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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 98

व्यर्थ दान और ब्राह्मणों का सम्मान

युधिष्ठिर पूछते हैं कि कौन-से जन्म, दान और जीवन व्यर्थ हैं और दान जीवन की अवस्थाओं में कैसे फल देता है। कृष्ण अपात्र प्राप्तकर्ताओं और उन दुष्ट लोगों की सूची देते हैं जिनके दान और जीवन व्यर्थ जाते हैं। फिर वे सात्त्विक, राजस और तामस दान, उन्हें ग्रहण करनेवालों और उनसे मिलनेवाली तीन गतियों का वर्णन करते हैं, और अन्त में अपने भक्त ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा रखने का उपदेश देते हैं।

अध्याय 97अध्याय-सूचीअध्याय 99

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.98.1)

एवं श्रुत्वा वचस्तस्य धर्मपुत्रोऽच्युतस्य तु । पप्रच्छ पुनरप्यन्यं धर्मं धर्मात्मजो हरिम् ॥

evaṃ śrutvā vacastasya dharmaputro'cyutasya tu | papraccha punarapyanyaṃ dharmaṃ dharmātmajo harim

अच्युत के इन वचनों को सुनकर धर्मात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने हरि से फिर एक और धर्म के विषय में पूछा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (14.98.2)

वृथा च कति जन्मानि वृथा दानानि कानि च । वृथा च जीवितं केषां नराणां पुरुषोत्तम ॥

vṛthā ca kati janmāni vṛthā dānāni kāni ca | vṛthā ca jīvitaṃ keṣāṃ narāṇāṃ puruṣottama

हे पुरुषोत्तम! कितने जन्म व्यर्थ होते हैं, कौन-से दान व्यर्थ हैं, और किन मनुष्यों का जीवन व्यर्थ है?

श्लोक 3 (14.98.3)

कीदृशासु ह्यवस्थासु दानं दत्तं जनार्दन । इह लोकेऽनुभवति पुरुषः पुरुषोत्तम ॥

kīdṛśāsu hyavasthāsu dānaṃ dattaṃ janārdana | iha loke'nubhavati puruṣaḥ puruṣottama

हे जनार्दन! हे पुरुषोत्तम! जीवन की किन अवस्थाओं में दिया हुआ दान मनुष्य को इस लोक में फल देता है?

श्लोक 4 (14.98.4)

गर्भस्थः किं समश्नाति किं बाल्ये वाऽपि केशव । यौवनस्थेऽपि किं कृष्ण वार्धके वाऽपि किं भवेत् ॥

garbhasthaḥ kiṃ samaśnāti kiṃ bālye vā'pi keśava | yauvanasthe'pi kiṃ kṛṣṇa vārdhake vā'pi kiṃ bhavet

हे केशव! गर्भ में रहते हुए मनुष्य क्या भोगता है, बचपन में क्या? हे कृष्ण! यौवन में और बुढ़ापे में क्या होता है?

श्लोक 5 (14.98.5)

सात्विकं कीदृशं दानं राजसं कीदृशं भवेत् । तामसं कीदृशं देव तर्पयिष्यति किं प्रभो ॥

sātvikaṃ kīdṛśaṃ dānaṃ rājasaṃ kīdṛśaṃ bhavet | tāmasaṃ kīdṛśaṃ deva tarpayiṣyati kiṃ prabho

सात्त्विक दान कैसा होता है और राजस कैसा? हे देव! तामस दान कैसा होता है और वह किसे तृप्त करता है, हे प्रभो?

श्लोक 6 (14.98.6)

उत्तमं कीदृशं दानं तेषां वा किं फलं भवेत् । किं दानं नयति ह्यूर्ध्वं किं गतिं मध्यमां नयेत् । गतिं जघन्यामथवा देवदेव ब्रवीहि मे ॥

uttamaṃ kīdṛśaṃ dānaṃ teṣāṃ vā kiṃ phalaṃ bhavet | kiṃ dānaṃ nayati hyūrdhvaṃ kiṃ gatiṃ madhyamāṃ nayet | gatiṃ jaghanyāmathavā devadeva bravīhi me

कौन-सा दान उत्तम है और उनमें से प्रत्येक का फल क्या है? कौन-सा दान ऊपर की ओर ले जाता है, कौन-सा मध्यम गति में और कौन-सा निकृष्ट गति में? हे देवदेव! यह मुझे बताइए।

श्लोक 7 (14.98.7)

एतदिच्छामि विज्ञातुं परं कौतूहलं हि मे । त्वदीयं वचनं सत्यं पुण्यं च मधुसूदन ॥

etadicchāmi vijñātuṃ paraṃ kautūhalaṃ hi me | tvadīyaṃ vacanaṃ satyaṃ puṇyaṃ ca madhusūdana

हे मधुसूदन! मैं यह जानना चाहता हूँ, मुझे बड़ी उत्सुकता है। आपका वचन सत्य और पुण्यमय है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (14.98.8)

एवं धर्मं प्रयत्नेन पृष्टः पाण्डुसुतेन वै । उवाच वासुदेवोऽथ धर्मान्धर्मात्मजस्य तु ॥

evaṃ dharmaṃ prayatnena pṛṣṭaḥ pāṇḍusutena vai | uvāca vāsudevo'tha dharmāndharmātmajasya tu

पाण्डुपुत्र के इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक धर्म के विषय में पूछने पर वासुदेव ने धर्मपुत्र युधिष्ठिर से धर्मों का वर्णन किया।

भगवानुवाच

श्लोक 9 (14.98.9)

शृणु राजन्यथान्यायं वचनं तथ्यमुत्तमम् । कथ्यमानं मया पुण्यं सर्वपापव्यपोहनम् ॥

śṛṇu rājanyathānyāyaṃ vacanaṃ tathyamuttamam | kathyamānaṃ mayā puṇyaṃ sarvapāpavyapohanam

हे राजन्! जैसा उचित है, मेरे कहे हुए इस सत्य और उत्तम वचन को सुनो। यह पुण्यमय है और सब पापों को मिटानेवाला है।

श्लोक 10 (14.98.10)

वृथा च दश जन्मानि चत्वारि च नराधिप । वृथा दानानि पञ्चाशत्पञ्चैव च यथाक्रमम् ॥

vṛthā ca daśa janmāni catvāri ca narādhipa | vṛthā dānāni pañcāśatpañcaiva ca yathākramam

हे नराधिप! क्रम से चौदह जन्म व्यर्थ होते हैं और पचपन दान व्यर्थ होते हैं।

श्लोक 11 (14.98.11)

वृथा च जीवितं येषां ते च षट् परिकीर्तिताः । अनुक्रमेण वक्ष्यामि तानि सर्वाणि पार्थिव ॥

vṛthā ca jīvitaṃ yeṣāṃ te ca ṣaṭ parikīrtitāḥ | anukrameṇa vakṣyāmi tāni sarvāṇi pārthiva

और छह प्रकार के जीवन व्यर्थ बताए गए हैं। हे पृथ्वीपति! मैं इन सबको क्रम से कहूँगा।

श्लोक 12 (14.98.12)

धर्मघ्नानां वृथा जन्म लुब्धानां पापिनां तथा । वृथा पाकं च येऽश्नन्ति परदाररताश्च ये । पाकभेदकरा ये च ये च स्युः सत्यवर्जिताः ॥

dharmaghnānāṃ vṛthā janma lubdhānāṃ pāpināṃ tathā | vṛthā pākaṃ ca ye'śnanti paradāraratāśca ye | pākabhedakarā ye ca ye ca syuḥ satyavarjitāḥ

धर्म का नाश करनेवालों, लोभियों और पापियों का जन्म व्यर्थ है; उनका भी जो व्यर्थ पकाया अन्न खाते हैं, जो परस्त्री में रत हैं, जो दूसरे के भोजन में विघ्न डालते हैं और जो सत्य से रहित हैं।

श्लोक 13 (14.98.13)

मृष्टमश्नाति यश्चैकः क्लिश्यमानैस्तु बान्धवैः । पितरं मातरं चैव उपाध्यायं गुरुं तथा । मातुलं मातुलानीं च यो निहन्याच्छपेत वा ॥

mṛṣṭamaśnāti yaścaikaḥ kliśyamānaistu bāndhavaiḥ | pitaraṃ mātaraṃ caiva upādhyāyaṃ guruṃ tathā | mātulaṃ mātulānīṃ ca yo nihanyācchapeta vā

तथा वह भी जो अकेले स्वादिष्ट भोजन खाता है जबकि उसके बन्धु कष्ट पा रहे हों, और जो अपने पिता, माता, उपाध्याय, गुरु, मामा या मामी को मारे अथवा शाप दे।

श्लोक 14 (14.98.14)

ब्राह्मणश्चैव यो भूत्वा सन्ध्योपासनवर्जितः । निस्स्वाहो निस्स्वधश्चैव शूद्राणामन्नभुग्द्विजः ॥

brāhmaṇaścaiva yo bhūtvā sandhyopāsanavarjitaḥ | nissvāho nissvadhaścaiva śūdrāṇāmannabhugdvijaḥ

तथा वह ब्राह्मण जो सन्ध्योपासना छोड़ देता है, जो स्वाहा और स्वधा से रहित है और जो शूद्रों का अन्न खाता है;

श्लोक 15 (14.98.15)

मम वा शंकरस्याथ ब्रह्मणो वा युधिष्ठिर । अथवा ब्राह्मणानां तु ये न भक्ता नराधमाः । वृथाजन्मान्यथैतेषां पापिनां विद्धि पाण्डव ॥

mama vā śaṃkarasyātha brahmaṇo vā yudhiṣṭhira | athavā brāhmaṇānāṃ tu ye na bhaktā narādhamāḥ | vṛthājanmānyathaiteṣāṃ pāpināṃ viddhi pāṇḍava

हे युधिष्ठिर! जो अधम मनुष्य मेरे, शंकर के, ब्रह्मा के अथवा ब्राह्मणों के भक्त नहीं हैं, हे पाण्डव! उन पापियों के जन्म को व्यर्थ जानो।

श्लोक 16 (14.98.16)

अश्रद्धयाऽपि यद्दत्तमवमानेन वाऽपि यत् । डंभार्थमपि यद्दत्तं यत्पाषण्डिहृतं नृप ॥

aśraddhayā'pi yaddattamavamānena vā'pi yat | ḍaṃbhārthamapi yaddattaṃ yatpāṣaṇḍihṛtaṃ nṛpa

जो दान श्रद्धा के बिना दिया गया हो या अपमान के साथ, या दिखावे के लिए, और हे राजन्! जो पाखण्डियों के हाथ चला गया हो;

श्लोक 17 (14.98.17)

शूद्राचाराय यद्दत्तं यद्दत्त्वा चानुकीर्तितम् । रोषयुक्तं तु यद्दत्तं यद्दत्तमनुशोचितम् ॥

śūdrācārāya yaddattaṃ yaddattvā cānukīrtitam | roṣayuktaṃ tu yaddattaṃ yaddattamanuśocitam

जो शूद्र जैसा आचरण करनेवाले को दिया जाए, जो देकर गिनाया जाए, जो क्रोध के साथ दिया जाए और जिसे देकर पछताया जाए;

श्लोक 18 (14.98.18)

डंभार्जितं च यद्दत्तं यच्च वाऽप्यनृतार्जितम् । ब्राह्मणस्वं च यद्दत्तं चौर्येणाप्यार्जितं च यत् ॥

ḍaṃbhārjitaṃ ca yaddattaṃ yacca vā'pyanṛtārjitam | brāhmaṇasvaṃ ca yaddattaṃ cauryeṇāpyārjitaṃ ca yat

जो दम्भ से कमाए हुए या झूठ से कमाए हुए धन में से दिया जाए, जो ब्राह्मण का धन देकर दिया जाए और जो चोरी से कमाया गया हो;

श्लोक 19 (14.98.19)

अभिशस्ताहृतं यत्तु यद्दत्तं पतिते द्विजे । निर्ब्रह्माभिहृतं यत्तु यद्दत्तं सर्वयाचकैः ॥

abhiśastāhṛtaṃ yattu yaddattaṃ patite dvije | nirbrahmābhihṛtaṃ yattu yaddattaṃ sarvayācakaiḥ

जो अभिशप्त या निन्दित व्यक्ति से छीना गया हो, जो पतित ब्राह्मण को दिया जाए, जो वेदहीन से छीना गया हो और जो सब प्रकार के याचकों द्वारा ले लिया गया हो;

श्लोक 20 (14.98.20)

व्रात्यैस्तु यद्धृतं दानमारूढपतितैश्च यत् । यद्दत्तं स्वैरिणीभर्तुः श्वशुराननुवर्तिने ॥

vrātyaistu yaddhṛtaṃ dānamārūḍhapatitaiśca yat | yaddattaṃ svairiṇībhartuḥ śvaśurānanuvartine

जो व्रात्यों और आरूढ़पतितों द्वारा ले लिया गया हो, तथा जो कुलटा के पति को या ससुर की चापलूसी करनेवाले को दिया जाए;

श्लोक 21 (14.98.21)

यद्ग्रामयाचकहृतं यत्कृतघ्नहृतं तथा । उपपातकिने दत्तं देवविक्रयिणे च यत् ॥

yadgrāmayācakahṛtaṃ yatkṛtaghnahṛtaṃ tathā | upapātakine dattaṃ devavikrayiṇe ca yat

जो ग्राम के याचकों द्वारा ले लिया गया हो, जो कृतघ्नों द्वारा ले लिया गया हो, जो उपपातकी को दिया जाए और जो देवताओं को बेचनेवाले को दिया जाए;

श्लोक 22 (14.98.22)

स्त्रीजिताय च यद्दत्तं यद्दत्तं राजसेविने । गणकाय च यद्दत्तं यच्च कारणिकाय च ॥

strījitāya ca yaddattaṃ yaddattaṃ rājasevine | gaṇakāya ca yaddattaṃ yacca kāraṇikāya ca

जो स्त्री के वश में रहनेवाले को दिया जाए, जो राजा की सेवा करनेवाले को दिया जाए, जो ज्योतिषी को दिया जाए और जो जाँच-अधिकारी को दिया जाए;

श्लोक 23 (14.98.23)

वृषलीपतये दत्तं यद्दत्तं शस्त्रजीविने । भृतकाय च यद्दत्तं व्यालग्राहिहृतं च यत् ॥

vṛṣalīpataye dattaṃ yaddattaṃ śastrajīvine | bhṛtakāya ca yaddattaṃ vyālagrāhihṛtaṃ ca yat

जो वृषली के पति को दिया जाए, जो शस्त्र से जीविका चलानेवाले को दिया जाए, जो भाड़े के नौकर को दिया जाए और जो साँप पकड़नेवाले ने ले लिया हो;

श्लोक 24 (14.98.24)

पुरोहिताय यद्दत्तं चिकित्सकहृतं च यत् । यद्वणिक्कर्मिणे दत्तं क्षुद्रमन्त्रोपजीविने ॥

purohitāya yaddattaṃ cikitsakahṛtaṃ ca yat | yadvaṇikkarmiṇe dattaṃ kṣudramantropajīvine

जो पुरोहित को दिया जाए, जो चिकित्सक ने ले लिया हो, जो व्यापार का काम करनेवाले को दिया जाए और जो टोने-टोटके से जीविका चलानेवाले को दिया जाए;

श्लोक 25 (14.98.25)

यच्छूद्रजीविने दत्तं यच्च देवलकाय च । देवद्रव्याशिने यच्च यद्दत्तं चित्रकर्मिणे ॥

yacchūdrajīvine dattaṃ yacca devalakāya ca | devadravyāśine yacca yaddattaṃ citrakarmiṇe

जो शूद्र की सेवा से जीविका चलानेवाले को दिया जाए, जो देवल (मन्दिर के पुजारी) को दिया जाए, जो देव-द्रव्य खानेवाले को दिया जाए और जो चित्रकार को दिया जाए;

श्लोक 26 (14.98.26)

रङ्गोपजीविने दत्तं यच्च मांसोपजीविने । सेवकाय च यद्दत्तं यद्दत्तं ब्राह्मणब्रुवे ॥

raṅgopajīvine dattaṃ yacca māṃsopajīvine | sevakāya ca yaddattaṃ yaddattaṃ brāhmaṇabruve

जो रंगमंच से जीविका चलानेवाले को दिया जाए, जो मांस से जीविका चलानेवाले को दिया जाए, जो सेवक को दिया जाए और जो नाममात्र का ब्राह्मण है उसको दिया जाए;

श्लोक 27 (14.98.27)

अदेशिने च यद्दत्तं दत्तं वार्धुषिकाय च । यदनाचारिणे दत्तं यत्तु दत्तमनग्नये ॥

adeśine ca yaddattaṃ dattaṃ vārdhuṣikāya ca | yadanācāriṇe dattaṃ yattu dattamanagnaye

जो उचित देश-काल न जाननेवाले को दिया जाए, जो ब्याजखोर को दिया जाए, जो आचारहीन को दिया जाए और जो अग्निहोत्र न रखनेवाले को दिया जाए;

श्लोक 28 (14.98.28)

असन्ध्योपासिने दत्तं यच्छूद्रग्रामवासिने । यन्मिथ्यालिङ्गिने दत्तं दत्तं सर्वाशिने च यत् ॥

asandhyopāsine dattaṃ yacchūdragrāmavāsine | yanmithyāliṅgine dattaṃ dattaṃ sarvāśine ca yat

जो सन्ध्या न करनेवाले को दिया जाए, जो शूद्रों के गाँव में रहनेवाले को दिया जाए, जो झूठा वेश धारण करनेवाले को दिया जाए और जो सब कुछ खा लेनेवाले को दिया जाए;

श्लोक 29 (14.98.29)

नास्तिकाय च यद्दत्तं धर्मविक्रयिणे च यत् । वराकाय च यद्दत्तं यद्दत्तं कूटसाक्षिणे ॥

nāstikāya ca yaddattaṃ dharmavikrayiṇe ca yat | varākāya ca yaddattaṃ yaddattaṃ kūṭasākṣiṇe

जो नास्तिक को दिया जाए, जो धर्म बेचनेवाले को दिया जाए, जो तुच्छ व्यक्ति को दिया जाए और जो झूठे गवाह को दिया जाए;

श्लोक 30 (14.98.30)

ग्रामकूटाय यद्दत्तं दानं पार्थिवपुङ्गव । वृथा भवति तत्सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥

grāmakūṭāya yaddattaṃ dānaṃ pārthivapuṅgava | vṛthā bhavati tatsarvaṃ nātra kāryā vicāraṇā

और हे राजाओं में श्रेष्ठ! जो ग्राम के ठग को दिया जाए, वह सब व्यर्थ हो जाता है; इसमें कोई सन्देह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 31 (14.98.31)

विप्राणामधरा एते लोलुपा ब्राह्मणाधमाः । नात्मानं तारयन्त्येते न दातारं युधिष्ठिर ॥

viprāṇāmadharā ete lolupā brāhmaṇādhamāḥ | nātmānaṃ tārayantyete na dātāraṃ yudhiṣṭhira

ये ब्राह्मणों में निकृष्ट, लोभी और अधम हैं। हे युधिष्ठिर! ये न स्वयं को तारते हैं और न देनेवाले को।

श्लोक 32 (14.98.32)

एतेभ्यो दत्तमात्राणि दानानि सुबहून्यपि । वृथा भवन्ति राजेन्द्र भस्मन्याज्याहुतिर्यथा ॥

etebhyo dattamātrāṇi dānāni subahūnyapi | vṛthā bhavanti rājendra bhasmanyājyāhutiryathā

हे राजेन्द्र! इन्हें दिए हुए दान चाहे बहुत हों, सब व्यर्थ हो जाते हैं, जैसे राख में डाली हुई घी की आहुति।

श्लोक 33 (14.98.33)

एतेषु यत्फलं किंचिद्भविष्यति कथंचन । राक्षसाश्च पिशाचाश्च तद्विलुंपन्ति हर्षिताः ॥

eteṣu yatphalaṃ kiṃcidbhaviṣyati kathaṃcana | rākṣasāśca piśācāśca tadviluṃpanti harṣitāḥ

इनसे जो कोई फल किसी प्रकार हो भी, उसे राक्षस और पिशाच प्रसन्न होकर छीन लेते हैं।

श्लोक 34 (14.98.34)

वृथा ह्येतानि दत्तानि कथितानि समासतः । जीवितं तु वृथा येषां तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ॥

vṛthā hyetāni dattāni kathitāni samāsataḥ | jīvitaṃ tu vṛthā yeṣāṃ tacchṛṇuṣva yudhiṣṭhira

इस प्रकार मैंने संक्षेप में बताया कि कौन-से दान व्यर्थ होते हैं। हे युधिष्ठिर! अब सुनो कि किनका जीवन व्यर्थ है।

श्लोक 35 (14.98.35)

ये मां न प्रतिपद्यन्ते शङ्करं वा नराधमाः । ब्राह्मणान्वा महीदेवान्वृथा जीवन्ति ते नराः ॥

ye māṃ na pratipadyante śaṅkaraṃ vā narādhamāḥ | brāhmaṇānvā mahīdevānvṛthā jīvanti te narāḥ

जो अधम मनुष्य न मुझे मानते हैं, न शंकर को, न पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों को, वे व्यर्थ जीते हैं।

श्लोक 36 (14.98.36)

हेतुशास्त्रेषु ये सक्ताः कुदृष्टिपथमाश्रिताः । देवान्निन्दन्त्यनाचारा वृथा जीवन्ति ते नराः ॥

hetuśāstreṣu ye saktāḥ kudṛṣṭipathamāśritāḥ | devānnindantyanācārā vṛthā jīvanti te narāḥ

जो तर्कशास्त्रों में आसक्त हैं, मिथ्या दृष्टि के मार्ग पर चलते हैं और आचारहीन होकर देवताओं की निन्दा करते हैं, वे मनुष्य व्यर्थ जीते हैं।

श्लोक 37 (14.98.37)

कुशलैः कृतशास्त्राणि पठित्वा ये नराधमाः । विप्रान्निन्दन्ति यज्ञांश्च वृथा जीवन्ति ते नराः ॥

kuśalaiḥ kṛtaśāstrāṇi paṭhitvā ye narādhamāḥ | viprānnindanti yajñāṃśca vṛthā jīvanti te narāḥ

जो अधम मनुष्य चतुरों के रचे हुए शास्त्र पढ़कर ब्राह्मणों और यज्ञों की निन्दा करते हैं, वे व्यर्थ जीते हैं।

श्लोक 38 (14.98.38)

ये दुर्गां वा कुमारं वा वायुमग्निं जलं रविम् । पितरं मातरं चैव गुरुमिन्द्रं निशाकरम् । मूढा निन्दन्त्यनाचारा वृथा जीवन्ति ते नराः ॥

ye durgāṃ vā kumāraṃ vā vāyumagniṃ jalaṃ ravim | pitaraṃ mātaraṃ caiva gurumindraṃ niśākaram | mūḍhā nindantyanācārā vṛthā jīvanti te narāḥ

जो मूढ़ और आचारहीन लोग दुर्गा, कुमार, वायु, अग्नि, जल, सूर्य, पिता, माता, गुरु, इन्द्र और चन्द्रमा की निन्दा करते हैं, वे व्यर्थ जीते हैं।

श्लोक 39 (14.98.39)

विद्यमाने धने यस्तु दानधर्मविवर्जितः । मृष्टमश्नाति यश्चैको वृथा जीवति सोपि च ॥

vidyamāne dhane yastu dānadharmavivarjitaḥ | mṛṣṭamaśnāti yaścaiko vṛthā jīvati sopi ca

और वह भी व्यर्थ जीता है जो धन होते हुए भी दान और धर्म से दूर रहता है और अकेले स्वादिष्ट भोजन खाता है।

श्लोक 40 (14.98.40)

वृथा जीवितमाख्यातं दानकालं ब्रवीमि ते ॥

vṛthā jīvitamākhyātaṃ dānakālaṃ bravīmi te

इस प्रकार व्यर्थ जीवन बताए गए। अब मैं तुम्हें दान का समय बताता हूँ।

श्लोक 41 (14.98.41)

तमोनिविष्टचित्तेन दत्तं दानं तु यद्भवेत् । तदस्य फलमश्नाति नरो गर्भगतो नृप ॥

tamoniviṣṭacittena dattaṃ dānaṃ tu yadbhavet | tadasya phalamaśnāti naro garbhagato nṛpa

हे राजन्! तमोगुण में डूबे चित्त से जो दान दिया जाता है, उसका फल मनुष्य गर्भ में रहते हुए भोगता है।

श्लोक 42 (14.98.42)

ईर्ष्यामत्सरसंयुक्तो डंभार्थं चार्थकारणात् । ददाति दानं यो मर्त्यो बालभावे तदश्नुते ॥

īrṣyāmatsarasaṃyukto ḍaṃbhārthaṃ cārthakāraṇāt | dadāti dānaṃ yo martyo bālabhāve tadaśnute

जो मनुष्य ईर्ष्या और मात्सर्य से भरकर, दिखावे के लिए या किसी स्वार्थ से दान देता है, वह उसका फल बचपन में भोगता है।

श्लोक 43 (14.98.43)

भोक्तुं भोगमशक्तस्तु व्याधिभिः पीडितो भृशम् । ददाति दानं यो मर्त्यो वृद्धभावे तदश्नुते ॥

bhoktuṃ bhogamaśaktastu vyādhibhiḥ pīḍito bhṛśam | dadāti dānaṃ yo martyo vṛddhabhāve tadaśnute

जो मनुष्य रोगों से अत्यन्त पीड़ित होकर भोग भोगने में असमर्थ हो जाने पर दान देता है, वह उसका फल बुढ़ापे में भोगता है।

श्लोक 44 (14.98.44)

श्रद्धायुक्तः शुचिः स्नातः प्रसन्नेन्द्रियमानसः । ददाति दानं यो मर्त्यो यौवने स तदश्नुते ॥

śraddhāyuktaḥ śuciḥ snātaḥ prasannendriyamānasaḥ | dadāti dānaṃ yo martyo yauvane sa tadaśnute

जो मनुष्य श्रद्धा के साथ, शुद्ध होकर, स्नान करके और प्रसन्न इन्द्रियों तथा मन से दान देता है, वह उसका फल यौवन में भोगता है।

श्लोक 45 (14.98.45)

स्वयं नीत्वा तु यद्दानं भक्त्या पात्रे प्रदीयते । तत्सार्वकालिकं विद्धि दानमामरणान्तिकम् ॥

svayaṃ nītvā tu yaddānaṃ bhaktyā pātre pradīyate | tatsārvakālikaṃ viddhi dānamāmaraṇāntikam

जो दान स्वयं ले जाकर भक्ति से सुपात्र को दिया जाता है, उसे सब कालों में फल देनेवाला और मृत्यु तक साथ रहनेवाला दान जानो।

श्लोक 46 (14.98.46)

राजसं सात्विकं चापि तामसं च युधिष्ठिर । दानं दानफलं चैव गतिं च त्रिविधां शृणु ॥

rājasaṃ sātvikaṃ cāpi tāmasaṃ ca yudhiṣṭhira | dānaṃ dānaphalaṃ caiva gatiṃ ca trividhāṃ śṛṇu

हे युधिष्ठिर! अब राजस, सात्त्विक और तामस दान, दान का फल और तीन प्रकार की गति सुनो।

श्लोक 47 (14.98.47)

दानं दातव्यमित्येव मतिं कृत्वा द्विजाय वै । उपकारवियुक्ताय यद्दत्तं तद्धि सात्विकम् ॥

dānaṃ dātavyamityeva matiṃ kṛtvā dvijāya vai | upakāraviyuktāya yaddattaṃ taddhi sātvikam

"दान देना चाहिए" यह सोचकर जो दान उस ब्राह्मण को दिया जाता है जो बदले में उपकार नहीं कर सकता, वही सात्त्विक कहलाता है।

श्लोक 48 (14.98.48)

श्रोत्रियाय दरिद्राय बहुभृत्याय पाण्डव । दीयते यत्प्रहृष्टेन तत्सात्विकमुदाहृतम् ॥

śrotriyāya daridrāya bahubhṛtyāya pāṇḍava | dīyate yatprahṛṣṭena tatsātvikamudāhṛtam

हे पाण्डव! जो वेदपाठी, निर्धन और बहुत-से आश्रितोंवाले ब्राह्मण को प्रसन्न मन से दिया जाता है, वह सात्त्विक कहा गया है।

श्लोक 49 (14.98.49)

वेदाक्षरविहीनाय यत्तु पूर्वोपकारिणे । समृद्धाय च यद्दत्तं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥

vedākṣaravihīnāya yattu pūrvopakāriṇe | samṛddhāya ca yaddattaṃ taddānaṃ rājasaṃ smṛtam

जो वेद के अक्षरों से रहित किन्तु पहले उपकार करनेवाले को, अथवा पहले से समृद्ध को दिया जाए, वह दान राजस माना गया है।

श्लोक 50 (14.98.50)

संबन्धिने च यद्दत्तं प्रमत्ताय च पाण्डव । फलार्थिभिरपात्राय तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥

saṃbandhine ca yaddattaṃ pramattāya ca pāṇḍava | phalārthibhirapātrāya taddānaṃ rājasaṃ smṛtam

हे पाण्डव! जो दान सम्बन्धी को, असावधान को या फल चाहनेवालों द्वारा अपात्र को दिया जाता है, वह राजस माना गया है।

श्लोक 51 (14.98.51)

वैश्वदेवविहीनाय दानमश्रोत्रियाय च । दीयते तस्करायापि तद्दानं तामसं स्मृतम् ॥

vaiśvadevavihīnāya dānamaśrotriyāya ca | dīyate taskarāyāpi taddānaṃ tāmasaṃ smṛtam

जो दान वैश्वदेव न करनेवाले को, वेद न जाननेवाले को या चोर को भी दिया जाए, वह तामस माना गया है।

श्लोक 52 (14.98.52)

सरोषमवधूतं च क्लेशयुक्तमवज्ञया । सेवकाय च यद्दत्तं तत्तामसमुदाहृतम् ॥

saroṣamavadhūtaṃ ca kleśayuktamavajñayā | sevakāya ca yaddattaṃ tattāmasamudāhṛtam

जो दान क्रोध से, तिरस्कार करके, कष्ट के साथ और अवज्ञा से दिया जाए, अथवा जो सेवक को दिया जाए, वह तामस कहा गया है।

श्लोक 53 (14.98.53)

देवाः पितृगणाश्चैव मुनयश्चाग्नयस्तथा । सात्विकं दानमश्नन्ति तुष्यन्ति च नरेश्वर ॥

devāḥ pitṛgaṇāścaiva munayaścāgnayastathā | sātvikaṃ dānamaśnanti tuṣyanti ca nareśvara

हे नरेश्वर! देवता, पितृगण, मुनि और अग्नियाँ सात्त्विक दान का भोग करते हैं और उससे सन्तुष्ट होते हैं।

श्लोक 54 (14.98.54)

दानवा दैत्यसङ्घाश्च ग्रहा यक्षाः सराक्षसाः । राजसं दानमश्नन्ति वर्जितं पितृदैवतैः ॥

dānavā daityasaṅghāśca grahā yakṣāḥ sarākṣasāḥ | rājasaṃ dānamaśnanti varjitaṃ pitṛdaivataiḥ

दानव, दैत्यों के समूह, ग्रह, यक्ष और राक्षस राजस दान का भोग करते हैं; पितर और देवता उससे दूर रहते हैं।

श्लोक 55 (14.98.55)

पिशाचाः प्रेतसङ्घाश्च कश्मला ये मलीमसाः । तामसं दानमश्नन्ति गतिं च त्रिविधां शृणु ॥

piśācāḥ pretasaṅghāśca kaśmalā ye malīmasāḥ | tāmasaṃ dānamaśnanti gatiṃ ca trividhāṃ śṛṇu

पिशाच, प्रेतों के समूह और मलिन तथा अपवित्र प्राणी तामस दान का भोग करते हैं। अब तीन प्रकार की गति सुनो।

श्लोक 56 (14.98.56)

सात्विकानां तु दानानामुत्तमं फलमश्नुते । मध्यमं राजसानां तु तामसानां तु पश्चिमम् ॥

sātvikānāṃ tu dānānāmuttamaṃ phalamaśnute | madhyamaṃ rājasānāṃ tu tāmasānāṃ tu paścimam

सात्त्विक दानों का उत्तम फल मिलता है, राजस दानों का मध्यम और तामस दानों का सबसे निकृष्ट।

श्लोक 57 (14.98.57)

अभिगम्योपनीतानां दानानामुत्तमं फलम् । मध्यमं तु समाहूय जघन्यं याचते फलम् ॥

abhigamyopanītānāṃ dānānāmuttamaṃ phalam | madhyamaṃ tu samāhūya jaghanyaṃ yācate phalam

जो दान स्वयं जाकर पहुँचाए जाते हैं, उनका फल उत्तम है; जो बुलाकर दिए जाते हैं, उनका मध्यम; और जो माँगने पर दिया जाता है, उसका निकृष्ट।

श्लोक 58 (14.98.58)

अयाचितप्रदाता यः स याति गतिमुत्तमाम् । समाहूय तु यो दद्यान्मध्यमां स गतिं व्रजेत् । याचितो यश्च वै दद्याज्जघन्यां स गतिं व्रजेत् ॥

ayācitapradātā yaḥ sa yāti gatimuttamām | samāhūya tu yo dadyānmadhyamāṃ sa gatiṃ vrajet | yācito yaśca vai dadyājjaghanyāṃ sa gatiṃ vrajet

जो बिना माँगे देता है, वह उत्तम गति पाता है। जो बुलाकर देता है, वह मध्यम गति पाता है। और जो माँगे जाने पर देता है, वह निकृष्ट गति पाता है।

श्लोक 59 (14.98.59)

उत्तमा दैविकी ज्ञेया मध्यमा मानुषी गतिः । गतिर्जघन्या तिर्यक्षु गतिरेषा त्रिधा स्मृता ॥

uttamā daivikī jñeyā madhyamā mānuṣī gatiḥ | gatirjaghanyā tiryakṣu gatireṣā tridhā smṛtā

उत्तम गति देवताओं की जाननी चाहिए, मध्यम गति मनुष्यों की और निकृष्ट गति पशु-पक्षियों की; यही तीन प्रकार की गति मानी गई है।

श्लोक 60 (14.98.60)

पात्रभूतेषु विप्रेषु संस्थितेष्वाहिताग्निषु । यत्तु निक्षिप्यते दानमक्षयं संप्रकीर्तितम् ॥

pātrabhūteṣu vipreṣu saṃsthiteṣvāhitāgniṣu | yattu nikṣipyate dānamakṣayaṃ saṃprakīrtitam

सुपात्र ब्राह्मणों में, जो भली-भाँति स्थित हैं और अग्निहोत्र रखते हैं, जो दान स्थापित किया जाता है, वह अक्षय कहा गया है।

श्लोक 61 (14.98.61)

श्रोत्रियाणां दरिद्राणां भरणं कुरु पार्थिव । समृद्धानां द्विजातीनां कुर्यास्तेषां तु रक्षणम् ॥

śrotriyāṇāṃ daridrāṇāṃ bharaṇaṃ kuru pārthiva | samṛddhānāṃ dvijātīnāṃ kuryāsteṣāṃ tu rakṣaṇam

हे राजन्! वेदपाठी और निर्धन ब्राह्मणों का भरण-पोषण करो, और जो द्विज समृद्ध हैं, उनकी रक्षा करो।

श्लोक 62 (14.98.62)

दरिद्रान्वित्तहीनांश्च प्रदानैः सुष्ठु पूजय । आतुरस्यौषधैः कार्यं नीरुजस्य किमौषधैः ॥

daridrānvittahīnāṃśca pradānaiḥ suṣṭhu pūjaya | āturasyauṣadhaiḥ kāryaṃ nīrujasya kimauṣadhaiḥ

निर्धनों और दीनों का दान देकर भली-भाँति सत्कार करो। औषधि रोगी के लिए होती है; जो निरोग है उसे औषधि से क्या?

श्लोक 63 (14.98.63)

पापं प्रतिग्रहीतारं प्रदातुरपगच्छति । प्रतिग्रहीतुर्यत्पुण्यं प्रदातारमुपैति तत् । तस्माद्दानं सदा कार्यं परत्र हितमिच्छता ॥

pāpaṃ pratigrahītāraṃ pradāturapagacchati | pratigrahīturyatpuṇyaṃ pradātāramupaiti tat | tasmāddānaṃ sadā kāryaṃ paratra hitamicchatā

(देनेवाले का) पाप लेनेवाले के पास चला जाता है और लेनेवाले का पुण्य देनेवाले को मिलता है। इसलिए परलोक में अपना हित चाहनेवाले को सदा दान करना चाहिए।

श्लोक 64 (14.98.64)

वेदविद्यावदातेषु सदा शूद्रान्नवर्जिषु । प्रयत्नेन विधातव्यो महादानमयो निधिः ॥

vedavidyāvadāteṣu sadā śūdrānnavarjiṣu | prayatnena vidhātavyo mahādānamayo nidhiḥ

जो वेदविद्या से निर्मल हैं और सदा शूद्र का अन्न त्यागते हैं, उनके लिए प्रयत्नपूर्वक महादान का निधि-संचय करना चाहिए।

श्लोक 65 (14.98.65)

येषां दाराः प्रतीक्षन्ते सहस्रस्येव लम्भनम् । भुक्तशेषस्य भक्तस्य तान्निमन्त्रय पाण्डव ॥

yeṣāṃ dārāḥ pratīkṣante sahasrasyeva lambhanam | bhuktaśeṣasya bhaktasya tānnimantraya pāṇḍava

हे पाण्डव! जिनकी पत्नियाँ भक्त के भोजन से बचे अन्न की ऐसी प्रतीक्षा करती हैं मानो उन्हें हज़ार (मुद्राएँ) मिलनेवाली हों, उन्हें निमन्त्रण दो।

श्लोक 66 (14.98.66)

आमन्त्र्य तु निराशानि न कर्तव्यानि भारत । कुलानि सुदरिद्राणि तेषामाशा हता भवेत् ॥

āmantrya tu nirāśāni na kartavyāni bhārata | kulāni sudaridrāṇi teṣāmāśā hatā bhavet

हे भारत! अत्यन्त निर्धन कुलों को निमन्त्रण देकर निराश नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे उनकी आशा टूट जाती है।

श्लोक 67 (14.98.67)

मद्भक्ता ये नरश्रेष्ठ मद्गता मत्परायणाः । मद्याजिनो मन्नियमास्तान्प्रयत्नेन पूजयेत् ॥

madbhaktā ye naraśreṣṭha madgatā matparāyaṇāḥ | madyājino manniyamāstānprayatnena pūjayet

हे नरश्रेष्ठ! जो मेरे भक्त हैं, मुझमें स्थित हैं, मुझे ही परम आश्रय मानते हैं, मेरा यजन करते हैं और मेरे नियमों का पालन करते हैं, उनकी प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 68 (14.98.68)

तेषां तु पावनायाहं नित्यमेव युधिष्ठिर । उभे सन्ध्येऽधितिष्ठामि ह्यस्कन्नं तद्व्रतं मम ॥

teṣāṃ tu pāvanāyāhaṃ nityameva yudhiṣṭhira | ubhe sandhye'dhitiṣṭhāmi hyaskannaṃ tadvrataṃ mama

हे युधिष्ठिर! उन्हें पवित्र करने के लिए मैं दोनों सन्ध्याओं में सदा उपस्थित रहता हूँ। यह मेरा अटल व्रत है।

श्लोक 69 (14.98.69)

तस्मादष्टाक्षरं मन्त्रं मद्भक्तैर्वीतकल्मषैः । सन्ध्याकाले तु जप्तव्यं सततं चात्मशुद्धये ॥

tasmādaṣṭākṣaraṃ mantraṃ madbhaktairvītakalmaṣaiḥ | sandhyākāle tu japtavyaṃ satataṃ cātmaśuddhaye

इसलिए मेरे निष्पाप भक्तों को आत्मशुद्धि के लिए सन्ध्या के समय निरन्तर अष्टाक्षर मन्त्र का जप करना चाहिए।

श्लोक 70 (14.98.70)

अन्येषामपि विप्राणां किल्बिषं हि विनश्यति । उभे सन्ध्येप्युपासीत तस्माद्विप्रो विशुद्धये ॥

anyeṣāmapi viprāṇāṃ kilbiṣaṃ hi vinaśyati | ubhe sandhyepyupāsīta tasmādvipro viśuddhaye

अन्य ब्राह्मणों का भी पाप नष्ट हो जाता है। इसलिए ब्राह्मण को शुद्धि के लिए दोनों सन्ध्याओं में उपासना करनी चाहिए।

श्लोक 71 (14.98.71)

दैवे श्राद्धेपि विप्रः स नियोक्तव्योऽजुगुप्सया । जुगुप्सितस्तु यः श्राद्धं दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥

daive śrāddhepi vipraḥ sa niyoktavyo'jugupsayā | jugupsitastu yaḥ śrāddhaṃ dahatyagnirivendhanam

देवकर्म और श्राद्ध में भी ब्राह्मण को बिना घृणा के नियुक्त करना चाहिए। जो तिरस्कृत किया गया हो, वह श्राद्ध को वैसे जला देता है जैसे अग्नि ईंधन को।

श्लोक 72 (14.98.72)

भारतं मानवो धर्मो वेदाः साङ्गाश्चिकित्सितम् । आज्ञासिद्धानि चत्वारि न हन्तव्यानि हेतुभिः ॥

bhārataṃ mānavo dharmo vedāḥ sāṅgāścikitsitam | ājñāsiddhāni catvāri na hantavyāni hetubhiḥ

महाभारत, मनु का धर्मशास्त्र, अंगोंसहित वेद और चिकित्साशास्त्र, ये चार आज्ञा से सिद्ध हैं; इन्हें तर्कों से नहीं काटना चाहिए।

श्लोक 73 (14.98.73)

न ब्राह्मणान्परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित् । महान्भवेत्परीवादो ब्राह्मणानां परीक्षणे ॥

na brāhmaṇānparīkṣeta daive karmaṇi dharmavit | mahānbhavetparīvādo brāhmaṇānāṃ parīkṣaṇe

धर्म को जाननेवाला देवकर्म में ब्राह्मणों की परीक्षा न करे। ब्राह्मणों की परीक्षा करने में बड़ा अपवाद होता है।

श्लोक 74 (14.98.74)

ब्राह्मणानां परीवादं यः कुर्यात्स नराधमः । रासभानां शुनां योनिं गच्छेत्पुरुषदूषकः ॥

brāhmaṇānāṃ parīvādaṃ yaḥ kuryātsa narādhamaḥ | rāsabhānāṃ śunāṃ yoniṃ gacchetpuruṣadūṣakaḥ

जो नराधम ब्राह्मणों की निन्दा करता है, वह पुरुषों को दूषित करनेवाला गधों और कुत्तों की योनि में जाता है।

श्लोक 75 (14.98.75)

श्वत्वं प्राप्नोति निन्दित्वा परीवादात्खरो भवेत् । कृमिर्भवत्यभिभवात्कीटो भवति मत्सरात् ॥

śvatvaṃ prāpnoti ninditvā parīvādātkharo bhavet | kṛmirbhavatyabhibhavātkīṭo bhavati matsarāt

निन्दा करके वह कुत्ता बनता है, बदनामी करने से गधा; अपमान करने से कृमि और डाह करने से कीट बनता है।

श्लोक 76 (14.98.76)

दुर्वृत्ता वा सुवृत्ता वा प्राकृता वा सुसंस्कृताः । ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ना इवाग्नयः ॥

durvṛttā vā suvṛttā vā prākṛtā vā susaṃskṛtāḥ | brāhmaṇā nāvamantavyā bhasmacchannā ivāgnayaḥ

ब्राह्मण चाहे दुराचारी हों या सदाचारी, साधारण हों या सुशिक्षित, उनका अपमान नहीं करना चाहिए; वे राख से ढकी हुई अग्नि के समान हैं।

श्लोक 77 (14.98.77)

क्षत्रियं चैव सर्पं च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम् । नावमन्येत मेधावी कृशानपि कदाचन ॥

kṣatriyaṃ caiva sarpaṃ ca brāhmaṇaṃ ca bahuśrutam | nāvamanyeta medhāvī kṛśānapi kadācana

बुद्धिमान को क्षत्रिय, सर्प और बहुश्रुत ब्राह्मण का, भले ही वे दुर्बल हों, कभी अपमान नहीं करना चाहिए।

श्लोक 78 (14.98.78)

एतत्त्रयं हि पुरुषं निर्दहेदवमानितम् । तस्मादेतत्प्रयत्नेन नावमन्येत बुद्धिमान् ॥

etattrayaṃ hi puruṣaṃ nirdahedavamānitam | tasmādetatprayatnena nāvamanyeta buddhimān

ये तीनों अपमानित होने पर मनुष्य को भस्म कर देते हैं। इसलिए बुद्धिमान को प्रयत्नपूर्वक इनका अपमान नहीं करना चाहिए।

श्लोक 79 (14.98.79)

यथा सर्वास्ववस्थासु पावको दैवतं महत् । तथा सर्वास्ववस्थासु ब्राह्मणो दैवतं महत् ॥

yathā sarvāsvavasthāsu pāvako daivataṃ mahat | tathā sarvāsvavasthāsu brāhmaṇo daivataṃ mahat

जैसे अग्नि सभी अवस्थाओं में महान देवता है, वैसे ही ब्राह्मण सभी अवस्थाओं में महान देवता है।

श्लोक 80 (14.98.80)

व्यङ्गाः काणाश्च कुब्जाश्च वामनाङ्गास्तथैव च । सर्वे दैवे नियोक्तव्या व्यामिश्रा वेदपारगैः ॥

vyaṅgāḥ kāṇāśca kubjāśca vāmanāṅgāstathaiva ca | sarve daive niyoktavyā vyāmiśrā vedapāragaiḥ

अंगहीन, काने, कुबड़े और बौने, ये सब भी देवकर्म में वेदपारंगत ब्राह्मणों के साथ मिलाकर नियुक्त किए जा सकते हैं।

श्लोक 81 (14.98.81)

मन्युं नोत्पादयेत्तेषां न चारिष्टं समाचरेत् । मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्राः शस्त्रपाणयः ॥

manyuṃ notpādayetteṣāṃ na cāriṣṭaṃ samācaret | manyupraharaṇā viprā na viprāḥ śastrapāṇayaḥ

उनके क्रोध को नहीं जगाना चाहिए और न उनका कोई अहित करना चाहिए। ब्राह्मणों का शस्त्र क्रोध है, वे हाथ में शस्त्र लिए नहीं होते।

श्लोक 82 (14.98.82)

मन्युना घ्नन्ति ते शत्रून्वज्रेणेन्द्र इवासुरान् । ब्राह्मणो हि महद्दैवं जातिमात्रेण जायते ॥

manyunā ghnanti te śatrūnvajreṇendra ivāsurān | brāhmaṇo hi mahaddaivaṃ jātimātreṇa jāyate

वे क्रोध से शत्रुओं को वैसे ही मार गिराते हैं जैसे इन्द्र ने वज्र से असुरों को। ब्राह्मण केवल जन्म से ही महान देवता होता है।

श्लोक 83 (14.98.83)

ब्राह्मणः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये । किं पुनर्ये च कौन्तेय सन्ध्यां नित्यमुपासते ॥

brāhmaṇaḥ sarvabhūtānāṃ dharmakośasya guptaye | kiṃ punarye ca kaunteya sandhyāṃ nityamupāsate

ब्राह्मण सब प्राणियों के धर्म-कोश की रक्षा के लिए है। फिर हे कुन्तीपुत्र! जो नित्य सन्ध्या की उपासना करते हैं, उनके विषय में तो कहना ही क्या?

श्लोक 84 (14.98.84)

यस्यास्येन समश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकसः । कव्यानि चैव पितरः किं भूतमधिकं ततः ॥

yasyāsyena samaśnanti havyāni tridivaukasaḥ | kavyāni caiva pitaraḥ kiṃ bhūtamadhikaṃ tataḥ

जिसके मुख से स्वर्गवासी देवता हव्य और पितर कव्य ग्रहण करते हैं, उससे बढ़कर और कौन प्राणी है?

श्लोक 85 (14.98.85)

उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिधर्मस्य शाश्वती । स हि धर्मार्थमुत्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

utpattireva viprasya mūrtidharmasya śāśvatī | sa hi dharmārthamutpanno brahmabhūyāya kalpate

ब्राह्मण का जन्म ही शाश्वत मूर्तिमान धर्म है। वह धर्म के लिए उत्पन्न हुआ है और ब्रह्मभाव को पाने योग्य होता है।

श्लोक 86 (14.98.86)

स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च । आनृशंस्याद्ब्राह्मणस्य भुञ्जते हीतरे जनाः । तस्मात्ते नावमन्तव्या मद्भक्ता हि द्विजाः सदा ॥

svameva brāhmaṇo bhuṅkte svaṃ vaste svaṃ dadāti ca | ānṛśaṃsyādbrāhmaṇasya bhuñjate hītare janāḥ | tasmātte nāvamantavyā madbhaktā hi dvijāḥ sadā

ब्राह्मण अपना ही खाता है, अपना ही पहनता है और अपना ही देता है। दूसरे लोग ब्राह्मण की दया से ही भोग पाते हैं। इसलिए मेरे भक्त ब्राह्मणों का कभी अपमान नहीं करना चाहिए।

श्लोक 87 (14.98.87)

आरण्यकोपनिषदि ये तु पश्यन्ति मां द्विजाः । निगूढं निष्कलावस्थं तान्प्रयत्नेन पूजय ॥

āraṇyakopaniṣadi ye tu paśyanti māṃ dvijāḥ | nigūḍhaṃ niṣkalāvasthaṃ tānprayatnena pūjaya

जो ब्राह्मण आरण्यक उपनिषद् में मुझे गूढ़ और निष्कल रूप में देखते हैं, उनकी प्रयत्नपूर्वक पूजा करो।

श्लोक 88 (14.98.88)

स्वगृहे वा प्रवासे वा दिवारात्रमथापि वा । श्रद्धया ब्राह्मणाः पूज्या मद्भक्ता ये च पाण्डव ॥

svagṛhe vā pravāse vā divārātramathāpi vā | śraddhayā brāhmaṇāḥ pūjyā madbhaktā ye ca pāṇḍava

हे पाण्डव! घर में हो या प्रवास में, दिन हो या रात, जो ब्राह्मण मेरे भक्त हैं, उनकी श्रद्धा से पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 89 (14.98.89)

नास्ति विप्रसमं दैवं नास्ति विप्रसमो गुरुः । नास्ति विप्रात्परो बन्धुर्नास्ति विप्रात्परो निधिः । नास्ति विप्रात्परं तीर्थं न पुण्यं ब्राह्मणात्परम् ॥

nāsti viprasamaṃ daivaṃ nāsti viprasamo guruḥ | nāsti viprātparo bandhurnāsti viprātparo nidhiḥ | nāsti viprātparaṃ tīrthaṃ na puṇyaṃ brāhmaṇātparam

ब्राह्मण के समान कोई देवता नहीं, ब्राह्मण के समान कोई गुरु नहीं। ब्राह्मण से बढ़कर कोई बन्धु नहीं, ब्राह्मण से बढ़कर कोई निधि नहीं; ब्राह्मण से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं और ब्राह्मण से बढ़कर कोई पुण्य नहीं।

श्लोक 90 (14.98.90)

न पवित्रं परं विप्रान्न द्विजात्पावनं परम् । नास्ति विप्रात्परो धर्मो नास्ति विप्रात्परा गतिः ॥

na pavitraṃ paraṃ viprānna dvijātpāvanaṃ param | nāsti viprātparo dharmo nāsti viprātparā gatiḥ

ब्राह्मण से अधिक पवित्र कुछ नहीं और द्विज से बढ़कर पावन करनेवाला कोई नहीं। ब्राह्मण से ऊँचा कोई धर्म नहीं और ब्राह्मण से ऊँची कोई गति नहीं।

श्लोक 91 (14.98.91)

पापकर्मसमाक्षिप्तं पतन्तं नरके नरम् । त्रायते पात्रमप्येकं पात्रभूते तु तद्द्विजे ॥

pāpakarmasamākṣiptaṃ patantaṃ narake naram | trāyate pātramapyekaṃ pātrabhūte tu taddvije

पापकर्मों से खिंचकर नरक में गिरते हुए मनुष्य को सुपात्र ब्राह्मण को दिया हुआ एक ही दान भी बचा लेता है।

श्लोक 92 (14.98.92)

बालाहिताग्नयो ये च शान्ताः शूद्रान्नवर्जिताः । मामर्चयन्ति तद्भक्तास्तेभ्यो दत्तमिहाक्षयम् ॥

bālāhitāgnayo ye ca śāntāḥ śūdrānnavarjitāḥ | māmarcayanti tadbhaktāstebhyo dattamihākṣayam

जो बचपन से ही अग्निहोत्र रखनेवाले हैं, शान्त हैं, शूद्र का अन्न त्याग चुके हैं और मेरे भक्त होकर मेरी अर्चना करते हैं, उन्हें दिया हुआ दान यहाँ अक्षय होता है।

श्लोक 93 (14.98.93)

प्रदानैः पूजितो विप्रो वन्दितो वापि संस्कृतः । सम्भाषितो वा दृष्टो वा मद्भक्तो दिवमुन्नयेत् ॥

pradānaiḥ pūjito vipro vandito vāpi saṃskṛtaḥ | sambhāṣito vā dṛṣṭo vā madbhakto divamunnayet

मेरा भक्त ब्राह्मण दान से पूजित होने पर, प्रणाम किए जाने पर, आदर पाने पर, उससे बात करने पर या देखे जाने पर भी मनुष्य को स्वर्ग की ओर उठा देता है।

श्लोक 94 (14.98.94)

ये पठन्ति नमस्यन्ति ध्यायन्ति पुरुषास्तु माम् । स तान्स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च नरः पापैः प्रमुच्यते ॥

ye paṭhanti namasyanti dhyāyanti puruṣāstu mām | sa tānspṛṣṭvā ca dṛṣṭvā ca naraḥ pāpaiḥ pramucyate

जो लोग मेरा पाठ करते हैं, मुझे नमस्कार करते हैं और मेरा ध्यान करते हैं, उन्हें छूकर या देखकर मनुष्य पापों से छूट जाता है।

श्लोक 95 (14.98.95)

मद्भक्ता मद्गतप्राणा मद्गीता मत्परायणाः । बीजयोनिविशुद्धा ये श्रोत्रियाः संयतेन्द्रियाः । शूद्रान्नविरता नित्यं ते पुनन्तीह दर्शनात् ॥

madbhaktā madgataprāṇā madgītā matparāyaṇāḥ | bījayoniviśuddhā ye śrotriyāḥ saṃyatendriyāḥ | śūdrānnaviratā nityaṃ te punantīha darśanāt

मेरे भक्त, जिनके प्राण मुझमें लगे हैं, जो मेरा गान करते हैं और मुझे ही परम आश्रय मानते हैं, जो बीज और योनि से शुद्ध, श्रोत्रिय और संयतेन्द्रिय हैं और शूद्र के अन्न से सदा दूर रहते हैं, वे दर्शन मात्र से यहाँ पवित्र करते हैं।

श्लोक 96 (14.98.96)

स्वयं नीत्वा विशेषेण दानं तेषां गृहेष्वथ । निवापयेत्तु यद्भक्त्या तद्दानं कोटिसंमितम् ॥

svayaṃ nītvā viśeṣeṇa dānaṃ teṣāṃ gṛheṣvatha | nivāpayettu yadbhaktyā taddānaṃ koṭisaṃmitam

जो दान विशेष रूप से स्वयं ले जाकर उनके घरों में श्रद्धा से अर्पित किया जाता है, वह करोड़ गुना माना जाता है।

श्लोक 97 (14.98.97)

जाग्रतः स्वपतो वापि प्रवासेषु गृहेष्वथ । हृदये न प्रणश्यामि यस्य विप्रस्य भावतः ॥

jāgrataḥ svapato vāpi pravāseṣu gṛheṣvatha | hṛdaye na praṇaśyāmi yasya viprasya bhāvataḥ

जागते हुए या सोते हुए, प्रवास में या घर में, जिस ब्राह्मण के भाव में मैं रहता हूँ, उसके हृदय से मैं कभी लुप्त नहीं होता।

श्लोक 98 (14.98.98)

स पूजितो वा दृष्टो वा स्पृष्टो वापि द्विजोत्तमः । सम्भाषितो वा राजेन्द्र पुनात्येव नरं सदा ॥

sa pūjito vā dṛṣṭo vā spṛṣṭo vāpi dvijottamaḥ | sambhāṣito vā rājendra punātyeva naraṃ sadā

हे राजेन्द्र! वह श्रेष्ठ ब्राह्मण पूजित होने पर, देखे जाने पर, छुए जाने पर या उससे बात करने पर सदा मनुष्य को पवित्र कर देता है।

श्लोक 99 (14.98.99)

एवं सर्वास्ववस्थासु सर्वदानानि पाण्डव । मद्भक्तेभ्यः प्रदत्तानि स्वर्गमार्गप्रदानि वै ॥

evaṃ sarvāsvavasthāsu sarvadānāni pāṇḍava | madbhaktebhyaḥ pradattāni svargamārgapradāni vai

हे पाण्डव! इस प्रकार सभी अवस्थाओं में मेरे भक्तों को दिए हुए सब दान स्वर्ग का मार्ग देनेवाले होते हैं।

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