आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 6
बृहस्पति द्वारा मरुत्त का त्याग और नारद का संवर्त के पास भेजना
व्यास राजा मरुत्त का प्राचीन इतिहास सुनाते हैं। मरुत्त यज्ञ कराने के लिए बृहस्पति के पास जाते हैं, पर इन्द्र को वचन दे चुके होने के कारण बृहस्पति मना कर देते हैं। निराश मरुत्त को नारद मिलते हैं और उन्हें बृहस्पति के भाई संवर्त के पास भेजते हैं, जो नग्न तपस्वी उन्मत्त की तरह वाराणसी में घूमते हैं; नारद नगर-द्वार पर शव रखकर उन्हें पहचानने की युक्ति बताते हैं। मरुत्त संवर्त के पीछे चलते हैं, संवर्त उन पर धूल, कीचड़ और थूक फेंकते हैं, और अन्त में वे एक वटवृक्ष के नीचे बैठ जाते हैं।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (14.6.1)
अत्राप्युदाहरन्तीमममितिहासं पुरातनम् । बृहस्पतेश्च संवादं मरुत्तस्य च धीमतः ॥
atrāpyudāharantīmamamitihāsaṃ purātanam | bṛhaspateśca saṃvādaṃ maruttasya ca dhīmataḥ
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं—बृहस्पति और बुद्धिमान् मरुत्त का संवाद।
श्लोक 2 (14.6.2)
देवराजस्य समयं कृतमाङ्गिरसेन ह । श्रुत्वा मरुत्तो नृपतिर्मन्युमाहारयत्परम् ॥
devarājasya samayaṃ kṛtamāṅgirasena ha | śrutvā marutto nṛpatirmanyumāhārayatparam
देवराज इन्द्र के साथ अंगिरा के पुत्र बृहस्पति ने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे सुनकर राजा मरुत्त के मन में गहरा क्षोभ उत्पन्न हुआ।
श्लोक 3 (14.6.3)
सङ्कल्प्य मनसा यज्ञं करंधमसुतात्मजः । बृहस्पतिमुपागम्य वाग्मी वचनमब्रवीत् ॥
saṅkalpya manasā yajñaṃ karaṃdhamasutātmajaḥ | bṛhaspatimupāgamya vāgmī vacanamabravīt
करन्धम के पौत्र वाक्पटु मरुत्त ने मन में यज्ञ करने का संकल्प किया और बृहस्पति के पास जाकर कहा—
मरुत्त उवाच
श्लोक 4 (14.6.4)
भगवन्यन्मया पूर्वमभिगम्य तपोधन । कृतोऽभिसन्धिर्यज्ञस्य भवतो वचनाद्गुरो ॥
bhagavanyanmayā pūrvamabhigamya tapodhana | kṛto'bhisandhiryajñasya bhavato vacanādguro
"भगवन्, हे तपोधन! पहले मैंने आपके पास आकर आपके कहने से यज्ञ करने का निश्चय किया था, हे गुरो।
श्लोक 5 (14.6.5)
तमहं यष्टुमिच्छामि सम्भाराः सम्भृताश्च मे । याज्योस्मि भवतः साधो तत्प्राप्नुहि विधत्स्व च ॥
tamahaṃ yaṣṭumicchāmi sambhārāḥ sambhṛtāśca me | yājyosmi bhavataḥ sādho tatprāpnuhi vidhatsva ca
अब मैं उसे करना चाहता हूँ और मेरी सामग्री एकत्र हो चुकी है। हे साधो, मैं आपके द्वारा यज्ञ कराए जाने योग्य यजमान हूँ; अतः इसे स्वीकार कीजिए और सम्पन्न कराइए।"
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 6 (14.6.6)
न कामये याजयितुं त्वामहं पृथिवीपते । वृतोस्मि देवराजेन प्रतिज्ञातं च तस्य मे ॥
na kāmaye yājayituṃ tvāmahaṃ pṛthivīpate | vṛtosmi devarājena pratijñātaṃ ca tasya me
बृहस्पति ने कहा—"हे पृथ्वीपति, मैं आपका यज्ञ कराना नहीं चाहता। देवराज इन्द्र ने मुझे वरण कर लिया है और मैंने उनसे प्रतिज्ञा कर रखी है।"
मरुत्त उवाच
श्लोक 7 (14.6.7)
पित्र्यमस्मि तव क्षेत्रं बहुमन्ये च ते भृशम् । तवास्मि याज्यतां प्राप्तो भजमानं भजस्व माम् ॥
pitryamasmi tava kṣetraṃ bahumanye ca te bhṛśam | tavāsmi yājyatāṃ prāpto bhajamānaṃ bhajasva mām
मरुत्त ने कहा—"मैं आपका पैतृक क्षेत्र हूँ, आपके कुल का पुराना यजमान हूँ और आपका बहुत आदर करता हूँ। मैं आपका यजमान बनकर आया हूँ; मुझ भक्त को स्वीकार कीजिए।"
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 8 (14.6.8)
अमर्त्यं याजयित्वाऽहं याजयिष्ये कथं नरम् । मरुत्त गच्छ वा मा वा निवृत्तोस्म्यद्य याजनात् ॥
amartyaṃ yājayitvā'haṃ yājayiṣye kathaṃ naram | marutta gaccha vā mā vā nivṛttosmyadya yājanāt
बृहस्पति ने कहा—"अमर देवता का यज्ञ कराकर मैं किसी मरणधर्मा मनुष्य का यज्ञ कैसे कराऊँगा? मरुत्त, चाहे जाओ या न जाओ; मैंने आज तुम्हारा यज्ञ कराने से मुँह मोड़ लिया है।
श्लोक 9 (14.6.9)
न त्वां याजयितास्म्यद्य वृणु यं त्वमिहेच्छसि । उपाध्यायं महाबाहो यस्ते यज्ञं करिष्यति ॥
na tvāṃ yājayitāsmyadya vṛṇu yaṃ tvamihecchasi | upādhyāyaṃ mahābāho yaste yajñaṃ kariṣyati
मैं आज तुम्हारा यज्ञ नहीं कराऊँगा। हे महाबाहो, यहाँ जिसे चाहो अपना उपाध्याय चुन लो, जो तुम्हारा यज्ञ कराएगा।"
व्यास उवाच
श्लोक 10 (14.6.10)
एवमुक्तस्तु नृपतिर्मरुत्तो व्रीडितोऽभवत् । प्रत्यागच्छन्सुसंविग्नो ददर्श पथि नारदम् ॥
evamuktastu nṛpatirmarutto vrīḍito'bhavat | pratyāgacchansusaṃvigno dadarśa pathi nāradam
व्यास ने कहा—ऐसा कहे जाने पर राजा मरुत्त लज्जित हो गए। अत्यन्त व्याकुल होकर लौटते हुए उन्होंने मार्ग में नारद को देखा।
श्लोक 11 (14.6.11)
देवर्षिणा समागम्य नारदेन स पार्थिवः । विधिवत्प्राञ्जलिस्तस्थावथैनं नारदोऽब्रवीत् ॥
devarṣiṇā samāgamya nāradena sa pārthivaḥ | vidhivatprāñjalistasthāvathainaṃ nārado'bravīt
देवर्षि नारद से मिलकर राजा विधिपूर्वक हाथ जोड़कर खड़े हो गए, तब नारद ने उनसे कहा।
नारद उवाच
श्लोक 12 (14.6.12)
राजर्षे नातिहृष्टोसि कच्चित्क्षेमं तवानघ । क्व गतोसि कुतश्चेदमप्रीतिस्थानमागतम् ॥
rājarṣe nātihṛṣṭosi kaccitkṣemaṃ tavānagha | kva gatosi kutaścedamaprītisthānamāgatam
"हे राजर्षे, आप बहुत प्रसन्न नहीं दीखते। हे निष्पाप, आपका कुशल तो है? आप कहाँ गए थे और यह अप्रसन्नता का कारण कहाँ से आपके सामने आया?
श्लोक 13 (14.6.13)
श्रोतव्यं चेन्मया राजन्ब्रूहि मे पार्थिवर्षभ । व्यपनेष्यामि ते मन्युं सर्वयत्नैर्नराधिप ॥
śrotavyaṃ cenmayā rājanbrūhi me pārthivarṣabha | vyapaneṣyāmi te manyuṃ sarvayatnairnarādhipa
हे राजन्, हे पृथ्वीपतियों में श्रेष्ठ, यदि मेरे सुनने योग्य हो तो मुझे बताइए; हे नरेश्वर, मैं हर प्रयत्न से आपका दुःख दूर करूँगा।"
व्यास उवाच
श्लोक 14 (14.6.14)
एवमुक्तो मरुत्तः स नारदेन महर्षिणा । विप्रलम्भमुपाध्यायात्सर्वज्ञे तं न्यवेदयत् ॥
evamukto maruttaḥ sa nāradena maharṣiṇā | vipralambhamupādhyāyātsarvajñe taṃ nyavedayat
महर्षि नारद के ऐसा कहने पर मरुत्त ने उन सर्वज्ञ को अपने उपाध्याय से मिले तिरस्कार की बात बताई।
मरुत्त उवाच
श्लोक 15 (14.6.15)
गतोस्म्यङ्गिरसः पुत्रं देवाचार्यं बृहस्पतिम् । यज्ञार्थमृत्विजं प्रष्टुं स च मां नाभ्यनन्दत ॥
gatosmyaṅgirasaḥ putraṃ devācāryaṃ bṛhaspatim | yajñārthamṛtvijaṃ praṣṭuṃ sa ca māṃ nābhyanandata
मरुत्त ने कहा—"मैं अंगिरा के पुत्र, देवताओं के आचार्य बृहस्पति के पास यज्ञ के लिए ऋत्विज बनने की प्रार्थना करने गया था, पर उन्होंने मेरा स्वागत नहीं किया।
श्लोक 16 (14.6.16)
प्रत्याख्यातश्च तेनाहं जीवितुं नाद्य कामये । परित्यक्तश्च गुरुणा दूषितश्चास्मि नारद ॥
pratyākhyātaśca tenāhaṃ jīvituṃ nādya kāmaye | parityaktaśca guruṇā dūṣitaścāsmi nārada
उनके द्वारा ठुकराए जाने पर अब मैं जीना नहीं चाहता। हे नारद, मुझे मेरे गुरु ने त्याग दिया है और मैं अपमानित हुआ हूँ।"
व्यास उवाच
श्लोक 17 (14.6.17)
एवमुक्तस्तु राज्ञा स नारदः प्रत्युवाच ह । आविक्षितं महाराज वाचा संजीवयन्निव ॥
evamuktastu rājñā sa nāradaḥ pratyuvāca ha | āvikṣitaṃ mahārāja vācā saṃjīvayanniva
व्यास ने कहा—राजा के ऐसा कहने पर नारद ने आविक्षित-पुत्र मरुत्त को, हे महाराज, मानो अपनी वाणी से जिलाते हुए उत्तर दिया।
नारद उवाच
श्लोक 18 (14.6.18)
राजन्नङ्गिरसः पुत्रः संवर्तो नाम धार्मिकः । चङ्क्रमीति दिशः सर्वा दिग्वासा मोहयन्प्रजाः ॥
rājannaṅgirasaḥ putraḥ saṃvarto nāma dhārmikaḥ | caṅkramīti diśaḥ sarvā digvāsā mohayanprajāḥ
नारद ने कहा—"हे राजन्, अंगिरा के पुत्र संवर्त धर्मात्मा हैं; वे दिगम्बर होकर सब दिशाओं में घूमते हैं और लोगों को भ्रम में डालते हैं।
श्लोक 19 (14.6.19)
तं गच्छ यदि याज्यं त्वां न वाञ्छति बृहस्पतिः । प्रसन्नस्त्वां महातेजाः संवर्तो याजयिष्यति ॥
taṃ gaccha yadi yājyaṃ tvāṃ na vāñchati bṛhaspatiḥ | prasannastvāṃ mahātejāḥ saṃvarto yājayiṣyati
आप उनके पास जाइए। यदि बृहस्पति आपका यज्ञ कराना नहीं चाहते, तो महातेजस्वी संवर्त प्रसन्न होकर आपका यज्ञ करा देंगे।"
मरुत्त उवाच
श्लोक 20 (14.6.20)
संजीवितोऽहं भवता वाक्येनानेन नारद । पश्येयं क्व नु संवर्तं शंस मे वदतांवर ॥
saṃjīvito'haṃ bhavatā vākyenānena nārada | paśyeyaṃ kva nu saṃvartaṃ śaṃsa me vadatāṃvara
मरुत्त ने कहा—"हे नारद, आपके इन वचनों से मुझमें जान आ गई। हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, बताइए कि मैं संवर्त को कहाँ देख सकूँगा।
श्लोक 21 (14.6.21)
कथं च तस्मै वर्तेयं कथं मां न परित्यजेत् । प्रत्याख्यातश्च तेनापि नाहं जीवितुमुत्सहे ॥
kathaṃ ca tasmai varteyaṃ kathaṃ māṃ na parityajet | pratyākhyātaśca tenāpi nāhaṃ jīvitumutsahe
मैं उनके साथ कैसा व्यवहार करूँ और कैसे करूँ कि वे मुझे न छोड़ें? यदि उन्होंने भी मुझे ठुकरा दिया, तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगा।"
नारद उवाच
श्लोक 22 (14.6.22)
उन्मत्तवेषं बिभ्रत्स चङ्क्रमीति यथासुखम् । वाराणसीं तु नगरीमभीक्ष्णमुपसेवते ॥
unmattaveṣaṃ bibhratsa caṅkramīti yathāsukham | vārāṇasīṃ tu nagarīmabhīkṣṇamupasevate
नारद ने कहा—"वे उन्मत्त का वेश धारण किए अपनी इच्छा से घूमते रहते हैं और बार-बार वाराणसी नगरी में आते-जाते हैं।
श्लोक 23 (14.6.23)
तस्या द्वारं समासाद्य न्यसेथाः कुणपं क्वचित् । तं दृष्ट्वा यो निवर्तेत संवर्तः स महीपते ॥
tasyā dvāraṃ samāsādya nyasethāḥ kuṇapaṃ kvacit | taṃ dṛṣṭvā yo nivarteta saṃvartaḥ sa mahīpate
उस नगरी के द्वार पर पहुँचकर कहीं एक शव रख देना। हे पृथ्वीपति, उसे देखकर जो लौट पड़े, वही संवर्त है।
श्लोक 24 (14.6.24)
तं पृष्ठतोऽनुगच्छेथा यत्र गच्छेत्स वीर्यवान् । तमेकान्ते समासाद्य प्राञ्जलिः शरणं व्रजेः ॥
taṃ pṛṣṭhato'nugacchethā yatra gacchetsa vīryavān | tamekānte samāsādya prāñjaliḥ śaraṇaṃ vrajeḥ
वह पराक्रमी जहाँ भी जाए, उसके पीछे-पीछे चलना, और एकान्त में उसके पास पहुँचकर हाथ जोड़कर उसकी शरण लेना।
श्लोक 25 (14.6.25)
पृच्छेत्त्वां यदि केनाहं तवाख्यात इति स्म ह । ब्रूयास्त्वं नारदेनेति स कुत्र इति शत्रुहन् ॥
pṛcchettvāṃ yadi kenāhaṃ tavākhyāta iti sma ha | brūyāstvaṃ nāradeneti sa kutra iti śatruhan
यदि वह तुमसे पूछे कि 'तुम्हें मेरा पता किसने बताया?', तो कहना—'नारद ने।' और हे शत्रुहन्ता, यदि वह पूछे कि 'वे कहाँ हैं?'
श्लोक 26 (14.6.26)
स चेत्त्वामनुयुञ्जीत ममानुगमनेप्सया । शंसेथा वह्निमारूढं मामपि त्वमशङ्कया ॥
sa cettvāmanuyuñjīta mamānugamanepsayā | śaṃsethā vahnimārūḍhaṃ māmapi tvamaśaṅkayā
और यदि वह मेरे पीछे आने की इच्छा से तुमसे बार-बार पूछे, तो निर्भय होकर कह देना कि मैं भी अग्नि में प्रवेश कर गया हूँ।"
व्यास उवाच
श्लोक 27 (14.6.27)
स तथेति प्रतिश्रुत्य पूजयित्वा च नारदम् । अभ्यनुज्ञाय राजर्षिर्ययौ वाराणसीं पुरीम् ॥
sa tatheti pratiśrutya pūjayitvā ca nāradam | abhyanujñāya rājarṣiryayau vārāṇasīṃ purīm
व्यास ने कहा—'ऐसा ही होगा'—यह प्रतिज्ञा करके और नारद का सत्कार करके उनसे विदा लेकर राजर्षि वाराणसी नगरी की ओर चल पड़े।
श्लोक 28 (14.6.28)
तत्र गत्वा यथोक्तं स पुर्या द्वारे महायशाः । कुणपं स्थापयामास नारदस्य वचः स्मरन् ॥
tatra gatvā yathoktaṃ sa puryā dvāre mahāyaśāḥ | kuṇapaṃ sthāpayāmāsa nāradasya vacaḥ smaran
वहाँ पहुँचकर महायशस्वी राजा ने नारद की बात स्मरण करते हुए, जैसा कहा गया था वैसे, नगर के द्वार पर एक शव रख दिया।
श्लोक 29 (14.6.29)
यौगपद्येन विप्रश्च पुरीद्वारमथाविशत् । ततः स कुणपं दृष्ट्वा सहसा संन्यवर्तत ॥
yaugapadyena vipraśca purīdvāramathāviśat | tataḥ sa kuṇapaṃ dṛṣṭvā sahasā saṃnyavartata
उसी समय वह ब्राह्मण नगर-द्वार में प्रविष्ट हुआ; परन्तु शव को देखकर वह सहसा लौट पड़ा।
श्लोक 30 (14.6.30)
स तं निवृत्तमालक्ष्य प्राञ्जलिः पृष्ठतोऽन्वगात् । आविक्षितो महीपालः संवर्तमुपशिक्षितुम् ॥
sa taṃ nivṛttamālakṣya prāñjaliḥ pṛṣṭhato'nvagāt | āvikṣito mahīpālaḥ saṃvartamupaśikṣitum
उन्हें लौटते देख आविक्षित-पुत्र राजा हाथ जोड़कर संवर्त से शिक्षा पाने की इच्छा से उनके पीछे-पीछे चले।
श्लोक 31 (14.6.31)
स च तं विजने दृष्ट्वा पांसुभिः कर्दमेन च । श्लेष्मणा चैव राजानं ष्ठीवनैश्च समाकिरत् ॥
sa ca taṃ vijane dṛṣṭvā pāṃsubhiḥ kardamena ca | śleṣmaṇā caiva rājānaṃ ṣṭhīvanaiśca samākirat
संवर्त ने उस राजा को निर्जन स्थान में देखकर उस पर धूल, कीचड़, कफ और थूक बरसाए।
श्लोक 32 (14.6.32)
स तथा बाध्यमानो वै संवर्तेन महीपतिः । अन्वगादेव तमृषिं प्राञ्जलिः सम्प्रसादयन् ॥
sa tathā bādhyamāno vai saṃvartena mahīpatiḥ | anvagādeva tamṛṣiṃ prāñjaliḥ samprasādayan
संवर्त के इस प्रकार सताने पर भी राजा हाथ जोड़कर उन्हें प्रसन्न करते हुए उन ऋषि के पीछे चलते ही रहे।
श्लोक 33 (14.6.33)
ततो निवर्त्य संवर्तः परिश्रान्त उपाविशत् । शीतलच्छायमासाद्य न्यग्रोधं बहुशाखिनम् ॥
tato nivartya saṃvartaḥ pariśrānta upāviśat | śītalacchāyamāsādya nyagrodhaṃ bahuśākhinam
तब संवर्त मुड़कर थके हुए एक शीतल छाया वाले, बहुत शाखाओं वाले वटवृक्ष के पास पहुँचे और वहाँ बैठ गए।