आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 93
इन्द्र का यज्ञ और ऋषियों का विवाद
जनमेजय पूछते हैं कि यज्ञ को सर्वोच्च फल देने वाला मानने पर भी नेवले ने युधिष्ठिर के यज्ञ की निन्दा क्यों की। वैशम्पायन इन्द्र के यज्ञ की कथा सुनाते हैं, जिसमें ऋषियों ने पशु-वध पर आपत्ति की और राजा वसु के असत्य निर्णय देने पर वह रसातल में चला गया। वे सिखाते हैं कि अन्याय से कमाए धन का दान निष्फल है, जबकि न्याय से कमाए थोड़े दान भी स्वर्ग देते हैं, जैसे विश्वामित्र आदि राजाओं को मिले।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (14.93.1)
यज्ञे सक्ता नृपतयस्तपःसक्ता महर्षयः । शान्तिव्यवस्थिता विप्राः शमो दम इति प्रभो ॥
yajñe saktā nṛpatayastapaḥsaktā maharṣayaḥ | śāntivyavasthitā viprāḥ śamo dama iti prabho
"प्रभो, राजा लोग यज्ञ में लगे रहते हैं, महर्षि तप में, और ब्राह्मण शान्ति पर दृढ़ रहकर 'शम और दम' की बात कहते हैं।"
श्लोक 2 (14.93.2)
तस्माद्यज्ञफलैस्तुल्यं न किञ्चिदिह दृश्यते । इति मे वर्तते बुद्धिस्तथा चैतदसंशयम् ॥
tasmādyajñaphalaistulyaṃ na kiñcidiha dṛśyate | iti me vartate buddhistathā caitadasaṃśayam
"इसलिए इस लोक में यज्ञ के फलों के समान कुछ भी दिखाई नहीं देता। यही मेरी बुद्धि का निश्चय है, और इसमें कोई संदेह नहीं।"
श्लोक 3 (14.93.3)
यज्ञैरिष्ट्वा तु बहवो राजानो द्विजसत्तमाः । इह कीर्तिं परां प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमितो गताः ॥
yajñairiṣṭvā tu bahavo rājāno dvijasattamāḥ | iha kīrtiṃ parāṃ prāpya pretya svargamito gatāḥ
"हे द्विजश्रेष्ठ, बहुत-से राजा यज्ञ करके इस लोक में परम कीर्ति पाकर यहाँ से मरने के बाद स्वर्ग गए हैं।"
श्लोक 4 (14.93.4)
देवराजः सहस्राक्षः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । देवराज्यं महातेजाः प्राप्तवानखिलं विभुः ॥
devarājaḥ sahasrākṣaḥ kratubhirbhūridakṣiṇaiḥ | devarājyaṃ mahātejāḥ prāptavānakhilaṃ vibhuḥ
"देवराज सहस्राक्ष इन्द्र ने, जो महातेजस्वी और सर्वसमर्थ हैं, भारी दक्षिणा वाले यज्ञों से देवताओं का सम्पूर्ण राज्य प्राप्त किया।"
श्लोक 5 (14.93.5)
अतो युधिष्ठिरो राजा भीमार्जुनपुरःसरः । सदृशो देवराजेन समृद्ध्या विक्रमेण च ॥
ato yudhiṣṭhiro rājā bhīmārjunapuraḥsaraḥ | sadṛśo devarājena samṛddhyā vikrameṇa ca
"और इसी प्रकार भीम और अर्जुन को आगे रखने वाले राजा युधिष्ठिर समृद्धि और पराक्रम में देवराज के समान हैं।"
श्लोक 6 (14.93.6)
अथ कस्मात्स नकुलो गर्हयामास तं क्रतुम् । अश्वमेधं महायज्ञं राज्ञस्तस्य महात्मनः ॥
atha kasmātsa nakulo garhayāmāsa taṃ kratum | aśvamedhaṃ mahāyajñaṃ rājñastasya mahātmanaḥ
"तब फिर उस नेवले ने उस महात्मा राजा के उस यज्ञ की, उस महान अश्वमेध की, निन्दा क्यों की?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (14.93.7)
यज्ञस्य विधिमग्र्यं वै फलं चापि नराधिप । गदतः शृणु मे राजन्यथावदिह भारत ॥
yajñasya vidhimagryaṃ vai phalaṃ cāpi narādhipa | gadataḥ śṛṇu me rājanyathāvadiha bhārata
हे राजन्, हे भारत, यज्ञ की श्रेष्ठ विधि और उसका फल, जैसा वह है वैसा, मैं बताता हूँ; सुनिए।
श्लोक 8 (14.93.8)
पुरा शक्रस्य यजतः सर्व ऊचुर्महर्षयः । ऋत्विक्षु कर्मव्यग्रेषु वितते यज्ञकर्मणि ॥
purā śakrasya yajataḥ sarva ūcurmaharṣayaḥ | ṛtvikṣu karmavyagreṣu vitate yajñakarmaṇi
बहुत पहले जब इन्द्र यज्ञ कर रहे थे और ऋत्विज अपने कर्मों में लगे थे तथा यज्ञ-कर्म विस्तार से चल रहा था, तब सब महर्षियों ने कहा।
श्लोक 9 (14.93.9)
हूयमाने तथा वह्नौ होत्रे गुणसमन्विते । देवेष्वाहूयमानेषु स्थितेषु परमर्षिषु ॥
hūyamāne tathā vahnau hotre guṇasamanvite | deveṣvāhūyamāneṣu sthiteṣu paramarṣiṣu
अग्नि में आहुतियाँ दी जा रही थीं, यज्ञ सब गुणों से सम्पन्न था, देवताओं का आवाहन हो रहा था और परम ऋषि वहाँ खड़े थे,
श्लोक 10 (14.93.10)
सुप्रतीतैस्तथा विप्रैः स्वागमैः सुस्वरैर्नृप । अश्रान्तैश्चापि लघुभिरध्वर्युवृषभैस्तथा ॥
supratītaistathā vipraiḥ svāgamaiḥ susvarairnṛpa | aśrāntaiścāpi laghubhiradhvaryuvṛṣabhaistathā
ब्राह्मण-ऋत्विज प्रसन्न थे, उनके वेद-पाठ सुव्यवस्थित और मधुर स्वर वाले थे, और अध्वर्युओं में श्रेष्ठ ऋत्विज अथक और फुर्तीले थे।
श्लोक 11 (14.93.11)
आलम्भसमये तस्मिन्गृहीतेषु पशुष्वथ । महर्षयो महाराज बभूवुः कृपयाऽन्विताः ॥
ālambhasamaye tasmingṛhīteṣu paśuṣvatha | maharṣayo mahārāja babhūvuḥ kṛpayā'nvitāḥ
हे महाराज, बलि के समय जब पशु पकड़े जा चुके थे, तब महर्षि दया से भर उठे।
श्लोक 12 (14.93.12)
ततो दीनान्पशून्दृष्ट्वा ऋषयस्ते तपोधनाः । ऊचुः शक्रं समागम्य नायं यज्ञविधिः शुभः ॥
tato dīnānpaśūndṛṣṭvā ṛṣayaste tapodhanāḥ | ūcuḥ śakraṃ samāgamya nāyaṃ yajñavidhiḥ śubhaḥ
उन दीन पशुओं को देखकर तपोधन ऋषि इन्द्र के पास गए और बोले, "यह यज्ञ की शुभ विधि नहीं है।"
ऋषय ऊचुः
श्लोक 13 (14.93.13)
अपरिज्ञानमेतत्ते महान्तं धर्ममिच्छतः । सन्ति यज्ञे बहुगुणा विधिदृष्टाः पुरंदर ॥
aparijñānametatte mahāntaṃ dharmamicchataḥ | santi yajñe bahuguṇā vidhidṛṣṭāḥ puraṃdara
"आप महान धर्म चाहते हैं, पर यह आपकी अनभिज्ञता है। हे पुरन्दर, यज्ञ में विधि से बताए हुए बहुत-से गुण हैं।"
श्लोक 14 (14.93.14)
धर्मोपघातकस्त्वेष समारंभस्तव प्रभो । नायं धर्मकृतो यज्ञो न हिंसा धर्म उच्यते ॥
dharmopaghātakastveṣa samāraṃbhastava prabho | nāyaṃ dharmakṛto yajño na hiṃsā dharma ucyate
"प्रभो, आपका यह आयोजन धर्म का घात करने वाला है। यह धर्मपूर्वक किया गया यज्ञ नहीं है, और हिंसा को धर्म नहीं कहा जाता।"
श्लोक 15 (14.93.15)
आगमेनैव ते यज्ञं कुर्वन्तु यदि चेच्छसि । विधिदृष्टेन यज्ञेन धर्मस्ते सुमहान्भवेत् ॥
āgamenaiva te yajñaṃ kurvantu yadi cecchasi | vidhidṛṣṭena yajñena dharmaste sumahānbhavet
"यदि आप चाहें तो शास्त्र के अनुसार ही आपका यज्ञ किया जाए। विधि में बताए यज्ञ से आपको महान धर्म प्राप्त होगा।"
श्लोक 16 (14.93.16)
यज बीजैः सहस्राक्ष त्रिवर्षपरमोषितैः । एष धर्मो महाञ्शक्र चिन्त्यमानोऽधिगम्यते ॥
yaja bījaiḥ sahasrākṣa trivarṣaparamoṣitaiḥ | eṣa dharmo mahāñśakra cintyamāno'dhigamyate
"हे सहस्राक्ष, तीन वर्ष पुराने बीजों से यज्ञ कीजिए। हे शक्र, यही महान धर्म है, जो विचार करने पर समझ में आता है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (14.93.17)
शतक्रतुस्तु तद्वाक्यमृषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः । उक्तं न प्रतिजग्राह मानमोहवशं गतः ॥
śatakratustu tadvākyamṛṣibhistattvadarśibhiḥ | uktaṃ na pratijagrāha mānamohavaśaṃ gataḥ
परन्तु शतक्रतु ने मान और मोह के वश में आकर तत्त्वदर्शी ऋषियों के कहे उन वचनों को स्वीकार नहीं किया।
श्लोक 18 (14.93.18)
तेषां विवादः सुमहाञ्शक्रयज्ञे तपस्विनाम् । जङ्गमैः स्थावरैर्वाऽपि यष्टव्यमिति भारत ॥
teṣāṃ vivādaḥ sumahāñśakrayajñe tapasvinām | jaṅgamaiḥ sthāvarairvā'pi yaṣṭavyamiti bhārata
हे भारत, शक्र के उस यज्ञ में उन तपस्वियों के बीच बड़ा विवाद उठ खड़ा हुआ कि यज्ञ चल पदार्थों से किया जाए या अचल पदार्थों से।
श्लोक 19 (14.93.19)
ते तु खिन्ना विवादेन ऋषयस्तत्त्वदर्शिनः । अभिसंधाय शक्रेण पप्रच्छुर्नृपतिं वसुम् ॥
te tu khinnā vivādena ṛṣayastattvadarśinaḥ | abhisaṃdhāya śakreṇa papracchurnṛpatiṃ vasum
विवाद से थके हुए उन तत्त्वदर्शी ऋषियों ने शक्र से सहमति करके राजा वसु से पूछा।
ऋषय ऊचुः
श्लोक 20 (14.93.20)
धर्मसंशयमापन्नान्सत्यं ब्रूहि महामते । महाभाग कथं यज्ञेष्वागमो नृपसत्तम । यष्टव्यं पशुभिर्मेध्यैरथो बीजैरजैरिति ॥
dharmasaṃśayamāpannānsatyaṃ brūhi mahāmate | mahābhāga kathaṃ yajñeṣvāgamo nṛpasattama | yaṣṭavyaṃ paśubhirmedhyairatho bījairajairiti
"हे महामते, हम धर्म के विषय में संशय में पड़े हैं, हमें सत्य बताइए। हे महाभाग, नृपश्रेष्ठ, यज्ञों में शास्त्र का विधान क्या है? यज्ञ पवित्र पशुओं से करना चाहिए, या बीजों से, या अजों से?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (14.93.21)
तच्छ्रुत्वा तु वसुस्तेषामविचार्य बलाबलम् । यथोपनीतैर्यष्टव्यमिति प्रोवाच पार्थिवः ॥
tacchrutvā tu vasusteṣāmavicārya balābalam | yathopanītairyaṣṭavyamiti provāca pārthivaḥ
उनकी बात सुनकर राजा वसु ने बलाबल का विचार किए बिना कह दिया, "जो सामग्री उपलब्ध हो, उसी से यज्ञ करना चाहिए।"
श्लोक 22 (14.93.22)
एवमुक्त्वा स नृपतिः प्रविवेश रसातलम् । उक्त्वेह वितथं राजंश्चेदीनामीश्वरः प्रभुः ॥
evamuktvā sa nṛpatiḥ praviveśa rasātalam | uktveha vitathaṃ rājaṃścedīnāmīśvaraḥ prabhuḥ
यह कहकर वह राजा रसातल में प्रविष्ट हो गया; हे राजन्, यहाँ असत्य बोलने के कारण चेदि देश का वह स्वामी और प्रभु नीचे चला गया।
श्लोक 23 (14.93.23)
तस्मान्न वाच्यं ह्येकेन बहुज्ञेनापि संशये । प्रजापतिमपाहाय स्वयंभुवमृते प्रभुम् ॥
tasmānna vācyaṃ hyekena bahujñenāpi saṃśaye | prajāpatimapāhāya svayaṃbhuvamṛte prabhum
इसलिए संशय की बात में अकेले एक व्यक्ति को, चाहे वह कितना ही बहुज्ञ हो, निर्णय नहीं देना चाहिए; केवल प्रजापति स्वयम्भू प्रभु को छोड़कर।
श्लोक 24 (14.93.24)
तेन दत्तानि दानानि पापेनाशुद्धबुद्धिना । तानि सर्वाण्यनादृत्य नश्यन्ति विपुलान्यपि ॥
tena dattāni dānāni pāpenāśuddhabuddhinā | tāni sarvāṇyanādṛtya naśyanti vipulānyapi
उस पापी, अशुद्ध बुद्धि वाले पुरुष के दिए हुए दान, चाहे बहुत बड़े हों, अनादृत होकर सब नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 25 (14.93.25)
तस्याधर्मप्रवृत्तस्य हिंसकस्य दुरात्मनः । दानेन कीर्तिर्भवति न प्रेत्येह च दुर्मतेः ॥
tasyādharmapravṛttasya hiṃsakasya durātmanaḥ | dānena kīrtirbhavati na pretyeha ca durmateḥ
जो अधर्म में लगा हो, हिंसक, दुरात्मा और दुर्बुद्धि हो, उसके दान से न इस लोक में कीर्ति होती है, न परलोक में।
श्लोक 26 (14.93.26)
अन्यायोपगतं द्रव्यमभीक्ष्णं यो ह्यपण्डितः । धर्माभिकाङ्क्षी त्यजति न स धर्मफलं लभेत् ॥
anyāyopagataṃ dravyamabhīkṣṇaṃ yo hyapaṇḍitaḥ | dharmābhikāṅkṣī tyajati na sa dharmaphalaṃ labhet
जो मूर्ख धर्म की इच्छा से अन्याय से आए हुए धन को बार-बार दान में छोड़ता है, वह धर्म का फल नहीं पाता।
श्लोक 27 (14.93.27)
धर्मवैतंसिको यस्तु पापात्मा पुरुषाधमः । ददाति दानं विप्रेभ्यो लोकविश्वासकारणम् ॥
dharmavaitaṃsiko yastu pāpātmā puruṣādhamaḥ | dadāti dānaṃ viprebhyo lokaviśvāsakāraṇam
जो धर्म का ढोंग करने वाला पापात्मा नीच पुरुष लोगों का विश्वास जीतने के लिए ब्राह्मणों को दान देता है,
श्लोक 28 (14.93.28)
पापेन कर्मणा विप्रो धनं प्राप्य निरङ्कुशः । रागमोहान्वितः सोन्ते कलुषां गतिमश्नुते ॥
pāpena karmaṇā vipro dhanaṃ prāpya niraṅkuśaḥ | rāgamohānvitaḥ sonte kaluṣāṃ gatimaśnute
या जो ब्राह्मण पाप-कर्म से धन पाकर निरंकुश होकर राग और मोह से भरा रहता है, वह अन्त में दूषित गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 29 (14.93.29)
अपि संचयबुद्धिर्हि लोभमोहवशं गतः । उद्वेजयति भूतानि हिंसया पापचेतनः ॥
api saṃcayabuddhirhi lobhamohavaśaṃ gataḥ | udvejayati bhūtāni hiṃsayā pāpacetanaḥ
और जिसकी बुद्धि संचय में लगी है और जो लोभ तथा मोह के वश में है, वह पाप-चित्त पुरुष हिंसा से प्राणियों को पीड़ित करता है।
श्लोक 30 (14.93.30)
एवं लब्ध्वा धनं मोहाद्यो हि दद्याद्यजेत वा । न तस्य स फलं प्रेत्य भुंक्ते पापधनागमात् ॥
evaṃ labdhvā dhanaṃ mohādyo hi dadyādyajeta vā | na tasya sa phalaṃ pretya bhuṃkte pāpadhanāgamāt
इस प्रकार जो मोह से धन पाकर उसका दान करता है या उससे यज्ञ करता है, वह मरने पर उसका फल नहीं भोगता, क्योंकि धन पाप से आया है।
श्लोक 31 (14.93.31)
उञ्छं मूलं फलं शाकमुदपात्रं तपोधनाः । दानं विभवतो दत्त्वा नराः स्वर्यान्ति धार्मिकाः ॥
uñchaṃ mūlaṃ phalaṃ śākamudapātraṃ tapodhanāḥ | dānaṃ vibhavato dattvā narāḥ svaryānti dhārmikāḥ
हे तपोधनो, बीना हुआ अन्न, कन्द-मूल, फल, साग, जल का पात्र, इनका दान अपनी सामर्थ्य के अनुसार करके धार्मिक लोग स्वर्ग को जाते हैं।
श्लोक 32 (14.93.32)
एष धर्मो महायोगो दानं भूतदया तथा । ब्रह्मचर्यं तथा सत्यमनुक्रोशो धृतिः क्षमा ॥
eṣa dharmo mahāyogo dānaṃ bhūtadayā tathā | brahmacaryaṃ tathā satyamanukrośo dhṛtiḥ kṣamā
यही महान धर्म है, महान साधना है: दान, प्राणियों पर दया, ब्रह्मचर्य, सत्य, करुणा, धैर्य और क्षमा।
श्लोक 33 (14.93.33)
सनातनस्य धर्मस्य फलमेतत्सनातनम् । श्रूयन्ते हि पुरावृत्ता विश्वामित्रादयो नृपाः ॥
sanātanasya dharmasya phalametatsanātanam | śrūyante hi purāvṛttā viśvāmitrādayo nṛpāḥ
यह सनातन धर्म का सनातन फल है। सुना जाता है कि प्राचीन काल में विश्वामित्र आदि राजा हुए हैं।
श्लोक 34 (14.93.34)
विश्वामित्रोसितश्चैवं जनकश्च महीपतिः । कक्षसेनार्ष्टिसेनौ च सिन्धुद्वीपश्च पार्थिवः ॥
viśvāmitrositaścaivaṃ janakaśca mahīpatiḥ | kakṣasenārṣṭisenau ca sindhudvīpaśca pārthivaḥ
विश्वामित्र, असित, राजा जनक, कक्षसेन, आर्ष्टिसेन और राजा सिन्धुद्वीप,
श्लोक 35 (14.93.35)
एते चान्ये च बहवः सिद्धिं परमिकां गताः । नृपाः सत्यैश्च दानैश्च न्यायलब्धैस्तपोधनाः ॥
ete cānye ca bahavaḥ siddhiṃ paramikāṃ gatāḥ | nṛpāḥ satyaiśca dānaiśca nyāyalabdhaistapodhanāḥ
ये और दूसरे बहुत-से तपोधन राजा सत्य और न्याय से कमाए हुए दानों के द्वारा परम सिद्धि को प्राप्त हुए।
श्लोक 36 (14.93.36)
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये चाश्रितास्तपः । दानधर्माग्निना शुद्धास्ते स्वर्गं यान्ति भारत ॥
brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrā ye cāśritāstapaḥ | dānadharmāgninā śuddhāste svargaṃ yānti bhārata
हे भारत, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, जिन्होंने तप का आश्रय लिया है, दान और धर्म की अग्नि से शुद्ध होकर स्वर्ग को जाते हैं।