आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 32
कुन्ती व्यास को कर्ण के जन्म का रहस्य बताती हैं
कुन्ती अपने श्वशुर व्यास को बताती हैं कि पिता के घर में दुर्वासा ने उन्हें वर दिया था, कैसे बालसुलभ उत्सुकता में उन्होंने सूर्यदेव का आवाहन किया, और कैसे उन्होंने गुप्त रूप से जन्मे पुत्र को जल में बहा दिया। वे कहती हैं कि तब से यह दुःख उन्हें जलाता रहा है; वे कर्ण को देखना चाहती हैं और चाहती हैं कि राजा की इच्छा भी पूरी हो। व्यास उत्तर देते हैं कि वे निर्दोष हैं — वे कन्या थीं, देवता शरीरों में प्रवेश कर सकते हैं और पाँच प्रकार से सन्तान उत्पन्न करते हैं, और समर्थों के लिए सब कुछ पवित्र है।
कुन्त्युवाच
श्लोक 1 (15.32.1)
भगवञ्श्वशुरो मेऽसि दैवतस्यापि दैवतम् । स मे देवातिदेवस्त्वं शृणु सत्यां गिरं मम ॥
bhagavañśvaśuro me'si daivatasyāpi daivatam | sa me devātidevastvaṃ śṛṇu satyāṃ giraṃ mama
भगवन्! आप मेरे श्वशुर हैं, देवताओं के भी देवता; इसी रूप में आप मेरे देवाधिदेव हैं। मेरी सच्ची बात सुनिए।
श्लोक 2 (15.32.2)
तपस्वी कोपनो विप्रो दुर्वासा नाम मे पितुः । भिक्षामुपागतो भोक्तुं तमहं पर्यतोषयम् ॥
tapasvī kopano vipro durvāsā nāma me pituḥ | bhikṣāmupāgato bhoktuṃ tamahaṃ paryatoṣayam
दुर्वासा नाम के एक तपस्वी, क्रोधी ब्राह्मण मेरे पिता के घर भिक्षा लेने आए थे; मैंने उन्हें सन्तुष्ट किया।
श्लोक 3 (15.32.3)
शौचेन त्वागसस्त्यागैः शुद्धेन मनसा तथा । कोपस्थानेष्वपि महत्स्वकुप्यन्न कदाचन ॥
śaucena tvāgasastyāgaiḥ śuddhena manasā tathā | kopasthāneṣvapi mahatsvakupyanna kadācana
शुद्धता से, अपराधों से बचकर और निर्मल मन से मैं क्रोध के बड़े-बड़े अवसरों पर भी कभी क्रोधित नहीं हुई।
श्लोक 4 (15.32.4)
स प्रीतो वरदो मेऽभूत्कृतकृत्यो महामुनिः । अवश्यं ते ग्रहीतव्यमिति मां सोब्रवीद्वचः ॥
sa prīto varado me'bhūtkṛtakṛtyo mahāmuniḥ | avaśyaṃ te grahītavyamiti māṃ sobravīdvacaḥ
वे महामुनि प्रसन्न हुए और कृतकृत्य होकर मुझे वर देने वाले हुए। उन्होंने मुझसे कहा, “तुम्हें इसे अवश्य स्वीकार करना होगा।”
श्लोक 5 (15.32.5)
ततः शापभयाद्विप्रमवोचं पुनरेव तम् । एवमस्त्विति च प्राह पुनरेव स मे द्विजः ॥
tataḥ śāpabhayādvipramavocaṃ punareva tam | evamastviti ca prāha punareva sa me dvijaḥ
तब शाप के भय से मैंने उन ब्राह्मण से फिर कहा, और उन द्विज ने फिर कहा, “ऐसा ही हो।”
श्लोक 6 (15.32.6)
धर्मस्य जननी भद्रे भवित्री त्वं शुभानने । वशे स्थास्यन्ति ते देवा यांस्त्वमावाहयिष्यसि ॥
dharmasya jananī bhadre bhavitrī tvaṃ śubhānane | vaśe sthāsyanti te devā yāṃstvamāvāhayiṣyasi
“हे भद्रे, सुन्दर मुखवाली! तुम धर्म की जननी होगी, और तुम जिन देवताओं का आवाहन करोगी, वे तुम्हारे वश में रहेंगे।”
श्लोक 7 (15.32.7)
इत्युक्त्वाऽन्तर्हितो विप्रस्ततोऽहं विस्मिताऽभवम् । न च सर्वास्ववस्थासु स्मृतिर्मे विप्रणश्यति ॥
ityuktvā'ntarhito viprastato'haṃ vismitā'bhavam | na ca sarvāsvavasthāsu smṛtirme vipraṇaśyati
यह कहकर वे ब्राह्मण अन्तर्धान हो गए और मैं विस्मित रह गई; किसी भी अवस्था में मेरी स्मृति से यह बात नहीं मिटी।
श्लोक 8 (15.32.8)
अथ हर्म्यतलस्थाऽहं रविमुद्यन्तमीक्षती । संस्मृत्य तदृषेर्वाक्यं स्पृहयन्ती दिवाकरम् ॥
atha harmyatalasthā'haṃ ravimudyantamīkṣatī | saṃsmṛtya tadṛṣervākyaṃ spṛhayantī divākaram
फिर महल की छत पर खड़ी मैं उगते हुए सूर्य को देख रही थी, और ऋषि के वचन को याद करके मेरे मन में दिवाकर के प्रति चाह जागी।
श्लोक 9 (15.32.9)
स्थिताऽहं बालभावेन तत्र दोषमबुद्ध्यती । अथ देवः सहस्रांशुर्मत्समीपगतोऽभवत् ॥
sthitā'haṃ bālabhāvena tatra doṣamabuddhyatī | atha devaḥ sahasrāṃśurmatsamīpagato'bhavat
बालबुद्धि के कारण मैं उसमें दोष न समझती हुई वहीं खड़ी रही। तब सहस्र किरणों वाले देव मेरे समीप आ गए।
श्लोक 10 (15.32.10)
द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहं भूमौ च गगनेऽपि च । तताप लोकानेकेन द्वितीयेनागमत्स माम् ॥
dvidhā kṛtvā''tmano dehaṃ bhūmau ca gagane'pi ca | tatāpa lokānekena dvitīyenāgamatsa mām
अपने शरीर के दो भाग करके, एक पृथ्वी पर और एक आकाश में, उन्होंने एक से लोकों को तपाया और दूसरे से मेरे पास आए।
श्लोक 11 (15.32.11)
स मामुवाच वेपन्तीं वरं मत्तो वृणीष्व ह । गम्यतामिति तं चाहं प्रणम्य शिरसाऽवदम् ॥
sa māmuvāca vepantīṃ varaṃ matto vṛṇīṣva ha | gamyatāmiti taṃ cāhaṃ praṇamya śirasā'vadam
मुझे काँपते देख उन्होंने कहा, “मुझसे वर माँगो।” और मैंने सिर झुकाकर उनसे कहा, “आप चले जाइए।”
श्लोक 12 (15.32.12)
स मामुवाच तिग्मांशुर्वृथाऽऽह्वानं न मे क्षमम् । धक्ष्यामि त्वां च विप्रं च येन दत्तो वरस्तव ॥
sa māmuvāca tigmāṃśurvṛthā''hvānaṃ na me kṣamam | dhakṣyāmi tvāṃ ca vipraṃ ca yena datto varastava
उन तीक्ष्ण किरणों वाले देव ने मुझसे कहा, “मेरा व्यर्थ आवाहन मेरे योग्य नहीं है। मैं तुम्हें भी जला दूँगा और उन ब्राह्मण को भी, जिन्होंने तुम्हें वर दिया।”
श्लोक 13 (15.32.13)
तमहं रक्षती विप्रं शापादनपकारिणम् । पुत्रो मे त्वत्समो देव भवेदिति ततोऽब्रवम् ॥
tamahaṃ rakṣatī vipraṃ śāpādanapakāriṇam | putro me tvatsamo deva bhavediti tato'bravam
निरपराध ब्राह्मण को शाप से बचाने की इच्छा से मैंने तब कहा, “हे देव! मुझे आपके समान पुत्र हो।”
श्लोक 14 (15.32.14)
ततो मां तेजसाऽऽविश्य मोहयित्वा च भानुमान् । उवाच भविता पुत्रस्तवेत्यभ्यगमद्दिवम् ॥
tato māṃ tejasā''viśya mohayitvā ca bhānumān | uvāca bhavitā putrastavetyabhyagamaddivam
तब उन तेजस्वी ने अपने तेज से मुझमें प्रवेश करके मुझे मोहित कर दिया और “तुम्हें पुत्र होगा” यह कहकर स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 15 (15.32.15)
ततोऽहमन्तर्भवने पितुश्चित्तानुरक्षिणी । गूढोत्पन्नं सुतं बालं जले कर्णमवासृजम् ॥
tato'hamantarbhavane pituścittānurakṣiṇī | gūḍhotpannaṃ sutaṃ bālaṃ jale karṇamavāsṛjam
तब अन्तःपुर में पिता के मन की रक्षा करती हुई मैंने गुप्त रूप से जन्मे बालक कर्ण को जल में बहा दिया।
श्लोक 16 (15.32.16)
नूनं तस्यैव देवस्य प्रसादात्पुनरेव तु । कन्याऽहमभवं विप्र यथा प्राह स मामृषिः ॥
nūnaṃ tasyaiva devasya prasādātpunareva tu | kanyā'hamabhavaṃ vipra yathā prāha sa māmṛṣiḥ
निश्चय ही उन्हीं देव की कृपा से, हे विप्र, मैं फिर कन्या हो गई, जैसा उन ऋषि ने मुझसे कहा था।
श्लोक 17 (15.32.17)
स मया मूढया पुत्रो ज्ञायमानोऽप्युपेक्षितः । तन्मां दहति विप्रर्षे यथा सुविदितं तव ॥
sa mayā mūḍhayā putro jñāyamāno'pyupekṣitaḥ | tanmāṃ dahati viprarṣe yathā suviditaṃ tava
उस पुत्र को पहचानते हुए भी मुझ मूढ़ ने त्याग दिया। हे विप्रर्षि! वही मुझे जलाता रहता है, जैसा आपको भलीभाँति ज्ञात है।
श्लोक 18 (15.32.18)
यदि पापमपापं वा यदेतद्विवृतं मया । तं द्रष्टुमिच्छामि भगवन्व्यपनेतुं त्वमर्हसि ॥
yadi pāpamapāpaṃ vā yadetadvivṛtaṃ mayā | taṃ draṣṭumicchāmi bhagavanvyapanetuṃ tvamarhasi
यह पाप हो या पाप न हो, मैंने इसे खोलकर कह दिया है। भगवन्! मैं उसे देखना चाहती हूँ; आप मेरी यह पीड़ा दूर करें।
श्लोक 19 (15.32.19)
यच्चास्य राज्ञो विदितं हृदिस्थं भवतोऽनघ । तं चायं लभतां काममद्यैव मुनिसत्तम ॥
yaccāsya rājño viditaṃ hṛdisthaṃ bhavato'nagha | taṃ cāyaṃ labhatāṃ kāmamadyaiva munisattama
और हे निष्पाप मुनिश्रेष्ठ! इन राजा के हृदय में जो इच्छा है और जो आपको ज्ञात है, वह आज ही इन्हें प्राप्त हो।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (15.32.20)
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं व्यासो वेदविदांवरः । साधु सर्वमिदं भाव्यमेवमेतद्यथाऽऽत्थ माम् ॥
ityuktaḥ pratyuvācedaṃ vyāso vedavidāṃvaraḥ | sādhu sarvamidaṃ bhāvyamevametadyathā''ttha mām
ऐसा कहे जाने पर वेदज्ञों में श्रेष्ठ व्यास ने उत्तर दिया — “ठीक है। यह सब होना ही था, और यह वैसा ही है जैसा तुमने मुझसे कहा।
व्यास उवाच
श्लोक 21 (15.32.21)
अपराधश्च ते नास्ति कन्याभावं गता ह्यसि । देवाश्चैश्वर्यवन्तो वै शरीराण्याविशन्ति वै ॥
aparādhaśca te nāsti kanyābhāvaṃ gatā hyasi | devāścaiśvaryavanto vai śarīrāṇyāviśanti vai
तुमसे कोई अपराध नहीं हुआ, क्योंकि तुम कन्या थीं। ऐश्वर्यवान् देवता शरीरों में प्रवेश करते ही हैं।
श्लोक 22 (15.32.22)
सन्ति देवनिकायाश्च संकल्पाज्जनयन्ति ये । वाचा दृष्ट्या तथा स्पर्शात्संघर्षेणेति पञ्चधा ॥
santi devanikāyāśca saṃkalpājjanayanti ye | vācā dṛṣṭyā tathā sparśātsaṃgharṣeṇeti pañcadhā
ऐसे देवगण हैं जो संकल्प मात्र से सन्तान उत्पन्न करते हैं; कुल पाँच प्रकार से — संकल्प, वाणी, दृष्टि, स्पर्श और संयोग से।
श्लोक 23 (15.32.23)
मनुष्यधर्मो दैवेन धर्मेण हि न दुष्यति । इति कुन्ति विजानीहि व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥
manuṣyadharmo daivena dharmeṇa hi na duṣyati | iti kunti vijānīhi vyetu te mānaso jvaraḥ
मनुष्य का धर्म दैवी धर्म से दूषित नहीं होता। हे कुन्ती! यह जान लो और तुम्हारे मन का ताप दूर हो।
श्लोक 24 (15.32.24)
सर्वं बलवतां पथ्यं सर्वं बलवतां शुचि । सर्वं बलवतां धर्मः सर्वं बलवतां स्वकम् ॥
sarvaṃ balavatāṃ pathyaṃ sarvaṃ balavatāṃ śuci | sarvaṃ balavatāṃ dharmaḥ sarvaṃ balavatāṃ svakam
समर्थों के लिए सब कुछ हितकर है, समर्थों के लिए सब कुछ पवित्र है, समर्थों के लिए सब कुछ धर्म है, समर्थों के लिए सब कुछ अपना है।”