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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 8

संवर्त का मरुत्त को मुञ्जवान् पर्वत पर शिव के स्वर्ण के लिए भेजना

संवर्त हिमालय के मुञ्जवान् पर्वत का वर्णन करते हैं, जहाँ शिव उमा के साथ देवताओं और अपने गणों के बीच निवास करते हैं और कुबेर के अनुचर सोने की खानों की रक्षा करते हैं। वे मरुत्त को वहाँ जाकर शिव के नामों की लम्बी सूची से उनकी स्तुति करने और अपने लोगों के साथ स्वर्ण लाने को कहते हैं। मरुत्त ऐसा ही करते हैं, शिव की कृपा से धन पाते हैं और यज्ञ के लिए सोने के पात्र और शालाएँ बनवाते हैं। यह सुनकर बृहस्पति ईर्ष्या से क्षीण हो जाते हैं और इन्द्र उनके पास आते हैं।

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

संवर्त उवाच

श्लोक 1 (14.8.1)

गिरेर्हिमवतः पृष्ठे मुञ्जवान्नाम पर्वतः । तप्यते यत्र भगवांस्तपो नित्यमुमापतिः ॥

girerhimavataḥ pṛṣṭhe muñjavānnāma parvataḥ | tapyate yatra bhagavāṃstapo nityamumāpatiḥ

संवर्त ने कहा—"हिमालय की पीठ पर मुञ्जवान् नाम का एक पर्वत है, जहाँ भगवान् उमापति नित्य तप करते हैं—

श्लोक 2 (14.8.2)

वनस्पतीनां मूलेषु शृङ्गेषु विषमेषु च । गुहासु शैलराजस्य यथाकामं यथासुखम् ॥

vanaspatīnāṃ mūleṣu śṛṅgeṣu viṣameṣu ca | guhāsu śailarājasya yathākāmaṃ yathāsukham

उस पर्वतराज के वृक्षों की जड़ों में, ऊबड़-खाबड़ शिखरों पर और गुफाओं में, जहाँ उनकी इच्छा हो और जैसे उन्हें सुख मिले।

श्लोक 3 (14.8.3)

उमासहायो भगवान्यत्र नित्यं महेश्वरः । आस्ते शूली महातेजा नानाभूतगणावृतः ॥

umāsahāyo bhagavānyatra nityaṃ maheśvaraḥ | āste śūlī mahātejā nānābhūtagaṇāvṛtaḥ

वहाँ त्रिशूलधारी महातेजस्वी भगवान् महेश्वर उमा के साथ नित्य निवास करते हैं और अनेक प्रकार के भूतगणों से घिरे रहते हैं।

श्लोक 4 (14.8.4)

तत्र रुद्राश्च साध्याश्च विश्वेऽथ वसवस्तथा । यमश्च वरुणश्चैव कुबेरश्च सहानुगः ॥

tatra rudrāśca sādhyāśca viśve'tha vasavastathā | yamaśca varuṇaścaiva kuberaśca sahānugaḥ

वहाँ रुद्र, साध्य, विश्वेदेव और वसु, यम और वरुण, तथा अपने अनुचरों सहित कुबेर रहते हैं;

श्लोक 5 (14.8.5)

भूतानि च पिशाचाश्च नासत्यावपि चाश्विनौ । गन्धर्वाप्सरसश्चैव यक्षा देवर्षयस्तथा ॥

bhūtāni ca piśācāśca nāsatyāvapi cāśvinau | gandharvāpsarasaścaiva yakṣā devarṣayastathā

भूत और पिशाच, नासत्य नामक दोनों अश्विनीकुमार, गन्धर्व और अप्सराएँ, यक्ष तथा देवर्षि—

श्लोक 6 (14.8.6)

आदित्या मरुतश्चैव यातुधानाश्च सर्वशः । उपासन्ते महात्मानं बहुरूपमुमापतिम् ॥

ādityā marutaścaiva yātudhānāśca sarvaśaḥ | upāsante mahātmānaṃ bahurūpamumāpatim

आदित्य, मरुद्गण और सब यातुधान—ये सभी बहुरूपधारी उन महात्मा उमापति की उपासना करते हैं।

श्लोक 7 (14.8.7)

रमते भगवांस्तत्र कुबेरानुचरैः सह । विकृतैर्विकृताकारैः क्रीडद्भिः पृथिवीपते ॥

ramate bhagavāṃstatra kuberānucaraiḥ saha | vikṛtairvikṛtākāraiḥ krīḍadbhiḥ pṛthivīpate

हे पृथ्वीपति, वहाँ भगवान् कुबेर के उन अनुचरों के साथ रमण करते हैं जो विकृत और विकृत आकार वाले हैं और क्रीड़ा करते रहते हैं।

श्लोक 8 (14.8.8)

श्रिया ज्वलन्दृश्यते वै बालादित्यसमद्युतिः । न रूपं शक्यते तस्य संस्थानं वा कदाचन । निर्देष्टुं प्राणिभिः कैश्चित्प्राकृतैर्मांसलोचनैः ॥

śriyā jvalandṛśyate vai bālādityasamadyutiḥ | na rūpaṃ śakyate tasya saṃsthānaṃ vā kadācana | nirdeṣṭuṃ prāṇibhiḥ kaiścitprākṛtairmāṃsalocanaiḥ

वे तेज से जाज्वल्यमान दिखाई देते हैं और उनकी कान्ति नए उगे सूर्य के समान है। साधारण मांस की आँखों वाला कोई भी प्राणी उनके रूप या आकार का वर्णन कभी नहीं कर सकता।

श्लोक 9 (14.8.9)

नोष्णं न शिशिरं तत्र न वायुर्न च भास्करः । न जरा क्षुत्पिपासे वा न मृत्युर्न भयं नृप ॥

noṣṇaṃ na śiśiraṃ tatra na vāyurna ca bhāskaraḥ | na jarā kṣutpipāse vā na mṛtyurna bhayaṃ nṛpa

वहाँ न गरमी है न सरदी, न वायु है न सूर्य; वहाँ न बुढ़ापा है, न भूख-प्यास, न मृत्यु और न भय, हे राजन्।

श्लोक 10 (14.8.10)

तस्य शैलस्य पार्श्वेषु सर्वेषु जयतांवर । धातवो जातरूपस्य रश्मयः सवितुर्यथा ॥

tasya śailasya pārśveṣu sarveṣu jayatāṃvara | dhātavo jātarūpasya raśmayaḥ savituryathā

हे विजेताओं में श्रेष्ठ, उस पर्वत की सभी ढालों पर सोने की धातुएँ हैं, जो सूर्य की किरणों जैसी चमकती हैं।

श्लोक 11 (14.8.11)

रक्ष्यन्ते ते कुबेरस्य सहायैरुद्यतायुधैः । चिकीर्षद्भिः प्रियं राजन्कुबेरस्य महात्मनः ॥

rakṣyante te kuberasya sahāyairudyatāyudhaiḥ | cikīrṣadbhiḥ priyaṃ rājankuberasya mahātmanaḥ

हे राजन्, उनकी रक्षा कुबेर के सहायक शस्त्र उठाए हुए करते हैं, जो महात्मा कुबेर का प्रिय करना चाहते हैं।

श्लोक 12 (14.8.12)

तत्र गत्वा समन्वास्य महायोगेश्वरं शिवम् । कुरु प्रणामं राजर्षे भक्त्या परमया युतः ॥

tatra gatvā samanvāsya mahāyogeśvaraṃ śivam | kuru praṇāmaṃ rājarṣe bhaktyā paramayā yutaḥ

वहाँ जाकर महायोगेश्वर शिव के पास बैठो और हे राजर्षे, परम भक्ति से उन्हें प्रणाम करो।

श्लोक 13 (14.8.13)

तस्मै भगवते कृत्वा नमः शर्वाय वेधसे । एभिस्तं नामभिर्देवं सर्वविद्याधरं स्तुहि ॥

tasmai bhagavate kṛtvā namaḥ śarvāya vedhase | ebhistaṃ nāmabhirdevaṃ sarvavidyādharaṃ stuhi

भगवान् शर्व, विधाता को प्रणाम करके, इन नामों से उन सर्वविद्याधर देव की स्तुति करो—

श्लोक 14 (14.8.14)

रुद्राय शितिकण्ठाय सुरूपाय सुवर्चसे । कपर्दिने करालाय हर्यक्ष्णे वरदाय च ॥

rudrāya śitikaṇṭhāya surūpāya suvarcase | kapardine karālāya haryakṣṇe varadāya ca

रुद्र को, नीलकण्ठ (शितिकण्ठ) को, सुन्दर रूप वाले को, तेजस्वी को; जटाधारी कपर्दी को, भयंकर को, पिंगल नेत्रों वाले को और वर देने वाले को—

श्लोक 15 (14.8.15)

त्र्यक्ष्णे पूष्णो दन्तभिदे वामनाय शिवाय च । याम्यायाव्यक्तरूपाय सद्वृत्ते शङ्कराय च ॥

tryakṣṇe pūṣṇo dantabhide vāmanāya śivāya ca | yāmyāyāvyaktarūpāya sadvṛtte śaṅkarāya ca

त्र्यक्ष को, पूषा के दाँत तोड़ने वाले को, वामन को और शिव को; याम्य को, अव्यक्तरूप को, सदाचारी को और शंकर को—

श्लोक 16 (14.8.16)

क्षेम्याय हरिकेशाय स्थाणवे पुरुषाय च । हरिनेत्राय मुण्डाय क्रुद्धायोत्तरणाय च ॥

kṣemyāya harikeśāya sthāṇave puruṣāya ca | harinetrāya muṇḍāya kruddhāyottaraṇāya ca

कल्याणकारी को, पिंगल केशों वाले को, स्थाणु को और पुरुष को; हरे नेत्रों वाले को, मुण्डित को, क्रुद्ध को और पार उतारने वाले को—

श्लोक 17 (14.8.17)

भास्वराय सुतीर्थाय देवदेवाय रंहसे । उष्णीषिणे सुवक्त्राय सहस्राक्षाय मीढुषे ॥

bhāsvarāya sutīrthāya devadevāya raṃhase | uṣṇīṣiṇe suvaktrāya sahasrākṣāya mīḍhuṣe

भास्वर को, उत्तम तीर्थ वाले को, देवों के देव को, वेगवान् को; पगड़ी वाले को, सुन्दर मुख वाले को, सहस्र नेत्रों वाले को और वर्षा करने वाले (दानी) को—

श्लोक 18 (14.8.18)

गिरिशाय प्रशान्ताय यतये चीरवाससे । बिल्वदण्डाय सिद्धाय सर्वदण्डधराय च ॥

giriśāya praśāntāya yataye cīravāsase | bilvadaṇḍāya siddhāya sarvadaṇḍadharāya ca

गिरीश को, प्रशान्त को, यति को, वल्कल-वस्त्र पहनने वाले को; बिल्व-दण्ड धारण करने वाले को, सिद्ध को और सब दण्डों को धारण करने वाले को—

श्लोक 19 (14.8.19)

मृगव्याधाय महते धन्विनेऽथ भवाय च । वराय सोमवक्त्राय सिद्धमन्त्राय चक्षुषे ॥

mṛgavyādhāya mahate dhanvine'tha bhavāya ca | varāya somavaktrāya siddhamantrāya cakṣuṣe

मृगव्याध को, महान् को, धनुर्धारी को और भव को; श्रेष्ठ को, चन्द्रमुख को, सिद्धमन्त्र को और चक्षु को—

श्लोक 20 (14.8.20)

हिरण्यबाहवे राजन्नुग्राय पतये दिशाम् । लेलिहानाय गोष्ठाय सिद्धमन्त्राय वृष्णये ॥

hiraṇyabāhave rājannugrāya pataye diśām | lelihānāya goṣṭhāya siddhamantrāya vṛṣṇaye

हे राजन्, हिरण्यबाहु को, उग्र को, दिशाओं के स्वामी को; लेलिहान को, गोष्ठ को, सिद्धमन्त्र को और वर्षक को—

श्लोक 21 (14.8.21)

पशूनां पतये चैव भूतानां पतये नमः । वृषाय मातृभक्ताय सेनान्ये मध्यमाय च ॥

paśūnāṃ pataye caiva bhūtānāṃ pataye namaḥ | vṛṣāya mātṛbhaktāya senānye madhyamāya ca

पशुओं के पति और भूतों के पति को नमस्कार है; वृष को, मातृभक्त को, सेनापति को और मध्यम को—

श्लोक 22 (14.8.22)

अभिवक्त्राय पतये सर्वदेवमयाय च । स्रुवहस्ताय पतये धन्विने भार्गवाय च । अजाय कृष्णनेत्राय विरूपाक्षाय चैव ह ॥

abhivaktrāya pataye sarvadevamayāya ca | sruvahastāya pataye dhanvine bhārgavāya ca | ajāya kṛṣṇanetrāya virūpākṣāya caiva ha

अभिवक्त्र को, पति को और सर्वदेवमय को; स्रुवा हाथ में लिए हुए पति को, धनुर्धारी को, भार्गव को; अज को, कृष्ण नेत्रों वाले को और विरूपाक्ष को—

श्लोक 23 (14.8.23)

तीक्ष्णदंष्ट्राय तीक्ष्णाय वैश्वानरमुखाय च । महात्मने चानङ्गाय सर्वाय पतये विशाम् ॥

tīkṣṇadaṃṣṭrāya tīkṣṇāya vaiśvānaramukhāya ca | mahātmane cānaṅgāya sarvāya pataye viśām

तीखी दाढ़ों वाले को, तीक्ष्ण को, वैश्वानर-मुख वाले को; महात्मा को, अनङ्ग को और प्रजाओं के पति सर्व को—

श्लोक 24 (14.8.24)

तथा रुद्राय पतये पृथवे कृत्तिवाससे । विलोहिताय दीप्ताय दीप्ताक्षाय महौजसे । वसुरेतःसुवपुषे पृथवे कृत्तिवाससे ॥

tathā rudrāya pataye pṛthave kṛttivāsase | vilohitāya dīptāya dīptākṣāya mahaujase | vasuretaḥsuvapuṣe pṛthave kṛttivāsase

और रुद्र को, पति को, विशाल को, चर्मवस्त्रधारी को; गहरे लाल को, दीप्त को, दीप्त नेत्रों वाले को, महातेजस्वी को; वसुरेता को, सुन्दर शरीर वाले को, विशाल को और चर्मवस्त्रधारी को—

श्लोक 25 (14.8.25)

कपालमालिने चैव सुवर्णमुकुटाय च । महादेवाय कृष्णाय त्र्यम्बकायानघाय च ॥

kapālamāline caiva suvarṇamukuṭāya ca | mahādevāya kṛṣṇāya tryambakāyānaghāya ca

कपाल-माला पहनने वाले को, स्वर्ण-मुकुट वाले को; महादेव को, कृष्ण को, त्र्यम्बक को और निष्पाप को—

श्लोक 26 (14.8.26)

क्रोधनायानृशंसाय मृदवे बाहुशालिने । दण्डिने तप्ततपसे तथैवाक्रूरकर्मणे ॥

krodhanāyānṛśaṃsāya mṛdave bāhuśāline | daṇḍine taptatapase tathaivākrūrakarmaṇe

क्रोधी को, दयालु को, मृदु को, बाहुबली को; दण्डधारी को, तप्त तप वाले को और अक्रूरकर्मा को—

श्लोक 27 (14.8.27)

सहस्रशिरसे चैव सहस्रचरणाय च । नमः स्वधास्वरूपाय बहुरूपाय दंष्ट्रिणे ॥

sahasraśirase caiva sahasracaraṇāya ca | namaḥ svadhāsvarūpāya bahurūpāya daṃṣṭriṇe

सहस्र सिर वाले और सहस्र चरणों वाले को; स्वधा-स्वरूप को, बहुरूप को, दंष्ट्रावान् को नमस्कार है।

श्लोक 28 (14.8.28)

पिनाकिनं महादेवं महाभोगिनमव्ययम् । त्रिशूलहस्तं वरदं त्र्यम्बकं भुवनेश्वरम् ॥

pinākinaṃ mahādevaṃ mahābhoginamavyayam | triśūlahastaṃ varadaṃ tryambakaṃ bhuvaneśvaram

पिनाकधारी, महादेव, महाभोगी, अविनाशी, हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले, वरदाता, त्र्यम्बक और भुवनेश्वर को—

श्लोक 29 (14.8.29)

त्रिपुरघ्नं त्रिनयनं त्रिलोकेशं महौजसम् । प्रभवं सर्वभूतानां दातारं धरणीधरम् ॥

tripuraghnaṃ trinayanaṃ trilokeśaṃ mahaujasam | prabhavaṃ sarvabhūtānāṃ dātāraṃ dharaṇīdharam

त्रिपुर का नाश करने वाले, त्रिनेत्र, त्रिलोकेश, महाबली, सब भूतों के उत्पत्ति-स्थान, दाता और पृथ्वी को धारण करने वाले को—

श्लोक 30 (14.8.30)

ईशानं शङ्करं सर्वं शिवं विश्वेश्वरं भवम् । उमापतिं पशुपतिं विश्वरूपं महेश्वरम् ॥

īśānaṃ śaṅkaraṃ sarvaṃ śivaṃ viśveśvaraṃ bhavam | umāpatiṃ paśupatiṃ viśvarūpaṃ maheśvaram

ईशान, शंकर, सर्व, शिव, विश्वेश्वर, भव; उमापति, पशुपति, विश्वरूप, महेश्वर को—

श्लोक 31 (14.8.31)

विरूपाक्षं दशभुजं विष्यन्दं गोवृषध्वजम् । उग्रं स्थाणुं शिवं रौद्रं शर्वं गौरीशमीश्वरम् ॥

virūpākṣaṃ daśabhujaṃ viṣyandaṃ govṛṣadhvajam | ugraṃ sthāṇuṃ śivaṃ raudraṃ śarvaṃ gaurīśamīśvaram

विरूपाक्ष, दशभुज, विष्यन्द, वृषभ-ध्वज वाले; उग्र, स्थाणु, शिव, रौद्र, शर्व, गौरीश और ईश्वर को—

श्लोक 32 (14.8.32)

शितिकण्ठमजं शुक्रं पृथुं पृथुहरं वरम् । विश्वरूपं विरूपाक्षं बहुरूपमुमापतिम् ॥

śitikaṇṭhamajaṃ śukraṃ pṛthuṃ pṛthuharaṃ varam | viśvarūpaṃ virūpākṣaṃ bahurūpamumāpatim

शितिकण्ठ, अज, शुक्र, पृथु, पृथुहर, श्रेष्ठ; विश्वरूप, विरूपाक्ष और बहुरूप उमापति को—

श्लोक 33 (14.8.33)

प्रणम्य शिरसा देवमनङ्गाङ्गहरं हरम् । शरण्यं शरणं याहि महादेवं चतुर्मुखम् ॥

praṇamya śirasā devamanaṅgāṅgaharaṃ haram | śaraṇyaṃ śaraṇaṃ yāhi mahādevaṃ caturmukham

अनङ्ग (कामदेव) के शरीर का नाश करने वाले उन देव हर को सिर झुकाकर प्रणाम करो और शरण देने वाले चतुर्मुख महादेव की शरण में जाओ।

श्लोक 34 (14.8.34)

विरोचमानं वपुषा दिव्याभरणभूषितम् । अनाद्यन्तमजं शंभुं सर्वव्यापिनमीश्वरम् ॥

virocamānaṃ vapuṣā divyābharaṇabhūṣitam | anādyantamajaṃ śaṃbhuṃ sarvavyāpinamīśvaram

'अपने शरीर से देदीप्यमान, दिव्य आभूषणों से सजे, आदि-अन्त से रहित, अजन्मा, शम्भु, सर्वव्यापी ईश्वर को—

श्लोक 35 (14.8.35)

निस्त्रैगुण्यं निरुद्वेगं निर्मलं निधिमोजसाम् । प्रणम्य प्राञ्जलिः शर्वं प्रयामि शरणं हरम् ॥

nistraiguṇyaṃ nirudvegaṃ nirmalaṃ nidhimojasām | praṇamya prāñjaliḥ śarvaṃ prayāmi śaraṇaṃ haram

तीनों गुणों से परे, उद्वेग-रहित, निर्मल, ओज के निधि—उन शर्व को हाथ जोड़कर प्रणाम करके मैं हर की शरण में जाता हूँ।

श्लोक 36 (14.8.36)

सम्मान्यं निश्चलं नित्यमकारुण्यमलेपनम् । अध्यात्मवेदमासाद्य प्रयामि शरणं मुहुः ॥

sammānyaṃ niścalaṃ nityamakāruṇyamalepanam | adhyātmavedamāsādya prayāmi śaraṇaṃ muhuḥ

सम्माननीय, अचल, नित्य, करुणा से परे, निर्लेप—अध्यात्मज्ञान को पाकर मैं बार-बार उनकी शरण में जाता हूँ।

श्लोक 37 (14.8.37)

यस्य नित्यं विदुः स्थानं मोक्षमध्यात्मचिन्तकाः । योगीशं तत्वमार्गस्थाः कैवल्यं पदमक्षरम् ॥

yasya nityaṃ viduḥ sthānaṃ mokṣamadhyātmacintakāḥ | yogīśaṃ tatvamārgasthāḥ kaivalyaṃ padamakṣaram

जिनके नित्य स्थान को आत्मचिन्तक मोक्ष के रूप में जानते हैं; जो योगीश्वर हैं और तत्त्व-मार्ग पर स्थित लोगों के लिए अक्षर कैवल्य-पद हैं।

श्लोक 38 (14.8.38)

यं विदुः सङ्गिनं मुक्ताः सामान्यं समदर्शिनः । तं प्रपद्ये जगद्योनिमयोनिं निर्गुणात्मकम् ॥

yaṃ viduḥ saṅginaṃ muktāḥ sāmānyaṃ samadarśinaḥ | taṃ prapadye jagadyonimayoniṃ nirguṇātmakam

जिन्हें समदर्शी मुक्त जन सबसे जुड़ा हुआ और सबके लिए समान जानते हैं, उन जगत् के योनि, स्वयं अयोनि और निर्गुणस्वरूप की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 39 (14.8.39)

असृजद्यस्तु भूतादीन्सप्त लोकान्सनातनान् । स्थितः सत्योपरि स्थाणुस्तं प्रपद्ये सनातनम् ॥

asṛjadyastu bhūtādīnsapta lokānsanātanān | sthitaḥ satyopari sthāṇustaṃ prapadye sanātanam

जिन्होंने भूतादि और सात सनातन लोकों की सृष्टि की, और जो सत्य के भी ऊपर स्थाणु रूप में स्थित हैं, उन सनातन की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 40 (14.8.40)

भक्तानां सुलभं तं हि दुर्लभं दूरपातिनाम् । अदूरस्थममुं देवं प्रकृतेः परतः स्थितम् ॥

bhaktānāṃ sulabhaṃ taṃ hi durlabhaṃ dūrapātinām | adūrasthamamuṃ devaṃ prakṛteḥ parataḥ sthitam

वे भक्तों के लिए सुलभ हैं और दूर भटके हुओं के लिए दुर्लभ; ये देव प्रकृति से परे स्थित होकर भी दूर नहीं हैं।

श्लोक 41 (14.8.41)

नमामि सर्वलोकस्थं व्रजामि शरणं शिवम् । एवं कृत्वा नमस्तस्मै महादेवाय रंहसे । महात्मने क्षितिपते तत्सुवर्णमवाप्स्यसि ॥

namāmi sarvalokasthaṃ vrajāmi śaraṇaṃ śivam | evaṃ kṛtvā namastasmai mahādevāya raṃhase | mahātmane kṣitipate tatsuvarṇamavāpsyasi

जो समस्त लोकों में स्थित हैं उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ; मैं शिव की शरण में जाता हूँ।' हे क्षितिपते, वेगवान् महात्मा महादेव को इस प्रकार नमस्कार करके तुम वह सुवर्ण प्राप्त करोगे।

श्लोक 42 (14.8.42)

लभन्ते गाणपत्यं च तदेकाग्रा हि मानवाः । किं पुनः स्वर्णभाण्डानि तस्मात्त्वं गच्छ मा चिरं ॥

labhante gāṇapatyaṃ ca tadekāgrā hi mānavāḥ | kiṃ punaḥ svarṇabhāṇḍāni tasmāttvaṃ gaccha mā ciraṃ

जो मनुष्य एकाग्र होकर उनमें लगे रहते हैं वे गणों का आधिपत्य तक पा लेते हैं; फिर सोने के पात्रों की तो बात ही क्या! इसलिए तुम जाओ, देर मत करो;

श्लोक 43 (14.8.43)

महत्तरं हि ते लाभं हस्त्यश्वोष्ट्रादिभिः सह । सुवर्णमाहरिष्यन्तस्तत्र गच्छन्तु ते नराः ॥

mahattaraṃ hi te lābhaṃ hastyaśvoṣṭrādibhiḥ saha | suvarṇamāhariṣyantastatra gacchantu te narāḥ

क्योंकि हाथी, घोड़े, ऊँट आदि के साथ तुम्हें इससे कहीं बड़ा लाभ होगा। तुम्हारे लोग वहाँ जाकर सोना ले आएँ।"

व्यास उवाच

श्लोक 44 (14.8.44)

इत्युक्तः स वचस्तस्य चक्रे कारन्धमात्मजः । गङ्गाधरं नमस्कृत्य लब्धवान्धनमुत्तमम् ॥

ityuktaḥ sa vacastasya cakre kārandhamātmajaḥ | gaṅgādharaṃ namaskṛtya labdhavāndhanamuttamam

व्यास ने कहा—इस प्रकार कहे जाने पर करन्धम के वंशज के पुत्र मरुत्त ने उनके वचन के अनुसार किया; गंगाधर को नमस्कार करके उन्होंने उत्तम धन प्राप्त किया,

श्लोक 45 (14.8.45)

कुबेर इव तत्प्राप्य महादेवप्रसादतः । ततोऽतिमानुषं सर्वं चक्रे यज्ञस्य संविधिम् ॥

kubera iva tatprāpya mahādevaprasādataḥ | tato'timānuṣaṃ sarvaṃ cakre yajñasya saṃvidhim

और महादेव की कृपा से उसे पाकर वे कुबेर के समान हो गए। फिर उन्होंने यज्ञ की सारी तैयारियाँ मनुष्य की सामर्थ्य से परे पैमाने पर कीं।

श्लोक 46 (14.8.46)

सौवर्णानि च भाण्डानि संचक्रुस्तत्र शिल्पिनः । शालाश्च सर्वसम्भारांस्तत्र संवर्तशासनात् ॥

sauvarṇāni ca bhāṇḍāni saṃcakrustatra śilpinaḥ | śālāśca sarvasambhārāṃstatra saṃvartaśāsanāt

वहाँ शिल्पियों ने संवर्त की आज्ञा से सोने के पात्र तथा शालाएँ और सब सामग्री तैयार की।

श्लोक 47 (14.8.47)

बृहस्पतिस्तु तां श्रुत्वा मरुत्तस्य महीपतेः । समृद्धिमति देवेभ्यः सन्तापमकरोद्भृशम् ॥

bṛhaspatistu tāṃ śrutvā maruttasya mahīpateḥ | samṛddhimati devebhyaḥ santāpamakarodbhṛśam

राजा मरुत्त की देवताओं से भी बढ़कर समृद्धि के विषय में सुनकर बृहस्पति बहुत सन्तप्त हुए।

श्लोक 48 (14.8.48)

सन्तप्यमानो वैवर्ण्यं कृशत्वं चागमत्परम् । भविष्यति हि मे शत्रुः संवर्तो वसुमानिति ॥

santapyamāno vaivarṇyaṃ kṛśatvaṃ cāgamatparam | bhaviṣyati hi me śatruḥ saṃvarto vasumāniti

सन्तप्त होकर वे पीले पड़ गए और बहुत दुबले हो गए; वे सोचते थे—"धनवान् संवर्त मेरा शत्रु हो जाएगा।"

श्लोक 49 (14.8.49)

तं श्रुत्वा भृशसंतप्तं देवराजो बृहस्पतिम् । अभिगम्यामरवृतः प्रोवाचेदं वचस्तदा ॥

taṃ śrutvā bhṛśasaṃtaptaṃ devarājo bṛhaspatim | abhigamyāmaravṛtaḥ provācedaṃ vacastadā

उन्हें इस प्रकार अत्यन्त सन्तप्त सुनकर देवराज इन्द्र देवताओं से घिरे हुए बृहस्पति के पास गए और उनसे ये वचन कहे।

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9