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आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 30

व्यास द्वारा विदुर के धर्म-स्वरूप का प्रकटीकरण

एकत्र ऋषियों के बीच बैठे व्यास धृतराष्ट्र से उनके तप, मन की शान्ति तथा गान्धारी, कुन्ती और पाण्डवों के कुशल के विषय में अनेक प्रश्न पूछते हैं। फिर वे बताते हैं कि विदुर स्वयं धर्म थे, जो माण्डव्य के शाप से विचित्रवीर्य के क्षेत्र में उत्पन्न हुए और अब युधिष्ठिर में प्रविष्ट हो गए हैं। व्यास तप का एक अद्भुत फल दिखाने का वचन देते हैं और पूछते हैं कि धृतराष्ट्र क्या देखना, छूना या सुनना चाहते हैं।

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (15.30.1)

ततः समुपविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु । व्यासः सत्यवतीपुत्रः प्रोवाचामन्त्र्य पार्थिवम् ॥

tataḥ samupaviṣṭeṣu pāṇḍaveṣu mahātmasu | vyāsaḥ satyavatīputraḥ provācāmantrya pārthivam

जब महात्मा पाण्डव बैठ चुके, तब सत्यवती के पुत्र व्यास ने राजा को सम्बोधित करके कहा:

व्यास उवाच

श्लोक 2 (15.30.2)

धृतराष्ट्र महाबाहो कच्चित्ते वर्तते तपः । कच्चिन्मनस्ते प्रीणाति वनवासे नराधिप ॥

dhṛtarāṣṭra mahābāho kaccitte vartate tapaḥ | kaccinmanaste prīṇāti vanavāse narādhipa

"हे महाबाहु धृतराष्ट्र! क्या तुम्हारा तप चल रहा है? हे नराधिप! क्या वनवास में तुम्हारा मन रमता है?

श्लोक 3 (15.30.3)

कच्चिद्धृदि न ते शोको राजन्पुत्रविनाशजः । कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि सुप्रसन्नानि तेऽनघ ॥

kacciddhṛdi na te śoko rājanputravināśajaḥ | kaccijjñānāni sarvāṇi suprasannāni te'nagha

हे राजन्! क्या तुम्हारे हृदय में पुत्रों के विनाश से उत्पन्न शोक नहीं है? हे अनघ! क्या तुम्हारा सारा ज्ञान भली-भाँति प्रसन्न (निर्मल) है?

श्लोक 4 (15.30.4)

कच्चिद्बुद्धिं दृढां कृत्वा चरस्यारण्यकं विधिम् । कच्चिद्वधूश्च गान्धारी न शोकेनाभिभूयते ॥

kaccidbuddhiṃ dṛḍhāṃ kṛtvā carasyāraṇyakaṃ vidhim | kaccidvadhūśca gāndhārī na śokenābhibhūyate

क्या तुम बुद्धि को दृढ़ करके वनवास की विधि का पालन करते हो? और क्या तुम्हारी वधू (पत्नी) गान्धारी शोक से अभिभूत नहीं है?

श्लोक 5 (15.30.5)

महाप्रज्ञा बुद्धिमती देवी धर्मार्थदर्शिनी । आगमापायतत्त्वज्ञा कच्चिदेषा न शोचति ॥

mahāprajñā buddhimatī devī dharmārthadarśinī | āgamāpāyatattvajñā kaccideṣā na śocati

वह महाप्रज्ञा, बुद्धिमती, धर्म और अर्थ को देखने वाली, आगम और अपाय के तत्त्व को जानने वाली देवी — क्या वह शोक तो नहीं करती?

श्लोक 6 (15.30.6)

कच्चित्कुन्ती च राजंस्त्वां शुश्रूषत्यनहङ्कृता । या परित्यज्य स्वं पुत्रं गुरुशुश्रूषणे रता ॥

kaccitkuntī ca rājaṃstvāṃ śuśrūṣatyanahaṅkṛtā | yā parityajya svaṃ putraṃ guruśuśrūṣaṇe ratā

और क्या कुन्ती अहंकार से रहित होकर तुम्हारी सेवा करती है — वह जो अपने पुत्र को छोड़कर गुरुजनों की सेवा में लगी है?

श्लोक 7 (15.30.7)

कच्चिद्धर्मसुतो राजा त्वया प्रत्यभिनन्दितः । भीमार्जुनयमाश्चैव कच्चिदेतेऽपि सान्त्विताः ॥

kacciddharmasuto rājā tvayā pratyabhinanditaḥ | bhīmārjunayamāścaiva kaccidete'pi sāntvitāḥ

क्या तुमने धर्मपुत्र राजा का स्वागत किया? और क्या भीम, अर्जुन और जुड़वाँ भाइयों को भी तुमने सान्त्वना दी?

श्लोक 8 (15.30.8)

कच्चिन्नन्दसि दृष्ट्वैतान्कच्चित्ते निर्मलं मनः । कच्चिच्च शुद्धभावोसि जातज्ञानो नराधिप ॥

kaccinnandasi dṛṣṭvaitānkaccitte nirmalaṃ manaḥ | kaccicca śuddhabhāvosi jātajñāno narādhipa

क्या तुम इन्हें देखकर प्रसन्न होते हो? क्या तुम्हारा मन निर्मल है? और हे नराधिप! क्या तुम शुद्ध भाव वाले हो और तुम्हें ज्ञान उत्पन्न हो चुका है?

श्लोक 9 (15.30.9)

एतद्धि त्रितयं श्रेष्ठं सर्वभूतेषु भारत । निर्वैरता महाराज सत्यमक्रोध एव च ॥

etaddhi tritayaṃ śreṣṭhaṃ sarvabhūteṣu bhārata | nirvairatā mahārāja satyamakrodha eva ca

हे भारत! समस्त प्राणियों में ये तीन श्रेष्ठ हैं: वैरहीनता, सत्य और क्रोध का अभाव, हे महाराज!

श्लोक 10 (15.30.10)

कच्चित्ते न च मोहोस्ति वनवासेन भारत । स्वदते वन्यमन्नं वा उपवासोपि वा भवेत् ॥

kaccitte na ca mohosti vanavāsena bhārata | svadate vanyamannaṃ vā upavāsopi vā bhavet

हे भारत! क्या वनवास से तुम्हें मोह तो नहीं होता? क्या वन का अन्न तुम्हें रुचता है, अथवा जो भी हो, उपवास?

श्लोक 11 (15.30.11)

विदितं चापि राजेन्द्र विदुरस्य महात्मनः । गमनं विधिनाऽनेन धर्मस्य सुमहात्मनः ॥

viditaṃ cāpi rājendra vidurasya mahātmanaḥ | gamanaṃ vidhinā'nena dharmasya sumahātmanaḥ

हे राजेन्द्र! मुझे महात्मा विदुर के इस प्रकार प्रस्थान का पता है; वे साक्षात् धर्म थे, महान् आत्मा वाले।

श्लोक 12 (15.30.12)

माण्डव्यशापाद्धि स वै धर्मो विदुरतां गतः । महाबुद्धिर्महायोगी महात्मा सुमहामनाः ॥

māṇḍavyaśāpāddhi sa vai dharmo viduratāṃ gataḥ | mahābuddhirmahāyogī mahātmā sumahāmanāḥ

माण्डव्य के शाप से वही धर्म विदुर के रूप में उत्पन्न हुआ: महाबुद्धि, महायोगी, महात्मा, उदार मन वाला।

श्लोक 13 (15.30.13)

बृहस्पतिर्वा देवेषु शुक्रो वाऽप्यसुरेषु च । न तथा बुद्धिसम्पन्नो यथा स पुरुषर्षभः ॥

bṛhaspatirvā deveṣu śukro vā'pyasureṣu ca | na tathā buddhisampanno yathā sa puruṣarṣabhaḥ

देवताओं में बृहस्पति और असुरों में शुक्राचार्य भी उस पुरुषश्रेष्ठ के समान बुद्धिसम्पन्न नहीं थे।

श्लोक 14 (15.30.14)

तपोबलव्ययं कृत्वा सुचिरात्सम्भृतं तदा । माण्डव्येनर्षिणा धर्मो ह्यभिभूतः सनातनः ॥

tapobalavyayaṃ kṛtvā sucirātsambhṛtaṃ tadā | māṇḍavyenarṣiṇā dharmo hyabhibhūtaḥ sanātanaḥ

बहुत समय से संचित तपोबल का व्यय करके ऋषि माण्डव्य ने सनातन धर्म को अपने वश में कर लिया।

श्लोक 15 (15.30.15)

नियोगाद्ब्रह्मणः पूर्वं मया स्वेन बलेन च । वैचित्रवीर्यके क्षेत्रे जातः स सुमहामतिः ॥

niyogādbrahmaṇaḥ pūrvaṃ mayā svena balena ca | vaicitravīryake kṣetre jātaḥ sa sumahāmatiḥ

ब्रह्मा की आज्ञा से, पूर्वकाल में, मेरे अपने बल से वह महाबुद्धिमान् विचित्रवीर्य के क्षेत्र में उत्पन्न हुआ।

श्लोक 16 (15.30.16)

भ्राता तव महाराज देवदेवः सनातनः । धारणान्मनसा ध्यानाद्यं धर्मं कवयो विदुः ॥

bhrātā tava mahārāja devadevaḥ sanātanaḥ | dhāraṇānmanasā dhyānādyaṃ dharmaṃ kavayo viduḥ

हे महाराज! तुम्हारा भाई सनातन देवों का देव है, जिसे धारणा, मन और ध्यान के द्वारा ज्ञानी लोग धर्म के रूप में जानते हैं —

श्लोक 17 (15.30.17)

सत्येन संवर्धयति यो दमेन शमेन च । अहिंसया च दानेन तपसा च सनातनः ॥

satyena saṃvardhayati yo damena śamena ca | ahiṃsayā ca dānena tapasā ca sanātanaḥ

जो सत्य, दम और शम से, अहिंसा, दान और तप से सबको बढ़ाता है — वह सनातन —

श्लोक 18 (15.30.18)

येन योगबलाज्जातः कुरुराजो युधिष्ठिरः । धर्म इत्येष नृपते प्राज्ञेनामितबुद्धिना ॥

yena yogabalājjātaḥ kururājo yudhiṣṭhiraḥ | dharma ityeṣa nṛpate prājñenāmitabuddhinā

जिसके द्वारा योगबल से कुरुराज युधिष्ठिर उत्पन्न हुआ। हे राजन्! वह अपार बुद्धि वाला प्राज्ञ यह धर्म ही है।

श्लोक 19 (15.30.19)

यथा वह्निर्यथा वायुर्यथाऽऽपः पृथिवी यथा । यथाऽऽकाशं तथा धर्म इह चामुत्र च स्थितः ॥

yathā vahniryathā vāyuryathā''paḥ pṛthivī yathā | yathā''kāśaṃ tathā dharma iha cāmutra ca sthitaḥ

जैसे अग्नि, जैसे वायु, जैसे जल, जैसे पृथ्वी और जैसे आकाश, वैसे ही धर्म इस लोक में और परलोक में स्थित है।

श्लोक 20 (15.30.20)

सर्वगश्चैव राजेन्द्र सर्वं व्याप्य चराचरम् । दृश्यते देवदेवैः स सिद्धैर्निर्मुक्तकल्मषैः ॥

sarvagaścaiva rājendra sarvaṃ vyāpya carācaram | dṛśyate devadevaiḥ sa siddhairnirmuktakalmaṣaiḥ

हे राजेन्द्र! वह सर्वव्यापी है, चर और अचर सबमें व्याप्त है, और प्रमुख देवताओं तथा निष्पाप सिद्धों को दिखाई देता है।

श्लोक 21 (15.30.21)

यो हि धर्मः स विदुरो विदुरो यः स पाण्डवः । स एष राजन्दृश्यस्ते पाण्डवः प्रेष्यवत्स्थितः ॥

yo hi dharmaḥ sa viduro viduro yaḥ sa pāṇḍavaḥ | sa eṣa rājandṛśyaste pāṇḍavaḥ preṣyavatsthitaḥ

जो धर्म है वही विदुर है, और जो विदुर है वही पाण्डव है; हे राजन्! वही तुम्हें सेवक की भाँति खड़ा दिखाई दे रहा है।

श्लोक 22 (15.30.22)

प्रविष्टः स महात्मानं भ्राता ते बुद्धिसम्मतः । दृष्ट्वा महात्मा कौन्तेयं महायोगबलान्वितः ॥

praviṣṭaḥ sa mahātmānaṃ bhrātā te buddhisammataḥ | dṛṣṭvā mahātmā kaunteyaṃ mahāyogabalānvitaḥ

तुम्हारा बुद्धि से सम्मानित भाई उस महात्मा कुन्तीपुत्र को देखकर उसमें प्रविष्ट हो गया है — वह महात्मा जो महान् योगबल से सम्पन्न है।

श्लोक 23 (15.30.23)

त्वां चापि श्रेयसा योक्ष्ये नचिराद्भरतर्षभ । संशयच्छेदनार्थाय प्राप्तं मां विद्धि पुत्रक ॥

tvāṃ cāpi śreyasā yokṣye nacirādbharatarṣabha | saṃśayacchedanārthāya prāptaṃ māṃ viddhi putraka

हे भरतश्रेष्ठ! मैं शीघ्र ही तुम्हें भी कल्याण से जोड़ दूँगा। पुत्र! जानो कि मैं तुम्हारे संशय काटने के लिए आया हूँ।

श्लोक 24 (15.30.24)

न कृतं यैः पुरा कैश्चित्कर्म लोके महर्षिभिः । आश्चर्यभूतं तपसः फलं तद्दर्शयामि वः ॥

na kṛtaṃ yaiḥ purā kaiścitkarma loke maharṣibhiḥ | āścaryabhūtaṃ tapasaḥ phalaṃ taddarśayāmi vaḥ

मैं तुम्हें तप का वह आश्चर्यजनक फल दिखाऊँगा, जो कर्म इस लोक में पहले किसी महर्षि ने नहीं किया।

श्लोक 25 (15.30.25)

किमिच्छसि महीपाल मत्तः प्राप्तुमभीप्सितम् । द्रष्टुं स्प्रष्टुमथ श्रोतुं तत्कर्तास्मि तवानघ ॥

kimicchasi mahīpāla mattaḥ prāptumabhīpsitam | draṣṭuṃ spraṣṭumatha śrotuṃ tatkartāsmi tavānagha

हे महीपाल! तुम मुझसे क्या पाना चाहते हो — देखना, छूना या सुनना? हे अनघ! मैं वह तुम्हारे लिए कर दूँगा।"

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