आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 28
विदुर का देह-त्याग
धृतराष्ट्र युधिष्ठिर से राज्य और प्रजा का कुशल पूछते हैं, और युधिष्ठिर बड़ों तथा विदुर के विषय में पूछते हैं। विदुर दूर से दिखाई देते हैं पर वन में लौट जाते हैं; युधिष्ठिर अकेले उनके पीछे जाकर आकृति से उन्हें पहचानते हैं, और विदुर उन्हें देखते हुए योग से राजा के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। एक वाणी पीछे रह गए शरीर के दाह का निषेध करती है। युधिष्ठिर धृतराष्ट्र को यह बताते हैं; राजा भाइयों को वन के फल-मूल देते हैं और वे रात वृक्षों के नीचे बिताते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (15.28.1)
युधिष्ठिर महाबाहो कच्चित्वं कुशली ह्यसि । सहितो भ्रातृभिः सर्वैः पौरजानपदैस्तथा ॥
yudhiṣṭhira mahābāho kaccitvaṃ kuśalī hyasi | sahito bhrātṛbhiḥ sarvaiḥ paurajānapadaistathā
"हे महाबाहु युधिष्ठिर! क्या तुम अपने सब भाइयों, नगरवासियों और देशवासियों सहित कुशल हो?
श्लोक 2 (15.28.2)
ये च त्वामनुजीवन्ति कच्चित्तेऽपि निरामयाः । सचिवा भृत्यवर्गाश्च गुरवश्चैव ते नृप ॥
ye ca tvāmanujīvanti kaccitte'pi nirāmayāḥ | sacivā bhṛtyavargāśca guravaścaiva te nṛpa
और जो लोग तुम्हारे आश्रय से जीते हैं, क्या वे भी नीरोग हैं, तुम्हारे मन्त्री, सेवकगण और गुरुजन, हे राजन्?
श्लोक 3 (15.28.3)
कच्चित्तेऽपि निरातङ्का वसन्ति विषये तव । कच्चिद्वर्तसि पौराणीं वृत्तिं राजर्षिसेविताम् ॥
kaccitte'pi nirātaṅkā vasanti viṣaye tava | kaccidvartasi paurāṇīṃ vṛttiṃ rājarṣisevitām
क्या वे भी तुम्हारे राज्य में निर्भय होकर रहते हैं? क्या तुम राजर्षियों द्वारा सेवित प्राचीन रीति से चलते हो?
श्लोक 4 (15.28.4)
कच्चिन्न्यायाननुच्छिद्य कोशस्तेऽभिप्रपूर्यते । अरिमध्यस्थमित्रेषु वर्तसे चानुरूपतः । ब्राह्मणानग्रहारैर्वा यथावदनुपश्यसि ॥
kaccinnyāyānanucchidya kośaste'bhiprapūryate | arimadhyasthamitreṣu vartase cānurūpataḥ | brāhmaṇānagrahārairvā yathāvadanupaśyasi
क्या तुम न्यायोचित को न काटकर अपना कोष भरते हो? क्या शत्रुओं, उदासीनों और मित्रों के साथ यथायोग्य बरतते हो? और क्या अग्रहार (भूमिदान) द्वारा ब्राह्मणों का यथोचित ध्यान रखते हो?
श्लोक 5 (15.28.5)
कच्चित्ते परितुष्यन्ति शीलेन भरतर्षभ । शत्रवोपि कुतः पौरा भृत्या वा स्वजनोपि वा ॥
kaccitte parituṣyanti śīlena bharatarṣabha | śatravopi kutaḥ paurā bhṛtyā vā svajanopi vā
हे भरतश्रेष्ठ! क्या वे तुम्हारे शील से सन्तुष्ट हैं — शत्रु भी, फिर नगरवासी, सेवक और अपने जन तो कहाँ?
श्लोक 6 (15.28.6)
कच्चिद्यजसि राजेन्द्र श्रद्धावान्पितृदेवताः । अतिथीनन्नपानेन कच्चिदर्चसि भारत ॥
kaccidyajasi rājendra śraddhāvānpitṛdevatāḥ | atithīnannapānena kaccidarcasi bhārata
हे राजेन्द्र! क्या तुम श्रद्धा के साथ पितरों और देवताओं का यजन करते हो? और हे भारत! क्या अन्न-जल से अतिथियों का सत्कार करते हो?
श्लोक 7 (15.28.7)
कच्चिन्नयपथे विप्राः स्वकर्मनिरतास्तव । क्षत्रिया वैश्यवर्णा वा शूद्रा वाऽपि कुटुम्बिनः ॥
kaccinnayapathe viprāḥ svakarmaniratāstava | kṣatriyā vaiśyavarṇā vā śūdrā vā'pi kuṭumbinaḥ
क्या तुम्हारे राज्य में ब्राह्मण नीति के मार्ग पर चलते हुए अपने कर्म में लगे हैं? और क्षत्रिय, वैश्यवर्ग तथा गृहस्थ शूद्र भी?
श्लोक 8 (15.28.8)
कच्चित्स्त्रीबालवृद्धं ते न शोचति न याचते । जामयः पूजिताः कच्चित्तव गेहे नरर्षभ ॥
kaccitstrībālavṛddhaṃ te na śocati na yācate | jāmayaḥ pūjitāḥ kaccittava gehe nararṣabha
क्या तुम्हारे यहाँ स्त्रियाँ, बालक और वृद्ध न शोक करते हैं, न भीख माँगते हैं? हे नरश्रेष्ठ! क्या तुम्हारे घर में गृह की स्त्रियाँ सम्मानित हैं?
श्लोक 9 (15.28.9)
कच्चिद्राजर्षिवंशोऽयं त्वामासाद्य महीपतिम् । यथोचितं महाराज यशसा नावसीदति ॥
kaccidrājarṣivaṃśo'yaṃ tvāmāsādya mahīpatim | yathocitaṃ mahārāja yaśasā nāvasīdati
हे महाराज! क्या राजर्षियों का यह वंश तुम जैसे राजा को पाकर अपने यथोचित यश से नहीं गिर रहा है?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (15.28.10)
इत्येवंवादिनं तं स न्यायवित्प्रत्यभाषत । कुशलप्रश्नसंयुक्तं कुशलो वाक्यमब्रवीत् ॥
ityevaṃvādinaṃ taṃ sa nyāyavitpratyabhāṣata | kuśalapraśnasaṃyuktaṃ kuśalo vākyamabravīt
जब धृतराष्ट्र ने इस प्रकार कहा, तब न्याय को जानने वाले कुशल युधिष्ठिर ने कुशल-प्रश्नों से भरी वाणी में उत्तर दिया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 11 (15.28.11)
अपि ते वर्धते राजंस्तपो मन्दः श्रमश्च ते ॥
api te vardhate rājaṃstapo mandaḥ śramaśca te
"हे राजन्! क्या तुम्हारा तप बढ़ रहा है, और क्या तुम्हारा श्रम हल्का है?
श्लोक 12 (15.28.12)
अपि मे जननी चेयं शुश्रूषुर्विगतक्लमा । अथास्याः सफलो राजन्वनवासो भविष्यति ॥
api me jananī ceyaṃ śuśrūṣurvigataklamā | athāsyāḥ saphalo rājanvanavāso bhaviṣyati
और क्या मेरी यह माता, जो तुम्हारी सेवा के लिए उत्सुक रहती है, थकान से मुक्त है? हे राजन्! तब क्या इसका वनवास सफल होगा?
श्लोक 13 (15.28.13)
इयं च माता ज्येष्ठा मे शीतवाताध्वकर्शिता । घोरेण तपसा युक्ता देवी कच्चिन्न शोचति ॥
iyaṃ ca mātā jyeṣṭhā me śītavātādhvakarśitā | ghoreṇa tapasā yuktā devī kaccinna śocati
और मेरी यह ज्येष्ठ माता, देवी, जो शीत, वायु और मार्ग से कृश हो गई है और घोर तप में लगी है — क्या वह शोक तो नहीं करती?
श्लोक 14 (15.28.14)
हतान्पुत्रान्महावीर्यान्क्षत्रधर्मपरायणान् । नापध्यायति वा कच्चिदस्मान्पापकृतः सदा ॥
hatānputrānmahāvīryānkṣatradharmaparāyaṇān | nāpadhyāyati vā kaccidasmānpāpakṛtaḥ sadā
क्या वह क्षत्रिय-धर्म में लगे, अपने मारे गए महापराक्रमी पुत्रों के कारण हम अपराधियों के प्रति सदा बुरा तो नहीं सोचती?
श्लोक 15 (15.28.15)
क्व चासौ विदुरो राजन्नेमं पश्यामहे वयम् । संजयः कुशली चायं कच्चिन्नु तपसि स्थिरः ॥
kva cāsau viduro rājannemaṃ paśyāmahe vayam | saṃjayaḥ kuśalī cāyaṃ kaccinnu tapasi sthiraḥ
और हे राजन्! विदुर कहाँ हैं? हम उन्हें नहीं देख रहे। और यह सञ्जय कुशल है? क्या यह तप में स्थिर है?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (15.28.16)
इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं धृतराष्ट्रो जनाधिपम् । कुशली विदुरः पुत्र तपो घोरं समाश्रितः ॥
ityuktaḥ pratyuvācainaṃ dhṛtarāṣṭro janādhipam | kuśalī viduraḥ putra tapo ghoraṃ samāśritaḥ
ऐसा कहे जाने पर धृतराष्ट्र ने राजा को उत्तर दिया, "पुत्र! विदुर कुशल है; उसने घोर तप का आश्रय लिया है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 17 (15.28.17)
वायुभक्षो निराहारः कृशो धमनिसंततः । कदाचिद्दृश्यते विप्रैः शून्येऽस्मिन्कानने क्वचित् ॥
vāyubhakṣo nirāhāraḥ kṛśo dhamanisaṃtataḥ | kadāciddṛśyate vipraiḥ śūnye'sminkānane kvacit
वह वायु पर जीता है, निराहार है, कृश है और उसकी नसें दिखाई देती हैं; इस सूने वन में कहीं कभी ब्राह्मणों को वह दिखाई दे जाता है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (15.28.18)
इत्येवं ब्रुवतस्तस्य जटी वीटामुखः कृशः । दिग्वासा मलदिग्धाङ्गो वनरेणुसमुक्षितः ॥
ityevaṃ bruvatastasya jaṭī vīṭāmukhaḥ kṛśaḥ | digvāsā maladigdhāṅgo vanareṇusamukṣitaḥ
वह यह कह ही रहा था कि जटाधारी, मुँह में कंकड़ रखे, कृश, दिगम्बर, मैल से लिपे अंगों वाला और वन की धूल से ढका हुआ विदुर दिखाई दिया।
श्लोक 19 (15.28.19)
दूरादालक्षितः क्षत्ता तत्राख्यातो महीपतेः । विदुरस्त्वेष धर्मात्मा जनं दृष्ट्वा निवर्तते ॥
dūrādālakṣitaḥ kṣattā tatrākhyāto mahīpateḥ | vidurastveṣa dharmātmā janaṃ dṛṣṭvā nivartate
क्षत्ता (विदुर) दूर से दिखाई दिए और वहाँ राजा को बताए गए: "यह धर्मात्मा विदुर है; लोगों को देखकर लौट रहा है।"
श्लोक 20 (15.28.20)
निवर्तमानं सहसा जनं दृष्ट्वाऽऽश्रमं प्रति । तमन्वधावन्नृपतिरेक एव युधिष्ठिरः । प्रविशन्तं वनं घोरं लक्ष्यालक्ष्यं क्वचित्क्वचित् ॥
nivartamānaṃ sahasā janaṃ dṛṣṭvā''śramaṃ prati | tamanvadhāvannṛpatireka eva yudhiṣṭhiraḥ | praviśantaṃ vanaṃ ghoraṃ lakṣyālakṣyaṃ kvacitkvacit
आश्रम की ओर आते हुए लोगों को देखकर उन्हें सहसा लौटते देख राजा युधिष्ठिर अकेले ही उनके पीछे दौड़े, जब वे उस भयंकर वन में प्रवेश कर रहे थे, कहीं दिखाई देते, कहीं ओझल हो जाते।
श्लोक 21 (15.28.21)
भोभो विदुर राजाऽहं दयितस्ते युधिष्ठिरः । इति ब्रुवन्नरपतिस्तं यत्नादभ्यधावत ॥
bhobho vidura rājā'haṃ dayitaste yudhiṣṭhiraḥ | iti bruvannarapatistaṃ yatnādabhyadhāvata
"अरे विदुर! मैं तुम्हारा प्रिय राजा युधिष्ठिर हूँ!" यह पुकारते हुए राजा ने यत्न से उनका पीछा किया।
श्लोक 22 (15.28.22)
ततो विविक्त एकान्ते तस्थौ बुद्धिमतां वरः । विदुरो वृक्षमाश्रित्य कञ्चित्तत्र वनान्तरे ॥
tato vivikta ekānte tasthau buddhimatāṃ varaḥ | viduro vṛkṣamāśritya kañcittatra vanāntare
तब वन के एक निर्जन, एकान्त स्थान में बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विदुर एक वृक्ष का सहारा लेकर खड़े हो गए।
श्लोक 23 (15.28.23)
तं राजा क्षीणभूयिष्ठमाकृतीमात्रसूचितम् । अभिजज्ञे महाबुद्धिं महाबुद्धिर्युधिष्ठिरः ॥
taṃ rājā kṣīṇabhūyiṣṭhamākṛtīmātrasūcitam | abhijajñe mahābuddhiṃ mahābuddhiryudhiṣṭhiraḥ
महाबुद्धि राजा युधिष्ठिर ने उन अत्यन्त क्षीण, केवल आकृति से पहचाने जाने वाले महाबुद्धि विदुर को पहचान लिया।
श्लोक 24 (15.28.24)
युधिष्ठिरोऽहमस्मीति वाक्यमुक्त्वाऽग्रतः स्थितः । विदुरस्याश्रवे राजा स च प्रत्याह संज्ञया ॥
yudhiṣṭhiro'hamasmīti vākyamuktvā'grataḥ sthitaḥ | vidurasyāśrave rājā sa ca pratyāha saṃjñayā
"मैं युधिष्ठिर हूँ" यह कहकर राजा उनके सामने, विदुर की श्रवण-सीमा में, खड़े हो गए, और विदुर ने संकेत से उत्तर दिया।
श्लोक 25 (15.28.25)
ततः सोऽनिमिषो भूत्वा राजानं तमुदैक्षत । संयोज्य विदुरस्तस्मिन्दृष्टिं दृष्ट्या समाहितः ॥
tataḥ so'nimiṣo bhūtvā rājānaṃ tamudaikṣata | saṃyojya vidurastasmindṛṣṭiṃ dṛṣṭyā samāhitaḥ
तब विदुर निर्निमेष होकर, अपनी दृष्टि उनकी दृष्टि में जोड़कर, एकाग्र मन से राजा को देखते रहे।
श्लोक 26 (15.28.26)
विवेश विदुरो धीमान्गात्रैर्गात्राणि चैव ह । प्राणान्प्राणेषु च दधदिन्द्रियाणीन्द्रियेषु च ॥
viveśa viduro dhīmāngātrairgātrāṇi caiva ha | prāṇānprāṇeṣu ca dadhadindriyāṇīndriyeṣu ca
बुद्धिमान् विदुर ने अपने अंगों से उनके अंगों में, अपने प्राणों को उनके प्राणों में और अपनी इन्द्रियों को उनकी इन्द्रियों में स्थापित करते हुए उनमें प्रवेश किया।
श्लोक 27 (15.28.27)
स योगबलमास्थाय विवेश नृपतेस्तनुम् । विदुरो धर्मराजस्य तेजसा प्रज्वलन्निव ॥
sa yogabalamāsthāya viveśa nṛpatestanum | viduro dharmarājasya tejasā prajvalanniva
योगबल का आश्रय लेकर विदुर तेज से मानो प्रज्वलित होते हुए धर्मराज राजा के शरीर में प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 28 (15.28.28)
विदुरस्य शरीरं तु तथैव स्तब्धलोचनम् । वृक्षाश्रितं तदा राजा ददर्श गतचेतनम् ॥
vidurasya śarīraṃ tu tathaiva stabdhalocanam | vṛkṣāśritaṃ tadā rājā dadarśa gatacetanam
पर राजा ने विदुर का अपना शरीर वृक्ष के सहारे वैसा ही टिका देखा, उसकी आँखें स्थिर थीं और उसमें चेतना नहीं थी।
श्लोक 29 (15.28.29)
बलवन्तं तथाऽऽत्मानं मेने बहुगुणं तदा । धर्मराजो महातेजास्तच्च सस्मार पाण्डवः ॥
balavantaṃ tathā''tmānaṃ mene bahuguṇaṃ tadā | dharmarājo mahātejāstacca sasmāra pāṇḍavaḥ
उस समय उन्होंने अपने को बलवान् और बहुत गुणों से युक्त माना; और महातेजस्वी पाण्डव धर्मराज को वह स्मरण हो आया —
श्लोक 30 (15.28.30)
पौराणमात्मनः सर्वं भविष्यं च विशाम्पते । योगधर्मं महातेजा व्यासेन कथितं यथा ॥
paurāṇamātmanaḥ sarvaṃ bhaviṣyaṃ ca viśāmpate | yogadharmaṃ mahātejā vyāsena kathitaṃ yathā
अपना सब पूर्वजन्म का वृत्तान्त और भविष्य, हे राजन्! तथा व्यास द्वारा बताया हुआ योगधर्म।
श्लोक 31 (15.28.31)
धर्मराजश्च तत्रैनं सञ्चस्कारयिषुस्तदा । दग्धुकामोऽभवद्विद्वानथ वागभ्यभाषत ॥
dharmarājaśca tatrainaṃ sañcaskārayiṣustadā | dagdhukāmo'bhavadvidvānatha vāgabhyabhāṣata
तब धर्मराज उनका अन्त्य-संस्कार कराना चाहते हुए उस शरीर को जलाने को उद्यत हुए, तभी एक वाणी बोली।
वागुवाच
श्लोक 32 (15.28.32)
भोभो राजन्न दग्धव्यमेतद्विदुरसंज्ञकम् । कलेबरमिहैवं ते धर्म एष सनातनः ॥
bhobho rājanna dagdhavyametadvidurasaṃjñakam | kalebaramihaivaṃ te dharma eṣa sanātanaḥ
"अरे राजन्! विदुर नामक यह शरीर जलाने योग्य नहीं है; इसे यहीं ऐसा ही रहने दो, यही सनातन धर्म है।
श्लोक 33 (15.28.33)
लोको वैकर्तनो नाम भविष्यत्यस्य भारत । यतिधर्ममवाप्तोसौ नैष शोच्यः परंतप ॥
loko vaikartano nāma bhaviṣyatyasya bhārata | yatidharmamavāptosau naiṣa śocyaḥ paraṃtapa
हे भारत! इसे वैकर्तन नामक लोक प्राप्त होगा; यह यतिधर्म को पा चुका है, इसलिए हे परंतप! यह शोक के योग्य नहीं है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 34 (15.28.34)
इत्युक्तो धर्मराजः स विनिवृत्य ततः पुनः । राज्ञो वैचित्रवीर्यस्य तत्सर्वं प्रत्यवेदयत् ॥
ityukto dharmarājaḥ sa vinivṛtya tataḥ punaḥ | rājño vaicitravīryasya tatsarvaṃ pratyavedayat
ऐसा कहे जाने पर धर्मराज वहाँ से लौटे और विचित्रवीर्य के पुत्र राजा को वह सब निवेदन किया।
श्लोक 35 (15.28.35)
ततः स राजा धृतिमान्स च सर्वो जनस्तदा । भीमसेनादयश्चैव परं विस्मियमागताः ॥
tataḥ sa rājā dhṛtimānsa ca sarvo janastadā | bhīmasenādayaścaiva paraṃ vismiyamāgatāḥ
तब धैर्यवान् राजा, सब लोग और भीमसेन आदि अत्यन्त विस्मय को प्राप्त हुए।
श्लोक 36 (15.28.36)
तच्छ्रुत्वा प्रीतिमान्राजा भूत्वा धर्मजमब्रवीत् । आपो मूलं फलं चैव ममेदं प्रतिगृह्यताम् ॥
tacchrutvā prītimānrājā bhūtvā dharmajamabravīt | āpo mūlaṃ phalaṃ caiva mamedaṃ pratigṛhyatām
यह सुनकर राजा प्रसन्न हुए और धर्मपुत्र से बोले, "मेरे ये जल, मूल और फल स्वीकार करो।
श्लोक 37 (15.28.37)
यदन्नो हि नरो राजंस्तदन्नोऽस्यातिथिः स्मृतः । इत्युक्तः स तथेत्येवं प्राह धर्मात्मजो नृपम् ॥
yadanno hi naro rājaṃstadanno'syātithiḥ smṛtaḥ | ityuktaḥ sa tathetyevaṃ prāha dharmātmajo nṛpam
हे राजन्! मनुष्य जो अन्न खाता है, उसका अतिथि भी वही अन्न खाने वाला कहा गया है।" ऐसा कहे जाने पर धर्मपुत्र ने राजा से "ऐसा ही हो" कहा।
श्लोक 38 (15.28.38)
फलं मूलं च बुभुजे राज्ञा दत्तं सहानुजः । ततस्ते वृक्षमूलेषु कृतवासपरिग्रहाः । तां रात्रिमवसन्सर्वे फलमूलजलाशनाः ॥
phalaṃ mūlaṃ ca bubhuje rājñā dattaṃ sahānujaḥ | tataste vṛkṣamūleṣu kṛtavāsaparigrahāḥ | tāṃ rātrimavasansarve phalamūlajalāśanāḥ
उन्होंने भाइयों सहित राजा के दिए फल और मूल खाए। फिर सब वृक्षों के नीचे ठहरकर फल, मूल और जल का आहार करते हुए वह रात बिताई।