आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 100
यमलोक का मार्ग और धर्मात्माओं की यात्रा
युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि यमलोक कितनी दूर है, उसका मार्ग कैसा है और मनुष्य उसे कैसे पार करते हैं। श्रीकृष्ण बताते हैं कि वह छियासी हजार योजन लम्बा, जल और आश्रय से रहित मार्ग है, और यमदूतों द्वारा खींचे जाते हुए जीव को उस पर जो भयानक कष्ट सहने पड़ते हैं, उनका वर्णन करते हैं; पापी लोग पिटते, घायल होते, भक्षित होते और भूख-प्यास से तड़पते हुए जाते हैं, और चोर, हत्यारे तथा ब्राह्मणों का धन हरने वाले सबसे अधिक दुःख पाते हैं। यह सुनकर युधिष्ठिर मूर्छित हो जाते हैं और होश में आकर पूछते हैं कि मनुष्य उसे सुखपूर्वक कैसे पार कर सकते हैं। श्रीकृष्ण उन दानों, उपवासों, व्रतों, तीर्थयात्राओं और गुणों को गिनाते हैं जिनसे धर्मात्मा लोग अप्सराओं और गन्धर्वों से सम्मानित होकर सुन्दर विमानों में यमपुरी जाते हैं, और अन्त में उन लोगों का वर्णन करते हैं जो एकनिष्ठ भक्ति से उनकी या शिव की पूजा करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (14.100.1)
देवदेवेश दैत्यघ्न परं कौतूहलं हि मे । एतत्कथय सर्वज्ञ त्वद्भक्तस्य च केशव । मानुषस्य च लोकस्य धर्मलोकस्य चान्तरम् ॥
devadeveśa daityaghna paraṃ kautūhalaṃ hi me | etatkathaya sarvajña tvadbhaktasya ca keśava | mānuṣasya ca lokasya dharmalokasya cāntaram
हे देवदेवेश्वर! हे दैत्यों का संहार करने वाले! मुझे बड़ा कौतूहल है। हे सर्वज्ञ केशव! आपके भक्त को यह बताइए कि मनुष्यलोक और धर्मलोक के बीच कितना अन्तर है,
श्लोक 2 (14.100.2)
कीदृशं किंप्रमाणं वा किमधिष्ठानमेव च । तरन्ति मानुषा देव केनोपायेन माधव ॥
kīdṛśaṃ kiṃpramāṇaṃ vā kimadhiṣṭhānameva ca | taranti mānuṣā deva kenopāyena mādhava
वह मार्ग कैसा है, कितना लम्बा है, उसका आधार क्या है, और हे माधव! मनुष्य किस उपाय से उसे पार करते हैं।
श्लोक 3 (14.100.3)
त्वगस्थिमांसनिर्मुक्ते पञ्चभूतविवर्जिते । कथयस्व महादेव सुखदुःखमशेषतः ॥
tvagasthimāṃsanirmukte pañcabhūtavivarjite | kathayasva mahādeva sukhaduḥkhamaśeṣataḥ
हे महादेव! त्वचा, अस्थि और मांस से रहित तथा पंचभूतों से विहीन उस जीव का सुख-दुःख मुझे पूर्ण रूप से बताइए,
श्लोक 4 (14.100.4)
जीवस्य कर्मलोकेषु कर्मभिस्तु शुभाशुभैः । अनुबद्धस्य तैः पाशैर्नीयमानस्य दारुणैः ॥
jīvasya karmalokeṣu karmabhistu śubhāśubhaiḥ | anubaddhasya taiḥ pāśairnīyamānasya dāruṇaiḥ
जो कर्मलोकों में अपने शुभ-अशुभ कर्मों के कठोर पाशों में बँधा हुआ उनके द्वारा खींचा जा रहा है,
श्लोक 5 (14.100.5)
मृत्युदूतैर्दुराधर्षैर्घोरैर्घोरपराक्रमैः । वध्यस्याक्षिप्यमाणस्य विद्रुतस्य यमाज्ञया ॥
mṛtyudūtairdurādharṣairghorairghoraparākramaiḥ | vadhyasyākṣipyamāṇasya vidrutasya yamājñayā
जिसे यम की आज्ञा से अजेय, भयंकर और घोर पराक्रम वाले मृत्युदूत वध के योग्य मानकर घसीटते और भगाते हैं।
श्लोक 6 (14.100.6)
पुण्यपापकृदातिष्ठेत्सुखदुःखमशेषतः । यमदूतैर्दुराधर्षैर्नीयते वा कथं पुनः । किं वा तत्र गता देव कर्म कुर्वन्ति मानवाः ॥
puṇyapāpakṛdātiṣṭhetsukhaduḥkhamaśeṣataḥ | yamadūtairdurādharṣairnīyate vā kathaṃ punaḥ | kiṃ vā tatra gatā deva karma kurvanti mānavāḥ
पुण्य-पाप करने वाला जीव सुख-दुःख को पूरी तरह भोगता है। और यम के अजेय दूत उसे किस प्रकार ले जाते हैं? वहाँ पहुँचकर मनुष्य कौन-से कर्म करते हैं?
श्लोक 7 (14.100.7)
कथं धर्मपरा यान्ति देवताद्विजपूजकाः । कथं वा पापकर्माणो यान्ति प्रेतपुरं नराः ॥
kathaṃ dharmaparā yānti devatādvijapūjakāḥ | kathaṃ vā pāpakarmāṇo yānti pretapuraṃ narāḥ
धर्म में तत्पर, देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा करने वाले लोग कैसे जाते हैं, और पापकर्म करने वाले मनुष्य प्रेतपुर को कैसे जाते हैं?
श्लोक 8 (14.100.8)
किं रूपं किं प्रमाणं वा वर्णः को वाऽस्य केशव । जीवस्य गच्छतो नित्यं यमलोकं ब्रवीहि मे ॥
kiṃ rūpaṃ kiṃ pramāṇaṃ vā varṇaḥ ko vā'sya keśava | jīvasya gacchato nityaṃ yamalokaṃ bravīhi me
हे केशव! यमलोक को जाते हुए जीव का रूप कैसा है, उसका प्रमाण क्या है और उसका वर्ण क्या है? यह मुझे बताइए।
वासुदेव उवाच
श्लोक 9 (14.100.9)
शृणु राजन्यथावृत्तं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । तत्तेऽहं कथयिष्यामि मद्भक्तस्य नरेश्वर ॥
śṛṇu rājanyathāvṛttaṃ yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi | tatte'haṃ kathayiṣyāmi madbhaktasya nareśvara
हे राजन्! जो तुम मुझसे पूछ रहे हो, उसे जैसा है वैसा सुनो। हे नरेश्वर! तुम मेरे भक्त हो, इसलिए मैं तुम्हें बताऊँगा।
श्लोक 10 (14.100.10)
षडशीतिसहस्राणि योजनानां युधिष्ठिर । मानुष्यस्य च लोकस्य यमलोकस्य चान्तरम् ॥
ṣaḍaśītisahasrāṇi yojanānāṃ yudhiṣṭhira | mānuṣyasya ca lokasya yamalokasya cāntaram
हे युधिष्ठिर! मनुष्यलोक और यमलोक के बीच छियासी हजार योजन का अन्तर है।
श्लोक 11 (14.100.11)
न तत्र वृक्षच्छाया वा न तटाकं सरोपि वा । न वाप्यो दीर्घिका वाऽपि न कूपो वा युधिष्ठिर ॥
na tatra vṛkṣacchāyā vā na taṭākaṃ saropi vā | na vāpyo dīrghikā vā'pi na kūpo vā yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर! उस मार्ग में न वृक्ष की छाया है, न तालाब, न सरोवर, न बावड़ी, न दीर्घिका और न कुआँ।
श्लोक 12 (14.100.12)
न मण्टपं सभा वाऽपि न प्रपा न निकेतनम् । न पर्वतो नदी वाऽपि न भूमेर्विवरं क्वचित् ॥
na maṇṭapaṃ sabhā vā'pi na prapā na niketanam | na parvato nadī vā'pi na bhūmervivaraṃ kvacit
न मण्डप, न सभा, न प्याऊ, न कोई निवास, न पर्वत, न नदी, और न कहीं पृथ्वी में कोई गुफा है।
श्लोक 13 (14.100.13)
न ग्रामो नाश्रमो वाऽपि नोद्यानं वा वनानि च । न किंचिदाश्रयस्थानं पथि तस्मिन्युधिष्ठिर ॥
na grāmo nāśramo vā'pi nodyānaṃ vā vanāni ca | na kiṃcidāśrayasthānaṃ pathi tasminyudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर! उस मार्ग में न कोई गाँव है, न आश्रम, न उद्यान, न वन, और न आश्रय लेने का कोई स्थान।
श्लोक 14 (14.100.14)
जन्तोर्हि प्राप्तकालस्य वेदनार्तस्य वै भृशम् । कारणैस्त्यक्तदेहस्य प्राणैः कण्ठगतैः पुनः ॥
jantorhi prāptakālasya vedanārtasya vai bhṛśam | kāraṇaistyaktadehasya prāṇaiḥ kaṇṭhagataiḥ punaḥ
जिस प्राणी का काल आ गया हो, जो पीड़ा से अत्यन्त व्याकुल हो, जिसके अंग-प्रत्यंगों ने देह को छोड़ दिया हो और जिसके प्राण कण्ठ में आ गए हों,
श्लोक 15 (14.100.15)
शरीराच्चाल्यते जीवो ह्यवशो मातरिश्वना । निर्गतो वायुभूतस्तु षट्कोशात्तु कलेवरात् ॥
śarīrāccālyate jīvo hyavaśo mātariśvanā | nirgato vāyubhūtastu ṣaṭkośāttu kalevarāt
उस जीव को वायु शरीर से विवश करके हिला देती है; और वह वायुरूप होकर छः कोशों वाले उस शरीर से निकल जाता है।
श्लोक 16 (14.100.16)
शरीरमन्यत्तद्रूपं तद्वर्णं तत्प्रमाणतः । अदृश्यं तत्प्रविष्टस्तु सोप्यदृष्टोऽथ केनचित् ॥
śarīramanyattadrūpaṃ tadvarṇaṃ tatpramāṇataḥ | adṛśyaṃ tatpraviṣṭastu sopyadṛṣṭo'tha kenacit
उसका एक दूसरा शरीर होता है, जो उसी रूप, उसी वर्ण और उसी माप का होता है और अदृश्य रहता है; उसमें प्रविष्ट होकर वह स्वयं भी किसी को दिखाई नहीं देता।
श्लोक 17 (14.100.17)
सोन्तरात्मा देहवतामष्टाङ्गो यस्तु संचरेत् । छेदनाद्भेदनाद्दाहात्ताडनाद्वा न नश्यति ॥
sontarātmā dehavatāmaṣṭāṅgo yastu saṃcaret | chedanādbhedanāddāhāttāḍanādvā na naśyati
देहधारियों का वह अन्तरात्मा, जो आठ अंगों वाला होकर चलता है, काटने, चीरने, जलाने या पीटने से नष्ट नहीं होता।
श्लोक 18 (14.100.18)
नाना रूपधरैर्घोरैः प्रचण्डैश्चण्डसाधनैः । नीयमानो दुराधर्षैर्यमदूतैर्यमाज्ञया ॥
nānā rūpadharairghoraiḥ pracaṇḍaiścaṇḍasādhanaiḥ | nīyamāno durādharṣairyamadūtairyamājñayā
यम की आज्ञा से यमदूत उसे ले जाते हैं, जो भयंकर, उग्र, अनेक रूप धारण करने वाले, अजेय और क्रूर साधनों वाले होते हैं;
श्लोक 19 (14.100.19)
पुत्रदारमयैः पाशैः संनिरुद्धोऽवशो बलात् । स्वकर्मभिश्चानुगतः कृतैः सुकृतदुष्कृतैः ॥
putradāramayaiḥ pāśaiḥ saṃniruddho'vaśo balāt | svakarmabhiścānugataḥ kṛtaiḥ sukṛtaduṣkṛtaiḥ
पुत्र और पत्नी के पाशों से बलपूर्वक बँधा, विवश होकर, अपने किए हुए पुण्य-पाप कर्मों के पीछे-पीछे चलता हुआ,
श्लोक 20 (14.100.20)
आक्रन्दमानः करुणं बन्धुभिर्दुःखपीडितैः । त्यक्त्वा बन्धुजनं सर्वं निरपेक्षस्तु गच्छति ॥
ākrandamānaḥ karuṇaṃ bandhubhirduḥkhapīḍitaiḥ | tyaktvā bandhujanaṃ sarvaṃ nirapekṣastu gacchati
दुःख से पीड़ित बन्धुओं के बीच करुण विलाप करता हुआ, वह सब बन्धुजनों को छोड़कर निरपेक्ष भाव से चला जाता है।
श्लोक 21 (14.100.21)
मातृभिः पितृभिश्चैव भ्रातृभिर्मातुलैस्तथा । दारैः पुत्रैर्वयस्यैश्च रुदद्भिस्त्यज्यते पुनः ॥
mātṛbhiḥ pitṛbhiścaiva bhrātṛbhirmātulaistathā | dāraiḥ putrairvayasyaiśca rudadbhistyajyate punaḥ
माताओं, पिताओं, भाइयों, मामाओं, पत्नियों, पुत्रों और मित्रों द्वारा रोते-रोते फिर त्याग दिया जाता है,
श्लोक 22 (14.100.22)
अदृश्यमानस्तैर्दीनैरश्रुपूर्णमुखेक्षणैः । स्वशरीरं परित्यज्य वायुभूतस्तु गच्छति ॥
adṛśyamānastairdīnairaśrupūrṇamukhekṣaṇaiḥ | svaśarīraṃ parityajya vāyubhūtastu gacchati
आँसुओं से भरे मुख और नेत्रों वाले उन दीन जनों को वह दिखाई नहीं देता; अपना शरीर छोड़कर वह वायुरूप होकर चला जाता है।
श्लोक 23 (14.100.23)
अन्धकारमपारं तं महाघोरं तमोवृतम् । दुःखान्तं दुष्प्रतारं च दुर्गमं पापकर्मणाम् ॥
andhakāramapāraṃ taṃ mahāghoraṃ tamovṛtam | duḥkhāntaṃ duṣpratāraṃ ca durgamaṃ pāpakarmaṇām
वह अन्धकार अपार, अत्यन्त भयंकर और तमस से घिरा हुआ है; उसका अन्त दुःख में होता है, उसे पार करना कठिन है और पापकर्मियों के लिए वह दुर्गम है,
श्लोक 24 (14.100.24)
दुःसहायं दुरन्तं च दुर्निरीक्षं दुरासदम् । दुरापमतिदुःखं च पापिष्ठानां नरोत्तम ॥
duḥsahāyaṃ durantaṃ ca durnirīkṣaṃ durāsadam | durāpamatiduḥkhaṃ ca pāpiṣṭhānāṃ narottama
असहाय करने वाला, अनन्त, देखने में भयानक और पाने में कठिन है; हे नरोत्तम! पापियों के लिए वह अत्यन्त दुःखदायी है।
श्लोक 25 (14.100.25)
ऋषिभिः कथ्यमानं तत्पारंपर्येण पार्थिव । त्रासं जनयति प्रायः श्रूयमाणं कथास्वपि ॥
ṛṣibhiḥ kathyamānaṃ tatpāraṃparyeṇa pārthiva | trāsaṃ janayati prāyaḥ śrūyamāṇaṃ kathāsvapi
हे राजन्! ऋषियों द्वारा परम्परा से कहा जाने वाला वह मार्ग कथाओं में सुनने भर से भी प्रायः भय उत्पन्न करता है।
श्लोक 26 (14.100.26)
अवश्यं चैव गन्तव्यं तदध्वानं युधिष्ठिर । प्राप्तकालेन संत्यज्य बन्धून्भोगान्धनानि च ॥
avaśyaṃ caiva gantavyaṃ tadadhvānaṃ yudhiṣṭhira | prāptakālena saṃtyajya bandhūnbhogāndhanāni ca
हे युधिष्ठिर! काल आने पर बन्धुओं, भोगों और धन को छोड़कर उस मार्ग पर अवश्य जाना पड़ता है।
श्लोक 27 (14.100.27)
जरायुजैरण्डजैश्च स्वेदजैरुद्भिदैस्तथा । जङ्गमैः स्थिरसंज्ञैश्च गन्तव्यं यमसादनम् ॥
jarāyujairaṇḍajaiśca svedajairudbhidaistathā | jaṅgamaiḥ sthirasaṃjñaiśca gantavyaṃ yamasādanam
जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज प्राणियों को, जंगम और स्थावर कहलाने वालों को, यमलोक जाना ही पड़ता है।
श्लोक 28 (14.100.28)
देवासुरैर्मनुष्याद्यैर्वैवस्वतवशानुगैः । स्त्रीपुंनपुंसकैश्चापि पृथिव्यां जीवसंज्ञितैः ॥
devāsurairmanuṣyādyairvaivasvatavaśānugaiḥ | strīpuṃnapuṃsakaiścāpi pṛthivyāṃ jīvasaṃjñitaiḥ
देवताओं और असुरों को, मनुष्य आदि को, जो सब वैवस्वत के अधीन हैं, स्त्री, पुरुष और नपुंसकों को, पृथ्वी पर जीव कहलाने वाले सभी को,
श्लोक 29 (14.100.29)
मध्यमैर्युवभिर्वाऽपि बालैर्वृद्धैस्तथैव च । जातमात्रैश्च गर्भस्थैर्गन्तव्यः स महापथः ॥
madhyamairyuvabhirvā'pi bālairvṛddhaistathaiva ca | jātamātraiśca garbhasthairgantavyaḥ sa mahāpathaḥ
मध्यम आयु वालों, युवकों, बालकों और वृद्धों को, नवजात और गर्भ में स्थित शिशुओं को भी उस महापथ पर जाना पड़ता है।
श्लोक 30 (14.100.30)
पूर्वाह्णे वाऽपराह्णे वा सन्ध्याकालेऽथवा पुनः । प्रदोषे वाऽर्धरात्रे वा प्रत्युषे वाऽप्युपस्थिते ॥
pūrvāhṇe vā'parāhṇe vā sandhyākāle'thavā punaḥ | pradoṣe vā'rdharātre vā pratyuṣe vā'pyupasthite
पूर्वाह्न में या अपराह्न में, सन्ध्याकाल में या प्रदोष में, आधी रात को या प्रभात के आने पर,
श्लोक 31 (14.100.31)
प्रवासस्थैर्वनस्थैर्वा पर्वतस्थैर्जले स्थितैः । क्षेत्रस्थैर्वा नभःस्थैर्वा गृहमध्यगतैरपि ॥
pravāsasthairvanasthairvā parvatasthairjale sthitaiḥ | kṣetrasthairvā nabhaḥsthairvā gṛhamadhyagatairapi
परदेस में, वन में, पर्वत पर, जल में, खेत में, आकाश में या घर के भीतर रहते हुए भी,
श्लोक 32 (14.100.32)
भुञ्जद्भिर्वा पिबद्भिर्वा खादद्भिर्वा नरोत्तम । आसीनैर्वा स्थितैर्वापि शयनीयगतैरपि । जाग्रद्भिर्वा प्रसुप्तैर्वा गन्तव्यः स महापथः ॥
bhuñjadbhirvā pibadbhirvā khādadbhirvā narottama | āsīnairvā sthitairvāpi śayanīyagatairapi | jāgradbhirvā prasuptairvā gantavyaḥ sa mahāpathaḥ
हे नरोत्तम! खाते, पीते या चबाते हुए, बैठे, खड़े या शय्या पर लेटे हुए, जागते या सोते हुए, उस महापथ पर जाना ही पड़ता है।
श्लोक 33 (14.100.33)
मृत्युदूतैर्दुराधर्षैः प्रचण्डैश्चण्डशासनैः । आक्षिप्यमाणा ह्यवशाः प्रयान्ति यमसादनम् ॥
mṛtyudūtairdurādharṣaiḥ pracaṇḍaiścaṇḍaśāsanaiḥ | ākṣipyamāṇā hyavaśāḥ prayānti yamasādanam
विवश जीव, अजेय, उग्र और कठोर आज्ञा देने वाले मृत्युदूतों द्वारा घसीटे जाते हुए यमलोक को जाते हैं।
श्लोक 34 (14.100.34)
क्वचिद्भीतैः क्वचिन्मत्तैः प्रस्खलद्भिः क्वचित्क्वचित् । क्रन्दद्भिर्वेदनार्तैस्तु गन्तव्यं यमसादनम् ॥
kvacidbhītaiḥ kvacinmattaiḥ praskhaladbhiḥ kvacitkvacit | krandadbhirvedanārtaistu gantavyaṃ yamasādanam
कहीं डरे हुए, कहीं घबराए हुए, कहीं बार-बार लड़खड़ाते हुए और पीड़ा से चीखते हुए उन्हें यमलोक जाना पड़ता है।
श्लोक 35 (14.100.35)
निर्भर्त्स्यमानैरुद्विग्नैर्विधूतैर्भयविह्वलैः । तुद्यमानशरीरैश्च गन्तव्यं तर्जितैस्तथा ॥
nirbhartsyamānairudvignairvidhūtairbhayavihvalaiḥ | tudyamānaśarīraiśca gantavyaṃ tarjitaistathā
डाँटे जाते हुए, उद्विग्न, काँपते हुए और भय से व्याकुल, शरीर में चुभाए जाते और धमकाए जाते हुए उन्हें जाना पड़ता है।
श्लोक 36 (14.100.36)
कण्टकाकीर्णमार्गेण तप्तवालुकपांसुना । दह्यमानैस्तु गन्तव्यं नरैर्दानविवर्जितैः ॥
kaṇṭakākīrṇamārgeṇa taptavālukapāṃsunā | dahyamānaistu gantavyaṃ narairdānavivarjitaiḥ
काँटों से भरे मार्ग पर, तपी हुई बालू और धूल में जलते हुए, दान न करने वाले मनुष्यों को जाना पड़ता है।
श्लोक 37 (14.100.37)
काष्ठोपलशिलाघातैर्दण्डोल्मुककशाङ्कुशैः । हन्यमानैर्यमपुरं गन्तव्यं धर्मवर्जितैः ॥
kāṣṭhopalaśilāghātairdaṇḍolmukakaśāṅkuśaiḥ | hanyamānairyamapuraṃ gantavyaṃ dharmavarjitaiḥ
काठ, पत्थर और चट्टानों की चोट से, डण्डों, जलती लकड़ियों, कोड़ों और अंकुशों से पिटते हुए धर्महीन लोगों को यमपुर जाना पड़ता है।
श्लोक 38 (14.100.38)
मेदःशोणितपूयाद्यैर्वक्त्रैर्गात्रैश्च सव्रणैः । दग्धक्षतजकीर्णैश्च गन्तव्यं जीवघातकैः ॥
medaḥśoṇitapūyādyairvaktrairgātraiśca savraṇaiḥ | dagdhakṣatajakīrṇaiśca gantavyaṃ jīvaghātakaiḥ
चर्बी, रक्त और मवाद से सने मुखों और घावों से भरे शरीरों वाले, जले और रक्त से लथपथ, प्राणियों की हत्या करने वालों को जाना पड़ता है।
श्लोक 39 (14.100.39)
वेदनार्तैश्च कूजद्भिर्विक्रोशद्भिश्च विस्वरम् । वेदनार्तैः पतद्भिश्च गन्तव्यं जीवघातकैः ॥
vedanārtaiśca kūjadbhirvikrośadbhiśca visvaram | vedanārtaiḥ patadbhiśca gantavyaṃ jīvaghātakaiḥ
पीड़ा से कराहते, चिल्लाते और बेसुरी आवाज़ में विलाप करते हुए, तड़पकर गिरते हुए, प्राणियों के हत्यारों को जाना पड़ता है।
श्लोक 40 (14.100.40)
भग्नपादोरुहस्ताङ्गैर्भग्नजङ्घाशिरोधरैः । छिन्नकर्णोष्ठनासैश्च गन्तव्यं जीवघातकैः ॥
bhagnapādoruhastāṅgairbhagnajaṅghāśirodharaiḥ | chinnakarṇoṣṭhanāsaiśca gantavyaṃ jīvaghātakaiḥ
टूटे हुए पैर, जाँघ, हाथ और अंगों वाले, टूटी पिंडलियों और गर्दनों वाले, कटे कान, होंठ और नाक वाले, प्राणियों के हत्यारों को जाना पड़ता है।
श्लोक 41 (14.100.41)
शक्तिभिर्भिण्डिपालैश्च शङ्कुतोमरसायकैः । तुद्यमानैस्तु शूलाग्रैर्गन्तव्यं जीवघातकैः ॥
śaktibhirbhiṇḍipālaiśca śaṅkutomarasāyakaiḥ | tudyamānaistu śūlāgrairgantavyaṃ jīvaghātakaiḥ
शक्तियों, भिन्दिपालों, कीलों, तोमरों और बाणों से तथा त्रिशूल की नोकों से बींधे जाते हुए प्राणिघातकों को जाना पड़ता है।
श्लोक 42 (14.100.42)
श्वभिर्व्याघ्रैर्वृकैः काकैर्भक्ष्यमाणाः समन्ततः । तुद्यमानाश्च गच्छन्ति राक्षसैर्मांसघातिभिः ॥
śvabhirvyāghrairvṛkaiḥ kākairbhakṣyamāṇāḥ samantataḥ | tudyamānāśca gacchanti rākṣasairmāṃsaghātibhiḥ
कुत्तों, बाघों, भेड़ियों और कौओं से चारों ओर से खाए जाते हुए और मांसभक्षी राक्षसों से बींधे जाते हुए वे जाते हैं।
श्लोक 43 (14.100.43)
महिषैश्च मृगैश्चापि सूकरैः पृषतैस्तथा । भक्ष्यमाणैस्तदध्वानं गन्तव्यं मांसखादिभिः ॥
mahiṣaiśca mṛgaiścāpi sūkaraiḥ pṛṣataistathā | bhakṣyamāṇaistadadhvānaṃ gantavyaṃ māṃsakhādibhiḥ
भैंसों, मृगों, सूअरों और चित्तीदार हिरणों से खाए जाते हुए मांसभक्षियों को उस मार्ग पर जाना पड़ता है।
श्लोक 44 (14.100.44)
सूचीसुतीक्ष्णतुण्डाभिर्मक्षिकाभिः समन्ततः । तुद्यमानैश्च गन्तव्यं पापिष्ठैर्बालघातकैः ॥
sūcīsutīkṣṇatuṇḍābhirmakṣikābhiḥ samantataḥ | tudyamānaiśca gantavyaṃ pāpiṣṭhairbālaghātakaiḥ
सुई के समान तीखी चोंच वाली मक्खियों से चारों ओर से बींधे जाते हुए अत्यन्त पापी बालघातकों को जाना पड़ता है।
श्लोक 45 (14.100.45)
विस्रब्धं स्वामिनं मित्रं स्त्रियं वा घ्रन्ति ये नराः । शस्त्रैर्निर्भिद्यमानैश्च गन्तव्यं यमसादनम् ॥
visrabdhaṃ svāminaṃ mitraṃ striyaṃ vā ghranti ye narāḥ | śastrairnirbhidyamānaiśca gantavyaṃ yamasādanam
जो मनुष्य विश्वास करने वाले स्वामी, मित्र या स्त्री की हत्या करते हैं, उन्हें शस्त्रों से कटे हुए शरीरों के साथ यमलोक जाना पड़ता है।
श्लोक 46 (14.100.46)
खादयन्ति च ये जीवान्दुःखमापादयन्ति च । राक्षसैश्च श्वभिश्चैव भक्ष्यमाणा व्रजन्ति च ॥
khādayanti ca ye jīvānduḥkhamāpādayanti ca | rākṣasaiśca śvabhiścaiva bhakṣyamāṇā vrajanti ca
जो प्राणियों को खिलवाते और उन्हें दुःख देते हैं, वे राक्षसों और कुत्तों द्वारा खाए जाते हुए जाते हैं।
श्लोक 47 (14.100.47)
ये हरन्ति च वस्त्राणि शय्यां प्रावरणानि च । ते यान्ति विद्रुता नग्नाः पिशाचा इव तत्पथं ॥
ye haranti ca vastrāṇi śayyāṃ prāvaraṇāni ca | te yānti vidrutā nagnāḥ piśācā iva tatpathaṃ
जो वस्त्र, शय्या और ओढ़ने के कपड़े चुराते हैं, वे उस मार्ग पर पिशाचों की तरह नंगे और भागते हुए जाते हैं।
श्लोक 48 (14.100.48)
गाश्च धान्यं हिरण्यं वा बलात्क्षेत्रं गृहं तथा । ये हरन्ति दुरात्मानः परस्वं पापकारिणः ॥
gāśca dhānyaṃ hiraṇyaṃ vā balātkṣetraṃ gṛhaṃ tathā | ye haranti durātmānaḥ parasvaṃ pāpakāriṇaḥ
गायें, अन्न, सोना, या बलपूर्वक खेत और घर, जिन दुष्ट पापी लोगों ने दूसरों का धन हर लिया है,
श्लोक 49 (14.100.49)
पाषाणैरुल्मुकैर्दण्डैः काष्ठघातैश्च झर्झरैः । हन्यमानैः क्षताकीर्णैर्गन्तव्यं तैर्यमालयम् ॥
pāṣāṇairulmukairdaṇḍaiḥ kāṣṭhaghātaiśca jharjharaiḥ | hanyamānaiḥ kṣatākīrṇairgantavyaṃ tairyamālayam
वे पत्थरों, जलती लकड़ियों, डण्डों, काठ की चोटों और झर्झरों से पिटते और घावों से भरे हुए यमलोक जाते हैं।
श्लोक 50 (14.100.50)
ब्रह्मस्वं ये हरन्तीह नरा नरकनिर्भयाः । आक्रोशन्तीह ये नित्यं प्रहरन्ति च ये द्विजान् ॥
brahmasvaṃ ye harantīha narā narakanirbhayāḥ | ākrośantīha ye nityaṃ praharanti ca ye dvijān
जो मनुष्य नरक से निर्भय होकर ब्राह्मण का धन हरते हैं, जो सदा ब्राह्मणों को गाली देते और उन पर प्रहार करते हैं,
श्लोक 51 (14.100.51)
शुष्ककण्ठा निबद्धास्ते छिन्नजिह्वाक्षिनासिकाः । पूयशोणितदुर्गन्धा भक्ष्यमाणाश्च जंबुकैः ॥
śuṣkakaṇṭhā nibaddhāste chinnajihvākṣināsikāḥ | pūyaśoṇitadurgandhā bhakṣyamāṇāśca jaṃbukaiḥ
वे बँधे हुए, सूखे कण्ठ वाले, कटी जीभ, आँखों और नाक वाले, मवाद और रक्त की दुर्गन्ध से भरे होकर सियारों द्वारा खाए जाते हैं।
श्लोक 52 (14.100.52)
चण्डालैर्भीषणैश्चण्डैस्तुद्यमानाः समन्ततः । क्रोशन्तः करुणं घोरं गच्छन्ति यमसादनम् ॥
caṇḍālairbhīṣaṇaiścaṇḍaistudyamānāḥ samantataḥ | krośantaḥ karuṇaṃ ghoraṃ gacchanti yamasādanam
भयंकर और उग्र चाण्डालों से चारों ओर से बींधे जाते हुए, करुण और भयानक स्वर में चीखते हुए वे यमलोक जाते हैं।
श्लोक 53 (14.100.53)
तत्र चापि गताः पापा विष्ठाकूपेष्वनेकशः । जीवन्तो वर्षकोटीस्तु क्लिश्यन्ते वेदनात्ततः ॥
tatra cāpi gatāḥ pāpā viṣṭhākūpeṣvanekaśaḥ | jīvanto varṣakoṭīstu kliśyante vedanāttataḥ
वहाँ भी पहुँचकर वे पापी बार-बार मल के कुण्डों में गिरते हैं और करोड़ों वर्ष जीवित रहकर पीड़ा से कष्ट पाते हैं।
श्लोक 54 (14.100.54)
ततश्च मुक्ताः कालेन लोके चास्मिन्नराधमाः । विष्ठाक्रिमित्वं गच्छन्ति जन्मकोटिशतं नृप ॥
tataśca muktāḥ kālena loke cāsminnarādhamāḥ | viṣṭhākrimitvaṃ gacchanti janmakoṭiśataṃ nṛpa
फिर समय आने पर छूटकर वे अधम मनुष्य इस लोक में सौ करोड़ जन्मों तक मल के कीड़े बनते हैं, हे राजन्।
श्लोक 55 (14.100.55)
विद्यमानधनैर्यैस्तु लोभडंभानृतान्वितैः । श्रोत्रियेभ्यो न दत्तानि दानानि कुरुपुङ्गव ॥
vidyamānadhanairyaistu lobhaḍaṃbhānṛtānvitaiḥ | śrotriyebhyo na dattāni dānāni kurupuṅgava
हे कुरुश्रेष्ठ! धन होते हुए भी जो लोभ, दम्भ और असत्य से भरे हैं और जिन्होंने श्रोत्रिय ब्राह्मणों को दान नहीं दिया,
श्लोक 56 (14.100.56)
ग्रीवापाशनिबद्धास्ते हन्यमानाश्च राक्षसैः । क्षुत्पिपासाश्रमार्तास्तु यान्ति प्रेतपुरं नराः ॥
grīvāpāśanibaddhāste hanyamānāśca rākṣasaiḥ | kṣutpipāsāśramārtāstu yānti pretapuraṃ narāḥ
वे गले में फाँसी से बँधे, राक्षसों से पिटते और भूख, प्यास तथा थकान से पीड़ित होकर प्रेतपुर को जाते हैं।
श्लोक 57 (14.100.57)
अदत्तदाना गच्छन्ति शुष्ककण्ठास्यतालुकाः । अन्नं पानीयसहितं प्रार्थयन्तः पुनःपुनः ॥
adattadānā gacchanti śuṣkakaṇṭhāsyatālukāḥ | annaṃ pānīyasahitaṃ prārthayantaḥ punaḥpunaḥ
दान न देने वाले सूखे कण्ठ, मुख और तालु वाले होकर बार-बार अन्न और जल माँगते हुए जाते हैं।
श्लोक 58 (14.100.58)
स्वामिन्बुभुक्षातृष्णार्ता गन्तुं नैवाद्य शक्नुमः । ममान्नं दीयतां स्वामिन्पानीयं दीयतां मम । इति ब्रुवन्तस्तैर्दूतैः प्राप्यन्ते वै यमालयम् ॥
svāminbubhukṣātṛṣṇārtā gantuṃ naivādya śaknumaḥ | mamānnaṃ dīyatāṃ svāminpānīyaṃ dīyatāṃ mama | iti bruvantastairdūtaiḥ prāpyante vai yamālayam
'हे स्वामी! हम भूख और प्यास से व्याकुल हैं और आज आगे नहीं जा सकते। हे स्वामी! मुझे भोजन दीजिए, मुझे पानी दीजिए', ऐसा कहते हुए वे उन दूतों द्वारा यमलोक पहुँचा दिए जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 59 (14.100.59)
तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णोः पपात भुवि पाण्डवः । निस्संज्ञो भयसंत्रस्तो मूर्छया समभिप्लुतः ॥
tacchrutvā vacanaṃ viṣṇoḥ papāta bhuvi pāṇḍavaḥ | nissaṃjño bhayasaṃtrasto mūrchayā samabhiplutaḥ
विष्णु की यह बात सुनकर पाण्डव युधिष्ठिर भय से काँपते हुए, मूर्छा से घिरकर, अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 60 (14.100.60)
ततो लब्ध्वा शनैः संज्ञां समाश्वस्तोच्युतेन सः । नेत्रे प्रक्षाल्य तोयेन भूयः केशवमब्रवीत् ॥
tato labdhvā śanaiḥ saṃjñāṃ samāśvastocyutena saḥ | netre prakṣālya toyena bhūyaḥ keśavamabravīt
फिर धीरे-धीरे होश में आकर, अच्युत के सान्त्वना देने पर उन्होंने आँखें जल से धोईं और फिर केशव से बोले।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 61 (14.100.61)
भीतोस्म्यहं महादेव श्रुत्वा मार्गस्य विस्तरम् । केनोपायेन तं मार्गं तरन्ति पुरुषाः सुखम् ॥
bhītosmyahaṃ mahādeva śrutvā mārgasya vistaram | kenopāyena taṃ mārgaṃ taranti puruṣāḥ sukham
हे महादेव! उस मार्ग का विस्तार सुनकर मैं भयभीत हो गया हूँ। मनुष्य किस उपाय से उस मार्ग को सुखपूर्वक पार करते हैं?
वासुदेव उवाच
श्लोक 62 (14.100.62)
इह ये धार्मिका लोके जीवघातविवर्जिताः । गुरुशुश्रूषणे युक्ता देवब्राह्मणपूजकाः ॥
iha ye dhārmikā loke jīvaghātavivarjitāḥ | guruśuśrūṣaṇe yuktā devabrāhmaṇapūjakāḥ
इस लोक में जो धार्मिक हैं, प्राणिहिंसा से रहित हैं, गुरुजनों की सेवा में लगे रहते हैं और देवताओं तथा ब्राह्मणों की पूजा करते हैं,
श्लोक 63 (14.100.63)
अस्मान्मानुष्यलोकात्ते सभार्याः सहबान्धवाः । यमध्वानं तु गच्छन्ति यथावत्तं निबोध मे ॥
asmānmānuṣyalokātte sabhāryāḥ sahabāndhavāḥ | yamadhvānaṃ tu gacchanti yathāvattaṃ nibodha me
वे इस मनुष्यलोक से अपनी पत्नियों और बन्धुओं सहित यम के मार्ग पर जैसे जाते हैं, उसे मुझसे ठीक-ठीक सुनो।
श्लोक 64 (14.100.64)
ब्राह्मणेभ्यः प्रदानानि नानारूपाणि पाण्डव । ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्ते सुखं यान्ति तत्फलम् ॥
brāhmaṇebhyaḥ pradānāni nānārūpāṇi pāṇḍava | ye prayacchanti viprebhyaste sukhaṃ yānti tatphalam
हे पाण्डव! ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान जो लोग देते हैं, वे सुखपूर्वक उनके फल को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 65 (14.100.65)
अन्नं ये च प्रयच्छन्ति ब्राह्मणेभ्यः सुसंस्कृतम् । श्रोत्रियेभ्यो विशेषेण प्रीत्या परमया युताः ॥
annaṃ ye ca prayacchanti brāhmaṇebhyaḥ susaṃskṛtam | śrotriyebhyo viśeṣeṇa prītyā paramayā yutāḥ
और जो लोग परम प्रेम के साथ ब्राह्मणों को, विशेषकर श्रोत्रियों को, भलीभाँति तैयार किया हुआ अन्न देते हैं,
श्लोक 66 (14.100.66)
ते विमानैर्महात्मानो यान्ति चित्रैर्यमालयम् । सेव्यमाना वरस्त्रीभिरप्सरोभिर्महापथम् ॥
te vimānairmahātmāno yānti citrairyamālayam | sevyamānā varastrībhirapsarobhirmahāpatham
वे महात्मा सुन्दर विमानों में बैठकर यमलोक जाते हैं; उस महापथ पर श्रेष्ठ स्त्रियाँ और अप्सराएँ उनकी सेवा करती हैं।
श्लोक 67 (14.100.67)
ये च नित्यं प्रभाषन्ते सत्यं निष्कल्मषं वचः । ते च यान्त्यमलाभ्राभैर्विमानैर्वृषयोजितैः ॥
ye ca nityaṃ prabhāṣante satyaṃ niṣkalmaṣaṃ vacaḥ | te ca yāntyamalābhrābhairvimānairvṛṣayojitaiḥ
और जो सदा सत्य और निर्मल वचन बोलते हैं, वे भी निर्मल मेघ के समान चमकने वाले, बैलों से जुते विमानों में जाते हैं।
श्लोक 68 (14.100.68)
कपिलाद्यानि पुण्यानि गोप्रदानानि ये नराः । ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छन्ति श्रोत्रियेभ्यो विशेषतः ॥
kapilādyāni puṇyāni gopradānāni ye narāḥ | brāhmaṇebhyaḥ prayacchanti śrotriyebhyo viśeṣataḥ
जो मनुष्य कपिला आदि पुण्य गौएँ ब्राह्मणों को, विशेषकर श्रोत्रियों को देते हैं,
श्लोक 69 (14.100.69)
ते यान्त्यमलवर्णाभैर्विमानैर्वृषयोजितैः । वैवस्वतपुरं प्राप्य ह्यप्सरोभिर्निषेविताः ॥
te yāntyamalavarṇābhairvimānairvṛṣayojitaiḥ | vaivasvatapuraṃ prāpya hyapsarobhirniṣevitāḥ
वे निर्मल वर्ण की आभा वाले, बैलों से जुते विमानों में जाते हैं, और वैवस्वत की नगरी में पहुँचकर अप्सराओं से सेवित होते हैं।
श्लोक 70 (14.100.70)
उपानहौ च च्छत्रं च शयनान्यासनानि च । विप्रेभ्यो ये प्रयच्छन्ति वस्त्राण्याभरणानि च ॥
upānahau ca cchatraṃ ca śayanānyāsanāni ca | viprebhyo ye prayacchanti vastrāṇyābharaṇāni ca
जो ब्राह्मणों को जूते, छाता, शय्याएँ, आसन, वस्त्र और आभूषण देते हैं,
श्लोक 71 (14.100.71)
ते यान्त्यश्वैर्वृषैर्वाऽपि कुञ्जरैरप्यलङ्कृताः । धर्मराजपुरं रम्यं सौवर्णच्छत्रशोभिताः ॥
te yāntyaśvairvṛṣairvā'pi kuñjarairapyalaṅkṛtāḥ | dharmarājapuraṃ ramyaṃ sauvarṇacchatraśobhitāḥ
वे अलंकृत होकर घोड़ों, बैलों या हाथियों पर चढ़कर, सुनहरे छत्रों से शोभित, धर्मराज की रमणीय नगरी को जाते हैं।
श्लोक 72 (14.100.72)
ये च भक्ष्याणि दास्यन्ति भोज्यं पेयं तथैव च । स्निग्धान्नान्यपि विप्रेभ्यः श्रद्धया परया युताः ॥
ye ca bhakṣyāṇi dāsyanti bhojyaṃ peyaṃ tathaiva ca | snigdhānnānyapi viprebhyaḥ śraddhayā parayā yutāḥ
जो परम श्रद्धा से युक्त होकर ब्राह्मणों को खाने, चबाने और पीने की वस्तुएँ तथा चिकने भोजन देते हैं,
श्लोक 73 (14.100.73)
ते यान्ति काञ्चनैर्यानैः सुखं वैवस्वतालयम् । वरस्त्रीभिर्यथाकामं सेव्यमानाः सहस्रशः ॥
te yānti kāñcanairyānaiḥ sukhaṃ vaivasvatālayam | varastrībhiryathākāmaṃ sevyamānāḥ sahasraśaḥ
वे सोने के विमानों में सुखपूर्वक वैवस्वत के धाम जाते हैं; श्रेष्ठ स्त्रियाँ इच्छानुसार हजारों की संख्या में उनकी सेवा करती हैं।
श्लोक 74 (14.100.74)
ये च क्षीरं प्रयच्छन्ति घृतं दधि गुडं मधु । ब्राह्मणेभ्यः प्रयत्नेन श्रद्दधानाः सुसंस्कृताः ॥
ye ca kṣīraṃ prayacchanti ghṛtaṃ dadhi guḍaṃ madhu | brāhmaṇebhyaḥ prayatnena śraddadhānāḥ susaṃskṛtāḥ
जो श्रद्धालु और संस्कारी जन प्रयत्नपूर्वक ब्राह्मणों को दूध, घी, दही, गुड़ और शहद देते हैं,
श्लोक 75 (14.100.75)
चक्रवाकप्रयुक्तैस्तु यानै रुक्ममयैः शुभैः । यान्ति गन्धर्ववादित्रैः सेव्यमाना यमालयम् ॥
cakravākaprayuktaistu yānai rukmamayaiḥ śubhaiḥ | yānti gandharvavāditraiḥ sevyamānā yamālayam
वे चकवों से जुते हुए सुन्दर सोने के विमानों में, गन्धर्वों के वाद्यों से सेवित होकर यमलोक जाते हैं।
श्लोक 76 (14.100.76)
ये फलानि प्रयच्छन्ति पुष्पाणि सुरभीणि च । हंसयुक्तैर्विमानैस्तु यान्ति धर्मपुरं नराः ॥
ye phalāni prayacchanti puṣpāṇi surabhīṇi ca | haṃsayuktairvimānaistu yānti dharmapuraṃ narāḥ
जो फल और सुगन्धित फूल देते हैं, वे हंसों से जुते विमानों में धर्मपुरी को जाते हैं।
श्लोक 77 (14.100.77)
ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यो विचित्रान्नं घृताप्लुतम् । ते व्रजन्त्यमलाभ्राभैर्विमानैर्वायुवेगिभिः । पुरं तत्प्रेतनाथस्य नानाजनसमाकुलम् ॥
ye prayacchanti viprebhyo vicitrānnaṃ ghṛtāplutam | te vrajantyamalābhrābhairvimānairvāyuvegibhiḥ | puraṃ tatpretanāthasya nānājanasamākulam
जो ब्राह्मणों को घी में डूबा हुआ तरह-तरह का भोजन देते हैं, वे निर्मल मेघ के समान चमकने वाले, वायु के समान वेग वाले विमानों में प्रेतराज की उस नगरी को जाते हैं, जो अनेक लोगों से भरी है।
श्लोक 78 (14.100.78)
पानीयं ये प्रयच्छन्ति सर्वभूतप्रजीवनम् । ते सुतृप्ताः सुखं यान्ति भवनैर्हंसचोदितैः ॥
pānīyaṃ ye prayacchanti sarvabhūtaprajīvanam | te sutṛptāḥ sukhaṃ yānti bhavanairhaṃsacoditaiḥ
जो सब प्राणियों के जीवन के आधार जल का दान करते हैं, वे भलीभाँति तृप्त होकर हंसों से चलाए जाने वाले भवनों में सुखपूर्वक जाते हैं।
श्लोक 79 (14.100.79)
ये तिलं तिलधेनुं वा घृतधेनुमथापि च । श्रोत्रियेभ्यः प्रयच्छन्ति सौम्यभावसमन्विताः ॥
ye tilaṃ tiladhenuṃ vā ghṛtadhenumathāpi ca | śrotriyebhyaḥ prayacchanti saumyabhāvasamanvitāḥ
जो सौम्य भाव से युक्त होकर श्रोत्रियों को तिल, तिलधेनु या घृतधेनु देते हैं,
श्लोक 80 (14.100.80)
सूर्यमण्डलसंकाशैर्यानैस्ते यान्ति निर्मलैः । गीयमानैस्तु गन्धर्वैर्वैवस्वतपुरं नृप ॥
sūryamaṇḍalasaṃkāśairyānaiste yānti nirmalaiḥ | gīyamānaistu gandharvairvaivasvatapuraṃ nṛpa
वे सूर्यमण्डल के समान निर्मल विमानों में, गन्धर्वों द्वारा गाए जाते हुए, हे राजन्! वैवस्वत की नगरी को जाते हैं।
श्लोक 81 (14.100.81)
येषां वाप्यश्च कूपाश्च तटाकानि सरांसि च । दीर्घिकाः पुष्करिण्यश्च सजलाश्च जलाशयाः ॥
yeṣāṃ vāpyaśca kūpāśca taṭākāni sarāṃsi ca | dīrghikāḥ puṣkariṇyaśca sajalāśca jalāśayāḥ
जिनकी बावड़ियाँ, कुएँ, तालाब, सरोवर, दीर्घिकाएँ, पुष्करिणियाँ और जल से भरे जलाशय हैं,
श्लोक 82 (14.100.82)
यानैस्ते यान्ति चन्द्राभैर्दिव्यघण्टानिनादितैः । चामरैस्तालवृन्तैश्च वीज्यमाना महाप्रभाः । नित्यतृप्ता महात्मानो गच्छन्ति यमसादनम् ॥
yānaiste yānti candrābhairdivyaghaṇṭānināditaiḥ | cāmaraistālavṛntaiśca vījyamānā mahāprabhāḥ | nityatṛptā mahātmāno gacchanti yamasādanam
वे चन्द्रमा के समान चमकने वाले, दिव्य घण्टों की ध्वनि से गूँजते विमानों में, चँवरों और ताड़ के पंखों से हवा किए जाते हुए, महान् प्रभा वाले और सदा तृप्त महात्मा होकर यमलोक जाते हैं।
श्लोक 83 (14.100.83)
येषां देवगृहाणीह चित्राण्यायतनानि च । मनोहराणि कान्तानि दर्शनीयानि भान्ति च ॥
yeṣāṃ devagṛhāṇīha citrāṇyāyatanāni ca | manoharāṇi kāntāni darśanīyāni bhānti ca
जिनके यहाँ देवमन्दिर और विचित्र, मनोहर, सुन्दर तथा दर्शनीय आयतन शोभित होते हैं,
श्लोक 84 (14.100.84)
ते व्रजन्त्यमलाभ्राभैर्विमानैर्वायुवेगिभिः । पुरं तत्प्रेतनाथस्य नानाजनपदाकुलम् ॥
te vrajantyamalābhrābhairvimānairvāyuvegibhiḥ | puraṃ tatpretanāthasya nānājanapadākulam
वे निर्मल मेघ के समान चमकने वाले, वायु के वेग वाले विमानों में प्रेतराज की उस नगरी को जाते हैं, जो अनेक जनपदों से भरी हुई है।
श्लोक 85 (14.100.85)
वैवस्वतं च पश्यन्ति सुखचित्तं सुखस्थितम् । यमेन पूजिता यान्ति देवसालोक्यतां ततः ॥
vaivasvataṃ ca paśyanti sukhacittaṃ sukhasthitam | yamena pūjitā yānti devasālokyatāṃ tataḥ
वे सुखी चित्त और सुख से बैठे हुए वैवस्वत को देखते हैं; यम से पूजित होकर वे फिर देवताओं के सालोक्य को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 86 (14.100.86)
देवानुद्दिश्य लोकेषु प्रपासु करकोद्धृतम् । शीतलं सलिलं रम्यं तृषितेभ्यो दिशन्ति ये । ते तु तृप्तिं परां यान्ति प्राप्य सौख्यं महापथम् ॥
devānuddiśya lokeṣu prapāsu karakoddhṛtam | śītalaṃ salilaṃ ramyaṃ tṛṣitebhyo diśanti ye | te tu tṛptiṃ parāṃ yānti prāpya saukhyaṃ mahāpatham
जो लोग देवताओं के उद्देश्य से मार्गों की प्याऊ में घड़ों से निकाला हुआ शीतल, सुन्दर जल प्यासों को पिलाते हैं, वे परम तृप्ति पाते हैं और महापथ पर सुख प्राप्त करते हैं।
श्लोक 87 (14.100.87)
काष्ठपादुकदा यान्ति तदध्वानं सुखं नराः । सौवर्णमणिपीठे तु पादं कृत्वा रथोत्तमे ॥
kāṣṭhapādukadā yānti tadadhvānaṃ sukhaṃ narāḥ | sauvarṇamaṇipīṭhe tu pādaṃ kṛtvā rathottame
काठ की खड़ाऊँ देने वाले मनुष्य उस मार्ग पर सुखपूर्वक जाते हैं, श्रेष्ठ रथ में सोने और मणियों के पीढ़े पर पैर रखकर।
श्लोक 88 (14.100.88)
आरामान्वृक्षषण्डांश्च रोपयन्ति च ये नराः । संवर्धयन्ति चाव्यग्रं फलपुष्पोपशोभितम् ॥
ārāmānvṛkṣaṣaṇḍāṃśca ropayanti ca ye narāḥ | saṃvardhayanti cāvyagraṃ phalapuṣpopaśobhitam
जो मनुष्य बाग और वृक्षों के समूह लगाते हैं और बिना थके उन्हें सींचकर फल-फूलों से सुशोभित करते हैं,
श्लोक 89 (14.100.89)
वृक्षच्छायासु रम्यासु शीतलासु स्वलङ्कृताः । यान्ति ते वाहनैर्दिव्यैः पूज्यमाना मुहुर्मुहुः ॥
vṛkṣacchāyāsu ramyāsu śītalāsu svalaṅkṛtāḥ | yānti te vāhanairdivyaiḥ pūjyamānā muhurmuhuḥ
वे सुन्दर वस्त्राभूषणों से सजे, रमणीय और शीतल वृक्षों की छाया में बार-बार सम्मानित होते हुए दिव्य वाहनों से जाते हैं,
श्लोक 90 (14.100.90)
सेव्यमानाः सुरूपाभिरुत्तमाभिः प्रयत्नतः । स्त्रीभिः कनकवर्णाभिर्यथाकामं यथासुखम् ॥
sevyamānāḥ surūpābhiruttamābhiḥ prayatnataḥ | strībhiḥ kanakavarṇābhiryathākāmaṃ yathāsukham
और सोने के रंग वाली, सुन्दर रूप की उत्तम स्त्रियों द्वारा प्रयत्नपूर्वक इच्छानुसार सुखपूर्वक सेवित होते हैं।
श्लोक 91 (14.100.91)
अश्वयानं तु गोयानं हस्तियानमथापि च । ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यो विमानैः कनकोपमैः ॥
aśvayānaṃ tu goyānaṃ hastiyānamathāpi ca | ye prayacchanti viprebhyo vimānaiḥ kanakopamaiḥ
जो ब्राह्मणों को अश्वयान, गोयान या हस्तीयान देते हैं, वे सोने के समान विमानों में जाते हैं।
श्लोक 92 (14.100.92)
सुवर्णं रजतं वाऽपि विद्रुमं मौक्तिकं तथा । ये प्रयच्छन्ति ते यान्ति विमानैः कनकोज्ज्वलैः । ते व्रजन्ति वरस्त्रीभिः सेव्यमाना यथासुखम् ॥
suvarṇaṃ rajataṃ vā'pi vidrumaṃ mauktikaṃ tathā | ye prayacchanti te yānti vimānaiḥ kanakojjvalaiḥ | te vrajanti varastrībhiḥ sevyamānā yathāsukham
जो सोना, चाँदी, मूँगा या मोती देते हैं, वे सोने की तरह चमकने वाले विमानों में जाते हैं; वे श्रेष्ठ स्त्रियों से सेवित होकर सुखपूर्वक जाते हैं।
श्लोक 93 (14.100.93)
भूमिदा यान्ति तं लोकं सर्वकामैः सुतर्पिताः । उदितादित्यसंकाशैर्विमानैर्वृषयोजितैः ॥
bhūmidā yānti taṃ lokaṃ sarvakāmaiḥ sutarpitāḥ | uditādityasaṃkāśairvimānairvṛṣayojitaiḥ
भूमिदान करने वाले सब कामनाओं से भलीभाँति तृप्त होकर उस लोक को जाते हैं, उदित सूर्य के समान चमकने वाले, बैलों से जुते विमानों में।
श्लोक 94 (14.100.94)
कन्यां ये च प्रयच्छन्ति विप्राय श्रोत्रियाय च । दिव्यकन्यावृता यान्ति विमानैस्ते यमालयम् ॥
kanyāṃ ye ca prayacchanti viprāya śrotriyāya ca | divyakanyāvṛtā yānti vimānaiste yamālayam
जो श्रोत्रिय ब्राह्मण को कन्या देते हैं, वे दिव्य कन्याओं से घिरे हुए विमानों में यमलोक जाते हैं।
श्लोक 95 (14.100.95)
सुगन्धान्गन्धसंयोगान्पुष्पाणि सुरभीणि च । प्रयच्छन्ति द्विजाग्रेभ्यो भक्त्या परमया युताः ॥
sugandhāngandhasaṃyogānpuṣpāṇi surabhīṇi ca | prayacchanti dvijāgrebhyo bhaktyā paramayā yutāḥ
जो परम भक्ति के साथ श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सुगन्धित पदार्थ, इत्र और सुन्दर महकते फूल देते हैं,
श्लोक 96 (14.100.96)
सुगन्धाः सुष्ठुवेषाश्च सुप्रभाः स्रग्विभूषणाः । यान्ति धर्मपुरं यानैर्विचित्रैरप्यलङ्कृताः ॥
sugandhāḥ suṣṭhuveṣāśca suprabhāḥ sragvibhūṣaṇāḥ | yānti dharmapuraṃ yānairvicitrairapyalaṅkṛtāḥ
वे सुगन्ध से युक्त, सुन्दर वेष वाले, तेजस्वी, माला और आभूषण पहने हुए, विचित्र वाहनों से सजे हुए धर्मपुरी को जाते हैं।
श्लोक 97 (14.100.97)
दीपदा यान्ति यानैश्च द्योतयन्तो दिशो दश । आदित्यसदृशाकारैर्दीप्यमाना इवाग्नयः ॥
dīpadā yānti yānaiśca dyotayanto diśo daśa | ādityasadṛśākārairdīpyamānā ivāgnayaḥ
दीपदान करने वाले दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए, सूर्य के समान रूप वाले, अग्नि की तरह दीप्त होते हुए वाहनों में जाते हैं।
श्लोक 98 (14.100.98)
गृहावसथदातारो गृहैः काञ्चनवेदिकैः । व्रजन्ति बालसूर्याभैर्धर्मराजपुरं नराः ॥
gṛhāvasathadātāro gṛhaiḥ kāñcanavedikaiḥ | vrajanti bālasūryābhairdharmarājapuraṃ narāḥ
अतिथियों के ठहरने के लिए घर देने वाले मनुष्य बाल सूर्य के समान चमकने वाले, सोने की वेदियों वाले घरों में धर्मराज की नगरी को जाते हैं।
श्लोक 99 (14.100.99)
जलभाजनदातारः कुण्डिकाकरकप्रदाः । पूज्यमाना वरस्त्रीभिर्यान्ति तृप्ता महागजैः ॥
jalabhājanadātāraḥ kuṇḍikākarakapradāḥ | pūjyamānā varastrībhiryānti tṛptā mahāgajaiḥ
जल के पात्र, कुण्डिकाएँ और घड़े देने वाले श्रेष्ठ स्त्रियों से पूजित होकर तृप्त भाव से बड़े हाथियों पर जाते हैं।
श्लोक 100 (14.100.100)
पादाभ्यङ्गं शिरोभ्यङ्गं पानं पादोदकं तथा । ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्ते यान्त्यश्वैर्यमालयम् ॥
pādābhyaṅgaṃ śirobhyaṅgaṃ pānaṃ pādodakaṃ tathā | ye prayacchanti viprebhyaste yāntyaśvairyamālayam
जो ब्राह्मणों को पैरों की मालिश, सिर की मालिश, पेय और पाद्य जल देते हैं, वे घोड़ों पर यमलोक जाते हैं।
श्लोक 101 (14.100.101)
विश्रामायन्ति ये विप्राञ्श्रान्तानध्वनि कर्शितान् । चक्रवाकप्रयुक्तेन यान्ति यानेन तेऽपि च ॥
viśrāmāyanti ye viprāñśrāntānadhvani karśitān | cakravākaprayuktena yānti yānena te'pi ca
जो मार्ग में थके और दुर्बल ब्राह्मणों को विश्राम देते हैं, वे भी चकवों से जुते वाहन में जाते हैं।
श्लोक 102 (14.100.102)
स्वागतेन च यो विप्रान्पूजयेदासनेन च । स गच्छति तदध्वानं सुखं परमनिर्वृतः ॥
svāgatena ca yo viprānpūjayedāsanena ca | sa gacchati tadadhvānaṃ sukhaṃ paramanirvṛtaḥ
जो स्वागत और आसन से ब्राह्मणों की पूजा करता है, वह परम सन्तुष्ट होकर उस मार्ग पर सुखपूर्वक जाता है।
श्लोक 103 (14.100.103)
नमो ब्रह्मण्यदेवेति यो मां दृष्ट्वाऽभिवादयेत् । व्रतवत् प्रयतो नित्यं स सुखं तत्पदं व्रजेत् ॥
namo brahmaṇyadeveti yo māṃ dṛṣṭvā'bhivādayet | vratavat prayato nityaṃ sa sukhaṃ tatpadaṃ vrajet
'ब्राह्मणों के देवता को नमस्कार' कहकर जो मुझे देखकर प्रणाम करता है, और सदा व्रत के समान संयमी रहता है, वह सुखपूर्वक उस धाम को जाता है।
श्लोक 104 (14.100.104)
नमः सर्वसहाभ्यश्चेत्यभिख्याय दिनेदिने । नमस्करोति नित्यं गां स सुखं याति तत्पथं ॥
namaḥ sarvasahābhyaścetyabhikhyāya dinedine | namaskaroti nityaṃ gāṃ sa sukhaṃ yāti tatpathaṃ
जो प्रतिदिन 'सब कुछ सहन करने वालियों को नमस्कार' कहकर नित्य गौ को प्रणाम करता है, वह उस मार्ग पर सुखपूर्वक जाता है।
श्लोक 105 (14.100.105)
नमोस्तु प्रियदत्तायेत्येवंवादी दिनेदिने । भूमिमाक्रमते प्रातः शयनादुत्थितश्च यः ॥
namostu priyadattāyetyevaṃvādī dinedine | bhūmimākramate prātaḥ śayanādutthitaśca yaḥ
जो प्रतिदिन 'प्रियदत्त को नमस्कार हो' ऐसा कहता है और प्रातः शय्या से उठकर पृथ्वी पर पैर रखता है,
श्लोक 106 (14.100.106)
सर्वकामैः स तृप्तात्मा सर्वभूषणभूषितः । याति यानेन दिव्येन सुखं वैवस्वतालयम् ॥
sarvakāmaiḥ sa tṛptātmā sarvabhūṣaṇabhūṣitaḥ | yāti yānena divyena sukhaṃ vaivasvatālayam
वह सब कामनाओं से तृप्त और सब आभूषणों से विभूषित होकर दिव्य विमान में सुखपूर्वक वैवस्वत के धाम जाता है।
श्लोक 107 (14.100.107)
अनन्तराशिनो ये तु डंभानृतविवर्जिताः । तेऽपि सारसयुक्तेन यान्ति यानेन वै सुखम् ॥
anantarāśino ye tu ḍaṃbhānṛtavivarjitāḥ | te'pi sārasayuktena yānti yānena vai sukham
जो दम्भ और असत्य से रहित होकर अन्तराल देकर भोजन करते हैं, वे भी सारसों से जुते वाहन में सुखपूर्वक जाते हैं।
श्लोक 108 (14.100.108)
ये चाप्येकेन भुक्तेन डंभानृतविवर्जिताः । हंसयुक्तैर्विमानैस्तु सुखं यान्ति यमालयम् ॥
ye cāpyekena bhuktena ḍaṃbhānṛtavivarjitāḥ | haṃsayuktairvimānaistu sukhaṃ yānti yamālayam
जो दम्भ और असत्य से रहित होकर एक समय के भोजन पर जीवन चलाते हैं, वे हंसों से जुते विमानों में सुखपूर्वक यमलोक जाते हैं।
श्लोक 109 (14.100.109)
चतुर्थेन च भुक्तेन वर्तन्ते ये जितेन्द्रियाः । यान्ति ते धर्मनगरं यानैर्बर्हिणयोजितैः ॥
caturthena ca bhuktena vartante ye jitendriyāḥ | yānti te dharmanagaraṃ yānairbarhiṇayojitaiḥ
जो जितेन्द्रिय चौथे भोजन-काल पर भोजन करते हैं, वे मोरों से जुते वाहनों में धर्मनगर जाते हैं।
श्लोक 110 (14.100.110)
तृतीयदिवसेनेह भुञ्जते ये जितेन्द्रियाः । तेऽपि हस्तिरथं यान्ति तत्पथं कनकोज्ज्वलैः ॥
tṛtīyadivaseneha bhuñjate ye jitendriyāḥ | te'pi hastirathaṃ yānti tatpathaṃ kanakojjvalaiḥ
जो जितेन्द्रिय यहाँ तीसरे दिन भोजन करते हैं, वे भी सोने के समान चमकने वाले हाथी-रथों में उस मार्ग पर जाते हैं।
श्लोक 111 (14.100.111)
षष्ठान्नकालिको यस्तु वर्षमेकं तु वर्तते । कामक्रोधविनिर्मुक्तः शुचिर्नित्यं जितेन्द्रियः । स याति कुञ्जरस्थैस्तु जयशब्दरवैर्युतः ॥
ṣaṣṭhānnakāliko yastu varṣamekaṃ tu vartate | kāmakrodhavinirmuktaḥ śucirnityaṃ jitendriyaḥ | sa yāti kuñjarasthaistu jayaśabdaravairyutaḥ
जो काम और क्रोध से मुक्त, पवित्र और सदा जितेन्द्रिय रहकर एक वर्ष तक छठे भोजन-काल पर भोजन करता है, वह जयघोष के साथ हाथी पर बैठकर जाता है।
श्लोक 112 (14.100.112)
पक्षोपवासिनो यान्ति यानैः शार्दूलयोजितैः । धर्मराजपुरं रम्यं दिव्यस्त्रीगणसेवितम् ॥
pakṣopavāsino yānti yānaiḥ śārdūlayojitaiḥ | dharmarājapuraṃ ramyaṃ divyastrīgaṇasevitam
जो पन्द्रह दिन का उपवास करते हैं, वे बाघों से जुते वाहनों में दिव्य स्त्रियों के समूह से सेवित, धर्मराज की रमणीय नगरी को जाते हैं।
श्लोक 113 (14.100.113)
ये च मासोपवासं वै कुर्वते संयतेन्द्रियाः । तेऽपि सूर्योदयप्रख्यैर्यान्ति यानैर्यमालयम् ॥
ye ca māsopavāsaṃ vai kurvate saṃyatendriyāḥ | te'pi sūryodayaprakhyairyānti yānairyamālayam
और जो संयतेन्द्रिय एक मास का उपवास करते हैं, वे उदय होते सूर्य के समान चमकने वाले वाहनों में यमलोक जाते हैं।
श्लोक 114 (14.100.114)
अग्निप्रवेशं यश्चापि कुरुते मद्गतात्मना । स यात्यग्निप्रकाशेन विमानेन यमालयम् ॥
agnipraveśaṃ yaścāpi kurute madgatātmanā | sa yātyagniprakāśena vimānena yamālayam
जो मुझमें मन लगाकर अग्नि में प्रवेश करता है, वह अग्नि के समान प्रकाशमान विमान में यमलोक जाता है।
श्लोक 115 (14.100.115)
गोकृते स्त्रीकृते चैव हता विप्रकृतेऽपि च । ते यान्त्यमरकन्याभिः सेव्यमाना रविप्रभाः ॥
gokṛte strīkṛte caiva hatā viprakṛte'pi ca | te yāntyamarakanyābhiḥ sevyamānā raviprabhāḥ
जो गौ के लिए, स्त्री के लिए या ब्राह्मण के लिए मारे जाते हैं, वे अमर कन्याओं से सेवित और सूर्य के समान तेजस्वी होकर जाते हैं।
श्लोक 116 (14.100.116)
ये च कुर्वन्ति मद्भक्तास्तीर्थयात्रां जितेन्द्रियाः । ते पन्थानं महात्मानो यानैर्यान्ति सुनिर्वृताः ॥
ye ca kurvanti madbhaktāstīrthayātrāṃ jitendriyāḥ | te panthānaṃ mahātmāno yānairyānti sunirvṛtāḥ
जो मेरे भक्त जितेन्द्रिय होकर तीर्थयात्रा करते हैं, वे महात्मा पूर्ण सन्तुष्ट होकर वाहनों में उस मार्ग पर जाते हैं।
श्लोक 117 (14.100.117)
ये यजन्ति द्विजश्रेष्ठाः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । हंससारससंयुक्तैर्यानैस्ते यान्ति तत्पथम् ॥
ye yajanti dvijaśreṣṭhāḥ kratubhirbhūridakṣiṇaiḥ | haṃsasārasasaṃyuktairyānaiste yānti tatpatham
जो श्रेष्ठ द्विज प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञों से यजन करते हैं, वे हंसों और सारसों से जुते वाहनों में उस मार्ग पर जाते हैं।
श्लोक 118 (14.100.118)
परपीडामकृत्वैव भृत्यान्बिभ्रति ये नराः । तत्पथं ससुखं यान्ति विमानैः काञ्चनोज्ज्वलैः ॥
parapīḍāmakṛtvaiva bhṛtyānbibhrati ye narāḥ | tatpathaṃ sasukhaṃ yānti vimānaiḥ kāñcanojjvalaiḥ
जो मनुष्य दूसरों को पीड़ा दिए बिना अपने आश्रितों का भरण-पोषण करते हैं, वे सोने की तरह चमकते विमानों में सुखपूर्वक उस मार्ग पर जाते हैं।
श्लोक 119 (14.100.119)
ये समाः सर्वभूतेषु जीवानामभयप्रदाः । क्रोधलोभविनिर्मुक्ता निगृहीतेन्द्रियास्तथा ॥
ye samāḥ sarvabhūteṣu jīvānāmabhayapradāḥ | krodhalobhavinirmuktā nigṛhītendriyāstathā
जो सब प्राणियों के प्रति समभाव रखते हैं, जीवों को अभय देते हैं, क्रोध और लोभ से मुक्त हैं और जिन्होंने इन्द्रियों को वश में कर लिया है,
श्लोक 120 (14.100.120)
पूर्णचन्द्रप्रतीकाशैर्विमानैस्ते महाप्रभाः । यान्ति वैवस्वतपुरं देवगन्धर्वसेविताः ॥
pūrṇacandrapratīkāśairvimānaiste mahāprabhāḥ | yānti vaivasvatapuraṃ devagandharvasevitāḥ
वे पूर्ण चन्द्रमा के समान चमकने वाले विमानों में महान् प्रभा के साथ, देवताओं और गन्धर्वों से सेवित होकर वैवस्वत की नगरी को जाते हैं।
श्लोक 121 (14.100.121)
ये मामेकान्तभावेन देवं त्र्यंबकमेव वा । पूजयन्ति नमस्यन्ति स्तुवन्ति च दिनेदिने । धर्मराजपुरं यान्ति यानैस्तेऽर्कसमप्रभैः ॥
ye māmekāntabhāvena devaṃ tryaṃbakameva vā | pūjayanti namasyanti stuvanti ca dinedine | dharmarājapuraṃ yānti yānaiste'rkasamaprabhaiḥ
जो एकनिष्ठ भाव से मेरी, या देव त्र्यम्बक की, प्रतिदिन पूजा करते, नमस्कार करते और स्तुति करते हैं, वे सूर्य के समान प्रभा वाले वाहनों में धर्मराज की नगरी को जाते हैं।
श्लोक 122 (14.100.122)
पूजितास्तत्र धर्मेण स्वयं माल्यादिभिः शुभैः । यान्त्येव धर्मलोकं वा रुद्रलोकमथापि वा ॥
pūjitāstatra dharmeṇa svayaṃ mālyādibhiḥ śubhaiḥ | yāntyeva dharmalokaṃ vā rudralokamathāpi vā
वहाँ स्वयं धर्मराज द्वारा शुभ मालाओं आदि से सम्मानित होकर वे धर्मलोक को अथवा रुद्रलोक को जाते हैं।