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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 103

श्रीकृष्ण द्वारा दान और व्रतों के फलों का उपदेश

अतृप्त युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से बैल के दान तथा अब तक न कहे गए दानों का फल पूछते हैं। श्रीकृष्ण बैल, घर, शय्या, विद्या, आसन, वाहन, फलदार वृक्ष, दीप, जल, जूते-छाते और भोजन के दान का, ब्राह्मणों के सत्कार, अपनी प्रतिमा की स्थापना, पवित्र अग्नि के रक्षण, उपवासों और महाप्रस्थान का स्वर्गीय फल बताते हैं। अन्त में वे चेताते हैं कि जो दान घोषित करके न दिया जाए या दिया हुआ वापस ले लिया जाए, वह नष्ट हो जाता है, और श्रोत्रिय ब्राह्मणों को दिया दान ही फलता है।

अध्याय 102अध्याय-सूचीअध्याय 104

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.103.1)

वासुदेवेन दानेषु कथितेषु यथाक्रमम् । अवितृप्तश्च धर्मेषु केशवं पुनरब्रवीत् ॥

vāsudevena dāneṣu kathiteṣu yathākramam | avitṛptaśca dharmeṣu keśavaṃ punarabravīt

वासुदेव ने जब क्रम से दानों का वर्णन कर दिया, तब धर्म की बातों से अतृप्त युधिष्ठिर ने केशव से फिर कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (14.103.2)

देव धर्मामृतमिदं शृण्वतोपि परंतप । न विद्यते सुरश्रेष्ठ मम तृप्तिर्हि माधव ॥

deva dharmāmṛtamidaṃ śṛṇvatopi paraṃtapa | na vidyate suraśreṣṭha mama tṛptirhi mādhava

हे देव, हे परंतप, धर्मरूपी इस अमृत को सुनते हुए भी मेरी तृप्ति नहीं होती, हे सुरश्रेष्ठ माधव।

श्लोक 3 (14.103.3)

अनडुत्संप्रदानस्य यत्फलं तु विधीयते । तत्फलं कथयस्वेह तव भक्तस्य मेऽच्युत ॥

anaḍutsaṃpradānasya yatphalaṃ tu vidhīyate | tatphalaṃ kathayasveha tava bhaktasya me'cyuta

हे अच्युत, मुझ अपने भक्त को यहाँ बताइए कि बैल के दान का क्या फल विधान किया गया है।

श्लोक 4 (14.103.4)

यानि चान्यानि दानानि त्वया नोक्तानि कानिचित् । तान्याचक्ष्व सुरश्रेष्ठ तेषां चानुक्रमात्फलम् ॥

yāni cānyāni dānāni tvayā noktāni kānicit | tānyācakṣva suraśreṣṭha teṣāṃ cānukramātphalam

और जो अन्य दान आपने नहीं बताए, हे सुरश्रेष्ठ, उन्हें तथा क्रम से उनके फल को भी बताइए।

भगवानुवाच

श्लोक 5 (14.103.5)

पवित्रत्वात्सुपुण्यत्वात्पावनत्वात्तथैव च । शृणु धर्मामृतं श्रेष्ठं दत्तस्यानडुहः फलम् ॥

pavitratvātsupuṇyatvātpāvanatvāttathaiva ca | śṛṇu dharmāmṛtaṃ śreṣṭhaṃ dattasyānaḍuhaḥ phalam

यह पवित्र, परम पुण्यदायक और पावन है; इसलिए धर्म के इस श्रेष्ठ अमृत को सुनो, अर्थात् दिए हुए बैल का फल।

श्लोक 6 (14.103.6)

दशधेनुसमोऽनड्वानेकोपि कुरुपुङ्गव । मेदोमांसविपुष्टाङ्गो नीरोगः कोपवर्जितः ॥

daśadhenusamo'naḍvānekopi kurupuṅgava | medomāṃsavipuṣṭāṅgo nīrogaḥ kopavarjitaḥ

हे कुरुश्रेष्ठ, चर्बी और मांस से पुष्ट अंगों वाला, नीरोग और क्रोध से रहित एक ही बैल दस गायों के समान होता है।

श्लोक 7 (14.103.7)

युवा भद्रः सुशीलश्च सर्वदोषविवर्जितः । धुरं धारयति क्षिप्रं दत्तो विप्राय पाण्डव ॥

yuvā bhadraḥ suśīlaśca sarvadoṣavivarjitaḥ | dhuraṃ dhārayati kṣipraṃ datto viprāya pāṇḍava

जो जवान, भद्र, सुशील और सब दोषों से रहित हो। हे पाण्डव, ब्राह्मण को दिया जाने पर वह शीघ्रता से जुए का भार उठाता है।

श्लोक 8 (14.103.8)

स तेन पुण्यदानेन वर्षकोटिं युधिष्ठिर । यथाकामं महातेजा गवां लोके महीयते ॥

sa tena puṇyadānena varṣakoṭiṃ yudhiṣṭhira | yathākāmaṃ mahātejā gavāṃ loke mahīyate

हे युधिष्ठिर, उस पुण्य दान से महातेजस्वी दाता करोड़ वर्ष तक गौओं के लोक में इच्छानुसार सम्मान पाता है।

श्लोक 9 (14.103.9)

यश्च दद्यादनडुहौ द्वौ युक्तौ च धुरंधरौ । सुवृत्ताय दरिद्राय श्रोत्रियाय विशेषतः । तस्य यत्पुण्यमाख्यातं तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ॥

yaśca dadyādanaḍuhau dvau yuktau ca dhuraṃdharau | suvṛttāya daridrāya śrotriyāya viśeṣataḥ | tasya yatpuṇyamākhyātaṃ tacchṛṇuṣva yudhiṣṭhira

और जो जुए में जुते हुए, भार वहन करने वाले दो बैल किसी सदाचारी, दरिद्र और विशेषकर श्रोत्रिय ब्राह्मण को देता है, हे युधिष्ठिर, उसके लिए जो पुण्य बताया गया है उसे सुनो।

श्लोक 10 (14.103.10)

सहस्रगोप्रदानेन यत्प्रोक्तं फलमुत्तमम् । तत्पुण्यफलमाप्नोति याति लोकान्स मामकान् ॥

sahasragopradānena yatproktaṃ phalamuttamam | tatpuṇyaphalamāpnoti yāti lokānsa māmakān

सहस्र गौओं के दान का जो उत्तम फल कहा गया है, वही पुण्य फल वह पाता है और मेरे लोकों को जाता है।

श्लोक 11 (14.103.11)

यावन्ति चैव रोमाणि तयोरनडुहोर्नृप । तावद्वर्षसहस्राणि मम लोके महीयते ॥

yāvanti caiva romāṇi tayoranaḍuhornṛpa | tāvadvarṣasahasrāṇi mama loke mahīyate

हे राजन्, उन दोनों बैलों के शरीर में जितने रोम होते हैं, उतने हजार वर्ष तक वह मेरे लोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 12 (14.103.12)

दरिद्रायैव दातव्यं न समृद्धाय पाण्डव । वर्षाणां हि तटाकेषु फलं नैव पयोधिषु ॥

daridrāyaiva dātavyaṃ na samṛddhāya pāṇḍava | varṣāṇāṃ hi taṭākeṣu phalaṃ naiva payodhiṣu

दान दरिद्र को ही देना चाहिए, धनी को नहीं, हे पाण्डव; वर्षा का फल तालाबों में होता है, समुद्रों में नहीं।

श्लोक 13 (14.103.13)

यस्तु दद्यादनडुहं दरिद्राय द्विजातये । स तेन पुण्यदानेन पूतात्मा कुरुपुङ्गव ॥

yastu dadyādanaḍuhaṃ daridrāya dvijātaye | sa tena puṇyadānena pūtātmā kurupuṅgava

किन्तु हे कुरुश्रेष्ठ, जो दरिद्र द्विज को बैल देता है, वह उस पुण्य दान से पवित्र आत्मा वाला हो जाता है,

श्लोक 14 (14.103.14)

विमानं दिव्यमारूढो दिव्यरूपी यथासुखम् । मम लोकेषु रमते यावदाभूतसंप्लवम् ॥

vimānaṃ divyamārūḍho divyarūpī yathāsukham | mama lokeṣu ramate yāvadābhūtasaṃplavam

और दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर दिव्य रूप धारण किए हुए सुखपूर्वक मेरे लोकों में प्रलयकाल तक रमण करता है।

श्लोक 15 (14.103.15)

गृहं दीपप्रभायुक्तं शय्यासनविभूषितम् । भाजनोपस्करैर्युक्तं धनधान्यैरलङ्कृतम् । दासीगोभूमिसंयुक्तमन्यूनं सर्वसाधनैः ॥

gṛhaṃ dīpaprabhāyuktaṃ śayyāsanavibhūṣitam | bhājanopaskarairyuktaṃ dhanadhānyairalaṅkṛtam | dāsīgobhūmisaṃyuktamanyūnaṃ sarvasādhanaiḥ

दीपों की प्रभा से युक्त, शय्या और आसनों से सजा हुआ, बर्तनों और गृहसामग्री से भरा, धन-धान्य से अलंकृत, दासियों, गौओं और भूमि से संयुक्त तथा सब साधनों से परिपूर्ण घर,

श्लोक 16 (14.103.16)

ब्राह्मणाय दरिद्राय श्रोत्रियाय युधिष्ठिर । दद्यात्सदक्षिणं यस्तु तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

brāhmaṇāya daridrāya śrotriyāya yudhiṣṭhira | dadyātsadakṣiṇaṃ yastu tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

हे युधिष्ठिर, जो दरिद्र श्रोत्रिय ब्राह्मण को दक्षिणा सहित ऐसा घर देता है, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 17 (14.103.17)

देवाः पितृगणाश्चैव ह्यग्नयो ऋषयस्तथा । प्रयच्छन्ति प्रहृष्टा वै यानमादित्यसन्निभम् ॥

devāḥ pitṛgaṇāścaiva hyagnayo ṛṣayastathā | prayacchanti prahṛṣṭā vai yānamādityasannibham

देवता, पितृगण, अग्नियाँ और ऋषि प्रसन्न होकर उसे सूर्य के समान तेजस्वी यान प्रदान करते हैं।

श्लोक 18 (14.103.18)

तेन गच्छेच्छ्रिया युक्तो ब्रह्मलोकमनुत्तमम् । स्त्रीसहस्रावृते रम्ये भवने तत्र काञ्चने । मोदते ब्रह्मलोकस्थो यावदाभूतसंप्लवम् ॥

tena gacchecchriyā yukto brahmalokamanuttamam | strīsahasrāvṛte ramye bhavane tatra kāñcane | modate brahmalokastho yāvadābhūtasaṃplavam

उससे वह शोभा से युक्त होकर परम श्रेष्ठ ब्रह्मलोक को जाता है। वहाँ सहस्रों स्त्रियों से घिरे सुन्दर स्वर्णमय भवन में वह ब्रह्मलोक में रहकर प्रलयकाल तक आनन्द करता है।

श्लोक 19 (14.103.19)

शय्यां प्रस्तरणोपेतां यः प्रयच्छति पाण्डव । अर्चयित्वा द्विजं भक्त्या वस्त्रमाल्यानुलेपनैः । भोजयित्वा विचित्रान्नं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

śayyāṃ prastaraṇopetāṃ yaḥ prayacchati pāṇḍava | arcayitvā dvijaṃ bhaktyā vastramālyānulepanaiḥ | bhojayitvā vicitrānnaṃ tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

हे पाण्डव, जो वस्त्र, माला और अनुलेपन से भक्तिपूर्वक द्विज का सत्कार करके और नाना प्रकार का अन्न खिलाकर बिछौने सहित शय्या देता है, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 20 (14.103.20)

धेनुदानस्य यत्पुण्यं विधिदत्तस्य पाण्डव । तत्पुण्यं तमनुप्राप्य पितृलोके महीयते ॥

dhenudānasya yatpuṇyaṃ vidhidattasya pāṇḍava | tatpuṇyaṃ tamanuprāpya pitṛloke mahīyate

हे पाण्डव, विधिपूर्वक दी हुई गौ के दान का जो पुण्य है, उसे पाकर वह पितृलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 21 (14.103.21)

शिल्पमध्ययनं वाऽपि विद्यां मन्त्रौषधानि च । यः प्रयच्छति विप्राय तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

śilpamadhyayanaṃ vā'pi vidyāṃ mantrauṣadhāni ca | yaḥ prayacchati viprāya tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

जो ब्राह्मण को शिल्प, अध्ययन, विद्या, मन्त्र और औषधियाँ देता है, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 22 (14.103.22)

आहिताग्निसहस्रस्य पूजितस्यैव यत्फलम् । तत्पुण्यफलमाप्नोति यस्तु शय्यां प्रयच्छति ॥

āhitāgnisahasrasya pūjitasyaiva yatphalam | tatpuṇyaphalamāpnoti yastu śayyāṃ prayacchati

एक सहस्र अग्निहोत्रियों का सत्कार करने से जो फल मिलता है, वही पुण्य फल उसे मिलता है जो शय्या का दान करता है।

श्लोक 23 (14.103.23)

छन्दोभिः संप्रयुक्तेन विमानेन विराजता । सप्तर्षिलोकान्व्रजति पूज्यते ब्रह्मवादिभिः ॥

chandobhiḥ saṃprayuktena vimānena virājatā | saptarṣilokānvrajati pūjyate brahmavādibhiḥ

छन्दों से युक्त, दीप्तिमान विमान में बैठकर वह सप्तर्षियों के लोकों को जाता है और ब्रह्मवादियों द्वारा पूजित होता है।

श्लोक 24 (14.103.24)

चतुर्युगानि वै त्रिंशत्क्रीडित्वा तत्र देववत् । इह मानुष्यके लोके विप्रो भवति वेदवित् ॥

caturyugāni vai triṃśatkrīḍitvā tatra devavat | iha mānuṣyake loke vipro bhavati vedavit

वहाँ देवता के समान तीस चतुर्युगों तक क्रीड़ा करके वह इस मनुष्य लोक में वेदज्ञ ब्राह्मण होता है।

श्लोक 25 (14.103.25)

विश्रामयति यो विप्रं श्रान्तमध्वनि कर्शितम् । विनश्यति तदा पापं तस्य वर्षकृतं नृप ॥

viśrāmayati yo vipraṃ śrāntamadhvani karśitam | vinaśyati tadā pāpaṃ tasya varṣakṛtaṃ nṛpa

जो मार्ग में थके हुए और दुर्बल ब्राह्मण को विश्राम देता है, हे राजन्, उसी समय उसका वर्षभर का किया हुआ पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 26 (14.103.26)

अथ प्रक्षालयेत्पादौ तस्य तोयेन भक्तिमान् । दशवर्षकृतं पापं व्यपोहति न संशयः ॥

atha prakṣālayetpādau tasya toyena bhaktimān | daśavarṣakṛtaṃ pāpaṃ vyapohati na saṃśayaḥ

और यदि वह भक्तिपूर्वक जल से उसके पाँव धोता है, तो दस वर्ष का किया पाप दूर कर देता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 27 (14.103.27)

घृतेन वाऽथ तैलेन पादौ तस्य तु पूजयेत् । तद्द्वादशसमारूढं पापमाशु व्यपोहति ॥

ghṛtena vā'tha tailena pādau tasya tu pūjayet | taddvādaśasamārūḍhaṃ pāpamāśu vyapohati

अथवा घी या तेल से उसके पाँवों की पूजा करे, तो बारह वर्ष का जमा हुआ पाप शीघ्र दूर कर देता है।

श्लोक 28 (14.103.28)

धेनुकाञ्चनदत्तस्य यत्पुण्यं समुदाहृतम् । तत्पुण्यफलमाप्नोति यस्त्वेनं विप्रमर्चयेत् ॥

dhenukāñcanadattasya yatpuṇyaṃ samudāhṛtam | tatpuṇyaphalamāpnoti yastvenaṃ vipramarcayet

गौ और सोने के दान का जो पुण्य बताया गया है, वही पुण्य फल उसे मिलता है जो इस प्रकार ब्राह्मण का सत्कार करता है।

श्लोक 29 (14.103.29)

स्वागतेन तु यो विप्रं पूजयेदासनेन च । प्रत्युत्थानेन वा राजन्स देवानां प्रियो भवेत् ॥

svāgatena tu yo vipraṃ pūjayedāsanena ca | pratyutthānena vā rājansa devānāṃ priyo bhavet

हे राजन्, जो स्वागत, आसन अथवा उठकर सम्मान देने से ब्राह्मण की पूजा करता है, वह देवताओं का प्रिय होता है।

श्लोक 30 (14.103.30)

स्वागतेनाग्नयो राजन्नासनेन शतक्रतुः । प्रत्युत्थानेन पितरः प्रीतिं यान्त्यतिथिप्रियाः ॥

svāgatenāgnayo rājannāsanena śatakratuḥ | pratyutthānena pitaraḥ prītiṃ yāntyatithipriyāḥ

हे राजन्, स्वागत से अग्नियाँ, आसन से शतक्रतु इन्द्र और उठकर सम्मान देने से अतिथिप्रिय पितर प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 31 (14.103.31)

अग्निशक्रपितॄणां च तेषां प्रीत्या नराधिप । संवत्सरकृतं पापं तस्य सद्यो विनश्यति ॥

agniśakrapitṝṇāṃ ca teṣāṃ prītyā narādhipa | saṃvatsarakṛtaṃ pāpaṃ tasya sadyo vinaśyati

हे नराधिप, अग्नि, इन्द्र और पितरों की प्रसन्नता से उसका वर्षभर का किया पाप तुरन्त नष्ट हो जाता है।

श्लोक 32 (14.103.32)

यः प्रयच्छति विप्राय आसनं माल्यभूषितम् । स याति मणिचित्रेण रथेनेन्द्रनिकेतनम् ॥

yaḥ prayacchati viprāya āsanaṃ mālyabhūṣitam | sa yāti maṇicitreṇa rathenendraniketanam

जो ब्राह्मण को माला से सजा आसन देता है, वह मणियों से विचित्र रथ में बैठकर इन्द्र के भवन को जाता है।

श्लोक 33 (14.103.33)

पुरन्दरासने तत्र दिव्यनारीविभूषितः । षष्टिं वर्षसहस्राणि क्रीडत्यप्सरसां गणैः ॥

purandarāsane tatra divyanārīvibhūṣitaḥ | ṣaṣṭiṃ varṣasahasrāṇi krīḍatyapsarasāṃ gaṇaiḥ

वहाँ इन्द्र के आसन पर दिव्य स्त्रियों से विभूषित होकर वह साठ हजार वर्ष तक अप्सराओं के समूहों के साथ क्रीड़ा करता है।

श्लोक 34 (14.103.34)

वाहनं यः प्रयच्छेत ब्राह्मणाय युधिष्ठिर । स याति रत्नचित्रेण वाहनेन सुरालयम् ॥

vāhanaṃ yaḥ prayaccheta brāhmaṇāya yudhiṣṭhira | sa yāti ratnacitreṇa vāhanena surālayam

हे युधिष्ठिर, जो ब्राह्मण को वाहन देता है, वह रत्नों से विचित्र वाहन में बैठकर देवलोक को जाता है।

श्लोक 35 (14.103.35)

स तत्र कामं क्रीडित्वा सेव्यमानोप्सरोगणैः । इह राजा भवेद्राजन्नात्र कार्या विचारणा ॥

sa tatra kāmaṃ krīḍitvā sevyamānopsarogaṇaiḥ | iha rājā bhavedrājannātra kāryā vicāraṇā

वहाँ इच्छानुसार क्रीड़ा करके, अप्सराओं के समूहों से सेवित होकर, हे राजन्, वह यहाँ राजा होता है; इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 36 (14.103.36)

पादपं पल्लवाकीर्णं पुष्पितं फलितं तथा । गन्धमाल्यैरथाभ्यर्च्य वस्त्राभरणभूषितम् ॥

pādapaṃ pallavākīrṇaṃ puṣpitaṃ phalitaṃ tathā | gandhamālyairathābhyarcya vastrābharaṇabhūṣitam

नए पल्लवों से भरा, फूला-फला हुआ वृक्ष, जो गन्ध और मालाओं से पूजित तथा वस्त्र-आभरणों से सजा हो,

श्लोक 37 (14.103.37)

यः प्रयच्छति विप्राय श्रोत्रियाय सदक्षिणम् । भोजयित्वा यथाकामं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

yaḥ prayacchati viprāya śrotriyāya sadakṣiṇam | bhojayitvā yathākāmaṃ tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

जो उसे दक्षिणा सहित श्रोत्रिय ब्राह्मण को देता है और उसे इच्छानुसार भोजन कराता है, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 38 (14.103.38)

जांबूनदविचित्रेण विमानेन विराजता । पुरन्दरपुरं याति जयशब्दरवैर्युतः ॥

jāṃbūnadavicitreṇa vimānena virājatā | purandarapuraṃ yāti jayaśabdaravairyutaḥ

जाम्बूनद स्वर्ण से विचित्र, शोभायमान विमान में, जयघोषों से घिरा हुआ वह इन्द्र की पुरी को जाता है।

श्लोक 39 (14.103.39)

ततः शक्रपुरे रम्ये तस्य कल्पकपादपः । ददाति चेप्सितं सर्वं मनसा यद्यदिच्छति ॥

tataḥ śakrapure ramye tasya kalpakapādapaḥ | dadāti cepsitaṃ sarvaṃ manasā yadyadicchati

तब इन्द्र की रमणीय पुरी में उसके लिए कल्पवृक्ष होता है; वह मन से जो-जो चाहता है, वह सब इच्छित वस्तु देता है।

श्लोक 40 (14.103.40)

यावन्ति तस्य पत्राणि पुष्पाणि च फलानि च । तावद्वर्षसहस्राणि शक्रलोके महीयते ॥

yāvanti tasya patrāṇi puṣpāṇi ca phalāni ca | tāvadvarṣasahasrāṇi śakraloke mahīyate

उस वृक्ष के जितने पत्ते, फूल और फल थे, उतने हजार वर्ष तक वह इन्द्रलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 41 (14.103.41)

शक्रलोकावतीर्णश्च मानुष्यं लोकमागतः । रथाश्वगजसंपूर्णं पुरं राज्यं च रक्षति ॥

śakralokāvatīrṇaśca mānuṣyaṃ lokamāgataḥ | rathāśvagajasaṃpūrṇaṃ puraṃ rājyaṃ ca rakṣati

इन्द्रलोक से उतरकर जब वह मनुष्य लोक में आता है, तब रथ, घोड़ों और हाथियों से भरे नगर और राज्य की रक्षा करता है।

श्लोक 42 (14.103.42)

स्थापयित्वा तु मद्भक्त्या यो मत्प्रतिकृतिं नरः । आलयं विधिवत्कृत्वा पूजाकर्म च कारयेत् । स्वयं वा पूजयेद्भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

sthāpayitvā tu madbhaktyā yo matpratikṛtiṃ naraḥ | ālayaṃ vidhivatkṛtvā pūjākarma ca kārayet | svayaṃ vā pūjayedbhaktyā tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

जो मनुष्य मेरी भक्ति से मेरी प्रतिमा स्थापित करके विधिपूर्वक मन्दिर बनवाता है और पूजा करवाता है, अथवा स्वयं भक्तिपूर्वक पूजा करता है, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 43 (14.103.43)

अश्वमेधसहस्रस्य यत्पुण्यं समुदाहृतम् । तत्फलं समवाप्नोति मत्सालोक्यं प्रपद्यते । न जाने निर्गमं तस्य मम लोकाद्युधिष्ठिर ॥

aśvamedhasahasrasya yatpuṇyaṃ samudāhṛtam | tatphalaṃ samavāpnoti matsālokyaṃ prapadyate | na jāne nirgamaṃ tasya mama lokādyudhiṣṭhira

हजार अश्वमेध यज्ञों का जो पुण्य बताया गया है, उस फल को वह पूरा पाता है और मेरे सालोक्य को प्राप्त होता है। हे युधिष्ठिर, मेरे लोक से उसके निकलने का मैं कोई उपाय नहीं जानता।

श्लोक 44 (14.103.44)

देवालये विप्रगृहे गोवाटे चत्वरेऽपि वा । प्रज्वालयति यो दीपं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

devālaye vipragṛhe govāṭe catvare'pi vā | prajvālayati yo dīpaṃ tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

जो देवालय में, ब्राह्मण के घर में, गोशाला में अथवा चौराहे पर दीप जलाता है, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 45 (14.103.45)

आरुह्य काञ्चनं यानं द्योतयन्सर्वतो दिशम् । गच्छेदादित्यलोकं स सेव्यमानः सुरोत्तमैः ॥

āruhya kāñcanaṃ yānaṃ dyotayansarvato diśam | gacchedādityalokaṃ sa sevyamānaḥ surottamaiḥ

सब दिशाओं को प्रकाशित करने वाले स्वर्णमय यान पर चढ़कर, श्रेष्ठ देवताओं से सेवित होकर वह सूर्यलोक को जाता है।

श्लोक 46 (14.103.46)

तत्र प्रकामं क्रीडित्वा वर्षकोटिं महातपाः । इह लोके भवेद्विप्रो वेदवेदाङ्गपारगः ॥

tatra prakāmaṃ krīḍitvā varṣakoṭiṃ mahātapāḥ | iha loke bhavedvipro vedavedāṅgapāragaḥ

वहाँ करोड़ वर्ष तक इच्छानुसार क्रीड़ा करके वह महातपस्वी इस लोक में वेद और वेदांगों में पारंगत ब्राह्मण होता है।

श्लोक 47 (14.103.47)

देवालयेषु वा राजन्ब्राह्मणावसथेषु वा । चत्वरे वा चतुष्के वा रात्रौ वा यदि वा दिवा ॥

devālayeṣu vā rājanbrāhmaṇāvasatheṣu vā | catvare vā catuṣke vā rātrau vā yadi vā divā

हे राजन्, देवालयों में अथवा ब्राह्मणों के निवासों में, चौराहों पर या चौकों में, रात में हो या दिन में,

श्लोक 48 (14.103.48)

नानागन्धर्ववाद्यानि धर्मश्रावणिकानि च । यस्तु कारयते भक्त्या मद्गतेनान्तरात्मना ॥

nānāgandharvavādyāni dharmaśrāvaṇikāni ca | yastu kārayate bhaktyā madgatenāntarātmanā

जो मुझमें लगे हुए अन्तःकरण से भक्तिपूर्वक नाना प्रकार के गन्धर्व-वाद्य और धर्म की कथाओं का श्रवण करवाता है,

श्लोक 49 (14.103.49)

तस्य देवा नरश्रेष्ठ पितरश्चापि हर्षिताः । सुप्रीताः संप्रयच्छन्ति विमानं कामगं सुखम् ॥

tasya devā naraśreṣṭha pitaraścāpi harṣitāḥ | suprītāḥ saṃprayacchanti vimānaṃ kāmagaṃ sukham

हे नरश्रेष्ठ, उसके लिए देवता और पितर प्रसन्न होते हैं और संतुष्ट होकर उसे इच्छानुसार चलने वाला सुखद विमान देते हैं।

श्लोक 50 (14.103.50)

स च तेन विमानेन याति देवपुरं नरः । तत्र दिव्याप्सरोभिस्तु सेव्यमानः प्रमोदते ॥

sa ca tena vimānena yāti devapuraṃ naraḥ | tatra divyāpsarobhistu sevyamānaḥ pramodate

उस विमान से वह मनुष्य देवपुरी को जाता है और वहाँ दिव्य अप्सराओं से सेवित होकर आनन्द करता है।

श्लोक 51 (14.103.51)

देवलोकावतीर्णस्तु सोस्मिँल्लोके नराधिप । वेदवेदाङ्गतत्वज्ञो भोगवान्ब्राह्मणो भवेत् ॥

devalokāvatīrṇastu sosmim̐lloke narādhipa | vedavedāṅgatatvajño bhogavānbrāhmaṇo bhavet

हे नराधिप, देवलोक से उतरकर वह इस लोक में वेद-वेदांगों के तत्त्व को जानने वाला भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है।

श्लोक 52 (14.103.52)

चत्वरे वा सभायां वा विस्तीर्णे वा सभाङ्गणे । कृत्वाऽग्निकुण्डं विपुलं स्थण्डिलं वा युधिष्ठिर ॥

catvare vā sabhāyāṃ vā vistīrṇe vā sabhāṅgaṇe | kṛtvā'gnikuṇḍaṃ vipulaṃ sthaṇḍilaṃ vā yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर, चौराहे पर, सभा में अथवा सभा के विशाल आँगन में एक बड़ा अग्निकुण्ड या चबूतरा बनाकर,

श्लोक 53 (14.103.53)

तत्राग्निं चतुरो मासाञ्ज्वालयेद्यस्तु भक्तिमान् । समाप्तेषु च मासेषु पौष्यादिषु ततो द्विजान् ॥

tatrāgniṃ caturo māsāñjvālayedyastu bhaktimān | samāpteṣu ca māseṣu pauṣyādiṣu tato dvijān

जो भक्तिमान् पुरुष वहाँ चार महीने तक अग्नि जलाए रखता है और पौष से आरम्भ होने वाले महीनों के पूरे होने पर ब्राह्मणों को भोजन कराता है,

श्लोक 54 (14.103.54)

भोजयेत्पायसं मृष्टं मद्गतेनान्तरात्मना । दक्षिणां च यथाशक्ति ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत् ॥

bhojayetpāyasaṃ mṛṣṭaṃ madgatenāntarātmanā | dakṣiṇāṃ ca yathāśakti brāhmaṇebhyo nivedayet

मुझमें लगे हुए अन्तःकरण से उन्हें मीठी खीर खिलाए और सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को दक्षिणा दे।

श्लोक 55 (14.103.55)

एवमग्निं तु यः कुर्यान्नित्यमेवार्चयेत्तु माम् । तस्य पुण्यफलं यद्वै तन्निबोध युधिष्ठिर ॥

evamagniṃ tu yaḥ kuryānnityamevārcayettu mām | tasya puṇyaphalaṃ yadvai tannibodha yudhiṣṭhira

जो इस प्रकार अग्नि स्थापित करता है और नित्य मेरी पूजा करता है, हे युधिष्ठिर, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 56 (14.103.56)

तेनाहं शङ्करश्चैव पितरो ह्यग्नयस्तथा । यास्यामः परमां प्रीतिं नात्र कार्या विचारणा ॥

tenāhaṃ śaṅkaraścaiva pitaro hyagnayastathā | yāsyāmaḥ paramāṃ prītiṃ nātra kāryā vicāraṇā

उसके कारण मैं, शंकर, पितर और अग्नियाँ परम प्रसन्नता को प्राप्त होंगे; इसमें संदेह की कोई बात नहीं।

श्लोक 57 (14.103.57)

षष्टिं वर्षसहस्राणि षष्टिं वर्षशतानि च । सोस्मत्प्रीतिकरः श्रीमान्मम लोके महीयते ॥

ṣaṣṭiṃ varṣasahasrāṇi ṣaṣṭiṃ varṣaśatāni ca | sosmatprītikaraḥ śrīmānmama loke mahīyate

साठ हजार वर्ष और साठ सौ वर्ष तक वह श्रीमान्, हमें प्रसन्न करने वाला, मेरे लोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 58 (14.103.58)

मम लोकावतीर्णश्च अस्मिँल्लोके महायशाः । वेदवेदाङ्गविद्विप्रो जायते राजपूजितः ॥

mama lokāvatīrṇaśca asmim̐lloke mahāyaśāḥ | vedavedāṅgavidvipro jāyate rājapūjitaḥ

मेरे लोक से उतरकर इस लोक में वह महायशस्वी वेद-वेदांगों का ज्ञाता ब्राह्मण होकर जन्म लेता है और राजाओं से पूजित होता है।

श्लोक 59 (14.103.59)

यः करोति नरश्रेष्ठ भरणं ब्राह्मणस्य तु । श्रोत्रियस्याभिजातस्य दरिद्रस्य विशेषतः । तस्य पुण्यफलं यद्वै तन्निबोध युधिष्ठिर ॥

yaḥ karoti naraśreṣṭha bharaṇaṃ brāhmaṇasya tu | śrotriyasyābhijātasya daridrasya viśeṣataḥ | tasya puṇyaphalaṃ yadvai tannibodha yudhiṣṭhira

हे नरश्रेष्ठ, जो किसी कुलीन श्रोत्रिय ब्राह्मण का, विशेषकर दरिद्र का, भरण-पोषण करता है, हे युधिष्ठिर, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 60 (14.103.60)

गवां कोटिप्रदानेन यत्पुण्यं समुदाहृतम् । तत्सर्वफलमाप्नोति वर्षेणैकेन पाण्डव ॥

gavāṃ koṭipradānena yatpuṇyaṃ samudāhṛtam | tatsarvaphalamāpnoti varṣeṇaikena pāṇḍava

एक करोड़ गौओं के दान का जो पुण्य बताया गया है, वह सारा फल, हे पाण्डव, वह एक ही वर्ष में पा लेता है।

श्लोक 61 (14.103.61)

काञ्चनेन विचित्रेण विमानेनार्कशोभिना । स याति मामकं लोकं दिव्यस्त्रीगणसेवितः ॥

kāñcanena vicitreṇa vimānenārkaśobhinā | sa yāti māmakaṃ lokaṃ divyastrīgaṇasevitaḥ

सूर्य के समान शोभायमान, विचित्र स्वर्णमय विमान से वह दिव्य स्त्रियों के समूहों से सेवित होकर मेरे लोक को जाता है।

श्लोक 62 (14.103.62)

गीयमानो वरस्त्रीभिर्वर्षाणां कोटिविंशतिम् । क्रीडित्वा मामके तत्र सर्वदेवैरभिष्टुतः । मानुष्यमवतीर्णस्तु वेदविद्ब्राह्मणो भवेत् ॥

gīyamāno varastrībhirvarṣāṇāṃ koṭiviṃśatim | krīḍitvā māmake tatra sarvadevairabhiṣṭutaḥ | mānuṣyamavatīrṇastu vedavidbrāhmaṇo bhavet

उत्तम स्त्रियों द्वारा गाया जाता हुआ वह मेरे लोक में बीस करोड़ वर्ष तक क्रीड़ा करता है और वहाँ सब देवताओं से स्तुत होता है; फिर मनुष्य लोक में उतरकर वेदज्ञ ब्राह्मण होता है।

श्लोक 63 (14.103.63)

करकां कर्णिकां वाऽपि महद्वा जलभाजनम् । यः प्रयच्छति विप्राय तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

karakāṃ karṇikāṃ vā'pi mahadvā jalabhājanam | yaḥ prayacchati viprāya tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

जल रखने का घड़ा, कान वाला पात्र अथवा बड़ा जलपात्र, जो ब्राह्मण को देता है, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 64 (14.103.64)

ब्रह्मकूर्चे तु यत्पीते फलं प्रोक्तं नराधिप । तत्पुण्यफलमाप्नोति जलभाजनदो नरः । सुतृप्तः सर्वसौगन्धः प्रहृष्टेन्द्रियमानसः ॥

brahmakūrce tu yatpīte phalaṃ proktaṃ narādhipa | tatpuṇyaphalamāpnoti jalabhājanado naraḥ | sutṛptaḥ sarvasaugandhaḥ prahṛṣṭendriyamānasaḥ

हे नराधिप, ब्रह्मकूर्च पीने पर जो फल बताया गया है, जलपात्र देने वाला मनुष्य वही पुण्य फल पाता है; वह भलीभाँति तृप्त, सब सुगन्धों से युक्त और प्रसन्न इन्द्रियों तथा मन वाला होता है।

श्लोक 65 (14.103.65)

हंससारसयुक्तेन विमानेन विराजता । स याति वारुणं लोकं दिव्यगन्धर्वसेवितम् ॥

haṃsasārasayuktena vimānena virājatā | sa yāti vāruṇaṃ lokaṃ divyagandharvasevitam

हंसों और सारसों से युक्त शोभायमान विमान में वह दिव्य गन्धर्वों से सेवित वरुणलोक को जाता है।

श्लोक 66 (14.103.66)

पानीयं यः प्रयच्छेद्वै जीवानां जीवनं परम् । ग्रीष्मे च त्रिषु मासेषु तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

pānīyaṃ yaḥ prayacchedvai jīvānāṃ jīvanaṃ param | grīṣme ca triṣu māseṣu tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

जो ग्रीष्म के तीन महीनों में जीवों के परम जीवन पानी का दान करता है, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 67 (14.103.67)

कपिलाकोटिदानस्य यत्पुण्यं तु विधीयते । तत्पुण्यफलमाप्नोति पानीयं यः प्रयच्छति ॥

kapilākoṭidānasya yatpuṇyaṃ tu vidhīyate | tatpuṇyaphalamāpnoti pānīyaṃ yaḥ prayacchati

करोड़ कपिला गौओं के दान का जो पुण्य विधान किया गया है, वही पुण्य फल उसे मिलता है जो पानी का दान करता है।

श्लोक 68 (14.103.68)

पूर्णचन्द्रप्रकाशेन विमानेन विराजता । स गच्छेच्चन्द्रभवनं सेव्यमानोप्सरोगणैः ॥

pūrṇacandraprakāśena vimānena virājatā | sa gaccheccandrabhavanaṃ sevyamānopsarogaṇaiḥ

पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकाशमान विमान से वह अप्सराओं के समूहों द्वारा सेवित होकर चन्द्रलोक को जाता है।

श्लोक 69 (14.103.69)

त्रिंशत्कोटियुगं तत्र दिव्यगन्धर्वसेवितः । क्रीडित्वा मानुषे लोके चतुर्वेदी द्विजो भवेत् ॥

triṃśatkoṭiyugaṃ tatra divyagandharvasevitaḥ | krīḍitvā mānuṣe loke caturvedī dvijo bhavet

वहाँ दिव्य गन्धर्वों से सेवित होकर तीस करोड़ युगों तक क्रीड़ा करके वह मनुष्य लोक में चारों वेदों का ज्ञाता द्विज होता है।

श्लोक 70 (14.103.70)

शिरोभ्यङ्गप्रदानेन तेजस्वी प्रियदर्शनः । सुभगो रूपवाञ्शूरः पण्डितश्च भवेद्द्विजः ॥

śirobhyaṅgapradānena tejasvī priyadarśanaḥ | subhago rūpavāñśūraḥ paṇḍitaśca bhaveddvijaḥ

सिर में लगाने के तेल का दान करने से द्विज तेजस्वी, देखने में प्रिय, सुभग, रूपवान, शूर और विद्वान् होता है।

श्लोक 71 (14.103.71)

वस्त्रदायी तु तेजस्वी सर्वत्र प्रियदर्शनः । सुभगो भवति श्रीमान्स्त्रीणां नित्यं मनोरमः ॥

vastradāyī tu tejasvī sarvatra priyadarśanaḥ | subhago bhavati śrīmānstrīṇāṃ nityaṃ manoramaḥ

वस्त्र देने वाला तेजस्वी और सर्वत्र देखने में प्रिय, सुभग और श्रीमान् होता है तथा स्त्रियों को सदा मनोहर लगता है।

श्लोक 72 (14.103.72)

उपानहौ च च्छत्रं च यो ददाति नरोत्तमः । स याति रथमुख्येन काञ्चनेन विराजता । शक्रलोकं महातेजाः सेव्यमानोप्सरोगणैः ॥

upānahau ca cchatraṃ ca yo dadāti narottamaḥ | sa yāti rathamukhyena kāñcanena virājatā | śakralokaṃ mahātejāḥ sevyamānopsarogaṇaiḥ

जो नरश्रेष्ठ जूते और छाता देता है, वह चमकते हुए स्वर्णमय श्रेष्ठ रथ में बैठकर इन्द्रलोक को जाता है; वह महातेजस्वी अप्सराओं के समूहों से सेवित होता है।

श्लोक 73 (14.103.73)

काष्ठपादुकदा यान्ति विमानैर्वृक्षनिर्मितैः । धर्मराजपुरं रम्यं सेव्यमानाः सुरोत्तमैः ॥

kāṣṭhapādukadā yānti vimānairvṛkṣanirmitaiḥ | dharmarājapuraṃ ramyaṃ sevyamānāḥ surottamaiḥ

जो लकड़ी की खड़ाऊँ देते हैं, वे काठ के बने विमानों में श्रेष्ठ देवताओं से सेवित होकर धर्मराज की रमणीय पुरी को जाते हैं।

श्लोक 74 (14.103.74)

दन्तकाष्ठप्रदानेन प्रियवाक्यो भवेन्नरः । सुगन्धवदनः श्रीमान्मेधासौभाग्यसंयुतः ॥

dantakāṣṭhapradānena priyavākyo bhavennaraḥ | sugandhavadanaḥ śrīmānmedhāsaubhāgyasaṃyutaḥ

दातुन देने से मनुष्य प्रिय बोलने वाला, सुगन्धित मुख वाला, श्रीमान् तथा बुद्धि और सौभाग्य से युक्त होता है।

श्लोक 75 (14.103.75)

क्षीरं दधि घृतं वाऽपि गुडं मधुरसं तथा । ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यः परां भक्तिमुपागताः ॥

kṣīraṃ dadhi ghṛtaṃ vā'pi guḍaṃ madhurasaṃ tathā | ye prayacchanti viprebhyaḥ parāṃ bhaktimupāgatāḥ

जो मनुष्य परम भक्ति से भरकर ब्राह्मणों को दूध, दही, घी, गुड़ अथवा मीठा रस देते हैं,

श्लोक 76 (14.103.76)

ते वृषैरश्वयानैश्च श्वेतस्रग्दामभूषिताः । उपगीयमाना गन्धर्वैर्यान्तीश्वरपुरं नराः ॥

te vṛṣairaśvayānaiśca śvetasragdāmabhūṣitāḥ | upagīyamānā gandharvairyāntīśvarapuraṃ narāḥ

वे श्वेत मालाओं से सजे हुए, गन्धर्वों से गाए जाते हुए बैलों और घोड़ों के यानों पर ईश्वर की पुरी को जाते हैं।

श्लोक 77 (14.103.77)

तत्र दिव्याप्सरोभिस्तु सेव्यमाना यथासुखम् । षष्टिवर्षसहस्राणि मोदन्ते देवसन्निभाः ॥

tatra divyāpsarobhistu sevyamānā yathāsukham | ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi modante devasannibhāḥ

वहाँ दिव्य अप्सराओं से सुखपूर्वक सेवित होकर वे देवताओं के समान साठ हजार वर्ष तक आनन्द करते हैं।

श्लोक 78 (14.103.78)

ततः कालावतीर्णाश्च जायन्ते त्विह मानवाः । प्रभूतधनधान्याश्च भोगवन्तो नरोत्तमाः ॥

tataḥ kālāvatīrṇāśca jāyante tviha mānavāḥ | prabhūtadhanadhānyāśca bhogavanto narottamāḥ

फिर समय पूरा होने पर वे यहाँ मनुष्य होकर जन्म लेते हैं, उत्तम मनुष्य, जो बहुत धन-धान्य वाले और भोगसम्पन्न होते हैं।

श्लोक 79 (14.103.79)

वैशाखे मासि वैशाखे दिवसे पाण्डुनन्दन । वैवस्वतं समुद्दिश्य परां भक्तिमुपागताः ॥

vaiśākhe māsi vaiśākhe divase pāṇḍunandana | vaivasvataṃ samuddiśya parāṃ bhaktimupāgatāḥ

हे पाण्डुनन्दन, वैशाख मास में वैशाख के दिन जो वैवस्वत (यम) को उद्देश्य करके परम भक्ति से युक्त होकर,

श्लोक 80 (14.103.80)

अभ्यर्च्य विधिवद्विप्रांस्तिलान्गुडसमन्वितान् । ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्तेषां पुण्यफलं शृणु ॥

abhyarcya vidhivadviprāṃstilānguḍasamanvitān | ye prayacchanti viprebhyasteṣāṃ puṇyaphalaṃ śṛṇu

विधिपूर्वक ब्राह्मणों का पूजन करके उन्हें गुड़ मिले तिल देते हैं, उनके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 81 (14.103.81)

गोप्रदानेन यत्पुण्यं विधिवत्पाण्डुनन्दन । तत्पुण्यं समनुप्राप्तो यमलोके महीयते । ततश्चापि च्युतः कालादिह राजा भविष्यति ॥

gopradānena yatpuṇyaṃ vidhivatpāṇḍunandana | tatpuṇyaṃ samanuprāpto yamaloke mahīyate | tataścāpi cyutaḥ kālādiha rājā bhaviṣyati

हे पाण्डुनन्दन, विधिपूर्वक गोदान से जो पुण्य होता है, उसे पाकर वह यमलोक में सम्मानित होता है, और समय आने पर वहाँ से च्युत होकर यहाँ राजा होगा।

श्लोक 82 (14.103.82)

तस्मिन्नेव दिने विप्रान्भोजयित्वा सुदक्षिणम् । तोयपूर्णानि दिव्यानि भाजनानि दिशन्ति ये ॥

tasminneva dine viprānbhojayitvā sudakṣiṇam | toyapūrṇāni divyāni bhājanāni diśanti ye

जो उसी दिन ब्राह्मणों को दक्षिणा सहित भलीभाँति भोजन कराकर उन्हें जल से भरे सुन्दर पात्र देते हैं,

श्लोक 83 (14.103.83)

ते यान्त्यादित्यवर्णाभैर्विमानैर्वरुणालयम् । तत्र दिव्याङ्गनाभिस्तु रमन्ते कामकामिनः ॥

te yāntyādityavarṇābhairvimānairvaruṇālayam | tatra divyāṅganābhistu ramante kāmakāminaḥ

वे सूर्य के वर्ण जैसे विमानों में वरुण के लोक को जाते हैं; वहाँ कामनाओं वाले वे दिव्य स्त्रियों के साथ रमण करते हैं।

श्लोक 84 (14.103.84)

ततोऽवतीर्णाः कालेन ते चास्मिन्मानुषे पुनः । भोगवन्तो द्विजश्रेष्ठ भविष्यन्ति न संशयः ॥

tato'vatīrṇāḥ kālena te cāsminmānuṣe punaḥ | bhogavanto dvijaśreṣṭha bhaviṣyanti na saṃśayaḥ

फिर समय आने पर वहाँ से उतरकर वे इस मनुष्य लोक में भोगसम्पन्न श्रेष्ठ द्विज होंगे, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 85 (14.103.85)

अनन्तराशी यश्चापि वर्तते व्रतवत्सदा । सत्यवाक्क्रोधरहितः शुचिः स्नानरतः सदा । स विमानेन दिव्येन याति शक्रपुरं नरः ॥

anantarāśī yaścāpi vartate vratavatsadā | satyavākkrodharahitaḥ śuciḥ snānarataḥ sadā | sa vimānena divyena yāti śakrapuraṃ naraḥ

जो सदा व्रती के समान रहता है, नियत क्रम से ही भोजन करता है, सत्य बोलने वाला, क्रोध से रहित, पवित्र और सदा स्नान में लगा रहता है, वह मनुष्य दिव्य विमान से इन्द्र की पुरी को जाता है।

श्लोक 86 (14.103.86)

तत्र दिव्याप्सरोभिस्तु वर्षकोटिं महातपाः । क्रीडित्वा मानुषे लोके जायते वेदविद्द्विजः ॥

tatra divyāpsarobhistu varṣakoṭiṃ mahātapāḥ | krīḍitvā mānuṣe loke jāyate vedaviddvijaḥ

वहाँ दिव्य अप्सराओं के साथ वह महातपस्वी करोड़ वर्ष क्रीड़ा करके मनुष्य लोक में वेदज्ञ द्विज होकर जन्म लेता है।

श्लोक 87 (14.103.87)

एकभुक्तेन यश्चापि वर्षमेकं तु वर्तते । ब्रह्मचारी जितक्रोधः सत्यशौचसमन्वितः । स विमानेन दिव्येन याति शक्रपुरं नरः ॥

ekabhuktena yaścāpi varṣamekaṃ tu vartate | brahmacārī jitakrodhaḥ satyaśaucasamanvitaḥ | sa vimānena divyena yāti śakrapuraṃ naraḥ

जो ब्रह्मचारी होकर, क्रोध को जीतकर और सत्य तथा शौच से युक्त रहकर एक वर्ष तक दिन में एक ही बार भोजन करता है, वह मनुष्य दिव्य विमान से इन्द्र की पुरी को जाता है।

श्लोक 88 (14.103.88)

दशकोटिसहस्राणि क्रीडित्वाऽप्सरसां गणैः । इह मानुष्यके लोके वेदविद्ब्राह्मणो भवेत् ॥

daśakoṭisahasrāṇi krīḍitvā'psarasāṃ gaṇaiḥ | iha mānuṣyake loke vedavidbrāhmaṇo bhavet

अप्सराओं के समूहों के साथ दस हजार करोड़ वर्ष क्रीड़ा करके वह इस मनुष्य लोक में वेदज्ञ ब्राह्मण होता है।

श्लोक 89 (14.103.89)

चतुर्थकाले यो भुङ्क्ते ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । वर्तते चैकवर्षं तु तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

caturthakāle yo bhuṅkte brahmacārī jitendriyaḥ | vartate caikavarṣaṃ tu tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

जो जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी चौथे भोजन-काल में ही भोजन करता है और एक वर्ष तक ऐसा ही करता रहता है, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 90 (14.103.90)

चित्रबर्हिणयुक्तेन विचित्रध्वजशोभिना । याति यानेन दिव्येन स महेन्द्रपुरं नरः ॥

citrabarhiṇayuktena vicitradhvajaśobhinā | yāti yānena divyena sa mahendrapuraṃ naraḥ

रंग-बिरंगे मोरों से जुते हुए और विचित्र ध्वजाओं से शोभित दिव्य यान से वह मनुष्य महेन्द्र की पुरी को जाता है।

श्लोक 91 (14.103.91)

अकृशाभिर्वरस्त्रीभिः सेव्यमानो यथासुखम् । ततो द्वादशकोटिं स समाः सम्यक्प्रमोदते ॥

akṛśābhirvarastrībhiḥ sevyamāno yathāsukham | tato dvādaśakoṭiṃ sa samāḥ samyakpramodate

भरे-पूरे अंगों वाली उत्तम स्त्रियों से सुखपूर्वक सेवित होकर वह फिर बारह करोड़ वर्ष तक भलीभाँति आनन्द करता है।

श्लोक 92 (14.103.92)

शक्रलोकावतीर्णस्तु लोके चास्मिन्नराधिप । भवेद्वै ब्राह्मणो विद्वान्क्षमावान्वेदपारगः ॥

śakralokāvatīrṇastu loke cāsminnarādhipa | bhavedvai brāhmaṇo vidvānkṣamāvānvedapāragaḥ

हे नराधिप, इन्द्रलोक से उतरकर इस लोक में वह विद्वान्, क्षमाशील और वेदपारंगत ब्राह्मण होता है।

श्लोक 93 (14.103.93)

षष्ठकाले तु योऽश्नाति वर्षमेकमकल्मषः । ब्रह्मचर्यव्रतैर्युक्तः शुचिः क्रोधविवर्जितः । तपोयुक्तस्य तस्याथ शृणुष्व फलमुत्तमम् ॥

ṣaṣṭhakāle tu yo'śnāti varṣamekamakalmaṣaḥ | brahmacaryavratairyuktaḥ śuciḥ krodhavivarjitaḥ | tapoyuktasya tasyātha śṛṇuṣva phalamuttamam

जो निष्पाप पुरुष ब्रह्मचर्य के व्रतों से युक्त, पवित्र और क्रोध से रहित होकर एक वर्ष तक छठे भोजन-काल में भोजन करता है, उस तपस्वी का उत्तम फल सुनो।

श्लोक 94 (14.103.94)

अत्यादित्यप्रकाशेन विमानेनार्कसंनिभः । स याति मम लोकान्वै दिव्यनारीनिषेवितः ॥

atyādityaprakāśena vimānenārkasaṃnibhaḥ | sa yāti mama lokānvai divyanārīniṣevitaḥ

सूर्य से भी अधिक प्रकाशमान विमान में, सूर्य के समान स्वयं भी तेजस्वी होकर वह दिव्य स्त्रियों से सेवित मेरे लोकों को जाता है।

श्लोक 95 (14.103.95)

तत्र साध्यैर्मरुद्भिस्तु पूज्यमानो यथासुखम् । पश्यन्नेव सदा मां तु क्रीडत्यप्सरसां गणैः ॥

tatra sādhyairmarudbhistu pūjyamāno yathāsukham | paśyanneva sadā māṃ tu krīḍatyapsarasāṃ gaṇaiḥ

वहाँ साध्यों और मरुद्गणों से सुखपूर्वक पूजित होकर, सदा मुझे देखता हुआ, वह अप्सराओं के समूहों के साथ क्रीड़ा करता है।

श्लोक 96 (14.103.96)

पक्षोपवासं यश्चापि कुरुते मद्गतात्मना । समाप्ते तु व्रते तस्मिंस्तर्पयेच्छ्रोत्रियान्द्विजान् ॥

pakṣopavāsaṃ yaścāpi kurute madgatātmanā | samāpte tu vrate tasmiṃstarpayecchrotriyāndvijān

जो मुझमें मन लगाकर पन्द्रह दिन का उपवास करता है और व्रत पूरा होने पर श्रोत्रिय द्विजों को तृप्त करता है,

श्लोक 97 (14.103.97)

सोपि गच्छति दिव्येन विमानेन महातपाः । द्योतयन्प्रभया व्योम मम लोकं प्रपद्यते । स तत्र मोदते कामं कामरूपी यथासुखम् ॥

sopi gacchati divyena vimānena mahātapāḥ | dyotayanprabhayā vyoma mama lokaṃ prapadyate | sa tatra modate kāmaṃ kāmarūpī yathāsukham

वह महातपस्वी भी दिव्य विमान से, अपनी प्रभा से आकाश को प्रकाशित करता हुआ, मेरे लोक को प्राप्त होता है। वहाँ वह इच्छानुसार रूप धारण करता हुआ सुखपूर्वक आनन्द करता है।

श्लोक 98 (14.103.98)

त्रिंशत्कोटिसमा राजन्क्रीडित्वा तत्र देववत् । इह मानुष्यके लोके पूजनीयो द्विजो भवेत् । त्रयाणामपि वेदानां साङ्गानां पारगो भवेत् ॥

triṃśatkoṭisamā rājankrīḍitvā tatra devavat | iha mānuṣyake loke pūjanīyo dvijo bhavet | trayāṇāmapi vedānāṃ sāṅgānāṃ pārago bhavet

हे राजन्, वहाँ देवता की भाँति तीस करोड़ वर्ष क्रीड़ा करके वह इस मनुष्य लोक में पूजनीय ब्राह्मण होता है, जो तीनों वेदों और उनके अंगों का पारगामी होता है।

श्लोक 99 (14.103.99)

यश्च मासोपवासं वै कुरुते मद्गतात्मना । जितेन्द्रियो जितक्रोधोजितधीः स्नानतत्परः ॥

yaśca māsopavāsaṃ vai kurute madgatātmanā | jitendriyo jitakrodhojitadhīḥ snānatatparaḥ

और जो मुझमें मन लगाकर एक मास का उपवास करता है, इन्द्रियों, क्रोध और बुद्धि को जीते हुए तथा स्नान में तत्पर रहता है,

श्लोक 100 (14.103.100)

समाप्ते नियमे तत्र भोजयित्वा द्विजोत्तमान् । दक्षिणां च ततो दद्यात्प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥

samāpte niyame tatra bhojayitvā dvijottamān | dakṣiṇāṃ ca tato dadyātprahṛṣṭenāntarātmanā

नियम पूरा होने पर श्रेष्ठ द्विजों को भोजन कराकर फिर प्रसन्न अन्तःकरण से उन्हें दक्षिणा देता है,

श्लोक 101 (14.103.101)

स गच्छति महातेजा ब्रह्मलोकमनुत्तमम् । सिंहयुक्तेन यानेन दिव्यस्त्रीगणसेवितः ॥

sa gacchati mahātejā brahmalokamanuttamam | siṃhayuktena yānena divyastrīgaṇasevitaḥ

वह महातेजस्वी पुरुष सिंहों से जुते यान में, दिव्य स्त्रियों के समूहों से सेवित होकर, सर्वोत्तम ब्रह्मलोक को जाता है।

श्लोक 102 (14.103.102)

स तत्र ब्रह्मणो लोके दिव्यर्षिगणसेवितः । शतकोटिसमा राजन्यथाकामं प्रमोदते ॥

sa tatra brahmaṇo loke divyarṣigaṇasevitaḥ | śatakoṭisamā rājanyathākāmaṃ pramodate

हे राजन्, वहाँ ब्रह्मलोक में दिव्य ऋषियों के समूहों से सेवित होकर वह सौ करोड़ वर्ष तक इच्छानुसार आनन्द करता है।

श्लोक 103 (14.103.103)

ततः कालावतीर्णश्च सोस्मिँल्लोके द्विजो भवेत् । षडङ्गविच्चतुर्वेदी त्रिंशज्जन्मान्यरोगवान् ॥

tataḥ kālāvatīrṇaśca sosmim̐lloke dvijo bhavet | ṣaḍaṅgaviccaturvedī triṃśajjanmānyarogavān

फिर समय आने पर उतरकर वह इस लोक में छहों अंगों का ज्ञाता और चारों वेदों का ज्ञानी द्विज होता है, तथा तीस जन्मों तक नीरोग रहता है।

श्लोक 104 (14.103.104)

यस्त्यक्त्वा सर्वकर्माणि शुचिः क्रोधविवर्जितः । महाप्रस्थानमेकाग्रो याति मद्गतमानसः ॥

yastyaktvā sarvakarmāṇi śuciḥ krodhavivarjitaḥ | mahāprasthānamekāgro yāti madgatamānasaḥ

जो सब कर्मों को त्यागकर, पवित्र और क्रोधरहित होकर, एकाग्र चित्त से मुझमें मन लगाए हुए महाप्रस्थान करता है,

श्लोक 105 (14.103.105)

स गच्छेदिन्द्रसदनं विमानेन महातपाः । महामणिविचित्रेण सौवर्णेन विराजता ॥

sa gacchedindrasadanaṃ vimānena mahātapāḥ | mahāmaṇivicitreṇa sauvarṇena virājatā

वह महातपस्वी बड़े-बड़े मणियों से विचित्र, चमकते हुए स्वर्णमय विमान से इन्द्र के भवन को जाता है।

श्लोक 106 (14.103.106)

शतकोटिसमास्तत्र सुराधिपतिपूजितः । नाकपृष्ठे निवसति दिव्यस्त्रीगणसेवितः ॥

śatakoṭisamāstatra surādhipatipūjitaḥ | nākapṛṣṭhe nivasati divyastrīgaṇasevitaḥ

वहाँ सौ करोड़ वर्ष तक देवताओं के स्वामी से पूजित होकर वह दिव्य स्त्रियों के समूहों से सेवित स्वर्ग के शिखर पर निवास करता है।

श्लोक 107 (14.103.107)

शक्रलोकावतीर्णश्च मानुषेषूपजायते । राज्ञां राजा महातेजाः सर्वलोकार्चितः प्रभुः ॥

śakralokāvatīrṇaśca mānuṣeṣūpajāyate | rājñāṃ rājā mahātejāḥ sarvalokārcitaḥ prabhuḥ

इन्द्रलोक से उतरकर वह मनुष्यों में राजाओं का राजा होकर जन्म लेता है, महातेजस्वी और सब लोकों से पूजित प्रभु।

श्लोक 108 (14.103.108)

प्रायोपवेशं यश्चापि कुरुते मद्गतात्मना । नमो ब्रह्मण्यदेवायेत्युक्त्वा मन्त्रं समाहितः । अन्तःस्वस्थो जितक्रोधस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

prāyopaveśaṃ yaścāpi kurute madgatātmanā | namo brahmaṇyadevāyetyuktvā mantraṃ samāhitaḥ | antaḥsvastho jitakrodhastasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

और जो मुझमें मन लगाकर प्रायोपवेश (आमरण उपवास) करता है, "ब्राह्मणप्रिय देव को नमस्कार" यह मन्त्र समाहित चित्त से बोलता है, भीतर से शान्त और क्रोध को जीते हुए है, उसके पुण्य का फल सुनो।

श्लोक 109 (14.103.109)

कामगः कामरूपी च बालसूर्यसमप्रभः । स विमानेन दिव्येन याति लोकाननामयान् ॥

kāmagaḥ kāmarūpī ca bālasūryasamaprabhaḥ | sa vimānena divyena yāti lokānanāmayān

इच्छानुसार गमन करने वाला और रूप धारण करने वाला, बालसूर्य के समान प्रभा वाला वह दिव्य विमान से रोग-शोक रहित लोकों को जाता है।

श्लोक 110 (14.103.110)

स्वर्गात्स्वर्गं महातेजा गत्वा चैव यथासुखम् । मम लोकेषु रमते यावदाभूतसंप्लवम् ॥

svargātsvargaṃ mahātejā gatvā caiva yathāsukham | mama lokeṣu ramate yāvadābhūtasaṃplavam

वह महातेजस्वी एक स्वर्ग से दूसरे स्वर्ग में सुखपूर्वक जाकर प्रलयकाल तक मेरे लोकों में रमण करता है।

श्लोक 111 (14.103.111)

अग्निप्रवेशं यश्चापि कुरुते मद्गतात्मना । सोपि यानेन दिव्येन मम लोकं प्रपद्यते ॥

agnipraveśaṃ yaścāpi kurute madgatātmanā | sopi yānena divyena mama lokaṃ prapadyate

और जो मुझमें मन लगाकर अग्नि में प्रवेश करता है, वह भी दिव्य यान से मेरे लोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 112 (14.103.112)

तत्र सर्वगुणोपेतः पश्यन्नेव स मां सदा । त्रिंशत्कोटिसमा राजन्मोदते मम संनिधौ । ततोऽवतीर्णः कालेन वेदविद्ब्राह्मणो भवेत् ॥

tatra sarvaguṇopetaḥ paśyanneva sa māṃ sadā | triṃśatkoṭisamā rājanmodate mama saṃnidhau | tato'vatīrṇaḥ kālena vedavidbrāhmaṇo bhavet

वहाँ सब गुणों से युक्त होकर, सदा मुझे देखता हुआ, हे राजन्, वह तीस करोड़ वर्ष तक मेरे समीप आनन्द करता है। फिर समय आने पर उतरकर वेदज्ञ ब्राह्मण होता है।

श्लोक 113 (14.103.113)

कर्षणं साधयन्यस्तु मां प्रपन्नः शुचिव्रतः । नमो ब्रह्मण्यदेवायेत्येतन्मन्त्रमुदाहरन् ॥

karṣaṇaṃ sādhayanyastu māṃ prapannaḥ śucivrataḥ | namo brahmaṇyadevāyetyetanmantramudāharan

जो शुद्ध व्रत वाला मेरी शरण में आकर "ब्राह्मणप्रिय देव को नमस्कार" इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ शरीर को कृश करने वाली तपस्या करता है,

श्लोक 114 (14.103.114)

बालसूर्यप्रकाशेन विमानेन विराजता । मम लोकं समासाद्य वर्षकोटिं प्रमोदते । मम लोकावतीर्णश्च सोस्मिँल्लोके नृपो भवेत् ॥

bālasūryaprakāśena vimānena virājatā | mama lokaṃ samāsādya varṣakoṭiṃ pramodate | mama lokāvatīrṇaśca sosmim̐lloke nṛpo bhavet

वह बालसूर्य के समान प्रकाशमान विमान से मेरे लोक में पहुँचकर करोड़ वर्ष तक आनन्द करता है। मेरे लोक से उतरकर वह इस लोक में राजा होता है।

श्लोक 115 (14.103.115)

निवेशयति मन्मूर्त्यामात्मानं मद्गतः शुचिः । रुद्रदक्षिणमूर्त्यां वा चतुर्दश्यां विशेषतः ॥

niveśayati manmūrtyāmātmānaṃ madgataḥ śuciḥ | rudradakṣiṇamūrtyāṃ vā caturdaśyāṃ viśeṣataḥ

जो मुझमें भक्त और पवित्र होकर अपने को मेरी मूर्ति में स्थित करता है, अथवा विशेषकर चतुर्दशी को रुद्र की दक्षिण मूर्ति में,

श्लोक 116 (14.103.116)

सिद्धैर्ब्रह्मर्षिभिश्चैव देवलोकैश्च पूजितः । गन्धर्वैर्भूतसङ्घैश्च गीयमानो महातपाः ॥

siddhairbrahmarṣibhiścaiva devalokaiśca pūjitaḥ | gandharvairbhūtasaṅghaiśca gīyamāno mahātapāḥ

सिद्धों, ब्रह्मर्षियों और देवलोकों से पूजित, गन्धर्वों और भूतगणों द्वारा गाया जाता हुआ वह महातपस्वी

श्लोक 117 (14.103.117)

प्रविशेत्स महातेजा मां वा शङ्करमेव वा । न स्यात्पुनर्भवो राजन्नात्र कार्या विचारणा ॥

praviśetsa mahātejā māṃ vā śaṅkarameva vā | na syātpunarbhavo rājannātra kāryā vicāraṇā

वह महातेजस्वी मुझमें अथवा शंकर में प्रवेश करता है। हे राजन्, उसका पुनर्जन्म नहीं होता; इसमें संदेह की कोई बात नहीं।

श्लोक 118 (14.103.118)

गोकृते स्त्रीकृते चैव गुरुविप्रकृतेऽपि वा । हन्यन्ते ये तु राजेन्द्र शक्रलोकं व्रजन्ति ते ॥

gokṛte strīkṛte caiva guruviprakṛte'pi vā | hanyante ye tu rājendra śakralokaṃ vrajanti te

हे राजेन्द्र, जो गौ के लिए, स्त्री के लिए, गुरु अथवा ब्राह्मण के लिए मारे जाते हैं, वे इन्द्रलोक को जाते हैं।

श्लोक 119 (14.103.119)

तत्र जांबूनदमये विमाने कामगामिनि । मन्वन्तरं प्रमोदन्ते दिव्यनारीनिषेविताः ॥

tatra jāṃbūnadamaye vimāne kāmagāmini | manvantaraṃ pramodante divyanārīniṣevitāḥ

वहाँ जाम्बूनद स्वर्ण के बने, इच्छानुसार चलने वाले विमान में दिव्य स्त्रियों से सेवित होकर वे एक मन्वन्तर तक आनन्द करते हैं।

श्लोक 120 (14.103.120)

आश्रुतस्याप्रदानेन दत्तस्य हरणेन च । जन्मप्रभृति यद्दत्तं सर्वं नश्यति भारत ॥

āśrutasyāpradānena dattasya haraṇena ca | janmaprabhṛti yaddattaṃ sarvaṃ naśyati bhārata

जो देने की घोषणा की हो उसे न देने से और दिए हुए को वापस ले लेने से, हे भारत, जन्म से लेकर जो कुछ दिया गया हो वह सब नष्ट हो जाता है।

श्लोक 121 (14.103.121)

नागोप्रदास्तत्र पयः पिबन्ति । नाभूमिदा भूमिमथाश्नुवन्ति । यान्यान्कामान्ब्राह्मणेभ्यो ददाति । तांस्तान्कामान्स्वर्गलोके च भुङ्क्ते ॥

nāgopradāstatra payaḥ pibanti | nābhūmidā bhūmimathāśnuvanti | yānyānkāmānbrāhmaṇebhyo dadāti | tāṃstānkāmānsvargaloke ca bhuṅkte

जिन्होंने गौएँ नहीं दीं, वे वहाँ दूध नहीं पीते; जिन्होंने भूमि नहीं दी, वे भूमि नहीं पाते। जो-जो कामनाएँ मनुष्य ब्राह्मणों को पूरी करके देता है, उन्हीं-उन्हीं कामनाओं को वह स्वर्गलोक में भोगता है।

श्लोक 122 (14.103.122)

यद्यदिष्टतमं द्रव्यं न्यायेनोपार्जितं च यत् । तत्तद्गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता ॥

yadyadiṣṭatamaṃ dravyaṃ nyāyenopārjitaṃ ca yat | tattadguṇavate deyaṃ tadevākṣayamicchatā

जो वस्तु सबसे अधिक प्रिय हो और जो न्याय से कमाई गई हो, उसे अक्षय फल चाहने वाले को गुणवान् पात्र को देना चाहिए।

श्लोक 123 (14.103.123)

अनुपोष्य त्रिरात्राणि तीर्थान्यनभिगम्य च । अदत्त्वा काञ्चनं गां च दरिद्रो नाम जायते ॥

anupoṣya trirātrāṇi tīrthānyanabhigamya ca | adattvā kāñcanaṃ gāṃ ca daridro nāma jāyate

जो तीन रात का उपवास किए बिना, तीर्थों में गए बिना और सोने तथा गौ का दान किए बिना रहता है, वह दरिद्र होकर जन्म लेता है।

श्लोक 124 (14.103.124)

दानं यत्तत्फलं नैति श्रोत्रियाय न दीयते । श्रोत्रिया यत्र नाश्नन्ति न देवास्तत्र भुञ्जते ॥

dānaṃ yattatphalaṃ naiti śrotriyāya na dīyate | śrotriyā yatra nāśnanti na devāstatra bhuñjate

जो दान श्रोत्रिय को नहीं दिया जाता, वह फल तक नहीं पहुँचता; जहाँ श्रोत्रिय भोजन नहीं करते, वहाँ देवता भी भोजन नहीं करते।

श्लोक 125 (14.103.125)

श्रोत्रियेभ्यः परं नास्ति परमं दैवतं महत् । निधानं चापि राजेन्द्र तस्माच्छ्रोत्रियभोजनात् ॥

śrotriyebhyaḥ paraṃ nāsti paramaṃ daivataṃ mahat | nidhānaṃ cāpi rājendra tasmācchrotriyabhojanāt

श्रोत्रियों से बढ़कर कुछ नहीं है, उनसे बड़ा कोई परम देवता नहीं है; इसलिए हे राजेन्द्र, श्रोत्रियों को भोजन कराना ही एक संचित निधि है।

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