आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 92
नकुल की कथा: उञ्छवृत्ति ब्राह्मण और उसका सत्तू-दान
युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ के बाद सुनहरे पार्श्व वाला नेवला नकुल उपस्थित ब्राह्मणों को कुरुक्षेत्र के एक उञ्छवृत्ति ब्राह्मण की कथा सुनाता है, जिसने अकाल में अपने परिवार का थोड़ा-सा जौ का सत्तू एक भूखे अतिथि को भाग-दर-भाग दे दिया। वह अतिथि स्वयं धर्म था; उसने दान की प्रशंसा की और पूरे परिवार को स्वर्ग ले गया। उस सत्तू के कणों से नेवले का आधा शरीर सोने का हो गया था, और वह कहता है कि युधिष्ठिर का महायज्ञ उस एक प्रस्थ सत्तू के बराबर नहीं है। अन्त में वैशम्पायन जनमेजय से कहते हैं कि इस पर विस्मय न करें।
नकुल उवाच
श्लोक 1 (14.92.1)
हन्त वः कथयिष्यामि दानस्य फलमुत्तमम् । न्यायलब्धस्य सूक्ष्मस्य विप्रदत्तस्य यद्द्विजाः ॥
hanta vaḥ kathayiṣyāmi dānasya phalamuttamam | nyāyalabdhasya sūkṣmasya vipradattasya yaddvijāḥ
हे द्विजो, अब मैं तुम्हें उस दान का सर्वोत्तम फल बताऊँगा जो न्याय से कमाया हुआ, थोड़ा-सा और किसी ब्राह्मण को दिया गया हो।
श्लोक 2 (14.92.2)
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे धर्मज्ञैर्बहुभिर्वृते । उञ्छवृत्तिर्द्विजः कश्चित्कापोतिरभवत्पुरा ॥
dharmakṣetre kurukṣetre dharmajñairbahubhirvṛte | uñchavṛttirdvijaḥ kaścitkāpotirabhavatpurā
बहुत पहले की बात है, धर्म के जानकार अनेक लोगों से भरे धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में एक ब्राह्मण रहता था, जो कबूतर की तरह बीन-बीनकर अन्न जुटाकर निर्वाह करता था।
श्लोक 3 (14.92.3)
सभार्यः सहपुत्रेण सस्नुषस्तपसि स्थितः । बभूव शुक्लवृत्तः स धर्मात्मा नियतेन्द्रियः ॥
sabhāryaḥ sahaputreṇa sasnuṣastapasi sthitaḥ | babhūva śuklavṛttaḥ sa dharmātmā niyatendriyaḥ
वह धर्मात्मा, शुद्ध आजीविका वाला और इन्द्रियों को वश में रखने वाला ब्राह्मण अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू के साथ वहाँ तप में लगा रहता था।
श्लोक 4 (14.92.4)
षष्ठे काले सदा विप्रो भुङ्क्ते तैः सह संवृतः ॥
ṣaṣṭhe kāle sadā vipro bhuṅkte taiḥ saha saṃvṛtaḥ
वह ब्राह्मण सदा उन सबके साथ बैठकर केवल छठे भोजन-काल में ही भोजन करता था।
श्लोक 5 (14.92.5)
षष्ठे काले कदाचित्तु तस्याहारो न विद्यते । भुङ्क्तेऽन्यस्मिन्कदाचित्स षष्ठे काले द्विजोत्तमः ॥
ṣaṣṭhe kāle kadācittu tasyāhāro na vidyate | bhuṅkte'nyasminkadācitsa ṣaṣṭhe kāle dvijottamaḥ
कभी-कभी छठे काल में भी उसके लिए आहार नहीं होता था; तब वह श्रेष्ठ ब्राह्मण किसी अगले छठे काल में भोजन करता था।
श्लोक 6 (14.92.6)
कपोतधर्मिणस्तस्य दुर्भिक्षे सति दारुणे । नाविद्यत तदा विप्राः संचयस्तन्निबोधत ॥
kapotadharmiṇastasya durbhikṣe sati dāruṇe | nāvidyata tadā viprāḥ saṃcayastannibodhata
हे ब्राह्मणो, जब भयानक अकाल पड़ा, तब कबूतर की-सी वृत्ति वाले उस ब्राह्मण के पास अन्न का कोई संचय नहीं रहा; यह कैसे हुआ, सुनिए।
श्लोक 7 (14.92.7)
क्षीणौषधिसमावापो द्रव्यहीनोऽभवत्तदा । कालेकालेऽस्य सम्प्राप्ते नैव विद्येत भोजनम् ॥
kṣīṇauṣadhisamāvāpo dravyahīno'bhavattadā | kālekāle'sya samprāpte naiva vidyeta bhojanam
उसका अन्न और औषधियों का संग्रह चुक गया और वह साधनहीन हो गया; भोजन का समय आने पर भी भोजन नहीं मिलता था।
श्लोक 8 (14.92.8)
क्षुधापरिगताः सर्वे प्रातिष्ठन्त तदा तु ते । उञ्छं तदा शुक्लपक्षे मध्यं तपति भास्करे ॥
kṣudhāparigatāḥ sarve prātiṣṭhanta tadā tu te | uñchaṃ tadā śuklapakṣe madhyaṃ tapati bhāskare
भूख से व्याकुल वे सब उस समय निकल पड़े; शुक्ल पक्ष में, जब दोपहर का सूर्य तप रहा था, वे अन्न के दाने बीनने लगे।
श्लोक 9 (14.92.9)
उष्णार्तश्च क्षुधार्तश्च विप्रस्तपसि संस्थितः । उञ्छमप्राप्तवानेव ब्राह्मणः क्षुच्छ्रमान्वितः ॥
uṣṇārtaśca kṣudhārtaśca viprastapasi saṃsthitaḥ | uñchamaprāptavāneva brāhmaṇaḥ kṣucchramānvitaḥ
गरमी से झुलसते और भूख से पीड़ित होते हुए भी वह ब्राह्मण तप में डटा रहा; पर उसे बीनने को अन्न नहीं मिला और वह भूख तथा थकान से निढाल हो गया।
श्लोक 10 (14.92.10)
स तथैव क्षुधाविष्टः सार्धं परिजनेन ह । क्षपयामास तं कालं कृच्छ्रप्राणो द्विजोत्तमः ॥
sa tathaiva kṣudhāviṣṭaḥ sārdhaṃ parijanena ha | kṣapayāmāsa taṃ kālaṃ kṛcchraprāṇo dvijottamaḥ
इसी प्रकार भूख से घिरे हुए, अपने परिवार-जनों के साथ वह श्रेष्ठ ब्राह्मण बड़ी कठिनाई से प्राण बचाए हुए वह समय बिताता रहा।
श्लोक 11 (14.92.11)
अथ षष्ठे गते काले यवप्रस्थमुपार्जयन् । यवप्रस्थं तु तं सक्तूनकुर्वन्त तपस्विनः ॥
atha ṣaṣṭhe gate kāle yavaprasthamupārjayan | yavaprasthaṃ tu taṃ saktūnakurvanta tapasvinaḥ
फिर छठा काल बीत जाने पर उन्होंने एक प्रस्थ जौ जुटाया और उन तपस्वियों ने उस जौ का सत्तू बना लिया।
श्लोक 12 (14.92.12)
कृतजप्याह्निकास्ते तु हुत्वा चाग्निं यथाविधि । कुडवंकुडवं सर्वे व्यभजन्त तपस्विनः ॥
kṛtajapyāhnikāste tu hutvā cāgniṃ yathāvidhi | kuḍavaṃkuḍavaṃ sarve vyabhajanta tapasvinaḥ
जप और नित्य-कर्म पूरे करके तथा विधि के अनुसार अग्नि में आहुति देकर उन सब तपस्वियों ने सत्तू को आपस में बाँट लिया, प्रत्येक को एक-एक कुडव।
श्लोक 13 (14.92.13)
अथागच्छद्द्विजः कश्चिदतिथिर्भुञ्जतां तदा । ते तं दृष्ट्वाऽतिथिं प्राप्तं प्रहृष्टमनसोऽभवन् ॥
athāgacchaddvijaḥ kaścidatithirbhuñjatāṃ tadā | te taṃ dṛṣṭvā'tithiṃ prāptaṃ prahṛṣṭamanaso'bhavan
ठीक तभी, जब वे भोजन करने बैठे थे, एक ब्राह्मण अतिथि के रूप में आ पहुँचा; अतिथि को आया देखकर वे मन-ही-मन प्रसन्न हुए।
श्लोक 14 (14.92.14)
तेऽभिवाद्य सुखप्रश्नं पृष्ट्वा तमतिथिं तदा । विशुद्धमनसो दान्ताः श्रद्धादमसमन्विताः ॥
te'bhivādya sukhapraśnaṃ pṛṣṭvā tamatithiṃ tadā | viśuddhamanaso dāntāḥ śraddhādamasamanvitāḥ
उन्होंने अतिथि को प्रणाम किया और उसका कुशल-क्षेम पूछा। वे शुद्ध मन वाले, संयमी तथा श्रद्धा और दम से युक्त थे,
श्लोक 15 (14.92.15)
अनसूया गतक्रोधाः साधवो वीतमत्सराः । त्यक्तमानमदक्रोधा धर्मज्ञा द्विजसत्तमाः ॥
anasūyā gatakrodhāḥ sādhavo vītamatsarāḥ | tyaktamānamadakrodhā dharmajñā dvijasattamāḥ
ईर्ष्या और क्रोध से रहित, सज्जन और मत्सर से मुक्त, अभिमान, मद और क्रोध को त्याग चुके, धर्म को जानने वाले और द्विजों में श्रेष्ठ थे;
श्लोक 16 (14.92.16)
सब्रह्मचर्यं गोत्रं ते तस्य ख्यात्वा परस्परम् । कुटीं प्रवेशयामासुः क्षुधार्तमतिथिं तदा ॥
sabrahmacaryaṃ gotraṃ te tasya khyātvā parasparam | kuṭīṃ praveśayāmāsuḥ kṣudhārtamatithiṃ tadā
उन्होंने एक-दूसरे को अपना गोत्र और ब्रह्मचर्य बताया और भूखे अतिथि को अपनी कुटिया में ले गए।
उञ्छवृत्तिरुवाच
श्लोक 17 (14.92.17)
इदमर्घ्यं च पाद्यं च बृसी चेयं तवानघ । शुचयः सक्तवश्चेमे नियमोपार्जिताः प्रभो । प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते मया दत्ता द्विजर्षभ ॥
idamarghyaṃ ca pādyaṃ ca bṛsī ceyaṃ tavānagha | śucayaḥ saktavaśceme niyamopārjitāḥ prabho | pratigṛhṇīṣva bhadraṃ te mayā dattā dvijarṣabha
"हे निष्पाप, यह हाथ धोने का जल है, यह पाँव धोने का जल है और यह आपके बैठने के लिए कुश का आसन है। प्रभो, ये शुद्ध सत्तू हैं, जो हमने नियम-पालन से कमाए हैं। इन्हें स्वीकार कीजिए, आपका कल्याण हो; हे द्विजश्रेष्ठ, मैं ये आपको देता हूँ।"
नकुल उवाच
श्लोक 18 (14.92.18)
इत्युक्तः प्रतिगृह्याथ सक्तूनां कुडवं द्विजः । भक्षयामास राजेन्द्र न च तुष्टिं जगाम सः ॥
ityuktaḥ pratigṛhyātha saktūnāṃ kuḍavaṃ dvijaḥ | bhakṣayāmāsa rājendra na ca tuṣṭiṃ jagāma saḥ
ऐसा कहे जाने पर उस ब्राह्मण ने सत्तू का वह कुडव ग्रहण करके खा लिया, हे राजेन्द्र, पर उसे तृप्ति नहीं हुई।
श्लोक 19 (14.92.19)
स उञ्छवृत्तिस्तं प्रेक्ष्य क्षुधापरिगतं द्विजम् । आहारं चिन्तयामास कथं तुष्टो भवेदिति ॥
sa uñchavṛttistaṃ prekṣya kṣudhāparigataṃ dvijam | āhāraṃ cintayāmāsa kathaṃ tuṣṭo bhavediti
उञ्छवृत्ति ब्राह्मण ने अतिथि को भूख से पीड़ित देखकर सोचा कि उसे कौन-सा आहार देने से वह तृप्त होगा।
श्लोक 20 (14.92.20)
तस्य भार्याऽब्रवीद्वाक्यं मद्भागो दीयतामिति । गच्छत्वेष यथाकामं परितुष्टो द्विजोत्तमः ॥
tasya bhāryā'bravīdvākyaṃ madbhāgo dīyatāmiti | gacchatveṣa yathākāmaṃ parituṣṭo dvijottamaḥ
उसकी पत्नी ने कहा, "मेरा भाग इन्हें दे दीजिए; ये द्विजश्रेष्ठ पूर्ण तृप्त होकर अपनी इच्छा से जाएँ।"
श्लोक 21 (14.92.21)
इति ब्रुवन्तीं तां साध्वीं भार्यां स द्विजसत्तमः । क्षुधापरिगतां ज्ञात्वा तान्सक्तून्नाभ्यनन्दत ॥
iti bruvantīṃ tāṃ sādhvīṃ bhāryāṃ sa dvijasattamaḥ | kṣudhāparigatāṃ jñātvā tānsaktūnnābhyanandata
इस प्रकार कहती हुई अपनी साध्वी पत्नी को स्वयं भूख से पीड़ित जानकर उन द्विजश्रेष्ठ ने उस सत्तू को स्वीकार नहीं किया।
श्लोक 22 (14.92.22)
आत्मानुमानतो विद्वान्स तु विप्रर्षभस्तदा । जानन्वृद्धां क्षुधार्तां च श्रान्तां ग्लानां तपस्विनीम् । त्वगस्थिभूतां वेपन्तीं ततो भार्यामुवाच ह ॥
ātmānumānato vidvānsa tu viprarṣabhastadā | jānanvṛddhāṃ kṣudhārtāṃ ca śrāntāṃ glānāṃ tapasvinīm | tvagasthibhūtāṃ vepantīṃ tato bhāryāmuvāca ha
अपनी ही दशा से अनुमान करके उस विद्वान ब्राह्मण ने उसे वृद्ध, भूखी, थकी, क्षीण, तपस्विनी, केवल चमड़ी और हड्डियों की रह गई तथा काँपती हुई जानकर तब अपनी पत्नी से कहा:
उञ्छवृत्तिरुवाच
श्लोक 23 (14.92.23)
अपि कीटपतङ्गानां मृगाणां चैव शोभने । स्त्रियो रक्ष्याश्च पोष्याश्च न त्वेवं वक्तुमर्हसि ॥
api kīṭapataṅgānāṃ mṛgāṇāṃ caiva śobhane | striyo rakṣyāśca poṣyāśca na tvevaṃ vaktumarhasi
"शुभे, कीड़ों, पतंगों और पशुओं में भी मादाओं की रक्षा और पालन किया जाता है। तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए।"
श्लोक 24 (14.92.24)
अनुकंप्यो नरः पत्न्या पुष्टो रक्षित एव च । प्रपतेद्यशसो दीप्तात्स च लोकान्न चाप्नुयात् ॥
anukaṃpyo naraḥ patnyā puṣṭo rakṣita eva ca | prapatedyaśaso dīptātsa ca lokānna cāpnuyāt
"जो पुरुष अपनी पत्नी की दया का पात्र बने और उसी से पोषित और रक्षित हो, वह दीप्त यश से गिर जाता है और उत्तम लोकों को नहीं पाता।"
श्लोक 25 (14.92.25)
धर्मकामार्थकार्याणि शुश्रूषाकुलसंततिः । दारेष्वधीनो धर्मश्च पितॄणामात्मनस्तथा ॥
dharmakāmārthakāryāṇi śuśrūṣākulasaṃtatiḥ | dāreṣvadhīno dharmaśca pitṝṇāmātmanastathā
"धर्म, काम और अर्थ के कार्य, सेवा, कुल की संतान-परम्परा, तथा पितरों और अपने प्रति धर्म, ये सब पत्नी पर ही निर्भर हैं।"
श्लोक 26 (14.92.26)
न वेत्ति कर्मतो भार्यारक्षणे योऽक्षमः पुमान् । अयशो महदाप्नोति नारकांश्चैव गच्छति ॥
na vetti karmato bhāryārakṣaṇe yo'kṣamaḥ pumān | ayaśo mahadāpnoti nārakāṃścaiva gacchati
"जो पुरुष पत्नी की रक्षा करने में असमर्थ है, वह अपने कर्मों से कर्तव्य को नहीं जानता; वह भारी अपयश पाता है और नरकों में जाता है।"
नकुल उवाच
श्लोक 27 (14.92.27)
इत्युक्ता सा ततः प्राह धर्मार्थौ नौ समौ द्विज । सक्तुप्रस्थचतुर्भागं गृहाणेमं प्रसीद मे ॥
ityuktā sā tataḥ prāha dharmārthau nau samau dvija | saktuprasthacaturbhāgaṃ gṛhāṇemaṃ prasīda me
यह कहे जाने पर वह बोली, "हे द्विज, हमारा धर्म और हमारा प्रयोजन एक ही है। एक प्रस्थ सत्तू का यह चौथाई भाग ले लीजिए और मुझ पर कृपा कीजिए।"
भार्योवाच
श्लोक 28 (14.92.28)
सत्यं रतिश्च धर्मश्च स्वर्गश्च गुणनिर्जितः । स्त्रीणां पतिसमाधीनं काङ्क्षितं च द्विजर्षभ ॥
satyaṃ ratiśca dharmaśca svargaśca guṇanirjitaḥ | strīṇāṃ patisamādhīnaṃ kāṅkṣitaṃ ca dvijarṣabha
"हे द्विजश्रेष्ठ, सत्य, रति, धर्म और गुणों से जीता हुआ स्वर्ग, तथा स्त्रियों की जो भी अभिलाषा है, वह सब पति पर ही निर्भर है।"
श्लोक 29 (14.92.29)
ऋतुर्मातुः पितुर्बीजं दैवतं परमं पतिः । भर्तुः प्रसादान्नारीणां रतिपुत्रफलं तथा ॥
ṛturmātuḥ piturbījaṃ daivataṃ paramaṃ patiḥ | bhartuḥ prasādānnārīṇāṃ ratiputraphalaṃ tathā
"ऋतु माता का है और बीज पिता का, किन्तु स्त्री का परम देवता पति है। पति की कृपा से ही स्त्रियों को रति और पुत्र का फल मिलता है।"
श्लोक 30 (14.92.30)
पालनाद्धि पतिस्त्वं मे भर्ताऽसि भरणाच्च मे । पुत्रप्रदानाद्वरदस्तस्मात्सक्तून्प्रयच्छ मे ॥
pālanāddhi patistvaṃ me bhartā'si bharaṇācca me | putrapradānādvaradastasmātsaktūnprayaccha me
"आप मेरा पालन करने से मेरे पति हैं और भरण-पोषण करने से मेरे स्वामी हैं; पुत्र देने के कारण आप मेरे वरदाता हैं। इसलिए मेरी ओर से यह सत्तू दे दीजिए।"
श्लोक 31 (14.92.31)
जरापरिगतो वृद्धः क्षुधार्तो दुर्बलो भृशम् । उपवासपरिश्रान्तो यदा त्वमपि कर्शितः ॥
jarāparigato vṛddhaḥ kṣudhārto durbalo bhṛśam | upavāsapariśrānto yadā tvamapi karśitaḥ
"आप तो बूढ़े हैं, बुढ़ापे से जर्जर, भूख से पीड़ित, अत्यन्त दुर्बल और उपवास से थके हुए हैं; आप भी तो कृश हो गए हैं।"
नकुल उवाच
श्लोक 32 (14.92.32)
इत्युक्तः स तया सक्तून्प्रगृह्येदं वचोऽब्रवीत् । द्विज सक्तूनिमान्भूयः प्रतिगृह्णीष्व सत्तम ॥
ityuktaḥ sa tayā saktūnpragṛhyedaṃ vaco'bravīt | dvija saktūnimānbhūyaḥ pratigṛhṇīṣva sattama
उसके यों कहने पर उसने सत्तू लेकर कहा, "हे द्विज, हे सज्जन, इस सत्तू को भी और ग्रहण कीजिए।"
श्लोक 33 (14.92.33)
स तान्प्रगृह्य भुक्त्वा च न तुष्टिमगमद्द्विजः । तमुञ्छवृत्तिरालक्ष्य ततश्चिन्तापरोऽभवत् ॥
sa tānpragṛhya bhuktvā ca na tuṣṭimagamaddvijaḥ | tamuñchavṛttirālakṣya tataścintāparo'bhavat
अतिथि ने उसे भी लेकर खाया, फिर भी वह तृप्त न हुआ। यह देखकर उञ्छवृत्ति ब्राह्मण चिन्ता में पड़ गया।
पुत्र उवाच
श्लोक 34 (14.92.34)
सक्तूनिमान्प्रगृह्य त्वं देहि विप्राय सत्तम । इत्येव सुकृतं मन्ये तस्मादेतत्करोम्यहम् ॥
saktūnimānpragṛhya tvaṃ dehi viprāya sattama | ityeva sukṛtaṃ manye tasmādetatkaromyaham
"हे श्रेष्ठ, यह सत्तू लेकर आप इस ब्राह्मण को दे दीजिए। मैं इसी को सत्कर्म मानता हूँ, इसीलिए मैं यह करता हूँ।"
श्लोक 35 (14.92.35)
भवान्हि परिपाल्यो मे सर्वदैव प्रयत्नतः । साधूनां काङ्क्षितं यस्मात्पितुर्वृद्धस्य पालनम् ॥
bhavānhi paripālyo me sarvadaiva prayatnataḥ | sādhūnāṃ kāṅkṣitaṃ yasmātpiturvṛddhasya pālanam
"मुझे सदा पूरे प्रयत्न से आपका पालन करना चाहिए, क्योंकि वृद्ध पिता की सेवा करना सज्जनों को अभीष्ट है।"
श्लोक 36 (14.92.36)
पुत्रार्थो विहितो ह्येष वार्धके परिपालनम् । श्रुतिरेषा हि विप्रर्षे त्रिषु लोकेषु शाश्वती ॥
putrārtho vihito hyeṣa vārdhake paripālanam | śrutireṣā hi viprarṣe triṣu lokeṣu śāśvatī
"पुत्र का प्रयोजन ही यह ठहराया गया है कि वह बुढ़ापे में पिता का पालन करे। हे विप्रर्षि, यह श्रुति तीनों लोकों में सनातन रूप से प्रसिद्ध है।"
श्लोक 37 (14.92.37)
प्राणाधारणमात्रेण शक्यं कर्तुं तपस्त्वया । प्राणो हि परमो धर्मः स्थितो देहेषु देहिनाम् ॥
prāṇādhāraṇamātreṇa śakyaṃ kartuṃ tapastvayā | prāṇo hi paramo dharmaḥ sthito deheṣu dehinām
"आप तप तभी कर सकते हैं जब प्राण बने रहें; क्योंकि प्राण ही परम धर्म है, जो देहधारियों के शरीरों में रहता है।"
पितोवाच
श्लोक 38 (14.92.38)
अपि वर्षसहस्री त्वं बाल एव मतो मम । उत्पाद्य पुत्रं हि पिता कृतकृत्यो भवेत्सुतात् ॥
api varṣasahasrī tvaṃ bāla eva mato mama | utpādya putraṃ hi pitā kṛtakṛtyo bhavetsutāt
"आप हज़ार वर्ष के भी हो जाएँ तो भी मेरी दृष्टि में बालक ही रहेंगे। पुत्र को जन्म देकर पिता पुत्र के द्वारा कृतकृत्य हो जाता है।"
श्लोक 39 (14.92.39)
बालानां क्षुद्बलवती जानाम्येतदहं प्रभो । वृद्धोऽहं धारयिष्यामि त्वं बली भव पुत्रक ॥
bālānāṃ kṣudbalavatī jānāmyetadahaṃ prabho | vṛddho'haṃ dhārayiṣyāmi tvaṃ balī bhava putraka
"प्रभो, मैं जानता हूँ कि बालकों में भूख प्रबल होती है। मैं बूढ़ा हूँ, मैं सह लूँगा; बेटा, तुम बलवान बने रहो।"
श्लोक 40 (14.92.40)
जीर्णेन वयसा पुत्र न मां क्षुद्बाधतेऽपि च । दीर्घकालं तपस्तप्तं न मे मरणतो भयम् ॥
jīrṇena vayasā putra na māṃ kṣudbādhate'pi ca | dīrghakālaṃ tapastaptaṃ na me maraṇato bhayam
"बेटा, मेरी आयु ढल चुकी है, भूख मुझे अधिक नहीं सताती। मैंने बहुत समय तक तप किया है, मुझे मृत्यु का भय नहीं है।"
पुत्र उवाच
श्लोक 41 (14.92.41)
अपत्यमस्मि ते पुंसस्त्राणात्पुत्र इति स्मृतः । आत्मा पुत्रः स्मृतस्तस्मात्त्राह्यात्मानमिहात्मना ॥
apatyamasmi te puṃsastrāṇātputra iti smṛtaḥ | ātmā putraḥ smṛtastasmāttrāhyātmānamihātmanā
"मैं आपकी संतान हूँ; पुरुष की रक्षा करने के कारण ही पुत्र कहलाता है। पुत्र को आत्मा ही माना गया है, इसलिए आप अपने आप से अपनी रक्षा कीजिए।"
पितोवाच
श्लोक 42 (14.92.42)
रूपेण सदृशस्त्वं मे शीलेन च दमेन च । परीक्षितश्च बहुधा सक्तूनादद्मि ते सुत ॥
rūpeṇa sadṛśastvaṃ me śīlena ca damena ca | parīkṣitaśca bahudhā saktūnādadmi te suta
"तुम रूप, शील और संयम में मेरे ही समान हो और मैंने तुम्हें कई प्रकार से परख लिया है। बेटा, मैं तुम्हारा सत्तू लेता हूँ।"
नकुल उवाच
श्लोक 43 (14.92.43)
इत्युक्त्वाऽऽदाय तान्सक्तून्प्रीतात्मा द्विजसत्तमः । प्रहसन्निव विप्राय स तस्मै प्रददौ तदा ॥
ityuktvā''dāya tānsaktūnprītātmā dvijasattamaḥ | prahasanniva viprāya sa tasmai pradadau tadā
यह कहकर उस द्विजश्रेष्ठ ने प्रसन्न मन से वह सत्तू लिया और मानो मुस्कराते हुए उस ब्राह्मण अतिथि को दे दिया।
श्लोक 44 (14.92.44)
भुक्त्वा तानपि सक्तून्स नैव तुष्टो बभूव ह । उञ्छवृत्तिस्तु धर्मात्मा व्रीडामनुजगाम ह ॥
bhuktvā tānapi saktūnsa naiva tuṣṭo babhūva ha | uñchavṛttistu dharmātmā vrīḍāmanujagāma ha
उस सत्तू को खाकर भी अतिथि तृप्त नहीं हुआ और धर्मात्मा उञ्छवृत्ति ब्राह्मण लज्जित हो गया।
श्लोक 45 (14.92.45)
तं वै वधूः स्थिता साध्वी ब्राह्मणप्रियकाम्यया । सक्तूनादाय संहृष्टा श्वशुरं वाक्यमब्रवीत् ॥
taṃ vai vadhūḥ sthitā sādhvī brāhmaṇapriyakāmyayā | saktūnādāya saṃhṛṣṭā śvaśuraṃ vākyamabravīt
तब वहाँ खड़ी साध्वी पुत्रवधू ने ब्राह्मण का प्रिय करने की इच्छा से सत्तू लिया और अत्यन्त हर्ष के साथ अपने श्वशुर से कहा:
स्नुषोवाच
श्लोक 46 (14.92.46)
संतानात्तव संतानं मम विप्र भविष्यति । सक्तूनिमानतिथये गृहीत्वा सम्प्रयच्छ मे ॥
saṃtānāttava saṃtānaṃ mama vipra bhaviṣyati | saktūnimānatithaye gṛhītvā samprayaccha me
"हे विप्र, आपकी संतान से ही मेरी संतान चलेगी। इस सत्तू को लेकर मेरी ओर से अतिथि को दे दीजिए।"
श्लोक 47 (14.92.47)
तव प्रसादान्निर्वृत्ता मम लोकाः किलाक्षयाः । पुत्रेण तानवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति ॥
tava prasādānnirvṛttā mama lokāḥ kilākṣayāḥ | putreṇa tānavāpnoti yatra gatvā na śocati
"आपकी कृपा से मेरे लोक निश्चय ही अक्षय हो गए हैं। पुत्र के द्वारा मनुष्य उन लोकों को पाता है जहाँ जाकर शोक नहीं करना पड़ता।"
श्लोक 48 (14.92.48)
धर्माद्या हि यथा त्रेता वह्नित्रेता तथैव च । तथैव पुत्रपौत्राणां स्वर्गस्त्रेता किलाक्षयः ॥
dharmādyā hi yathā tretā vahnitretā tathaiva ca | tathaiva putrapautrāṇāṃ svargastretā kilākṣayaḥ
"जैसे धर्म आदि की त्रयी है और जैसे अग्नियों की त्रयी है, वैसे ही पुत्रों और पौत्रों का स्वर्ग भी, कहते हैं, अक्षय त्रयी है।"
श्लोक 49 (14.92.49)
पितॄन्त्राणात्तारयति पुत्र इत्यनुशुश्रुम । पुत्रपौत्रैश्च नियतं साधुलोकानुपाश्नुते ॥
pitṝntrāṇāttārayati putra ityanuśuśruma | putrapautraiśca niyataṃ sādhulokānupāśnute
"हमने सुना है कि पुत्र अपने पितरों का त्राण करके उन्हें तार देता है; पुत्रों और पौत्रों के द्वारा मनुष्य निश्चय ही सत्पुरुषों के लोकों को पाता है।"
श्वशुर उवाच
श्लोक 50 (14.92.50)
वातातपविशीर्णाङ्गीं त्वां विवर्णां निरीक्ष्य वै । कर्शितां सुव्रताचारे क्षुधाविह्वलचेतसम् ॥
vātātapaviśīrṇāṅgīṃ tvāṃ vivarṇāṃ nirīkṣya vai | karśitāṃ suvratācāre kṣudhāvihvalacetasam
"हे उत्तम व्रत का आचरण करने वाली, हवा और धूप से सूखी हुई, कान्तिहीन, कृश और भूख से विह्वल चित्त वाली तुम्हें देखकर,"
श्लोक 51 (14.92.51)
कथं सक्तून्ग्रहीष्यामि भूत्वा धर्मोपघातकः । कल्याणवृत्ते कल्याणि नैव त्वं वक्तुमर्हसि ॥
kathaṃ saktūngrahīṣyāmi bhūtvā dharmopaghātakaḥ | kalyāṇavṛtte kalyāṇi naiva tvaṃ vaktumarhasi
"मैं धर्म का घातक बनकर सत्तू कैसे ले सकता हूँ? हे कल्याणमय आचरण वाली, कल्याणि, तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए।"
श्लोक 52 (14.92.52)
षष्ठे काले व्रतवतीं शौचशीलतपोन्विताम् । कृच्छ्रवृत्तिं निराहारां द्रक्ष्यामि त्वां कथं शुभे ॥
ṣaṣṭhe kāle vratavatīṃ śaucaśīlataponvitām | kṛcchravṛttiṃ nirāhārāṃ drakṣyāmi tvāṃ kathaṃ śubhe
"हे शुभे, व्रत का पालन करने वाली, शौच, शील और तप से युक्त तुम्हें, छठे काल में कठिन जीवन बिताती हुई और बिना आहार के, मैं कैसे देख सकूँगा?"
श्लोक 53 (14.92.53)
बाला क्षुधार्ता नारी च रक्ष्या त्वं सततं मया । उपवासपरिश्रान्ता त्वं हि बान्धवनन्दिनी ॥
bālā kṣudhārtā nārī ca rakṣyā tvaṃ satataṃ mayā | upavāsapariśrāntā tvaṃ hi bāndhavanandinī
"तुम अल्पवयस्क हो, भूखी हो और नारी हो; मुझे सदा तुम्हारी रक्षा करनी चाहिए। उपवास से थकी हुई तुम अपने बन्धुओं को आनन्द देने वाली हो।"
स्नुषोवाच
श्लोक 54 (14.92.54)
गुरोर्मम गुरुस्त्वं वै यतो दैवतदैवतम् । देवातिदेवस्तस्मात्त्वं सक्तूनादत्स्व मे प्रभो ॥
gurormama gurustvaṃ vai yato daivatadaivatam | devātidevastasmāttvaṃ saktūnādatsva me prabho
"आप मेरे गुरु के भी गुरु हैं और देवताओं के भी देवता हैं; इसलिए हे प्रभो, देवताओं से भी बढ़कर आप मुझसे यह सत्तू स्वीकार कीजिए।"
श्लोक 55 (14.92.55)
देहः प्राणश्च धर्मश्च शुश्रूषार्थमिदं गुरोः । तव विप्र प्रसादेन लोकान्प्राप्स्यामहे शुभान् ॥
dehaḥ prāṇaśca dharmaśca śuśrūṣārthamidaṃ guroḥ | tava vipra prasādena lokānprāpsyāmahe śubhān
"यह देह, प्राण और धर्म, सब गुरुजन की सेवा के लिए ही हैं। हे विप्र, आपकी कृपा से हम शुभ लोकों को पाएँगे।"
श्लोक 56 (14.92.56)
अवेक्ष्या इति कृत्वाऽहं दृढभक्तेति वा द्विज । चिन्त्या ममेयमिति वा सक्तूनादानुमर्हसि ॥
avekṣyā iti kṛtvā'haṃ dṛḍhabhakteti vā dvija | cintyā mameyamiti vā saktūnādānumarhasi
"चाहे आप मुझे रक्षा के योग्य मानें, या दृढ़ भक्ति वाली समझें, या यह सोचें कि यह मेरी अपनी चिन्ता का विषय है, आपको यह सत्तू ले लेना चाहिए।"
श्वशुर उवाच
श्लोक 57 (14.92.57)
अनेन नित्यं साध्वी त्वं शीलवृत्तेन शोभसे । या त्वं धर्मव्रतोपेता गुरुवृत्तिमवेक्षसे ॥
anena nityaṃ sādhvī tvaṃ śīlavṛttena śobhase | yā tvaṃ dharmavratopetā guruvṛttimavekṣase
"हे साध्वी, इसी शील-आचरण से तुम सदा शोभा पाती हो, क्योंकि तुम धर्म और व्रत में लगी रहकर गुरुजन की सेवा का ध्यान रखती हो।"
श्लोक 58 (14.92.58)
तस्मात्सक्तून्ग्रहीष्यामि वधु नार्हसि वञ्चनाम् । गणयित्वा महाभागे त्वां हि धर्मभृतां वरे ॥
tasmātsaktūngrahīṣyāmi vadhu nārhasi vañcanām | gaṇayitvā mahābhāge tvāṃ hi dharmabhṛtāṃ vare
"इसलिए मैं सत्तू ले लूँगा। बहू, तुम्हें निराश नहीं किया जाना चाहिए। हे महाभागे, मैं तुम्हें धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ गिनता हूँ।"
नकुल उवाच
श्लोक 59 (14.92.59)
इत्युक्त्वा तानुपादाय सक्तून्प्रादाद्द्विजातये । ततस्तुष्टोऽभवद्विप्रस्तस्य साधोर्महात्मनः ॥
ityuktvā tānupādāya saktūnprādāddvijātaye | tatastuṣṭo'bhavadviprastasya sādhormahātmanaḥ
यह कहकर उसने वह सत्तू लिया और ब्राह्मण अतिथि को दे दिया; तब वह अतिथि उस सज्जन महात्मा से प्रसन्न हो गया।
श्लोक 60 (14.92.60)
प्रीतात्मा स तु तं वाक्यमिदमाह द्विजर्षभम् । वाग्मी तदा द्विजश्रेष्ठो धर्मः पुरुषविग्रहः ॥
prītātmā sa tu taṃ vākyamidamāha dvijarṣabham | vāgmī tadā dvijaśreṣṭho dharmaḥ puruṣavigrahaḥ
प्रसन्न मन से उसने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण से यह बात कही। वह वाक्पटु, श्रेष्ठ ब्राह्मण स्वयं मनुष्य-रूप में धर्म था।
धर्म उवाच
श्लोक 61 (14.92.61)
शुद्धेन तव दानेन न्यायोपात्तेन धर्मतः । यथाशक्ति विसृष्टेन प्रीतोस्मि द्विजसत्तम ॥
śuddhena tava dānena nyāyopāttena dharmataḥ | yathāśakti visṛṣṭena prītosmi dvijasattama
"हे द्विजश्रेष्ठ, तुम्हारे शुद्ध, न्याय से प्राप्त, धर्मपूर्वक और सामर्थ्य के अनुसार दिए गए दान से मैं प्रसन्न हूँ।"
श्लोक 62 (14.92.62)
अहो दानं घुष्यते ते स्वर्गे स्वर्गनिवासिभिः । गगनात्पुष्पवर्षं च पश्येदं पतितं भुवि ॥
aho dānaṃ ghuṣyate te svarge svarganivāsibhiḥ | gaganātpuṣpavarṣaṃ ca paśyedaṃ patitaṃ bhuvi
"अहा! स्वर्ग में रहने वाले लोग स्वर्ग में तुम्हारे दान की घोषणा कर रहे हैं। देखो, आकाश से पृथ्वी पर यह पुष्पवर्षा गिरी है।"
श्लोक 63 (14.92.63)
सुरर्षिदेवगन्धर्वा ये च देवपुरःसराः । स्तुवन्तो देवदूताश्च स्थिता दानेन विस्मिताः ॥
surarṣidevagandharvā ye ca devapuraḥsarāḥ | stuvanto devadūtāśca sthitā dānena vismitāḥ
"देवर्षि, देवता, गन्धर्व, देवताओं के अग्रगामी और देवदूत, सब तुम्हारी स्तुति करते हुए तुम्हारे दान से विस्मित खड़े हैं।"
श्लोक 64 (14.92.64)
ब्रह्मर्षयो विमानस्था ब्रह्मलोकचराश्च ये । काङ्क्षन्ते दर्शनं तुभ्यं दिवं व्रज द्विजर्षभ ॥
brahmarṣayo vimānasthā brahmalokacarāśca ye | kāṅkṣante darśanaṃ tubhyaṃ divaṃ vraja dvijarṣabha
"विमानों में बैठे ब्रह्मर्षि और ब्रह्मलोक में विचरने वाले तुम्हारे दर्शन की इच्छा कर रहे हैं। हे द्विजश्रेष्ठ, स्वर्ग को चलो।"
श्लोक 65 (14.92.65)
पितृलोकगताः सर्वे तारिताः पितरस्त्वया । अनागताश्च बहवः सुबहूनि युगान्युत ॥
pitṛlokagatāḥ sarve tāritāḥ pitarastvayā | anāgatāśca bahavaḥ subahūni yugānyuta
"पितृलोक में गए तुम्हारे सब पितर तुम्हारे द्वारा तर गए हैं, और जो अभी आए नहीं हैं, ऐसे बहुत-से पितर भी आने वाले अनेक युगों तक तर जाएँगे।"
श्लोक 66 (14.92.66)
ब्रह्मचर्येण दानेन यज्ञेन तपसा तथा । अगह्वरेण धर्मेण तस्माद्गच्छ दिवं द्विज ॥
brahmacaryeṇa dānena yajñena tapasā tathā | agahvareṇa dharmeṇa tasmādgaccha divaṃ dvija
"ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ, तप और निष्कपट धर्म के कारण, हे द्विज, तुम स्वर्ग को जाओ।"
श्लोक 67 (14.92.67)
श्रद्धया परया यस्त्वं तपश्चरसि सुव्रत । तस्माद्देवास्तवानेन प्रीता ब्राह्मणसत्तम ॥
śraddhayā parayā yastvaṃ tapaścarasi suvrata | tasmāddevāstavānena prītā brāhmaṇasattama
"हे सुव्रत, तुम परम श्रद्धा से तप करते हो, इसलिए हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, देवता तुम्हारे इस आचरण से प्रसन्न हैं।"
श्लोक 68 (14.92.68)
सर्वमेतद्धि यस्मात्ते दत्तं शुद्धेन चेतसा । कृच्छ्रकाले ततः स्वर्गो विजितः कर्मणा त्वया ॥
sarvametaddhi yasmātte dattaṃ śuddhena cetasā | kṛcchrakāle tataḥ svargo vijitaḥ karmaṇā tvayā
"क्योंकि तुमने संकट के समय यह सब शुद्ध चित्त से दे दिया, इसलिए तुमने अपने कर्म से स्वर्ग जीत लिया है।"
श्लोक 69 (14.92.69)
क्षुधा निर्णुदति प्रज्ञां धर्मबुद्धिं व्यपोहति । क्षुधापरिगतज्ञानो धृतिं त्यजति चैव ह ॥
kṣudhā nirṇudati prajñāṃ dharmabuddhiṃ vyapohati | kṣudhāparigatajñāno dhṛtiṃ tyajati caiva ha
"भूख बुद्धि को हर लेती है, धर्म-बुद्धि को दूर कर देती है; जिसका ज्ञान भूख से घिर गया हो, वह धैर्य भी छोड़ देता है।"
श्लोक 70 (14.92.70)
बुभुक्षां जयते यस्तु स स्वर्गं जयते ध्रुवम् । यदा दानरुचिः स्याद्वै तदा धर्मो न सीदति ॥
bubhukṣāṃ jayate yastu sa svargaṃ jayate dhruvam | yadā dānaruciḥ syādvai tadā dharmo na sīdati
"जो भूख को जीत लेता है, वह निश्चय ही स्वर्ग को जीत लेता है। जब मन में दान की रुचि हो, तब धर्म क्षीण नहीं होता।"
श्लोक 71 (14.92.71)
अनवेक्ष्य सुतस्नेहं कलत्रस्नेहमेव च । धर्ममेव गुरुं ज्ञात्वा तृष्णा न गणिता त्वया ॥
anavekṣya sutasnehaṃ kalatrasnehameva ca | dharmameva guruṃ jñātvā tṛṣṇā na gaṇitā tvayā
"पुत्र के स्नेह और पत्नी के स्नेह की उपेक्षा करके, धर्म को ही गुरु मानकर तुमने तृष्णा को कोई महत्त्व नहीं दिया।"
श्लोक 72 (14.92.72)
द्रव्यागमो नृणां सूक्ष्मः पात्रे दानं ततः परम् । कालः परतरो दानाच्छ्रद्धा चैव ततः परा ॥
dravyāgamo nṛṇāṃ sūkṣmaḥ pātre dānaṃ tataḥ param | kālaḥ parataro dānācchraddhā caiva tataḥ parā
"मनुष्यों के लिए धन का आना सूक्ष्म बात है; उससे ऊपर सत्पात्र को दान देना है; दान से भी ऊपर उचित काल है, और उससे भी ऊपर श्रद्धा है।"
श्लोक 73 (14.92.73)
स्वर्गद्वारं सुसूक्ष्मं हि नरैर्मोहान्न दृश्यते । स्वर्गार्गलं लोभकीलं रागगुप्तं दुरासदम् ॥
svargadvāraṃ susūkṣmaṃ hi narairmohānna dṛśyate | svargārgalaṃ lobhakīlaṃ rāgaguptaṃ durāsadam
"स्वर्ग का द्वार अत्यन्त सूक्ष्म है; मोह के कारण मनुष्य उसे नहीं देख पाते। वह स्वर्ग की अर्गला है, लोभ की कील से जड़ा, राग से रक्षित और पहुँचने में कठिन है।"
श्लोक 74 (14.92.74)
तं तु पश्यन्ति पुरुषा जितक्रोधा जितेन्द्रियाः । ब्राह्मणास्तपसा युक्ता यथाशक्ति प्रदायिनः ॥
taṃ tu paśyanti puruṣā jitakrodhā jitendriyāḥ | brāhmaṇāstapasā yuktā yathāśakti pradāyinaḥ
"उसे वही लोग देखते हैं जिन्होंने क्रोध और इन्द्रियों को जीत लिया है, अर्थात् तप से युक्त वे ब्राह्मण जो अपनी शक्ति के अनुसार दान देते हैं।"
श्लोक 75 (14.92.75)
सहस्रशक्तिश्च शतं शतशक्तिर्दशापि च । दद्यादपश्च यः शक्त्या सर्वे तुल्यफलाः स्मृताः ॥
sahasraśaktiśca śataṃ śataśaktirdaśāpi ca | dadyādapaśca yaḥ śaktyā sarve tulyaphalāḥ smṛtāḥ
"जिसमें हज़ार देने की शक्ति है, जिसमें सौ देने की शक्ति है, जिसमें दस देने की शक्ति है, और जो सामर्थ्य भर केवल जल देता है, वे सब समान फल वाले माने गए हैं।"
श्लोक 76 (14.92.76)
रन्तिदेवो हि नृपतिरपः प्रादादकिंचनः । शुद्धेन मनसा विप्र नाकपृष्ठं ततो गतः ॥
rantidevo hi nṛpatirapaḥ prādādakiṃcanaḥ | śuddhena manasā vipra nākapṛṣṭhaṃ tato gataḥ
"राजा रन्तिदेव ने अकिंचन होते हुए भी शुद्ध मन से जल दान किया और उसी से स्वर्ग के शिखर पर पहुँचे।"
श्लोक 77 (14.92.77)
न धर्मः प्रीयते तात दानैर्दत्तैर्महाफलैः । न्यायलब्धैर्यथा सूक्ष्मैः श्रद्धापूतैः स तुष्यति ॥
na dharmaḥ prīyate tāta dānairdattairmahāphalaiḥ | nyāyalabdhairyathā sūkṣmaiḥ śraddhāpūtaiḥ sa tuṣyati
"हे तात, धर्म बड़े फल वाले बड़े दानों से प्रसन्न नहीं होता; वह न्याय से पाए हुए छोटे दानों से, जो श्रद्धा से पवित्र हों, प्रसन्न होता है।"
श्लोक 78 (14.92.78)
गोप्रदानसहस्राणि द्विजेभ्योऽदान्नृगो नृपः । एकां दत्त्वा स पारक्यां नरकं समपद्यत ॥
gopradānasahasrāṇi dvijebhyo'dānnṛgo nṛpaḥ | ekāṃ dattvā sa pārakyāṃ narakaṃ samapadyata
"राजा नृग ने ब्राह्मणों को हज़ारों गायें दीं, फिर भी दूसरे की एक गाय दे देने से वे नरक में गिरे।"
श्लोक 79 (14.92.79)
आत्ममांसप्रदानेन शिबिरौशीनरो नृपः । प्राप्य पुण्यकृताँल्लोकान्मोदते दिवि सुव्रतः ॥
ātmamāṃsapradānena śibirauśīnaro nṛpaḥ | prāpya puṇyakṛtām̐llokānmodate divi suvrataḥ
"उशीनर-पुत्र राजा शिबि ने अपना मांस दान किया; वे पुण्यात्माओं के लोकों को पाकर दृढ़ व्रत वाले होकर स्वर्ग में आनन्द करते हैं।"
श्लोक 80 (14.92.80)
विभवेन नृणां पुण्यं यच्छक्त्या स्वार्जितं न तत् । न यज्ञैर्विविधैर्विप्र यथान्यायेन संचितैः ॥
vibhavena nṛṇāṃ puṇyaṃ yacchaktyā svārjitaṃ na tat | na yajñairvividhairvipra yathānyāyena saṃcitaiḥ
"धन से मनुष्यों को जो पुण्य मिलता है, वह अपने सामर्थ्य से, स्वयं कमाए हुए धन में से, दिए जाने पर ही मिलता है। हे विप्र, नाना प्रकार के यज्ञों से, चाहे वे विधिपूर्वक जुटाई सामग्री से किए गए हों, वह उसी रूप में नहीं मिलता।"
श्लोक 81 (14.92.81)
क्रोधाद्दानफलं हन्ति लोभात्स्वर्गं न गच्छति । न्यायवृत्तिर्हि तपसा दानवित्स्वर्गमश्नुते ॥
krodhāddānaphalaṃ hanti lobhātsvargaṃ na gacchati | nyāyavṛttirhi tapasā dānavitsvargamaśnute
"क्रोध दान के फल को नष्ट कर देता है और लोभ से मनुष्य स्वर्ग नहीं जाता। जो न्यायपूर्वक जीविका चलाता है और दान का मर्म जानता है, वह तप के साथ स्वर्ग पाता है।"
श्लोक 82 (14.92.82)
न राजसूयैर्बहुभिरिष्ट्वा विपुलदक्षिणैः । न चाश्वमेधैर्बहुभिः फलं सममिदं तव ॥
na rājasūyairbahubhiriṣṭvā vipuladakṣiṇaiḥ | na cāśvamedhairbahubhiḥ phalaṃ samamidaṃ tava
"बहुत-से राजसूय यज्ञ करके, भारी दक्षिणाओं के साथ भी, और बहुत-से अश्वमेध करके भी, तुम्हारे इस दान के समान फल नहीं मिलता।"
श्लोक 83 (14.92.83)
सक्तुप्रस्थेन विजितो ब्रह्मलोकस्त्वयाऽक्षयः । विरजो ब्रह्मसदनं गच्छ विप्र यथासुखम् ॥
saktuprasthena vijito brahmalokastvayā'kṣayaḥ | virajo brahmasadanaṃ gaccha vipra yathāsukham
"एक प्रस्थ सत्तू से तुमने अक्षय ब्रह्मलोक जीत लिया है। हे विप्र, जैसी इच्छा हो, उस निर्मल ब्रह्मभवन को जाओ।"
श्लोक 84 (14.92.84)
सर्वेषां वो द्विजश्रेष्ठ दिव्यं यानमुपस्थितम् । आरोहत यथाकामं धर्मोस्मि द्विज पश्य माम् ॥
sarveṣāṃ vo dvijaśreṣṭha divyaṃ yānamupasthitam | ārohata yathākāmaṃ dharmosmi dvija paśya mām
"हे द्विजश्रेष्ठ, तुम सबके लिए दिव्य रथ आ गया है। इच्छानुसार उस पर चढ़ो। हे द्विज, मैं धर्म हूँ, मुझे देखो।"
श्लोक 85 (14.92.85)
बाधितो हि त्वया देहो लोके कीर्तिः स्थिरा च ते । सभार्यः सहपुत्रश्च सस्नुषश्च दिवं व्रज ॥
bādhito hi tvayā deho loke kīrtiḥ sthirā ca te | sabhāryaḥ sahaputraśca sasnuṣaśca divaṃ vraja
"तुमने अपने शरीर को तपाया है और लोक में तुम्हारी कीर्ति स्थिर है। पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू के साथ स्वर्ग को जाओ।"
नकुल उवाच
श्लोक 86 (14.92.86)
इत्युक्तवाक्ये धर्मे तु यानमारुद्य स द्विजः । सदारः ससुतश्चैव सस्नुषश्च दिवं गतः ॥
ityuktavākye dharme tu yānamārudya sa dvijaḥ | sadāraḥ sasutaścaiva sasnuṣaśca divaṃ gataḥ
धर्म के यों कहने पर वह ब्राह्मण रथ पर चढ़कर पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू के साथ स्वर्ग चला गया।
श्लोक 87 (14.92.87)
तस्मिन्विप्रे गते स्वर्गं ससुते सस्नुषे तदा । भार्याचतुर्थे धर्मज्ञे ततोऽहं निःसृतो बिलात् ॥
tasminvipre gate svargaṃ sasute sasnuṣe tadā | bhāryācaturthe dharmajñe tato'haṃ niḥsṛto bilāt
हे धर्म के जानने वालो, जब वह ब्राह्मण पुत्र और पुत्रवधू के साथ, अपनी पत्नी को चौथा लेकर, स्वर्ग चला गया, तब मैं बिल से बाहर निकला।
श्लोक 88 (14.92.88)
ततस्तु सक्तुगन्धेन क्लेदेन सलिलस्य च । दिव्यपुष्पविमर्दाच्च साधोर्दानलवैश्च तैः ॥
tatastu saktugandhena kledena salilasya ca | divyapuṣpavimardācca sādhordānalavaiśca taiḥ
तब सत्तू की गन्ध से, जल की नमी से, दिव्य फूलों के कुचले जाने से और उस सज्जन के दान के बिखरे कणों से,
श्लोक 89 (14.92.89)
विप्रस्य तपसा तस्य शिरो मे काञ्चनीकृतम् । तस्य सत्याभिसन्धस्य सक्तुदानेन चैव ह ॥
viprasya tapasā tasya śiro me kāñcanīkṛtam | tasya satyābhisandhasya saktudānena caiva ha
उस ब्राह्मण के तप से मेरा सिर सोने का हो गया, और उस सत्य-संकल्प वाले पुरुष के सत्तू-दान से भी।
श्लोक 90 (14.92.90)
शरीरार्धं च मे विप्राः शातकुंभमयं कृतम् । पश्यतेमं सुविपुलं तपसा तस्य धीमतः ॥
śarīrārdhaṃ ca me viprāḥ śātakuṃbhamayaṃ kṛtam | paśyatemaṃ suvipulaṃ tapasā tasya dhīmataḥ
हे ब्राह्मणो, मेरा आधा शरीर भी स्वर्णमय हो गया। उस बुद्धिमान के तप से हुए इस विशाल अंग को देखिए।
श्लोक 91 (14.92.91)
कथमेवंविधं स्याद्वै पार्श्वमन्यदिति द्विजाः । तपोवनानि यज्ञांश्च हृष्टोऽभ्येमि पुनः पुनः ॥
kathamevaṃvidhaṃ syādvai pārśvamanyaditi dvijāḥ | tapovanāni yajñāṃśca hṛṣṭo'bhyemi punaḥ punaḥ
हे ब्राह्मणो, "मेरा दूसरा पार्श्व भी ऐसा कैसे हो जाए?" यह सोचकर मैं प्रसन्न मन से बार-बार तपोवनों और यज्ञों में जाता हूँ।
श्लोक 92 (14.92.92)
यज्ञं त्वहमिमं श्रुत्वा कुरुराजस्य धीमतः । आशया परया प्राप्तो न चाहं काञ्चनीकृतः ॥
yajñaṃ tvahamimaṃ śrutvā kururājasya dhīmataḥ | āśayā parayā prāpto na cāhaṃ kāñcanīkṛtaḥ
कुरुराज के इस यज्ञ के विषय में सुनकर मैं बड़ी आशा से यहाँ आया, पर मैं सोने का नहीं हुआ।
श्लोक 93 (14.92.93)
ततो मयोक्तं तद्वाक्यं प्रहस्य ब्राह्मणर्षभाः । सक्तुप्रस्थेन यज्ञोऽयं संमितो नेति सर्वथा ॥
tato mayoktaṃ tadvākyaṃ prahasya brāhmaṇarṣabhāḥ | saktuprasthena yajño'yaṃ saṃmito neti sarvathā
तब हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, मैंने हँसकर वह बात कही कि "यह यज्ञ एक प्रस्थ सत्तू के बराबर किसी भी प्रकार नहीं है।"
श्लोक 94 (14.92.94)
सक्तुप्रस्थलवैस्तैर्हि तदाऽहं काञ्चनीकृतः । न हि यज्ञो महानेष सदृशस्तैर्मतो मम ॥
saktuprasthalavaistairhi tadā'haṃ kāñcanīkṛtaḥ | na hi yajño mahāneṣa sadṛśastairmato mama
"उस प्रस्थ भर सत्तू के केवल कणों से ही मैं तब सोने का हो गया था। मेरी दृष्टि में यह महान यज्ञ उनके बराबर नहीं है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 95 (14.92.95)
इत्युक्त्वा नकुलः सर्वान्यज्ञे द्विजवरांस्तदा । जगामादर्शनं तेषां विप्रास्ते च ययुर्गृहान् ॥
ityuktvā nakulaḥ sarvānyajñe dvijavarāṃstadā | jagāmādarśanaṃ teṣāṃ viprāste ca yayurgṛhān
यह कहकर वह नेवला यज्ञ में उपस्थित उन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणों की आँखों से ओझल हो गया और वे ब्राह्मण अपने-अपने घर चले गए।
श्लोक 96 (14.92.96)
एतत्ते सर्वमाख्यातं मया परपुरंजय । यदाश्चर्यमभूत्तत्र वाजिमेधे महाक्रतौ ॥
etatte sarvamākhyātaṃ mayā parapuraṃjaya | yadāścaryamabhūttatra vājimedhe mahākratau
"हे शत्रु-नगरों को जीतने वाले, उस महान अश्वमेध यज्ञ में जो आश्चर्य हुआ था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया।"
श्लोक 97 (14.92.97)
न विस्मयस्ते नृपते यज्ञे कार्यः कथञ्चन । ऋषिकोटिसहस्राणि तपोभिर्ये दिवं गताः ॥
na vismayaste nṛpate yajñe kāryaḥ kathañcana | ṛṣikoṭisahasrāṇi tapobhirye divaṃ gatāḥ
"हे राजन्, तुम्हें इस यज्ञ के विषय में किसी प्रकार विस्मय नहीं करना चाहिए; हज़ारों करोड़ ऋषि तप के बल से स्वर्ग गए हैं।"
श्लोक 98 (14.92.98)
अद्रोहः सर्वभूतेषु संतोषः शीलमार्जवम् । तपो दमश्च सत्यं च प्रदानं चेति संमितम् ॥
adrohaḥ sarvabhūteṣu saṃtoṣaḥ śīlamārjavam | tapo damaśca satyaṃ ca pradānaṃ ceti saṃmitam
"सब प्राणियों से अद्रोह, सन्तोष, शील, सरलता, तप, दम, सत्य और दान, ये सब बराबर माने गए हैं।"