आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 3
व्यास द्वारा अश्वमेध यज्ञ का विधान
व्यास युधिष्ठिर से कहते हैं कि कोई मनुष्य पूरी तरह अपनी इच्छा से कर्म नहीं करता, और तप, यज्ञ तथा दान से पाप धुल जाते हैं; वे उन्हें अश्वमेध करने को कहते हैं। युधिष्ठिर आपत्ति करते हैं कि युद्ध के बाद उनके पास धन नहीं रहा और वे शोकग्रस्त राजाओं के पुत्रों पर कर नहीं लगाना चाहते। व्यास उत्तर देते हैं कि राजा मरुत्त के यज्ञ में ब्राह्मणों द्वारा छोड़ा गया धन हिमालय में पड़ा है और लाया जा सकता है, और उस राजा के विषय में युधिष्ठिर के प्रश्न का उत्तर आरम्भ करते हैं।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (14.3.1)
युधिष्ठिर तव प्रज्ञा न सम्यगिति मे मतिः । न हि कश्चित्स्वयं मर्त्यः स्ववशः कुरुते क्रियाम् ॥
yudhiṣṭhira tava prajñā na samyagiti me matiḥ | na hi kaścitsvayaṃ martyaḥ svavaśaḥ kurute kriyām
युधिष्ठिर, मेरी समझ में तुम्हारी बुद्धि ठीक नहीं है; क्योंकि कोई भी मनुष्य अपने ही वश में रहकर केवल अपनी इच्छा से कर्म नहीं करता।
श्लोक 2 (14.3.2)
ईश्वरेण च युक्तोऽयं साध्वसाधु च मानवः । करोत्यसुकरं कर्म तत्र का परिदेवना ॥
īśvareṇa ca yukto'yaṃ sādhvasādhu ca mānavaḥ | karotyasukaraṃ karma tatra kā paridevanā
ईश्वर से प्रेरित यह मनुष्य भले और बुरे दोनों प्रकार के कर्म करता है, यहाँ तक कि कठिन कर्म भी कर लेता है; फिर इसमें विलाप का क्या कारण?
श्लोक 3 (14.3.3)
आत्मानं मन्यसे चाथ पापकर्माणमन्ततः । शृणु तत्र यथा पापमपकृत्येत भारत ॥
ātmānaṃ manyase cātha pāpakarmāṇamantataḥ | śṛṇu tatra yathā pāpamapakṛtyeta bhārata
और यदि तुम अपने को अन्ततः पापकर्म करने वाला मानते हो, तो हे भारत, सुनो कि पाप किस प्रकार दूर किया जाता है।
श्लोक 4 (14.3.4)
तपोभिः क्रतुभिश्चैव दानेन च युधिष्ठिर । तरन्ति नित्यं पुरुषा ये स्म पापानि कुर्वते ॥
tapobhiḥ kratubhiścaiva dānena ca yudhiṣṭhira | taranti nityaṃ puruṣā ye sma pāpāni kurvate
तप, यज्ञ और दान के द्वारा, युधिष्ठिर, पाप करने वाले पुरुष उस पाप को सदा पार कर जाते हैं।
श्लोक 5 (14.3.5)
यज्ञेन तपसा चैव दानेन च नराधिप । पूयन्ते नरशार्दूल नरा दुष्कृतकारिणः ॥
yajñena tapasā caiva dānena ca narādhipa | pūyante naraśārdūla narā duṣkṛtakāriṇaḥ
यज्ञ, तप और दान से, हे नरेश्वर, हे नरश्रेष्ठ, दुष्कर्म करने वाले मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं।
श्लोक 6 (14.3.6)
असुराश्च सुराश्चैव पुण्यहेतोर्मखक्रियाम् । प्रवर्तन्ते महात्मानस्तस्माद्यज्ञः परायणम् ॥
asurāśca surāścaiva puṇyahetormakhakriyām | pravartante mahātmānastasmādyajñaḥ parāyaṇam
असुर और देवता दोनों ही महात्मा पुण्य के लिए यज्ञ-कर्म में लगते हैं; इसलिए यज्ञ ही परम आश्रय है।
श्लोक 7 (14.3.7)
यज्ञैरेव महात्मानो बभूवुरधिकाः सुराः । ततो देवाः क्रियावन्तो दानवानभ्यधर्षयन् ॥
yajñaireva mahātmāno babhūvuradhikāḥ surāḥ | tato devāḥ kriyāvanto dānavānabhyadharṣayan
यज्ञों से ही महात्मा देवता श्रेष्ठ हुए; फिर कर्मनिष्ठ देवों ने दानवों को परास्त किया।
श्लोक 8 (14.3.8)
राजसूयाश्वमेधौ च सर्वमेधं च भारत । नरमेधं च नृपते त्वमाहर युधिष्ठिर ॥
rājasūyāśvamedhau ca sarvamedhaṃ ca bhārata | naramedhaṃ ca nṛpate tvamāhara yudhiṣṭhira
हे भारत, राजसूय और अश्वमेध, सर्वमेध और नरमेध भी — हे राजन् युधिष्ठिर, तुम इनका अनुष्ठान करो।
श्लोक 9 (14.3.9)
यजस्व वाजिमेधेन विधिवद्दक्षिणावता । बहुकामान्नवित्तेन रामो दाशरथिर्यथा ॥
yajasva vājimedhena vidhivaddakṣiṇāvatā | bahukāmānnavittena rāmo dāśarathiryathā
विधि के अनुसार, भरपूर दक्षिणा के साथ तथा अनेक काम्य वस्तुओं, अन्न और धन से सम्पन्न अश्वमेध द्वारा यजन करो, जैसे दशरथपुत्र राम ने किया था।
श्लोक 10 (14.3.10)
यथा च भरतो राजा दौष्यन्तिः पृथिवीपतिः । शाकुन्तलो महावीर्यस्तव पूर्वपितामहः ॥
yathā ca bharato rājā dauṣyantiḥ pṛthivīpatiḥ | śākuntalo mahāvīryastava pūrvapitāmahaḥ
और जैसे दुष्यन्त के पुत्र राजा भरत ने किया, जो शकुन्तला के पुत्र, महापराक्रमी और तुम्हारे पूर्वपितामह थे।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 11 (14.3.11)
असंशयं वाजिमेधः पावयेत्पृथिवीमपि । अभिप्रायस्तु मे कश्चित्तं त्वं श्रोतुमिहार्हसि ॥
asaṃśayaṃ vājimedhaḥ pāvayetpṛthivīmapi | abhiprāyastu me kaścittaṃ tvaṃ śrotumihārhasi
निःसन्देह अश्वमेध पृथ्वी को भी पवित्र कर सकता है। परन्तु मेरे मन में एक चिन्ता है, उसे आप सुनें।
श्लोक 12 (14.3.12)
इमं ज्ञातिवधं कृत्वा सुमहान्तं द्विजोत्तम । अहमाराधयिष्यामि कथं शोकपरायणः । दानमल्पं न शक्नोमि दातुं वित्तं च नास्ति मे ॥
imaṃ jñātivadhaṃ kṛtvā sumahāntaṃ dvijottama | ahamārādhayiṣyāmi kathaṃ śokaparāyaṇaḥ | dānamalpaṃ na śaknomi dātuṃ vittaṃ ca nāsti me
हे द्विजश्रेष्ठ, अपने बन्धुओं का यह महान् संहार करके शोक में डूबा हुआ मैं यज्ञ द्वारा आराधना कैसे करूँगा? मैं थोड़ा-सा दान भी नहीं दे सकता, और मेरे पास धन भी नहीं है।
श्लोक 13 (14.3.13)
न तु बालानिमान्दीनानुत्सहे वसु याचितुम् । तथैवाद्रविणान्कृच्छ्रे वर्तमानान्नृपात्मजान् ॥
na tu bālānimāndīnānutsahe vasu yācitum | tathaivādraviṇānkṛcchre vartamānānnṛpātmajān
न ही मैं इन दीन बालकों से, और वैसे ही निर्धन तथा संकट में पड़े राजकुमारों से धन माँगना सह सकता हूँ।
श्लोक 14 (14.3.14)
स्वयं विनाश्य पृथिवीं यज्ञार्थं द्विजसत्तम । करमाहारयिष्यामि कथं शोकपरायणः ॥
svayaṃ vināśya pṛthivīṃ yajñārthaṃ dvijasattama | karamāhārayiṣyāmi kathaṃ śokaparāyaṇaḥ
हे द्विजश्रेष्ठ, स्वयं पृथ्वी का विनाश करके, शोक में डूबा हुआ मैं यज्ञ के लिए कर कैसे वसूलूँगा?
श्लोक 15 (14.3.15)
दुर्योधनापराधेन वसुधायां नराधिपाः । प्रनष्टा योजयित्वाऽस्मानकीर्त्या मुनिसत्तम ॥
duryodhanāparādhena vasudhāyāṃ narādhipāḥ | pranaṣṭā yojayitvā'smānakīrtyā munisattama
हे मुनिश्रेष्ठ, दुर्योधन के अपराध से पृथ्वी के राजा नष्ट हो गए और हमें अपकीर्ति से जोड़ गए।
श्लोक 16 (14.3.16)
दुर्योधनेन पृथिवी क्षपिता जयकारणात् । कोशश्चापि विशीर्णोसौ धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥
duryodhanena pṛthivī kṣapitā jayakāraṇāt | kośaścāpi viśīrṇosau dhārtarāṣṭrasya durmateḥ
विजय के लिए दुर्योधन ने पृथ्वी को क्षीण कर दिया, और दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र-पुत्र का वह कोश भी बिखर चुका है।
श्लोक 17 (14.3.17)
पृथिवी दक्षिणा चात्र वाजिमेधे महाक्रतौ । विद्वद्भिः परिदृष्टोऽयं शिष्टो विधिविपर्ययः ॥
pṛthivī dakṣiṇā cātra vājimedhe mahākratau | vidvadbhiḥ paridṛṣṭo'yaṃ śiṣṭo vidhiviparyayaḥ
अश्वमेध महायज्ञ में पृथ्वी ही दक्षिणा है; विद्वानों ने यही देखा है, इसके अतिरिक्त जो कुछ हो वह विधि का उलटना होगा।
श्लोक 18 (14.3.18)
न च प्रतिनिधिं कर्तुं चिकीर्षामि तपोधन । अत्र मे भगवन्सम्यक्साचिव्यं कर्तुमर्हसि ॥
na ca pratinidhiṃ kartuṃ cikīrṣāmi tapodhana | atra me bhagavansamyaksācivyaṃ kartumarhasi
और हे तपोधन, मैं कोई स्थानापन्न (प्रतिनिधि) करना नहीं चाहता। हे भगवन्, इस विषय में आप मेरी भली-भाँति सहायता करें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (14.3.19)
एवमुक्तस्तु पार्थेन कृष्णद्वैपायनस्तदा । मुहूर्तमनुसञ्चिन्त्य धर्मराजानमब्रवीत् ॥
evamuktastu pārthena kṛṣṇadvaipāyanastadā | muhūrtamanusañcintya dharmarājānamabravīt
पार्थ के इस प्रकार कहने पर कृष्ण द्वैपायन ने क्षणभर विचार किया और फिर धर्मराज से कहा।
व्यास उवाच
श्लोक 20 (14.3.20)
कोशश्चापि विशीर्णोऽयं परिपूर्णो भविष्यति । विद्यते द्रविणं पार्थ गिरौ हिमवति स्थितम् ॥
kośaścāpi viśīrṇo'yaṃ paripūrṇo bhaviṣyati | vidyate draviṇaṃ pārtha girau himavati sthitam
तुम्हारा यह बिखरा हुआ कोश भी फिर भर जाएगा। हे पार्थ, हिमालय पर्वत पर धन पड़ा हुआ है —
श्लोक 21 (14.3.21)
उत्सृष्टं ब्राह्मणैर्यज्ञे मरुत्तस्य महीपते । तदानयस्व कौन्तेय पर्याप्तं तद्भविष्यति ॥
utsṛṣṭaṃ brāhmaṇairyajñe maruttasya mahīpate | tadānayasva kaunteya paryāptaṃ tadbhaviṣyati
जो राजा मरुत्त के यज्ञ में ब्राह्मणों द्वारा छोड़ दिया गया था। हे कौन्तेय, उसे ले आओ; वह पर्याप्त होगा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 22 (14.3.22)
कथं यज्ञे मरुत्तस्य द्रविणं तत्समाचितम् । कस्मिंश्च काले स नृपो बभूव ददतां वर ॥
kathaṃ yajñe maruttasya draviṇaṃ tatsamācitam | kasmiṃśca kāle sa nṛpo babhūva dadatāṃ vara
मरुत्त के यज्ञ में वह धन कैसे एकत्र हुआ? और हे दानियों में श्रेष्ठ, वह राजा किस समय हुआ था?
व्यास उवाच
श्लोक 23 (14.3.23)
यदि शुश्रूषसे पार्थ शृणु कारंधमं नृपम् । यस्मिन्काले महावीर्यः स राजाऽऽसीन्महाधनः ॥
yadi śuśrūṣase pārtha śṛṇu kāraṃdhamaṃ nṛpam | yasminkāle mahāvīryaḥ sa rājā''sīnmahādhanaḥ
हे पार्थ, यदि सुनना चाहते हो तो राजा करन्धम के विषय में सुनो, और उस काल के विषय में भी जिसमें वह महापराक्रमी और महाधनी राजा हुआ था।