आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 2
कृष्ण और व्यास का युधिष्ठिर को कर्म के लिए प्रेरित करना
धृतराष्ट्र के आश्वासन पर भी युधिष्ठिर चुप रहते हैं; तब कृष्ण कहते हैं कि अत्यधिक शोक से दिवंगत पूर्वज ही सन्तप्त होते हैं, और यज्ञ करने को कहते हैं। युधिष्ठिर उत्तर देते हैं कि वे वन जाना चाहते हैं और ऐसा कर्म पूछते हैं जिससे भीष्म और कर्ण के वध से उनका मन शुद्ध हो जाए। व्यास उन्हें कोमलता से डाँटते हैं कि क्षत्रिय-धर्म और मोक्ष-धर्म जानने वाले होकर भी वे अज्ञानी की तरह फिर क्यों मोहित हो रहे हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.2.1)
एवमुक्तस्तु राजाऽसौ धृतराष्ट्रेण धीमता । तूष्णींबभूव मेधावी तमुवाचाथ केशवः ॥
evamuktastu rājā'sau dhṛtarāṣṭreṇa dhīmatā | tūṣṇīṃbabhūva medhāvī tamuvācātha keśavaḥ
बुद्धिमान् धृतराष्ट्र के इस प्रकार कहने पर मेधावी राजा युधिष्ठिर चुप रह गए; तब केशव ने उनसे कहा।
वासुदेव उवाच
श्लोक 2 (14.2.2)
अतीव मनसा शोकः क्रियमाणो जनाधिप । सन्तापयति चैतस्य पूर्वप्रेतान्पितामहान् ॥
atīva manasā śokaḥ kriyamāṇo janādhipa | santāpayati caitasya pūrvapretānpitāmahān
हे जनाधिप, मन में अत्यधिक किया गया शोक शोक करने वाले के पहले परलोक सिधार चुके पितामह-पूर्वजों को सन्ताप देता है।
श्लोक 3 (14.2.3)
यजस्व विविधैर्यज्ञैर्बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः । देवांस्तर्पय सोमेन स्वधया च पितॄनपि ॥
yajasva vividhairyajñairbahubhiḥ svāptadakṣiṇaiḥ | devāṃstarpaya somena svadhayā ca pitṝnapi
अनेक प्रकार के, भरपूर दक्षिणा वाले यज्ञों से यजन करो; देवताओं को सोम से और पितरों को भी स्वधा से तृप्त करो।
श्लोक 4 (14.2.4)
अतिथीनन्नपानेन कामैरन्यैरकिञ्चनान् । त्वद्विधस्य महाबुद्धे नैतदद्योपपद्यते । विदितं वेदितव्यं ते कर्तव्यमपि ते कृतम् ॥
atithīnannapānena kāmairanyairakiñcanān | tvadvidhasya mahābuddhe naitadadyopapadyate | viditaṃ veditavyaṃ te kartavyamapi te kṛtam
अतिथियों को अन्न-जल से और निर्धनों को उनकी इच्छित अन्य वस्तुओं से तृप्त करो। हे महाबुद्धिमान्, तुम जैसे पुरुष को अब यह शोक शोभा नहीं देता; जो जानने योग्य है वह तुम जान चुके हो, और जो करने योग्य था वह तुमने कर लिया है।
श्लोक 5 (14.2.5)
श्रुताश्च राजधर्मास्ते भीष्माद्भागीरथीसुतात् । कृष्णद्वैपायनाच्चैव नारदाद्विदुरात्तथा ॥
śrutāśca rājadharmāste bhīṣmādbhāgīrathīsutāt | kṛṣṇadvaipāyanāccaiva nāradādvidurāttathā
राजधर्म तुमने गङ्गापुत्र भीष्म से, कृष्ण द्वैपायन से, नारद से और विदुर से भी सुने हैं।
श्लोक 6 (14.2.6)
नेमामर्हसि मूढानां वृत्तिं त्वमनुवर्तितुम् । पितृपैतामहं वृत्तमास्थाय धुरमुद्वह ॥
nemāmarhasi mūḍhānāṃ vṛttiṃ tvamanuvartitum | pitṛpaitāmahaṃ vṛttamāsthāya dhuramudvaha
मूढ़ जनों के इस आचरण का तुम्हें अनुसरण नहीं करना चाहिए; पिता-पितामहों के आचार का आश्रय लेकर राज्य का भार वहन करो।
श्लोक 7 (14.2.7)
युक्तं हि यशसा क्षात्रं स्वर्गं प्राप्तुमसंशयम् । नहि कश्चिद्धि शूराणां निहतोऽत्र पराङ्मुखः ॥
yuktaṃ hi yaśasā kṣātraṃ svargaṃ prāptumasaṃśayam | nahi kaściddhi śūrāṇāṃ nihato'tra parāṅmukhaḥ
क्षत्रिय का यश के द्वारा निःसन्देह स्वर्ग पाना उचित ही है; यहाँ मारे गए शूरवीरों में कोई भी पीठ फेरकर नहीं मारा गया।
श्लोक 8 (14.2.8)
त्यज शोकं महाराज भवितव्यं हि तत्तथा । न शक्यास्ते पुनर्द्रष्टुं त्वया येऽस्मिन्रणे हताः ॥
tyaja śokaṃ mahārāja bhavitavyaṃ hi tattathā | na śakyāste punardraṣṭuṃ tvayā ye'sminraṇe hatāḥ
हे महाराज, शोक त्याग दो; जो हुआ वैसा होना ही था। इस युद्ध में जो मारे गए हैं, उन्हें तुम फिर नहीं देख सकते।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (14.2.9)
एतावदुक्त्वा गोविन्दो धर्मराजं युधिष्ठिरम् । विरराम महातेजास्तमुवाच युधिष्ठिरः ॥
etāvaduktvā govindo dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | virarāma mahātejāstamuvāca yudhiṣṭhiraḥ
धर्मराज युधिष्ठिर से इतना कहकर महातेजस्वी गोविन्द चुप हो गए; तब युधिष्ठिर ने उनसे कहा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 10 (14.2.10)
गोविन्द मयि या प्रीतिस्तव सा विदिता मम । सौहृदेन तथा प्रेम्णा सदा मय्यनुकम्पसे ॥
govinda mayi yā prītistava sā viditā mama | sauhṛdena tathā premṇā sadā mayyanukampase
गोविन्द, मुझ पर आपका जो स्नेह है वह मैं जानता हूँ; मित्रभाव और प्रेम से आप सदा मुझ पर कृपा करते हैं।
श्लोक 11 (14.2.11)
प्रियं तु मे स्यात्सुमहत्कृतं चक्रगदाधर । श्रीमन्प्रीतेन मनसा सर्वं यादवनन्दन ॥
priyaṃ tu me syātsumahatkṛtaṃ cakragadādhara | śrīmanprītena manasā sarvaṃ yādavanandana
हे चक्र-गदाधारी, हे श्रीमान् यादवनन्दन, यदि आप प्रसन्न मन से मेरा सब कुछ पूरा कर दें तो यह मेरे ऊपर बहुत बड़ा उपकार होगा —
श्लोक 12 (14.2.12)
यदि मामनुजानीयाद्भवान्गन्तुं तपोवनम् । कृतकृत्यो भविष्यामि इति मे निश्चिता मतिः ॥
yadi māmanujānīyādbhavāngantuṃ tapovanam | kṛtakṛtyo bhaviṣyāmi iti me niścitā matiḥ
यदि आप मुझे तपोवन जाने की अनुमति दे दें, तो मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा — ऐसा मेरा निश्चित विचार है।
श्लोक 13 (14.2.13)
न हि शान्तिं प्रपश्यामि पातयित्वा पितामहम् । नृशंसः पुरुषव्याघ्रं गुरुं वीर्यबलान्वितम् । कर्णं च पुरुषव्याघ्रं सङ्ग्रामेष्वपलायिनम् ॥
na hi śāntiṃ prapaśyāmi pātayitvā pitāmaham | nṛśaṃsaḥ puruṣavyāghraṃ guruṃ vīryabalānvitam | karṇaṃ ca puruṣavyāghraṃ saṅgrāmeṣvapalāyinam
पितामह को गिराकर मुझे शान्ति नहीं दिखाई देती; क्रूर होकर मैंने उन पुरुषव्याघ्र, पराक्रम और बल से सम्पन्न गुरुजन को भी गिराया, और संग्राम में कभी पीछे न हटने वाले पुरुषव्याघ्र कर्ण को भी।
श्लोक 14 (14.2.14)
कर्मणा येन मुच्येयमस्मात्क्रूरादरिंदम । कर्मणा तद्विधत्स्वेह येन शुध्यति मे मनः ॥
karmaṇā yena mucyeyamasmātkrūrādariṃdama | karmaṇā tadvidhatsveha yena śudhyati me manaḥ
हे शत्रुदमन, जिस कर्म से मैं इस क्रूर कृत्य से मुक्त हो सकूँ, वही कर्म यहाँ विधान कीजिए, जिससे मेरा मन शुद्ध हो जाए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (14.2.15)
तमेवंवादिनं पार्थं व्यासः प्रोवाच धर्मवित् । सान्त्वयन्सुमहातेजाः शुभं वचनमर्थवत् ॥
tamevaṃvādinaṃ pārthaṃ vyāsaḥ provāca dharmavit | sāntvayansumahātejāḥ śubhaṃ vacanamarthavat
इस प्रकार कहते हुए पार्थ को सान्त्वना देते हुए धर्मज्ञ महातेजस्वी व्यास ने कल्याणकारी और अर्थपूर्ण वचन कहे।
व्यास उवाच
श्लोक 16 (14.2.16)
सुकृता ते मतिस्तात पुनर्बाल्येन मुह्यसे । किमाकाशे वयं सर्वे प्रलपामो मुहुर्मुहुः ॥
sukṛtā te matistāta punarbālyena muhyase | kimākāśe vayaṃ sarve pralapāmo muhurmuhuḥ
तात, तुम्हारी बुद्धि तो सुघड़ है, फिर भी तुम बचपने से बार-बार मोहित हो जाते हो। हम सब आकाश में व्यर्थ बार-बार क्यों बकते जा रहे हैं?
श्लोक 17 (14.2.17)
विदिताः क्षत्रधर्मास्ते येषां युद्धेन जीविका । तथा प्रवृत्तो नृपतिर्नाधिबन्धेन युज्यसे ॥
viditāḥ kṣatradharmāste yeṣāṃ yuddhena jīvikā | tathā pravṛtto nṛpatirnādhibandhena yujyase
जिनकी आजीविका युद्ध है, उन क्षत्रियों के धर्म तुम जानते हो; इस प्रकार कर्म में प्रवृत्त होकर तुम, एक राजा, किसी पाप के बन्धन में नहीं पड़ते।
श्लोक 18 (14.2.18)
मोक्षधर्माश्च निखिला याथातथ्येन ते श्रुताः । यथा वै कामजां मायां परित्यक्तुं त्वमर्हसि ॥
mokṣadharmāśca nikhilā yāthātathyena te śrutāḥ | yathā vai kāmajāṃ māyāṃ parityaktuṃ tvamarhasi
मोक्ष-धर्म तुमने सम्पूर्ण और यथार्थ रूप में सुने हैं; इसलिए तुम्हें कामना से उत्पन्न माया को त्याग देना चाहिए।
श्लोक 19 (14.2.19)
असकृच्चापि सन्देहाश्छिन्नास्ते कामजा मया । अश्रद्दधानो दुर्मेधा लुप्तस्मृतिरसि ध्रुवम् ॥
asakṛccāpi sandehāśchinnāste kāmajā mayā | aśraddadhāno durmedhā luptasmṛtirasi dhruvam
मैंने बार-बार तुम्हारे कामना से उत्पन्न सन्देहों को काटा है। फिर भी तुम निश्चय ही श्रद्धाहीन, मन्दबुद्धि और स्मृति खो बैठे हुए हो।
श्लोक 20 (14.2.20)
मैवं भव न ते युक्तमिदमज्ञानमीदृशम् ॥
maivaṃ bhava na te yuktamidamajñānamīdṛśam
ऐसे मत बनो; तुम्हारे लिए ऐसा अज्ञान उचित नहीं।
श्लोक 21 (14.2.21)
प्रायश्चित्तानि सर्वाणि विदितानि च तेऽनघ । राजधर्माश्च ते सर्वे दानधर्माश्च ते श्रुताः ॥
prāyaścittāni sarvāṇi viditāni ca te'nagha | rājadharmāśca te sarve dānadharmāśca te śrutāḥ
हे निष्पाप, सब प्रायश्चित्त तुम्हें ज्ञात हैं; राजधर्म और दानधर्म भी तुमने सुने हैं।
श्लोक 22 (14.2.22)
स कथं सर्वधर्मज्ञः सर्वागमविशारदः । परिमुह्यसि भूयस्त्वमज्ञानादिव भारत ॥
sa kathaṃ sarvadharmajñaḥ sarvāgamaviśāradaḥ | parimuhyasi bhūyastvamajñānādiva bhārata
तब सब धर्मों को जानने वाले और सब शास्त्रों में निपुण होकर भी, हे भारत, तुम अज्ञान से ही मानो फिर मोह में क्यों पड़ जाते हो?