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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 1

गङ्गा-तट पर धृतराष्ट्र का युधिष्ठिर को सान्त्वना देना

गङ्गा में मृतकों को जलदान करने के बाद युधिष्ठिर बाहर आकर शोक से तट पर गिर पड़ते हैं; भीम उन्हें थाम लेते हैं और पाण्डव उनके पास बैठ जाते हैं। धृतराष्ट्र उनसे उठने और क्षत्रिय-धर्म से जीती हुई पृथ्वी का भोग करने को कहते हैं, और मानते हैं कि शोक तो उन्हें और गान्धारी को करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने दुर्योधन के विषय में विदुर की चेतावनियाँ अनसुनी कर दीं।

अध्याय-सूचीअध्याय 2

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.1.1)

कृतोदकस्तु राजानं धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः । पुरस्कृत्य महाबाहुरुत्तताराकुलेन्द्रियः ॥

kṛtodakastu rājānaṃ dhṛtarāṣṭraṃ yudhiṣṭhiraḥ | puraskṛtya mahābāhuruttatārākulendriyaḥ

जलदान कर चुकने पर महाबाहु युधिष्ठिर राजा धृतराष्ट्र को आगे करके, व्याकुल इन्द्रियों के साथ गङ्गा से बाहर निकले।

श्लोक 2 (14.1.2)

उत्तीर्य तु महाबाहुर्बाष्पव्याकुललोचनः । पपात तीरे गङ्गाया व्याधविद्ध इव द्विपः ॥

uttīrya tu mahābāhurbāṣpavyākulalocanaḥ | papāta tīre gaṅgāyā vyādhaviddha iva dvipaḥ

बाहर आकर महाबाहु राजा, जिनकी आँखें आँसुओं से धुँधली हो गई थीं, गङ्गा के तट पर ऐसे गिर पड़े जैसे व्याध के बाण से बिंधा हुआ हाथी गिर पड़ता है।

श्लोक 3 (14.1.3)

तं सीदमानं जग्राह भीमः कृष्णेन चोदितः । मैवमित्यब्रवीच्चैनं कृष्णः परबलार्दनः ॥

taṃ sīdamānaṃ jagrāha bhīmaḥ kṛṣṇena coditaḥ | maivamityabravīccainaṃ kṛṣṇaḥ parabalārdanaḥ

जब वे विषाद में डूबने लगे तो कृष्ण की प्रेरणा से भीम ने उन्हें थाम लिया; और शत्रुसेना का संहार करने वाले कृष्ण ने उनसे कहा, "ऐसा नहीं।"

श्लोक 4 (14.1.4)

तमार्तं पतितं भूमौ श्वसन्तं च पुनः पुनः । ददृशुः पार्थिवा राजन्धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥

tamārtaṃ patitaṃ bhūmau śvasantaṃ ca punaḥ punaḥ | dadṛśuḥ pārthivā rājandharmaputraṃ yudhiṣṭhiram

हे राजन्, वहाँ के राजाओं ने धर्मपुत्र युधिष्ठिर को पीड़ित होकर भूमि पर पड़े और बार-बार लम्बी साँसें लेते देखा।

श्लोक 5 (14.1.5)

तं दृष्ट्वा दीनमनसं गतसत्वं नरेश्वरम् । भूयः शोकसमाविष्टाः पाण्डवाः समुपाविशन् ॥

taṃ dṛṣṭvā dīnamanasaṃ gatasatvaṃ nareśvaram | bhūyaḥ śokasamāviṣṭāḥ pāṇḍavāḥ samupāviśan

नरेश्वर को दीनचित्त और बलहीन देखकर पाण्डव फिर शोक से भर उठे और उनके पास बैठ गए।

श्लोक 6 (14.1.6)

राजा तु धृतराष्ट्रस्तं तथा दीनो महाभुजम् । वाक्यमाह महाबुद्धिः प्रज्ञाचक्षुर्नरेश्वरम् ॥

rājā tu dhṛtarāṣṭrastaṃ tathā dīno mahābhujam | vākyamāha mahābuddhiḥ prajñācakṣurnareśvaram

तब प्रज्ञा ही जिनकी आँख थी, उन महाबुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्र ने स्वयं दीन होते हुए भी उन महाबाहु नरेश्वर से यह बात कही।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 7 (14.1.7)

उत्तिष्ठ कुरुशार्दूल कुरु कार्यमनन्तरम् । क्षत्रधर्मेण कौन्तेय जितेयमवनी त्वया ॥

uttiṣṭha kuruśārdūla kuru kāryamanantaram | kṣatradharmeṇa kaunteya jiteyamavanī tvayā

उठो, कुरुश्रेष्ठ, और अब जो करना उचित है वह करो। हे कुन्तीपुत्र, क्षत्रिय-धर्म के अनुसार यह पृथ्वी तुमने जीत ली है।

श्लोक 8 (14.1.8)

भुङ्क्ष्व सार्धं भ्रातृभिस्तां सुहृद्भिश्च जनेश्वर । शोचितव्यं न पश्यामि त्वया धर्मभृतां वर ॥

bhuṅkṣva sārdhaṃ bhrātṛbhistāṃ suhṛdbhiśca janeśvara | śocitavyaṃ na paśyāmi tvayā dharmabhṛtāṃ vara

अपने भाइयों और मित्रों के साथ इसका भोग करो, हे नरेश्वर। हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, मुझे तुम्हारे शोक करने का कोई कारण नहीं दिखता।

श्लोक 9 (14.1.9)

शोचितव्यं मया चैव गान्धार्या च महीपते । ययोः पुत्रशतं नष्टं स्वप्नलब्धं यथा धनम् ॥

śocitavyaṃ mayā caiva gāndhāryā ca mahīpate | yayoḥ putraśataṃ naṣṭaṃ svapnalabdhaṃ yathā dhanam

शोक तो मुझे और गान्धारी को करना चाहिए, हे पृथ्वीपते, जिनके सौ पुत्र स्वप्न में मिले धन की तरह नष्ट हो गए।

श्लोक 10 (14.1.10)

अश्रुत्वा हितकामस्य विदुरस्य महात्मनः । वाक्यानि सुमहार्थानि परितप्यामि दुर्मतिः ॥

aśrutvā hitakāmasya vidurasya mahātmanaḥ | vākyāni sumahārthāni paritapyāmi durmatiḥ

मैं दुर्बुद्धि हूँ; हित चाहने वाले महात्मा विदुर के गम्भीर अर्थ वाले वचनों को मैंने नहीं सुना, और अब पछतावे से जल रहा हूँ।

श्लोक 11 (14.1.11)

उक्तवान्विदुरो यन्मां धर्मात्मा दिव्यदर्शनः । दुर्योधनापराधेन कुलं ते विनशिष्यति ॥

uktavānviduro yanmāṃ dharmātmā divyadarśanaḥ | duryodhanāparādhena kulaṃ te vinaśiṣyati

धर्मात्मा और दिव्यदृष्टि विदुर ने मुझसे कहा था, "दुर्योधन के अपराध से तुम्हारा कुल नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 12 (14.1.12)

स्वस्ति चेदिच्छसे राजन्कुलस्य कुरु मे वचः । वध्यतामेष दुष्टात्मा मन्दो राजा सुयोधनः ॥

svasti cedicchase rājankulasya kuru me vacaḥ | vadhyatāmeṣa duṣṭātmā mando rājā suyodhanaḥ

हे राजन्, यदि तुम कुल का कल्याण चाहते हो तो मेरी बात मानो — इस दुष्टात्मा और मूढ़ राजा सुयोधन का वध कर दिया जाए।

श्लोक 13 (14.1.13)

कर्णश्च शकुनिश्चैव नैनं पश्यतु कर्हिचित् । द्यूतसङ्घातमप्येषामप्रमादेन वारय ॥

karṇaśca śakuniścaiva nainaṃ paśyatu karhicit | dyūtasaṅghātamapyeṣāmapramādena vāraya

कर्ण और शकुनि कभी उसे न देखें, और सावधान रहकर उनके द्यूत के जमावड़ों को भी रोक दो।

श्लोक 14 (14.1.14)

अभिषेचय राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । स पालयिष्यति वशी धर्मेण पृथिवीमिमाम् ॥

abhiṣecaya rājānaṃ dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram | sa pālayiṣyati vaśī dharmeṇa pṛthivīmimām

धर्मात्मा युधिष्ठिर को राजा के पद पर अभिषिक्त करो; वह जितेन्द्रिय होकर धर्म से इस पृथ्वी का पालन करेगा।

श्लोक 15 (14.1.15)

अथ नेच्छसि राजानं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । विनाशमुपयास्यन्ति तव पुत्रा न संशयः । मेढीभूतः स्वयं राज्यं प्रतिगृह्णीष्व पार्थिव ॥

atha necchasi rājānaṃ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | vināśamupayāsyanti tava putrā na saṃśayaḥ | meḍhībhūtaḥ svayaṃ rājyaṃ pratigṛhṇīṣva pārthiva

और यदि तुम कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को राजा बनाना नहीं चाहते, तो तुम्हारे पुत्र निश्चय ही विनाश को प्राप्त होंगे; इसलिए हे राजन्, सबके आधार-स्तम्भ बनकर स्वयं राज्य को अपने हाथ में ले लो।

श्लोक 16 (14.1.16)

समं सर्वेषु भूतेषु वर्तमानं नराधिप । अनुजीवन्तु सर्वे त्वां ज्ञातयो ज्ञातिवर्धन ॥

samaṃ sarveṣu bhūteṣu vartamānaṃ narādhipa | anujīvantu sarve tvāṃ jñātayo jñātivardhana

सब प्राणियों के प्रति समान व्यवहार करने वाले आपके आश्रय से सभी स्वजन जीवन चलाएँ, हे बन्धुओं को बढ़ाने वाले।"

श्लोक 17 (14.1.17)

एवं ब्रुवति कौन्तेय विदुरे दीर्घदर्शिनि । दुर्योधनमहं पापमन्ववर्तं वृथामतिः ॥

evaṃ bruvati kaunteya vidure dīrghadarśini | duryodhanamahaṃ pāpamanvavartaṃ vṛthāmatiḥ

हे कुन्तीपुत्र, जब दूरदर्शी विदुर इस प्रकार कह रहे थे, तब मैं मूढ़बुद्धि पापी दुर्योधन का ही अनुसरण करता रहा।

श्लोक 18 (14.1.18)

अश्रुत्वा तस्य धीरस्य वाक्यानि मधुराण्यहम् । फलं प्राप्य महद्दुःखं निमग्नः शोकसागरे ॥

aśrutvā tasya dhīrasya vākyāni madhurāṇyaham | phalaṃ prāpya mahadduḥkhaṃ nimagnaḥ śokasāgare

उस धीर पुरुष की मधुर बातों को न सुनने के कारण मैंने उसका फल पाया है — महान् दुःख — और मैं शोक के सागर में डूब गया हूँ।

श्लोक 19 (14.1.19)

वृद्धौ हि तेऽद्य पितरौ पश्य नौ दुःखितौ नृप । न शोचितव्यं भवता पश्यामीह जनाधिप ॥

vṛddhau hi te'dya pitarau paśya nau duḥkhitau nṛpa | na śocitavyaṃ bhavatā paśyāmīha janādhipa

हे राजन्, देखो, हम तुम्हारे दोनों वृद्ध माता-पिता दुःख में हैं; फिर भी हे जनाधिप, मुझे तुम्हारे शोक करने का कोई कारण नहीं दिखता।

अध्याय-सूचीअध्याय 2