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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 5

बृहस्पति का इन्द्र को मरुत्त का यज्ञ न कराने का वचन

युधिष्ठिर पूछते हैं कि मरुत्त को सोना कैसे मिला और वह अब कहाँ है। व्यास देवताओं और असुरों की स्पर्धा से तथा अङ्गिरा के पुत्रों बृहस्पति और संवर्त के वैर से कथा आरम्भ करते हैं; बृहस्पति के सताने पर संवर्त सब कुछ छोड़कर दिगम्बर होकर वन में रहने लगे। बृहस्पति को अपना पुरोहित बना चुके इन्द्र अतुलनीय राजा मरुत्त से ईर्ष्या करने लगे और बृहस्पति से माँग की कि वे कभी मरुत्त का यज्ञ न कराएँ; बृहस्पति ने वचन दिया कि वे किसी मनुष्य के यज्ञ में कभी स्रुवा नहीं उठाएँगे, और इन्द्र सन्तुष्ट होकर लौट गए।

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (14.5.1)

कथंवीर्यः समभवत्स राजा ददतां वरः । कथं च जातरूपेण समयुज्यत वै नृपः ॥

kathaṃvīryaḥ samabhavatsa rājā dadatāṃ varaḥ | kathaṃ ca jātarūpeṇa samayujyata vai nṛpaḥ

दाताओं में श्रेष्ठ वह राजा कैसे पराक्रम वाला था? और वह राजा सोने से कैसे सम्पन्न हुआ?

श्लोक 2 (14.5.2)

क्व च तत्सांप्रतं द्रव्यं भगवन्नवतिष्ठते । कथं च शक्यमस्माभिस्तदवाप्तुं तपोधन ॥

kva ca tatsāṃprataṃ dravyaṃ bhagavannavatiṣṭhate | kathaṃ ca śakyamasmābhistadavāptuṃ tapodhana

और हे भगवन्, वह धन अब कहाँ है? और हे तपोधन, हम उसे कैसे पा सकते हैं?

व्यास उवाच

श्लोक 3 (14.5.3)

असुराश्चैव देवाश्च दक्षस्यासन्प्रजापतेः । अपत्यं बहुलं तात तेऽस्पर्धन्त परस्परम् ॥

asurāścaiva devāśca dakṣasyāsanprajāpateḥ | apatyaṃ bahulaṃ tāta te'spardhanta parasparam

तात, असुर और देवता प्रजापति दक्ष की बहुसंख्यक सन्तान थे, और वे आपस में स्पर्धा करते थे।

श्लोक 4 (14.5.4)

तथैवाङ्गिरसः पुत्रौ पितृतुल्यौ बभूवतुः । बृहस्पतिर्बृहत्तेजाः संवर्तश्च तपोधनः ॥

tathaivāṅgirasaḥ putrau pitṛtulyau babhūvatuḥ | bṛhaspatirbṛhattejāḥ saṃvartaśca tapodhanaḥ

उसी प्रकार अङ्गिरा के दो पुत्र थे, जो पिता के समान थे — महातेजस्वी बृहस्पति और तपोधन संवर्त।

श्लोक 5 (14.5.5)

तावपि स्पर्धिनौ राजन्पृथगास्तां परस्परम् । बृहस्पतिः स संवर्तं बाधते स्म पुनःपुनः ॥

tāvapi spardhinau rājanpṛthagāstāṃ parasparam | bṛhaspatiḥ sa saṃvartaṃ bādhate sma punaḥpunaḥ

हे राजन्, वे दोनों भी एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी होकर अलग-अलग रहते थे, और बृहस्पति संवर्त को बार-बार सताते थे।

श्लोक 6 (14.5.6)

स बाध्यमानः सततं भ्रात्रा ज्येष्ठेन भारत । अर्थानुत्सृज्य दिग्वासा वने वासमरोचयत् ॥

sa bādhyamānaḥ satataṃ bhrātrā jyeṣṭhena bhārata | arthānutsṛjya digvāsā vane vāsamarocayat

हे भारत, बड़े भाई से निरन्तर सताए जाने पर उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति त्याग दी और दिगम्बर होकर वन में रहना स्वीकार किया।

श्लोक 7 (14.5.7)

वासवोऽप्यसुरान्सर्वान्विजित्य च निपात्य च । इन्द्रत्वं प्राप्य लोकेषु ततो वव्रे पुरोहितम् ॥

vāsavo'pyasurānsarvānvijitya ca nipātya ca | indratvaṃ prāpya lokeṣu tato vavre purohitam

और वासव ने सब असुरों को जीतकर और मारकर, लोकों में इन्द्रपद पाकर, तब अपना पुरोहित चुना —

श्लोक 8 (14.5.8)

पुत्रमङ्गिरसो ज्येष्ठं विप्रज्येष्ठं बृहस्पतिम् । याज्यस्त्वङ्गिरसः पूर्वमासीद्राजा करंधमः ॥

putramaṅgiraso jyeṣṭhaṃ viprajyeṣṭhaṃ bṛhaspatim | yājyastvaṅgirasaḥ pūrvamāsīdrājā karaṃdhamaḥ

अङ्गिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति को, जो ब्राह्मणों में सबसे बड़े थे। पहले राजा करन्धम अङ्गिरा के यजमान रहे थे।

श्लोक 9 (14.5.9)

वीर्येणाप्रतिमो लोके वृत्तेन च बलेन च । शतक्रतुरिवौजस्वी धर्मात्मा संशितव्रतः ॥

vīryeṇāpratimo loke vṛttena ca balena ca | śatakraturivaujasvī dharmātmā saṃśitavrataḥ

वे पराक्रम, आचरण और बल में संसार में अद्वितीय थे, शतक्रतु (इन्द्र) की तरह तेजस्वी, धर्मात्मा और दृढ़व्रत थे।

श्लोक 10 (14.5.10)

वाहनं यस्य योधाश्च मित्राणि विविधानि च । शयनानि च मुख्यानि महार्हाणि च सर्वशः ॥

vāhanaṃ yasya yodhāśca mitrāṇi vividhāni ca | śayanāni ca mukhyāni mahārhāṇi ca sarvaśaḥ

उनके वाहन और योद्धा, अनेक प्रकार के मित्र, और सब प्रकार की श्रेष्ठ और बहुमूल्य शय्याएँ —

श्लोक 11 (14.5.11)

ध्यानादेवाभवद्राजन्मुखवातेन सर्वशः । स गुणैः पार्थिवान्सर्वान्वशे चक्रे नराधिपः ॥

dhyānādevābhavadrājanmukhavātena sarvaśaḥ | sa guṇaiḥ pārthivānsarvānvaśe cakre narādhipaḥ

यह सब हे राजन्, उनके केवल ध्यान से, उनके मुख की वायु से ही प्रकट हो गया। अपने गुणों से उन नरेश ने सब राजाओं को अपने वश में कर लिया।

श्लोक 12 (14.5.12)

संजीव्य कालमिष्टं च सशरीरो दिवं गतः । बभूव तस्य पुत्रस्तु ययातिरिव धर्मवित् ॥

saṃjīvya kālamiṣṭaṃ ca saśarīro divaṃ gataḥ | babhūva tasya putrastu yayātiriva dharmavit

अपना इच्छित समय जीकर वे शरीर सहित स्वर्ग चले गए। उनके यायाति के समान धर्मज्ञ पुत्र हुए —

श्लोक 13 (14.5.13)

अविक्षिन्नाम शत्रुंजित्स वशे कृतवान्महीम् । विक्रमेण गुणैश्चैव पितेवासीत्स पार्थिवः ॥

avikṣinnāma śatruṃjitsa vaśe kṛtavānmahīm | vikrameṇa guṇaiścaiva pitevāsītsa pārthivaḥ

अविक्षित् नाम के, शत्रुओं को जीतने वाले, जिन्होंने पृथ्वी को अपने वश में किया; पराक्रम और गुणों में वे राजा अपने पिता के समान थे।

श्लोक 14 (14.5.14)

तस्य वासवतुल्योऽभून्मरुत्तो नाम वीर्यवान् । पुत्रस्तमनुरक्ताऽभूत्पृथिवी सागराम्बरा ॥

tasya vāsavatulyo'bhūnmarutto nāma vīryavān | putrastamanuraktā'bhūtpṛthivī sāgarāmbarā

उनके पुत्र मरुत्त नाम के हुए, पराक्रमी और वासव के समान; समुद्र रूपी वस्त्र पहनने वाली पृथ्वी उन पर अनुरक्त थी।

श्लोक 15 (14.5.15)

स्पर्धते स स्म सततं देवराजेन नित्यदा । वासवोऽपि मरुत्तेन स्पर्धते पाण्डुनन्दन ॥

spardhate sa sma satataṃ devarājena nityadā | vāsavo'pi maruttena spardhate pāṇḍunandana

वे निरन्तर, प्रतिदिन, देवराज से स्पर्धा करते थे, और हे पाण्डुनन्दन, वासव भी मरुत्त से स्पर्धा करते थे।

श्लोक 16 (14.5.16)

शुचिः स गुणवानासीन्मरुत्तः पृथिवीपतिः । यतमानोपि यं शक्रो न विशेषयति स्म ह ॥

śuciḥ sa guṇavānāsīnmaruttaḥ pṛthivīpatiḥ | yatamānopi yaṃ śakro na viśeṣayati sma ha

पृथ्वीपति मरुत्त पवित्र और गुणवान् थे; इन्द्र यत्न करके भी उनसे बढ़कर नहीं हो सके।

श्लोक 17 (14.5.17)

सोऽशक्नुवन्विशेषाय समाहूय बृहस्पतिम् । उवाचेदं वचो देवैः सहितो हरिवाहनः ॥

so'śaknuvanviśeṣāya samāhūya bṛhaspatim | uvācedaṃ vaco devaiḥ sahito harivāhanaḥ

उनसे बढ़ न पाने पर हरे घोड़ों वाले इन्द्र ने बृहस्पति को बुलाया और देवताओं के साथ यह वचन कहा।

इन्द्र उवाच

श्लोक 18 (14.5.18)

बृहस्पते मरुत्तस्य मा स्म कार्षीः कथञ्चन । दैवं कर्माथ पित्र्यं वा कर्तासि मम चेत्प्रियम् ॥

bṛhaspate maruttasya mā sma kārṣīḥ kathañcana | daivaṃ karmātha pitryaṃ vā kartāsi mama cetpriyam

बृहस्पति, यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो मरुत्त के लिए किसी प्रकार कोई कर्म — चाहे देवताओं का हो या पितरों का — मत करना।

श्लोक 19 (14.5.19)

अहं हि त्रिषु लोकेषु सुराणां च बृहस्पते । इन्द्रत्वं प्राप्तवानेको मरुत्तस्तु महीपतिः ॥

ahaṃ hi triṣu lokeṣu surāṇāṃ ca bṛhaspate | indratvaṃ prāptavāneko maruttastu mahīpatiḥ

हे बृहस्पति, तीनों लोकों में और देवताओं में केवल मैंने इन्द्रपद पाया है, जबकि मरुत्त केवल पृथ्वी के स्वामी हैं।

श्लोक 20 (14.5.20)

कथं ह्यमर्त्यं ब्रह्मंस्त्वं याजयित्वा सुराधिपम् । याजयेर्मृत्युसंयुक्तं मरुत्तमविशङ्कया ॥

kathaṃ hyamartyaṃ brahmaṃstvaṃ yājayitvā surādhipam | yājayermṛtyusaṃyuktaṃ maruttamaviśaṅkayā

हे ब्रह्मन्, अमर देवाधिपति का यज्ञ कराकर आप बिना किसी शंका के मृत्यु से बँधे मरुत्त का यज्ञ कैसे करा सकते हैं?

श्लोक 21 (14.5.21)

मां वा वृणीष्व भद्रं ते मरुत्तं वा महीपतिम् । परित्यज्य मरुत्तं वा यथाजोषं भजस्व माम् ॥

māṃ vā vṛṇīṣva bhadraṃ te maruttaṃ vā mahīpatim | parityajya maruttaṃ vā yathājoṣaṃ bhajasva mām

आपका कल्याण हो, या तो मुझे चुनिए या पृथ्वीपति मरुत्त को; अथवा मरुत्त को छोड़कर अपनी इच्छा से मेरी सेवा कीजिए।

व्यास उवाच

श्लोक 22 (14.5.22)

एवमुक्तः स कौरव्य देवराज्ञा बृहस्पतिः । मुहूर्तमिव सञ्चिन्त्य देवराजानमब्रवीत् ॥

evamuktaḥ sa kauravya devarājñā bṛhaspatiḥ | muhūrtamiva sañcintya devarājānamabravīt

हे कौरव्य, देवराज के इस प्रकार कहने पर बृहस्पति ने क्षणभर विचार किया और फिर देवराज से कहा।

बृहस्पतिरुवाच

श्लोक 23 (14.5.23)

त्वं भूतानामधिपतिस्त्वयि लोकाः प्रतिष्ठिताः । नमुचेर्विश्वरूपस्य निहन्ता त्वं बलस्य च ॥

tvaṃ bhūtānāmadhipatistvayi lokāḥ pratiṣṭhitāḥ | namucerviśvarūpasya nihantā tvaṃ balasya ca

आप प्राणियों के अधिपति हैं, लोक आप में प्रतिष्ठित हैं; आप नमुचि, विश्वरूप और बल का वध करने वाले हैं।

श्लोक 24 (14.5.24)

त्वमाजहर्थ देवानामेको वीरश्रियं पराम् । त्वं बिभर्षि भुवं द्यां च सदैव बलसूदन ॥

tvamājahartha devānāmeko vīraśriyaṃ parām | tvaṃ bibharṣi bhuvaṃ dyāṃ ca sadaiva balasūdana

देवताओं में केवल आपने परम वीर-श्री प्राप्त की है; हे बलसूदन, आप सदा पृथ्वी और आकाश को धारण करते हैं।

श्लोक 25 (14.5.25)

पौरोहित्यं कथं कृत्वा तव देवगणेश्वर । याजयेयमहं मर्त्यं मरुत्तं पाकशासन ॥

paurohityaṃ kathaṃ kṛtvā tava devagaṇeśvara | yājayeyamahaṃ martyaṃ maruttaṃ pākaśāsana

हे देवगणों के स्वामी, आपका पुरोहित होकर मैं एक मर्त्य, मरुत्त, का यज्ञ कैसे करा सकता हूँ, हे पाकशासन?

श्लोक 26 (14.5.26)

समाश्वसिहि देवेन्द्र नाहं मर्त्यस्य कर्हिचित् । ग्रहीष्यामि स्रुवं यज्ञे शृणु चेदं वचो मम ॥

samāśvasihi devendra nāhaṃ martyasya karhicit | grahīṣyāmi sruvaṃ yajñe śṛṇu cedaṃ vaco mama

हे देवेन्द्र, आश्वस्त हों; मैं किसी मनुष्य के यज्ञ में कभी स्रुवा नहीं उठाऊँगा। और मेरी यह बात भी सुनिए —

श्लोक 27 (14.5.27)

हिरण्यरेता नोष्णः स्यात्परिवर्तेत मेदिनी । भासं तु न रविः कुर्यान्न तु सत्यं चलेन्मयि ॥

hiraṇyaretā noṣṇaḥ syātparivarteta medinī | bhāsaṃ tu na raviḥ kuryānna tu satyaṃ calenmayi

अग्नि उष्ण न रहे, पृथ्वी उलट जाए, सूर्य प्रकाश न दे — पर मुझमें सत्य कभी विचलित नहीं होगा।

व्यास उवाच

श्लोक 28 (14.5.28)

बृहस्पतिवचः श्रुत्वा शक्रो विगतमत्सरः । प्रशस्यैनं विवेशाथ स्वमेव भवनं तदा ॥

bṛhaspativacaḥ śrutvā śakro vigatamatsaraḥ | praśasyainaṃ viveśātha svameva bhavanaṃ tadā

बृहस्पति के वचन सुनकर इन्द्र की ईर्ष्या दूर हो गई; उन्होंने उनकी प्रशंसा की और फिर अपने भवन में चले गए।

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