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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 95

नेवला: शाप से मुक्त हुआ क्रोध

जनमेजय पूछते हैं कि सोने के सिर वाला नेवला कौन था। वैशम्पायन बताते हैं कि क्रोध ने नेवले का रूप लेकर जमदग्नि के श्राद्ध के लिए रखे दूध को दूषित किया; ऋषि ने उसे क्षमा किया, पर पितरों के शाप से वह नेवला बन गया। यज्ञ में धर्मस्वरूप युधिष्ठिर की निन्दा करने पर वह शाप से मुक्त हुआ और नेवला अन्तर्धान हो गया।

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जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (14.95.1)

कोसौ नकुलरूपेण शिरसा काञ्चनेन वै । प्राह मानुषवद्वाचमेतत्पृष्टो वदस्व मे ॥

kosau nakularūpeṇa śirasā kāñcanena vai | prāha mānuṣavadvācametatpṛṣṭo vadasva me

सोने के सिर वाले नेवले के रूप में वह कौन था, जिसने मनुष्य की भाषा में बात की? मेरे पूछने पर आप यह बताइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (14.95.2)

एतत्पूर्वं न पृष्टोऽहं न चास्माभिः प्रभाषितम् । श्रूयतां नकुलो योसौ यथा वाक्तस्य मानुषी ॥

etatpūrvaṃ na pṛṣṭo'haṃ na cāsmābhiḥ prabhāṣitam | śrūyatāṃ nakulo yosau yathā vāktasya mānuṣī

यह बात मुझसे पहले नहीं पूछी गई थी, और हमने भी इसे नहीं कहा। सुनिए कि वह नेवला कौन है और उसकी वाणी मनुष्य जैसी कैसे हुई।

श्लोक 3 (14.95.3)

श्राद्धं संकल्पयामास जमदग्निः पुरा किल । होमधेनुस्तमागाच्च स्वयमेव दुदोह ताम् ॥

śrāddhaṃ saṃkalpayāmāsa jamadagniḥ purā kila | homadhenustamāgācca svayameva dudoha tām

कहते हैं, पूर्वकाल में जमदग्नि ने श्राद्ध का संकल्प किया। होमधेनु उनके पास आई और उन्होंने स्वयं उसे दुहा।

श्लोक 4 (14.95.4)

तत्पयः स्थापयामास नवे भाण्डे दृढे शुचौ । क्रोधो नकुलरूपेण पिठरं पर्यकर्षयत् ॥

tatpayaḥ sthāpayāmāsa nave bhāṇḍe dṛḍhe śucau | krodho nakularūpeṇa piṭharaṃ paryakarṣayat

उन्होंने उस दूध को नए, दृढ़ और शुद्ध पात्र में रखा। क्रोध ने नेवले का रूप लेकर उस पात्र को इधर-उधर खींचा।

श्लोक 5 (14.95.5)

जिज्ञासुस्तमृषिश्रेष्ठं किं कुर्याद्विप्रिये कृते । इति सञ्चिन्त्य दुर्मेधा धर्षयामास तत्पयः ॥

jijñāsustamṛṣiśreṣṭhaṃ kiṃ kuryādvipriye kṛte | iti sañcintya durmedhā dharṣayāmāsa tatpayaḥ

उन श्रेष्ठ ऋषि की परीक्षा लेने की इच्छा से, 'अपमान किए जाने पर ये क्या करेंगे?' यह सोचकर उस दुष्टबुद्धि ने उस दूध को दूषित कर दिया।

श्लोक 6 (14.95.6)

तमाज्ञाय मुनिः क्रोधं नैवास्य स चुकोप ह । स तु क्रोधस्ततो राजन्ब्राह्मणीं मूर्तिमास्थितः ॥

tamājñāya muniḥ krodhaṃ naivāsya sa cukopa ha | sa tu krodhastato rājanbrāhmaṇīṃ mūrtimāsthitaḥ

मुनि ने उसे क्रोध जान लिया और उस पर क्रोधित नहीं हुए। तब वह क्रोध, हे राजन्, ब्राह्मण का रूप धारण करके खड़ा हुआ।

क्रोध उवाच

श्लोक 7 (14.95.7)

जितोस्मीति भृगुश्रेष्ठ भृगवो ह्यतिरोषणाः । लोके मिथ्याप्रवादोयं यत्त्वयाऽस्मि विनिर्जितः ॥

jitosmīti bhṛguśreṣṭha bhṛgavo hyatiroṣaṇāḥ | loke mithyāpravādoyaṃ yattvayā'smi vinirjitaḥ

उसने कहा: 'हे भृगुश्रेष्ठ, मैं पराजित हो गया। कहा जाता है कि भृगुवंशी अत्यन्त क्रोधी होते हैं; पर संसार में यह बात झूठी है, क्योंकि आपने मुझे जीत लिया।'

श्लोक 8 (14.95.8)

वशे स्थितोऽहं त्वय्यद्य क्षमावति महात्मनि । बिभेमि तपसः साधो प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥

vaśe sthito'haṃ tvayyadya kṣamāvati mahātmani | bibhemi tapasaḥ sādho prasādaṃ kuru me prabho

'आज मैं आप क्षमाशील महात्मा के वश में हूँ। हे साधु, मैं आपके तप से डरता हूँ; हे प्रभु, मुझ पर कृपा कीजिए।'

जमदग्निरुवाच

श्लोक 9 (14.95.9)

साक्षाद्दृष्टोसि मे क्रोध गच्छ त्वं विगतज्वरः । न त्वयापकृतं मेऽद्य न च मे मन्युरस्ति वै ॥

sākṣāddṛṣṭosi me krodha gaccha tvaṃ vigatajvaraḥ | na tvayāpakṛtaṃ me'dya na ca me manyurasti vai

'क्रोध, मैंने तुम्हें साक्षात् देख लिया। तुम चिन्ता से मुक्त होकर जाओ। आज तुमने मेरा कोई अपकार नहीं किया, और मुझे कोई क्रोध भी नहीं है।'

श्लोक 10 (14.95.10)

यान्समुद्दिश्य संकल्पः पयसोस्य कृतो मया । पितरस्ते महाभागास्तेभ्यो बुद्ध्यस्व गम्यताम् ॥

yānsamuddiśya saṃkalpaḥ payasosya kṛto mayā | pitaraste mahābhāgāstebhyo buddhyasva gamyatām

'इस दूध के लिए मैंने जिनके उद्देश्य से संकल्प किया था, वे महाभाग पितर तुम्हारे ही पूर्वज हैं। उनसे सावधान हो जाओ और जाओ।'

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (14.95.11)

इत्युक्तो जातसंत्रासस्तत्रैवान्तरधीयत । पितॄणामभिषङ्गाच्च नकुलत्वमुपागतः ॥

ityukto jātasaṃtrāsastatraivāntaradhīyata | pitṝṇāmabhiṣaṅgācca nakulatvamupāgataḥ

ऐसा कहे जाने पर वह भयभीत हो गया और वहीं अन्तर्धान हो गया; और पितरों के शाप से नेवले की योनि को प्राप्त हुआ।

श्लोक 12 (14.95.12)

स तान्प्रसादयामास शापस्यान्तो भवेदिति । तैश्चाप्युक्तः क्षिपन्धर्मं शापस्यान्तमवाप्स्यति ॥

sa tānprasādayāmāsa śāpasyānto bhavediti | taiścāpyuktaḥ kṣipandharmaṃ śāpasyāntamavāpsyati

उसने उन्हें प्रसन्न किया कि शाप का अन्त हो; और उन्होंने भी कहा कि धर्म की निन्दा करने से वह शाप का अन्त पाएगा।

श्लोक 13 (14.95.13)

तैश्चोक्तो यज्ञियान्देशान्धर्मारण्यं तथैव च । जुगुप्समानो धावन्स तं यज्ञं समुपासदत् ॥

taiścokto yajñiyāndeśāndharmāraṇyaṃ tathaiva ca | jugupsamāno dhāvansa taṃ yajñaṃ samupāsadat

उनके ऐसा कहने पर वह यज्ञ योग्य स्थानों और धर्मारण्य से घृणा करता हुआ भागता फिरा और उस यज्ञ के पास पहुँचा।

श्लोक 14 (14.95.14)

धर्मपुत्रमथाक्षिप्य सक्तुप्रस्थेन तेन सः । मुक्तः शापात्ततः क्रोधो धर्मो ह्यासीद्युधिष्ठिरः ॥

dharmaputramathākṣipya saktuprasthena tena saḥ | muktaḥ śāpāttataḥ krodho dharmo hyāsīdyudhiṣṭhiraḥ

एक प्रस्थ सत्तू के प्रसंग में धर्मपुत्र की निन्दा करके वह शाप से मुक्त हो गया; और वह क्रोध ही धर्म हुआ, जो युधिष्ठिर थे।

श्लोक 15 (14.95.15)

एवमेतत्तदा वृत्तं यज्ञे तस्य महात्मनः । पश्यतां चापि नस्तत्र नकुलोऽन्तर्हितस्तदा ॥

evametattadā vṛttaṃ yajñe tasya mahātmanaḥ | paśyatāṃ cāpi nastatra nakulo'ntarhitastadā

इस प्रकार उस महात्मा के यज्ञ में तब यह घटना घटी; और हम सबके देखते-देखते वहाँ वह नेवला अन्तर्धान हो गया।

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