आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 31
व्यास का वर-दान; धृतराष्ट्र और गान्धारी मृतकों को देखने की प्रार्थना करते हैं
जनमेजय पूछते हैं कि युधिष्ठिर वन में कितने समय रहे और पाण्डवों का आहार क्या था। वैशम्पायन बताते हैं कि वे एक मास तक आश्रम में रहे, तभी नारद आदि ऋषियों के साथ व्यास वहाँ पहुँचे और बड़ों को वर माँगने को कहा। धृतराष्ट्र अपने पापी पुत्र और मारे गए राजाओं तथा योद्धाओं के शोक की बात कहकर उनकी गति पूछते हैं। गान्धारी अपनी प्रार्थना जोड़ती हैं और घर की शोकाकुल स्त्रियों के नाम गिनाती हैं; तब कुन्ती अपने गुप्त पुत्र का स्मरण कर व्यास को प्रणाम करके बोलने लगती हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (15.31.1)
वनवासं गते विप्र धृतराष्ट्रे महीपतौ । सभार्ये नृपशार्दूले वध्वा कुन्त्या समन्विते ॥
vanavāsaṃ gate vipra dhṛtarāṣṭre mahīpatau | sabhārye nṛpaśārdūle vadhvā kuntyā samanvite
हे विप्र! जब नृपश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्र अपनी पत्नी और बहू कुन्ती के साथ वनवास को चले गए,
श्लोक 2 (15.31.2)
विदुरे चापि धर्मज्ञे धर्मराजं व्यपाश्रिते । वसत्सु पाण्डुपुत्रेषु सर्वेष्वाश्रममण्डले ॥
vidure cāpi dharmajñe dharmarājaṃ vyapāśrite | vasatsu pāṇḍuputreṣu sarveṣvāśramamaṇḍale
और धर्म के ज्ञाता विदुर धर्मराज में समा गए, तथा सभी पाण्डवपुत्र आश्रम-मण्डल में रह रहे थे —
श्लोक 3 (15.31.3)
यत्तदाश्चर्यमिति वै करिष्यामीत्युवाच ह । व्यासः परमतेजस्वी महर्षिस्तद्वदस्व मे ॥
yattadāścaryamiti vai kariṣyāmītyuvāca ha | vyāsaḥ paramatejasvī maharṣistadvadasva me
तब परम तेजस्वी महर्षि व्यास ने कहा था, “मैं वह आश्चर्य करूँगा।” वह मुझे बताइए।
श्लोक 4 (15.31.4)
वनवासे च कौरव्यः कियन्तं कालमच्युतः । युधिष्ठिरो नरपतिर्न्यवसत्सजनस्तदा ॥
vanavāse ca kauravyaḥ kiyantaṃ kālamacyutaḥ | yudhiṣṭhiro narapatirnyavasatsajanastadā
और कौरववंशी, अच्युत राजा युधिष्ठिर अपने जनों के साथ उस समय वन में कितने समय तक रहे?
श्लोक 5 (15.31.5)
किमाहाराश्च ते तत्र ससैन्या न्यवसन्प्रभो । सान्तःपुरा महात्मान एतदिच्छामि वेदितुम् ॥
kimāhārāśca te tatra sasainyā nyavasanprabho | sāntaḥpurā mahātmāna etadicchāmi veditum
हे प्रभो! वे महात्मा अपनी सेना और अन्तःपुर के साथ वहाँ किस आहार पर रहे? यह मैं जानना चाहता हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (15.31.6)
वनवासगतं राजन्धृतराष्ट्रं महीपतिम् । युधिष्ठिरोऽभ्ययाद्द्रष्टुं ससैन्यो भ्रातृभिः सह ॥
vanavāsagataṃ rājandhṛtarāṣṭraṃ mahīpatim | yudhiṣṭhiro'bhyayāddraṣṭuṃ sasainyo bhrātṛbhiḥ saha
हे राजन्! वन में गए हुए राजा धृतराष्ट्र को देखने युधिष्ठिर अपनी सेना और भाइयों के साथ गए।
श्लोक 7 (15.31.7)
प्रथमे दिवसे चैषामापो मूलं फलं तथा । भोजनं भूमिशय्या च तत्रासीद्भरतर्षभ ॥
prathame divase caiṣāmāpo mūlaṃ phalaṃ tathā | bhojanaṃ bhūmiśayyā ca tatrāsīdbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ! पहले दिन उनके भोजन में केवल जल, कन्द-मूल और फल थे और भूमि ही उनकी शय्या थी।
श्लोक 8 (15.31.8)
तेऽनुज्ञातास्तदा राजन्कुरुराजेन पाण्डवाः । विविधान्यन्नपानानि शय्याश्चैवाभजन्वने ॥
te'nujñātāstadā rājankururājena pāṇḍavāḥ | vividhānyannapānāni śayyāścaivābhajanvane
फिर हे राजन्! कुरुराज की अनुमति पाकर पाण्डवों ने वन में अनेक प्रकार के अन्न-पान और शय्याओं का उपभोग किया।
श्लोक 9 (15.31.9)
मासमेकं विजह्रुस्ते ससैन्यान्तःपुरो वने । अथ तत्रागमद्व्यासो यथोक्तं ते मयाऽनघ ॥
māsamekaṃ vijahruste sasainyāntaḥpuro vane | atha tatrāgamadvyāso yathoktaṃ te mayā'nagha
एक मास तक वे अपनी सेना और अन्तःपुर के साथ वन में विहार करते रहे। फिर हे अनघ! व्यास वहाँ आए, जैसा मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ।
श्लोक 10 (15.31.10)
तथा च तेषां सर्वेषां कथाभिर्नृपसन्निधौ । व्यासन्वास्य तं राजन्नाजग्मुर्मुनयोऽपरे ॥
tathā ca teṣāṃ sarveṣāṃ kathābhirnṛpasannidhau | vyāsanvāsya taṃ rājannājagmurmunayo'pare
इस प्रकार राजा के निकट सब लोग वार्तालाप में लगे थे और व्यास उनके बीच बैठे थे, तभी हे राजन्! और भी मुनि वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 11 (15.31.11)
नारदः पर्वतश्चैव देवलश्च महातपाः । विश्वावसुस्तुंबुरुश्च चित्रसेनश्च भारत ॥
nāradaḥ parvataścaiva devalaśca mahātapāḥ | viśvāvasustuṃburuśca citrasenaśca bhārata
हे भारत! वे थे — नारद, पर्वत, महातपस्वी देवल, विश्वावसु, तुम्बुरु और चित्रसेन।
श्लोक 12 (15.31.12)
तेषामपि यथान्यायं पूजां चक्रे महातपाः । धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातः कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥
teṣāmapi yathānyāyaṃ pūjāṃ cakre mahātapāḥ | dhṛtarāṣṭrābhyanujñātaḥ kururājo yudhiṣṭhiraḥ
धृतराष्ट्र की अनुमति से कुरुराज महातपस्वी युधिष्ठिर ने उनका भी यथोचित सत्कार किया।
श्लोक 13 (15.31.13)
निषेदुस्ते ततः सर्वे पूजां प्राप्य युधिष्ठिरात् । आसनेषु च पुण्येषु बर्हिणेषु वरेषु च ॥
niṣeduste tataḥ sarve pūjāṃ prāpya yudhiṣṭhirāt | āsaneṣu ca puṇyeṣu barhiṇeṣu vareṣu ca
युधिष्ठिर से सत्कार पाकर वे सब पवित्र और उत्तम आसनों पर, जिन पर मुलायम पंखों की गद्दियाँ बिछी थीं, बैठ गए।
श्लोक 14 (15.31.14)
तेषु तत्रोपविष्टेषु स तु राजा महामतिः । पाण्डुपुत्रैः परिवृतो निषसाद कुरूद्वह ॥
teṣu tatropaviṣṭeṣu sa tu rājā mahāmatiḥ | pāṇḍuputraiḥ parivṛto niṣasāda kurūdvaha
हे कुरुवंशी! उनके वहाँ बैठ जाने पर परम बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र पाण्डवों से घिरे हुए बैठे।
श्लोक 15 (15.31.15)
गान्धारी चैव कुन्ती च द्रौपदी सात्वती तथा । स्त्रियश्चान्यास्तथाऽन्याभिः सहोपविविशुस्ततः ॥
gāndhārī caiva kuntī ca draupadī sātvatī tathā | striyaścānyāstathā'nyābhiḥ sahopaviviśustataḥ
गान्धारी, कुन्ती, द्रौपदी और सात्वती (यादवकुल की स्त्री) तथा अन्य स्त्रियाँ अपनी-अपनी सखियों के साथ वहाँ बैठ गईं।
श्लोक 16 (15.31.16)
तेषां तत्र कथा दिव्या धर्मिष्ठाश्चाभवन्नृप । राजर्षीणां पुराणानां देवासुरविमिश्रिताः ॥
teṣāṃ tatra kathā divyā dharmiṣṭhāścābhavannṛpa | rājarṣīṇāṃ purāṇānāṃ devāsuravimiśritāḥ
हे राजन्! वहाँ उनके बीच प्राचीन राजर्षियों की दिव्य और धर्मपूर्ण कथाएँ होती रहीं, जिनमें देवताओं और असुरों की कथाएँ भी मिली हुई थीं।
श्लोक 17 (15.31.17)
ततः कथान्ते व्यासस्तं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । प्रोवाच वदतांश्रेष्ठः पुनरेव स तद्वचः ॥
tataḥ kathānte vyāsastaṃ prajñācakṣuṣamīśvaram | provāca vadatāṃśreṣṭhaḥ punareva sa tadvacaḥ
फिर कथा समाप्त होने पर वक्ताओं में श्रेष्ठ व्यास ने प्रज्ञाचक्षु राजा से पुनः कहा —
श्लोक 18 (15.31.18)
प्रीयमाणो महातेजाः सर्ववेदविदांवरः । विदितं मम राजेन्द्र यत्ते हृदि विवक्षितम् ॥
prīyamāṇo mahātejāḥ sarvavedavidāṃvaraḥ | viditaṃ mama rājendra yatte hṛdi vivakṣitam
प्रसन्न, महातेजस्वी, सब वेदज्ञों में श्रेष्ठ व्यास बोले — “हे राजेन्द्र! तुम्हारे हृदय में जो कहने की इच्छा है, वह मुझे ज्ञात है।
व्यास उवाच
श्लोक 19 (15.31.19)
दह्यमानस्य शोकेन तव पुत्रकृतेन वै । गान्धार्याश्चैव यद्दुःखं हृदि तिष्ठति नित्यदा ॥
dahyamānasya śokena tava putrakṛtena vai | gāndhāryāścaiva yadduḥkhaṃ hṛdi tiṣṭhati nityadā
तुम्हारे पुत्र के किए हुए कर्मों के कारण शोक से तुम जो जल रहे हो, और गान्धारी के हृदय में जो दुःख सदा बना रहता है,
श्लोक 20 (15.31.20)
कुन्त्याश्च यन्महाराज द्रौपद्याश्च हृदि स्थितम् । यच्च धारयते तीव्रं दुःखं पुत्रविनाशजम् । सुभद्रा कृष्णभगिनी तच्चापि विदितं मम ॥
kuntyāśca yanmahārāja draupadyāśca hṛdi sthitam | yacca dhārayate tīvraṃ duḥkhaṃ putravināśajam | subhadrā kṛṣṇabhaginī taccāpi viditaṃ mama
और हे महाराज! कुन्ती तथा द्रौपदी के हृदय में जो दुःख है, और कृष्ण की बहन सुभद्रा पुत्र-नाश से उत्पन्न जो तीव्र दुःख धारण किए हुए है — यह सब भी मुझे ज्ञात है।
श्लोक 21 (15.31.21)
श्रुत्वा समागममिमं सर्वेषां वस्ततो नृप । संशयच्छेदनार्थाय प्राप्तः कौरवनन्दन ॥
śrutvā samāgamamimaṃ sarveṣāṃ vastato nṛpa | saṃśayacchedanārthāya prāptaḥ kauravanandana
हे राजन्! तुम सबके इस समागम को सुनकर, हे कौरवनन्दन, मैं तुम्हारे संशय दूर करने के लिए आया हूँ।
श्लोक 22 (15.31.22)
इमे च देवगन्धर्वाः सर्वे चेमे महर्षयः । पश्यन्तु तपसो वीर्यमद्य मे चिरसम्भृतम् ॥
ime ca devagandharvāḥ sarve ceme maharṣayaḥ | paśyantu tapaso vīryamadya me cirasambhṛtam
ये देवता, गन्धर्व और सब महर्षि आज मेरी चिरसंचित तपस्या का बल देखें।
श्लोक 23 (15.31.23)
तदुच्यतां महाप्राज्ञ कं कामं प्रददामि ते । प्रवणोस्मि वरं दातुं पश्य मे तपसो बलम् ॥
taducyatāṃ mahāprājña kaṃ kāmaṃ pradadāmi te | pravaṇosmi varaṃ dātuṃ paśya me tapaso balam
इसलिए हे महाप्राज्ञ! कहो, मैं तुम्हें कौन-सी कामना पूरी कर दूँ? मैं वर देने को तैयार हूँ; मेरे तप का बल देखो।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (15.31.24)
एवमुक्तः स राजेन्द्रो व्यासेनामितबुद्धिना । मुहूर्तमिव संचिन्त्य वचनायोपचक्रमे ॥
evamuktaḥ sa rājendro vyāsenāmitabuddhinā | muhūrtamiva saṃcintya vacanāyopacakrame
अपार बुद्धिवाले व्यास के ऐसा कहने पर वे राजेन्द्र क्षण भर विचार-सा करके बोलने लगे।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 25 (15.31.25)
धन्योस्म्यनुगृहीतश्च सफलं जीवितं च मे । यन्मे समागमोऽद्येह भवद्भिः सह साधुभिः ॥
dhanyosmyanugṛhītaśca saphalaṃ jīvitaṃ ca me | yanme samāgamo'dyeha bhavadbhiḥ saha sādhubhiḥ
“मैं धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ, मेरा जीवन सफल हो गया, क्योंकि आज यहाँ आप साधुजनों से मेरा मिलन हुआ।
श्लोक 26 (15.31.26)
अद्य चाप्यवगच्छामि गतिमिष्टामिहात्मनः । ब्रह्मकल्पैर्भवद्भिर्यत्समेतोऽहं तपोधनाः ॥
adya cāpyavagacchāmi gatimiṣṭāmihātmanaḥ | brahmakalpairbhavadbhiryatsameto'haṃ tapodhanāḥ
आज मैं यह भी जान गया हूँ कि मुझे अपने लिए इष्ट गति मिल गई है, क्योंकि हे तपस्वियो! मैं ब्रह्मा के समान आप लोगों से मिला हूँ।
श्लोक 27 (15.31.27)
दर्शनादेव भवतां पूतोऽहं नात्र संशयः । विद्यते न भयं चापि परलोके ममानघाः ॥
darśanādeva bhavatāṃ pūto'haṃ nātra saṃśayaḥ | vidyate na bhayaṃ cāpi paraloke mamānaghāḥ
आपके दर्शन मात्र से मैं पवित्र हो गया हूँ, इसमें संदेह नहीं; और हे निष्पापो! मुझे परलोक का भी भय नहीं है।
श्लोक 28 (15.31.28)
किंतु तस्य सुदुर्बुद्धेर्मन्दस्यापनयैर्भृशम् । दूयते मे मनो नित्यं स्मरतः पुत्रगृद्धिनः ॥
kiṃtu tasya sudurbuddhermandasyāpanayairbhṛśam | dūyate me mano nityaṃ smarataḥ putragṛddhinaḥ
किन्तु मेरा मन सदा जलता रहता है — पुत्र के मोह में पड़े हुए मुझको उस दुर्बुद्धि मूर्ख के भारी अन्यायों का स्मरण होता है।
श्लोक 29 (15.31.29)
अपापाः पाण्डवा येन निकृताः पापबुद्धिना । घातिता पृथिवी येन सहया सनरद्विपा ॥
apāpāḥ pāṇḍavā yena nikṛtāḥ pāpabuddhinā | ghātitā pṛthivī yena sahayā sanaradvipā
उस पापबुद्धि ने निर्दोष पाण्डवों को ठगा, और उसी ने घोड़ों, मनुष्यों और हाथियों सहित पृथ्वी का नाश करवाया।
श्लोक 30 (15.31.30)
राजानश्च महात्मानो नानाजनपदेश्वराः । आगम्य मम पुत्रार्थे सर्वे मृत्युवशं गताः ॥
rājānaśca mahātmāno nānājanapadeśvarāḥ | āgamya mama putrārthe sarve mṛtyuvaśaṃ gatāḥ
और अनेक जनपदों के स्वामी महात्मा राजा मेरे पुत्र के लिए आकर सब मृत्यु के वश में हो गए,
श्लोक 31 (15.31.31)
ये ते पितॄंश्च दारांश्च प्राणांश्च मनसः प्रियान् । परित्यज्य गताः शूराः प्रेतराजनिवेशनम् ॥
ye te pitṝṃśca dārāṃśca prāṇāṃśca manasaḥ priyān | parityajya gatāḥ śūrāḥ pretarājaniveśanam
जो वीर अपने पिताओं, पत्नियों और प्रिय प्राणों को त्यागकर यमराज के भवन को चले गए।
श्लोक 32 (15.31.32)
का नु तेषां गतिर्ब्रह्मन्मित्रार्थे ये हता मृधे । तथैव पुत्रपौत्राणां मम ये निहता युधि ॥
kā nu teṣāṃ gatirbrahmanmitrārthe ye hatā mṛdhe | tathaiva putrapautrāṇāṃ mama ye nihatā yudhi
हे ब्राह्मण! जो मित्र के लिए युद्ध में मारे गए, उनकी क्या गति है? और मेरे जो पुत्र-पौत्र युद्ध में मारे गए, उनकी भी क्या गति है?
श्लोक 33 (15.31.33)
दूयते मे मनोऽभीक्ष्णं घातयित्वा महाबलम् । भीष्मं शान्तनवं वृद्धं द्रोणं च द्विजसत्तमम् ॥
dūyate me mano'bhīkṣṇaṃ ghātayitvā mahābalam | bhīṣmaṃ śāntanavaṃ vṛddhaṃ droṇaṃ ca dvijasattamam
महाबली वृद्ध शान्तनुपुत्र भीष्म और द्विजश्रेष्ठ द्रोण को मरवा देने की याद से मेरा मन बार-बार जलता है,
श्लोक 34 (15.31.34)
मम पुत्रेण मूढेन पापेनाकृतबुद्धिना । क्षयं नीतं कुलं दीप्तं पृथिवीराज्यमिच्छता ॥
mama putreṇa mūḍhena pāpenākṛtabuddhinā | kṣayaṃ nītaṃ kulaṃ dīptaṃ pṛthivīrājyamicchatā
मेरे उस मूढ़, पापी और अशिक्षित बुद्धि वाले पुत्र के कारण, जिसने पृथ्वी का राज्य चाहकर एक दीप्तिमान कुल को नष्ट कर दिया।
श्लोक 35 (15.31.35)
एते मदर्थे पुत्रांश्च दारांश्च मनसः प्रियान् । भोगांश्च विविधांस्तात इष्टापूर्तांस्तथैव च । परित्यज्य गताः शूराः प्रेतराजनिवेशनम् ॥
ete madarthe putrāṃśca dārāṃśca manasaḥ priyān | bhogāṃśca vividhāṃstāta iṣṭāpūrtāṃstathaiva ca | parityajya gatāḥ śūrāḥ pretarājaniveśanam
मेरे लिए इन वीरों ने अपने पुत्रों, मन को प्रिय पत्नियों, अनेक प्रकार के भोगों और, हे तात! यज्ञ-दान आदि पुण्य कर्मों के फल को भी त्याग दिया और यमराज के भवन को चले गए।
श्लोक 36 (15.31.36)
एतत्सर्वमनुस्मृत्य दह्यमानो दिवानिशम् । न शान्तिमधिगच्छामि दुःखशोकसमाहतः ॥
etatsarvamanusmṛtya dahyamāno divāniśam | na śāntimadhigacchāmi duḥkhaśokasamāhataḥ
यह सब स्मरण करके मैं दिन-रात जलता हुआ, दुःख और शोक से पीड़ित होकर शान्ति नहीं पाता।
श्लोक 37 (15.31.37)
इति मे चिन्तयानस्य पितः शान्तिर्न विद्यते ॥
iti me cintayānasya pitaḥ śāntirna vidyate
हे पिताजी! इस प्रकार चिन्ता करते हुए मुझे शान्ति नहीं मिलती।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 38 (15.31.38)
तच्छ्रुत्वा विविधं तस्य राजर्षेः परिदेवितम् । पुनर्नवीकृतः शोको गान्धार्या जनमेजय ॥
tacchrutvā vividhaṃ tasya rājarṣeḥ paridevitam | punarnavīkṛtaḥ śoko gāndhāryā janamejaya
हे जनमेजय! राजर्षि का वह नाना प्रकार का विलाप सुनकर गान्धारी का शोक फिर नया हो गया,
श्लोक 39 (15.31.39)
कुन्त्या द्रुपदपुत्र्याश्च सुभद्रायास्तथैव च । तासां च वरनारीणां वधूनां कौरवस्य ह ॥
kuntyā drupadaputryāśca subhadrāyāstathaiva ca | tāsāṃ ca varanārīṇāṃ vadhūnāṃ kauravasya ha
और कुन्ती, द्रुपद की पुत्री, सुभद्रा तथा कौरव की उन श्रेष्ठ बहुओं का भी शोक नया हो गया।
श्लोक 40 (15.31.40)
पुत्रशोकसमाविष्टा गान्धारी त्विदमब्रवीत् । श्वशुरं बद्धनयना देवी प्राञ्जलिरुत्थिता ॥
putraśokasamāviṣṭā gāndhārī tvidamabravīt | śvaśuraṃ baddhanayanā devī prāñjalirutthitā
पुत्रशोक से व्याकुल, आँखों पर पट्टी बाँधे गान्धारी देवी हाथ जोड़कर उठीं और अपने श्वशुर से यह बोलीं —
गान्धार्युवाच
श्लोक 41 (15.31.41)
लोकान्तरगतान्पुत्रानयं काङ्क्षति मानद । तच्चास्य मानसं ज्ञातं भगवंस्तपसा त्वया ॥
lokāntaragatānputrānayaṃ kāṅkṣati mānada | taccāsya mānasaṃ jñātaṃ bhagavaṃstapasā tvayā
“हे मानद! ये राजा अपने परलोक में गए हुए पुत्रों को देखना चाहते हैं, और हे भगवन्! इनके मन की यह इच्छा आपने तपस्या से जान ली है।
श्लोक 42 (15.31.42)
षोडशेमानि वर्षाणि गतानि मुनिपुङ्गव । अस्य राज्ञोहतान्पुत्राञ्शोचतो न शमो विभो ॥
ṣoḍaśemāni varṣāṇi gatāni munipuṅgava | asya rājñohatānputrāñśocato na śamo vibho
हे मुनिश्रेष्ठ! सोलह वर्ष बीत गए, पर मारे गए पुत्रों के लिए शोक करते हुए इन राजा को शान्ति नहीं मिली, हे विभो!
श्लोक 43 (15.31.43)
पुत्रशोकसमाविष्टो निःश्वसन्ह्येष भूमिपः । न शेते वसतीः सर्वा धृतराष्ट्रो महामुने ॥
putraśokasamāviṣṭo niḥśvasanhyeṣa bhūmipaḥ | na śete vasatīḥ sarvā dhṛtarāṣṭro mahāmune
हे महामुनि! पुत्रशोक में डूबे, आहें भरते हुए ये राजा धृतराष्ट्र इन सब रातों में सो नहीं पाए।
श्लोक 44 (15.31.44)
लोकानन्यान्समर्थोसि स्रष्टुं सर्वांस्तपोबलात् । किमु लोकान्तरगतान्राज्ञो दर्शयितुं सुतान् ॥
lokānanyānsamarthosi sraṣṭuṃ sarvāṃstapobalāt | kimu lokāntaragatānrājño darśayituṃ sutān
आप अपने तपोबल से दूसरे सम्पूर्ण लोकों की भी सृष्टि कर सकते हैं; तब परलोक में गए राजा के पुत्रों को दिखा देना कौन-सी बड़ी बात है?
श्लोक 45 (15.31.45)
इयं च द्रौपदी कृष्णा हतज्ञातिसुता भृशम् । शोचत्यतीव सर्वासां स्नुषाणां दयिता स्नुषा ॥
iyaṃ ca draupadī kṛṣṇā hatajñātisutā bhṛśam | śocatyatīva sarvāsāṃ snuṣāṇāṃ dayitā snuṣā
और यह द्रौपदी कृष्णा, जिसके बन्धु और पुत्र मारे गए हैं, अत्यन्त शोक करती है — यह सब बहुओं में प्रिय बहू है।
श्लोक 46 (15.31.46)
तथा कृष्णस्य भगिनी सुभद्रा भद्रभाषिणी । सौभद्रवधसंतप्ता भृशं शोचति भामिनी ॥
tathā kṛṣṇasya bhaginī subhadrā bhadrabhāṣiṇī | saubhadravadhasaṃtaptā bhṛśaṃ śocati bhāminī
इसी प्रकार कृष्ण की बहन मधुरभाषिणी सुभद्रा सौभद्र (अभिमन्यु) के वध से सन्तप्त होकर अत्यन्त शोक करती है।
श्लोक 47 (15.31.47)
इयं च भूरिश्रवसो भार्या परमसम्मता । भर्तृव्यसनशोकार्ता भृशं शोचति भामिनी ॥
iyaṃ ca bhūriśravaso bhāryā paramasammatā | bhartṛvyasanaśokārtā bhṛśaṃ śocati bhāminī
और यह भूरिश्रवा की पत्नी, जिसका सब आदर करते हैं, पति की विपत्ति के शोक से पीड़ित होकर अत्यन्त विलाप करती है।
श्लोक 48 (15.31.48)
यस्यास्तु श्वशुरो धीमान्बाह्लिकः स कुरूद्वहः । निहतः सोमदत्तश्च पित्रा सह महारणे ॥
yasyāstu śvaśuro dhīmānbāhlikaḥ sa kurūdvahaḥ | nihataḥ somadattaśca pitrā saha mahāraṇe
उसके श्वशुर बुद्धिमान कुरुवंशी बाह्लीक थे, और सोमदत्त भी महायुद्ध में अपने पिता के साथ मारे गए।
श्लोक 49 (15.31.49)
श्रीमतोस्य महाबुद्धेः सङ्ग्रामेष्वपलायिनः । पुत्रस्य ते पुत्रशतं निहतं यद्रणाजिरे ॥
śrīmatosya mahābuddheḥ saṅgrāmeṣvapalāyinaḥ | putrasya te putraśataṃ nihataṃ yadraṇājire
आपके इस श्रीमान्, बुद्धिमान और युद्धों में कभी न भागने वाले पुत्र के सौ पुत्र रणभूमि में मारे गए।
श्लोक 50 (15.31.50)
तस्य भार्याशतमिदं दुःखशोकसमाहतम् । पुनःपुनर्वर्धयानं शोकं राज्ञो ममैव च । हताहारेण महता मामुपास्ते महामुने ॥
tasya bhāryāśatamidaṃ duḥkhaśokasamāhatam | punaḥpunarvardhayānaṃ śokaṃ rājño mamaiva ca | hatāhāreṇa mahatā māmupāste mahāmune
उसकी ये सौ पत्नियाँ, दुःख और शोक से पीड़ित, राजा के और मेरे भी शोक को बार-बार बढ़ाती हुई, हे महामुने! भोजन छोड़े हुए, बड़ी व्याकुलता से मेरे पास बैठी रहती हैं।
श्लोक 51 (15.31.51)
ये च शूरा महात्मानः श्वशुरा मे महारथाः । सोमदत्तप्रभृतयः का नु तेषां गतिः प्रभो ॥
ye ca śūrā mahātmānaḥ śvaśurā me mahārathāḥ | somadattaprabhṛtayaḥ kā nu teṣāṃ gatiḥ prabho
और मेरे जो वीर, महात्मा, महारथी श्वशुर सोमदत्त आदि थे, हे प्रभो! उनकी क्या गति हुई?
श्लोक 52 (15.31.52)
तव प्रसादाद्भगवन्विशोकोऽयं महीपतिः । कुर्यात्कालमहं चेयं वधूस्तव महामुने ॥
tava prasādādbhagavanviśoko'yaṃ mahīpatiḥ | kuryātkālamahaṃ ceyaṃ vadhūstava mahāmune
हे भगवन्! आपकी कृपा से ये राजा शोकरहित हों, और मैं तथा आपकी यह बहू भी शोकरहित होकर समय बिताएँ।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 53 (15.31.53)
इत्युक्तवत्यां गान्धार्यां कुन्ती व्रतकृशानना । प्रच्छन्नजातं पुत्रं तु सस्मारादित्यसन्निभम् ॥
ityuktavatyāṃ gāndhāryāṃ kuntī vratakṛśānanā | pracchannajātaṃ putraṃ tu sasmārādityasannibham
गान्धारी के ऐसा कहने पर व्रतों से दुबले मुखवाली कुन्ती को अपने गुप्त रूप से उत्पन्न, सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र का स्मरण हो आया।
श्लोक 54 (15.31.54)
तामृषिर्वरदो व्यासो दूरश्रवणदर्शनः । अपश्यद्दुःखितां देवीं मातरं सव्यसाचिनः ॥
tāmṛṣirvarado vyāso dūraśravaṇadarśanaḥ | apaśyadduḥkhitāṃ devīṃ mātaraṃ savyasācinaḥ
वरदायक, दूर की बात देखने-सुनने में समर्थ ऋषि व्यास ने सव्यसाची (अर्जुन) की माता उस दुःखी देवी को देखा।
श्लोक 55 (15.31.55)
तामुवाच ततो व्यासो यत्ते कार्यं विवक्षितम् । तद्बूहि त्वं महाभागे यत्ते मनसि वर्तते ॥
tāmuvāca tato vyāso yatte kāryaṃ vivakṣitam | tadbūhi tvaṃ mahābhāge yatte manasi vartate
तब व्यास ने उनसे कहा, “तुम्हारा जो कार्य करवाना चाहती हो, हे महाभागे! जो तुम्हारे मन में है, वह कहो।”
श्लोक 56 (15.31.56)
श्वशुराय ततः कुन्ती प्रणम्य शिरसा तदा । उवाच वाक्यं सव्रीडा विवृण्वाना पुरातनम् ॥
śvaśurāya tataḥ kuntī praṇamya śirasā tadā | uvāca vākyaṃ savrīḍā vivṛṇvānā purātanam
तब कुन्ती ने श्वशुर को सिर झुकाकर प्रणाम किया और लज्जित होकर एक पुरानी बात को प्रकट करती हुई बोलीं।