Skip to main content

आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 96

कृष्ण द्वारा वैष्णव धर्म का उपदेश

अश्वमेध के बाद युधिष्ठिर कृष्ण से वैष्णव धर्म बताने की प्रार्थना करते हैं और अपने सुने हुए अनेक धर्मोपदेशों की गणना करते हैं; मुनि भी सुनने के लिए एकत्र होते हैं। कृष्ण धर्म को पिता, माता और मित्र बताते हैं, लोगों के सुख-दुःख का कारण समझाते हैं और कहते हैं कि उनका मनुष्य-जन्म माया का कार्य है। वे अपने भक्तों, अपने विराट् रूप और सब में अपनी स्थिति का वर्णन करते हैं और कहते हैं कि सारा जगत् उन्हीं से उत्पन्न होता और उन्हीं में लीन होता है।

अध्याय 95अध्याय-सूचीअध्याय 97

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (14.96.1)

अश्वमेधे पुरावृत्ते केशवं केशिसूदनम् । धर्मसंशयमुद्दिश्य किमपृच्छत्पितामहः ॥

aśvamedhe purāvṛtte keśavaṃ keśisūdanam | dharmasaṃśayamuddiśya kimapṛcchatpitāmahaḥ

अश्वमेध के समय केशिसूदन केशव से धर्म-सम्बन्धी संशय के विषय में पितामह (युधिष्ठिर) ने क्या पूछा था?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (14.96.2)

पश्चिमेनाश्वमेधेन यदा स्नातो युधिष्ठिरः । तदा राजा नमस्कृत्य केशवं पुनरब्रवीत् ॥

paścimenāśvamedhena yadā snāto yudhiṣṭhiraḥ | tadā rājā namaskṛtya keśavaṃ punarabravīt

अन्तिम अश्वमेध के समापन पर जब युधिष्ठिर स्नान कर चुके, तब राजा ने केशव को प्रणाम करके फिर कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 3 (14.96.3)

भगवन्वैष्णवा धर्माः किंफलाः किंपरायणाः । किं धर्ममधिकृत्याथ भवतोत्पादिताः पुरा ॥

bhagavanvaiṣṇavā dharmāḥ kiṃphalāḥ kiṃparāyaṇāḥ | kiṃ dharmamadhikṛtyātha bhavatotpāditāḥ purā

भगवन्, वैष्णव धर्मों का फल क्या है और उनका परम आश्रय क्या है? किस धर्म को लक्ष्य करके आपने उन्हें पूर्वकाल में प्रकट किया था?

श्लोक 4 (14.96.4)

यदि तेहमनुग्राह्यः प्रियोस्मि मधुसूदन । श्रोतव्या यदि मे कृष्ण तन्मे कथय सुव्रत ॥

yadi tehamanugrāhyaḥ priyosmi madhusūdana | śrotavyā yadi me kṛṣṇa tanme kathaya suvrata

हे मधुसूदन, यदि मैं आपका अनुग्रह पाने योग्य हूँ, यदि मैं आपको प्रिय हूँ और यदि वे मेरे सुनने योग्य हैं, तो हे सुव्रत कृष्ण, मुझे बताइए।

श्लोक 5 (14.96.5)

पवित्रा किल ते धर्माः सर्वपापप्रणाशनाः । सर्वधर्मोत्तमाः पुण्या भगवंस्त्वन्मुखोद्गताः ॥

pavitrā kila te dharmāḥ sarvapāpapraṇāśanāḥ | sarvadharmottamāḥ puṇyā bhagavaṃstvanmukhodgatāḥ

कहा जाता है कि आपके वे धर्म पवित्र हैं, सब पापों का नाश करने वाले हैं, सब धर्मों में उत्तम और पुण्यमय हैं; हे भगवन्, वे आपके मुख से निकले हैं।

श्लोक 6 (14.96.6)

याञ्श्रुत्वा ब्रह्महा गोघ्नो मातृहा गुरुतल्पगः । पाकभेदी कृतघ्नश्च सुरापो ब्रह्मविक्रयी ॥

yāñśrutvā brahmahā goghno mātṛhā gurutalpagaḥ | pākabhedī kṛtaghnaśca surāpo brahmavikrayī

जिन्हें सुनकर ब्राह्मण की हत्या करने वाला, गोहत्यारा, माता का हत्यारा, गुरुपत्नी-गामी, दूसरों का भोजन बिगाड़ने वाला, कृतघ्न, मद्यपान करने वाला और वेद बेचने वाला,

श्लोक 7 (14.96.7)

मित्रविश्वासघाती च वीरहा भ्रूणहा तथा । तपोविक्रयिणश्चैव दानविक्रयिणस्तथा ॥

mitraviśvāsaghātī ca vīrahā bhrūṇahā tathā | tapovikrayiṇaścaiva dānavikrayiṇastathā

मित्र के विश्वास को तोड़ने वाला, वीरों का हत्यारा और गर्भ की हत्या करने वाला, तप बेचने वाले और दान बेचने वाले,

श्लोक 8 (14.96.8)

आत्मविक्रयिणो मूढा जीवेद्यश्च विकर्मभिः । पापाः शठा नैकृतिका डांभिका दूषकास्तथा ॥

ātmavikrayiṇo mūḍhā jīvedyaśca vikarmabhiḥ | pāpāḥ śaṭhā naikṛtikā ḍāṃbhikā dūṣakāstathā

स्वयं को बेचने वाले मूढ़, निषिद्ध कर्मों से जीविका चलाने वाले, पापी, शठ, कपटी, दम्भी और दूसरों को दूषित करने वाले,

श्लोक 9 (14.96.9)

रसभेदकरा ये च ये च स्युर्ब्रह्मघातकाः । शूद्रप्रेष्यकराश्चोरा विप्रा ये च पुरोहिताः ॥

rasabhedakarā ye ca ye ca syurbrahmaghātakāḥ | śūdrapreṣyakarāścorā viprā ye ca purohitāḥ

रसों में मिलावट करने वाले, ब्राह्मणों का वध करने वाले, शूद्रों के सेवक, चोर और जो पुरोहित ब्राह्मण हैं,

श्लोक 10 (14.96.10)

निक्षेपहारिणः स्त्रीघ्नास्तथा ये पारदारिकाः । एते चान्ये च पापा ये मुच्यन्तेतेऽपि किल्बिषात् ॥

nikṣepahāriṇaḥ strīghnāstathā ye pāradārikāḥ | ete cānye ca pāpā ye mucyantete'pi kilbiṣāt

धरोहर हड़प लेने वाले, स्त्रियों की हत्या करने वाले और परस्त्रीगामी: ये और दूसरे पापी भी अपने पाप से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 11 (14.96.11)

तानाचक्ष्व सुरश्रेष्ठ त्वद्भक्तस्य ममाच्युत ॥

tānācakṣva suraśreṣṭha tvadbhaktasya mamācyuta

हे देवश्रेष्ठ अच्युत, अपने भक्त मुझे उन्हें बताइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (14.96.12)

इत्येवं कथिते देवे धर्मपुत्रेण संसदि । वसिष्ठाद्यास्तपोयुक्ता मुनयस्तत्वदर्शिनः ॥

ityevaṃ kathite deve dharmaputreṇa saṃsadi | vasiṣṭhādyāstapoyuktā munayastatvadarśinaḥ

धर्मपुत्र के सभा में भगवान् से इस प्रकार कहने पर वसिष्ठ आदि तपस्वी, तत्त्वदर्शी मुनि,

श्लोक 13 (14.96.13)

श्रोतुकामाः परं गुह्यं वैष्णवं धर्ममुत्तमम् । तथा भागवताश्चैव ततस्तं पर्यवारयन् ॥

śrotukāmāḥ paraṃ guhyaṃ vaiṣṇavaṃ dharmamuttamam | tathā bhāgavatāścaiva tatastaṃ paryavārayan

परम गुप्त और उत्तम वैष्णव धर्म को सुनने की इच्छा से, भागवतों के साथ, तब उन्हें चारों ओर से घेरकर बैठ गए।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 14 (14.96.14)

तत्वतस्तव भावेन पादमूलमुपागतम् । यदि जानासि मां भक्तं स्निग्धं वा भक्तवत्सल ॥

tatvatastava bhāvena pādamūlamupāgatam | yadi jānāsi māṃ bhaktaṃ snigdhaṃ vā bhaktavatsala

सच्चे भाव से मैं आपके चरणों के मूल में आया हूँ। हे भक्तवत्सल, यदि आप मुझे अपना भक्त और स्नेही जानते हैं,

श्लोक 15 (14.96.15)

धर्मगुह्यानि सर्वाणि वेत्तुमिच्छामि तत्वतः । धर्मान्कथय मे देव यद्यनुग्रहभागहम् ॥

dharmaguhyāni sarvāṇi vettumicchāmi tatvataḥ | dharmānkathaya me deva yadyanugrahabhāgaham

तो मैं धर्म के सब गुप्त रहस्यों को यथार्थ रूप से जानना चाहता हूँ। हे देव, यदि मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ, तो मुझे वे धर्म बताइए।

श्लोक 16 (14.96.16)

श्रुता मे मानवा धर्मा वासिष्ठाः काश्यपास्तथा । गार्गीया गौतमीयाश्च तथा गोपालकस्य च ॥

śrutā me mānavā dharmā vāsiṣṭhāḥ kāśyapāstathā | gārgīyā gautamīyāśca tathā gopālakasya ca

मैंने मनु के धर्म सुने हैं, वसिष्ठ और कश्यप के धर्म सुने हैं, तथा गार्ग्य, गौतम और गोपालक के धर्म भी सुने हैं।

श्लोक 17 (14.96.17)

पराशरकृताः पूर्वा मैत्रेयस्य च धीमतः । औमा माहेश्वराश्चैव नन्दिधर्माश्च पावनाः ॥

parāśarakṛtāḥ pūrvā maitreyasya ca dhīmataḥ | aumā māheśvarāścaiva nandidharmāśca pāvanāḥ

पराशर और बुद्धिमान मैत्रेय द्वारा पूर्व में रचे गए धर्म; उमा, महेश्वर और नन्दी के पावन धर्म भी।

श्लोक 18 (14.96.18)

ब्रह्मणा कथिता ये च कौमाराश्च श्रुता मया । धूमायनकृता धर्माः काण्डवैश्वानरा अपि ॥

brahmaṇā kathitā ye ca kaumārāśca śrutā mayā | dhūmāyanakṛtā dharmāḥ kāṇḍavaiśvānarā api

ब्रह्मा द्वारा कहे गए धर्म और कौमार धर्म मैंने सुने हैं; धूमायन के रचे हुए धर्म तथा काण्डवैश्वानर के धर्म भी।

श्लोक 19 (14.96.19)

भार्गवा याज्ञवल्क्याश्च मार्कण्डेयकृता अपि । भारद्वाजकृता ये च बृहस्पतिकृताश्च ये ॥

bhārgavā yājñavalkyāśca mārkaṇḍeyakṛtā api | bhāradvājakṛtā ye ca bṛhaspatikṛtāśca ye

भार्गव के, याज्ञवल्क्य के और मार्कण्डेय के रचे धर्म; भरद्वाज और बृहस्पति के रचे धर्म भी।

श्लोक 20 (14.96.20)

कुणेश्च कुणिबाहोश्च विश्वामित्रकृताश्च ये । सुमन्तुजैमिनिकृताः शाकुनेयास्तथैव च ॥

kuṇeśca kuṇibāhośca viśvāmitrakṛtāśca ye | sumantujaiminikṛtāḥ śākuneyāstathaiva ca

कुणि और कुणिबाहु के धर्म, विश्वामित्र के रचे धर्म; सुमन्तु और जैमिनि के रचे धर्म तथा शाकुनेय के धर्म भी।

श्लोक 21 (14.96.21)

पुलस्त्यपुलहोद्गीताः पावकीयास्तथैव च । अगस्त्यगीता मौद्गल्याः शाण्डिल्याः शलभायनाः ॥

pulastyapulahodgītāḥ pāvakīyāstathaiva ca | agastyagītā maudgalyāḥ śāṇḍilyāḥ śalabhāyanāḥ

पुलस्त्य और पुलह द्वारा गाए गए धर्म, पावकीय धर्म, अगस्त्य द्वारा गाए गए धर्म, तथा मौद्गल्य, शाण्डिल्य और शलभायन के धर्म।

श्लोक 22 (14.96.22)

वालखिल्यकृता ये च ये च सप्तर्षिभिस्तथा । आपस्तंबकृता धर्माः शङ्खस्य लिखितस्य च ॥

vālakhilyakṛtā ye ca ye ca saptarṣibhistathā | āpastaṃbakṛtā dharmāḥ śaṅkhasya likhitasya ca

वालखिल्यों के रचे धर्म और सप्तर्षियों के रचे धर्म; आपस्तम्ब के रचे धर्म तथा शंख और लिखित के धर्म।

श्लोक 23 (14.96.23)

प्राजापत्यास्तथा याम्या माहेन्द्राश्च श्रुता मया । वैयाघ्रव्यासकीयाश्च विभण्डककृताश्च ये ॥

prājāpatyāstathā yāmyā māhendrāśca śrutā mayā | vaiyāghravyāsakīyāśca vibhaṇḍakakṛtāśca ye

प्राजापत्य, याम्य और माहेन्द्र धर्म भी मैंने सुने हैं; व्याघ्र और व्यास के धर्म तथा विभण्डक के रचे धर्म भी।

श्लोक 24 (14.96.24)

नारदीयाः श्रुता धर्माः कापोताश्च श्रुता मया । तथा विदुरवाक्यानि भृगोरङ्गिरसस्तथा ॥

nāradīyāḥ śrutā dharmāḥ kāpotāśca śrutā mayā | tathā viduravākyāni bhṛgoraṅgirasastathā

नारद के धर्म मैंने सुने हैं, कापोत धर्म भी सुने हैं; वैसे ही विदुर, भृगु और अंगिरा के वचन भी।

श्लोक 25 (14.96.25)

क्रौञ्चा मृदङ्गगीताश्च सौर्या हारीतकाश्च ये । ये पिशङ्गकृताश्चापि कातपायाः सुवालकाः ॥

krauñcā mṛdaṅgagītāśca sauryā hārītakāśca ye | ye piśaṅgakṛtāścāpi kātapāyāḥ suvālakāḥ

क्रौञ्च धर्म, मृदङ्ग के गाए धर्म, सौर्य और हारीतक धर्म; पिशङ्ग के रचे धर्म, कातपाय और सुवालक धर्म।

श्लोक 26 (14.96.26)

उद्दालककृता धर्मा औशनस्यास्तथैव च । वैशंपायनगीताश्च ये चान्येऽप्येवमादितः ॥

uddālakakṛtā dharmā auśanasyāstathaiva ca | vaiśaṃpāyanagītāśca ye cānye'pyevamāditaḥ

उद्दालक के रचे धर्म और उशना (शुक्र) के धर्म; वैशम्पायन के गाए धर्म, तथा इसी प्रकार के जो और भी हैं।

श्लोक 27 (14.96.27)

एतेभ्यः सर्वधर्मेभ्यो देव त्वन्मुखनिस्सृताः । पावनत्वात्पवित्रत्वाद्विशिष्टा इति मे मतिः ॥

etebhyaḥ sarvadharmebhyo deva tvanmukhanissṛtāḥ | pāvanatvātpavitratvādviśiṣṭā iti me matiḥ

परन्तु हे देव, इन सब धर्मों में जो आपके मुख से निकले हैं, वे पावन करने वाले और पवित्र होने के कारण सबसे श्रेष्ठ हैं, ऐसा मेरा मत है।

श्लोक 28 (14.96.28)

तस्माद्धि त्वां प्रपन्नस्य त्वद्भक्तस्य च केशव । युष्मदीयान्वरान्धर्मान्पुण्यान्कथय मेच्युत ॥

tasmāddhi tvāṃ prapannasya tvadbhaktasya ca keśava | yuṣmadīyānvarāndharmānpuṇyānkathaya mecyuta

इसलिए हे केशव, आपकी शरण में आए हुए आपके भक्त मुझसे, अपने श्रेष्ठ और पुण्यमय धर्म कहिए, हे अच्युत।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 29 (14.96.29)

एवं पृष्टस्तु धर्मज्ञो धर्मपुत्रेण केशवः । उवाच धर्मान्सूक्ष्मार्थान्धर्मपुत्रस्य हर्षितः ॥

evaṃ pṛṣṭastu dharmajño dharmaputreṇa keśavaḥ | uvāca dharmānsūkṣmārthāndharmaputrasya harṣitaḥ

धर्मपुत्र के इस प्रकार पूछने पर धर्मज्ञ केशव ने हर्षित होकर धर्मपुत्र से सूक्ष्म अर्थ वाले धर्म कहे।

वासुदेव उवाच

श्लोक 30 (14.96.30)

एवं ते यस्य कौन्तेय यत्नो धर्मेषु सुव्रत । तस्य ते दुर्लभो लोके न कश्चिदपि विद्येत ॥

evaṃ te yasya kaunteya yatno dharmeṣu suvrata | tasya te durlabho loke na kaścidapi vidyeta

हे कुन्तीपुत्र, हे सुव्रत, धर्मों में तुम्हारा ऐसा प्रयत्न है; इसलिए संसार में तुम्हारे लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

श्लोक 31 (14.96.31)

धर्मः श्रुतो वा दृष्टो वा कथितो वा कृतोपि वा । अनुमोदितो वा राजेन्द्र नयतीन्द्रपदं नरम् ॥

dharmaḥ śruto vā dṛṣṭo vā kathito vā kṛtopi vā | anumodito vā rājendra nayatīndrapadaṃ naram

हे राजेन्द्र, धर्म चाहे सुना जाए, देखा जाए, कहा जाए, किया जाए या अनुमोदित किया जाए, वह मनुष्य को इन्द्र के पद तक पहुँचाता है।

श्लोक 32 (14.96.32)

धर्मः पिता च माता च धर्मो नाथः सुहृत्तथा । धर्मो भ्राता सखा चैव धर्मः स्वामी परंतप ॥

dharmaḥ pitā ca mātā ca dharmo nāthaḥ suhṛttathā | dharmo bhrātā sakhā caiva dharmaḥ svāmī paraṃtapa

धर्म ही पिता और माता है; धर्म ही रक्षक और मित्र है; धर्म ही भाई और सखा है; हे परंतप, धर्म ही स्वामी है।

श्लोक 33 (14.96.33)

धर्मादर्थश्च कामश्च धर्माद्भोगाः सुखानि च । धर्मादैश्वर्यमेवाग्र्यं धर्मात्स्वर्गगतिः परा ॥

dharmādarthaśca kāmaśca dharmādbhogāḥ sukhāni ca | dharmādaiśvaryamevāgryaṃ dharmātsvargagatiḥ parā

धर्म से अर्थ और काम प्राप्त होते हैं; धर्म से भोग और सुख मिलते हैं; धर्म से श्रेष्ठ ऐश्वर्य मिलता है और धर्म से ही स्वर्ग की परम गति मिलती है।

श्लोक 34 (14.96.34)

धर्मोयं सेवितः शुद्धस्त्रायते महतो भयात् । धर्माद्द्विजत्वं देवत्वं धर्मः पावयते नरम् ॥

dharmoyaṃ sevitaḥ śuddhastrāyate mahato bhayāt | dharmāddvijatvaṃ devatvaṃ dharmaḥ pāvayate naram

शुद्ध भाव से सेवन किया हुआ यह धर्म बड़े भय से बचाता है; धर्म से द्विजत्व और देवत्व मिलता है; धर्म मनुष्य को पवित्र करता है।

श्लोक 35 (14.96.35)

यदा च क्षीयते पापं कालेन पुरुषस्य तु । तदा संजायते बुद्धिर्धर्मं कर्तुं युधिष्ठिर ॥

yadā ca kṣīyate pāpaṃ kālena puruṣasya tu | tadā saṃjāyate buddhirdharmaṃ kartuṃ yudhiṣṭhira

जब समय के साथ पुरुष का पाप क्षीण हो जाता है, तब हे युधिष्ठिर, उसमें धर्म करने की बुद्धि उत्पन्न होती है।

श्लोक 36 (14.96.36)

जन्मान्तरसहस्रैस्तु मनुष्यत्वं हि दुर्लभम् । तद्गत्वापीह यो धर्मं न करोति स्ववञ्चितः ॥

janmāntarasahasraistu manuṣyatvaṃ hi durlabham | tadgatvāpīha yo dharmaṃ na karoti svavañcitaḥ

हजारों जन्मों के बाद भी मनुष्य-जन्म दुर्लभ है; उसे पाकर भी जो धर्म नहीं करता, वह स्वयं को ठगता है।

श्लोक 37 (14.96.37)

कुत्सिता ये दरिद्राश्च विरूपा व्याधितास्तथा । परद्वेष्याश्च मूर्खाश्च न तैर्धर्मः कृतः पुरा ॥

kutsitā ye daridrāśca virūpā vyādhitāstathā | paradveṣyāśca mūrkhāśca na tairdharmaḥ kṛtaḥ purā

जो निन्दित, दरिद्र, कुरूप, रोगी, दूसरों के द्वेष के पात्र और मूर्ख हैं, उन्होंने पूर्वजन्म में धर्म नहीं किया।

श्लोक 38 (14.96.38)

ये च दीर्घायुषः शूराः पण्डिता भोगिनस्तथा । नीरोगा रूपसंपन्नास्तैर्धर्मः सुकृतः पुरा ॥

ye ca dīrghāyuṣaḥ śūrāḥ paṇḍitā bhoginastathā | nīrogā rūpasaṃpannāstairdharmaḥ sukṛtaḥ purā

जो दीर्घायु, शूर, विद्वान और भोगसम्पन्न हैं, जो निरोग और रूपवान हैं, उन्होंने पूर्वजन्म में धर्म का भली प्रकार पालन किया।

श्लोक 39 (14.96.39)

एवं धर्मः कृतः शुद्धो नयते गतिमुत्तमाम् । अधर्मं सेवते यस्तु तिर्यग्योन्यां पतत्यसौ ॥

evaṃ dharmaḥ kṛtaḥ śuddho nayate gatimuttamām | adharmaṃ sevate yastu tiryagyonyāṃ patatyasau

इस प्रकार शुद्ध भाव से किया हुआ धर्म उत्तम गति तक ले जाता है; किन्तु जो अधर्म का सेवन करता है, वह पशु-पक्षी आदि की योनि में गिरता है।

श्लोक 40 (14.96.40)

इदं रहस्यं कौन्तेय शृणु धर्ममनुत्तमम् । कथयिष्ये परं धर्मं तव भक्तस्य पाण्डव ॥

idaṃ rahasyaṃ kaunteya śṛṇu dharmamanuttamam | kathayiṣye paraṃ dharmaṃ tava bhaktasya pāṇḍava

हे कुन्तीपुत्र, इस रहस्यमय और सर्वोत्तम धर्म को सुनो; हे पाण्डव, मैं अपने भक्त तुम्हें परम धर्म बताऊँगा।

श्लोक 41 (14.96.41)

इष्टस्त्वमसि मेऽत्यर्थं प्रपन्नश्चापि मां सदा । परमार्थमपि ब्रूयां किं पुनर्धर्मसंहिताम् ॥

iṣṭastvamasi me'tyarthaṃ prapannaścāpi māṃ sadā | paramārthamapi brūyāṃ kiṃ punardharmasaṃhitām

तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो और सदा मेरी शरण में रहे हो। मैं तुम्हें परमार्थ का भी उपदेश दे दूँ, फिर धर्म-शास्त्र की तो बात ही क्या।

श्लोक 42 (14.96.42)

इदं मे मानुषं जन्म कृतमात्मनि मायया । धर्मसंस्थापनार्थाय दुष्टानां नाशनाय च ॥

idaṃ me mānuṣaṃ janma kṛtamātmani māyayā | dharmasaṃsthāpanārthāya duṣṭānāṃ nāśanāya ca

मेरा यह मनुष्य-जन्म मैंने अपनी ही माया से स्वयं धारण किया है, धर्म की स्थापना और दुष्टों के नाश के लिए।

श्लोक 43 (14.96.43)

मानुष्यं भावमापन्नं ये मां गृह्णन्त्यवज्ञया । संसारान्तर्हि ते मूढास्तिर्यग्योनिष्वनेकशः ॥

mānuṣyaṃ bhāvamāpannaṃ ye māṃ gṛhṇantyavajñayā | saṃsārāntarhi te mūḍhāstiryagyoniṣvanekaśaḥ

जो मूढ़ मुझे मनुष्य-भाव में आया हुआ समझकर मेरी अवज्ञा करते हैं, वे फिर संसार-चक्रों में अनेक बार पशु-पक्षी आदि योनियों में भटकते हैं।

श्लोक 44 (14.96.44)

ये च मां सर्वभूतस्थं पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषा । मद्भक्तांस्तान्सदा युक्तान्मत्समीपं नयाम्यहम् ॥

ye ca māṃ sarvabhūtasthaṃ paśyanti jñānacakṣuṣā | madbhaktāṃstānsadā yuktānmatsamīpaṃ nayāmyaham

किन्तु जो ज्ञान की दृष्टि से मुझे सब प्राणियों में स्थित देखते हैं, उन सदा युक्त रहने वाले अपने भक्तों को मैं अपने समीप ले आता हूँ।

श्लोक 45 (14.96.45)

मद्भक्ता न विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः । मद्भक्तानां तु मानुष्ये सफलं जन्म पाण्डव ॥

madbhaktā na vinaśyanti madbhaktā vītakalmaṣāḥ | madbhaktānāṃ tu mānuṣye saphalaṃ janma pāṇḍava

मेरे भक्त नष्ट नहीं होते; मेरे भक्त पापरहित होते हैं। हे पाण्डव, मेरे भक्तों का मनुष्य-जन्म सफल होता है।

श्लोक 46 (14.96.46)

अपि पापेष्वभिरता मद्भक्ताः पाण्डुनन्दन । मुच्यन्ते पातकैः सर्वैः पद्मपत्रमिवांभसा ॥

api pāpeṣvabhiratā madbhaktāḥ pāṇḍunandana | mucyante pātakaiḥ sarvaiḥ padmapatramivāṃbhasā

हे पाण्डुपुत्र, पापों में लगे रहने पर भी मेरे भक्त सब पातकों से वैसे ही छूट जाते हैं जैसे कमल का पत्ता जल से।

श्लोक 47 (14.96.47)

जन्मान्तरसहस्रेषु तपसा भावितात्मनाम् । भक्तिरुत्पद्यते तात मनुष्याणां न संशयः ॥

janmāntarasahasreṣu tapasā bhāvitātmanām | bhaktirutpadyate tāta manuṣyāṇāṃ na saṃśayaḥ

हे तात, हजारों जन्मों के बाद तप से शुद्ध हुए अन्तःकरण वाले मनुष्यों में भक्ति उत्पन्न होती है; इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 48 (14.96.48)

यच्च रूपं परं गुह्यं कूटस्थमचलं ध्रुवम् । न दृश्यते तथा देवैर्मद्भक्तैर्दृश्यते यथा ॥

yacca rūpaṃ paraṃ guhyaṃ kūṭasthamacalaṃ dhruvam | na dṛśyate tathā devairmadbhaktairdṛśyate yathā

मेरा जो परम गुह्य रूप है, कूटस्थ, अचल और ध्रुव, उसे देवता भी वैसा नहीं देख पाते जैसा मेरे भक्त देखते हैं।

श्लोक 49 (14.96.49)

अपरं यच्च मे रूपं प्रादुर्भावेषु दृश्यते । तदर्चयन्ति सर्वार्थैः सर्वभूतानि पाण्डव ॥

aparaṃ yacca me rūpaṃ prādurbhāveṣu dṛśyate | tadarcayanti sarvārthaiḥ sarvabhūtāni pāṇḍava

और मेरा जो दूसरा रूप अवतारों में दिखाई देता है, हे पाण्डव, उसकी सब प्राणी सब प्रकार की सामग्रियों से पूजा करते हैं।

श्लोक 50 (14.96.50)

कल्पकोटिसहस्रेषु व्यतीतेष्वागतेषु च । दर्शयामीह तद्रूपं यच्च पश्यन्ति मे सुराः ॥

kalpakoṭisahasreṣu vyatīteṣvāgateṣu ca | darśayāmīha tadrūpaṃ yacca paśyanti me surāḥ

हजारों करोड़ कल्प बीत जाने पर और नया कल्प आने पर मैं यहाँ वह रूप दिखाता हूँ जिसे देवता देखते हैं।

श्लोक 51 (14.96.51)

स्थित्युत्पत्त्यव्ययकरं यो मां ज्ञात्वा प्रपद्यते । अनुगृह्णाम्यहं तं वै संसारान्मोचयामि च ॥

sthityutpattyavyayakaraṃ yo māṃ jñātvā prapadyate | anugṛhṇāmyahaṃ taṃ vai saṃsārānmocayāmi ca

जो मुझे जगत् की स्थिति, उत्पत्ति और लय करने वाला जानकर मेरी शरण लेता है, उस पर मैं अनुग्रह करता हूँ और उसे संसार से मुक्त करता हूँ।

श्लोक 52 (14.96.52)

अहमादिर्हि देवानां सृष्टा ब्रह्मादयो मया । प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य जगत्सर्वं सृजाम्यहम् ॥

ahamādirhi devānāṃ sṛṣṭā brahmādayo mayā | prakṛtiṃ svāmavaṣṭabhya jagatsarvaṃ sṛjāmyaham

मैं देवताओं का आदि हूँ; ब्रह्मा आदि मेरे द्वारा रचे गए हैं। अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर मैं सारे जगत् की सृष्टि करता हूँ।

श्लोक 53 (14.96.53)

तमोमूलोहमव्यक्तो रजोमध्ये प्रतिष्ठितः । ऊर्ध्वं सत्त्वं विना लोभं ब्रह्मादिस्तंबपर्यन्तः ॥

tamomūlohamavyakto rajomadhye pratiṣṭhitaḥ | ūrdhvaṃ sattvaṃ vinā lobhaṃ brahmādistaṃbaparyantaḥ

मैं तमोगुण के मूल में अव्यक्त रूप से स्थित हूँ और रजोगुण के मध्य में प्रतिष्ठित हूँ; ऊपर लोभरहित सत्त्व है, जो ब्रह्मा से लेकर तृण तक फैला है।

श्लोक 54 (14.96.54)

मूर्धानं मे विद्धि दिवं चन्द्रादित्यौ च लोचने । गावोग्निर्ब्राह्मणो वक्त्रं मारुतः श्वसनं च मे ॥

mūrdhānaṃ me viddhi divaṃ candrādityau ca locane | gāvognirbrāhmaṇo vaktraṃ mārutaḥ śvasanaṃ ca me

जानो कि आकाश मेरा मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य मेरी आँखें हैं; गौएँ, अग्नि और ब्राह्मण मेरा मुख हैं, और वायु मेरी श्वास है।

श्लोक 55 (14.96.55)

दिशो मे बाहवश्चाष्टौ नक्षत्राणि च भूषणम् । अन्तरिक्षमुरो विद्धि सर्वभूतावकाशकम् । मार्गो मेघानिलाभ्यां तु यन्ममोदरमव्ययम् ॥

diśo me bāhavaścāṣṭau nakṣatrāṇi ca bhūṣaṇam | antarikṣamuro viddhi sarvabhūtāvakāśakam | mārgo meghānilābhyāṃ tu yanmamodaramavyayam

दिशाएँ मेरी आठ भुजाएँ हैं और नक्षत्र मेरे आभूषण हैं; अन्तरिक्ष को मेरा वक्ष जानो, जो सब प्राणियों को स्थान देता है; और मेघ तथा वायु का मार्ग मेरा अविनाशी उदर है।

श्लोक 56 (14.96.56)

पृथिवीमण्डलं यद्वै द्वीपार्णवनगैर्युतम् । सर्वसंधारणोपेतं पादौ मम युधिष्ठिर ॥

pṛthivīmaṇḍalaṃ yadvai dvīpārṇavanagairyutam | sarvasaṃdhāraṇopetaṃ pādau mama yudhiṣṭhira

द्वीपों, समुद्रों और पर्वतों से युक्त, सबको धारण करने वाला जो पृथ्वीमण्डल है, हे युधिष्ठिर, वही मेरे चरण हैं।

श्लोक 57 (14.96.57)

स्थितो ह्येकगुणः खेऽहं द्विगुणश्चास्मि मारुते । त्रिगुणोग्नौ स्थितोहं वै सलिले च चतुर्गुणः ॥

sthito hyekaguṇaḥ khe'haṃ dviguṇaścāsmi mārute | triguṇognau sthitohaṃ vai salile ca caturguṇaḥ

मैं आकाश में एक गुण से स्थित हूँ, वायु में दो गुणों वाला हूँ, अग्नि में तीन गुणों से स्थित हूँ और जल में चार गुणों वाला हूँ।

श्लोक 58 (14.96.58)

शब्दाद्या ये गुणाः पञ्च महाभूतेषु पञ्चसु । तन्मात्रासंस्थितः सोहं पृथिव्यां पञ्चधास्थितः ॥

śabdādyā ye guṇāḥ pañca mahābhūteṣu pañcasu | tanmātrāsaṃsthitaḥ sohaṃ pṛthivyāṃ pañcadhāsthitaḥ

पाँच महाभूतों में शब्द आदि जो पाँच गुण हैं, उन तन्मात्राओं में स्थित मैं पृथ्वी में पाँच प्रकार से स्थित हूँ।

श्लोक 59 (14.96.59)

अहं सहस्रशीर्षस्तु सहस्रवदनेक्षणः । सहस्रबाहूदरधृक्सहस्रोरुः सहस्रपात् ॥

ahaṃ sahasraśīrṣastu sahasravadanekṣaṇaḥ | sahasrabāhūdaradhṛksahasroruḥ sahasrapāt

मेरे सहस्र सिर, सहस्र मुख और नेत्र, सहस्र भुजाएँ और उदर, सहस्र जंघाएँ और चरण हैं।

श्लोक 60 (14.96.60)

धृत्वोर्वीं सर्वतः सम्यगत्यतिष्ठं दशांगुलम् । सर्वभूतात्मभूतस्थः सर्वव्यापी ततोस्म्यहम् ॥

dhṛtvorvīṃ sarvataḥ samyagatyatiṣṭhaṃ daśāṃgulam | sarvabhūtātmabhūtasthaḥ sarvavyāpī tatosmyaham

सब ओर से पृथ्वी को भली प्रकार धारण करके मैं उससे दस अंगुल ऊपर भी स्थित रहा। सब प्राणियों में आत्मा के रूप में स्थित होने से मैं सर्वव्यापी हूँ।

श्लोक 61 (14.96.61)

अचिन्त्योहमनन्तोहमजरोहमजो ह्यहम् । अनाद्योऽहमवध्योहमप्रमेयोहमव्ययः ॥

acintyohamanantohamajarohamajo hyaham | anādyo'hamavadhyohamaprameyohamavyayaḥ

मैं अचिन्त्य हूँ, अनन्त हूँ, अजर और अजन्मा हूँ; मैं अनादि हूँ, अवध्य हूँ, अप्रमेय और अविनाशी हूँ।

श्लोक 62 (14.96.62)

निर्गुणोहं निगूढात्मा निर्द्वन्द्वो निर्ममो नृप । निष्कलो निर्विकारोहं निदानममृतस्य तु ॥

nirguṇohaṃ nigūḍhātmā nirdvandvo nirmamo nṛpa | niṣkalo nirvikārohaṃ nidānamamṛtasya tu

हे राजन्, मैं निर्गुण हूँ, अपने स्वरूप में छिपा हुआ हूँ, द्वन्द्वों और ममता से रहित हूँ; निष्कल और निर्विकार हूँ, और अमृत का आदि कारण हूँ।

श्लोक 63 (14.96.63)

सुधा चाहं स्वधा चाहं स्वाहा चाहं नराधिप । तेजसा तपसा चाहं भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥

sudhā cāhaṃ svadhā cāhaṃ svāhā cāhaṃ narādhipa | tejasā tapasā cāhaṃ bhūtagrāmaṃ caturvidham

हे नराधिप, मैं सुधा हूँ, मैं स्वधा हूँ और मैं स्वाहा हूँ; तेज और तप के द्वारा मैं चार प्रकार के प्राणिसमूह को (धारण करता हूँ),

श्लोक 64 (14.96.64)

स्नेहपाशैर्गुणैर्बद्ध्वा धारयाम्यात्ममायया । चातुराश्रमधर्मेहं चातुर्होत्रफलाशनः । चतुर्मूर्तिश्चतुर्यज्ञश्चतुराश्रमभावनः ॥

snehapāśairguṇairbaddhvā dhārayāmyātmamāyayā | cāturāśramadharmehaṃ cāturhotraphalāśanaḥ | caturmūrtiścaturyajñaścaturāśramabhāvanaḥ

उन्हें स्नेह के पाशों और गुणों से बाँधकर मैं अपनी माया से धारण करता हूँ। चार आश्रमों के धर्म में मैं चातुर्होत्र यज्ञ के फल का भोक्ता हूँ; मैं चार मूर्तियों वाला, चार यज्ञों वाला और चारों आश्रमों का पोषक हूँ।

श्लोक 65 (14.96.65)

संहृत्याहं जगत्सर्वं कृत्वा वै गर्भमात्मनः । शयामि दिव्ययोगेन प्रलयेषु युधिष्ठिर ॥

saṃhṛtyāhaṃ jagatsarvaṃ kṛtvā vai garbhamātmanaḥ | śayāmi divyayogena pralayeṣu yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर, प्रलयकाल में मैं सारे जगत् का संहार करके उसे अपना ही गर्भ बनाकर दिव्य योग से शयन करता हूँ।

श्लोक 66 (14.96.66)

सहस्रयुगपर्यन्तां ब्राह्मीं रात्रिं महार्णवे । स्थित्वा सृजामि भूतानि जङ्गमानि स्थिराणि च ॥

sahasrayugaparyantāṃ brāhmīṃ rātriṃ mahārṇave | sthitvā sṛjāmi bhūtāni jaṅgamāni sthirāṇi ca

हजार युगों तक चलने वाली ब्रह्मा की रात्रि में महासमुद्र पर रहकर मैं चर और अचर प्राणियों की सृष्टि करता हूँ।

श्लोक 67 (14.96.67)

कल्पे कल्पे च भूतानि संहरामि सृजामि च । न च मां तानि जानन्ति मायया मोहितानि मे ॥

kalpe kalpe ca bhūtāni saṃharāmi sṛjāmi ca | na ca māṃ tāni jānanti māyayā mohitāni me

प्रत्येक कल्प में मैं प्राणियों का संहार करता हूँ और उनकी सृष्टि करता हूँ; मेरी माया से मोहित हुए वे मुझे नहीं जानते।

श्लोक 68 (14.96.68)

मम चैवान्धकारस्य मार्गितव्यस्य नित्यशः । प्रशान्तस्येव दीपस्य गतिर्नैवोपलभ्यते ॥

mama caivāndhakārasya mārgitavyasya nityaśaḥ | praśāntasyeva dīpasya gatirnaivopalabhyate

मैं अन्धकार के समान हूँ और मुझे सदा खोजना पड़ता है; बुझे हुए दीपक की गति के समान मेरी गति भी नहीं पाई जाती।

श्लोक 69 (14.96.69)

न तदस्ति क्वचिद्राजन्यत्राहं न प्रतिष्ठितः । न च तद्विद्यते भूतं मयि यन्न प्रतिष्ठितम् ॥

na tadasti kvacidrājanyatrāhaṃ na pratiṣṭhitaḥ | na ca tadvidyate bhūtaṃ mayi yanna pratiṣṭhitam

हे राजन्, ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ मैं प्रतिष्ठित न होऊँ; और ऐसा कोई प्राणी नहीं जो मुझमें प्रतिष्ठित न हो।

श्लोक 70 (14.96.70)

यावन्मात्रं भवेद्भूतं स्थूलं सूक्ष्ममिदं जगत् । जीवभूतो ह्यहं तस्मिंस्तावन्मात्रं प्रतिष्ठितः ॥

yāvanmātraṃ bhavedbhūtaṃ sthūlaṃ sūkṣmamidaṃ jagat | jīvabhūto hyahaṃ tasmiṃstāvanmātraṃ pratiṣṭhitaḥ

यह स्थूल और सूक्ष्म जगत् जितने परिमाण का प्राणी-रूप है, उसमें जीव-रूप होकर मैं उतने ही परिमाण में प्रतिष्ठित हूँ।

श्लोक 71 (14.96.71)

किंचात्र बहुनोक्तेन सत्यमेतद्ब्रवीमि ते । यद्भूतं यद्भविष्यच्च तत्सर्वमहमेव तु ॥

kiṃcātra bahunoktena satyametadbravīmi te | yadbhūtaṃ yadbhaviṣyacca tatsarvamahameva tu

यहाँ अधिक कहने से क्या? मैं तुमसे यह सत्य कहता हूँ कि जो हो चुका है और जो होगा, वह सब मैं ही हूँ।

श्लोक 72 (14.96.72)

मया सृष्टानि भूतानि मन्मयानि च भारत । मामेव न विजानन्ति मायया मोहितानि वै ॥

mayā sṛṣṭāni bhūtāni manmayāni ca bhārata | māmeva na vijānanti māyayā mohitāni vai

हे भारत, प्राणी मेरे द्वारा रचे गए हैं और मुझसे ही बने हैं; फिर भी मेरी माया से मोहित होकर वे मुझे नहीं जानते।

श्लोक 73 (14.96.73)

एवं सर्वं जगदिदं सदेवासुरमानुषम् । मत्तः प्रभवते राजन्मय्येव प्रविलीयते ॥

evaṃ sarvaṃ jagadidaṃ sadevāsuramānuṣam | mattaḥ prabhavate rājanmayyeva pravilīyate

इस प्रकार देवता, असुर और मनुष्यों सहित यह सारा जगत्, हे राजन्, मुझसे उत्पन्न होता है और मुझमें ही लीन हो जाता है।

अध्याय 95अध्याय-सूचीअध्याय 97