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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 99

बीज और योनि की शुद्धता-अशुद्धता; गायत्री की महिमा; ब्राह्मणों का सम्मान

तीन प्रकार के दानों को सुनकर युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से शुद्ध और अशुद्ध बीज-योनि के लक्षण तथा यह पूछते हैं कि ब्राह्मण किस प्रकार स्वयं तरते और दूसरों को तारते हैं। श्रीकृष्ण अखण्ड ब्रह्मचर्य वाले ब्राह्मण और कुलीन पत्नी का वर्णन करते हैं, व्यभिचारिणी तथा शूद्रा स्त्री से सन्तान उत्पन्न करने की निन्दा करते हैं और गायत्री (सावित्री) को वेदों का प्राण बताते हैं। फिर वे कहते हैं कि ब्राह्मणों का सम्मान उन्हीं का सम्मान है, ब्राह्मणों की निन्दा या उन पर प्रहार करने वालों के लिए नरकों का वर्णन करते हैं, और अन्त में कहते हैं कि ब्राह्मणों की कृपा से ही वे पृथ्वी को धारण करते और असुरों को जीतते हैं।

अध्याय 98अध्याय-सूचीअध्याय 100

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.99.1)

श्रुत्वैवं सात्विकं दानं राजसं तामसं तथा । पृथक्पृथक्त्वेन गतिं फलं चापि पृथक्पृथक् ॥

śrutvaivaṃ sātvikaṃ dānaṃ rājasaṃ tāmasaṃ tathā | pṛthakpṛthaktvena gatiṃ phalaṃ cāpi pṛthakpṛthak

इस प्रकार सात्त्विक, राजस और तामस दान के विषय में, तथा प्रत्येक की अलग-अलग गति और फल के विषय में सुनकर,

श्लोक 2 (14.99.2)

अवितृप्तः प्रहृष्टात्मा पुण्यं धर्मामृतं पुनः । युधिष्ठिरो धर्मरतः केशवं पुनरब्रवीत् ॥

avitṛptaḥ prahṛṣṭātmā puṇyaṃ dharmāmṛtaṃ punaḥ | yudhiṣṭhiro dharmarataḥ keśavaṃ punarabravīt

धर्म में रत युधिष्ठिर तृप्त नहीं हुए; प्रसन्नचित्त होकर धर्म के उस पुण्यमय अमृत को फिर सुनने की इच्छा से उन्होंने केशव से पुनः कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 3 (14.99.3)

बीजयोनिविशुद्धानां लक्षणानि वदस्व मे । बीजदोषेण लोकेश जायन्ते च कथं नराः ॥

bījayoniviśuddhānāṃ lakṣaṇāni vadasva me | bījadoṣeṇa lokeśa jāyante ca kathaṃ narāḥ

हे लोकेश्वर! बीज और योनि की शुद्धता के लक्षण मुझे बताइए, और यह भी कि बीज के दोष से मनुष्य कैसे उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 4 (14.99.4)

आचारदोषं देवेश वक्तुमर्हस्यशेषतः । ब्राह्मणानां विशेषं च गुणदोषौ च केशव ॥

ācāradoṣaṃ deveśa vaktumarhasyaśeṣataḥ | brāhmaṇānāṃ viśeṣaṃ ca guṇadoṣau ca keśava

हे देवेश्वर! आप आचार के दोष, तथा ब्राह्मणों की विशेषता और उनके गुण-दोष, सब कुछ पूर्ण रूप से बताने में समर्थ हैं, हे केशव।

श्लोक 5 (14.99.5)

चातुर्वर्ण्यस्य कुत्स्नस्य वर्तमानाः प्रतिग्रहे । केन विप्रा विशेषेण तरन्ते तारयन्ति च । एतान्कथय देवेश त्वद्भक्तस्य नमोस्तु ते ॥

cāturvarṇyasya kutsnasya vartamānāḥ pratigrahe | kena viprā viśeṣeṇa tarante tārayanti ca | etānkathaya deveśa tvadbhaktasya namostu te

चारों वर्णों में जो लोग दान स्वीकार करके जीवन चलाते हैं, उनमें से ब्राह्मण किस विशेष उपाय से स्वयं तरते और दूसरों को तारते हैं? हे देवेश! यह मुझे बताइए; आपके भक्त का आपको नमस्कार है।

भगवानुवाच

श्लोक 6 (14.99.6)

शृणु राजन्यथावृत्तं बीजयोनिं शुभाशुभम् । येन तिष्ठति लोकोयं विनश्यति च पाण्डव ॥

śṛṇu rājanyathāvṛttaṃ bījayoniṃ śubhāśubham | yena tiṣṭhati lokoyaṃ vinaśyati ca pāṇḍava

हे राजन्! बीज और योनि के शुभ और अशुभ का जैसा वृत्तान्त है, उसे सुनो, जिससे यह लोक टिका रहता है और नष्ट भी होता है, हे पाण्डव।

श्लोक 7 (14.99.7)

अविप्लुतब्रह्मचर्यो यस्तु विप्रो यथाविधि । स बीजं नाम विज्ञेयं तस्य बीजं शुभं भवेत् ॥

aviplutabrahmacaryo yastu vipro yathāvidhi | sa bījaṃ nāma vijñeyaṃ tasya bījaṃ śubhaṃ bhavet

जो ब्राह्मण विधिपूर्वक अपना ब्रह्मचर्य अखण्ड रखता है, वह 'बीज' नाम से जानने योग्य है; उसका बीज शुभ होता है।

श्लोक 8 (14.99.8)

कन्या चाक्षतयोनिः स्यात्कुलीना पितृमातृतः । ब्राह्मणादिषु विवाहेषु परिणीता यथाविधि । सा प्रशस्ता वरारोहा तस्या योनिः प्रशस्यते ॥

kanyā cākṣatayoniḥ syātkulīnā pitṛmātṛtaḥ | brāhmaṇādiṣu vivāheṣu pariṇītā yathāvidhi | sā praśastā varārohā tasyā yoniḥ praśasyate

जिस कन्या की योनि अक्षत हो, जो पिता और माता दोनों ओर से कुलीन हो, और ब्राह्मण आदि वर्णों के विवाहों में विधिपूर्वक ब्याही गई हो, वह सुन्दर कटि वाली कन्या प्रशंसनीय है और उसकी योनि भी प्रशंसनीय है।

श्लोक 9 (14.99.9)

मनसा कर्मणा वाचा या गच्छेत्परपूरुषम् । योनिस्तस्या नरश्रेष्ठ गर्भाधानं न चार्हति ॥

manasā karmaṇā vācā yā gacchetparapūruṣam | yonistasyā naraśreṣṭha garbhādhānaṃ na cārhati

जो स्त्री मन, कर्म या वाणी से पराए पुरुष के पास जाती है, हे नरश्रेष्ठ! उसकी योनि गर्भाधान के योग्य नहीं है।

श्लोक 10 (14.99.10)

स्वैरिण्या यस्तु पापात्मा संतानार्थमिहेच्छति । स कुलान्पातयत्याशु दशपूर्वान्दशापरान् ॥

svairiṇyā yastu pāpātmā saṃtānārthamihecchati | sa kulānpātayatyāśu daśapūrvāndaśāparān

जो पापात्मा यहाँ स्वैरिणी स्त्री से सन्तान चाहता है, वह अपने दस पीढ़ी पहले और दस पीढ़ी बाद के कुलों को शीघ्र गिरा देता है।

श्लोक 11 (14.99.11)

दुष्टयोनौ तु यो मोहाद्रेतः सिञ्चति मूढधीः । तद्रेतसा समुत्पन्नः षडङ्गविदपि द्विजः । साधुभिः स बहिष्कार्यः श्वापाक इव पार्थिव ॥

duṣṭayonau tu yo mohādretaḥ siñcati mūḍhadhīḥ | tadretasā samutpannaḥ ṣaḍaṅgavidapi dvijaḥ | sādhubhiḥ sa bahiṣkāryaḥ śvāpāka iva pārthiva

जो मूढ़बुद्धि मोह से दूषित योनि में वीर्य सींचता है, उस वीर्य से उत्पन्न पुत्र छहों अंगों सहित वेद का ज्ञाता ब्राह्मण भी हो, तो भी हे राजन्! साधुजनों को उसे श्वपाक के समान बहिष्कृत कर देना चाहिए।

श्लोक 12 (14.99.12)

कर्मणा मनसा वाचा या भवेत्स्वैरचारिणी । सा कुलघ्नीति विज्ञेया तस्यां जातः श्वपाचकः ॥

karmaṇā manasā vācā yā bhavetsvairacāriṇī | sā kulaghnīti vijñeyā tasyāṃ jātaḥ śvapācakaḥ

जो स्त्री कर्म, मन और वाणी से स्वेच्छाचारिणी हो, उसे कुल का नाश करने वाली जानना चाहिए; उससे उत्पन्न पुत्र श्वपच होता है।

श्लोक 13 (14.99.13)

दैवे पित्र्ये तथा दाने भोजने सहभाषणे । शयने सहसंबन्धे न योग्या दुष्टयोनिजाः ॥

daive pitrye tathā dāne bhojane sahabhāṣaṇe | śayane sahasaṃbandhe na yogyā duṣṭayonijāḥ

दूषित योनि से उत्पन्न लोग देवकर्म, पितृकर्म, दान, भोजन, बातचीत, एक शय्या पर बैठने और सम्बन्ध जोड़ने के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 14 (14.99.14)

न तस्माद्दुष्टयोन्यां तु गर्भमुत्पादयेद्बुधः । मोहेन कुरुते यस्तु कुलं हन्ति त्रिपूरुषम् ॥

na tasmādduṣṭayonyāṃ tu garbhamutpādayedbudhaḥ | mohena kurute yastu kulaṃ hanti tripūruṣam

इसलिए बुद्धिमान पुरुष दूषित योनि में गर्भ उत्पन्न न करे। जो मोह के वश ऐसा करता है, वह तीन पीढ़ियों तक अपने कुल का नाश करता है।

श्लोक 15 (14.99.15)

कानीनश्च सहोढश्च तथोभौ कुण्डगोलकौ । आरूढपतिताज्जातः पतितस्यापि यः सुतः । षडेते विप्रचण्डाला निकृष्टाः श्वपचादपि ॥

kānīnaśca sahoḍhaśca tathobhau kuṇḍagolakau | ārūḍhapatitājjātaḥ patitasyāpi yaḥ sutaḥ | ṣaḍete vipracaṇḍālā nikṛṣṭāḥ śvapacādapi

कानीन और सहोढ, इसी प्रकार कुण्ड और गोलक दोनों, आरूढपतित से उत्पन्न, और पतित का पुत्र, ये छः ब्राह्मणों में चाण्डाल हैं और श्वपच से भी अधिक निकृष्ट हैं।

श्लोक 16 (14.99.16)

यो यत्र तत्र वा रेतः सिक्त्वा शूद्रासु वा चरेत् । कामचारी स पापात्मा बीजं तस्याशुभं भवेत् ॥

yo yatra tatra vā retaḥ siktvā śūdrāsu vā caret | kāmacārī sa pāpātmā bījaṃ tasyāśubhaṃ bhavet

जो पुरुष जहाँ-तहाँ वीर्य सींचता है, या शूद्र स्त्रियों के साथ स्वेच्छा से विचरता है, वह पापात्मा है और उसका बीज अशुभ हो जाता है।

श्लोक 17 (14.99.17)

अशुद्धं तद्भवेद्बीजं शुद्धां योनिं न चार्हति । दूषयत्यपि तां योनिं शुना लीढं हविर्यथा ॥

aśuddhaṃ tadbhavedbījaṃ śuddhāṃ yoniṃ na cārhati | dūṣayatyapi tāṃ yoniṃ śunā līḍhaṃ haviryathā

वह बीज अशुद्ध हो जाता है और शुद्ध योनि के योग्य नहीं रहता; वह उस योनि को भी वैसे ही दूषित कर देता है, जैसे कुत्ते का चाटा हुआ हविष्य दूषित हो जाता है।

श्लोक 18 (14.99.18)

शूद्रयोनौ पतेद्बीजं हाहाशब्दं द्विजन्मनः । कुर्यात्पुरीषगर्तेषु पतितोऽस्मीति दुःखितः ॥

śūdrayonau patedbījaṃ hāhāśabdaṃ dvijanmanaḥ | kuryātpurīṣagarteṣu patito'smīti duḥkhitaḥ

जब द्विज का बीज शूद्रा की योनि में गिरता है, तब वह दुःखी होकर 'हाय!' की पुकार करता है: 'मैं मल के गड्ढों में गिर गया हूँ!'

श्लोक 19 (14.99.19)

मामधःपातयन्नेष पापात्मा काममोहितः । अधोगतिं व्रजेत्क्षिप्रमिति शप्त्वा पतेत्तु तत् ॥

māmadhaḥpātayanneṣa pāpātmā kāmamohitaḥ | adhogatiṃ vrajetkṣipramiti śaptvā patettu tat

'यह कामवश मोहित पापात्मा मुझे नीचे गिरा रहा है; यह शीघ्र अधोगति को प्राप्त हो', ऐसा शाप देकर वह गिर पड़ता है।

श्लोक 20 (14.99.20)

आत्मा हि शुक्लमुद्दिष्टं दैवतं परमं महत् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन निरुन्ध्याच्छुक्लमात्मनः ॥

ātmā hi śuklamuddiṣṭaṃ daivataṃ paramaṃ mahat | tasmātsarvaprayatnena nirundhyācchuklamātmanaḥ

बीज को ही अपना आत्मा कहा गया है, वही परम और महान् देवता है। इसलिए पूरे प्रयत्न से मनुष्य को अपने बीज की रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 21 (14.99.21)

आयुस्तेजो बलं वीर्यं प्रज्ञा श्रीश्च महद्यशः । पुण्यं च मत्प्रियत्वं च लभते ब्रह्मचर्यया ॥

āyustejo balaṃ vīryaṃ prajñā śrīśca mahadyaśaḥ | puṇyaṃ ca matpriyatvaṃ ca labhate brahmacaryayā

ब्रह्मचर्य से मनुष्य आयु, तेज, बल, वीर्य, प्रज्ञा, श्री, महान् यश, पुण्य और मेरी प्रियता प्राप्त करता है।

श्लोक 22 (14.99.22)

अविप्लुतब्रह्मचर्यैर्गृहस्थाश्रममाश्रितैः । पञ्चयज्ञपरैर्धर्मः स्थाप्यते पृथिवीतले ॥

aviplutabrahmacaryairgṛhasthāśramamāśritaiḥ | pañcayajñaparairdharmaḥ sthāpyate pṛthivītale

जिन्होंने अपना ब्रह्मचर्य अखण्ड रखा, जो गृहस्थाश्रम में स्थित हैं और पंच महायज्ञों में तत्पर हैं, उनसे पृथ्वी पर धर्म की स्थापना होती है।

श्लोक 23 (14.99.23)

सायंप्रातस्तु ये सन्ध्यां सम्यङ्नित्यमुपासते । नावं वेदमयीं कृत्वा तरन्ते तारयन्ति च ॥

sāyaṃprātastu ye sandhyāṃ samyaṅnityamupāsate | nāvaṃ vedamayīṃ kṛtvā tarante tārayanti ca

जो लोग प्रातः और सायं सदा विधिपूर्वक सन्ध्या की उपासना करते हैं, वे वेदमयी नौका बनाकर स्वयं तरते और दूसरों को तारते हैं।

श्लोक 24 (14.99.24)

यो जपेत्पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम् । न सीदेत्प्रतिगृह्णानः पृथिवीं च ससागराम् ॥

yo japetpāvanīṃ devīṃ gāyatrīṃ vedamātaram | na sīdetpratigṛhṇānaḥ pṛthivīṃ ca sasāgarām

जो पावन करने वाली, वेदमाता देवी गायत्री का जप करता है, वह दान स्वीकार करता हुआ भी, चाहे वह समुद्रों सहित सारी पृथ्वी हो, दुःख में नहीं डूबता।

श्लोक 25 (14.99.25)

ये चास्य दुःस्थिताः केचिद्ग्रहाः सूर्यादयो दिवि । ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवाः शुभकरास्तथा ॥

ye cāsya duḥsthitāḥ kecidgrahāḥ sūryādayo divi | te cāsya saumyā jāyante śivāḥ śubhakarāstathā

आकाश में सूर्य आदि जो ग्रह उसके लिए अशुभ स्थिति में हों, वे भी उसके लिए सौम्य, कल्याणकारी और शुभ करने वाले हो जाते हैं।

श्लोक 26 (14.99.26)

यत्र यत्र स्थिताश्चैव दारुणाः पिशिताशनाः । घोररूपा महाकाया धर्षयन्ति न तं द्विजम् ॥

yatra yatra sthitāścaiva dāruṇāḥ piśitāśanāḥ | ghorarūpā mahākāyā dharṣayanti na taṃ dvijam

जहाँ-जहाँ भी भयंकर रूप वाले, विशाल शरीर वाले दारुण मांसभक्षी स्थित हों, वे उस द्विज को पीड़ित नहीं कर सकते।

श्लोक 27 (14.99.27)

पुनन्तीह पृथिव्यां च चीर्णवेदव्रता नराः । चतुर्णामपि वेदानां सा हि राजन्गरीयसी ॥

punantīha pṛthivyāṃ ca cīrṇavedavratā narāḥ | caturṇāmapi vedānāṃ sā hi rājangarīyasī

वेदव्रत का पालन करने वाले मनुष्य यहाँ पृथ्वी को पवित्र करते हैं; क्योंकि हे राजन्! वह गायत्री चारों वेदों से भी भारी है।

श्लोक 28 (14.99.28)

अचीर्णव्रतवेदा ये विकर्मफलमाश्रिताः । ब्राह्मणा नाममात्रेण तेऽपि पूज्या युधिष्ठिर । किं पुनर्यस्तु सन्ध्ये द्वे नित्यमेवोपतिष्ठते ॥

acīrṇavratavedā ye vikarmaphalamāśritāḥ | brāhmaṇā nāmamātreṇa te'pi pūjyā yudhiṣṭhira | kiṃ punaryastu sandhye dve nityamevopatiṣṭhate

जिन्होंने वेदव्रत का पालन नहीं किया और जो निन्दित कर्मों के फल पर आश्रित हैं, वे भी केवल नाम के ब्राह्मण होने से पूजनीय हैं, हे युधिष्ठिर; फिर जो प्रतिदिन दोनों सन्ध्याओं की उपासना करता है, उसकी तो बात ही क्या।

श्लोक 29 (14.99.29)

शीलमध्ययनं दानं शौचं मार्दवमार्जवम् । तस्माद्वेदाद्विशिष्टानि मनुराह प्रजापतिः ॥

śīlamadhyayanaṃ dānaṃ śaucaṃ mārdavamārjavam | tasmādvedādviśiṣṭāni manurāha prajāpatiḥ

शील, अध्ययन, दान, शौच, कोमलता और सरलता, इन्हें प्रजापति मनु ने वेद से भी श्रेष्ठ कहा है।

श्लोक 30 (14.99.30)

भूर्भुवस्स्वरिति ब्रह्म यो वेदनिरतो द्विजः । स्वदारनिरतो दान्तः स विद्वान्स च भूसुरः ॥

bhūrbhuvassvariti brahma yo vedanirato dvijaḥ | svadāranirato dāntaḥ sa vidvānsa ca bhūsuraḥ

जो वेद में रत द्विज 'भूर्भुवः स्वः' इस प्रकार ब्रह्म को जानता है, अपनी पत्नी में ही सन्तुष्ट और संयमी है, वही विद्वान् है और वही पृथ्वी का देवता है।

श्लोक 31 (14.99.31)

सन्ध्यामुपासते ये वै नित्यमेव द्विजोत्तमाः । ते यान्ति नरशार्दूल ब्रह्मलोकं न संशयः ॥

sandhyāmupāsate ye vai nityameva dvijottamāḥ | te yānti naraśārdūla brahmalokaṃ na saṃśayaḥ

जो श्रेष्ठ द्विज प्रतिदिन सन्ध्या की उपासना करते हैं, हे नरशार्दूल! वे ब्रह्मलोक को जाते हैं, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 32 (14.99.32)

सावित्रीमात्रसारोपि वरो विप्रः सुयन्त्रितः । नायन्त्रितश्चतुर्वेदी सर्वाशी सर्वविक्रयी ॥

sāvitrīmātrasāropi varo vipraḥ suyantritaḥ | nāyantritaścaturvedī sarvāśī sarvavikrayī

जिसका सार केवल सावित्री ही है, ऐसा संयमी ब्राह्मण भी श्रेष्ठ है; चारों वेदों को जानने वाला भी यदि संयमहीन हो, सब कुछ खाता हो और सब कुछ बेचता हो, तो वह श्रेष्ठ नहीं।

श्लोक 33 (14.99.33)

सावित्रीं चैव वेदांश्च तुलयाऽतोलयन्पुरा । सदेवर्षिगणाश्चैव सर्वे ब्रह्मपुरस्सराः । चतुर्णामपि वेदानां सा हि राजन्गरीयसी ॥

sāvitrīṃ caiva vedāṃśca tulayā'tolayanpurā | sadevarṣigaṇāścaiva sarve brahmapurassarāḥ | caturṇāmapi vedānāṃ sā hi rājangarīyasī

पूर्वकाल में ब्रह्मा को आगे करके सब देवताओं और ऋषिगणों ने सावित्री और वेदों को तराजू पर तौला था; हे राजन्! तब वह सावित्री चारों वेदों से भारी ठहरी।

श्लोक 34 (14.99.34)

यथा विकसिते पुष्पे मधु गृह्णन्ति षट्पदाः । एवं गृहीता सावित्री सर्ववेदे च पाण्डव ॥

yathā vikasite puṣpe madhu gṛhṇanti ṣaṭpadāḥ | evaṃ gṛhītā sāvitrī sarvavede ca pāṇḍava

जैसे खिले हुए फूल से भौंरे मधु ग्रहण करते हैं, वैसे ही, हे पाण्डव! सम्पूर्ण वेद से सावित्री ग्रहण की गई है।

श्लोक 35 (14.99.35)

तस्मात्तु सर्ववेदानां सावित्री प्राण उच्यते । निर्जीवा हीतरे वेदा विना सावित्रिया नृप ॥

tasmāttu sarvavedānāṃ sāvitrī prāṇa ucyate | nirjīvā hītare vedā vinā sāvitriyā nṛpa

इसलिए सावित्री को सब वेदों का प्राण कहा जाता है; हे राजन्! सावित्री के बिना अन्य वेद निर्जीव हैं।

श्लोक 36 (14.99.36)

नायन्त्रितश्चतुर्वेदी शीलभ्रष्टः स कुत्सितः । शीलवृत्तसमायुक्तः सावित्रीपाठको वरः ॥

nāyantritaścaturvedī śīlabhraṣṭaḥ sa kutsitaḥ | śīlavṛttasamāyuktaḥ sāvitrīpāṭhako varaḥ

चारों वेदों का ज्ञाता भी यदि संयमहीन और शील से भ्रष्ट हो तो निन्दनीय है; शील और सदाचार से युक्त सावित्री का पाठ करने वाला श्रेष्ठ है।

श्लोक 37 (14.99.37)

सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम् । सावित्रीं जप कौन्तेय सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥

sahasraparamāṃ devīṃ śatamadhyāṃ daśāvarām | sāvitrīṃ japa kaunteya sarvapāpapraṇāśinīm

हे कुन्तीपुत्र! सब पापों का नाश करने वाली देवी सावित्री का जप करो: अधिक से अधिक सहस्र बार, मध्यम सौ बार और कम से कम दस बार।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 38 (14.99.38)

त्रैलोक्यनाथ हे कृष्ण सर्वभूतात्मको ह्यसि । नानायोगपर श्रेष्ठ तुष्यसे केन कर्मणा ॥

trailokyanātha he kṛṣṇa sarvabhūtātmako hyasi | nānāyogapara śreṣṭha tuṣyase kena karmaṇā

हे त्रिलोकीनाथ कृष्ण! आप सब प्राणियों के आत्मा हैं। हे अनेक योगों में तत्पर रहने वालों में श्रेष्ठ! आप किस कर्म से प्रसन्न होते हैं?

भगवानुवाच

श्लोक 39 (14.99.39)

यदि भारसहस्रं तु गुग्गुल्वादि प्रधूपयेत् । करोति चेन्नमस्कारमुपहारं च कारयेत् ॥

yadi bhārasahasraṃ tu guggulvādi pradhūpayet | karoti cennamaskāramupahāraṃ ca kārayet

यदि कोई गुग्गुल आदि का धूप हजारों भार जला दे, नमस्कार करे और भेंट अर्पित कराए,

श्लोक 40 (14.99.40)

स्तौति यः स्तुतिभिर्मां च ऋग्यजुस्सामभिः सदा । न तोषयति चेद्विप्रान्नाहं तुष्यामि भारत ॥

stauti yaḥ stutibhirmāṃ ca ṛgyajussāmabhiḥ sadā | na toṣayati cedviprānnāhaṃ tuṣyāmi bhārata

और ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद के मन्त्रों से सदा मेरी स्तुति भी करे, परन्तु यदि वह ब्राह्मणों को सन्तुष्ट नहीं करता, तो हे भारत! मैं प्रसन्न नहीं होता।

श्लोक 41 (14.99.41)

ब्राह्मणे पूजिते नित्यं पूजितोस्मि न संशयः । आक्रुष्टे चाहमाक्रुष्टो भवामि भरतर्षभ ॥

brāhmaṇe pūjite nityaṃ pūjitosmi na saṃśayaḥ | ākruṣṭe cāhamākruṣṭo bhavāmi bharatarṣabha

ब्राह्मण की पूजा होने पर मेरी सदा पूजा होती है, इसमें संशय नहीं; और उसकी निन्दा होने पर, हे भरतश्रेष्ठ! मेरी निन्दा होती है।

श्लोक 42 (14.99.42)

परा मयि गतिस्तेषां पूजयन्ति द्विजं हि ये । यदहं द्विजरूपेण वसामि वसुधातले ॥

parā mayi gatisteṣāṃ pūjayanti dvijaṃ hi ye | yadahaṃ dvijarūpeṇa vasāmi vasudhātale

जो द्विज की पूजा करते हैं, उनकी परम गति मैं हूँ, क्योंकि मैं पृथ्वी पर द्विज के रूप में निवास करता हूँ।

श्लोक 43 (14.99.43)

यस्तान्पूजयति प्राज्ञो मद्गतेनान्तरात्मना । तमहं स्वेन रूपेण पश्यामि नरपुङ्गव ॥

yastānpūjayati prājño madgatenāntarātmanā | tamahaṃ svena rūpeṇa paśyāmi narapuṅgava

जो बुद्धिमान मुझमें लगे अन्तःकरण से उनकी पूजा करता है, हे नरश्रेष्ठ! उसे मैं अपने रूप में दर्शन देता हूँ।

श्लोक 44 (14.99.44)

कुब्जाः काणा वामनाश्च दरिद्रा व्याधितास्तथा । नावमान्या द्विजाः प्राज्ञैर्मम रूपा हि ते द्विजाः ॥

kubjāḥ kāṇā vāmanāśca daridrā vyādhitāstathā | nāvamānyā dvijāḥ prājñairmama rūpā hi te dvijāḥ

कुबड़े, काने, बौने, दरिद्र और रोगी द्विजों का भी ज्ञानी लोग अपमान न करें, क्योंकि वे द्विज मेरा ही रूप हैं।

श्लोक 45 (14.99.45)

ये केचित्सागरान्तायां पृथिव्यां द्विजसत्तमाः । मम रूपं हि तेष्वेवमर्चितेष्वर्चितोऽस्म्यहम् ॥

ye kecitsāgarāntāyāṃ pṛthivyāṃ dvijasattamāḥ | mama rūpaṃ hi teṣvevamarciteṣvarcito'smyaham

समुद्र तक फैली हुई पृथ्वी पर जो कोई श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, उनमें मेरा ही रूप है; उनकी पूजा होने पर मैं पूजित होता हूँ।

श्लोक 46 (14.99.46)

बहवस्तु न जानन्ति नरा ज्ञानबहिष्कृताः । यदहं द्विजरूपेण वसामि वसुधातले ॥

bahavastu na jānanti narā jñānabahiṣkṛtāḥ | yadahaṃ dvijarūpeṇa vasāmi vasudhātale

ज्ञान से वंचित बहुत से मनुष्य यह नहीं जानते कि मैं पृथ्वी पर द्विज के रूप में निवास करता हूँ।

श्लोक 47 (14.99.47)

अवमन्यन्ति ये विप्रान्स्वधर्मात्पातयन्ति ते । प्रेषणैः प्रेषयन्ते च शुश्रूषां कारयन्ति च ॥

avamanyanti ye viprānsvadharmātpātayanti te | preṣaṇaiḥ preṣayante ca śuśrūṣāṃ kārayanti ca

जो ब्राह्मणों का अपमान करते हैं, वे उन्हें उनके स्वधर्म से गिराते हैं; वे उन्हें इधर-उधर भेजते हैं और उनसे सेवा कराते हैं।

श्लोक 48 (14.99.48)

मृतांश्चात्र परत्रेमान्यमदूता महाबलाः । निकृन्तन्ति यथाकामं सूत्रमार्गेण शिल्पिनः ॥

mṛtāṃścātra paratremānyamadūtā mahābalāḥ | nikṛntanti yathākāmaṃ sūtramārgeṇa śilpinaḥ

मरने के बाद परलोक में यमराज के महाबली दूत इन लोगों को इच्छानुसार काटते हैं, जैसे शिल्पी सूत की रेखा के अनुसार काटते हैं।

श्लोक 49 (14.99.49)

आक्रोशपरिवादाभ्यां ये रमन्ते द्विजातिषु । तान्मृतान्यमलोकस्थान्निपात्य पृथिवीतले ॥

ākrośaparivādābhyāṃ ye ramante dvijātiṣu | tānmṛtānyamalokasthānnipātya pṛthivītale

जो द्विजातियों की निन्दा और गाली-गलौज में आनन्द लेते हैं, उन्हें मरकर यमलोक में पहुँचने पर यमराज पृथ्वी पर पटक देते हैं;

श्लोक 50 (14.99.50)

आक्रम्योरसि पादेन क्रूरः संरक्तलोचनः । अग्निवर्णैस्तु संदंशैर्यमो जिह्वां समुद्धरेत् ॥

ākramyorasi pādena krūraḥ saṃraktalocanaḥ | agnivarṇaistu saṃdaṃśairyamo jihvāṃ samuddharet

और क्रूर, रक्तिम नेत्रों वाले यमराज उनकी छाती पर पैर रखकर आग के समान तप्त संडासियों से उनकी जीभ खींच निकालते हैं।

श्लोक 51 (14.99.51)

ये च विप्रान्निरीक्षन्ते पापाः पापेन चक्षुषा । अब्रह्मण्याः श्रुतेर्बाह्या नित्यं ब्रह्मद्विषो नराः ॥

ye ca viprānnirīkṣante pāpāḥ pāpena cakṣuṣā | abrahmaṇyāḥ śruterbāhyā nityaṃ brahmadviṣo narāḥ

जो पापी लोग ब्राह्मणों को पाप भरी दृष्टि से देखते हैं, जो ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धाहीन, वेद से बाहर और सदा ब्राह्मणों से द्वेष करने वाले हैं,

श्लोक 52 (14.99.52)

तेषां घोरा महाकाया वक्रतुण्डा महाबलाः । उद्धरन्ति मुहूर्तेन खगाश्चक्षुर्यमाज्ञया ॥

teṣāṃ ghorā mahākāyā vakratuṇḍā mahābalāḥ | uddharanti muhūrtena khagāścakṣuryamājñayā

उनकी आँखें भयंकर, विशाल शरीर वाले, टेढ़ी चोंच वाले और महाबली पक्षी यमराज की आज्ञा से क्षण भर में नोच निकालते हैं।

श्लोक 53 (14.99.53)

यः प्रहारं द्विजेन्द्राय दद्यात्कुर्याच्च शोणितम् । अस्थिभङ्गं च यः कुर्यात्प्राणैर्वा विप्रयोजयेत् । सोनुपूर्व्येण यातीमान्नरकानेकविंशतिम् ॥

yaḥ prahāraṃ dvijendrāya dadyātkuryācca śoṇitam | asthibhaṅgaṃ ca yaḥ kuryātprāṇairvā viprayojayet | sonupūrvyeṇa yātīmānnarakānekaviṃśatim

जो श्रेष्ठ द्विज पर प्रहार करता है, उसका रक्त बहाता है, उसकी हड्डी तोड़ता है या उसे प्राणों से वंचित करता है, वह क्रम से इक्कीस नरकों में जाता है।

श्लोक 54 (14.99.54)

शूलमारोप्यते पश्चाज्ज्वलने परिपच्यते । बहुवर्षसहस्राणि पच्यमानस्त्ववाक्छिराः । नावमुच्येत दुर्मेधा न तस्य क्षीयते गतिः ॥

śūlamāropyate paścājjvalane paripacyate | bahuvarṣasahasrāṇi pacyamānastvavākchirāḥ | nāvamucyeta durmedhā na tasya kṣīyate gatiḥ

वह शूल पर चढ़ाया जाता है और फिर आग में पकाया जाता है; हजारों वर्षों तक वह मूर्ख सिर नीचे करके पकाया जाता है, छूटता नहीं, और उसकी यह गति समाप्त नहीं होती।

श्लोक 55 (14.99.55)

ब्राह्मणान्वा विचार्यैव व्रजन्वै वधकाङ्क्षया । शतवर्षसहस्राणि तामिस्रे परिपच्यते ॥

brāhmaṇānvā vicāryaiva vrajanvai vadhakāṅkṣayā | śatavarṣasahasrāṇi tāmisre paripacyate

जो ब्राह्मणों को मारने की इच्छा से, मन में निश्चय करके निकल पड़ता है, वह लाख वर्षों तक तामिस्र नरक में पकाया जाता है।

श्लोक 56 (14.99.56)

उत्पाद्य शोणितं गात्रात्संरंभमतिपूर्वकम् । स पर्यायेण यातीमान्नरकानेकविंशतिम् ॥

utpādya śoṇitaṃ gātrātsaṃraṃbhamatipūrvakam | sa paryāyeṇa yātīmānnarakānekaviṃśatim

जो क्रोध के आवेश में जान-बूझकर ब्राह्मण के शरीर से रक्त निकालता है, वह बारी-बारी से इन इक्कीस नरकों में जाता है।

श्लोक 57 (14.99.57)

तस्मान्नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गिरमीरयेत् । न ब्रूयात्परुषां वाणीं न चैवैनानतिक्रमेत् ॥

tasmānnākuśalaṃ brūyānna śuṣkāṃ giramīrayet | na brūyātparuṣāṃ vāṇīṃ na caivainānatikramet

इसलिए मनुष्य कभी बुरा न बोले, रूखी वाणी न कहे, कठोर बात न कहे और उन ब्राह्मणों का कभी उल्लंघन न करे।

श्लोक 58 (14.99.58)

ये विप्राञ्श्लक्ष्णया वाचा पूजयन्ति नरोत्तमाः । अर्चितश्च स्तुतश्चैव तैर्भवामि न संशयः ॥

ye viprāñślakṣṇayā vācā pūjayanti narottamāḥ | arcitaśca stutaścaiva tairbhavāmi na saṃśayaḥ

जो श्रेष्ठ मनुष्य मधुर वाणी से ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं, उनके द्वारा मैं पूजित और स्तुत होता हूँ, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 59 (14.99.59)

तर्जयन्ति च ये विप्रान्क्रोशयन्ति च भारत । आक्रुष्टस्तर्जितश्चाहं तैर्भवामि न संशयः ॥

tarjayanti ca ye viprānkrośayanti ca bhārata | ākruṣṭastarjitaścāhaṃ tairbhavāmi na saṃśayaḥ

और हे भारत! जो ब्राह्मणों को धमकाते और उन पर चिल्लाते हैं, उनके द्वारा मैं निन्दित और धमकाया जाता हूँ, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 60 (14.99.60)

यश्चन्दनैश्चागरुधूपदीपै- । रभ्यर्चयेत्काष्ठमयीं ममार्चाम् । तेनार्चितो नैव भवामि सम्य- । ग्विप्रार्चनादस्मि समर्चितोऽहम् ॥

yaścandanaiścāgarudhūpadīpai- | rabhyarcayetkāṣṭhamayīṃ mamārcām | tenārcito naiva bhavāmi samya- | gviprārcanādasmi samarcito'ham

जो चन्दन, अगरु की धूप और दीपों से मेरी लकड़ी की मूर्ति की पूजा करता है, उससे मैं भली-भाँति पूजित नहीं होता; मैं तो ब्राह्मणों की पूजा से ही सच्चे रूप में पूजित होता हूँ।

श्लोक 61 (14.99.61)

विप्रप्रसादाद्धरणीधरोऽहं । विप्रप्रसादादसुराञ्जयामि । विप्रप्रसादाच्च सदक्षिणोऽहं । विप्रप्रसादादजितोऽहमस्मि ॥

vipraprasādāddharaṇīdharo'haṃ | vipraprasādādasurāñjayāmi | vipraprasādācca sadakṣiṇo'haṃ | vipraprasādādajito'hamasmi

ब्राह्मणों की कृपा से मैं पृथ्वी को धारण करता हूँ; ब्राह्मणों की कृपा से मैं असुरों को जीतता हूँ; ब्राह्मणों की कृपा से मैं दक्षिणा सहित यज्ञस्वरूप हूँ; ब्राह्मणों की कृपा से मैं अजेय हूँ।

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