आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 33
व्यास मृत वीरों की दिव्य उत्पत्ति बताते हैं
व्यास गान्धारी, कुन्ती, द्रौपदी आदि को वचन देते हैं कि वे उसी रात अपने मृत जनों को देखेंगी, और बताते हैं कि महान योद्धा देवता, गन्धर्व और अन्य दिव्य प्राणी थे जो देवताओं का कार्य करने के लिए जन्मे थे। वे नाम गिनाते हैं — धृतराष्ट्र गन्धर्वराज, पाण्डु मरुद्गणों में से, दुर्योधन कलि, शकुनि द्वापर, कर्ण सूर्य, अभिमन्यु चन्द्रमा, भीष्म एक वसु, और अन्य। वे सबको गङ्गा के तट पर जाने को कहते हैं; लोग चल पड़ते हैं और तट पर पड़ाव डालकर रात की प्रतीक्षा करते हैं।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (15.33.1)
भद्रे द्रक्ष्यसि गान्धारि पुत्रान्भ्रातॄन्स्वकान्गणान् । वधूश्च पतिभिः सार्धं निशि सुप्तोत्थिता इव ॥
bhadre drakṣyasi gāndhāri putrānbhrātṝnsvakāngaṇān | vadhūśca patibhiḥ sārdhaṃ niśi suptotthitā iva
हे भद्रे गान्धारी! तुम अपने पुत्रों, भाइयों और अपने जनों को देखोगी, और बहुओं को उनके पतियों के साथ, मानो रात में सोकर उठे हों।
श्लोक 2 (15.33.2)
कर्णं द्रक्ष्यति कुन्ती च सौभद्रं चापि यादवी । द्रौपदी पञ्चपुत्रांश्च पितॄन्भ्रातॄंस्तथैव च ॥
karṇaṃ drakṣyati kuntī ca saubhadraṃ cāpi yādavī | draupadī pañcaputrāṃśca pitṝnbhrātṝṃstathaiva ca
कुन्ती कर्ण को देखेंगी, यादवी सुभद्रा सौभद्र को; द्रौपदी अपने पाँचों पुत्रों को और अपने पिताओं तथा भाइयों को भी देखेंगी।
श्लोक 3 (15.33.3)
पूर्वमेवैष हृदये व्यवसायोऽभवन्मम । यदाऽस्मि चोदितो राज्ञा भवत्या पृथयैव च ॥
pūrvamevaiṣa hṛdaye vyavasāyo'bhavanmama | yadā'smi codito rājñā bhavatyā pṛthayaiva ca
यह निश्चय मेरे हृदय में पहले ही हो चुका था, जब राजा ने, तुमने और पृथा ने मुझे प्रेरित किया।
श्लोक 4 (15.33.4)
न ते शोच्या महात्मानः सर्व एव नरर्षभाः । क्षत्रधर्मपराः सन्तस्तथा हि निधनं गताः ॥
na te śocyā mahātmānaḥ sarva eva nararṣabhāḥ | kṣatradharmaparāḥ santastathā hi nidhanaṃ gatāḥ
उन महात्मा नरश्रेष्ठों के लिए शोक करना उचित नहीं। वे सब क्षत्रिय-धर्म में लगे रहे और इसी प्रकार मृत्यु को प्राप्त हुए।
श्लोक 5 (15.33.5)
भवितव्यमवश्यं तत्सुरकार्यमनिन्दिते । अवतेरुस्ततः सर्वे देवा भागैर्महीतलम् ॥
bhavitavyamavaśyaṃ tatsurakāryamanindite | avaterustataḥ sarve devā bhāgairmahītalam
हे अनिन्दिते! यह अवश्य होना था; यह देवताओं का कार्य था। तब सब देवता अपने-अपने अंशों के साथ पृथ्वी पर अवतरित हुए।
श्लोक 6 (15.33.6)
गन्धर्वाप्सरसश्चैव पिशाचा गुह्यराक्षसाः । तथा पुण्यजनाश्चैव सिद्धा देवर्षयोपि च ॥
gandharvāpsarasaścaiva piśācā guhyarākṣasāḥ | tathā puṇyajanāścaiva siddhā devarṣayopi ca
गन्धर्व और अप्सराएँ, पिशाच, गुह्यक और राक्षस, पुण्यजन, सिद्ध तथा देवर्षि भी —
श्लोक 7 (15.33.7)
देवाश्च दानवाश्चैव तथा देवर्षयोऽमलाः । ते एते निधनं प्राप्ताः कुरुक्षेत्रे रणाजिरे ॥
devāśca dānavāścaiva tathā devarṣayo'malāḥ | te ete nidhanaṃ prāptāḥ kurukṣetre raṇājire
देवता और दानव तथा निर्मल देवर्षि — वे ही कुरुक्षेत्र के रणांगण में मृत्यु को प्राप्त हुए।
श्लोक 8 (15.33.8)
गन्धर्वराजो यो धीमान्धृतराष्ट्र इति श्रुतः । स एव मानुषे लोके धृतराष्ट्रः पतिस्तव ॥
gandharvarājo yo dhīmāndhṛtarāṣṭra iti śrutaḥ | sa eva mānuṣe loke dhṛtarāṣṭraḥ patistava
गन्धर्वों का जो बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र नाम से प्रसिद्ध है, वही मनुष्य लोक में तुम्हारा पति धृतराष्ट्र है।
श्लोक 9 (15.33.9)
पाण्डुं मरुद्गणाद्विद्धि विशिष्टतममच्युतम् । धर्मस्यांशोऽभवत्क्षत्ता राजा चैव युधिष्ठिरः ॥
pāṇḍuṃ marudgaṇādviddhi viśiṣṭatamamacyutam | dharmasyāṃśo'bhavatkṣattā rājā caiva yudhiṣṭhiraḥ
पाण्डु को मरुद्गणों में से जानो — सबसे श्रेष्ठ और अच्युत; क्षत्ता (विदुर) धर्म के अंश थे, और राजा युधिष्ठिर भी।
श्लोक 10 (15.33.10)
कलिं दुर्योधनं विद्धि शकुनिं द्वापरं नृपम् । दुःशासनादीन्विद्धि त्वं राक्षसान्शुभदर्शने ॥
kaliṃ duryodhanaṃ viddhi śakuniṃ dvāparaṃ nṛpam | duḥśāsanādīnviddhi tvaṃ rākṣasānśubhadarśane
दुर्योधन को कलि जानो और राजा शकुनि को द्वापर; और हे शुभदर्शने! दुःशासन आदि को राक्षस जानो।
श्लोक 11 (15.33.11)
मरुद्गणाद्भीमसेनं बलवन्तमरिंदमम् । विद्धि त्वं तु नरमृषिमिमं पार्थं धनंजयम् । नारायणं हृषीकेशमश्विनौ यमजौ तथा ॥
marudgaṇādbhīmasenaṃ balavantamariṃdamam | viddhi tvaṃ tu naramṛṣimimaṃ pārthaṃ dhanaṃjayam | nārāyaṇaṃ hṛṣīkeśamaśvinau yamajau tathā
शत्रुओं का दमन करने वाले बलवान भीमसेन को मरुद्गणों में से जानो। इन पार्थ धनंजय को ऋषि नर जानो, हृषीकेश को नारायण, और दोनों जुड़वाँ भाइयों को दोनों अश्विनीकुमार।
श्लोक 12 (15.33.12)
द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमादित्यं तपतां वरम् । लोकांश्च तापयानं वै कर्णं विद्धि पृथासुतम् ॥
dvidhā kṛtvā''tmano dehamādityaṃ tapatāṃ varam | lokāṃśca tāpayānaṃ vai karṇaṃ viddhi pṛthāsutam
जो तपने वालों में श्रेष्ठ आदित्य अपने शरीर के दो भाग करके लोकों को तपाते हैं, उन्हीं को पृथा के पुत्र कर्ण जानो।
श्लोक 13 (15.33.13)
यः स वैरार्थमुद्भूतः संघर्षजननस्तथा । तं कर्णं विद्धि कल्याणि भास्करं शुभदर्शने ॥
yaḥ sa vairārthamudbhūtaḥ saṃgharṣajananastathā | taṃ karṇaṃ viddhi kalyāṇi bhāskaraṃ śubhadarśane
जो वैर के लिए उत्पन्न हुआ और कलह का कारण बना — हे कल्याणी, हे शुभदर्शने! उस कर्ण को भास्कर (सूर्य) जानो।
श्लोक 14 (15.33.14)
यश्च पाण्डवदायादो हतः षड्भिर्महारथैः । स सोम इह सौभद्रो योगादेवाभवद्द्विधा ॥
yaśca pāṇḍavadāyādo hataḥ ṣaḍbhirmahārathaiḥ | sa soma iha saubhadro yogādevābhavaddvidhā
और जो पाण्डवों का उत्तराधिकारी छः महारथियों के हाथों मारा गया, वह सौभद्र यहाँ सोम (चन्द्रमा) है, जो योग से दो रूपों में हुआ था।
श्लोक 15 (15.33.15)
द्रौपद्या सह संभूतं धृष्टद्युम्नं च पावकात् । अग्नेर्भागं शुभं विद्धि राक्षसं तु शिखण्डिनम् ॥
draupadyā saha saṃbhūtaṃ dhṛṣṭadyumnaṃ ca pāvakāt | agnerbhāgaṃ śubhaṃ viddhi rākṣasaṃ tu śikhaṇḍinam
अग्नि से द्रौपदी के साथ उत्पन्न धृष्टद्युम्न को अग्नि का शुभ अंश जानो और शिखण्डी को राक्षस।
श्लोक 16 (15.33.16)
द्रोणं बृहस्पतेर्भागं विद्धि द्रौणिं च रुद्रजम् । गाङ्गेयो वसुवीर्येण देवो मानुषतां गतः ॥
droṇaṃ bṛhaspaterbhāgaṃ viddhi drauṇiṃ ca rudrajam | gāṅgeyo vasuvīryeṇa devo mānuṣatāṃ gataḥ
द्रोण को बृहस्पति का अंश जानो और द्रोणपुत्र को रुद्र से उत्पन्न; गाङ्गेय (भीष्म) एक देवता थे, जो वसु के तेज से मनुष्य-रूप में आए।
श्लोक 17 (15.33.17)
एवमेते महाप्रज्ञे देवा मानुष्यमेत्य हि । ततः पुनर्गताः स्वर्गं कृते कर्मणि शोभने ॥
evamete mahāprajñe devā mānuṣyametya hi | tataḥ punargatāḥ svargaṃ kṛte karmaṇi śobhane
हे महाप्रज्ञे! इस प्रकार ये देवता मनुष्य-रूप में आकर अपना शुभ कार्य पूरा होने पर फिर स्वर्ग को लौट गए।
श्लोक 18 (15.33.18)
यच्च वै हृदि सर्वेषां दुःखमेतच्चिरं स्थितम् । तदद्य व्यपनेष्यामि परलोककृताद्भयात् ॥
yacca vai hṛdi sarveṣāṃ duḥkhametacciraṃ sthitam | tadadya vyapaneṣyāmi paralokakṛtādbhayāt
और तुम सबके हृदय में जो दुःख बहुत समय से टिका हुआ है, उसे आज मैं दूर कर दूँगा, परलोक-सम्बन्धी भय के कारण।
श्लोक 19 (15.33.19)
सर्वे भवन्तो गच्छन्तु नदीं भागीरथीं प्रति । तत्र द्रक्ष्यथ तान्सर्वान्ये हतास्तत्र संयुगे ॥
sarve bhavanto gacchantu nadīṃ bhāgīrathīṃ prati | tatra drakṣyatha tānsarvānye hatāstatra saṃyuge
आप सब भागीरथी नदी की ओर चलिए; वहाँ आप उन सबको देखेंगे जो उस युद्ध में मारे गए थे।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (15.33.20)
इति व्यासस्य वचनं श्रुत्वा सर्वो जनस्तदा । महता सिंहनादेन गङ्गामभिमुखो ययौ ॥
iti vyāsasya vacanaṃ śrutvā sarvo janastadā | mahatā siṃhanādena gaṅgāmabhimukho yayau
व्यास के वचन सुनकर तब सब लोग सिंहनाद करते हुए गङ्गा की ओर चल पड़े।
श्लोक 21 (15.33.21)
धृतराष्ट्रश्च सामात्यः प्रययौ सह पाण्डवैः । सहितो मुनिशार्दूलैर्गन्धर्वैश्च समागतैः ॥
dhṛtarāṣṭraśca sāmātyaḥ prayayau saha pāṇḍavaiḥ | sahito muniśārdūlairgandharvaiśca samāgataiḥ
मन्त्रियों सहित धृतराष्ट्र भी पाण्डवों के साथ चले, श्रेष्ठ मुनियों और आए हुए गन्धर्वों के साथ।
श्लोक 22 (15.33.22)
ततो गङ्गां समासाद्य क्रमेण स जनार्णवः । निवासमकरोत्सर्वो यथाप्रीति यथासुखम् ॥
tato gaṅgāṃ samāsādya krameṇa sa janārṇavaḥ | nivāsamakarotsarvo yathāprīti yathāsukham
फिर गङ्गा के तट पर पहुँचकर लोगों का वह समुद्र क्रम से, जिसको जैसा रुचा और जैसा सुख मिला, वैसे पड़ाव डालकर ठहर गया।
श्लोक 23 (15.33.23)
राजा च पाण्डवैः सार्धमिष्टे देशे सहानुगः । निवासमकरोद्धीमान्सस्त्रीवृद्धपुरःसरः ॥
rājā ca pāṇḍavaiḥ sārdhamiṣṭe deśe sahānugaḥ | nivāsamakaroddhīmānsastrīvṛddhapuraḥsaraḥ
बुद्धिमान राजा ने पाण्डवों और अपने अनुचरों के साथ एक मनचाहे स्थान पर पड़ाव डाला, जिसमें स्त्रियाँ और वृद्ध आगे रखे गए थे।
श्लोक 24 (15.33.24)
जगाम तदहश्चापि तेषां वर्षशतं यथा । निशां प्रतीक्षमाणानां दिदृक्षूणां मृतान्नृपान् ॥
jagāma tadahaścāpi teṣāṃ varṣaśataṃ yathā | niśāṃ pratīkṣamāṇānāṃ didṛkṣūṇāṃ mṛtānnṛpān
रात की प्रतीक्षा करते और मरे हुए राजाओं को देखने की इच्छा रखने वाले उन लोगों का वह दिन सौ वर्ष के समान बीता।
श्लोक 25 (15.33.25)
अथ पुण्यं गिरिवरमस्तमभ्यगमद्रविः । ततः कृताभिषेकास्ते नैशं कर्म समाचरन् ॥
atha puṇyaṃ girivaramastamabhyagamadraviḥ | tataḥ kṛtābhiṣekāste naiśaṃ karma samācaran
तब सूर्य पवित्र अस्ताचल को चले गए; और स्नान करके उन्होंने सायंकालीन कर्म किए।