आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 7
संवर्त का मरुत्त का यज्ञ कराना स्वीकार करना
संवर्त पूछते हैं कि मरुत्त ने उन्हें कैसे पहचाना; मरुत्त बताते हैं कि नारद ने उनका पता दिया और फिर अग्नि में प्रवेश कर गए। संवर्त पहले कठोर वाणी में कहते हैं कि उनके बड़े भाई बृहस्पति के पास ही कुल के यजमान हैं और उनकी अनुमति आवश्यक है। मरुत्त बताते हैं कि इन्द्र के कारण बृहस्पति उन्हें पहले ही मना कर चुके हैं और वे संवर्त से याचना करते हैं। संवर्त चेताते हैं कि बृहस्पति और इन्द्र दोनों उनके विरोधी हो जाएँगे, दृढ़ प्रतिज्ञा माँगते हैं, और मरुत्त के प्रतिज्ञा करने पर उन्हें इन्द्र के समान बनाने वाला अक्षय धन बताने का वचन देते हैं।
संवर्त उवाच
श्लोक 1 (14.7.1)
कथमस्मि त्वया ज्ञातः केन वा कथितोस्मि ते । एतदाचक्ष्व मे तत्त्वमिच्छसे चेन्मम प्रियम् ॥
kathamasmi tvayā jñātaḥ kena vā kathitosmi te | etadācakṣva me tattvamicchase cenmama priyam
संवर्त ने कहा—"तुमने मुझे कैसे जाना, अथवा किसने तुम्हें मेरा पता बताया? यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो यह मुझे सच-सच बताओ।
श्लोक 2 (14.7.2)
सत्यं ते ब्रुवतः सर्वे सम्पत्स्यन्ते मनोरथाः । मिथ्या च ब्रुवतो मूर्धा शतधा ते स्फुटिष्यति ॥
satyaṃ te bruvataḥ sarve sampatsyante manorathāḥ | mithyā ca bruvato mūrdhā śatadhā te sphuṭiṣyati
यदि तुम सत्य बोलोगे तो तुम्हारे सब मनोरथ पूर्ण होंगे, और यदि झूठ बोलोगे तो तुम्हारा सिर सौ टुकड़े हो जाएगा।"
मरुत्त उवाच
श्लोक 3 (14.7.3)
नारदेन भवान्मह्यमाख्यातो ह्यटता पथि । गुरुपुत्रो ममेति त्वं ततो मे प्रीतिरुत्तमा ॥
nāradena bhavānmahyamākhyāto hyaṭatā pathi | guruputro mameti tvaṃ tato me prītiruttamā
मरुत्त ने कहा—"मार्ग में घूमते हुए नारद ने आपके विषय में मुझे बताया कि आप मेरे गुरु के पुत्र हैं। इसी से मुझे परम प्रसन्नता है।"
संवर्त उवाच
श्लोक 4 (14.7.4)
सत्यमेतद्भवानाह स मां जानाति सत्रिणम् । कथयस्व तदेतन्मे क्वनु सम्प्रति नारदः ॥
satyametadbhavānāha sa māṃ jānāti satriṇam | kathayasva tadetanme kvanu samprati nāradaḥ
संवर्त ने कहा—"तुमने सच कहा; वह मुझे जानता है, जो मैं कपट-वेश में छिपा हूँ। अब मुझे यह बताओ कि इस समय नारद कहाँ है?"
मरुत्त उवाच
श्लोक 5 (14.7.5)
भवन्तं कथयित्वा तु मम देवर्षिसत्तमः । ततो मामभ्यनुज्ञाय प्रविष्टो हव्यवाहनम् ॥
bhavantaṃ kathayitvā tu mama devarṣisattamaḥ | tato māmabhyanujñāya praviṣṭo havyavāhanam
मरुत्त ने कहा—"आपके विषय में मुझे बताकर देवर्षियों में श्रेष्ठ नारद ने मुझे जाने की अनुमति दी और फिर अग्नि में प्रवेश कर गए।"
व्यास उवाच
श्लोक 6 (14.7.6)
श्रुत्वा तु पार्थिवस्यैतत्संवर्तः प्रमुदं गतः । एतावदहमप्येवं शक्नुयामिति सोऽब्रवीत् ॥
śrutvā tu pārthivasyaitatsaṃvartaḥ pramudaṃ gataḥ | etāvadahamapyevaṃ śaknuyāmiti so'bravīt
व्यास ने कहा—राजा से यह सुनकर संवर्त बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, "मैं भी इतना कर सकूँ।"
श्लोक 7 (14.7.7)
ततो मरुत्तमुन्मत्तो वाचा निर्भर्त्सयन्निव । रूक्षया ब्राह्मणो राजन्पुनः पुनरथाब्रवीत् ॥
tato maruttamunmatto vācā nirbhartsayanniva | rūkṣayā brāhmaṇo rājanpunaḥ punarathābravīt
तब, हे राजन्, उन्मत्त-से बने उस ब्राह्मण ने मरुत्त को मानो डाँटते हुए रूखी वाणी में बार-बार कहा।
संवर्त उवाच
श्लोक 8 (14.7.8)
वातप्रधानेन मया स्वचित्तवशवर्तिना । एवं विकृतरूपेण कथं याजितुमिच्छसि ॥
vātapradhānena mayā svacittavaśavartinā | evaṃ vikṛtarūpeṇa kathaṃ yājitumicchasi
"मैं वात-प्रधान हूँ, अपने मन की मौज के वश में रहता हूँ और मेरा रूप भी ऐसा विकृत है। फिर तुम मुझसे यज्ञ कैसे कराना चाहते हो?
श्लोक 9 (14.7.9)
भ्राता मम समर्थश्च वासवेन च सङ्गतः । वर्तते याजने चैव तेन कर्माणि कारय ॥
bhrātā mama samarthaśca vāsavena ca saṅgataḥ | vartate yājane caiva tena karmāṇi kāraya
मेरा भाई समर्थ है, इन्द्र से उसका मेल है और वह यज्ञ कराने के कार्य में लगा हुआ है। तुम उसी से अपने कर्म कराओ।
श्लोक 10 (14.7.10)
गार्हस्थ्यं चैव याज्याश्च सर्वा गृह्याश्च देवताः । पूर्वजेन ममाक्षिप्तं शरीरं वर्जितं त्विदम् ॥
gārhasthyaṃ caiva yājyāśca sarvā gṛhyāśca devatāḥ | pūrvajena mamākṣiptaṃ śarīraṃ varjitaṃ tvidam
मेरे बड़े भाई ने मेरा गृहस्थ-जीवन, मेरे यजमान और सारे गृह-देवता मुझसे छीन लिए हैं; केवल यह शरीर ही मेरे लिए छोड़ा गया है।
श्लोक 11 (14.7.11)
नाहं तेनाननुज्ञातस्त्वामाविक्षित कर्हिचित् । याजयेयं कथंचिद्वै स हि पूज्यतमो मम ॥
nāhaṃ tenānanujñātastvāmāvikṣita karhicit | yājayeyaṃ kathaṃcidvai sa hi pūjyatamo mama
हे आविक्षित-पुत्र, उसकी अनुमति के बिना मैं किसी प्रकार भी तुम्हारा यज्ञ नहीं करा सकता, क्योंकि वह मेरे लिए सबसे अधिक पूज्य है।
श्लोक 12 (14.7.12)
स त्वं बृहस्पतिं गच्छ तमनुज्ञाप्य चाव्रज । ततोऽहं याजयिष्ये त्वां यदि यष्टुमिहेच्छसि ॥
sa tvaṃ bṛhaspatiṃ gaccha tamanujñāpya cāvraja | tato'haṃ yājayiṣye tvāṃ yadi yaṣṭumihecchasi
इसलिए तुम बृहस्पति के पास जाओ और उनकी अनुमति लेकर लौट आओ। तब यदि तुम यहाँ यज्ञ करना चाहते हो तो मैं तुम्हारा यज्ञ करा दूँगा।"
मरुत्त उवाच
श्लोक 13 (14.7.13)
बृहस्पतिं गतः पूर्वमहं संवर्त तच्छृणु । न मां कामयते याज्यं मुनिर्वासववारितः ॥
bṛhaspatiṃ gataḥ pūrvamahaṃ saṃvarta tacchṛṇu | na māṃ kāmayate yājyaṃ munirvāsavavāritaḥ
मरुत्त ने कहा—"हे संवर्त, मैं पहले बृहस्पति के पास गया था; वह सुनिए। इन्द्र द्वारा रोके जाने के कारण वे मुनि मुझे अपना यजमान बनाना नहीं चाहते।
श्लोक 14 (14.7.14)
अमरं याज्यमासाद्य याजयिष्ये न मानुषम् । शक्रेण प्रतिषिद्धोऽहं मरुत्तं मा स्म याजये ॥
amaraṃ yājyamāsādya yājayiṣye na mānuṣam | śakreṇa pratiṣiddho'haṃ maruttaṃ mā sma yājaye
'अमर देवता को यजमान बनाकर मैं किसी मनुष्य का यज्ञ नहीं कराऊँगा। इन्द्र ने मुझे रोक दिया है कि मैं मरुत्त का यज्ञ न कराऊँ।'
श्लोक 15 (14.7.15)
स्पर्धते हि मया विप्र सदा हि स तु पार्थिवः । एवमस्त्विति चाप्युक्तो भ्रात्रा ते बलसूदनः ॥
spardhate hi mayā vipra sadā hi sa tu pārthivaḥ | evamastviti cāpyukto bhrātrā te balasūdanaḥ
'हे विप्र, वह राजा सदा मुझसे स्पर्धा करता है'—ऐसा कहे जाने पर आपके भाई ने बल का वध करने वाले इन्द्र से कहा, 'ऐसा ही हो।'
श्लोक 16 (14.7.16)
स मामधिगतं प्रेम्णा याज्यत्वे न बुभूषति । देवराजं समाश्रित्य तद्विद्धि मुनिपुङ्गव ॥
sa māmadhigataṃ premṇā yājyatve na bubhūṣati | devarājaṃ samāśritya tadviddhi munipuṅgava
इस प्रकार प्रेम से उनके पास जाने पर भी, देवराज इन्द्र का आश्रय लेने के कारण वे मुझे अपना यजमान बनाना नहीं चाहते। हे मुनिश्रेष्ठ, यह जान लीजिए।
श्लोक 17 (14.7.17)
सोहमिच्छामि भवता सर्वस्वेनापि याजितुम् । कामये समतिक्रान्तुं वासवं त्वत्कृतैर्गुणैः ॥
sohamicchāmi bhavatā sarvasvenāpi yājitum | kāmaye samatikrāntuṃ vāsavaṃ tvatkṛtairguṇaiḥ
इसलिए मैं अपना सर्वस्व देकर भी आपसे यज्ञ कराना चाहता हूँ। आपके द्वारा अर्जित गुणों के बल से मैं इन्द्र से भी आगे बढ़ना चाहता हूँ।
श्लोक 18 (14.7.18)
न हि मे वर्तते बुद्धिर्गन्तुं ब्रह्मन्बृहस्पतिम् । प्रत्याख्यातो हि तेनास्मि तथाऽनपकृते सति ॥
na hi me vartate buddhirgantuṃ brahmanbṛhaspatim | pratyākhyāto hi tenāsmi tathā'napakṛte sati
हे ब्रह्मन्, अब बृहस्पति के पास जाने की मेरी इच्छा नहीं होती, क्योंकि मैंने उनका कोई अपराध नहीं किया था, फिर भी उन्होंने मुझे ठुकरा दिया।"
संवर्त उवाच
श्लोक 19 (14.7.19)
चिकीर्षसि यथाकामं सर्वमेतत्त्वयि ध्रुवम् । यदि सर्वानभिप्रायान्कर्तासि मम पार्थिव ॥
cikīrṣasi yathākāmaṃ sarvametattvayi dhruvam | yadi sarvānabhiprāyānkartāsi mama pārthiva
संवर्त ने कहा—"तुम अपनी इच्छा के अनुसार करना चाहते हो; यह सब निश्चय ही तुम्हारे हाथ में है, यदि हे राजन्, तुम मेरे सभी अभिप्राय पूरे करो।
श्लोक 20 (14.7.20)
याज्यमानं मया हि त्वां बृहस्पतिपुरन्दरौ । द्विषेतां समभिक्रुद्धावेतदेकं समर्थये ॥
yājyamānaṃ mayā hi tvāṃ bṛhaspatipurandarau | dviṣetāṃ samabhikruddhāvetadekaṃ samarthaye
यदि मैं तुम्हारा यज्ञ कराऊँ तो बृहस्पति और इन्द्र दोनों अत्यन्त क्रुद्ध होकर तुमसे द्वेष करेंगे। मैं तुमसे केवल इसी एक बात पर बल देता हूँ।
श्लोक 21 (14.7.21)
स्थैर्यमत्र कथं मे स्यात्स त्वं निःसंशयं कुरु । कुपितस्त्वां न हीदानीं भस्म कुर्या सबान्धवम् ॥
sthairyamatra kathaṃ me syātsa tvaṃ niḥsaṃśayaṃ kuru | kupitastvāṃ na hīdānīṃ bhasma kuryā sabāndhavam
इस विषय में मुझे तुम्हारी दृढ़ता का भरोसा कैसे हो? इसलिए इसे निस्सन्देह निश्चित कर दो; क्योंकि यदि मैं क्रुद्ध हो जाऊँ तो अभी तुम्हें बन्धु-बान्धवों सहित भस्म कर दूँगा।"
मरुत्त उवाच
श्लोक 22 (14.7.22)
यावत्तपेत्सहस्रांशुस्तिष्ठेरंश्चापि पर्वताः । तावल्लोकान्न लभेयं त्यजेयं सङ्गतं यदि ॥
yāvattapetsahasrāṃśustiṣṭheraṃścāpi parvatāḥ | tāvallokānna labheyaṃ tyajeyaṃ saṅgataṃ yadi
मरुत्त ने कहा—"जब तक सहस्रांशु सूर्य तपता रहे और पर्वत खड़े रहें, तब तक यदि मैं हमारा सम्बन्ध तोड़ूँ तो मैं पुण्यलोकों को न पाऊँ।
श्लोक 23 (14.7.23)
मा चापि शुभबुद्धित्वं लभेयमिह कर्हिचित् । विषयैः सङ्गतं चास्तु त्यजेयं सङ्गतं यदि ॥
mā cāpi śubhabuddhitvaṃ labheyamiha karhicit | viṣayaiḥ saṅgataṃ cāstu tyajeyaṃ saṅgataṃ yadi
यदि मैं हमारा सम्बन्ध तोड़ूँ तो इस लोक में मुझे कभी शुभ बुद्धि प्राप्त न हो और मैं विषयों में ही बँधा रहूँ।"
संवर्त उवाच
श्लोक 24 (14.7.24)
आविक्षित शुभा बुद्धिर्वर्ततां तव कर्मसु । याजनं हि ममाप्येव वर्तते हृदि पार्थिव ॥
āvikṣita śubhā buddhirvartatāṃ tava karmasu | yājanaṃ hi mamāpyeva vartate hṛdi pārthiva
संवर्त ने कहा—"हे आविक्षित-पुत्र, तुम्हारे कर्मों में तुम्हारी बुद्धि शुभ रहे; हे राजन्, तुम्हारा यज्ञ कराने की इच्छा मेरे हृदय में भी है।
श्लोक 25 (14.7.25)
अभिधास्ये च ते राजन्नक्षयं द्रव्यमुत्तमम् । येन देवान्सगन्धर्वाञ्शक्रं चाभिभविष्यसि ॥
abhidhāsye ca te rājannakṣayaṃ dravyamuttamam | yena devānsagandharvāñśakraṃ cābhibhaviṣyasi
और हे राजन्, मैं तुम्हें एक उत्तम अक्षय धन का पता बताऊँगा, जिससे तुम देवताओं, गन्धर्वों और इन्द्र को भी जीत लोगे।
श्लोक 26 (14.7.26)
न तु मे वर्तते बुद्धिर्धने याज्येषु वा पुनः । विप्रियं तु करिष्यामि भ्रातुश्चेन्द्रस्य चोभयोः ॥
na tu me vartate buddhirdhane yājyeṣu vā punaḥ | vipriyaṃ tu kariṣyāmi bhrātuścendrasya cobhayoḥ
पर मेरा मन न धन में है और न यजमानों में। फिर भी मैं अपने भाई और इन्द्र, दोनों का अप्रिय करूँगा।
श्लोक 27 (14.7.27)
गमयिष्यामि शक्रेण समतामपि ते ध्रुवम् । प्रियं च ते करिष्यामि सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
gamayiṣyāmi śakreṇa samatāmapi te dhruvam | priyaṃ ca te kariṣyāmi satyametadbravīmi te
मैं तुम्हें निश्चय ही इन्द्र के समान बना दूँगा और तुम्हारा प्रिय करूँगा। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।"