (15.34.13)
एते चान्ये च बहवो बहुत्वाद्ये न कीर्तिताः । सर्वे भासुरदेहास्ते समुत्तस्थुर्जलात्ततः ॥
ete cānye ca bahavo bahutvādye na kīrtitāḥ | sarve bhāsuradehāste samuttasthurjalāttataḥ
ये और अन्य बहुत-से, जिनके नाम संख्या अधिक होने से नहीं गिनाए गए — वे सब तेजस्वी देहवाले उस समय जल से उठ खड़े हुए।
श्लोक 14 (15.34.14)
यस्य वीरस्य यो वेषो यो ध्वजो यच्च वाहनम् । यद्वर्म यत्प्रहरणं तेन तेन स दृश्यते ॥
yasya vīrasya yo veṣo yo dhvajo yacca vāhanam | yadvarma yatpraharaṇaṃ tena tena sa dṛśyate
जिस वीर का जो वेश, जो ध्वज और जो वाहन था, तथा जो कवच और जो शस्त्र था, उसी से वह पहचाना जाता था।
श्लोक 15 (15.34.15)
दिव्यांबरधराः सर्वे सर्वे भ्राजिष्णुकुण्डलाः । निर्वैरा निरहङ्कारा विगतक्रोधमत्सराः ॥
divyāṃbaradharāḥ sarve sarve bhrājiṣṇukuṇḍalāḥ | nirvairā nirahaṅkārā vigatakrodhamatsarāḥ
सबने दिव्य वस्त्र धारण किए थे और सबके कुण्डल चमक रहे थे; वे वैर, अहंकार, क्रोध और डाह से रहित थे।
श्लोक 16 (15.34.16)
गन्धर्वैरुपगीयन्तः स्तूयमानाश्च बन्दिभिः । दिव्यमाल्यस्रजोपेतास्तथा दिव्याप्सरोवृताः ॥
gandharvairupagīyantaḥ stūyamānāśca bandibhiḥ | divyamālyasrajopetāstathā divyāpsarovṛtāḥ
गन्धर्व उनका गान कर रहे थे और बन्दीजन स्तुति कर रहे थे; वे दिव्य मालाओं से सजे थे और दिव्य अप्सराओं से घिरे थे।
श्लोक 17 (15.34.17)
धृतराष्ट्रस्य च तदा दिव्यं चक्षुर्नराधिप । मुनिः सत्यवतीपुत्रः प्रीतः प्रादात्तपोबलात् ॥
dhṛtarāṣṭrasya ca tadā divyaṃ cakṣurnarādhipa | muniḥ satyavatīputraḥ prītaḥ prādāttapobalāt
और हे नराधिप! तब सत्यवती के पुत्र मुनि व्यास ने प्रसन्न होकर तपोबल से धृतराष्ट्र को दिव्य नेत्र प्रदान किए।
श्लोक 18 (15.34.18)
दिव्यज्ञानबलोपेता गान्धारी च यशस्विनी । ददर्श पुत्रांस्तान्सर्वान्ये चान्येऽपि मृधे हताः ॥
divyajñānabalopetā gāndhārī ca yaśasvinī | dadarśa putrāṃstānsarvānye cānye'pi mṛdhe hatāḥ
दिव्य ज्ञान के बल से सम्पन्न यशस्विनी गान्धारी ने भी अपने सब पुत्रों को तथा युद्ध में मारे गए अन्य लोगों को देखा।
श्लोक 19 (15.34.19)
तदद्भुतमचिन्त्यं च सुमहद्रोमहर्षणम् । विस्मितः स जनः सर्वो ददर्शानिमिषेक्षणः ॥
tadadbhutamacintyaṃ ca sumahadromaharṣaṇam | vismitaḥ sa janaḥ sarvo dadarśānimiṣekṣaṇaḥ
उस अद्भुत, अचिन्त्य और रोमांचकारी दृश्य को सब लोग विस्मित होकर अपलक नेत्रों से देखते रहे।
श्लोक 20 (15.34.20)
तदुत्सवमहोदग्रं हृष्टनारीनराकुलम् । आश्चर्यभूतं ददृशे चित्रं पटगतं यथा ॥
tadutsavamahodagraṃ hṛṣṭanārīnarākulam | āścaryabhūtaṃ dadṛśe citraṃ paṭagataṃ yathā
हर्ष से भरे नर-नारियों से भरा वह उत्सव अत्यन्त उमंग वाला था और वह पट पर बने चित्र के समान एक आश्चर्य-सा दिखाई दिया।
श्लोक 21 (15.34.21)
धृतराष्ट्रस्तु तान्सर्वान्पश्यन्दिव्येन चक्षुषा । मुमुदे भरतश्रेष्ठ प्रसादात्तस्य वै मुनेः ॥
dhṛtarāṣṭrastu tānsarvānpaśyandivyena cakṣuṣā | mumude bharataśreṣṭha prasādāttasya vai muneḥ
और हे भरतश्रेष्ठ! धृतराष्ट्र दिव्य दृष्टि से उन सबको देखते हुए उन मुनि की कृपा से आनन्दित हुए।