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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 97

कृष्ण द्वारा चारों वर्णों की गति का उपदेश

कृष्ण बताते हैं कि उनके इस उपदेश को सुनने से पाप नष्ट होता है, और उपस्थित देवता तथा ऋषि आश्चर्य से प्रणाम करते हैं। युधिष्ठिर पूछते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की मृत्यु के बाद क्या गति होती है। कृष्ण बताते हैं कि अपने-अपने धर्म का पालन करने से प्रत्येक वर्ण किस स्वर्ग को पाता है और अगले जन्म में किस पद को, फिर यह कि बड़ा पुण्य या बड़ा पाप छोटे को कैसे दबा देता है, और क्यों पाप को प्रकट करना और धर्म को छिपाना चाहिए।

अध्याय 96अध्याय-सूचीअध्याय 98

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.97.1)

एवमात्मोद्भवं सर्वं जगदुद्दिश्य केशवः । धर्मान्धर्मात्मजस्याथ पुण्यानकथयत्प्रभुः ॥

evamātmodbhavaṃ sarvaṃ jagaduddiśya keśavaḥ | dharmāndharmātmajasyātha puṇyānakathayatprabhuḥ

इस प्रकार सारे जगत् को अपने ही से उत्पन्न बताकर प्रभु केशव ने धर्मराज के पुत्र युधिष्ठिर को पुण्यमय धर्मों का उपदेश दिया।

भगवानुवाच

श्लोक 2 (14.97.2)

शृणु पाण्डव तत्वेन पवित्रं पापनाशनम् । कथ्यमानं मया पुण्यं धर्मशास्त्रफलं महत् ॥

śṛṇu pāṇḍava tatvena pavitraṃ pāpanāśanam | kathyamānaṃ mayā puṇyaṃ dharmaśāstraphalaṃ mahat

हे पाण्डुपुत्र! मैं जो यह पवित्र, पापनाशक और पुण्यदायी बात ठीक-ठीक कह रहा हूँ, उसे सुनो। यह धर्मशास्त्र का महान फल देनेवाली है।

श्लोक 3 (14.97.3)

यः शृणोति शुचिर्भूत्वा एकचित्तस्तपोयुतः । स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं धर्मं ज्ञेयं युधिष्ठिर ॥

yaḥ śṛṇoti śucirbhūtvā ekacittastapoyutaḥ | svargyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ dharmaṃ jñeyaṃ yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर! जो शुद्ध होकर, एकाग्र मन से और तपस्या के साथ इसे सुनता है, उसके लिए इस धर्म को स्वर्ग, यश और आयु देनेवाला जानना चाहिए।

श्लोक 4 (14.97.4)

श्रद्दधानस्य तस्येह यत्पापं पूर्वसंचितम् । विनश्यत्याशु तत्सर्वं मद्भक्तस्य विशेषतः ॥

śraddadhānasya tasyeha yatpāpaṃ pūrvasaṃcitam | vinaśyatyāśu tatsarvaṃ madbhaktasya viśeṣataḥ

श्रद्धापूर्वक सुननेवाले का जो भी पाप पहले से संचित है, वह सब शीघ्र नष्ट हो जाता है, और मेरे भक्त का तो विशेष रूप से।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (14.97.5)

एवं श्रुत्वा वचः पुण्यं सत्यं केशवभाषितम् । प्रहृष्टमनसो भूत्वा चिन्तयन्तोऽद्भुतं परम् ॥

evaṃ śrutvā vacaḥ puṇyaṃ satyaṃ keśavabhāṣitam | prahṛṣṭamanaso bhūtvā cintayanto'dbhutaṃ param

केशव के कहे हुए इन पुण्यमय और सत्य वचनों को सुनकर वे सब मन में प्रसन्न हो गए और अत्यन्त आश्चर्य से भर गए।

श्लोक 6 (14.97.6)

देवब्रह्मर्षयः सर्वे गन्धर्वाप्सरसस्तथा । भूता यक्षग्रहाश्चैव गुह्यका भुजगास्तथा ॥

devabrahmarṣayaḥ sarve gandharvāpsarasastathā | bhūtā yakṣagrahāścaiva guhyakā bhujagāstathā

देवता और ब्रह्मर्षि, गन्धर्व और अप्सराएँ, भूत, यक्ष, ग्रह, गुह्यक और नाग, ये सब,

श्लोक 7 (14.97.7)

वालखिल्या महात्मानो योगिनस्तत्वदर्शिनः । तथा भागवताश्चापि पञ्चकालमुपासकाः ॥

vālakhilyā mahātmāno yoginastatvadarśinaḥ | tathā bhāgavatāścāpi pañcakālamupāsakāḥ

महात्मा वालखिल्य, तत्त्व को देखनेवाले योगी तथा पाँचों कालों में उपासना करनेवाले भागवत,

श्लोक 8 (14.97.8)

कौतूहलसमाविष्टाः प्रहृष्टेन्द्रियमानसाः । श्रोतुकामाः परं धर्मं वैष्णवं धर्मशासनम् । हृदि कर्तुं च तद्वाक्यं प्रणेमुः शिरसा नताः ॥

kautūhalasamāviṣṭāḥ prahṛṣṭendriyamānasāḥ | śrotukāmāḥ paraṃ dharmaṃ vaiṣṇavaṃ dharmaśāsanam | hṛdi kartuṃ ca tadvākyaṃ praṇemuḥ śirasā natāḥ

कौतूहल से भरे हुए, प्रसन्न इन्द्रियों और मनवाले वे परम वैष्णव धर्म के उपदेश को सुनने की इच्छा से और उन वचनों को हृदय में धारण करने के लिए सिर झुकाकर प्रणाम करने लगे।

श्लोक 9 (14.97.9)

ततस्तान्वासुदेवेन दृष्टान्दिव्येन चक्षुषा । विमुक्तपापानालोक्य प्रणम्य शिरसा हरिम् । पप्रच्छ केशवं धर्मं धर्मपुत्रः प्रतापवान् ॥

tatastānvāsudevena dṛṣṭāndivyena cakṣuṣā | vimuktapāpānālokya praṇamya śirasā harim | papraccha keśavaṃ dharmaṃ dharmaputraḥ pratāpavān

तब वासुदेव ने उन सबको दिव्य दृष्टि से देखा था और वे पापों से मुक्त हो गए थे, यह देखकर प्रतापी धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने हरि को सिर झुकाकर प्रणाम किया और केशव से धर्म के विषय में पूछा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 10 (14.97.10)

कीदृशी ब्राह्मणस्याथ क्षत्रियस्यापि कीदृशी । वैश्यस्य कीदृशी देव गतिः शूद्रस्य कीदृशी ॥

kīdṛśī brāhmaṇasyātha kṣatriyasyāpi kīdṛśī | vaiśyasya kīdṛśī deva gatiḥ śūdrasya kīdṛśī

हे देव! ब्राह्मण की गति कैसी होती है और क्षत्रिय की कैसी? वैश्य की गति कैसी है और शूद्र की कैसी?

श्लोक 11 (14.97.11)

कथं बध्येत पाशेन ब्राह्मणस्तु यमालये । क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा शूद्रो वा बध्यते कथम् । एतत्कर्मफलं ब्रूहि लोकनाथ नमोस्तु ते ॥

kathaṃ badhyeta pāśena brāhmaṇastu yamālaye | kṣatriyo vātha vaiśyo vā śūdro vā badhyate katham | etatkarmaphalaṃ brūhi lokanātha namostu te

यमलोक में ब्राह्मण पाश से कैसे बाँधा जाता है? अथवा क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र कैसे बाँधा जाता है? हे लोकनाथ! इन कर्मों का फल मुझे बताइए। आपको नमस्कार है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (14.97.12)

पृष्टोऽथ केशवो ह्येवं धर्मपुत्रेण धीमता । उवाच संसारगतिं चातुर्वर्ण्यस्य कर्मजाम् ॥

pṛṣṭo'tha keśavo hyevaṃ dharmaputreṇa dhīmatā | uvāca saṃsāragatiṃ cāturvarṇyasya karmajām

बुद्धिमान धर्मपुत्र के इस प्रकार पूछने पर केशव ने चारों वर्णों के कर्मों से उत्पन्न होनेवाली संसार की गति बताई।

भगवानुवाच

श्लोक 13 (14.97.13)

शृणु वर्णक्रमेणैव धर्मं धर्मभृतां वर । नास्ति किंचिन्नरश्रेष्ठ ब्राह्मणस्य तु दुष्कृतम् ॥

śṛṇu varṇakrameṇaiva dharmaṃ dharmabhṛtāṃ vara | nāsti kiṃcinnaraśreṣṭha brāhmaṇasya tu duṣkṛtam

हे धर्म धारण करनेवालों में श्रेष्ठ! वर्णों के क्रम से धर्म सुनो। हे नरश्रेष्ठ! ब्राह्मण के लिए तो कोई दुष्कर्म है ही नहीं।

श्लोक 14 (14.97.14)

शिखायज्ञोपवीता ये सन्ध्यां ये चाप्युपासते । यैश्च पूर्णाहुतिः प्राप्ता विधिवज्जुह्वते च ये ॥

śikhāyajñopavītā ye sandhyāṃ ye cāpyupāsate | yaiśca pūrṇāhutiḥ prāptā vidhivajjuhvate ca ye

जो शिखा और यज्ञोपवीत धारण करते हैं और सन्ध्या की उपासना करते हैं, जिन्होंने पूर्णाहुति प्राप्त की है और जो विधिपूर्वक हवन करते हैं,

श्लोक 15 (14.97.15)

वैश्वदेवं च ये चक्रुः पूजयन्त्यतिथींश्च ये । नित्यं स्वाध्यायशीलाश्च जपयज्ञपराश्च ये ॥

vaiśvadevaṃ ca ye cakruḥ pūjayantyatithīṃśca ye | nityaṃ svādhyāyaśīlāśca japayajñaparāśca ye

जो वैश्वदेव करते हैं और अतिथियों का सत्कार करते हैं, जो नित्य स्वाध्याय में लगे रहते हैं और जपयज्ञ में तत्पर हैं,

श्लोक 16 (14.97.16)

सायंप्रातर्हुताशाश्च शूद्रभोजनवर्जिताः । डंभानृतविमुक्ताश्च स्वदारनिरताश्च ये । पञ्चयज्ञपरा ये च येऽग्निहोत्रमुपासते ॥

sāyaṃprātarhutāśāśca śūdrabhojanavarjitāḥ | ḍaṃbhānṛtavimuktāśca svadāraniratāśca ye | pañcayajñaparā ye ca ye'gnihotramupāsate

जो सायं और प्रातः के हवन से बचा अन्न खाते हैं, शूद्र का भोजन नहीं करते, दम्भ और असत्य से मुक्त हैं और अपनी ही पत्नी में रत हैं, जो पाँच यज्ञों में तत्पर हैं और अग्निहोत्र की उपासना करते हैं,

श्लोक 17 (14.97.17)

दहन्ति दुष्कृतं येषां हूयमानास्त्रयोऽग्नयः । नष्टदुष्कृतकर्माणो ब्रह्मलोकं व्रजन्ति ते ॥

dahanti duṣkṛtaṃ yeṣāṃ hūyamānāstrayo'gnayaḥ | naṣṭaduṣkṛtakarmāṇo brahmalokaṃ vrajanti te

जिनके हवन किए जाते तीनों अग्नि उनके दुष्कर्म को जला देते हैं, वे दुष्कर्मों से रहित होकर ब्रह्मलोक को जाते हैं।

श्लोक 18 (14.97.18)

ब्रह्मलोके पुनः कामं गन्धर्वैर्ब्रह्मगायकैः । उद्गीयमानाः प्रयतैः पूज्यमानाः स्वयंभुवा । ब्रह्मलोके प्रमोदन्ते यावदाभूतसंप्लवम् ॥

brahmaloke punaḥ kāmaṃ gandharvairbrahmagāyakaiḥ | udgīyamānāḥ prayataiḥ pūjyamānāḥ svayaṃbhuvā | brahmaloke pramodante yāvadābhūtasaṃplavam

वहाँ ब्रह्मलोक में, ब्रह्मा के गायक गन्धर्वों से मनचाहे गाए जाते हुए और स्वयम्भू से पूजित होकर वे प्राणियों के प्रलय तक ब्रह्मलोक में आनन्द करते हैं।

श्लोक 19 (14.97.19)

क्षत्रियोपि स्थितो राज्ये स्वधर्मपरिपालकः । सम्यक्प्रजाः पालयिता षड्भागनिरतः सदा ॥

kṣatriyopi sthito rājye svadharmaparipālakaḥ | samyakprajāḥ pālayitā ṣaḍbhāganirataḥ sadā

क्षत्रिय भी, जो राज्य में स्थित रहकर अपने धर्म का पालन करता है, प्रजा की भली-भाँति रक्षा करता है और सदा छठे भाग के कर में सन्तुष्ट रहता है,

श्लोक 20 (14.97.20)

यज्ञदानरतो धीरः स्वदारनिरतः सदा । शास्त्रानुसारी तत्वज्ञः प्रजाकार्यपरायणः ॥

yajñadānarato dhīraḥ svadāranirataḥ sadā | śāstrānusārī tatvajñaḥ prajākāryaparāyaṇaḥ

जो यज्ञ और दान में रत है, धीर है, सदा अपनी पत्नी में अनुरक्त है, शास्त्र के अनुसार चलता है, तत्त्व को जानता है और प्रजा के कार्य में लगा रहता है,

श्लोक 21 (14.97.21)

विप्रेभ्यः कामदो नित्यं भृत्यानां भरणे रतः । सत्यसन्धः शुचिर्नित्यं लोभडंभविवर्जितः । क्षत्रियोप्युत्तमां याति गतिं देवनिषेविताम् ॥

viprebhyaḥ kāmado nityaṃ bhṛtyānāṃ bharaṇe rataḥ | satyasandhaḥ śucirnityaṃ lobhaḍaṃbhavivarjitaḥ | kṣatriyopyuttamāṃ yāti gatiṃ devaniṣevitām

जो ब्राह्मणों की इच्छाएँ सदा पूरी करता है, सेवकों के भरण-पोषण में रत रहता है, सत्य का पक्का है, सदा शुद्ध है और लोभ तथा दम्भ से रहित है, ऐसा क्षत्रिय भी देवताओं से सेवित उत्तम गति को पाता है।

श्लोक 22 (14.97.22)

तत्र दिव्याप्सरोभिस्तु गन्धर्वैश्च विशेषतः । सेव्यमानो महातेजाः क्रीडते शक्रपूजितः ॥

tatra divyāpsarobhistu gandharvaiśca viśeṣataḥ | sevyamāno mahātejāḥ krīḍate śakrapūjitaḥ

वहाँ दिव्य अप्सराओं और विशेषकर गन्धर्वों से सेवित वह महातेजस्वी इन्द्र से पूजित होकर विहार करता है।

श्लोक 23 (14.97.23)

चतुर्युगानि वै त्रिंशत्क्रीडित्वा तत्र देववत् । इह मानुष्यलोके तु चतुर्वेदी द्विजो भवेत् ॥

caturyugāni vai triṃśatkrīḍitvā tatra devavat | iha mānuṣyaloke tu caturvedī dvijo bhavet

वहाँ देवता की भाँति तीस चतुर्युगों तक क्रीड़ा करके वह इस मनुष्यलोक में चारों वेदों का ज्ञाता ब्राह्मण होता है।

श्लोक 24 (14.97.24)

कृषिगोपालनिरतो धर्मान्वेषणतत्परः । दानधर्मेपि निरतो विप्रशुश्रूषकस्तथा ॥

kṛṣigopālanirato dharmānveṣaṇatatparaḥ | dānadharmepi nirato vipraśuśrūṣakastathā

जो खेती और गोपालन में लगा है, धर्म की खोज में तत्पर है, दान और धर्म में भी रत है तथा ब्राह्मणों की सेवा करता है,

श्लोक 25 (14.97.25)

सत्यसन्धः शुचिर्नित्यं लोभडंभविवर्जितः । ऋजुः स्वदारनिरतो हिंसाद्रोहविवर्जितः ॥

satyasandhaḥ śucirnityaṃ lobhaḍaṃbhavivarjitaḥ | ṛjuḥ svadāranirato hiṃsādrohavivarjitaḥ

जो सदा सत्य का पक्का और शुद्ध है, लोभ और दम्भ से रहित है, सरल है, अपनी ही पत्नी में रत है और हिंसा तथा द्रोह से दूर है,

श्लोक 26 (14.97.26)

वणिग्धर्मान्नमुञ्चन्वै देवब्राह्मणपूजकः । वैश्यः स्वर्गतिमाप्नोति पूज्यमानोप्सरोगणैः ॥

vaṇigdharmānnamuñcanvai devabrāhmaṇapūjakaḥ | vaiśyaḥ svargatimāpnoti pūjyamānopsarogaṇaiḥ

जो वणिक् धर्म को नहीं छोड़ता और देवताओं तथा ब्राह्मणों की पूजा करता है, वह वैश्य स्वर्ग की गति पाता है और अप्सराओं के समूहों से पूजित होता है।

श्लोक 27 (14.97.27)

चतुर्युगानि वै त्रिंशत्क्रीडित्वा दश पञ्च च । इह मानुष्यलोके च राजा भवति वीर्यवान् ॥

caturyugāni vai triṃśatkrīḍitvā daśa pañca ca | iha mānuṣyaloke ca rājā bhavati vīryavān

वहाँ तीस और दस और पाँच, अर्थात् पैंतालीस चतुर्युगों तक क्रीड़ा करके वह इस मनुष्यलोक में पराक्रमी राजा होता है।

श्लोक 28 (14.97.28)

सुवर्णकोट्यः पञ्चाशद्रत्नानां च शतं तथा । हस्त्यश्वरथसंयुक्तो महाभोगांश्च सेवते ॥

suvarṇakoṭyaḥ pañcāśadratnānāṃ ca śataṃ tathā | hastyaśvarathasaṃyukto mahābhogāṃśca sevate

पचास करोड़ स्वर्ण और सौ रत्नों के भण्डार से तथा हाथी, घोड़े और रथों से युक्त होकर वह बड़े-बड़े भोग भोगता है।

श्लोक 29 (14.97.29)

त्रयाणामपि वर्णानां शुश्रूषानिरतः सदा । विशेषतस्तु विप्राणां दासवद्यस्तु तिष्ठति ॥

trayāṇāmapi varṇānāṃ śuśrūṣānirataḥ sadā | viśeṣatastu viprāṇāṃ dāsavadyastu tiṣṭhati

जो सदा तीनों वर्णों की सेवा में लगा रहता है और विशेष रूप से ब्राह्मणों के दास की भाँति रहता है,

श्लोक 30 (14.97.30)

अयाचितप्रदाता च सत्यशौचसमन्वितः । गुरुदेवार्चनरतः परदारविवर्जितः ॥

ayācitapradātā ca satyaśaucasamanvitaḥ | gurudevārcanarataḥ paradāravivarjitaḥ

जो बिना माँगे देता है, सत्य और शौच से युक्त है, गुरु और देवताओं की पूजा में रत है और परस्त्री से दूर रहता है,

श्लोक 31 (14.97.31)

परपीडामकृत्वैव भृत्यवर्गं बिभर्ति यः । शूद्रोपि स्वर्गमाप्नोति जीवानामभयप्रदः ॥

parapīḍāmakṛtvaiva bhṛtyavargaṃ bibharti yaḥ | śūdropi svargamāpnoti jīvānāmabhayapradaḥ

और जो दूसरों को कष्ट दिए बिना अपने आश्रितों का भरण-पोषण करता है, ऐसा शूद्र भी प्राणियों को अभय देनेवाला होकर स्वर्ग पाता है।

श्लोक 32 (14.97.32)

स स्वर्गलोके क्रीडित्वा वर्षकोटिं महातपाः । इह मानुषलोके तु वैश्यो धनपतिर्भवेत् ॥

sa svargaloke krīḍitvā varṣakoṭiṃ mahātapāḥ | iha mānuṣaloke tu vaiśyo dhanapatirbhavet

स्वर्गलोक में एक करोड़ वर्ष तक क्रीड़ा करके वह महातपस्वी इस मनुष्यलोक में धन का स्वामी वैश्य होता है।

श्लोक 33 (14.97.33)

एवं धर्मात्परं नास्ति महत्संसारमोक्षणम् । न च धर्मात्परं किंचित्पापकर्मव्यपोहनम् ॥

evaṃ dharmātparaṃ nāsti mahatsaṃsāramokṣaṇam | na ca dharmātparaṃ kiṃcitpāpakarmavyapohanam

इस प्रकार संसार से छुड़ानेवाला धर्म से बड़ा कोई साधन नहीं है, और पापकर्मों को मिटानेवाला भी धर्म से बड़ा कुछ नहीं है।

श्लोक 34 (14.97.34)

तस्माद्धर्मः सदा कार्यो मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् । न हि धर्मानुरक्तानां लोके किंचन दुर्लभम् ॥

tasmāddharmaḥ sadā kāryo mānuṣyaṃ prāpya durlabham | na hi dharmānuraktānāṃ loke kiṃcana durlabham

इसलिए दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर सदा धर्म का आचरण करना चाहिए, क्योंकि धर्म में अनुराग रखनेवालों के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

श्लोक 35 (14.97.35)

स्वयंभुविहितो धर्मो यो यस्येह नरेश्वर । स तेन क्षपयेत्पापं सम्यगाचरितेन च ॥

svayaṃbhuvihito dharmo yo yasyeha nareśvara | sa tena kṣapayetpāpaṃ samyagācaritena ca

हे नरेश्वर! स्वयम्भू ने जिस मनुष्य के लिए जो धर्म ठहराया है, उसी को भली-भाँति आचरण में लाकर वह अपना पाप क्षीण करे।

श्लोक 36 (14.97.36)

सहजं यद्भवेत्कर्म न तत्त्याज्यं हि केनचित् । स एव तस्य धर्मो हि तेन सिद्धिं स गच्छति ॥

sahajaṃ yadbhavetkarma na tattyājyaṃ hi kenacit | sa eva tasya dharmo hi tena siddhiṃ sa gacchati

जो कर्म मनुष्य के साथ सहज रूप से उत्पन्न होता है, उसे किसी को नहीं छोड़ना चाहिए; वही उसका धर्म है और उसी से वह सिद्धि पाता है।

श्लोक 37 (14.97.37)

विगुणोपि स्वधर्मस्तु पापकर्म व्यपोहति । एवमेव तु धर्मोपि क्षीयते पापवर्धनात् ॥

viguṇopi svadharmastu pāpakarma vyapohati | evameva tu dharmopi kṣīyate pāpavardhanāt

अपना धर्म गुणहीन होने पर भी पापकर्म को मिटा देता है; इसी प्रकार पाप के बढ़ने से धर्म भी क्षीण हो जाता है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 38 (14.97.38)

भगवन्देवदेवेश श्रोतुं कौतूहलं हि मे । शुभस्याप्यशुभस्यापि क्षयवृद्धी यथाक्रमम् ॥

bhagavandevadeveśa śrotuṃ kautūhalaṃ hi me | śubhasyāpyaśubhasyāpi kṣayavṛddhī yathākramam

हे भगवन्! हे देवों के देव! मुझे यह सुनने की उत्सुकता है कि शुभ और अशुभ का क्षय और वृद्धि किस क्रम से होती है।

भगवानुवाच

श्लोक 39 (14.97.39)

शृणु पार्थिव तत्सर्वं धर्मसूक्ष्मं सनातनम् । दुर्विज्ञेयतमं नित्यं यत्र मग्ना महाजनाः ॥

śṛṇu pārthiva tatsarvaṃ dharmasūkṣmaṃ sanātanam | durvijñeyatamaṃ nityaṃ yatra magnā mahājanāḥ

हे राजन्! वह सब सुनो। यह सूक्ष्म और सनातन धर्म अत्यन्त कठिनाई से समझा जानेवाला है, जिसमें बड़े-बड़े लोग भी डूब गए हैं।

श्लोक 40 (14.97.40)

यथैव शीतमुदकमुष्णेन बहुना वृतम् । भवेत्तु तत्क्षणादुष्णं शीतत्वं च विनश्यति ॥

yathaiva śītamudakamuṣṇena bahunā vṛtam | bhavettu tatkṣaṇāduṣṇaṃ śītatvaṃ ca vinaśyati

जैसे ठण्डा जल बहुत-से गरम जल से घिर जाने पर उसी क्षण गरम हो जाता है और उसकी शीतलता नष्ट हो जाती है,

श्लोक 41 (14.97.41)

यथोष्णं वा भवेदल्पं शीतेन बहुना वृतम् । शीतलं च भवेत्सर्वमुष्णत्वं च विनश्यति ॥

yathoṣṇaṃ vā bhavedalpaṃ śītena bahunā vṛtam | śītalaṃ ca bhavetsarvamuṣṇatvaṃ ca vinaśyati

अथवा थोड़ा-सा गरम जल बहुत-से ठण्डे जल से घिर जाने पर सब का सब ठण्डा हो जाता है और उसकी उष्णता नष्ट हो जाती है,

श्लोक 42 (14.97.42)

एवं च यद्भवेद्भूरि सुकृतं वाऽपि दुष्कृतम् । तदल्पं क्षपयेच्छीघ्रं नात्र कार्या विचारणा ॥

evaṃ ca yadbhavedbhūri sukṛtaṃ vā'pi duṣkṛtam | tadalpaṃ kṣapayecchīghraṃ nātra kāryā vicāraṇā

वैसे ही पुण्य या पाप जो भी बड़ा होता है, वह छोटे को शीघ्र क्षीण कर देता है; इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

श्लोक 43 (14.97.43)

समत्वे सति राजेन्द्र तयोः सुकृतपापयोः । गूहितस्य भवेद्वृद्धिः कीर्तितस्य भवेत्क्षयः ॥

samatve sati rājendra tayoḥ sukṛtapāpayoḥ | gūhitasya bhavedvṛddhiḥ kīrtitasya bhavetkṣayaḥ

हे राजेन्द्र! जब पुण्य और पाप दोनों बराबर हों, तब जो छिपाया गया हो वह बढ़ता है और जिसका बखान किया गया हो वह घटता है।

श्लोक 44 (14.97.44)

ख्यापनेनानुतापेन प्रायः पापं विनश्यति । तथा कृतस्तु राजेन्द्र धर्मो नश्यति मानद ॥

khyāpanenānutāpena prāyaḥ pāpaṃ vinaśyati | tathā kṛtastu rājendra dharmo naśyati mānada

पाप प्रायः प्रकट करने और पश्चात्ताप से नष्ट हो जाता है; किन्तु हे मानद राजेन्द्र! इस प्रकार प्रकट किया हुआ धर्म नष्ट हो जाता है।

श्लोक 45 (14.97.45)

तावुभौ गूहितौ सम्यग्वृद्धिं यातो न संशयः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन न पापं गूहयेद्बुधः ॥

tāvubhau gūhitau samyagvṛddhiṃ yāto na saṃśayaḥ | tasmātsarvaprayatnena na pāpaṃ gūhayedbudhaḥ

वे दोनों भली-भाँति छिपाए जाने पर निःसन्देह बढ़ते हैं; इसलिए बुद्धिमान को पूरे प्रयत्न से अपना पाप कभी नहीं छिपाना चाहिए।

श्लोक 46 (14.97.46)

तस्मादेतत्प्रयत्नेन कीर्तयेत्क्षयकारणात् । तस्मात्संकीर्तयेत्पापं नित्यं धर्मं च गूहयेत् ॥

tasmādetatprayatnena kīrtayetkṣayakāraṇāt | tasmātsaṃkīrtayetpāpaṃ nityaṃ dharmaṃ ca gūhayet

इसलिए पाप का क्षय करने के लिए प्रयत्नपूर्वक उसे प्रकट करे। अतः वह सदा पाप का बखान करे और धर्म को छिपाए रखे।

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