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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 102

भूमि, कन्या, स्वर्ण, तिल और गोदान का फल

कृष्ण युधिष्ठिर को सुपात्र ब्राह्मणों को दिए गए दानों का फल बताते हैं। निर्धन और विद्वान् ब्राह्मण को भूमि का दान सबसे बड़ा है, उसका पुण्य कभी क्षीण नहीं होता, और दी हुई भूमि को वापस लेने से भयंकर नरक मिलते हैं; गोकर्ण नामक माप भी समझाया जाता है। फिर वे कन्यादान, सोने, चाँदी, तिल के पर्वत, तिलधेनु और दुधारू गाय के दान के फल बताते हैं, और अन्त में उन ब्राह्मणों का वर्णन करते हैं जो सुपात्र हैं और दूसरों को तार सकते हैं।

अध्याय 101अध्याय-सूचीअध्याय 103

भगवानुवाच

श्लोक 1 (14.102.1)

अतः परं प्रवक्ष्यामि भूमिदानमनुत्तमम् ॥

ataḥ paraṃ pravakṣyāmi bhūmidānamanuttamam

अब मैं भूमिदान का वर्णन करूँगा, जो सब दानों में सर्वोत्तम है।

श्लोक 2 (14.102.2)

यः प्रयच्छति विप्राय भूमिं रम्यां सदक्षिणाम् । श्रोत्रियाय दरिद्राय साग्निहोत्राय पाण्डव ॥

yaḥ prayacchati viprāya bhūmiṃ ramyāṃ sadakṣiṇām | śrotriyāya daridrāya sāgnihotrāya pāṇḍava

हे पाण्डव, जो मनुष्य वेदों के ज्ञाता, निर्धन और अग्निहोत्र करने वाले ब्राह्मण को दक्षिणा सहित सुन्दर भूमि दान करता है,

श्लोक 3 (14.102.3)

स सर्वकामतृप्तात्मा सर्वरत्नविभूषितः । सर्वपापविनिर्मुक्तो दीप्यमानोऽर्कवत्सदा ॥

sa sarvakāmatṛptātmā sarvaratnavibhūṣitaḥ | sarvapāpavinirmukto dīpyamāno'rkavatsadā

वह सब कामनाओं से तृप्त, सब रत्नों से विभूषित, सब पापों से मुक्त और सूर्य के समान सदा देदीप्यमान होता है।

श्लोक 4 (14.102.4)

बालसूर्यप्रकाशेन विचित्रध्वजशोभिना । याति यानेन दिव्येन मम लोकं महायशाः ॥

bālasūryaprakāśena vicitradhvajaśobhinā | yāti yānena divyena mama lokaṃ mahāyaśāḥ

वह महायशस्वी बाल सूर्य के समान प्रकाशमान और रंग-बिरंगी ध्वजाओं से सुशोभित दिव्य विमान में बैठकर मेरे लोक को जाता है।

श्लोक 5 (14.102.5)

तत्र दिव्याङ्गनाभिस्तु सेव्यमानो यथासुखम् । कामगः कामरूपी च क्रीडत्यप्सरसांगणैः ॥

tatra divyāṅganābhistu sevyamāno yathāsukham | kāmagaḥ kāmarūpī ca krīḍatyapsarasāṃgaṇaiḥ

वहाँ दिव्य अप्सराओं से सुखपूर्वक सेवित होकर वह इच्छानुसार गमन करने वाला और इच्छानुसार रूप धारण करने वाला बनकर अप्सराओं के समूहों के साथ क्रीड़ा करता है।

श्लोक 6 (14.102.6)

यावद्बिभर्ति लोकान्वै भूमिः कुरुकुलोद्वह । तावद्भूमिप्रदः काले मम लोके महीयते ॥

yāvadbibharti lokānvai bhūmiḥ kurukulodvaha | tāvadbhūmipradaḥ kāle mama loke mahīyate

हे कुरुकुल को धारण करने वाले, जब तक पृथ्वी लोकों को धारण करती है, तब तक भूमिदाता मेरे लोक में सम्मान पाता है।

श्लोक 7 (14.102.7)

न हि भूमिप्रदानाद्वै दानमन्यद्विशिष्यते । न चापि भूमिहरणात्पापमान्यद्विशिष्यते ॥

na hi bhūmipradānādvai dānamanyadviśiṣyate | na cāpi bhūmiharaṇātpāpamānyadviśiṣyate

भूमिदान से बढ़कर कोई दान नहीं है, और भूमि छीनने से बढ़कर कोई पाप नहीं है।

श्लोक 8 (14.102.8)

दानान्यन्यानि हीयन्ते कालेन कुरुपुङ्गव । भूमिदानस्य पुण्यस्य क्षयो नैवोपपद्यते ॥

dānānyanyāni hīyante kālena kurupuṅgava | bhūmidānasya puṇyasya kṣayo naivopapadyate

हे कुरुश्रेष्ठ, अन्य दान समय के साथ क्षीण हो जाते हैं, परन्तु भूमिदान के पुण्य का कभी क्षय नहीं होता।

श्लोक 9 (14.102.9)

ब्राह्मणाय दरिद्राय भूमिं दत्तां तु यो नरः । न हिंसति नरव्याघ्र तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

brāhmaṇāya daridrāya bhūmiṃ dattāṃ tu yo naraḥ | na hiṃsati naravyāghra tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

हे नरव्याघ्र, जो मनुष्य निर्धन ब्राह्मण को दी हुई भूमि को फिर नहीं छीनता, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 10 (14.102.10)

सप्तद्वीपसमुद्रान्ता रत्नसंचयसंकुला । सशैलवनदुर्गाढ्या तेन दत्ता मही भवेत् ॥

saptadvīpasamudrāntā ratnasaṃcayasaṃkulā | saśailavanadurgāḍhyā tena dattā mahī bhavet

उसके द्वारा मानो सात द्वीपों और समुद्रों तक फैली, रत्नों के ढेरों से भरी, पर्वतों, वनों और दुर्गों से सम्पन्न पूरी पृथ्वी दान कर दी गई होती है।

श्लोक 11 (14.102.11)

भूमिं दृष्ट्वा दीयमानां श्रोत्रियायाग्निहोत्रिणे । सर्वभूतानि मन्यन्ते मां ददातीति हर्षवत् ॥

bhūmiṃ dṛṣṭvā dīyamānāṃ śrotriyāyāgnihotriṇe | sarvabhūtāni manyante māṃ dadātīti harṣavat

अग्निहोत्री श्रोत्रिय को भूमि दी जाती देखकर सब प्राणी हर्षित होकर समझते हैं कि 'यह मुझे दे रहा है।'

श्लोक 12 (14.102.12)

सुवर्णमणिरत्नानि धनानि च वसूनि च । सर्वदानानि वै राजन्ददाति वसुधां ददत् ॥

suvarṇamaṇiratnāni dhanāni ca vasūni ca | sarvadānāni vai rājandadāti vasudhāṃ dadat

हे राजन्, पृथ्वी का दान करने वाला सभी दान देता है, अर्थात् सोना, मणियाँ, रत्न, धन और निधियाँ।

श्लोक 13 (14.102.13)

सागरान्सरितः शैलान्समानि विषमाणि च । सर्वगन्धरसांश्चैव ददाति वसुधां ददत् ॥

sāgarānsaritaḥ śailānsamāni viṣamāṇi ca | sarvagandharasāṃścaiva dadāti vasudhāṃ dadat

समुद्र, नदियाँ और पर्वत, समतल और ऊबड़-खाबड़ भूमि, तथा सब गन्ध और रस, पृथ्वी का दान करने वाला इन सबको देता है।

श्लोक 14 (14.102.14)

ओषधीः फलसंपन्ना नानापुष्पसमन्विताः । कमलोत्पलषण्डांश्च ददाति वसुधां ददत् ॥

oṣadhīḥ phalasaṃpannā nānāpuṣpasamanvitāḥ | kamalotpalaṣaṇḍāṃśca dadāti vasudhāṃ dadat

फलों से लदी और नाना पुष्पों से भरी ओषधियाँ तथा कमलों और कुमुदों के समूह, पृथ्वी का दान करने वाला इन सबको देता है।

श्लोक 15 (14.102.15)

धर्मं कामं तथा चार्थं वेदान्यज्ञांस्तथैव च । स्वर्गमार्गगतिं चैव ददाति वसुधां ददत् ॥

dharmaṃ kāmaṃ tathā cārthaṃ vedānyajñāṃstathaiva ca | svargamārgagatiṃ caiva dadāti vasudhāṃ dadat

धर्म, काम और अर्थ, वेद और यज्ञ, तथा स्वर्ग का मार्ग और गति, पृथ्वी का दान करने वाला इन सबको देता है।

श्लोक 16 (14.102.16)

अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्ये यजन्ते सदक्षिणैः । न तत्फलं लभन्ते ते भूमिदानस्य यत्फलम् ॥

agniṣṭomādibhiryajñairye yajante sadakṣiṇaiḥ | na tatphalaṃ labhante te bhūmidānasya yatphalam

जो लोग दक्षिणा सहित अग्निष्टोम आदि यज्ञों से यजन करते हैं, उन्हें वह फल नहीं मिलता जो भूमिदान का फल है।

श्लोक 17 (14.102.17)

श्रोत्रियाय महीं दत्त्वा यो न हिंसति पाण्डव । तद्दानं कथयिष्यन्ति यावल्लोकाः प्रतिष्ठिताः । तावत्स्वर्गोपभोगानां भोक्तारः पाण्डुनन्दन ॥

śrotriyāya mahīṃ dattvā yo na hiṃsati pāṇḍava | taddānaṃ kathayiṣyanti yāvallokāḥ pratiṣṭhitāḥ | tāvatsvargopabhogānāṃ bhoktāraḥ pāṇḍunandana

हे पाण्डव, जो श्रोत्रिय को भूमि देकर उसे नहीं छीनता, उस दान की चर्चा लोग तब तक करेंगे जब तक लोक प्रतिष्ठित हैं; और हे पाण्डुनन्दन, तब तक वे स्वर्ग के भोगों के भोक्ता होंगे।

श्लोक 18 (14.102.18)

सस्यपूर्णां महीं यस्तु श्रोत्रियाय प्रयच्छति । पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदाभूतसंप्लुवम् ॥

sasyapūrṇāṃ mahīṃ yastu śrotriyāya prayacchati | pitarastasya tṛpyanti yāvadābhūtasaṃpluvam

जो फसल से भरी भूमि श्रोत्रिय को देता है, उसके पितर प्राणियों के महाप्रलय तक तृप्त रहते हैं।

श्लोक 19 (14.102.19)

मम रुद्रस्य सवितुस्त्रिदशानां तथैव च । प्रीतये विद्धि राजेन्द्र भूमिर्दत्ता द्विजाय वै ॥

mama rudrasya savitustridaśānāṃ tathaiva ca | prītaye viddhi rājendra bhūmirdattā dvijāya vai

हे राजेन्द्र, जान लो कि ब्राह्मण को दी गई भूमि मेरी, रुद्र की, सविता की और देवताओं की प्रसन्नता के लिए दी जाती है।

श्लोक 20 (14.102.20)

तेन पुण्येन पूतात्मा दाता भूमेर्युधिष्ठिर । मम सालोक्यमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥

tena puṇyena pūtātmā dātā bhūmeryudhiṣṭhira | mama sālokyamāpnoti nātra kāryā vicāraṇā

हे युधिष्ठिर, उस पुण्य से शुद्ध हुआ भूमिदाता मेरा सालोक्य प्राप्त करता है; इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 21 (14.102.21)

यत्किंचित्कुरुते पापं पुरुषो वृत्तिकर्शितः । स च गोकर्णमात्रेण भूमिदानेन शुध्यति ॥

yatkiṃcitkurute pāpaṃ puruṣo vṛttikarśitaḥ | sa ca gokarṇamātreṇa bhūmidānena śudhyati

जीविका के कष्ट से क्षीण हुआ मनुष्य जो कुछ पाप करता है, वह गोकर्ण-मात्र भूमि के दान से भी शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 22 (14.102.22)

मासोपवासे यत्पुण्यं कृच्छ्रे चान्द्रायणेऽपि च । भूमिगोकर्णमात्रेण तत्पुण्यं तु विधीयते ॥

māsopavāse yatpuṇyaṃ kṛcchre cāndrāyaṇe'pi ca | bhūmigokarṇamātreṇa tatpuṇyaṃ tu vidhīyate

मास भर के उपवास, कृच्छ्र और चान्द्रायण व्रत में जो पुण्य होता है, वही पुण्य गोकर्ण-मात्र भूमि के दान से निश्चित है।

श्लोक 23 (14.102.23)

सर्वतीर्थाभिषेके च यत्पुण्यं समुदाहृतम् । भूमिगोकर्णमात्रेण तत्पुण्यं तु विधीयते ॥

sarvatīrthābhiṣeke ca yatpuṇyaṃ samudāhṛtam | bhūmigokarṇamātreṇa tatpuṇyaṃ tu vidhīyate

सब तीर्थों में स्नान करने का जो पुण्य बताया गया है, वही पुण्य गोकर्ण-मात्र भूमि के दान से निश्चित है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 24 (14.102.24)

देवदेव नमस्तेऽस्तु वासुदेव सुरेश्वर । गोकर्णस्य प्रमाणं वै वक्तुमर्हसि तत्वतः ॥

devadeva namaste'stu vāsudeva sureśvara | gokarṇasya pramāṇaṃ vai vaktumarhasi tatvataḥ

हे देवदेव वासुदेव, सुरेश्वर, आपको नमस्कार है। आप मुझे गोकर्ण का प्रमाण यथार्थ रूप से बताने की कृपा करें।

भगवानुवाच

श्लोक 25 (14.102.25)

शृणु गोकर्णमात्रस्य प्रमाणं पाण्डुनन्दन । त्रिंशद्दण्डप्रमाणेन प्रमितं सर्वतो दिशम् ॥

śṛṇu gokarṇamātrasya pramāṇaṃ pāṇḍunandana | triṃśaddaṇḍapramāṇena pramitaṃ sarvato diśam

हे पाण्डुनन्दन, गोकर्ण का प्रमाण सुनो: वह सब दिशाओं में तीस दण्ड के माप का होता है।

श्लोक 26 (14.102.26)

प्रत्यक्प्रागपि राजेन्द्र तत्तथा दक्षिणोत्तरम् । गोकर्णं तद्विदः प्राहुः प्रमाणं धरणेर्नृप ॥

pratyakprāgapi rājendra tattathā dakṣiṇottaram | gokarṇaṃ tadvidaḥ prāhuḥ pramāṇaṃ dharaṇernṛpa

हे राजेन्द्र, पश्चिम और पूर्व में भी, तथा दक्षिण और उत्तर में भी इतना ही; भूमि के इस माप को जानने वाले गोकर्ण कहते हैं, हे नृप।

श्लोक 27 (14.102.27)

सवृषं गोशतं यत्र सुखं तिष्ठत्ययन्त्रितम् । सवत्सं कुरुशार्दूल तच्च गोकर्णमुच्यते ॥

savṛṣaṃ gośataṃ yatra sukhaṃ tiṣṭhatyayantritam | savatsaṃ kuruśārdūla tacca gokarṇamucyate

हे कुरुशार्दूल, जहाँ बछड़ों और साँड़ सहित सौ गायें बिना रोक-टोक सुख से खड़ी रह सकें, वही गोकर्ण कहलाता है।

श्लोक 28 (14.102.28)

किंकरा मृत्युदण्डाश्च कुंभीपाकाश्च दारुणाः । घोराश्च वारुणाः पाशा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ॥

kiṃkarā mṛtyudaṇḍāśca kuṃbhīpākāśca dāruṇāḥ | ghorāśca vāruṇāḥ pāśā nopasarpanti bhūmidam

यम के दूत, मृत्यु के दण्ड, भयानक कुम्भीपाक नरक और वरुण के घोर पाश भूमिदाता के पास नहीं फटकते।

श्लोक 29 (14.102.29)

निरया रौरवाद्याश्च तथा वैतरणी नदी । तीव्राश्च यातनाः कृष्टा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ॥

nirayā rauravādyāśca tathā vaitaraṇī nadī | tīvrāśca yātanāḥ kṛṣṭā nopasarpanti bhūmidam

रौरव आदि नरक, वैतरणी नदी और तीव्र कष्टदायक यातनाएँ भूमिदाता के पास नहीं फटकतीं।

श्लोक 30 (14.102.30)

चित्रगुप्ताः कलिः कालः कृतान्तो मृत्युरेव च । यमश्च भगवान्साक्षात्पूजयन्ति महीप्रदम् ॥

citraguptāḥ kaliḥ kālaḥ kṛtānto mṛtyureva ca | yamaśca bhagavānsākṣātpūjayanti mahīpradam

चित्रगुप्त, कलि, काल, कृतान्त, मृत्यु और स्वयं भगवान् यम भी भूमिदाता की पूजा करते हैं।

श्लोक 31 (14.102.31)

रुद्रः प्रजापतिः शक्रः सुरा ऋषिगणास्तथा । अहं च प्रीतिमान्राजन्पूजयामो महीप्रदम् ॥

rudraḥ prajāpatiḥ śakraḥ surā ṛṣigaṇāstathā | ahaṃ ca prītimānrājanpūjayāmo mahīpradam

रुद्र, प्रजापति, इन्द्र, देवता और ऋषिगण, तथा हे राजन्, मैं भी प्रसन्न होकर भूमिदाता की पूजा करते हैं।

श्लोक 32 (14.102.32)

कृशभृत्यस्य कृशगोः कृशाश्वस्य कृतातिथेः । भूमिर्देया नरश्रेष्ठ स निधिः पारलौकिकः ॥

kṛśabhṛtyasya kṛśagoḥ kṛśāśvasya kṛtātitheḥ | bhūmirdeyā naraśreṣṭha sa nidhiḥ pāralaukikaḥ

हे नरश्रेष्ठ, जिसके सेवक थोड़े हैं, जिसकी गाय और घोड़ा दुर्बल हैं और जिसने अतिथियों का सत्कार किया है, उसे भूमि देनी चाहिए; वह परलोक की निधि है।

श्लोक 33 (14.102.33)

सीदमानकुटुंबाय श्रोत्रियायाग्निहोत्रिणे । व्रतस्थाय दरिद्राय भूमिर्देया नराधिप ॥

sīdamānakuṭuṃbāya śrotriyāyāgnihotriṇe | vratasthāya daridrāya bhūmirdeyā narādhipa

हे नराधिप, जिसका कुटुम्ब कष्ट पा रहा हो, ऐसे व्रतनिष्ठ, निर्धन, श्रोत्रिय और अग्निहोत्री ब्राह्मण को भूमि देनी चाहिए।

श्लोक 34 (14.102.34)

यथा हि धात्री क्षीरेण पुत्रं वर्धयति स्वयम् । दातारमनुगृह्णाति दत्ता ह्येवं वसुंधरा ॥

yathā hi dhātrī kṣīreṇa putraṃ vardhayati svayam | dātāramanugṛhṇāti dattā hyevaṃ vasuṃdharā

जैसे धाय अपने दूध से स्वयं बालक को पुष्ट करती है, वैसे ही दी हुई पृथ्वी दाता पर अनुग्रह करती है।

श्लोक 35 (14.102.35)

यथा बिभर्ति गौर्वत्सं सृजन्ती क्षीरमात्मनः । तथा सर्वगुणोपेता भूमिर्वहति भूमिदम् ॥

yathā bibharti gaurvatsaṃ sṛjantī kṣīramātmanaḥ | tathā sarvaguṇopetā bhūmirvahati bhūmidam

जैसे गाय अपना दूध देकर बछड़े का पोषण करती है, वैसे ही सब गुणों से युक्त पृथ्वी भूमिदाता का भरण करती है।

श्लोक 36 (14.102.36)

यथा बीजानि रोहन्ति जलसिक्तानि भूपते । तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदस्य दिनेदिने ॥

yathā bījāni rohanti jalasiktāni bhūpate | tathā kāmāḥ prarohanti bhūmidasya dinedine

हे भूपति, जैसे जल से सींचे हुए बीज अंकुरित होते हैं, वैसे ही भूमिदाता की कामनाएँ दिन-प्रतिदिन फलती-फूलती हैं।

श्लोक 37 (14.102.37)

यथा तेजस्तु सूर्यस्य तमः सर्वं व्यपोहति । तथा पापं नरस्येह भूमिदानं व्यपोहति ॥

yathā tejastu sūryasya tamaḥ sarvaṃ vyapohati | tathā pāpaṃ narasyeha bhūmidānaṃ vyapohati

जैसे सूर्य का तेज सारे अन्धकार को दूर कर देता है, वैसे ही भूमिदान मनुष्य के पाप को यहाँ दूर कर देता है।

श्लोक 38 (14.102.38)

दाता दशानुगृह्णाति यो हरेद्दश हन्ति च । अतीतान्यागतानीह कुलानि कुरुपुङ्गव ॥

dātā daśānugṛhṇāti yo hareddaśa hanti ca | atītānyāgatānīha kulāni kurupuṅgava

हे कुरुश्रेष्ठ, दाता दस पर अनुग्रह करता है और जो भूमि छीनता है वह दस का नाश करता है, अर्थात् बीते हुए और आने वाले कुलों का।

श्लोक 39 (14.102.39)

आश्रुत्य भूमिदानं तु दत्त्वा यो वा हरेत्पुनः । स बद्धो वारुणैः पाशैः क्षिप्यते पूयशोणिते ॥

āśrutya bhūmidānaṃ tu dattvā yo vā haretpunaḥ | sa baddho vāruṇaiḥ pāśaiḥ kṣipyate pūyaśoṇite

जो भूमिदान की प्रतिज्ञा करके या भूमि देकर फिर उसे वापस छीन लेता है, वह वरुण के पाशों से बँधकर मवाद और रक्त में फेंका जाता है।

श्लोक 40 (14.102.40)

स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरेत् वसुंधराम् । न तस्य नरकाद्धोराद्विद्यते निष्कृतिः क्वचित् ॥

svadattāṃ paradattāṃ vā yo haret vasuṃdharām | na tasya narakāddhorādvidyate niṣkṛtiḥ kvacit

जो अपनी दी हुई या दूसरे की दी हुई भूमि को छीनता है, उसका उस भयंकर नरक से कहीं कोई उद्धार नहीं होता।

श्लोक 41 (14.102.41)

ब्राह्मणस्य हृते क्षेत्रे हन्याद्द्वादश पूर्वजान् । स गच्छेत्कृमियोनिं च न च मुच्येत जातु सः ॥

brāhmaṇasya hṛte kṣetre hanyāddvādaśa pūrvajān | sa gacchetkṛmiyoniṃ ca na ca mucyeta jātu saḥ

ब्राह्मण का खेत छीन लिए जाने पर छीनने वाला अपने बारह पूर्वजों का नाश कर देता है; वह कीड़ों की योनि में जाता है और कभी मुक्त नहीं होता।

श्लोक 42 (14.102.42)

दत्त्वा भूमिं द्विजेन्द्राय यस्तामेवोपजीवति । गवां शतसहस्रस्य हन्तुः स लभते फलम् ॥

dattvā bhūmiṃ dvijendrāya yastāmevopajīvati | gavāṃ śatasahasrasya hantuḥ sa labhate phalam

जो श्रेष्ठ ब्राह्मण को भूमि देकर फिर उसी भूमि से अपनी जीविका चलाता है, वह एक लाख गायों के हत्यारे के फल को पाता है।

श्लोक 43 (14.102.43)

सोधश्शिरास्तु पापात्मा कुंभीपाकेषु पच्यते । दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु कुंभीपाकाद्विनिस्सृतः । इह लोके भवेत्स श्वा शतजन्मनि पाण्डव ॥

sodhaśśirāstu pāpātmā kuṃbhīpākeṣu pacyate | divyairvarṣasahasraistu kuṃbhīpākādvinissṛtaḥ | iha loke bhavetsa śvā śatajanmani pāṇḍava

वह पापात्मा सिर नीचे किए हुए कुम्भीपाक नरकों में पकाया जाता है; दिव्य हजारों वर्षों के बाद कुम्भीपाक से निकलकर वह इस लोक में सौ जन्मों तक कुत्ता होता है, हे पाण्डव।

श्लोक 44 (14.102.44)

दत्त्वा भूमिं द्विजेन्द्राणां यस्तामेवोपजीवति । स मूढो याति दुष्टात्मा नरकानेकविंशतिम् । नरकेभ्यो विनिर्मुक्तः शुनां योनिं स गच्छति ॥

dattvā bhūmiṃ dvijendrāṇāṃ yastāmevopajīvati | sa mūḍho yāti duṣṭātmā narakānekaviṃśatim | narakebhyo vinirmuktaḥ śunāṃ yoniṃ sa gacchati

जो श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भूमि देकर फिर उसी से जीविका चलाता है, वह मूढ़ दुष्टात्मा इक्कीस नरकों में जाता है; नरकों से छूटने पर वह कुत्तों की योनि में जाता है।

श्लोक 45 (14.102.45)

हलकृष्टा मही देया सबीजा सस्यमालिनी । अथवा सोदका देया दरिद्राय द्विजातये ॥

halakṛṣṭā mahī deyā sabījā sasyamālinī | athavā sodakā deyā daridrāya dvijātaye

हल से जोती हुई, बीज सहित और फसल से लहलहाती भूमि देनी चाहिए; अथवा निर्धन ब्राह्मण को जल सहित भूमि देनी चाहिए।

श्लोक 46 (14.102.46)

एवं दत्ता मही राजन्प्रहृष्टेनान्तरात्मना । सर्वान्कामानवाप्नोति मनसा चिन्तितानि च ॥

evaṃ dattā mahī rājanprahṛṣṭenāntarātmanā | sarvānkāmānavāpnoti manasā cintitāni ca

हे राजन्, इस प्रकार प्रसन्न मन से दी हुई भूमि दाता को सब कामनाएँ, यहाँ तक कि मन से सोची हुई कामनाएँ भी, प्राप्त करा देती है।

श्लोक 47 (14.102.47)

बहुभिर्वसुधा दत्ता दीयते च नराधिपैः । यस्य यस्य यदा भूमिस्तस्य तस्य तदा फलम् ॥

bahubhirvasudhā dattā dīyate ca narādhipaiḥ | yasya yasya yadā bhūmistasya tasya tadā phalam

पृथ्वी बहुत-से राजाओं ने दी है और अब भी दी जाती है; जिसकी भूमि जिस समय होती है, उसी को उस समय उसका फल मिलता है।

श्लोक 48 (14.102.48)

यः प्रयच्छति कन्यां वै सुरूपां श्रोत्रियाय वै । स ब्रह्मदेयो राजेन्द्र तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

yaḥ prayacchati kanyāṃ vai surūpāṃ śrotriyāya vai | sa brahmadeyo rājendra tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

हे राजेन्द्र, जो सुन्दर कन्या श्रोत्रिय को देता है, उसका वह दान ब्रह्मदेय है; उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 49 (14.102.49)

बलीवर्दसहस्राणां दत्तानां धुर्यवाहिनाम् । यत्पुण्यं लभते राजन्कन्यादानेन तत्फलम् ॥

balīvardasahasrāṇāṃ dattānāṃ dhuryavāhinām | yatpuṇyaṃ labhate rājankanyādānena tatphalam

हे राजन्, जुए का भार ढोने वाले हजार बैल दान करने से जो पुण्य मिलता है, वही फल कन्यादान से मिलता है।

श्लोक 50 (14.102.50)

गवां शतसहस्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम् । तत्फलं समवाप्नोति यः प्रयच्छति कन्यकाम् ॥

gavāṃ śatasahasrasya samyagdattasya yatphalam | tatphalaṃ samavāpnoti yaḥ prayacchati kanyakām

विधिपूर्वक दी गई एक लाख गायों का जो फल है, वही फल कन्या देने वाले को प्राप्त होता है।

श्लोक 51 (14.102.51)

यावन्ति चैव रोमाणि कन्यायाः कुरुपुङ्गव । तावद्वर्षसहस्राणि मम लोके महीयते ॥

yāvanti caiva romāṇi kanyāyāḥ kurupuṅgava | tāvadvarṣasahasrāṇi mama loke mahīyate

हे कुरुश्रेष्ठ, कन्या के शरीर में जितने रोम होते हैं, उतने हजार वर्षों तक वह मेरे लोक में सम्मान पाता है।

श्लोक 52 (14.102.52)

ततश्चापि च्युतः कालादिह लोके स जायते । षडङ्गविच्चतुर्वेदी सर्वलोकार्चितो द्विजः ॥

tataścāpi cyutaḥ kālādiha loke sa jāyate | ṣaḍaṅgaviccaturvedī sarvalokārcito dvijaḥ

फिर समय आने पर वहाँ से च्युत होकर वह इस लोक में छहों अंगों का ज्ञाता, चारों वेदों का पण्डित और सब लोकों से पूजित ब्राह्मण होकर जन्म लेता है।

श्लोक 53 (14.102.53)

यः सुवर्णं दरिद्राय ब्राह्मणाय प्रयच्छति । श्रोत्रियाय सुवृत्ताय बहुपुत्राय पाण्डव ॥

yaḥ suvarṇaṃ daridrāya brāhmaṇāya prayacchati | śrotriyāya suvṛttāya bahuputrāya pāṇḍava

हे पाण्डव, जो निर्धन, श्रोत्रिय, सदाचारी और बहुत पुत्रों वाले ब्राह्मण को सोना देता है,

श्लोक 54 (14.102.54)

स मुक्तः सर्वपापेभ्यो बालसूर्यसमप्रभः । विमानं दिव्यमारूढः कामगः कामभोगवान् । वर्षकोटिं महातेजा मम लोके महीयते ॥

sa muktaḥ sarvapāpebhyo bālasūryasamaprabhaḥ | vimānaṃ divyamārūḍhaḥ kāmagaḥ kāmabhogavān | varṣakoṭiṃ mahātejā mama loke mahīyate

वह सब पापों से मुक्त होकर बाल सूर्य के समान कान्तिमान हो जाता है; दिव्य विमान पर आरूढ़, इच्छानुसार गमन करने वाला और सब भोगों से युक्त वह महातेजस्वी एक करोड़ वर्षों तक मेरे लोक में सम्मान पाता है।

श्लोक 55 (14.102.55)

ततः कालावतीर्णश्च सोस्मिँल्लोके हि जायते । वेदवेदाङ्गविद्विप्रः कोटीधनपतिर्भवेत् ॥

tataḥ kālāvatīrṇaśca sosmim̐lloke hi jāyate | vedavedāṅgavidvipraḥ koṭīdhanapatirbhavet

फिर समय पूरा होने पर उतरकर वह इस लोक में वेद-वेदाङ्ग का ज्ञाता और करोड़ों के धन का स्वामी ब्राह्मण होकर जन्म लेता है।

श्लोक 56 (14.102.56)

यश्च रूप्यं प्रयच्छेद्वै दरिद्राय द्विजातये । कृशवृत्तेः कृशगवे स मुक्तः सर्वकिल्बिषैः ॥

yaśca rūpyaṃ prayacchedvai daridrāya dvijātaye | kṛśavṛtteḥ kṛśagave sa muktaḥ sarvakilbiṣaiḥ

और जो दुर्बल जीविका वाले तथा दुर्बल गाय वाले निर्धन ब्राह्मण को चाँदी देता है, वह सब दोषों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 57 (14.102.57)

पूर्णचन्द्रप्रकाशेन विमानेन विराजता । कामरूपी यथाकामं स्वर्गलोके महीयते ॥

pūrṇacandraprakāśena vimānena virājatā | kāmarūpī yathākāmaṃ svargaloke mahīyate

पूर्णचन्द्र के समान प्रकाशमान, शोभायमान विमान में इच्छानुसार रूप धारण करने वाला वह स्वर्गलोक में यथेच्छ सम्मान पाता है।

श्लोक 58 (14.102.58)

ततोऽवतीर्णः कालेन लोके चास्मिन्महायशाः । सर्वलोकार्चितः श्रीमान्राजा भवति वीर्यवान् ॥

tato'vatīrṇaḥ kālena loke cāsminmahāyaśāḥ | sarvalokārcitaḥ śrīmānrājā bhavati vīryavān

फिर समय आने पर इस लोक में उतरकर वह महायशस्वी, श्रीमान् और पराक्रमी राजा होता है, जो सब लोकों से पूजित होता है।

श्लोक 59 (14.102.59)

तिलपर्वतकं यस्तु श्रोत्रियाय प्रयच्छति । विशेषेण दरिद्राय तस्यापि शृणु यत्फलम् ॥

tilaparvatakaṃ yastu śrotriyāya prayacchati | viśeṣeṇa daridrāya tasyāpi śṛṇu yatphalam

जो श्रोत्रिय को, और विशेषकर निर्धन को, तिलों का पर्वत देता है, उसका भी फल सुनो।

श्लोक 60 (14.102.60)

पुण्यं वृषायुतोत्सर्गे यत्प्रोक्तं पाण्डुनन्दन । तत्पुण्यं समनुप्राप्य तत्क्षणाद्विरजा भवेत् ॥

puṇyaṃ vṛṣāyutotsarge yatproktaṃ pāṇḍunandana | tatpuṇyaṃ samanuprāpya tatkṣaṇādvirajā bhavet

हे पाण्डुनन्दन, दस हजार साँड़ छोड़ने में जो पुण्य बताया गया है, उस पुण्य को पाकर वह उसी क्षण निर्मल हो जाता है।

श्लोक 61 (14.102.61)

यथा त्वचं भुजङ्गो वै त्यक्त्वा शुद्धतनुर्भवेत् । तथा तिलप्रदानाद्वै पापं त्यक्त्वा विशुद्ध्यति ॥

yathā tvacaṃ bhujaṅgo vai tyaktvā śuddhatanurbhavet | tathā tilapradānādvai pāpaṃ tyaktvā viśuddhyati

जैसे साँप केंचुली छोड़कर शुद्ध शरीर वाला हो जाता है, वैसे ही तिलदान से मनुष्य पाप छोड़कर शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 62 (14.102.62)

तिलषण्डं प्रयुञ्जानो जांबूनदविभूषितम् । विमानं दिव्यमारूढः पितृलोके महीयते ॥

tilaṣaṇḍaṃ prayuñjāno jāṃbūnadavibhūṣitam | vimānaṃ divyamārūḍhaḥ pitṛloke mahīyate

जो सोने से सजा तिलों का ढेर देता है, वह दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर पितृलोक में सम्मान पाता है।

श्लोक 63 (14.102.63)

षष्टिं वर्षसहस्राणि कामरूपी महायशाः । तिलप्रदाता रमते पितृलोके यथासुखम् ॥

ṣaṣṭiṃ varṣasahasrāṇi kāmarūpī mahāyaśāḥ | tilapradātā ramate pitṛloke yathāsukham

साठ हजार वर्षों तक वह महायशस्वी तिलदाता इच्छानुसार रूप धारण करता हुआ पितृलोक में सुखपूर्वक रमण करता है।

श्लोक 64 (14.102.64)

यः प्रयच्छति विप्राय तिलधेनुं नराधिप । श्रोत्रियाय दरिद्राय शृणु तस्यापि यत्फलम् ॥

yaḥ prayacchati viprāya tiladhenuṃ narādhipa | śrotriyāya daridrāya śṛṇu tasyāpi yatphalam

हे नराधिप, जो निर्धन श्रोत्रिय ब्राह्मण को तिलधेनु देता है, उसका भी फल सुनो।

श्लोक 65 (14.102.65)

गोसहस्रप्रदानेन यत्पुण्यं समुदाहृतम् । तत्पुण्यफलमाप्नोति तिलधेनुप्रदो नरः ॥

gosahasrapradānena yatpuṇyaṃ samudāhṛtam | tatpuṇyaphalamāpnoti tiladhenuprado naraḥ

एक हजार गायों के दान से जो पुण्य बताया गया है, वही पुण्य और फल तिलधेनु देने वाला मनुष्य पाता है।

श्लोक 66 (14.102.66)

तिलानां कुडवैर्यस्तु तिलधेनुं प्रयच्छति । तावत्कोटिसमा राजन्स्वर्गलोके महीयते ॥

tilānāṃ kuḍavairyastu tiladhenuṃ prayacchati | tāvatkoṭisamā rājansvargaloke mahīyate

हे राजन्, जो कुडव-परिमाण तिलों से बनी तिलधेनु देता है, वह उतने ही करोड़ वर्षों तक स्वर्गलोक में सम्मान पाता है।

श्लोक 67 (14.102.67)

अष्टाढकतिलैः कृत्वा तिलधेनुं नराधिप । द्वात्रिंशन्निष्कसंयुक्तं विषुवे यः प्रयच्छति । मद्भक्त्या मद्गतात्मा वै तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

aṣṭāḍhakatilaiḥ kṛtvā tiladhenuṃ narādhipa | dvātriṃśanniṣkasaṃyuktaṃ viṣuve yaḥ prayacchati | madbhaktyā madgatātmā vai tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

हे नराधिप, जो विषुव के दिन आठ आढक तिलों से तिलधेनु बनाकर बत्तीस निष्कों सहित मेरी भक्ति से और मुझमें मन लगाकर देता है, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 68 (14.102.68)

कन्यादानसहस्रस्य विधिदत्तस्य यत्फलम् । तत्पुण्यं समनुप्राप्तो मम लोके महीयते ॥

kanyādānasahasrasya vidhidattasya yatphalam | tatpuṇyaṃ samanuprāpto mama loke mahīyate

विधिपूर्वक दिए गए हजार कन्यादानों का जो फल है, उस पुण्य को पाकर वह मेरे लोक में सम्मान पाता है।

श्लोक 69 (14.102.69)

मम लोकावतीर्णश्च सोस्मिँल्लोकेऽभिजायते । ऋग्यजुस्सामवेदानां पारगो ब्राह्मणर्षभः ॥

mama lokāvatīrṇaśca sosmim̐lloke'bhijāyate | ṛgyajussāmavedānāṃ pārago brāhmaṇarṣabhaḥ

मेरे लोक से उतरकर वह इस लोक में ऋग्, यजुः और साम वेदों का पारंगत श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर जन्म लेता है।

श्लोक 70 (14.102.70)

गां तु यस्तु दरिद्राय श्रोत्रियाय प्रयच्छति । प्रसन्नां क्षीरिणीं पुण्यां सवत्सां कांस्यदोहिनीं ॥

gāṃ tu yastu daridrāya śrotriyāya prayacchati | prasannāṃ kṣīriṇīṃ puṇyāṃ savatsāṃ kāṃsyadohinīṃ

जो निर्धन श्रोत्रिय को शान्त, दूध देने वाली, पवित्र, बछड़े सहित और काँसे की दोहनी वाली गाय देता है,

श्लोक 71 (14.102.71)

यत्किंचिद्दुष्कृतं कर्म तस्य पूर्वकृतं नृप । तत्सर्वं तत्क्षणादेव विनश्यति न संशयः ॥

yatkiṃcidduṣkṛtaṃ karma tasya pūrvakṛtaṃ nṛpa | tatsarvaṃ tatkṣaṇādeva vinaśyati na saṃśayaḥ

हे नृप, उसने पहले जो कुछ भी पाप-कर्म किया हो, वह सब उसी क्षण नष्ट हो जाता है; इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 72 (14.102.72)

यानं च वृषसंयुक्तं दीप्यमानं स्वलङ्कृतम् । आरूढः कामगं दिव्यं गोलोकमधिगच्छति ॥

yānaṃ ca vṛṣasaṃyuktaṃ dīpyamānaṃ svalaṅkṛtam | ārūḍhaḥ kāmagaṃ divyaṃ golokamadhigacchati

बैलों से जुते, चमकते हुए, भली-भाँति सजे और इच्छानुसार चलने वाले दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर वह गोलोक को पहुँचता है।

श्लोक 73 (14.102.73)

यावन्ति चैव रोमाणि तस्या गोस्तु नराधिप । तावद्वर्षसहस्राणि गवां लोके महीयते ॥

yāvanti caiva romāṇi tasyā gostu narādhipa | tāvadvarṣasahasrāṇi gavāṃ loke mahīyate

हे नराधिप, उस गाय के शरीर में जितने रोम हैं, उतने हजार वर्षों तक वह गौओं के लोक में सम्मान पाता है।

श्लोक 74 (14.102.74)

गोलोकादवतीर्णस्तु लोकेऽस्मिन्ब्राह्मणो भवेत् । सत्रयाजी वदान्यश्च सर्वराजभिरर्चितः ॥

golokādavatīrṇastu loke'sminbrāhmaṇo bhavet | satrayājī vadānyaśca sarvarājabhirarcitaḥ

गोलोक से उतरकर वह इस लोक में सत्र-यज्ञ करने वाला, उदार और सब राजाओं से पूजित ब्राह्मण होता है।

श्लोक 75 (14.102.75)

तिलं गावः सुवर्णं चाप्यन्नं कन्या वसुंधरा । तारयन्तीह दत्तानि ब्राह्मणेभ्यो महाभुज ॥

tilaṃ gāvaḥ suvarṇaṃ cāpyannaṃ kanyā vasuṃdharā | tārayantīha dattāni brāhmaṇebhyo mahābhuja

हे महाबाहु, तिल, गौएँ, सोना, अन्न, कन्या और भूमि, ये ब्राह्मणों को दिए जाने पर दाता को तार देते हैं।

श्लोक 76 (14.102.76)

ब्राह्मणं वृत्तसंपन्नमाहिताग्निमलोलुपम् । तर्पयेद्विधिवद्राजन्स निधिः पारलौकिकः ॥

brāhmaṇaṃ vṛttasaṃpannamāhitāgnimalolupam | tarpayedvidhivadrājansa nidhiḥ pāralaukikaḥ

हे राजन्, सदाचारी, अग्निहोत्री और लोभरहित ब्राह्मण को विधिपूर्वक तृप्त करना चाहिए; वह परलोक की निधि है।

श्लोक 77 (14.102.77)

आहिताग्निं दरिद्रं च श्रोत्रियं च जितेन्द्रियम् । शूद्रान्नवर्जितं चैव द्विजं यत्नेन पूजयेत् ॥

āhitāgniṃ daridraṃ ca śrotriyaṃ ca jitendriyam | śūdrānnavarjitaṃ caiva dvijaṃ yatnena pūjayet

अग्निहोत्री, निर्धन, श्रोत्रिय, जितेन्द्रिय और शूद्र का अन्न न खाने वाले ब्राह्मण का यत्नपूर्वक आदर करना चाहिए।

श्लोक 78 (14.102.78)

आहिताग्निः सदा पात्रमग्निहोत्री च वेदवित् । पात्राणामपि तत्पात्रं शूद्रान्नं यस्य नोदरे ॥

āhitāgniḥ sadā pātramagnihotrī ca vedavit | pātrāṇāmapi tatpātraṃ śūdrānnaṃ yasya nodare

अग्नि की स्थापना करने वाला, अग्निहोत्री और वेदवेत्ता ब्राह्मण सदा सुपात्र है; और सुपात्रों में भी वह श्रेष्ठ पात्र है जिसके उदर में शूद्र का अन्न नहीं है।

श्लोक 79 (14.102.79)

यच्च वेदमयं पात्रं यच्च पात्रं तपोमयम् । असंकीर्णं च यत्पात्रं तत्पात्रं तारयिष्यति ॥

yacca vedamayaṃ pātraṃ yacca pātraṃ tapomayam | asaṃkīrṇaṃ ca yatpātraṃ tatpātraṃ tārayiṣyati

जो पात्र वेदमय है, जो पात्र तपोमय है और जो पात्र असंकीर्ण (शुद्ध) है, वह पात्र तार देगा।

श्लोक 80 (14.102.80)

नित्यस्वाध्यायनिरतास्त्वसंकीर्णेन्द्रियाश्च ये । पञ्चयज्ञपरा नित्यं पूजितास्तारयन्ति ते ॥

nityasvādhyāyaniratāstvasaṃkīrṇendriyāśca ye | pañcayajñaparā nityaṃ pūjitāstārayanti te

जो नित्य स्वाध्याय में लगे रहते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ बिखरी नहीं हैं और जो नित्य पाँच यज्ञों में तत्पर हैं, वे पूजित होने पर तार देते हैं।

श्लोक 81 (14.102.81)

ये क्षान्तिदान्ताः श्रुतिपूर्णकर्णा । जितेन्द्रियाः प्राणिवधे निवृत्ताः । प्रतिग्रहे संकुचिता गृहस्था- । स्ते ब्राह्मणास्तारयितुं समर्थाः ॥

ye kṣāntidāntāḥ śrutipūrṇakarṇā | jitendriyāḥ prāṇivadhe nivṛttāḥ | pratigrahe saṃkucitā gṛhasthā- | ste brāhmaṇāstārayituṃ samarthāḥ

जो क्षमाशील और संयमी हैं, जिनके कान श्रुति से भरे हैं, जो जितेन्द्रिय हैं, प्राणियों की हिंसा से दूर रहते हैं और दान लेने में संकोच करते हैं, ऐसे गृहस्थ ब्राह्मण तारने में समर्थ हैं।

श्लोक 82 (14.102.82)

नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती । नित्यस्वाध्यायी वृषलान्नवर्जी । क्रतौ गच्छन्विधिवच्चापि जुह्व- । त्स ब्राह्मणस्तारयितुं समर्थः ॥

nityodakī nityayajñopavītī | nityasvādhyāyī vṛṣalānnavarjī | kratau gacchanvidhivaccāpi juhva- | tsa brāhmaṇastārayituṃ samarthaḥ

जो नित्य स्नान करता है, नित्य यज्ञोपवीत धारण करता है, नित्य स्वाध्याय करता है, शूद्र का अन्न नहीं खाता, यज्ञ में जाता और विधिपूर्वक आहुति देता है, वह ब्राह्मण तारने में समर्थ है।

श्लोक 83 (14.102.83)

ब्राह्मणो यस्तु मद्भक्तो मद्रागी मत्परायणः । मयि संन्यस्तकर्मा च स विप्रस्तारयेद्ध्रुवम् ॥

brāhmaṇo yastu madbhakto madrāgī matparāyaṇaḥ | mayi saṃnyastakarmā ca sa viprastārayeddhruvam

जो ब्राह्मण मेरा भक्त है, मुझमें अनुराग रखता है, मुझे ही अपना परम आश्रय मानता है और जिसने अपने कर्म मुझमें समर्पित कर दिए हैं, वह निश्चय ही तार देगा।

श्लोक 84 (14.102.84)

द्वादशाक्षरतत्वज्ञश्चतुर्व्यूहविभागवित् । अच्छिद्रपञ्चकालज्ञः स विप्रस्तारयिष्यति ॥

dvādaśākṣaratatvajñaścaturvyūhavibhāgavit | acchidrapañcakālajñaḥ sa viprastārayiṣyati

जो द्वादशाक्षर मन्त्र के तत्त्व को जानता है, चतुर्व्यूह के विभागों को समझता है और पाँच कालों को निर्दोष रूप से जानता है, वह ब्राह्मण तार देगा।

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