आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 29
युधिष्ठिर का आश्रम-दर्शन और व्यास का आगमन
रात वार्तालाप में बीतती है; पाण्डव माता के पास भूमि पर सोते हैं और वही आहार करते हैं जो धृतराष्ट्र करते हैं। प्रातःकाल युधिष्ठिर धृतराष्ट्र की अनुमति से आश्रमों का भ्रमण करते हैं और तपस्वियों को पात्र तथा सब प्रकार की वस्तुएँ देते हैं, फिर लौटकर बड़ों के पास बैठते हैं। शतयूप आदि कुरुक्षेत्र के ऋषि आते हैं और उनके बाद शिष्यों सहित व्यास; सब उठकर उनका अभिवादन करते हैं और वे अपने लिए बिछाए आसन पर बैठते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (15.29.1)
ततस्तु राजन्नेतेषामाश्रमे पुण्यकर्मणाम् । शिवा नक्षत्रसम्पन्ना सा व्यतीयाय शर्वरी ॥
tatastu rājanneteṣāmāśrame puṇyakarmaṇām | śivā nakṣatrasampannā sā vyatīyāya śarvarī
तब हे राजन्! आश्रम में उन पुण्यकर्मा लोगों की वह शुभ, नक्षत्रों से भरी रात बीत गई।
श्लोक 2 (15.29.2)
ततस्तत्र कथाश्चासंस्तेषां धर्मार्थलक्षणाः । विचित्रपदसञ्चारा नानाश्रुतिभिरन्विताः ॥
tatastatra kathāścāsaṃsteṣāṃ dharmārthalakṣaṇāḥ | vicitrapadasañcārā nānāśrutibhiranvitāḥ
वहाँ उनके बीच धर्म और अर्थ से सम्बन्धित अनेक कथाएँ चलती रहीं, जो विविध पदों के विचरण वाली और नाना श्रुतियों से युक्त थीं।
श्लोक 3 (15.29.3)
पाण्डवास्त्वभितो मातुर्धरण्यां सुषुपुस्तदा । उत्सृज्य तु महार्हाणि शयनानि नराधिप ॥
pāṇḍavāstvabhito māturdharaṇyāṃ suṣupustadā | utsṛjya tu mahārhāṇi śayanāni narādhipa
हे नराधिप! पाण्डव अपनी बहुमूल्य शय्याओं को छोड़कर माता के चारों ओर भूमि पर सोए।
श्लोक 4 (15.29.4)
यदाहारोऽभवद्राजा धृतराष्ट्रो महामनाः । तदाहारा नृवीरास्ते न्यवसंस्तां निशां तदा ॥
yadāhāro'bhavadrājā dhṛtarāṣṭro mahāmanāḥ | tadāhārā nṛvīrāste nyavasaṃstāṃ niśāṃ tadā
महामना राजा धृतराष्ट्र जो आहार करते थे, वही आहार करते हुए वे वीर उस रात वहाँ रहे।
श्लोक 5 (15.29.5)
व्यतीतायां तु शर्वर्यां कृतपौर्वाह्णिकक्रियः । भ्रातृभिः सहितो राजा ददर्शाश्रममण्डलम् ॥
vyatītāyāṃ tu śarvaryāṃ kṛtapaurvāhṇikakriyaḥ | bhrātṛbhiḥ sahito rājā dadarśāśramamaṇḍalam
रात बीतने पर प्रातःकाल के कर्म करके राजा ने भाइयों के साथ आश्रम-मण्डल का दर्शन किया,
श्लोक 6 (15.29.6)
सान्तःपुरपरीवारः सभृत्यः सपुरोहितः । यथासुखं यथोद्देशं धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञया ॥
sāntaḥpuraparīvāraḥ sabhṛtyaḥ sapurohitaḥ | yathāsukhaṃ yathoddeśaṃ dhṛtarāṣṭrābhyanujñayā
अन्तःपुर की स्त्रियों, सेवकों और पुरोहित के साथ, सुखपूर्वक, बताए हुए क्रम से, धृतराष्ट्र की आज्ञा लेकर।
श्लोक 7 (15.29.7)
ददर्श तत्र वेदीश्च सम्प्रज्वलितपावकाः । कृताभिषेकैर्मुनिभिर्हुताग्निभिरुपस्थिताः ॥
dadarśa tatra vedīśca samprajvalitapāvakāḥ | kṛtābhiṣekairmunibhirhutāgnibhirupasthitāḥ
वहाँ उन्होंने प्रज्वलित अग्नि वाली वेदियाँ देखीं, जिनके पास स्नान किए हुए और अग्नि में आहुति दे चुके मुनि उपस्थित थे,
श्लोक 8 (15.29.8)
वानेयपुष्पनिकरैराज्यधूमोद्गमैरपि । ब्राह्मेण वपुषा युक्ता युक्ता मुनिगणस्य ताः ॥
vāneyapuṣpanikarairājyadhūmodgamairapi | brāhmeṇa vapuṣā yuktā yuktā munigaṇasya tāḥ
जो जंगली फूलों के ढेरों से और घी की आहुतियों से उठते धुएँ से सुशोभित थीं; वे वेदियाँ मुनिगण के ब्राह्म तेज से युक्त थीं।
श्लोक 9 (15.29.9)
मृगयूथैरनुद्विग्नैस्तत्रतत्र समाश्रितैः । अशङ्कितैः पक्षिगणैः प्रगीतैरिव च प्रभो ॥
mṛgayūthairanudvignaistatratatra samāśritaiḥ | aśaṅkitaiḥ pakṣigaṇaiḥ pragītairiva ca prabho
वह स्थान जहाँ-तहाँ निश्चिन्त मृगों के झुंडों से और निर्भय पक्षियों के समूहों से, मानो गाते हुए, सेवित था, हे प्रभो!
श्लोक 10 (15.29.10)
केकाभिर्नीलकण्ठानां दात्यूहानां च कूजितैः । कोकिलानां कुहुरवैः सुखैः श्रुतिमनोहरैः ॥
kekābhirnīlakaṇṭhānāṃ dātyūhānāṃ ca kūjitaiḥ | kokilānāṃ kuhuravaiḥ sukhaiḥ śrutimanoharaiḥ
मोरों की केका से, जलकुक्कुटों की कूजन से और कोयलों की कानों को मोहने वाली मधुर कुहू से युक्त;
श्लोक 11 (15.29.11)
प्राधीतद्विजघोषैश्च क्वचित्क्वचिदलङ्कृतम् । फलमूलसमाहारैर्महद्भिश्चोपशोभितम् ॥
prādhītadvijaghoṣaiśca kvacitkvacidalaṅkṛtam | phalamūlasamāhārairmahadbhiścopaśobhitam
जहाँ-तहाँ अध्ययन किए हुए पाठ का उच्चारण करते द्विजों के स्वरों से अलंकृत और फल-मूल के बड़े संग्रहों से शोभित।
श्लोक 12 (15.29.12)
ततः स राजा प्रददौ तापसार्थमुपाहृतान् । कलशान्काञ्चनान्राजंस्तथैवौदुम्बरानपि ॥
tataḥ sa rājā pradadau tāpasārthamupāhṛtān | kalaśānkāñcanānrājaṃstathaivaudumbarānapi
तब राजा ने तपस्वियों के लिए लाई गई वस्तुएँ दीं: सोने के कलश और, हे राजन्! उदुम्बर की लकड़ी के कलश भी,
श्लोक 13 (15.29.13)
अजिनानि प्रवेणीश्च स्रुक्स्रुवं च महीपतिः । कमण्डलूंश्च स्थालीश्च पिठराणि च भारत ॥
ajināni praveṇīśca sruksruvaṃ ca mahīpatiḥ | kamaṇḍalūṃśca sthālīśca piṭharāṇi ca bhārata
मृगचर्म, बुने हुए आसन, स्रुक् और स्रुवा, कमण्डलु, स्थालियाँ और घड़े, हे भारत!
श्लोक 14 (15.29.14)
भाजनानि च लौहानि पात्रीश्च विविधा नृप । यद्यदिच्छति यावच्च यदन्यदपि काङ्क्षितम् ॥
bhājanāni ca lauhāni pātrīśca vividhā nṛpa | yadyadicchati yāvacca yadanyadapi kāṅkṣitam
लोहे के पात्र और अनेक प्रकार की कटोरियाँ, हे राजन्! जिसे जो चाहिए था, जितना चाहिए था, और जो कुछ और भी अभीष्ट था।
श्लोक 15 (15.29.15)
एवं स राजा धर्मात्मा परीत्याश्रममण्डलम् । वसु विश्राण्य तत्सर्वं पुनरायान्महीपतिः ॥
evaṃ sa rājā dharmātmā parītyāśramamaṇḍalam | vasu viśrāṇya tatsarvaṃ punarāyānmahīpatiḥ
इस प्रकार आश्रम-मण्डल की परिक्रमा कर और वह सारा धन बाँटकर धर्मात्मा राजा लौट आए।
श्लोक 16 (15.29.16)
कृताह्निकं च राजानं धृतराष्ट्रं महीपतिम् । ददर्शासीनमव्यग्रं गान्धारीसहितं तदा ॥
kṛtāhnikaṃ ca rājānaṃ dhṛtarāṣṭraṃ mahīpatim | dadarśāsīnamavyagraṃ gāndhārīsahitaṃ tadā
उन्होंने राजा धृतराष्ट्र को, जिन्होंने अपने नित्यकर्म पूरे कर लिए थे, गान्धारी के साथ शान्तभाव से बैठे देखा;
श्लोक 17 (15.29.17)
मातरं चाविदूरस्थां शिष्यवत्प्रणतां स्थिताम् । कुन्तीं ददर्श धर्मात्मा शिष्टाचारसमन्विताम् ॥
mātaraṃ cāvidūrasthāṃ śiṣyavatpraṇatāṃ sthitām | kuntīṃ dadarśa dharmātmā śiṣṭācārasamanvitām
और धर्मात्मा ने अपनी माता कुन्ती को, जो पास ही शिष्या की तरह विनीत खड़ी थीं और शिष्टाचार से युक्त थीं, देखा।
श्लोक 18 (15.29.18)
स तमभ्यर्च्य राजानं नाम संश्राव्य चात्मनः । निषीदेत्यभ्यनुज्ञातो बृस्यामुपविवेश ह ॥
sa tamabhyarcya rājānaṃ nāma saṃśrāvya cātmanaḥ | niṣīdetyabhyanujñāto bṛsyāmupaviveśa ha
उन्होंने राजा की अर्चना की, अपना नाम सुनाया, और "बैठो" ऐसी अनुमति पाकर कुश-आसन पर बैठ गए।
श्लोक 19 (15.29.19)
भीमसेनादयश्चैव पाण्डव भरतर्षभ । अभिवाद्योपसङ्गृह्य निषेदुः पार्थिवाज्ञया ॥
bhīmasenādayaścaiva pāṇḍava bharatarṣabha | abhivādyopasaṅgṛhya niṣeduḥ pārthivājñayā
और हे भरतर्षभ! भीमसेन आदि पाण्डव प्रणाम कर और चरण पकड़कर राजा की आज्ञा से बैठ गए।
श्लोक 20 (15.29.20)
स तैः परिवृतो राजा शुशुभेऽतीव कौरवः । बिभ्रद्ब्राह्मीं श्रियं दीप्तां देवैरिव बृहस्पतिः ॥
sa taiḥ parivṛto rājā śuśubhe'tīva kauravaḥ | bibhradbrāhmīṃ śriyaṃ dīptāṃ devairiva bṛhaspatiḥ
उनसे घिरे हुए कुरुराज देदीप्यमान ब्राह्मी श्री धारण किए अत्यन्त शोभित हुए, जैसे देवताओं के बीच बृहस्पति।
श्लोक 21 (15.29.21)
तथा तेषूपविष्टेषु समाजग्मुर्महर्षयः । शतयूपप्रभृतयः कुरुक्षेत्रनिवासिनः ॥
tathā teṣūpaviṣṭeṣu samājagmurmaharṣayaḥ | śatayūpaprabhṛtayaḥ kurukṣetranivāsinaḥ
जब वे इस प्रकार बैठे थे, तब शतयूप आदि कुरुक्षेत्र-निवासी महर्षि वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 22 (15.29.22)
व्यासश्च भगवान्विप्रो देवर्षिगणसेवितः । वृतः शिष्यैर्महातेजा दर्शयामास पार्थिवम् ॥
vyāsaśca bhagavānvipro devarṣigaṇasevitaḥ | vṛtaḥ śiṣyairmahātejā darśayāmāsa pārthivam
और भगवान् विप्र व्यास, देवर्षियों के समूहों से सेवित और शिष्यों से घिरे हुए, महातेजस्वी, राजा के सामने उपस्थित हुए।
श्लोक 23 (15.29.23)
ततः स राजा कौरव्यः कुन्तीपुत्रश्च धर्मराट् । भीमसेनादयश्चैव प्रत्युत्थायाभ्यवादयन् ॥
tataḥ sa rājā kauravyaḥ kuntīputraśca dharmarāṭ | bhīmasenādayaścaiva pratyutthāyābhyavādayan
तब कुरुराज, कुन्ती के पुत्र धर्मराज और भीमसेन आदि ने उठकर उनका अभिवादन किया।
श्लोक 24 (15.29.24)
समागतस्ततो व्यासः शतयूपादिभिर्वृतः । धृतराष्ट्रं महीपालमास्यतामित्यभाषत ॥
samāgatastato vyāsaḥ śatayūpādibhirvṛtaḥ | dhṛtarāṣṭraṃ mahīpālamāsyatāmityabhāṣata
शतयूप आदि से घिरे हुए व्यास आकर पृथ्वी के पालक राजा धृतराष्ट्र से बोले, "बैठो।"
श्लोक 25 (15.29.25)
वरं तु विष्टरं कौश्यं कृष्णाजिनकुशोत्तरम् । प्रतिपेदे तदा व्यासस्तदर्थमुपकल्पितम् ॥
varaṃ tu viṣṭaraṃ kauśyaṃ kṛṣṇājinakuśottaram | pratipede tadā vyāsastadarthamupakalpitam
व्यास ने अपने लिए बिछाया हुआ वह उत्तम कुश का आसन, जिस पर कृष्णमृगचर्म और कुश बिछे थे, ग्रहण किया।
श्लोक 26 (15.29.26)
ते च सर्वे द्विजश्रेष्ठा विष्टरेषु समन्ततः । द्वैपायनाभ्यनुज्ञाता निषेदुर्विपुलौजसः ॥
te ca sarve dvijaśreṣṭhā viṣṭareṣu samantataḥ | dvaipāyanābhyanujñātā niṣedurvipulaujasaḥ
और वे सब विशाल तेज वाले श्रेष्ठ ब्राह्मण द्वैपायन की अनुमति पाकर चारों ओर अपने आसनों पर बैठ गए।