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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 94

अगस्त्य का यज्ञ और वर्षा

जनमेजय पूछते हैं कि सब यज्ञों के विषय में परम निश्चय कैसे प्राप्त हो, और वैशम्पायन अगस्त्य के बारह वर्ष के यज्ञ की कथा सुनाते हैं। इन्द्र के वर्षा न करने पर अगस्त्य ने कहा कि वे चिन्ता, स्पर्श, परिश्रम और बीज से यज्ञ पूरा करेंगे, या स्वयं इन्द्र बन जाएँगे। उनकी शक्ति देखकर विस्मित मुनियों ने कहा कि वे केवल न्यायपूर्ण, अहिंसक मार्ग चाहते हैं। तब इन्द्र ने वर्षा की और यज्ञ पूर्ण हुआ।

अध्याय 93अध्याय-सूचीअध्याय 95

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (14.94.1)

धर्मागतेन त्यागेन भगवन्सर्वमस्ति चेत् । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व कुशलो ह्यसि भाषितुम् ॥

dharmāgatena tyāgena bhagavansarvamasti cet | etanme sarvamācakṣva kuśalo hyasi bhāṣitum

भगवन्, यदि धर्म से प्राप्त वस्तु के दान से सब कुछ सिद्ध हो जाता है, तो यह सब मुझे बताइए; आप कहने में निपुण हैं।

श्लोक 2 (14.94.2)

तस्योञ्छवृत्तेर्यद्वृत्तं सक्तुदाने फलं महत् । कथितं तु मम ब्रह्मंस्तथ्यमेतदसंशयम् ॥

tasyoñchavṛtteryadvṛttaṃ saktudāne phalaṃ mahat | kathitaṃ tu mama brahmaṃstathyametadasaṃśayam

ब्रह्मन्, उस उञ्छवृत्ति वाले ब्राह्मण के सत्तू-दान से जो महान् फल हुआ, वह आपने मुझे बताया; और वह निःसंदेह सत्य है।

श्लोक 3 (14.94.3)

कथं हि सर्वयज्ञेषु निश्चयः परमो भवेत् । एतदर्हसि मे वक्तुं निखिलेन द्विजर्षभ ॥

kathaṃ hi sarvayajñeṣu niścayaḥ paramo bhavet | etadarhasi me vaktuṃ nikhilena dvijarṣabha

सब यज्ञों के विषय में परम निश्चय कैसे प्राप्त हो? हे द्विजश्रेष्ठ, यह मुझे पूरी तरह समझाइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (14.94.4)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अगस्त्यस्य महायज्ञे पुरावृत्तमरिंदम ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | agastyasya mahāyajñe purāvṛttamariṃdama

हे शत्रुदमन, इसी विषय में लोग यह प्राचीन इतिहास भी सुनाते हैं, जो अगस्त्य के महायज्ञ में पूर्वकाल में घटित हुआ था।

श्लोक 5 (14.94.5)

पुराऽगस्त्यो महातेजा दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् । प्रविवेश महाराज सर्वभूतहिते रतः ॥

purā'gastyo mahātejā dīkṣāṃ dvādaśavārṣikīm | praviveśa mahārāja sarvabhūtahite rataḥ

हे महाराज, पूर्वकाल में महातेजस्वी अगस्त्य ने, जो सब प्राणियों के हित में लगे रहते थे, बारह वर्ष की दीक्षा में प्रवेश किया।

श्लोक 6 (14.94.6)

तत्राग्निकल्पा होतार आसन्सत्रे महात्मनः । मूलाहाराः फलाहाराश्चाश्मकुट्टा मरीचिपाः ॥

tatrāgnikalpā hotāra āsansatre mahātmanaḥ | mūlāhārāḥ phalāhārāścāśmakuṭṭā marīcipāḥ

उस महात्मा के सत्र में होता (ऋत्विज) अग्नि के समान तेजस्वी थे: कुछ कन्द-मूल खाने वाले, कुछ फल खाने वाले, कुछ पत्थर से कूटकर खाने वाले और कुछ किरणों का पान करने वाले थे।

श्लोक 7 (14.94.7)

परिपृष्टिका वैघसिकाः प्रसङ्ख्यानास्तथैव च । यतयो भिक्षवश्चात्र बभूवुः पर्यवस्थिताः ॥

paripṛṣṭikā vaighasikāḥ prasaṅkhyānāstathaiva ca | yatayo bhikṣavaścātra babhūvuḥ paryavasthitāḥ

परिपृष्टिक, वैघसिक और प्रसंख्यान, तथा यति और भिक्षु भी वहाँ उपस्थित होकर खड़े थे।

श्लोक 8 (14.94.8)

सर्वे प्रत्यक्षधर्माणो जितक्रोधा जितेन्द्रियाः । दमे स्थिताश्च सर्वे ते हिंसादंभविवर्जिताः ॥

sarve pratyakṣadharmāṇo jitakrodhā jitendriyāḥ | dame sthitāśca sarve te hiṃsādaṃbhavivarjitāḥ

वे सब धर्म को प्रत्यक्ष जानने वाले, क्रोध को जीतने वाले और जितेन्द्रिय थे; सब संयम में स्थित थे और हिंसा तथा दम्भ से रहित थे।

श्लोक 9 (14.94.9)

वृत्ते शुद्धे स्थिता नित्यमिन्द्रियैश्चाप्यबाधिताः । उपातिष्ठन्त तं यज्ञं यजन्तस्ते महर्षयः ॥

vṛtte śuddhe sthitā nityamindriyaiścāpyabādhitāḥ | upātiṣṭhanta taṃ yajñaṃ yajantaste maharṣayaḥ

वे महर्षि सदा शुद्ध आचरण में स्थित रहते थे और इन्द्रियों से कभी बाधित नहीं होते थे; वे उस यज्ञ को करते हुए उसकी सेवा में उपस्थित रहे।

श्लोक 10 (14.94.10)

यथाशक्त्या भगवता तदन्नं समुपार्जितम् । तस्मिन्सत्रे तु यद्वृत्तं यद्योग्यं च तदाऽभवत् ॥

yathāśaktyā bhagavatā tadannaṃ samupārjitam | tasminsatre tu yadvṛttaṃ yadyogyaṃ ca tadā'bhavat

पूज्य अगस्त्य ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न एकत्र किया; और उस सत्र में जो कुछ आवश्यक और उचित था, वह सब वहाँ उपलब्ध हुआ।

श्लोक 11 (14.94.11)

तथा ह्यनेकैर्मुनिभिर्महान्तः क्रतवः कृताः । एवंविधे त्वगस्त्यस्य वर्तमाने तथाऽध्वरे । न ववर्ष सहस्राक्षस्तदा भरतसत्तम ॥

tathā hyanekairmunibhirmahāntaḥ kratavaḥ kṛtāḥ | evaṃvidhe tvagastyasya vartamāne tathā'dhvare | na vavarṣa sahasrākṣastadā bharatasattama

अनेक मुनियों ने पहले भी बड़े-बड़े यज्ञ किए थे; किन्तु अगस्त्य का ऐसा यज्ञ चलते समय सहस्रनेत्र इन्द्र ने वर्षा नहीं की, हे भरतश्रेष्ठ।

श्लोक 12 (14.94.12)

ततः कर्मान्तरे राजन्नगस्त्यस्य महात्मनः । कथेयमभिनिर्वृत्ता मुनीनां भावितात्मनाम् ॥

tataḥ karmāntare rājannagastyasya mahātmanaḥ | katheyamabhinirvṛttā munīnāṃ bhāvitātmanām

हे राजन्, तब महात्मा अगस्त्य के कर्मों के बीच के अवकाश में शुद्ध अन्तःकरण वाले मुनियों में यह चर्चा उठी।

मुनय ऊचुः

श्लोक 13 (14.94.13)

अगस्त्यो यजमानोसौ ददात्यन्नं विमत्सरः । न च वर्षति पर्जन्यः कथमन्नं भविष्यति ॥

agastyo yajamānosau dadātyannaṃ vimatsaraḥ | na ca varṣati parjanyaḥ kathamannaṃ bhaviṣyati

ये अगस्त्य यज्ञ करते हुए बिना ईर्ष्या के अन्न दे रहे हैं; परन्तु पर्जन्य वर्षा नहीं करता। फिर अन्न कैसे होगा?

श्लोक 14 (14.94.14)

सत्रं चेदं महद्विप्रा मुनेर्द्वादशवार्षिकम् । न वर्षिष्यति देवश्च वर्षाण्येतानि द्वादश ॥

satraṃ cedaṃ mahadviprā munerdvādaśavārṣikam | na varṣiṣyati devaśca varṣāṇyetāni dvādaśa

हे विप्रो, मुनि का यह महान् सत्र बारह वर्ष का है, और देवता इन बारह वर्षों तक वर्षा नहीं करेगा।

श्लोक 15 (14.94.15)

एतद्भवन्तः संचिन्त्य महर्षेरस्य धीमतः । अगस्त्यस्यातितपसः कर्तुमर्हन्त्यनुग्रहम् ॥

etadbhavantaḥ saṃcintya maharṣerasya dhīmataḥ | agastyasyātitapasaḥ kartumarhantyanugraham

आप सब इस पर विचार करके इन बुद्धिमान, महान् तपस्वी महर्षि अगस्त्य पर कृपा करें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (14.94.16)

इत्येवमुक्ते वचने ततोऽगस्त्यः प्रतापवान् । प्रोवाच वाक्यं स तदा प्रसाद्य शिरसा मुनीन् ॥

ityevamukte vacane tato'gastyaḥ pratāpavān | provāca vākyaṃ sa tadā prasādya śirasā munīn

यह कहे जाने पर प्रतापी अगस्त्य ने उन मुनियों को सिर झुकाकर प्रसन्न किया और उनसे कहा।

अगस्त्य उवाच

श्लोक 17 (14.94.17)

यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः । चिन्तायज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः ॥

yadi dvādaśavarṣāṇi na varṣiṣyati vāsavaḥ | cintāyajñaṃ kariṣyāmi vidhireṣa sanātanaḥ

यदि इन्द्र बारह वर्ष वर्षा नहीं करेगा, तो मैं चिन्तायज्ञ करूँगा; यह सनातन विधि है।

श्लोक 18 (14.94.18)

यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः । स्पर्शयज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः ॥

yadi dvādaśavarṣāṇi na varṣiṣyati vāsavaḥ | sparśayajñaṃ kariṣyāmi vidhireṣa sanātanaḥ

यदि इन्द्र बारह वर्ष वर्षा नहीं करेगा, तो मैं स्पर्शयज्ञ करूँगा; यह सनातन विधि है।

श्लोक 19 (14.94.19)

यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः । व्यायामेनाहरिष्यामि यज्ञानेतान्यतव्रतः ॥

yadi dvādaśavarṣāṇi na varṣiṣyati vāsavaḥ | vyāyāmenāhariṣyāmi yajñānetānyatavrataḥ

यदि इन्द्र बारह वर्ष वर्षा नहीं करेगा, तो मैं व्रतों को संयम में रखकर परिश्रम से इन यज्ञों को सम्पन्न करूँगा।

श्लोक 20 (14.94.20)

बीजयज्ञो मयाऽयं वै बहुवर्षसमाचितः । बीजैर्हितं करिष्यामि नात्र विघ्नो भविष्यति ॥

bījayajño mayā'yaṃ vai bahuvarṣasamācitaḥ | bījairhitaṃ kariṣyāmi nātra vighno bhaviṣyati

बहुत वर्षों में सँजोया हुआ यह मेरा बीजयज्ञ है; मैं बीजों से ही हितकर कार्य सिद्ध करूँगा, इसमें कोई विघ्न नहीं होगा।

श्लोक 21 (14.94.21)

नेदं शक्यं वृथा कर्तुं मम सत्रं कथञ्चन । वर्षिष्यतीह वा देवो न वा वर्षं भविष्यति ॥

nedaṃ śakyaṃ vṛthā kartuṃ mama satraṃ kathañcana | varṣiṣyatīha vā devo na vā varṣaṃ bhaviṣyati

मेरा यह सत्र किसी भी प्रकार व्यर्थ नहीं किया जा सकता। या तो देवता यहाँ वर्षा करेगा, या फिर वर्षा नहीं होगी।

श्लोक 22 (14.94.22)

अथवाऽभ्यर्थनामिन्द्रो न करिष्यति कामतः । स्वयमिन्द्रो भविष्यामि जीवयिष्यामि च प्रजाः ॥

athavā'bhyarthanāmindro na kariṣyati kāmataḥ | svayamindro bhaviṣyāmi jīvayiṣyāmi ca prajāḥ

अथवा यदि इन्द्र अपनी इच्छा से मेरी प्रार्थना पूरी नहीं करेगा, तो मैं स्वयं इन्द्र बन जाऊँगा और प्रजा को जीवित रखूँगा।

श्लोक 23 (14.94.23)

यो यदाहारजातश्च स तथैव भविष्यति । विशेषं चैव कर्तास्मि पुनः पुनरतीव हि ॥

yo yadāhārajātaśca sa tathaiva bhaviṣyati | viśeṣaṃ caiva kartāsmi punaḥ punaratīva hi

जो प्राणी जिस आहार से उत्पन्न हुआ है, वह वैसा ही बना रहेगा; और मैं बार-बार उसमें अत्यन्त विशेषता भी उत्पन्न करूँगा।

श्लोक 24 (14.94.24)

अद्येह स्वर्णमभ्येतु यच्चान्यद्वसु दुर्लभम् । त्रिषु लोकेषु यच्चास्ति तदिहागम्यतां स्वयम् ॥

adyeha svarṇamabhyetu yaccānyadvasu durlabham | triṣu lokeṣu yaccāsti tadihāgamyatāṃ svayam

आज यहाँ स्वर्ण आ जाए, और तीनों लोकों में जो कोई दुर्लभ धन है, वह भी अपने आप यहाँ आ जाए।

श्लोक 25 (14.94.25)

दिव्याश्चाप्सरसां सङ्घा गन्धर्वाश्च सकिन्नराः । विश्वावसुश्च ये चान्ये तेऽप्युपासन्तु मे मखम् ॥

divyāścāpsarasāṃ saṅghā gandharvāśca sakinnarāḥ | viśvāvasuśca ye cānye te'pyupāsantu me makham

दिव्य अप्सराओं के समूह, किन्नरों सहित गन्धर्व, विश्वावसु तथा और भी जो हैं, वे सब मेरे यज्ञ की सेवा में उपस्थित हों।

श्लोक 26 (14.94.26)

उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्च यत्किंचिद्वसु विद्यते । सर्वं तदिह यज्ञेषु स्वयमेवोपतिष्ठतु ॥

uttarebhyaḥ kurubhyaśca yatkiṃcidvasu vidyate | sarvaṃ tadiha yajñeṣu svayamevopatiṣṭhatu

उत्तर कुरुओं से जो कुछ धन विद्यमान है, वह सब मेरे यज्ञों में अपने आप उपस्थित हो जाए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (14.94.27)

स्वर्गः स्वर्गसदश्चैव धर्मश्च स्वयमेव तु । इत्युक्ते सर्वमेवैतदभवत्तपसा मुनेः । तस्य दीप्ताग्निमहसस्त्वगस्त्यस्यातितेजसः ॥

svargaḥ svargasadaścaiva dharmaśca svayameva tu | ityukte sarvamevaitadabhavattapasā muneḥ | tasya dīptāgnimahasastvagastyasyātitejasaḥ

स्वर्ग, स्वर्ग में रहने वाले और स्वयं धर्म भी अपने आप आ जाएँ। ऐसा कहते ही मुनि के तप के प्रभाव से यह सब हो गया; वे अगस्त्य प्रज्वलित अग्नि के समान तेज वाले और अत्यन्त तेजस्वी थे।

श्लोक 28 (14.94.28)

ततस्ते मुनयो हृष्टा ददृशुस्तपसो बलम् । विस्मिता वचनं प्राहुरिदं सर्वे महार्थवत् ॥

tataste munayo hṛṣṭā dadṛśustapaso balam | vismitā vacanaṃ prāhuridaṃ sarve mahārthavat

तब उन मुनियों ने हर्षित होकर उसके तप का बल देखा, और आश्चर्यचकित होकर सबने ये अर्थपूर्ण वचन कहे।

मुनय ऊचुः

श्लोक 29 (14.94.29)

प्रीताः स्म तव वाक्येन न त्विच्छामस्तपोवनम् । तैरेव यज्ञैस्तुष्टाः स्मो न्यायेनेच्छामहे वयम् ॥

prītāḥ sma tava vākyena na tvicchāmastapovanam | taireva yajñaistuṣṭāḥ smo nyāyenecchāmahe vayam

आपके वचन से हम प्रसन्न हैं, परन्तु हम तपोवन की कामना नहीं करते। हम उन्हीं यज्ञों से सन्तुष्ट हैं और न्याय के मार्ग से ही चलना चाहते हैं।

श्लोक 30 (14.94.30)

यज्ञं दीक्षां तथा होमान्यच्चान्यन्मृगयामहे । तयोस्संधर्षितैर्यज्ञैर्नान्यतो मृगयामहे ॥

yajñaṃ dīkṣāṃ tathā homānyaccānyanmṛgayāmahe | tayossaṃdharṣitairyajñairnānyato mṛgayāmahe

यज्ञ, दीक्षा, होम और जो कुछ और हम चाहते हैं, उसे उन दोनों के द्वारा सम्पन्न यज्ञों से ही हम खोजते हैं, अन्यत्र कहीं नहीं।

श्लोक 31 (14.94.31)

न्यायेनोपार्जिताहाराः स्वकर्माभिरता वयम् । वेदांश्च ब्रह्मचर्येण न्यायतः प्रार्थयामहे ॥

nyāyenopārjitāhārāḥ svakarmābhiratā vayam | vedāṃśca brahmacaryeṇa nyāyataḥ prārthayāmahe

हमने न्यायपूर्वक अपना आहार कमाया है और हम अपने कर्मों में रत हैं; ब्रह्मचर्य के द्वारा हम वेदों की भी न्यायपूर्वक प्रार्थना करते हैं।

श्लोक 32 (14.94.32)

न्यायेनोत्तरकालं च गृहेभ्यो निःसृता वयम् । धर्मदृष्टैर्विधिद्वारैस्तपस्तप्स्यामहे वयम् ॥

nyāyenottarakālaṃ ca gṛhebhyo niḥsṛtā vayam | dharmadṛṣṭairvidhidvāraistapastapsyāmahe vayam

समय आने पर हम न्यायपूर्वक घरों से निकले हैं; धर्म द्वारा देखे गए विधि-मार्गों से हम तप करेंगे।

श्लोक 33 (14.94.33)

भवतः सम्यगिष्टा तु बुद्धिर्हिंसाविवर्जिता । एतामहिंसां यज्ञेषु ब्रूयास्त्वं सततं प्रभो ॥

bhavataḥ samyagiṣṭā tu buddhirhiṃsāvivarjitā | etāmahiṃsāṃ yajñeṣu brūyāstvaṃ satataṃ prabho

आपकी यह हिंसा से रहित बुद्धि हमें भली प्रकार प्रिय है। हे प्रभु, आप यज्ञों में इसी अहिंसा का सदा उपदेश करें।

श्लोक 34 (14.94.34)

प्रीतास्ततो भविष्यामो वयं तु द्विजसत्तम । विसर्जिताः समाप्तौ च सत्रादस्माद्व्रजामहे ॥

prītāstato bhaviṣyāmo vayaṃ tu dvijasattama | visarjitāḥ samāptau ca satrādasmādvrajāmahe

हे द्विजश्रेष्ठ, तब हम प्रसन्न होंगे; और समाप्ति पर विदा किए जाने पर हम इस सत्र से चले जाएँगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (14.94.35)

तथा कथयतां तेषां देवराजः पुरंदरः । ववर्ष सुमहातेजा दृष्ट्वा तस्य तपोबलम् ॥

tathā kathayatāṃ teṣāṃ devarājaḥ puraṃdaraḥ | vavarṣa sumahātejā dṛṣṭvā tasya tapobalam

वे ऐसा कह ही रहे थे कि महातेजस्वी देवराज पुरन्दर ने उसके तप का बल देखकर वर्षा कर दी।

श्लोक 36 (14.94.36)

आसमाप्तेश्च यज्ञस्य तस्यामितपराक्रमः । निकामवर्षी पर्जन्यो बभूव जनमेजय ॥

āsamāpteśca yajñasya tasyāmitaparākramaḥ | nikāmavarṣī parjanyo babhūva janamejaya

हे जनमेजय, यज्ञ की समाप्ति तक अपार पराक्रम वाले पर्जन्य ने इच्छानुसार वर्षा की।

श्लोक 37 (14.94.37)

प्रसादयामास च तमगस्त्यं त्रिदशेश्वरः । स्वयमभ्येत्य राजर्षे पुरस्कृत्य बृहस्पतिम् ॥

prasādayāmāsa ca tamagastyaṃ tridaśeśvaraḥ | svayamabhyetya rājarṣe puraskṛtya bṛhaspatim

हे राजर्षि, देवताओं के स्वामी इन्द्र बृहस्पति को आगे करके स्वयं आए और उन अगस्त्य को प्रसन्न किया।

श्लोक 38 (14.94.38)

ततो यज्ञसमाप्तौ तान्विससर्ज महामुनीन् । अगस्त्यः परमप्रीतः पूजयित्वा यथाविधि ॥

tato yajñasamāptau tānvisasarja mahāmunīn | agastyaḥ paramaprītaḥ pūjayitvā yathāvidhi

तब यज्ञ पूर्ण होने पर अगस्त्य ने अत्यन्त प्रसन्न होकर विधिपूर्वक उन महामुनियों का सम्मान किया और उन्हें विदा किया।

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