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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 4

राजा मरुत्त की वंश-परम्परा

युधिष्ठिर के अनुरोध पर व्यास मरुत्त की कथा आरम्भ करते हैं। वे मनु से प्रजाति, क्षुत और इक्ष्वाकु होते हुए खनीनेत्र तक की वंश-परम्परा बताते हैं, जिसके कुशासन से प्रजा ने उसके धर्मात्मा पुत्र का अभिषेक कर दिया; वह पुत्र निर्धनता और शत्रु पड़ोसियों से घिरकर अपनी हथेली पर फूँक मारकर सेना खड़ी करता है और इस प्रकार करन्धम कहलाता है। फिर करन्धम के पुत्र अविक्षित् और अविक्षित् के पुत्र मरुत्त का वर्णन आता है; मरुत्त हजारों स्वर्ण-पात्र बनवाकर हिमालय के उत्तरी पार्श्व में अपना यज्ञ करते हैं।

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (14.4.1)

शुश्रूषे तस्य धर्मज्ञ राजर्षेः परिकीर्तनम् । द्वैपायन मरुत्तस्य कथां प्रब्रूहि मेऽनघ ॥

śuśrūṣe tasya dharmajña rājarṣeḥ parikīrtanam | dvaipāyana maruttasya kathāṃ prabrūhi me'nagha

हे धर्मज्ञ, मैं उन राजर्षि का वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ। हे निष्पाप द्वैपायन, मुझे मरुत्त की कथा सुनाइए।

व्यास उवाच

श्लोक 2 (14.4.2)

आसीत्कृतयुगे तात मनुर्दण्डिधरः प्रभुः । तस्य पुत्रो महेष्वासः प्रजातिरभवन्नृपः ॥

āsītkṛtayuge tāta manurdaṇḍidharaḥ prabhuḥ | tasya putro maheṣvāsaḥ prajātirabhavannṛpaḥ

तात, कृतयुग में दण्ड धारण करने वाले प्रभु मनु हुए। उनके पुत्र महाधनुर्धर प्रजाति राजा हुए।

श्लोक 3 (14.4.3)

प्रजातेरभवत्पुत्रः क्षुत इत्यभिविश्रुतः । क्षुतस्य पुत्र इक्ष्वाकुर्महीपालोऽभवत्प्रभुः ॥

prajāterabhavatputraḥ kṣuta ityabhiviśrutaḥ | kṣutasya putra ikṣvākurmahīpālo'bhavatprabhuḥ

प्रजाति के पुत्र क्षुत नाम से प्रसिद्ध हुए, और क्षुत के पुत्र इक्ष्वाकु पृथ्वी के स्वामी हुए।

श्लोक 4 (14.4.4)

तस्य पुत्रशतं राजन्नासीत्परमधार्मिकम् । तांस्तु सर्वान्महीपालानिक्ष्वाकुरकरोत्प्रभुः ॥

tasya putraśataṃ rājannāsītparamadhārmikam | tāṃstu sarvānmahīpālānikṣvākurakarotprabhuḥ

हे राजन्, उनके सौ परम धार्मिक पुत्र थे; और प्रभु इक्ष्वाकु ने उन सभी को पृथ्वी का शासक बनाया।

श्लोक 5 (14.4.5)

तेषां ज्येष्ठस्तु विंशोऽभूत्प्रतिमानं धनुष्मताम् । विंशस्य पुत्रः कल्याणो विविंशो नाम भारत ॥

teṣāṃ jyeṣṭhastu viṃśo'bhūtpratimānaṃ dhanuṣmatām | viṃśasya putraḥ kalyāṇo viviṃśo nāma bhārata

उनमें सबसे बड़े विंश थे, जो धनुर्धारियों में आदर्श थे। हे भारत, विंश के पुत्र उत्तम विविंश नाम के हुए।

श्लोक 6 (14.4.6)

विविंशस्य सुता राजन्बभूवुर्दश पञ्च च । सर्वे धनुषि विक्रान्ता ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ॥

viviṃśasya sutā rājanbabhūvurdaśa pañca ca | sarve dhanuṣi vikrāntā brahmaṇyāḥ satyavādinaḥ

हे राजन्, विविंश के पन्द्रह पुत्र थे, सभी धनुष में पराक्रमी, ब्राह्मणों के भक्त और सत्यवादी,

श्लोक 7 (14.4.7)

दानधर्मरताः शान्ताः सततं प्रियवादिनः । तेषां ज्येष्ठः खनीनेत्रः स तान्सर्वानपीडयत् ॥

dānadharmaratāḥ śāntāḥ satataṃ priyavādinaḥ | teṣāṃ jyeṣṭhaḥ khanīnetraḥ sa tānsarvānapīḍayat

दान और धर्म में रत, शान्त और सदा प्रिय बोलने वाले। उनमें सबसे बड़ा खनीनेत्र था, और वह उन सबको सताता था।

श्लोक 8 (14.4.8)

खनीनेत्रस्तु विक्रान्तो जित्वा राज्यमकण्टकम् । नाशकद्रक्षितुं राज्यं नान्वरज्यन्त तं प्रजाः ॥

khanīnetrastu vikrānto jitvā rājyamakaṇṭakam | nāśakadrakṣituṃ rājyaṃ nānvarajyanta taṃ prajāḥ

पराक्रमी खनीनेत्र निष्कण्टक राज्य जीतकर भी उसकी रक्षा नहीं कर सका, और प्रजा उससे प्रसन्न नहीं हुई।

श्लोक 9 (14.4.9)

तमपास्य च तद्राज्ये तस्य पुत्रं सुवर्चसम् । अभ्यषिञ्चन्त राजेन्द्र मुदिता ह्यभवंस्तदा ॥

tamapāsya ca tadrājye tasya putraṃ suvarcasam | abhyaṣiñcanta rājendra muditā hyabhavaṃstadā

हे राजेन्द्र, उसे उस राज्य से हटाकर उन्होंने उसके पुत्र सुवर्चा का अभिषेक किया, और तब वे प्रसन्न हुए।

श्लोक 10 (14.4.10)

स पितुर्विक्रियां दृष्ट्वा राज्यान्निरसनं च तत् । नियतो वर्तयामास प्रजाहितचिकीर्षया ॥

sa piturvikriyāṃ dṛṣṭvā rājyānnirasanaṃ ca tat | niyato vartayāmāsa prajāhitacikīrṣayā

पिता का दुराचरण और उसका राज्य से निकाला जाना देखकर सुवर्चा प्रजा का हित चाहते हुए संयम से रहे।

श्लोक 11 (14.4.11)

ब्रह्मण्यः सत्यवादी च शुचिः शमदमान्वितः । प्रजास्तं चान्वरज्यन्त धर्मनित्यं मनस्विनम् ॥

brahmaṇyaḥ satyavādī ca śuciḥ śamadamānvitaḥ | prajāstaṃ cānvarajyanta dharmanityaṃ manasvinam

ब्राह्मणों के भक्त, सत्यवादी, पवित्र, शम और दम से युक्त उन धर्मनिष्ठ, उदार राजा से प्रजा प्रेम करने लगी।

श्लोक 12 (14.4.12)

तस्य धर्मप्रवृत्तस्य व्यशीर्यत्कोशवाहनम् । तं क्षीणकोशं सामन्ताः समन्तात्पर्यपीडयन् ॥

tasya dharmapravṛttasya vyaśīryatkośavāhanam | taṃ kṣīṇakośaṃ sāmantāḥ samantātparyapīḍayan

परन्तु धर्म में लगे रहने से उनका कोश और वाहन-बल क्षीण हो गया, और कोश खाली हो जाने पर पड़ोसी राजाओं ने चारों ओर से उन्हें सताया।

श्लोक 13 (14.4.13)

स पीड्यमानो बहुभिः क्षीणकोशाश्ववाहनः । आर्तिमार्च्छत्परां राजा सह भृत्यैः पुरेण च ॥

sa pīḍyamāno bahubhiḥ kṣīṇakośāśvavāhanaḥ | ārtimārcchatparāṃ rājā saha bhṛtyaiḥ pureṇa ca

बहुतों से पीड़ित, कोश चुक जाने और घोड़े-वाहन समाप्त हो जाने पर राजा अपने सेवकों और नगर के साथ अत्यन्त संकट में पड़ गए।

श्लोक 14 (14.4.14)

न चैनमभिहन्तुं ते शक्नुवन्ति बलक्षये । सम्यग्वृत्तो हि राजा स धर्मनित्यो युधिष्ठिर ॥

na cainamabhihantuṃ te śaknuvanti balakṣaye | samyagvṛtto hi rājā sa dharmanityo yudhiṣṭhira

फिर भी उनका बल घट जाने पर भी वे उन्हें मार नहीं सके; क्योंकि हे युधिष्ठिर, वे राजा सम्यक् आचरण वाले और सदा धर्म में स्थिर थे।

श्लोक 15 (14.4.15)

यदा तु परमामार्तिं गतोऽसौ सपुरो नृपः । ततः प्रदध्मौ स करं प्रादुरासीत्ततो बलम् ॥

yadā tu paramāmārtiṃ gato'sau sapuro nṛpaḥ | tataḥ pradadhmau sa karaṃ prādurāsīttato balam

जब वे राजा अपने नगर सहित परम संकट में पहुँच गए, तब उन्होंने अपनी हथेली पर फूँक मारी, और उसी से बल प्रकट हो गया।

श्लोक 16 (14.4.16)

ततस्तानजयत्सर्वान्प्रातिसीमान्नराधिपान् । एतस्मात्कारणाद्राजन्विश्रुतः स करंधमः ॥

tatastānajayatsarvānprātisīmānnarādhipān | etasmātkāraṇādrājanviśrutaḥ sa karaṃdhamaḥ

तब उन्होंने पड़ोस के सभी राजाओं को जीत लिया। हे राजन्, इसी कारण वे करन्धम नाम से प्रसिद्ध हुए।

श्लोक 17 (14.4.17)

आवीक्षित्तस्य पुत्रोऽभूत्त्रेतायुगमुखे पुरा । इन्द्रादनवरः श्रीमान्देवैरपि सुदुर्जयः ॥

āvīkṣittasya putro'bhūttretāyugamukhe purā | indrādanavaraḥ śrīmāndevairapi sudurjayaḥ

त्रेतायुग के आरम्भ में बहुत पहले उनके पुत्र अविक्षित् हुए, जो श्रीमान् थे, इन्द्र से कम नहीं थे और देवताओं के लिए भी दुर्जेय थे।

श्लोक 18 (14.4.18)

कारंधम इति ख्यातो बभूव जगतीपतिः । तस्य सर्वे महीपाला वर्तन्ते स्म वशे तदा । स हि सम्राडभूत्तेषां वृत्तेन च बलेन च ॥

kāraṃdhama iti khyāto babhūva jagatīpatiḥ | tasya sarve mahīpālā vartante sma vaśe tadā | sa hi samrāḍabhūtteṣāṃ vṛttena ca balena ca

वे करन्धम नाम से प्रसिद्ध, पृथ्वी के स्वामी हुए। उस समय सभी राजा उनके वश में रहते थे, और अपने आचरण तथा बल से वे उन सबके सम्राट् हुए।

श्लोक 19 (14.4.19)

अविक्षिन्नाम धर्मात्मा शौर्येणेन्द्रसमोऽभवत् । यज्ञशीलो धर्मरतिर्धृतिमान्संयतेन्द्रियः ॥

avikṣinnāma dharmātmā śauryeṇendrasamo'bhavat | yajñaśīlo dharmaratirdhṛtimānsaṃyatendriyaḥ

अविक्षित् नाम के धर्मात्मा हुए, जो शौर्य में इन्द्र के समान थे, यज्ञशील, धर्म में रत, धैर्यवान् और संयतेन्द्रिय थे।

श्लोक 20 (14.4.20)

तेजसाऽऽदित्यसदृशः क्षमया पृथिवीसमः । बृहस्पतिसमो बुद्ध्या हिमवानिव सुस्थिरः ॥

tejasā''dityasadṛśaḥ kṣamayā pṛthivīsamaḥ | bṛhaspatisamo buddhyā himavāniva susthiraḥ

तेज में सूर्य के समान, क्षमा में पृथ्वी के समान, बुद्धि में बृहस्पति के समान और हिमालय की तरह अत्यन्त स्थिर।

श्लोक 21 (14.4.21)

कर्मणा मनसा वाचा दमेन प्रशमेन च । मनांस्याराधयामास प्रजानां स महीपतिः ॥

karmaṇā manasā vācā damena praśamena ca | manāṃsyārādhayāmāsa prajānāṃ sa mahīpatiḥ

कर्म, मन और वाणी से तथा दम और शम से उन राजा ने प्रजा के मन को प्रसन्न किया।

श्लोक 22 (14.4.22)

य ईजे हयमेधानां शतेन विधिवत्प्रभुः । याजयामास यं विद्वान्स्वयमेवाङ्गिराः प्रभुः ॥

ya īje hayamedhānāṃ śatena vidhivatprabhuḥ | yājayāmāsa yaṃ vidvānsvayamevāṅgirāḥ prabhuḥ

उन प्रभु ने विधिपूर्वक सौ अश्वमेध यज्ञ किए, और विद्वान् अङ्गिरा ने स्वयं उनका यज्ञ कराया।

श्लोक 23 (14.4.23)

तस्य पुत्रोऽतिचक्राम पितरं गुणवत्तया । मरुत्तो नाम धर्मज्ञश्चक्रवर्ती महायशाः । नागायुतसमप्राणः साक्षाद्विष्णुरिवापरः ॥

tasya putro'ticakrāma pitaraṃ guṇavattayā | marutto nāma dharmajñaścakravartī mahāyaśāḥ | nāgāyutasamaprāṇaḥ sākṣādviṣṇurivāparaḥ

उनके पुत्र गुणों में अपने पिता से भी आगे निकल गए — मरुत्त नाम के, धर्म को जानने वाले, महायशस्वी चक्रवर्ती, दस हजार हाथियों के समान बल वाले, मानो दूसरे साक्षात् विष्णु।

श्लोक 24 (14.4.24)

स यक्ष्यमाणो धर्मात्मा शातकुम्भमयान्युत । कारयामास शुभ्राणि भाजनानि सहस्रशः ॥

sa yakṣyamāṇo dharmātmā śātakumbhamayānyuta | kārayāmāsa śubhrāṇi bhājanāni sahasraśaḥ

यज्ञ करने की इच्छा से उन धर्मात्मा राजा ने सोने के हजारों चमकदार पात्र बनवाए।

श्लोक 25 (14.4.25)

मेरुं पर्वतमासाद्य हिमवत्पार्श्व उत्तरे । काञ्चनः सुमहान्पादस्तत्र कर्म चकार सः ॥

meruṃ parvatamāsādya himavatpārśva uttare | kāñcanaḥ sumahānpādastatra karma cakāra saḥ

मेरु पर्वत पर पहुँचकर, हिमालय के पास उत्तर की ओर, जहाँ सोने का एक विशाल पर्वत-पाद था, उन्होंने वहाँ अपनी तैयारी की।

श्लोक 26 (14.4.26)

ततः कुण्डानि पात्रीश्च पिठराण्यासनानि च । चक्रुः सुवर्णकर्तारो येषां सङ्ख्या न विद्यते ॥

tataḥ kuṇḍāni pātrīśca piṭharāṇyāsanāni ca | cakruḥ suvarṇakartāro yeṣāṃ saṅkhyā na vidyate

तब असंख्य स्वर्णकारों ने कुण्ड, पात्र, बड़े बर्तन और आसन बनाए।

श्लोक 27 (14.4.27)

तस्यैव च समीपे तु यज्ञवाटो बभूव ह । ईजे तत्र स धर्मात्मा विधिवत्पृथिवीपतिः । मरुत्तः सहितैः सर्वैः प्रजापालैर्नराधिपः ॥

tasyaiva ca samīpe tu yajñavāṭo babhūva ha | īje tatra sa dharmātmā vidhivatpṛthivīpatiḥ | maruttaḥ sahitaiḥ sarvaiḥ prajāpālairnarādhipaḥ

उसी के पास यज्ञ-भूमि थी। वहाँ उन धर्मात्मा पृथ्वीपति, नरेश्वर मरुत्त ने सब प्रजापालक राजाओं के साथ विधिपूर्वक यज्ञ किया।

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