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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 104

पञ्च महायज्ञ, स्नान की विधि और भगवान् की पूजा

युधिष्ठिर पूछते हैं कि शरीर छूट जाने पर प्राण की गति क्या होती है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि सच्चे अर्थ में मरण पापियों का ही होता है, और फिर गृहस्थ के प्रतिदिन करने योग्य पाँच महायज्ञों के नाम बताते हैं। वे स्नान की पूरी विधि, देवताओं, ऋषियों और पितरों के तर्पण तथा स्वाध्याय का क्रम कहते हैं। इसके बाद वे अपने प्रिय और वर्जित फूल, अपनी पूजा के रूप, भक्तों के व्रत और लक्षण बताते हैं, और देह के भीतर क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के नाम से गिनाए गए दोषों का वर्णन करते हैं, जिनके न रहने पर ही मनुष्य सच्चा ब्राह्मण होता है।

अध्याय 103अध्याय-सूचीअध्याय 105

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (14.104.1)

विप्रयोगे शरीरस्य सेन्द्रियस्य विशेषतः । अन्तरा वर्तमानस्य गतिः प्राणस्य कीदृशी ॥

viprayoge śarīrasya sendriyasya viśeṣataḥ | antarā vartamānasya gatiḥ prāṇasya kīdṛśī

शरीर का, और विशेषकर इन्द्रियों सहित शरीर का, वियोग हो जाने पर बीच की अवस्था में रहनेवाले प्राण की गति कैसी होती है?

भगवानुवाच

श्लोक 2 (14.104.2)

शुभाशुभकृतं सर्वं प्राप्नोतीह फलं नरः । न तु सर्वस्य भूतस्य पञ्चत्वं विद्यते नृप ॥

śubhāśubhakṛtaṃ sarvaṃ prāpnotīha phalaṃ naraḥ | na tu sarvasya bhūtasya pañcatvaṃ vidyate nṛpa

मनुष्य यहाँ अपने किए शुभ और अशुभ सब कर्मों का फल पाता है; किन्तु हे राजन्, पाँच तत्त्वों में लय होना, अर्थात् मृत्यु, हर प्राणी की नहीं होती।

श्लोक 3 (14.104.3)

पञ्चत्वं पाण्डवश्रेष्ठ भूरिभूतिकरं नृणाम् । तेषां पञ्च महायज्ञान्ये कुर्वन्ति द्विजोत्तम ॥

pañcatvaṃ pāṇḍavaśreṣṭha bhūribhūtikaraṃ nṛṇām | teṣāṃ pañca mahāyajñānye kurvanti dvijottama

हे पाण्डवश्रेष्ठ! पाँच तत्त्वों में यह लय मनुष्यों के लिए बड़ा कल्याणकारी है, उनके लिए, हे द्विजोत्तम, जो पाँच महायज्ञ करते हैं।

श्लोक 4 (14.104.4)

पञ्चत्वं पञ्चभिर्भूतैर्वियोगं संप्रचक्षते । न जायते न म्रियते पुरुषः शाश्वतः सदा ॥

pañcatvaṃ pañcabhirbhūtairviyogaṃ saṃpracakṣate | na jāyate na mriyate puruṣaḥ śāśvataḥ sadā

पाँच भूतों से वियोग को पञ्चत्व कहते हैं। पुरुष सदा शाश्वत है; वह न जन्म लेता है, न मरता है।

श्लोक 5 (14.104.5)

प्रायेण मरणं नाम पापिनामेव पाण्डव । येषां तु न गतिः पुण्या तेषां मरणमुच्यते ॥

prāyeṇa maraṇaṃ nāma pāpināmeva pāṇḍava | yeṣāṃ tu na gatiḥ puṇyā teṣāṃ maraṇamucyate

हे पाण्डव! प्रायः मरण पापियों का ही होता है। जिनकी गति पुण्यमयी नहीं होती, उन्हीं के लिए मरण शब्द कहा जाता है।

श्लोक 6 (14.104.6)

प्रायेणाकृतकृत्यस्तु मृत्योरुद्विजते जनः । कृतकृत्याः प्रतीक्षन्ते मृत्युं प्रियमिवातिथिम् ॥

prāyeṇākṛtakṛtyastu mṛtyorudvijate janaḥ | kṛtakṛtyāḥ pratīkṣante mṛtyuṃ priyamivātithim

प्रायः जिन्होंने अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया, वे लोग मृत्यु से घबराते हैं; और जो कृतकृत्य हैं, वे मृत्यु की प्रतीक्षा प्रिय अतिथि की तरह करते हैं।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 7 (14.104.7)

पञ्च यज्ञाः कथं देव क्रियन्तेऽत्र द्विजातिभिः । तेषां नाम च देवेश वक्तुमर्हस्यशेषतः ॥

pañca yajñāḥ kathaṃ deva kriyante'tra dvijātibhiḥ | teṣāṃ nāma ca deveśa vaktumarhasyaśeṣataḥ

हे देव! द्विजाति लोग यहाँ पाँच यज्ञ किस प्रकार करते हैं? हे देवेश! उनके नाम भी आप सम्पूर्ण रूप से बताइए।

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 8 (14.104.8)

शृणु पञ्च महायज्ञान्कीर्त्यमानान्युधिष्ठिर । यैरेव ब्रह्मसालोक्यं लभ्यते गृहमेधिना ॥

śṛṇu pañca mahāyajñānkīrtyamānānyudhiṣṭhira | yaireva brahmasālokyaṃ labhyate gṛhamedhinā

युधिष्ठिर! मैं जिन पाँच महायज्ञों के नाम बताता हूँ, उन्हें सुनो; इन्हीं से गृहस्थ को ब्रह्मा के लोक की प्राप्ति होती है।

श्लोक 9 (14.104.9)

ऋभुयज्ञं ब्रह्मयज्ञं भूतयज्ञं च पाण्डव । नृयज्ञं पितृयज्ञं च पञ्च यज्ञान्प्रचक्षते ॥

ṛbhuyajñaṃ brahmayajñaṃ bhūtayajñaṃ ca pāṇḍava | nṛyajñaṃ pitṛyajñaṃ ca pañca yajñānpracakṣate

हे पाण्डव! ऋभुयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, भूतयज्ञ, नृयज्ञ और पितृयज्ञ, इन्हें पाँच यज्ञ कहते हैं।

श्लोक 10 (14.104.10)

तर्पणं ऋभुयज्ञः स्यात्स्वाध्यायो ब्रह्मयज्ञकः । भूतयज्ञो बलिर्यज्ञो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् । पितॄनुद्दिश्य यत्कर्म पितृयज्ञः प्रकीर्तितः ॥

tarpaṇaṃ ṛbhuyajñaḥ syātsvādhyāyo brahmayajñakaḥ | bhūtayajño baliryajño nṛyajño'tithipūjanam | pitṝnuddiśya yatkarma pitṛyajñaḥ prakīrtitaḥ

तर्पण ऋभुयज्ञ है; स्वाध्याय ब्रह्मयज्ञ है; बलि भूतयज्ञ है; अतिथि की पूजा नृयज्ञ है; और पितरों के उद्देश्य से जो कर्म किया जाता है, वह पितृयज्ञ कहलाता है।

श्लोक 11 (14.104.11)

हुतं चाप्यहुतं चैव तथा प्रहुतमेव च । प्राशितं बलिदानं च पाकयज्ञान्प्रचक्षते ॥

hutaṃ cāpyahutaṃ caiva tathā prahutameva ca | prāśitaṃ balidānaṃ ca pākayajñānpracakṣate

हुत, अहुत, प्रहुत, प्राशित और बलिदान, इन्हें पाकयज्ञ कहते हैं।

श्लोक 12 (14.104.12)

वैश्वदेवादयो होमा हुतमित्युच्यते बुधैः । अहुतं च भवेद्दत्तं प्रहुतं ब्राह्मणाशितम् ॥

vaiśvadevādayo homā hutamityucyate budhaiḥ | ahutaṃ ca bhaveddattaṃ prahutaṃ brāhmaṇāśitam

विद्वान् लोग वैश्वदेव आदि होमों को हुत कहते हैं; जो दान में दिया जाए वह अहुत है; और जो ब्राह्मणों द्वारा खाया जाए वह प्रहुत है।

श्लोक 13 (14.104.13)

प्राणाग्निहोत्रहोमं च प्राशितं विधिवद्विदुः । बलिकर्म च राजेन्द्र पाकयज्ञाः प्रकीर्तिताः ॥

prāṇāgnihotrahomaṃ ca prāśitaṃ vidhivadviduḥ | balikarma ca rājendra pākayajñāḥ prakīrtitāḥ

प्राणों को अग्निहोत्र की तरह विधिपूर्वक आहुति देने को वे प्राशित जानते हैं; और हे राजेन्द्र, बलिकर्म भी इसी में है। ये पाकयज्ञ कहे गए हैं।

श्लोक 14 (14.104.14)

केचित्पञ्च महायज्ञान्पाकयज्ञान्प्रचक्षते । अपरे ब्रह्मयज्ञादीन्महायज्ञविदो विदुः ॥

kecitpañca mahāyajñānpākayajñānpracakṣate | apare brahmayajñādīnmahāyajñavido viduḥ

कुछ लोग पाँच महायज्ञों को ही पाकयज्ञ कहते हैं; महायज्ञों के दूसरे जानकार ब्रह्मयज्ञ आदि को महायज्ञ मानते हैं।

श्लोक 15 (14.104.15)

सर्व एते महायज्ञाः सर्वथा परिकीर्तिताः । बुभुक्षितान्ब्राह्मणांस्तु यथाशक्ति न हापयेत् ॥

sarva ete mahāyajñāḥ sarvathā parikīrtitāḥ | bubhukṣitānbrāhmaṇāṃstu yathāśakti na hāpayet

ये सभी हर प्रकार से महायज्ञ कहे गए हैं। भूखे ब्राह्मणों को यथाशक्ति कभी निराश न करे।

श्लोक 16 (14.104.16)

अहन्यहनि ये त्वेतानकृत्वा भुञ्जते स्वयम् । केवलं मलमश्नन्ति ते नरा न च संशयः ॥

ahanyahani ye tvetānakṛtvā bhuñjate svayam | kevalaṃ malamaśnanti te narā na ca saṃśayaḥ

जो लोग प्रतिदिन इन्हें किए बिना स्वयं भोजन करते हैं, वे मनुष्य केवल मल खाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 17 (14.104.17)

तस्मात्स्नात्वा द्विजो विद्वान्कुर्यादेतान्दिनेदिने । अतोऽन्यथा तु भुञ्जन्वै प्रायश्चित्ती भवेद्द्विजः ॥

tasmātsnātvā dvijo vidvānkuryādetāndinedine | ato'nyathā tu bhuñjanvai prāyaścittī bhaveddvijaḥ

इसलिए विद्वान् द्विज स्नान करके प्रतिदिन इन्हें करे। इसके विपरीत भोजन करनेवाले द्विज को प्रायश्चित्त करना पड़ता है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 18 (14.104.18)

देवदेवेश दैत्यघ्न त्वद्भक्तस्य जनार्दन । वक्तुमर्हसि देवेश स्नानस्य च विधिं मम ॥

devadeveśa daityaghna tvadbhaktasya janārdana | vaktumarhasi deveśa snānasya ca vidhiṃ mama

हे देवदेवेश, दैत्यों का नाश करनेवाले जनार्दन! मुझ अपने भक्त को आप स्नान की विधि बताइए, हे देवेश।

भगवानुवाच

श्लोक 19 (14.104.19)

शृणु पाण्डव तत्सर्वं पवित्रं पापनाशनम् । स्नात्वा येन विधानेन मुच्यन्ते किल्बिषाद्द्विजाः ॥

śṛṇu pāṇḍava tatsarvaṃ pavitraṃ pāpanāśanam | snātvā yena vidhānena mucyante kilbiṣāddvijāḥ

पाण्डव! वह सब सुनो, जो पवित्र और पापनाशक है, अर्थात् वह विधि जिससे स्नान करके द्विज पाप से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 20 (14.104.20)

मृदं च गोमयं चैव तिलं दर्भांस्तथैव च । पुष्पाण्यपि यथान्यायमादाय तु जलं व्रजेत् ॥

mṛdaṃ ca gomayaṃ caiva tilaṃ darbhāṃstathaiva ca | puṣpāṇyapi yathānyāyamādāya tu jalaṃ vrajet

मिट्टी, गोबर, तिल, दर्भ और विधि के अनुसार फूल भी लेकर वह जल के पास जाए।

श्लोक 21 (14.104.21)

नद्यां स्नात्वा न च स्नायादन्यत्र द्विजसत्तम । सति प्रभूते पयसि नाल्पे स्नायात्कदाचन ॥

nadyāṃ snātvā na ca snāyādanyatra dvijasattama | sati prabhūte payasi nālpe snāyātkadācana

हे द्विजश्रेष्ठ! वह नदी में स्नान करे, अन्यत्र नहीं। जहाँ बहुत जल हो, वहाँ कभी थोड़े जल में स्नान न करे।

श्लोक 22 (14.104.22)

गत्वोदकसमीपं तु शुचौ देशे मनोरमे । ततो मृद्गोमयादीनि तत्र विप्रो विनिक्षिपेत् ॥

gatvodakasamīpaṃ tu śucau deśe manorame | tato mṛdgomayādīni tatra vipro vinikṣipet

जल के समीप किसी स्वच्छ और सुन्दर स्थान पर पहुँचकर ब्राह्मण वहाँ मिट्टी, गोबर आदि रख दे।

श्लोक 23 (14.104.23)

बहिः प्रक्षाल्य पादौ च द्विराचम्य प्रयत्नतः । प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कुर्यात्तु तज्जलम् ॥

bahiḥ prakṣālya pādau ca dvirācamya prayatnataḥ | pradakṣiṇaṃ samāvṛtya namaskuryāttu tajjalam

जल से बाहर दोनों पैर धोकर, सावधानी से दो बार आचमन करके, प्रदक्षिणा कर वह उस जल को नमस्कार करे।

श्लोक 24 (14.104.24)

न च प्रक्षालयेद्विद्वांस्तीर्थमद्भिः कदाचन । न च पादेन वा हन्याद्धस्तेनान्येन तज्जलम् ॥

na ca prakṣālayedvidvāṃstīrthamadbhiḥ kadācana | na ca pādena vā hanyāddhastenānyena tajjalam

विद्वान् उस जल से घाट को कभी न धोए, और उस जल पर पैर, हाथ या किसी और वस्तु से प्रहार न करे।

श्लोक 25 (14.104.25)

सर्वदेवमया ह्यापो मन्मयाः पाण्डुनन्दन । तस्मात्तास्तु न हन्तव्यास्त्वद्भिः प्रक्षालयेत्स्थलं ॥

sarvadevamayā hyāpo manmayāḥ pāṇḍunandana | tasmāttāstu na hantavyāstvadbhiḥ prakṣālayetsthalaṃ

हे पाण्डुनन्दन! जल सब देवताओं से बने हैं और मुझसे ही बने हैं। इसलिए उन पर प्रहार न किया जाए; पर जल से वह भूमि को धो ले।

श्लोक 26 (14.104.26)

केवलं प्रथमं मज्जेन्नाङ्गानि विमृशेद्बुधः । तत्तु तीर्थं समासाद्य कुर्यादाचमनं पुनः ॥

kevalaṃ prathamaṃ majjennāṅgāni vimṛśedbudhaḥ | tattu tīrthaṃ samāsādya kuryādācamanaṃ punaḥ

पहले केवल डुबकी लगाए, अंगों को न मले; विद्वान् उस घाट पर पहुँचकर फिर आचमन करे।

श्लोक 27 (14.104.27)

गोकर्णाकृतिवत्कृत्वा करं त्रिः प्रपिबेज्जलम् । द्विस्तत्परिमृजेद्वक्त्रं पादावभ्युक्ष्य चात्मनः । शीर्षण्यांस्तु ततः प्राणान्सकृदेव तु संस्पृशेत् ॥

gokarṇākṛtivatkṛtvā karaṃ triḥ prapibejjalam | dvistatparimṛjedvaktraṃ pādāvabhyukṣya cātmanaḥ | śīrṣaṇyāṃstu tataḥ prāṇānsakṛdeva tu saṃspṛśet

हाथ को गाय के कान के आकार का बनाकर तीन बार जल पिए; दो बार मुख पोंछे; पैरों पर और अपने ऊपर जल छिड़के; फिर सिर के प्राणों, अर्थात् इन्द्रियों, को एक ही बार छुए।

श्लोक 28 (14.104.28)

बाहू द्वौ च ततः स्पृष्ट्वा हृदयं नाभिमेव च । प्रत्यङ्गमुदकं स्पृष्ट्वा मूर्धानं तु पुनः स्पृशेत् ॥

bāhū dvau ca tataḥ spṛṣṭvā hṛdayaṃ nābhimeva ca | pratyaṅgamudakaṃ spṛṣṭvā mūrdhānaṃ tu punaḥ spṛśet

फिर दोनों भुजाओं, हृदय और नाभि को छूकर, प्रत्येक अंग को जल से स्पर्श करके वह पुनः मस्तक को छुए।

श्लोक 29 (14.104.29)

आपः पुनन्त्वित्युक्त्वा च पुनराचमनं चरेत् । सोङ्कारव्याहृतीर्वाऽपि सदसस्पतिमित्यृचम् ॥

āpaḥ punantvityuktvā ca punarācamanaṃ caret | soṅkāravyāhṛtīrvā'pi sadasaspatimityṛcam

आपः पुनन्तु कहकर वह फिर आचमन करे; अथवा ओंकार और व्याहृतियों के साथ, या सदसस्पतिम् इस ऋचा के साथ।

श्लोक 30 (14.104.30)

आचम्य मृत्तिकाः पश्चात्त्रिधा कृत्वा समालभेत् । ऋचेदं विष्णुरित्यङ्गमुत्तमाधममध्यमम् । आलभ्य वारुणैः सूक्तैर्नमस्कृत्य जलं ततः ॥

ācamya mṛttikāḥ paścāttridhā kṛtvā samālabhet | ṛcedaṃ viṣṇurityaṅgamuttamādhamamadhyamam | ālabhya vāruṇaiḥ sūktairnamaskṛtya jalaṃ tataḥ

आचमन के बाद वह मिट्टी के तीन भाग करके उसे लगाए। इदं विष्णुः इस ऋचा से शरीर के ऊपरी, निचले और बीच के भागों पर लगाकर, वरुण के सूक्तों से जल को नमस्कार करे।

श्लोक 31 (14.104.31)

स्रवन्ती चेत्प्रतिस्रोतः प्रत्यर्कं चान्यवारिषु । मज्जेदोमित्युदाहृत्य न च विक्षोभयेज्जलम् ॥

sravantī cetpratisrotaḥ pratyarkaṃ cānyavāriṣu | majjedomityudāhṛtya na ca vikṣobhayejjalam

यदि जल बहती धारा हो तो वह धारा के सामने मुख करे, और अन्य जलों में सूर्य के सामने। ओम् कहकर डुबकी लगाए और जल को क्षुब्ध न करे।

श्लोक 32 (14.104.32)

गोमयं च त्रिधा कृत्वा जले पूर्वं समालभेत् । सव्याहृतीकां सप्रणवां गायत्रीं च जपेत्पुनः ॥

gomayaṃ ca tridhā kṛtvā jale pūrvaṃ samālabhet | savyāhṛtīkāṃ sapraṇavāṃ gāyatrīṃ ca japetpunaḥ

गोबर के भी तीन भाग करके वह पहले जल में उसे लगाए; फिर व्याहृतियों और प्रणव सहित गायत्री का जप करे।

श्लोक 33 (14.104.33)

पुनराचमनं कृत्वा मद्गतेनान्तरात्मना । आपोहिष्ठेति तिसृभिर्ऋग्भिः पूतेन वारिणा । तथा तरत्समन्दीभिः सिञ्चेच्चतसृभिः क्रमात् ॥

punarācamanaṃ kṛtvā madgatenāntarātmanā | āpohiṣṭheti tisṛbhirṛgbhiḥ pūtena vāriṇā | tathā taratsamandībhiḥ siñceccatasṛbhiḥ kramāt

फिर आचमन करके, मुझमें अन्तरात्मा लगाए हुए, वह आपो हि ष्ठा की तीन ऋचाओं से पवित्र किए हुए जल से, और फिर तरत्समन्दी की चार ऋचाओं से क्रम से अपने ऊपर जल छिड़के।

श्लोक 34 (14.104.34)

गोसूक्तेनाश्वसूक्तेन शुद्धवर्गेण चात्मनः । वैष्णवैर्वारुणैः सूक्तैः सावित्रैरिन्द्रदेवतैः ॥

gosūktenāśvasūktena śuddhavargeṇa cātmanaḥ | vaiṣṇavairvāruṇaiḥ sūktaiḥ sāvitrairindradevataiḥ

वह गोसूक्त, अश्वसूक्त और शुद्धिकारक सूक्तों के समूह से, तथा विष्णु, वरुण, सविता और इन्द्र के सूक्तों से अपने ऊपर जल छिड़के,

श्लोक 35 (14.104.35)

वामदैव्येन चात्मानमन्यैर्मन्मयसामभिः । स्थित्वाऽन्तःसलिले सूक्तं जपेद्वाचाऽघमर्षणं ॥

vāmadaivyena cātmānamanyairmanmayasāmabhiḥ | sthitvā'ntaḥsalile sūktaṃ japedvācā'ghamarṣaṇaṃ

और वामदेव्य साम तथा मुझसे परिपूर्ण अन्य सामों से भी। जल के भीतर खड़े होकर वह वाणी से अघमर्षण सूक्त का जप करे।

श्लोक 36 (14.104.36)

सव्याहृतीकां सप्रणवां गायत्रीं वा ततो जपेत् । आश्वासमोक्षात्प्रणवं जपेद्वा मामनुस्मरन् ॥

savyāhṛtīkāṃ sapraṇavāṃ gāyatrīṃ vā tato japet | āśvāsamokṣātpraṇavaṃ japedvā māmanusmaran

फिर वह व्याहृतियों और प्रणव सहित गायत्री का जप करे; अथवा मेरा स्मरण करते हुए साँस रुक जाने तक प्रणव का जप करे।

श्लोक 37 (14.104.37)

उत्प्लुत्य तीर्थमासाद्य धौते शुक्ले च वाससी । शुद्धे चाच्छादयेत्कक्षे न कुर्यात्परिपाशके ॥

utplutya tīrthamāsādya dhaute śukle ca vāsasī | śuddhe cācchādayetkakṣe na kuryātparipāśake

जल से निकलकर घाट पर आकर वह धुले हुए, श्वेत और स्वच्छ दो वस्त्र पहने और कटि के दोनों ओर उन्हें ठीक से ढक ले, पर गाँठ बाँधकर बन्धन न बनाए।

श्लोक 38 (14.104.38)

पाशेन बद्ध्वा कक्षे यत्कुरुते कर्म वैदिकम् । राक्षसा दानवा दैत्यास्तद्विलुंपन्ति हर्षिताः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कक्ष्यापाशं न धारयेत् ॥

pāśena baddhvā kakṣe yatkurute karma vaidikam | rākṣasā dānavā daityāstadviluṃpanti harṣitāḥ | tasmātsarvaprayatnena kakṣyāpāśaṃ na dhārayet

कमर में गाँठ बाँधकर जो वैदिक कर्म किया जाता है, उसे राक्षस, दानव और दैत्य हर्षित होकर छीन लेते हैं। इसलिए पूरे प्रयत्न से कमर में गाँठ का बन्धन न रखे।

श्लोक 39 (14.104.39)

ततः प्रक्षाल्य पादौ च हस्तौ चैव मृदा शनैः । आचम्य पुनराचामेत्पुनः सावित्रिया द्विजः ॥

tataḥ prakṣālya pādau ca hastau caiva mṛdā śanaiḥ | ācamya punarācāmetpunaḥ sāvitriyā dvijaḥ

फिर वह धीरे-धीरे मिट्टी से पैर और हाथ धोकर आचमन करे, और द्विज होने के नाते फिर सावित्री के साथ आचमन करे।

श्लोक 40 (14.104.40)

प्राङ्मुखोदङ्मुखो वाऽपि ध्यायन्वेदान्समाहितः । जले जलगतः शुद्धः स्थल एव स्थलस्थितः । उभयत्र स्थितस्तस्मादाचामेदात्मशुद्धये ॥

prāṅmukhodaṅmukho vā'pi dhyāyanvedānsamāhitaḥ | jale jalagataḥ śuddhaḥ sthala eva sthalasthitaḥ | ubhayatra sthitastasmādācāmedātmaśuddhaye

पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके, एकाग्र होकर वेदों का ध्यान करते हुए: जल में स्थित मनुष्य जल में शुद्ध होता है, स्थल पर स्थित स्थल पर। इसलिए दोनों में से जहाँ भी हो, वहाँ आत्मशुद्धि के लिए आचमन करे।

श्लोक 41 (14.104.41)

दर्भेषु दर्भपाणिः सन्प्राङ्मुखः सुसमाहितः । प्राणायामांस्ततः कुर्यान्मद्गतेनान्तरात्मना ॥

darbheṣu darbhapāṇiḥ sanprāṅmukhaḥ susamāhitaḥ | prāṇāyāmāṃstataḥ kuryānmadgatenāntarātmanā

दर्भ पर खड़ा होकर, हाथ में दर्भ लिए, पूर्वमुख और भलीभाँति एकाग्र होकर, मुझमें अन्तरात्मा लगाए हुए वह प्राणायाम करे।

श्लोक 42 (14.104.42)

सहस्रकृत्वः सावित्रीं शतकृत्वस्तु वा जपेत् ॥

sahasrakṛtvaḥ sāvitrīṃ śatakṛtvastu vā japet

वह सावित्री का हजार बार जप करे, या सौ बार।

श्लोक 43 (14.104.43)

समाहितो जपेत्तस्मात्सावित्र्या चाभिमन्त्र्य च । मन्देहानां विनाशाय रक्षसां विक्षिपेज्जलम् ॥

samāhito japettasmātsāvitryā cābhimantrya ca | mandehānāṃ vināśāya rakṣasāṃ vikṣipejjalam

इसलिए एकाग्र होकर जप करे, और सावित्री से जल को अभिमन्त्रित करके मन्देह नामक राक्षसों और अन्य राक्षसों के नाश के लिए उसे फेंके।

श्लोक 44 (14.104.44)

उद्वर्गोसीत्यथा चान्तःप्रायश्चित्तजलं क्षिपेत् ॥

udvargosītyathā cāntaḥprāyaścittajalaṃ kṣipet

फिर उद्वर्गोऽसि कहकर आचमन करके वह प्रायश्चित्त का जल फेंक दे।

श्लोक 45 (14.104.45)

अथादाय सुपुष्पाणि तोयमञ्जलिना द्विजः । प्रक्षिप्य प्रतिसूर्यं च व्योममुद्रां प्रकल्पयेत् ॥

athādāya supuṣpāṇi toyamañjalinā dvijaḥ | prakṣipya pratisūryaṃ ca vyomamudrāṃ prakalpayet

फिर द्विज सुन्दर फूल और जल अंजलि में लेकर सूर्य की ओर अर्पित करे और व्योममुद्रा बनाए।

श्लोक 46 (14.104.46)

ततो द्वादशकृत्वस्तु सूर्यस्यैकाक्षरं जपेत् । ततः षडक्षरादीनि षट्कृत्वः परिवर्तयेत् ॥

tato dvādaśakṛtvastu sūryasyaikākṣaraṃ japet | tataḥ ṣaḍakṣarādīni ṣaṭkṛtvaḥ parivartayet

फिर वह सूर्य के एकाक्षर मन्त्र का बारह बार जप करे, और उसके बाद षडक्षर आदि मन्त्रों को छह-छह बार दुहराए।

श्लोक 47 (14.104.47)

प्रदक्षिणं परामृश्य मुद्रया स्वमुखान्तरे । ऊर्ध्वबाहुस्ततो भूत्वा सूर्यमीक्षेत्समाहितः ॥

pradakṣiṇaṃ parāmṛśya mudrayā svamukhāntare | ūrdhvabāhustato bhūtvā sūryamīkṣetsamāhitaḥ

मुद्रा के साथ अपने मुख के सामने प्रदक्षिणा की क्रिया करके, वह फिर दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर एकाग्र मन से सूर्य को देखे।

श्लोक 48 (14.104.48)

तन्मण्डलस्थं मां ध्यायंस्तेजोमूर्तिं चतुर्भुजम् । उदुत्यं च जपेन्मन्त्रं चित्रं तच्चक्षुरित्यपि ॥

tanmaṇḍalasthaṃ māṃ dhyāyaṃstejomūrtiṃ caturbhujam | udutyaṃ ca japenmantraṃ citraṃ taccakṣurityapi

उस मण्डल में स्थित, तेजोमय रूपवाले चतुर्भुज मेरा ध्यान करते हुए वह उदु त्यम् मन्त्र और चित्रं तच्चक्षुः का जप करे।

श्लोक 49 (14.104.49)

सावित्रीं च यथाशक्ति जप्त्वा सूक्तं च मामकम् । मन्मयानि च सामानि पुरुषव्रतमेव च ॥

sāvitrīṃ ca yathāśakti japtvā sūktaṃ ca māmakam | manmayāni ca sāmāni puruṣavratameva ca

यथाशक्ति सावित्री का जप करके वह मेरा सूक्त, मुझसे परिपूर्ण साम और पुरुषव्रत भी जपे।

श्लोक 50 (14.104.50)

ततश्चालोकयेदर्कं हंसः शुचिषदित्यपि । प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कृत्य दिवाकरम् ॥

tataścālokayedarkaṃ haṃsaḥ śuciṣadityapi | pradakṣiṇaṃ samāvṛtya namaskṛtya divākaram

फिर वह हंसः शुचिषत् इस ऋचा से सूर्य को देखे, प्रदक्षिणा करे और दिवाकर को नमस्कार करे।

श्लोक 51 (14.104.51)

ततस्तु तर्पयेदद्भिर्ब्रह्माणं मां च शङ्करम् । प्रजापतिं च देवांश्च तथा देवमुनीनपि ॥

tatastu tarpayedadbhirbrahmāṇaṃ māṃ ca śaṅkaram | prajāpatiṃ ca devāṃśca tathā devamunīnapi

फिर वह जल से ब्रह्मा, मुझे और शंकर को तृप्त करे, और प्रजापति, देवताओं तथा देवर्षियों को भी,

श्लोक 52 (14.104.52)

साङ्गानपि तथा वेदानितिहासान्क्रतूनपि । पुराणानि च सर्वाणि कुलान्यप्सरसां तथा ॥

sāṅgānapi tathā vedānitihāsānkratūnapi | purāṇāni ca sarvāṇi kulānyapsarasāṃ tathā

अंगों सहित वेदों, इतिहासों, यज्ञों, सभी पुराणों और अप्सराओं के कुलों को भी,

श्लोक 53 (14.104.53)

क्रतून्संवत्सरं चैव कलाकाष्ठात्मकं तथा । भूतग्रामांश्च भूतानि सरितः सागरांस्तथा । शैलाञ्शैलस्थितान्देवानोषधीः सवनस्पतीः ॥

kratūnsaṃvatsaraṃ caiva kalākāṣṭhātmakaṃ tathā | bhūtagrāmāṃśca bhūtāni saritaḥ sāgarāṃstathā | śailāñśailasthitāndevānoṣadhīḥ savanaspatīḥ

यज्ञों को, कला और काष्ठा से बने संवत्सर को, भूतसमूहों और प्राणियों को, नदियों और समुद्रों को, पर्वतों और पर्वतों पर रहनेवाले देवताओं को, तथा वृक्षों सहित औषधियों को।

श्लोक 54 (14.104.54)

तर्पयेदुपवीती च प्रत्येकं तृप्यतामिति । अन्वारभ्य च सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु ॥

tarpayedupavītī ca pratyekaṃ tṛpyatāmiti | anvārabhya ca savyena pāṇinā dakṣiṇena tu

जनेऊ को बायें कन्धे पर रखकर वह प्रत्येक को अलग-अलग तृप्यताम् कहकर तृप्त करे; बायें हाथ का सहारा देकर दाहिने हाथ से जल दे।

श्लोक 55 (14.104.55)

निवीती तर्पयेद्विद्वानृषीन्मन्त्रकृतस्तथा । मरीच्यादीनृषींश्चैव नारदाद्यान्समाहितः ॥

nivītī tarpayedvidvānṛṣīnmantrakṛtastathā | marīcyādīnṛṣīṃścaiva nāradādyānsamāhitaḥ

जनेऊ को माला की तरह गले में डालकर विद्वान् एकाग्र होकर मन्त्रों की रचना करनेवाले ऋषियों को तृप्त करे: मरीचि आदि ऋषियों को, और नारद आदि को भी।

श्लोक 56 (14.104.56)

प्राचीनावीत्यथैतास्तु तर्पयेद्देवताः पितॄन् । ततस्तु कव्यवाडग्निं सोमं वैवस्वतं तथा ॥

prācīnāvītyathaitāstu tarpayeddevatāḥ pitṝn | tatastu kavyavāḍagniṃ somaṃ vaivasvataṃ tathā

फिर जनेऊ दाहिने कन्धे पर रखकर वह इन देव-पितरों को तृप्त करे: कव्यवाहन अग्नि, सोम और वैवस्वत को,

श्लोक 57 (14.104.57)

ततश्चार्यमणं चापि ह्यग्निष्वात्तांस्तथैव च । सोमपांश्चैव दर्भेषु सतिलैरेव वारिभिः । तृप्यतामिति पश्चात्तु स पितॄंस्तर्पयेत्ततः ॥

tataścāryamaṇaṃ cāpi hyagniṣvāttāṃstathaiva ca | somapāṃścaiva darbheṣu satilaireva vāribhiḥ | tṛpyatāmiti paścāttu sa pitṝṃstarpayettataḥ

और अर्यमा, अग्निष्वात्त तथा सोमप पितरों को, दर्भों पर तिलसहित जल से तृप्यताम् कहकर। इसके बाद वह अपने पितरों को तृप्त करे।

श्लोक 58 (14.104.58)

पितॄन्पितामहांश्चैव तथैव प्रपितामहान् । पितामहीस्तथा चापि तथैव प्रपितामहीः ॥

pitṝnpitāmahāṃścaiva tathaiva prapitāmahān | pitāmahīstathā cāpi tathaiva prapitāmahīḥ

पिता, पितामह और प्रपितामह को, और उसी प्रकार पितामहियों और प्रपितामहियों को भी,

श्लोक 59 (14.104.59)

मातरं चात्मनश्चैव गुरुमाचार्यमेव च । पितृमातृष्वसारौ च तथा मातामहीमपि ॥

mātaraṃ cātmanaścaiva gurumācāryameva ca | pitṛmātṛṣvasārau ca tathā mātāmahīmapi

अपनी माता को, गुरु और आचार्य को, पिता और माता की बहनों को, तथा मातामही को भी,

श्लोक 60 (14.104.60)

उपाध्यायान्सखीन्बन्धूञ्शिष्यर्त्विग्ज्ञातिबांधवान् । प्रमीतानानृशंस्यार्थं तर्पयेत्तानमत्सरः ॥

upādhyāyānsakhīnbandhūñśiṣyartvigjñātibāṃdhavān | pramītānānṛśaṃsyārthaṃ tarpayettānamatsaraḥ

उपाध्यायों, मित्रों, बन्धुओं, शिष्यों, ऋत्विजों, जाति-बिरादरी के लोगों और सम्बन्धियों को, जो दिवंगत हो चुके हैं, दया के भाव से, ईर्ष्या छोड़कर, वह तृप्त करे।

श्लोक 61 (14.104.61)

तर्पयित्वा तथाऽऽचम्य स्नानवस्त्रं प्रपीडयेत् । वृत्तिं भृत्यजनस्याहुः स्नानं पानं च तद्विदः ॥

tarpayitvā tathā''camya snānavastraṃ prapīḍayet | vṛttiṃ bhṛtyajanasyāhuḥ snānaṃ pānaṃ ca tadvidaḥ

तर्पण करके और आचमन करके वह स्नान का वस्त्र निचोड़े। इसे जाननेवाले कहते हैं कि यह उसके आश्रितों की जीविका है, उनके स्नान और पान के लिए।

श्लोक 62 (14.104.62)

अतर्पयित्वा तान्पूर्वं स्नानवस्त्रं न पीडयेत् । पीडयेच्चेत्पुरा मोहाद्देवाः सर्षिगणास्तथा । पितरस्तु निराशास्ते शप्त्वा यान्ति यथागतं ॥

atarpayitvā tānpūrvaṃ snānavastraṃ na pīḍayet | pīḍayeccetpurā mohāddevāḥ sarṣigaṇāstathā | pitarastu nirāśāste śaptvā yānti yathāgataṃ

उन्हें पहले तृप्त किए बिना वह स्नान का वस्त्र न निचोड़े। यदि मोहवश पहले निचोड़ दे, तो देवता, ऋषिगण और पितर भी निराश होकर शाप देकर जैसे आए थे वैसे लौट जाते हैं।

श्लोक 63 (14.104.63)

प्रक्षाल्य तु मृदा पादावाचम्य प्रयतः पुनः । दर्भेषु दर्भपाणिः सन्स्वाध्यायं तु समारभेत् ॥

prakṣālya tu mṛdā pādāvācamya prayataḥ punaḥ | darbheṣu darbhapāṇiḥ sansvādhyāyaṃ tu samārabhet

मिट्टी से पैर धोकर, पवित्र होकर फिर आचमन करके, दर्भ पर बैठा हुआ और हाथ में दर्भ लिए वह स्वाध्याय आरम्भ करे।

श्लोक 64 (14.104.64)

वेदमादौ समारभ्य ततोपर्युपरि क्रमात् । यदधीतेऽन्वहं शक्त्या तत्स्वाध्यायं प्रचक्षते ॥

vedamādau samārabhya tatoparyupari kramāt | yadadhīte'nvahaṃ śaktyā tatsvādhyāyaṃ pracakṣate

पहले वेद से आरम्भ करके फिर क्रम से आगे-आगे बढ़ते हुए, प्रतिदिन अपनी शक्ति के अनुसार जितना पढ़ा जाए, उसे स्वाध्याय कहते हैं।

श्लोक 65 (14.104.65)

ऋचो वाऽपि यजुर्वाऽपि सामगाथामथापि च । इतिहासपुराणानि यथाशक्ति न हापयेत् ॥

ṛco vā'pi yajurvā'pi sāmagāthāmathāpi ca | itihāsapurāṇāni yathāśakti na hāpayet

ऋचा, यजुः, साम या गाथा, अथवा इतिहास और पुराण, इन्हें यथाशक्ति न छोड़े।

श्लोक 66 (14.104.66)

उत्थाय तु नमस्कृत्य दिशो दिग्देवता अपि । ब्रह्मणं च ततश्चाग्निं पृथिवीमोषधीस्तथा ॥

utthāya tu namaskṛtya diśo digdevatā api | brahmaṇaṃ ca tataścāgniṃ pṛthivīmoṣadhīstathā

उठकर वह दिशाओं और दिशाओं के देवताओं को नमस्कार करे, ब्रह्मा, अग्नि, पृथ्वी और औषधियों को भी,

श्लोक 67 (14.104.67)

वाचं वाचस्पतिं चैव मां चैव सरितस्तथा । नमस्कृत्य तथाऽद्भिस्तु प्रणवादि च पूर्ववत् ॥

vācaṃ vācaspatiṃ caiva māṃ caiva saritastathā | namaskṛtya tathā'dbhistu praṇavādi ca pūrvavat

वाणी और वाचस्पति को, मुझे और नदियों को, और इसी प्रकार जलों को भी, पहले की तरह प्रणव आदि के साथ।

श्लोक 68 (14.104.68)

ततो नमोऽद्भ्य इत्युक्त्वा नमस्कुर्यात्तु तज्जलम् । घृणिः सूर्यस्तथाऽऽदित्यस्तं प्रणम्य स्वमूर्धनि ॥

tato namo'dbhya ityuktvā namaskuryāttu tajjalam | ghṛṇiḥ sūryastathā''dityastaṃ praṇamya svamūrdhani

फिर जलों को नमस्कार कहकर वह उस जल को प्रणाम करे। घृणि, सूर्य और आदित्य कहकर उन्हें प्रणाम करके वह अपने मस्तक पर अंजलि रखे।

श्लोक 69 (14.104.69)

ततस्त्वालोकयन्नर्कं प्रणवेन समाहितः । ततो मामर्चयेत्पुष्पैर्मत्प्रियैरेव नित्यशः ॥

tatastvālokayannarkaṃ praṇavena samāhitaḥ | tato māmarcayetpuṣpairmatpriyaireva nityaśaḥ

फिर प्रणव के साथ एकाग्र होकर सूर्य को देखते हुए वह मेरे प्रिय फूलों से नित्य मेरी पूजा करे।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 70 (14.104.70)

त्वत्प्रियाणि प्रसूनानि त्वदधिष्ठानि माधव । सर्वाण्याचक्ष्व देवेश त्वद्भक्तस्य ममाच्युत ॥

tvatpriyāṇi prasūnāni tvadadhiṣṭhāni mādhava | sarvāṇyācakṣva deveśa tvadbhaktasya mamācyuta

माधव! जो फूल आपको प्रिय हैं और आपकी पूजा के योग्य हैं, वे सब मुझ अपने भक्त को बताइए, हे देवेश अच्युत।

भगवानुवाच

श्लोक 71 (14.104.71)

शृणुष्वावहितो राजन्पुष्पाणि प्रियकृन्ति मे । कुमुदं करवीरं च चणकं चंपकं तथा ॥

śṛṇuṣvāvahito rājanpuṣpāṇi priyakṛnti me | kumudaṃ karavīraṃ ca caṇakaṃ caṃpakaṃ tathā

राजन्! जो फूल मुझे प्रिय हैं, उन्हें ध्यान से सुनो: कुमुद, करवीर, चणक, चम्पा,

श्लोक 72 (14.104.72)

मल्लिकाजातिपुष्पं च नन्द्यावर्तं च नन्दिकम् । पलाशपुष्पपत्राणि दूर्वा भृङ्गकमेव च ॥

mallikājātipuṣpaṃ ca nandyāvartaṃ ca nandikam | palāśapuṣpapatrāṇi dūrvā bhṛṅgakameva ca

मल्लिका और जाति के फूल, नन्द्यावर्त और नन्दिक, पलाश के फूल और पत्ते, दूर्वा, भृङ्गक,

श्लोक 73 (14.104.73)

वनमाला च राजेन्द्र मत्प्रियाणि विशेषतः । सर्वेषामपि पुष्पाणां सहस्रगुणमुत्पलम् ॥

vanamālā ca rājendra matpriyāṇi viśeṣataḥ | sarveṣāmapi puṣpāṇāṃ sahasraguṇamutpalam

और वनमाला, हे राजेन्द्र, ये मुझे विशेष रूप से प्रिय हैं। सब फूलों में उत्पल, यानी नीलकमल, हजार गुना श्रेष्ठ है।

श्लोक 74 (14.104.74)

तस्मात्पद्मं तथा राजन्पद्मात्तु शतपत्रकम् । तस्मात्सहस्रपत्रं तु पुण्डरीकं ततः परम् ॥

tasmātpadmaṃ tathā rājanpadmāttu śatapatrakam | tasmātsahasrapatraṃ tu puṇḍarīkaṃ tataḥ param

हे राजन्! उससे श्रेष्ठ पद्म है; पद्म से श्रेष्ठ शतपत्र; उससे श्रेष्ठ सहस्रपत्र; और उसके भी आगे पुण्डरीक।

श्लोक 75 (14.104.75)

पुण्डरीकसहस्रात्तु तुलसी गुणतोऽधिका । बकपुष्पं ततस्तस्मात्सौवर्णं तु ततोऽधिकम् । सौवर्णात्तु प्रसूनाच्च मत्प्रियं नास्ति पाण्डव ॥

puṇḍarīkasahasrāttu tulasī guṇato'dhikā | bakapuṣpaṃ tatastasmātsauvarṇaṃ tu tato'dhikam | sauvarṇāttu prasūnācca matpriyaṃ nāsti pāṇḍava

गुण में तुलसी हजार पुण्डरीकों से भी बढ़कर है; उसके बाद बक का फूल है, और उससे भी बढ़कर स्वर्णपुष्प है। हे पाण्डव! स्वर्णपुष्प से बढ़कर मुझे कुछ प्रिय नहीं।

श्लोक 76 (14.104.76)

पुष्पाभावे तुलस्यास्तु पत्रैर्मामर्चयेत्पुनः । पत्रालाभे तु शाखाभिः शाखालाभे शिफालवैः । शिफाभावे मृदा तत्र भक्तिमानर्चयेत माम् ॥

puṣpābhāve tulasyāstu patrairmāmarcayetpunaḥ | patrālābhe tu śākhābhiḥ śākhālābhe śiphālavaiḥ | śiphābhāve mṛdā tatra bhaktimānarcayeta mām

फूल न मिलें तो वह तुलसी के पत्तों से मेरी पूजा करे; पत्ते न मिलें तो टहनियों से; टहनियाँ न मिलें तो जड़ों के रेशों के टुकड़ों से; रेशे भी न हों तो भक्त मिट्टी से ही मेरी पूजा करे।

श्लोक 77 (14.104.77)

वर्जनीयानि पुष्पाणि शृणु राजन्समाहितः । किङ्किणी मुनिपुष्पं च धुर्धूरं पाटलं तथा ॥

varjanīyāni puṣpāṇi śṛṇu rājansamāhitaḥ | kiṅkiṇī munipuṣpaṃ ca dhurdhūraṃ pāṭalaṃ tathā

राजन्! जो फूल वर्जित हैं, उन्हें ध्यान से सुनो: किङ्किणी, मुनिपुष्प, धुर्धूर, पाटल,

श्लोक 78 (14.104.78)

तथाऽतिमुक्तकं चैव पुन्नागं नक्तमालिकम् । यौधिकं क्षीरिकापुष्पं निर्गुण्डी लाङ्गुली जपा ॥

tathā'timuktakaṃ caiva punnāgaṃ naktamālikam | yaudhikaṃ kṣīrikāpuṣpaṃ nirguṇḍī lāṅgulī japā

अतिमुक्तक, पुन्नाग, नक्तमालिक, यौधिक, क्षीरिका का फूल, निर्गुण्डी, लाङ्गुली, जपा,

श्लोक 79 (14.104.79)

कर्णिकारं तथाऽशोकं शल्मलीपुष्पमेव च । ककुभाः कोविदाराश्च वैभीतकमथापि च ॥

karṇikāraṃ tathā'śokaṃ śalmalīpuṣpameva ca | kakubhāḥ kovidārāśca vaibhītakamathāpi ca

कर्णिकार, अशोक, सेमल का फूल, ककुभ, कोविदार और वैभीतक भी,

श्लोक 80 (14.104.80)

कुरण्टकप्रसूनं च कल्पकं कालकं तथा । अङ्कोलं गिरिकर्णी च नीलान्येव च सर्वशः । एकपर्णानि चान्यानि सर्वाण्येव विवर्जयेत् ॥

kuraṇṭakaprasūnaṃ ca kalpakaṃ kālakaṃ tathā | aṅkolaṃ girikarṇī ca nīlānyeva ca sarvaśaḥ | ekaparṇāni cānyāni sarvāṇyeva vivarjayet

कुरण्टक का फूल, कल्पक, कालक, अङ्कोल, गिरिकर्णी, सब नीले फूल, और अन्य एकपर्ण भी, इन सबको वह त्याग दे।

श्लोक 81 (14.104.81)

अर्कपुष्पाणि वर्ज्यानि अर्कपत्रस्थितानि च । व्याघाताः पिचुमन्दानि सर्वाण्येव विवर्जयेत् ॥

arkapuṣpāṇi varjyāni arkapatrasthitāni ca | vyāghātāḥ picumandāni sarvāṇyeva vivarjayet

आक के फूल वर्जित हैं, और आक के पत्तों पर रखे हुए भी; व्याघात और नीम, इन सबको त्याग दे।

श्लोक 82 (14.104.82)

अन्यैस्तु शुक्लपत्रैस्तु गन्धवद्भिर्नराधिप । अवर्ज्यैस्तैर्यथालाभं मद्भक्तो मां समर्चयेत् ॥

anyaistu śuklapatraistu gandhavadbhirnarādhipa | avarjyaistairyathālābhaṃ madbhakto māṃ samarcayet

हे नराधिप! इनके सिवा अन्य श्वेत पत्तोंवाले, सुगन्धित और अवर्जित फूलों से, जैसे मिलें, मेरा भक्त मेरी पूजा करे।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 83 (14.104.83)

कथं त्वमर्चनीयोसि मूर्तयः कीदृशास्तु ते । वैखानसाः कथं ब्रूयुः कथं वा पाञ्चरात्रिकाः ॥

kathaṃ tvamarcanīyosi mūrtayaḥ kīdṛśāstu te | vaikhānasāḥ kathaṃ brūyuḥ kathaṃ vā pāñcarātrikāḥ

आपकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिए? आपकी मूर्तियाँ कैसी हैं? वैखानस क्या कहते हैं, और पाञ्चरात्रिक कैसे कहते हैं?

भगवानुवाच

श्लोक 84 (14.104.84)

शृणु पाण्डव तत्सर्वमर्चनाक्रममात्मनः । स्थण्डिले पद्मकं कृत्वा चाष्टपत्रं सकर्णिकम् ॥

śṛṇu pāṇḍava tatsarvamarcanākramamātmanaḥ | sthaṇḍile padmakaṃ kṛtvā cāṣṭapatraṃ sakarṇikam

पाण्डव! अपनी पूजा का वह सारा क्रम सुनो। शुद्ध की हुई भूमि पर कर्णिका सहित अष्टदल कमल बनाकर,

श्लोक 85 (14.104.85)

अष्टाक्षरविधानेन ह्यथवा द्वादशाक्षरैः । वैदिकैरथ मन्त्रैश्च मम सूक्तेन वा पुनः ॥

aṣṭākṣaravidhānena hyathavā dvādaśākṣaraiḥ | vaidikairatha mantraiśca mama sūktena vā punaḥ

अष्टाक्षर मन्त्र की विधि से, या द्वादशाक्षर से, अथवा वैदिक मन्त्रों से, या फिर मेरे सूक्त से,

श्लोक 86 (14.104.86)

स्थापितं मां ततस्तस्मिन्नर्चयित्वा विचक्षणः । पुरुषं च ततः सत्यमच्युतं च युधिष्ठिर ॥

sthāpitaṃ māṃ tatastasminnarcayitvā vicakṣaṇaḥ | puruṣaṃ ca tataḥ satyamacyutaṃ ca yudhiṣṭhira

वहाँ स्थापित मेरी पूजा करके बुद्धिमान् पुरुष, हे युधिष्ठिर, फिर पुरुष, सत्य और अच्युत की पूजा करे,

श्लोक 87 (14.104.87)

अनिरुद्धं च मां प्राहुर्वैखानसविदो जनाः । अन्ये त्वेवं विजानन्ति मां राजन्पाञ्चरात्रिकाः ॥

aniruddhaṃ ca māṃ prāhurvaikhānasavido janāḥ | anye tvevaṃ vijānanti māṃ rājanpāñcarātrikāḥ

और अनिरुद्ध की भी। वैखानस मत को जाननेवाले लोग मुझे इसी प्रकार कहते हैं। हे राजन्, दूसरे, अर्थात् पाञ्चरात्रिक, मुझे इस प्रकार जानते हैं:

श्लोक 88 (14.104.88)

वासुदेवं च राजेन्द्र संकर्षणमथापि वा । प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च चतुर्मूर्तिं प्रचक्षते ॥

vāsudevaṃ ca rājendra saṃkarṣaṇamathāpi vā | pradyumnaṃ cāniruddhaṃ ca caturmūrtiṃ pracakṣate

वासुदेव, हे राजेन्द्र, अथवा सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध। वे मुझे चतुर्मूर्ति कहते हैं।

श्लोक 89 (14.104.89)

एताश्चान्याश्च राजेन्द्र संज्ञाभेदेन मूर्तयः । विद्ध्यनर्थान्तरा एवं मामेवं चार्चयेद्बुधः ॥

etāścānyāśca rājendra saṃjñābhedena mūrtayaḥ | viddhyanarthāntarā evaṃ māmevaṃ cārcayedbudhaḥ

हे राजेन्द्र! ये और दूसरी मूर्तियाँ केवल नामभेद से अलग हैं। इन्हें मुझसे भिन्न न जानो, और इसी प्रकार बुद्धिमान् मेरी पूजा करे।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 90 (14.104.90)

त्वद्भक्ताः कीदृशा देव कानि तेषां व्रतानि च । एतत्कथय देवेश त्वद्भक्तस्य ममाच्युत ॥

tvadbhaktāḥ kīdṛśā deva kāni teṣāṃ vratāni ca | etatkathaya deveśa tvadbhaktasya mamācyuta

हे देव! आपके भक्त कैसे होते हैं, और उनके व्रत क्या हैं? हे देवेश अच्युत! यह मुझ अपने भक्त को बताइए।

भगवानुवाच

श्लोक 91 (14.104.91)

अनन्यदेवताभक्ता ये मद्भक्तजनप्रियाः । मामेव शरणं प्राप्ता मद्भक्तास्ते प्रकीर्तिताः ॥

ananyadevatābhaktā ye madbhaktajanapriyāḥ | māmeva śaraṇaṃ prāptā madbhaktāste prakīrtitāḥ

जो किसी दूसरे देवता के भक्त नहीं हैं, जो मेरे भक्तों के प्रिय हैं और जो मेरी ही शरण में आए हैं, वे मेरे भक्त कहे गए हैं।

श्लोक 92 (14.104.92)

स्वर्ग्याण्यपि यशस्यानि मत्प्रियाणि विशेषतः । मद्भक्तः पाण्डवश्रेष्ठ व्रतानीमानि धारयेत् ॥

svargyāṇyapi yaśasyāni matpriyāṇi viśeṣataḥ | madbhaktaḥ pāṇḍavaśreṣṭha vratānīmāni dhārayet

हे पाण्डवश्रेष्ठ! स्वर्ग देनेवाले, यश बढ़ानेवाले और मुझे विशेष प्रिय इन व्रतों को मेरा भक्त धारण करे।

श्लोक 93 (14.104.93)

नान्यदाच्छादयेद्वस्त्रं मद्भक्तो जलतारणे । स्वस्थस्तु न दिवा स्वप्येन्मधुमांसानि वर्जयेत् ॥

nānyadācchādayedvastraṃ madbhakto jalatāraṇe | svasthastu na divā svapyenmadhumāṃsāni varjayet

जल पार करते समय मेरा भक्त कोई दूसरा वस्त्र न ओढ़े; स्वस्थ हो तो दिन में न सोए; मधु और मांस से दूर रहे;

श्लोक 94 (14.104.94)

प्रदक्षिणं व्रजेद्विप्रान्गामश्वत्थं हुताशनम् । न धावेत्पतिते वर्षे नाग्रभिक्षां च लोपयेत् ॥

pradakṣiṇaṃ vrajedviprāngāmaśvatthaṃ hutāśanam | na dhāvetpatite varṣe nāgrabhikṣāṃ ca lopayet

ब्राह्मणों, गाय, पीपल और अग्नि की प्रदक्षिणा करे; वर्षा गिरते समय न दौड़े; और अग्रभिक्षा का लोप न करे।

श्लोक 95 (14.104.95)

प्रत्यक्षलवणं नाद्यात्सौभाञ्जनकरञ्जनौ । ग्रासमुष्टिं गवे दद्याद्धान्याम्लं चैव वर्जयेत् ॥

pratyakṣalavaṇaṃ nādyātsaubhāñjanakarañjanau | grāsamuṣṭiṃ gave dadyāddhānyāmlaṃ caiva varjayet

वह अकेला नमक न खाए, और सौभाञ्जन तथा करञ्जन भी न खाए; गाय को मुट्ठी भर ग्रास दे और कांजी, अर्थात् धान्य से बनी खटाई, से बचे।

श्लोक 96 (14.104.96)

तथा पर्युषितं चापि पक्वं परगृहागतम् । अनिवेदितं च यद्द्रव्यं तत्प्रयत्नेन वर्जयेत् ॥

tathā paryuṣitaṃ cāpi pakvaṃ paragṛhāgatam | aniveditaṃ ca yaddravyaṃ tatprayatnena varjayet

बासी भोजन को भी, दूसरे के घर से आए पके अन्न को भी, और जो वस्तु निवेदित न हुई हो, उसे प्रयत्नपूर्वक त्याग दे।

श्लोक 97 (14.104.97)

विभीतककरञ्जानां छायां दूरे विवर्जयेत् । विप्रदेवपरीवादान्न वदेत्पीडितोपि सन् ॥

vibhītakakarañjānāṃ chāyāṃ dūre vivarjayet | vipradevaparīvādānna vadetpīḍitopi san

विभीतक और करञ्ज की छाया से दूर रहे; और स्वयं पीड़ित होने पर भी ब्राह्मणों और देवताओं की निन्दा न करे।

श्लोक 98 (14.104.98)

सात्विका राजसाश्चापि तामसाश्चापि पाण्डव । मामर्चयन्ति मद्भक्तास्तेषामीदृग्विधा गतिः ॥

sātvikā rājasāścāpi tāmasāścāpi pāṇḍava | māmarcayanti madbhaktāsteṣāmīdṛgvidhā gatiḥ

पाण्डव! सात्त्विक, राजस और तामस, जो भी मेरे भक्त होकर मेरी पूजा करते हैं, उनकी गति इस प्रकार की होती है:

श्लोक 99 (14.104.99)

तामसास्तिमिरं यान्ति राजसा रज एव तत् । सात्विकाः सत्वसंपन्नाः सत्वमेव प्रयान्ति ते ॥

tāmasāstimiraṃ yānti rājasā raja eva tat | sātvikāḥ satvasaṃpannāḥ satvameva prayānti te

तामस अन्धकार में जाते हैं, राजस रजोगुण को ही प्राप्त होते हैं; और सत्त्व से सम्पन्न सात्त्विक सत्त्व को ही प्राप्त होते हैं।

श्लोक 100 (14.104.100)

ये सिद्धाः सन्ति साङ्ख्येन योगसत्वबलेन च । नभस्यादित्यचन्द्राभ्यां पश्यन्ति पदविस्तरम् ॥

ye siddhāḥ santi sāṅkhyena yogasatvabalena ca | nabhasyādityacandrābhyāṃ paśyanti padavistaram

जो सिद्ध साङ्ख्य से और योग तथा सत्त्व के बल से सिद्ध हुए हैं, वे आकाश में सूर्य और चन्द्रमा के द्वारा उस पद के विस्तार को देखते हैं।

श्लोक 101 (14.104.101)

एकस्तंभे नवद्वारे त्रिस्थूणे पञ्चसाक्षिके । एतस्मिन्देहनगरे राजसस्तु सदा भवेत् ॥

ekastaṃbhe navadvāre tristhūṇe pañcasākṣike | etasmindehanagare rājasastu sadā bhavet

एक खम्भे, नौ द्वारों, तीन टेकों और पाँच साक्षियोंवाले इस देहरूपी नगर में रजोगुणी भाव सदा बना रहे।

श्लोक 102 (14.104.102)

उदिते सवितर्यस्य क्रियायुक्तस्य धीमतः । चतुर्वेदविदश्चापि देहे षड्वृषलाः स्मृताः ॥

udite savitaryasya kriyāyuktasya dhīmataḥ | caturvedavidaścāpi dehe ṣaḍvṛṣalāḥ smṛtāḥ

सूर्योदय के बाद कर्म में लगे हुए बुद्धिमान् मनुष्य के भी, चारों वेदों के जाननेवाले के भी, शरीर में छह वृषल बताए गए हैं।

श्लोक 103 (14.104.103)

क्षत्रियाः सप्त विज्ञेया वैश्यास्त्वष्टौ प्रकीर्तिताः । नियताः पाण्डवश्रेष्ठ शूद्राणामेकविंशतिः ॥

kṣatriyāḥ sapta vijñeyā vaiśyāstvaṣṭau prakīrtitāḥ | niyatāḥ pāṇḍavaśreṣṭha śūdrāṇāmekaviṃśatiḥ

सात को क्षत्रिय जानना चाहिए, आठ को वैश्य कहा गया है, और हे पाण्डवश्रेष्ठ, शूद्र इक्कीस निश्चित हैं।

श्लोक 104 (14.104.104)

कामः क्रोधश्च लोभश्च मोहश्च मद एव च । महामोहश्च इत्येते देहे षड्वृषलाः स्मृताः ॥

kāmaḥ krodhaśca lobhaśca mohaśca mada eva ca | mahāmohaśca ityete dehe ṣaḍvṛṣalāḥ smṛtāḥ

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और महामोह, ये छह देह में वृषल कहे गए हैं।

श्लोक 105 (14.104.105)

गर्वः स्तंभो ह्यहङ्कार ईर्ष्या च द्रोह एव च । पारुष्यं क्रूरता चैव सप्तैते क्षत्रियाः स्मृताः ॥

garvaḥ staṃbho hyahaṅkāra īrṣyā ca droha eva ca | pāruṣyaṃ krūratā caiva saptaite kṣatriyāḥ smṛtāḥ

गर्व, जड़ता, अहंकार, ईर्ष्या, द्रोह, कठोरता और क्रूरता, ये सात क्षत्रिय कहे गए हैं।

श्लोक 106 (14.104.106)

तीक्ष्णता निकृतिर्माया शाठ्यं डंभो ह्यनार्जवम् । पैशुन्यमनृतं चैव वैश्यास्त्वष्टौ प्रकीर्तिताः ॥

tīkṣṇatā nikṛtirmāyā śāṭhyaṃ ḍaṃbho hyanārjavam | paiśunyamanṛtaṃ caiva vaiśyāstvaṣṭau prakīrtitāḥ

तीक्ष्णता, कपट, माया, शठता, दम्भ, कुटिलता, चुगली और झूठ, ये आठ वैश्य कहे गए हैं।

श्लोक 107 (14.104.107)

तृष्णा बुभुक्षा निद्रा च ह्यालस्यं चाघृणादयः । आधिश्चापि विषादश्च प्रमादो हीनसत्वता ॥

tṛṣṇā bubhukṣā nidrā ca hyālasyaṃ cāghṛṇādayaḥ | ādhiścāpi viṣādaśca pramādo hīnasatvatā

तृष्णा, भूख, नींद, आलस्य, निर्दयता आदि, चिन्ता और विषाद, प्रमाद, सत्त्वहीनता,

श्लोक 108 (14.104.108)

भयं विक्लबता जाड्यं पापकं मन्युरेव च । आशा चाश्रद्दधानत्वमनवस्थाप्यमन्त्रणम् ॥

bhayaṃ viklabatā jāḍyaṃ pāpakaṃ manyureva ca | āśā cāśraddadhānatvamanavasthāpyamantraṇam

भय, कायरता, जड़ता, दुष्टता, क्रोध, आशा, अश्रद्धा, अस्थिरता और विचार की अनिश्चितता,

श्लोक 109 (14.104.109)

आशौचं मलिनत्वं च शूद्रा ह्येते प्रकीर्तिताः । यस्मिन्नेते न दृश्यन्ते स वै ब्राह्मण उच्यते ॥

āśaucaṃ malinatvaṃ ca śūdrā hyete prakīrtitāḥ | yasminnete na dṛśyante sa vai brāhmaṇa ucyate

अपवित्रता और मलिनता, ये शूद्र कहे गए हैं। जिसमें ये दिखाई नहीं देते, वही सचमुच ब्राह्मण कहलाता है।

श्लोक 110 (14.104.110)

येषुयेषु हि भावेषु यत्कालं वर्तते द्विजः । तत्कालं वै स विज्ञेयो ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ॥

yeṣuyeṣu hi bhāveṣu yatkālaṃ vartate dvijaḥ | tatkālaṃ vai sa vijñeyo brāhmaṇo jñānadurbalaḥ

द्विज जिन-जिन भावों में जितने समय तक रहता है, उतने समय वह ज्ञान में दुर्बल ब्राह्मण समझा जाना चाहिए।

श्लोक 111 (14.104.111)

प्राणानायम्य यत्कालं येन मां चापि चिन्तयेत् । तत्कालो वै द्विजो ज्ञेयः शेषकालो ह्यथेतरः ॥

prāṇānāyamya yatkālaṃ yena māṃ cāpi cintayet | tatkālo vai dvijo jñeyaḥ śeṣakālo hyathetaraḥ

जितने समय तक वह प्राणायाम करके जिस किसी प्रकार मेरा चिन्तन करता है, उतने समय वह द्विज जाना जाए; शेष समय वह इतर है।

श्लोक 112 (14.104.112)

तस्मात्तु सात्विको भूत्वा शुचिः क्रोधविवर्जितः । मामर्चयेत्तु सततं मत्प्रियत्वं यदीच्छति ॥

tasmāttu sātviko bhūtvā śuciḥ krodhavivarjitaḥ | māmarcayettu satataṃ matpriyatvaṃ yadīcchati

इसलिए जो मेरा प्रिय होना चाहता है, वह सात्त्विक, पवित्र और क्रोध से रहित होकर निरन्तर मेरी पूजा करे।

श्लोक 113 (14.104.113)

अलोलजिह्वः समुपस्थितो धृतिं । निधाय चक्षुर्युगमात्रमेव च । मनश्च वाचं च निगृह्य चञ्चलं । भयान्निवृत्तो मम भक्त उच्यते ॥

alolajihvaḥ samupasthito dhṛtiṃ | nidhāya cakṣuryugamātrameva ca | manaśca vācaṃ ca nigṛhya cañcalaṃ | bhayānnivṛtto mama bhakta ucyate

जिसकी जीभ चंचल नहीं है, जो धैर्य धारण करके स्थिर खड़ा है, जिसकी दृष्टि एक जुए भर की दूरी पर ही टिकी है, जिसने चंचल मन और वाणी को रोक लिया है और जो भय से मुक्त हो गया है, वह मेरा भक्त कहलाता है।

श्लोक 114 (14.104.114)

ईदृशाध्यात्मिनो ये तु ब्राह्मणा नियतेन्द्रियाः । तेषां श्राद्धेषु तृप्यन्ति तेन तृप्ताः पितामहाः ॥

īdṛśādhyātmino ye tu brāhmaṇā niyatendriyāḥ | teṣāṃ śrāddheṣu tṛpyanti tena tṛptāḥ pitāmahāḥ

ऐसे अध्यात्मनिष्ठ और संयतेन्द्रिय ब्राह्मण जिन श्राद्धों में भोजन करते हैं, उनमें पितामह तृप्त होते हैं और उसी से सन्तुष्ट रहते हैं।

श्लोक 115 (14.104.115)

धर्मो जयति नाधर्मः सत्यं जयति नानृतम् । क्षमा जयति न क्रोधः क्षमावान्ब्राह्मणो भवेत् ॥

dharmo jayati nādharmaḥ satyaṃ jayati nānṛtam | kṣamā jayati na krodhaḥ kṣamāvānbrāhmaṇo bhavet

धर्म की जय होती है, अधर्म की नहीं; सत्य की जय होती है, असत्य की नहीं; क्षमा की जय होती है, क्रोध की नहीं। ब्राह्मण क्षमावान् हो।

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