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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 105

कपिला गौ का माहात्म्य और दस कपिलाएँ

युधिष्ठिर कृष्ण से पूछते हैं कि अग्निहोत्र के लिए ब्रह्मा द्वारा रची गई कपिला गौ किसे, कब और कैसे दी जानी चाहिए। कृष्ण उसकी अग्निमय उत्पत्ति बताते हैं, उसके दूध-घी पर जीने वाले शूद्रों और उनसे दान लेने वाले ब्राह्मणों की निन्दा करते हैं, दस प्रकार की कपिलाएँ गिनाते हैं और बैलों को जोतने के नियम कहते हैं। फिर वे कपिला को देखने, छूने और दान करने के फल बताते हैं और उनकी तुलना महायज्ञों से करते हैं।

अध्याय 104अध्याय-सूचीअध्याय 106

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.105.1)

दानपुण्यफलं श्रुत्वा तपःपुण्यफलानि च । धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ॥

dānapuṇyaphalaṃ śrutvā tapaḥpuṇyaphalāni ca | dharmaputraḥ prahṛṣṭātmā keśavaṃ punarabravīt

दान के पुण्यफल और तप के पुण्यफल सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने प्रसन्न मन से केशव से फिर कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (14.105.2)

या चैषा कपिला देव पूर्वमुत्पादिता विभो । होमधेनुः सदा पुण्या चतुर्वक्त्रेण माधव ॥

yā caiṣā kapilā deva pūrvamutpāditā vibho | homadhenuḥ sadā puṇyā caturvaktreṇa mādhava

हे देव! हे विभो! हे माधव! यह जो कपिला गौ है, जिसे पूर्वकाल में चतुर्मुख ब्रह्मा ने उत्पन्न किया था, जो सदा पवित्र होमधेनु है —

श्लोक 3 (14.105.3)

सा कथं ब्राह्मणेभ्यो हि देया कस्मिन्दिनेऽपि वा । कीदृशाय च विप्राय दातव्या पुण्यलक्षणा ॥

sā kathaṃ brāhmaṇebhyo hi deyā kasmindine'pi vā | kīdṛśāya ca viprāya dātavyā puṇyalakṣaṇā

वह ब्राह्मणों को कैसे दी जानी चाहिए, और किस दिन? और पुण्य लक्षणों वाली वह गौ किस प्रकार के ब्राह्मण को दी जानी चाहिए?

श्लोक 4 (14.105.4)

कथिता कपिला प्रोक्ता स्वयमेव स्वयंभुवा । कैर्वा देयाश्च ता देव श्रोतुमिच्छामि तत्वतः ॥

kathitā kapilā proktā svayameva svayaṃbhuvā | kairvā deyāśca tā deva śrotumicchāmi tatvataḥ

कपिला गौ का वर्णन हुआ है, स्वयं स्वयम्भू ने उसे बताया है। और हे देव, ऐसी गौएँ किन लोगों को देनी चाहिए? मैं यह यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (14.105.5)

एवमुक्तो हृषीकेशो धर्मपुत्रेण संसदि । अब्रवीत्कपिलासङ्ख्यां तासां माहात्म्यमेव च ॥

evamukto hṛṣīkeśo dharmaputreṇa saṃsadi | abravītkapilāsaṅkhyāṃ tāsāṃ māhātmyameva ca

सभा में धर्मपुत्र के इस प्रकार कहने पर हृषीकेश ने कपिला गौओं की संख्या और उनका माहात्म्य बताया।

वासुदेव उवाच

श्लोक 6 (14.105.6)

शृणु पाण्डव तत्वेन पवित्रं पावनं परम् । यच्छ्रुत्वा पापकर्मापि नरः पापात्प्रमुच्यते ॥

śṛṇu pāṇḍava tatvena pavitraṃ pāvanaṃ param | yacchrutvā pāpakarmāpi naraḥ pāpātpramucyate

हे पाण्डव! यह पवित्र और परम पावन उपदेश यथार्थ रूप से सुनो, जिसे सुनकर पापकर्म करने वाला मनुष्य भी पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 7 (14.105.7)

अग्निमध्योद्भवां दिव्यामग्निज्वालासमप्रभाम् । अग्निज्वालोज्ज्वलच्छृङ्गीं प्रदीप्ताङ्गारलोचनाम् ॥

agnimadhyodbhavāṃ divyāmagnijvālāsamaprabhām | agnijvālojjvalacchṛṅgīṃ pradīptāṅgāralocanām

वह दिव्य कपिला अग्नि के मध्य से उत्पन्न हुई है, उसकी कान्ति अग्निज्वाला के समान है; उसके सींग ज्वाला के समान दहकते हैं और उसकी आँखें जलते अंगारों जैसी हैं।

श्लोक 8 (14.105.8)

अग्निपुच्छामग्निखुरामग्निरोमप्रभान्विताम् । तामग्नेयीमग्निजिह्वामग्निग्रीवां ज्वलत्प्रभाम् ॥

agnipucchāmagnikhurāmagniromaprabhānvitām | tāmagneyīmagnijihvāmagnigrīvāṃ jvalatprabhām

उसकी पूँछ और खुर अग्नि के हैं, उसके रोमों में अग्नि की आभा है; वह अग्नि-स्वरूपा है, उसकी जिह्वा और ग्रीवा अग्निमय हैं, और वह प्रज्वलित तेज से दीप्त है।

श्लोक 9 (14.105.9)

भुञ्जते कपिलां ये तु शूद्रा लोभेन मोहिताः । पतितांस्तान्विजानीयाच्चण्डालसदृशा हि ते ॥

bhuñjate kapilāṃ ye tu śūdrā lobhena mohitāḥ | patitāṃstānvijānīyāccaṇḍālasadṛśā hi te

जो शूद्र लोभ से मोहित होकर कपिला का उपभोग करते हैं, उन्हें पतित समझना चाहिए; वे चाण्डालों के समान हैं।

श्लोक 10 (14.105.10)

न तेषां ब्राह्मणः कश्चिद्गृहे कुर्यात्प्रतिग्रहम् । दूराच्च परिहर्तव्या महापातकिनोपि ते ॥

na teṣāṃ brāhmaṇaḥ kaścidgṛhe kuryātpratigraham | dūrācca parihartavyā mahāpātakinopi te

कोई भी ब्राह्मण उनके घर में दान ग्रहण न करे। वे महापापी हैं, इसलिए उनसे दूर ही रहना चाहिए।

श्लोक 11 (14.105.11)

सार्वकालं हि ते सर्वैर्वर्जिताः पितृदैवतैः । ते सदा ह्यप्रतिग्राह्या ह्यसंभाष्याश्च पापिनः ॥

sārvakālaṃ hi te sarvairvarjitāḥ pitṛdaivataiḥ | te sadā hyapratigrāhyā hyasaṃbhāṣyāśca pāpinaḥ

वे सदा पितरों और देवताओं द्वारा त्यागे हुए हैं। वे पापी सदा दान लेने के अयोग्य हैं और उनसे बातचीत भी नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 12 (14.105.12)

पिबन्ति कपिलां यावत्तावत्तेषां पितामहाः । अमेध्यमुपभुञ्जन्ति भूम्यां वै श्वसृगालवत् ॥

pibanti kapilāṃ yāvattāvatteṣāṃ pitāmahāḥ | amedhyamupabhuñjanti bhūmyāṃ vai śvasṛgālavat

जब तक वे कपिला का दूध पीते हैं, तब तक उनके पितामह कुत्तों और सियारों की तरह भूमि पर अपवित्र वस्तु खाते हैं।

श्लोक 13 (14.105.13)

कपिलाया दधि क्षीरं घृतं तक्रमथापि वा । ये शूद्रा उपभुञ्जन्ति तेषां गतिमिमां शृणु ॥

kapilāyā dadhi kṣīraṃ ghṛtaṃ takramathāpi vā | ye śūdrā upabhuñjanti teṣāṃ gatimimāṃ śṛṇu

जो शूद्र कपिला का दही, दूध, घी अथवा मट्ठा खाते-पीते हैं, अब उनकी यह गति सुनो।

श्लोक 14 (14.105.14)

कपिलोपजीवी शूद्रस्तु मृतो गच्छति रौरवम् । क्लिश्यते रौरवे घोरे वर्षकोटिशतं वसन् ॥

kapilopajīvī śūdrastu mṛto gacchati rauravam | kliśyate raurave ghore varṣakoṭiśataṃ vasan

कपिला पर जीने वाला शूद्र मरकर रौरव नरक में जाता है, और उस भयंकर रौरव में सौ करोड़ वर्ष रहकर कष्ट भोगता है।

श्लोक 15 (14.105.15)

ततश्चापि च्युतः कालाच्छ्वानयोनिं स गच्छति । श्वयोन्याश्च परिभ्रष्टो विष्ठायां जायते क्रिमिः ॥

tataścāpi cyutaḥ kālācchvānayoniṃ sa gacchati | śvayonyāśca paribhraṣṭo viṣṭhāyāṃ jāyate krimiḥ

फिर समय पूरा होने पर वहाँ से च्युत होकर वह कुत्ते की योनि में जाता है; और कुत्ते की योनि से भी भ्रष्ट होकर विष्ठा में कीड़ा बनकर जन्म लेता है।

श्लोक 16 (14.105.16)

विष्ठाकूपेषु पापिष्ठो दुर्गन्धेषु सहस्रशः । तत्रतत्रोपजायेत नोत्तारं तत्र विन्दति ॥

viṣṭhākūpeṣu pāpiṣṭho durgandheṣu sahasraśaḥ | tatratatropajāyeta nottāraṃ tatra vindati

वह महापापी दुर्गन्धयुक्त विष्ठा के गड्ढों में हजारों बार जन्म लेता है और वहाँ से उसे उद्धार नहीं मिलता।

श्लोक 17 (14.105.17)

ब्राह्मणश्चैव यस्तेषां गृहे कुर्यात्प्रतिग्रहम् । ततः प्रभृति तस्यापि पितरः स्युरमेध्यपाः ॥

brāhmaṇaścaiva yasteṣāṃ gṛhe kuryātpratigraham | tataḥ prabhṛti tasyāpi pitaraḥ syuramedhyapāḥ

और जो ब्राह्मण उनके घर में दान ग्रहण करता है, उसी क्षण से उसके पितर भी अपवित्र वस्तु खाने वाले हो जाते हैं।

श्लोक 18 (14.105.18)

न तेन सार्धं सम्भाषेन्न चाप्येकासनं व्रजेत् । स नित्यं वर्जनीयो हि दूरात्तु ब्राह्मणाधमः ॥

na tena sārdhaṃ sambhāṣenna cāpyekāsanaṃ vrajet | sa nityaṃ varjanīyo hi dūrāttu brāhmaṇādhamaḥ

उसके साथ बातचीत न करे, न एक आसन पर बैठे; वह अधम ब्राह्मण सदा दूर से ही त्यागने योग्य है।

श्लोक 19 (14.105.19)

यस्तेन सह सम्भाषेदेकशय्यां व्रजेत् वा । प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रं स च तेन विशुद्ध्यति ॥

yastena saha sambhāṣedekaśayyāṃ vrajet vā | prājāpatyaṃ caretkṛcchraṃ sa ca tena viśuddhyati

जो उसके साथ बातचीत करे या एक शय्या पर सोए, वह प्राजापत्य कृच्छ्र व्रत करे; उसी से वह शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 20 (14.105.20)

कपिलोपजीविनः शूद्राद्यः करोति प्रतिग्रहम् । प्रायश्चित्तं भवेत्तस्य विप्रस्यैतन्न संशयः ॥

kapilopajīvinaḥ śūdrādyaḥ karoti pratigraham | prāyaścittaṃ bhavettasya viprasyaitanna saṃśayaḥ

कपिला पर जीने वाले शूद्र से जो ब्राह्मण दान लेता है, उस ब्राह्मण के लिए प्रायश्चित्त है — इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 21 (14.105.21)

ब्रह्मकूर्चं प्रकुर्वीत चान्द्रायणमथापि वा । मुच्यते किल्बिषात्तस्मादेतेन ब्राह्मणो हि सः ॥

brahmakūrcaṃ prakurvīta cāndrāyaṇamathāpi vā | mucyate kilbiṣāttasmādetena brāhmaṇo hi saḥ

वह ब्रह्मकूर्च अथवा चान्द्रायण व्रत करे; इससे वह उस पाप से मुक्त हो जाता है, क्योंकि वह वस्तुतः ब्राह्मण है।

श्लोक 22 (14.105.22)

कपिला ह्यग्निहोत्रार्थे विप्रार्थे वा स्वयंभुवा । सर्वं तेजः समुद्धृत्य निर्मिता ब्रह्मणा पुरा ॥

kapilā hyagnihotrārthe viprārthe vā svayaṃbhuvā | sarvaṃ tejaḥ samuddhṛtya nirmitā brahmaṇā purā

अग्निहोत्र के लिए अथवा ब्राह्मणों के लिए स्वयम्भू ब्रह्मा ने पूर्वकाल में सारा तेज निकालकर कपिला की रचना की थी।

श्लोक 23 (14.105.23)

पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम् । पुण्यानां परमं पुण्यं कपिला पाण्डुनन्दन ॥

pavitraṃ ca pavitrāṇāṃ maṅgalānāṃ ca maṅgalam | puṇyānāṃ paramaṃ puṇyaṃ kapilā pāṇḍunandana

हे पाण्डुनन्दन! कपिला पवित्रों में पवित्र, मंगलों में मंगल और पुण्यों में परम पुण्य है।

श्लोक 24 (14.105.24)

तपसा तप एवाग्र्यं व्रतानामुत्तमं व्रतम् । दानानां परमं दानं निदानं ह्येतदक्षयम् ॥

tapasā tapa evāgryaṃ vratānāmuttamaṃ vratam | dānānāṃ paramaṃ dānaṃ nidānaṃ hyetadakṣayam

तपों में वह सर्वश्रेष्ठ तप है, व्रतों में उत्तम व्रत है और दानों में परम दान है; यह अक्षय पुण्य का मूल है।

श्लोक 25 (14.105.25)

पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च । पवित्राणि च रम्याणि सर्वलोकेषु पाण्डव ॥

pṛthivyāṃ yāni tīrthāni puṇyānyāyatanāni ca | pavitrāṇi ca ramyāṇi sarvalokeṣu pāṇḍava

हे पाण्डव! पृथ्वी पर जो तीर्थ हैं, जो पुण्य आयतन हैं, और सब लोकों में जो पवित्र एवं रमणीय स्थान हैं —

श्लोक 26 (14.105.26)

एभ्यस्तेजः समुद्धृत्य ब्रह्मणा लोककर्तृणा । लोकनिस्तरणायैव निर्मिताः कपिलाः स्वयम् ॥

ebhyastejaḥ samuddhṛtya brahmaṇā lokakartṛṇā | lokanistaraṇāyaiva nirmitāḥ kapilāḥ svayam

उन सबका तेज निकालकर लोकस्रष्टा ब्रह्मा ने संसार के उद्धार के लिए ही स्वयं कपिला गौओं की रचना की।

श्लोक 27 (14.105.27)

सर्वतेजोमयी ह्येषां कपिला पाण्डुनन्दन । सदाऽमृतमयी मेध्या शुचिः पावनमुत्तमम् ॥

sarvatejomayī hyeṣāṃ kapilā pāṇḍunandana | sadā'mṛtamayī medhyā śuciḥ pāvanamuttamam

हे पाण्डुनन्दन! इन सबमें कपिला सब तेजों से बनी है; वह सदा अमृतमयी, पवित्र, शुद्ध और परम पावन है।

श्लोक 28 (14.105.28)

क्षीरेण कपिलायास्तु दध्ना वा सघृतेन वा । होतव्यान्यग्निहोत्राणि सायं प्रातर्द्विजातिभिः ॥

kṣīreṇa kapilāyāstu dadhnā vā saghṛtena vā | hotavyānyagnihotrāṇi sāyaṃ prātardvijātibhiḥ

द्विजातियों को सायं और प्रातः कपिला के दूध से, अथवा घी-सहित दही से अग्निहोत्र की आहुतियाँ देनी चाहिए।

श्लोक 29 (14.105.29)

कपिलाया घृतेनापि दध्ना क्षीरेण वा पुनः । जुह्वते येऽग्निहोत्राणि ब्राह्मणा विधिवत्प्रभो ॥

kapilāyā ghṛtenāpi dadhnā kṣīreṇa vā punaḥ | juhvate ye'gnihotrāṇi brāhmaṇā vidhivatprabho

हे प्रभो! जो ब्राह्मण कपिला के घी, दही अथवा दूध से विधिपूर्वक अग्निहोत्र करते हैं,

श्लोक 30 (14.105.30)

पूजयन्त्यतिथींश्चैव परां भक्तिमुपागताः । शूद्रान्नाद्विरता नित्यं डंभानृतविवर्जिताः ॥

pūjayantyatithīṃścaiva parāṃ bhaktimupāgatāḥ | śūdrānnādviratā nityaṃ ḍaṃbhānṛtavivarjitāḥ

जो परम भक्ति से अतिथियों की पूजा करते हैं, शूद्र के अन्न से सदा दूर रहते हैं और दम्भ तथा असत्य से रहित हैं —

श्लोक 31 (14.105.31)

ते यान्त्यादित्यसङ्काशैर्विमानैर्द्विजसत्तमाः । सूर्यमण्डलमध्येन ब्रह्मलोकमनुत्तमम् ॥

te yāntyādityasaṅkāśairvimānairdvijasattamāḥ | sūryamaṇḍalamadhyena brahmalokamanuttamam

वे श्रेष्ठ द्विज सूर्य के समान तेजस्वी विमानों में सूर्यमण्डल के बीच से होकर सर्वोत्तम ब्रह्मलोक को जाते हैं;

श्लोक 32 (14.105.32)

ब्रह्मणो भवने दिव्ये कामगाः कामरूपिणः । ब्रह्मणा पूज्यमानास्तु मोदन्ते कल्पमक्षयम् ॥

brahmaṇo bhavane divye kāmagāḥ kāmarūpiṇaḥ | brahmaṇā pūjyamānāstu modante kalpamakṣayam

वहाँ ब्रह्मा के दिव्य भवन में इच्छानुसार विचरने और मनचाहा रूप धारण करने वाले वे, ब्रह्मा से सम्मानित होकर, अक्षय कल्प तक आनन्द करते हैं।

श्लोक 33 (14.105.33)

एवं हि कपिला राजन्पुण्या मन्त्रामृतारणिः । आदावेवाग्निमध्ये तु मैत्रेयी ब्रह्मनिर्मिता ॥

evaṃ hi kapilā rājanpuṇyā mantrāmṛtāraṇiḥ | ādāvevāgnimadhye tu maitreyī brahmanirmitā

हे राजन्! इस प्रकार पुण्यमयी कपिला मन्त्र-रूपी अमृत की अरणि है; आरम्भ में ही अग्नि के मध्य में ब्रह्मा ने उसे मैत्रेयी रूप में रचा था।

श्लोक 34 (14.105.34)

शृङ्गाग्रे कपिलायास्तु सर्वतीर्थानि पाण्डव । ब्रह्मणो हि नियोगेन निवसन्ति दिनेदिने ॥

śṛṅgāgre kapilāyāstu sarvatīrthāni pāṇḍava | brahmaṇo hi niyogena nivasanti dinedine

हे पाण्डव! ब्रह्मा की आज्ञा से कपिला के सींगों के अग्रभाग पर सभी तीर्थ प्रतिदिन निवास करते हैं।

श्लोक 35 (14.105.35)

प्रातरुत्थाय यो मर्त्यः कपिलाशृङ्गमस्तकात् । यश्च्युतामंबुधारां वै शिरसा प्रयतः शुचिः ॥

prātarutthāya yo martyaḥ kapilāśṛṅgamastakāt | yaścyutāmaṃbudhārāṃ vai śirasā prayataḥ śuciḥ

जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर, संयमी और शुद्ध होकर, कपिला के सींग के शिखर से गिरी हुई जलधारा को सिर पर धारण करता है —

श्लोक 36 (14.105.36)

स तेन पुण्यतीर्थेन सहसा हतकिल्विषः । जन्मत्रयकृतं पापं प्रदहत्यग्निवत्तृणम् ॥

sa tena puṇyatīrthena sahasā hatakilviṣaḥ | janmatrayakṛtaṃ pāpaṃ pradahatyagnivattṛṇam

उस पुण्यतीर्थ के प्रभाव से उसके पाप सहसा नष्ट हो जाते हैं; तीन जन्मों में किए हुए पाप को वह वैसे ही भस्म कर देता है जैसे अग्नि तिनके को।

श्लोक 37 (14.105.37)

मूत्रेण कपिलायास्तु यश्च प्राणानुपस्पृशेत् । स्नानेन तेन पुण्येन नष्टपापः स मानवः । त्रिंशद्वर्षकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः ॥

mūtreṇa kapilāyāstu yaśca prāṇānupaspṛśet | snānena tena puṇyena naṣṭapāpaḥ sa mānavaḥ | triṃśadvarṣakṛtātpāpānmucyate nātra saṃśayaḥ

और जो मनुष्य कपिला के मूत्र से अपनी इन्द्रियों का स्पर्श करता है, उस पवित्र स्नान से उसके पाप नष्ट हो जाते हैं; वह तीस वर्षों के किए हुए पाप से मुक्त हो जाता है — इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 38 (14.105.38)

प्रातरुत्थाय यो भक्त्या प्रयच्छेत्तृणमुष्टिकम् । तस्य नश्यति तत्पापं त्रिंशद्रात्रकृतं नृप ॥

prātarutthāya yo bhaktyā prayacchettṛṇamuṣṭikam | tasya naśyati tatpāpaṃ triṃśadrātrakṛtaṃ nṛpa

हे राजन्! जो प्रातःकाल उठकर भक्ति से उसे मुट्ठी भर घास अर्पित करता है, उसका तीस रात का किया हुआ पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 39 (14.105.39)

प्रातरुत्थाय मद्भक्त्या कुर्याद्यस्तां प्रदक्षिणम् । प्रदक्षिणीकृता तेन पृथिवी नात्र संशयः ॥

prātarutthāya madbhaktyā kuryādyastāṃ pradakṣiṇam | pradakṣiṇīkṛtā tena pṛthivī nātra saṃśayaḥ

जो प्रातःकाल उठकर मेरे प्रति भक्ति से उसकी प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा मानो पृथ्वी की प्रदक्षिणा हो गई — इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 40 (14.105.40)

प्रदक्षिणेन चैकेन श्रद्धायुक्तेन पाण्डव । दशरात्रकृतं पापं तस्य तन्नश्यति ध्रुवम् ॥

pradakṣiṇena caikena śraddhāyuktena pāṇḍava | daśarātrakṛtaṃ pāpaṃ tasya tannaśyati dhruvam

हे पाण्डव! श्रद्धायुक्त होकर की गई एक प्रदक्षिणा से उसके दस रात का किया हुआ पाप निश्चय ही नष्ट हो जाता है।

श्लोक 41 (14.105.41)

कपिलापञ्चगव्येन यः स्नायात्तु शुचिर्नरः । स गङ्गाद्येषु तीर्थेषु स्नातो भवति पाण्डव ॥

kapilāpañcagavyena yaḥ snāyāttu śucirnaraḥ | sa gaṅgādyeṣu tīrtheṣu snāto bhavati pāṇḍava

हे पाण्डव! जो शुद्ध मनुष्य कपिला के पंचगव्य से स्नान करता है, वह गंगा आदि तीर्थों में स्नान कर चुका होता है।

श्लोक 42 (14.105.42)

तेन स्नानेन तस्यापि श्रद्धायुक्तस्य पार्थिव । दशरात्रकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥

tena snānena tasyāpi śraddhāyuktasya pārthiva | daśarātrakṛtaṃ pāpaṃ tatkṣaṇādeva naśyati

हे राजन्! श्रद्धायुक्त मनुष्य का दस रात का किया हुआ पाप उस स्नान से उसी क्षण नष्ट हो जाता है।

श्लोक 43 (14.105.43)

दृष्ट्वा तु कपिलां भक्त्या श्रुत्वा हुङ्कारनिस्वनम् । व्यपोहति नरः पापमहोरात्रकृतं नृप ॥

dṛṣṭvā tu kapilāṃ bhaktyā śrutvā huṅkāranisvanam | vyapohati naraḥ pāpamahorātrakṛtaṃ nṛpa

हे राजन्! भक्ति से कपिला को देखकर और उसकी हुंकार-ध्वनि सुनकर मनुष्य एक दिन-रात का किया हुआ पाप दूर कर देता है।

श्लोक 44 (14.105.44)

यत्र वा तत्र वा चाङ्गे कपिलां यः स्पृशेच्छुचिः । संवत्सरकृतं पापं विनाशयति पाण्डव ॥

yatra vā tatra vā cāṅge kapilāṃ yaḥ spṛśecchuciḥ | saṃvatsarakṛtaṃ pāpaṃ vināśayati pāṇḍava

हे पाण्डव! जो शुद्ध मनुष्य कपिला के किसी भी अंग को छूता है, वह एक वर्ष का किया हुआ पाप नष्ट कर देता है।

श्लोक 45 (14.105.45)

गोसहस्रं तु यो दद्यादेकां च कपिलां नरः । समं तस्य फलं प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः ॥

gosahasraṃ tu yo dadyādekāṃ ca kapilāṃ naraḥ | samaṃ tasya phalaṃ prāha brahmā lokapitāmahaḥ

जो मनुष्य एक हजार गौएँ देता है और जो केवल एक कपिला देता है — लोकपितामह ब्रह्मा ने दोनों का फल समान बताया है।

श्लोक 46 (14.105.46)

यस्त्वेवं कपिलां हन्यान्नरः कश्चित्प्रमादतः । गोसहस्रं हतं तेन भवेन्नात्र विचारणा ॥

yastvevaṃ kapilāṃ hanyānnaraḥ kaścitpramādataḥ | gosahasraṃ hataṃ tena bhavennātra vicāraṇā

और यदि कोई मनुष्य असावधानी से भी एक कपिला को मार दे, तो उसके द्वारा हजार गौओं की हत्या हुई — इसमें कोई विचार नहीं।

श्लोक 47 (14.105.47)

यश्चैकां कपिलां दद्याच्छ्रोत्रियायाहिताग्नये । गवां शतसहस्रं तु दत्तं भवति पाण्डव ॥

yaścaikāṃ kapilāṃ dadyācchrotriyāyāhitāgnaye | gavāṃ śatasahasraṃ tu dattaṃ bhavati pāṇḍava

हे पाण्डव! जो वेदपाठी अग्निहोत्री ब्राह्मण को एक कपिला दान करता है, उसने मानो एक लाख गौएँ दान कर दीं।

श्लोक 48 (14.105.48)

दश वै कपिलाः प्रोक्ताः स्वयमेव स्वयंभुवा । यो दद्याच्छ्रोत्रियेभ्यो वै स्वर्गं गच्छति तच्छृणु ॥

daśa vai kapilāḥ proktāḥ svayameva svayaṃbhuvā | yo dadyācchrotriyebhyo vai svargaṃ gacchati tacchṛṇu

स्वयं स्वयम्भू ने दस प्रकार की कपिलाएँ बताई हैं। यह सुनो: जो उन्हें वेदपाठी ब्राह्मणों को दान करता है, वह स्वर्ग जाता है।

श्लोक 49 (14.105.49)

प्रथमा स्वर्णकपिला द्वितीया गौरपिङ्गला । तृतीया रक्तपिङ्गाक्षी चतुर्थी गलपिङ्गला ॥

prathamā svarṇakapilā dvitīyā gaurapiṅgalā | tṛtīyā raktapiṅgākṣī caturthī galapiṅgalā

पहली स्वर्ण-कपिला, दूसरी गौर-पिंगला, तीसरी रक्त-पिंगल नेत्रों वाली, चौथी गल-पिंगला;

श्लोक 50 (14.105.50)

पञ्चमी बभ्रुवर्णाभा षष्ठी च श्वेतपिङ्गला । सप्तमी रङ्गपिङ्गाक्षी त्वष्टमी खुरपिङ्गला ॥

pañcamī babhruvarṇābhā ṣaṣṭhī ca śvetapiṅgalā | saptamī raṅgapiṅgākṣī tvaṣṭamī khurapiṅgalā

पाँचवीं बभ्रु (भूरे) वर्ण की आभा वाली, छठी श्वेत-पिंगला, सातवीं चटकीले रंग की पिंगल आँखों वाली, आठवीं खुर-पिंगला;

श्लोक 51 (14.105.51)

नवमी पाटला ज्ञेया दशमी पुच्छपिङ्गला । दशैताः कपिलाः प्रोक्तास्तारयन्ति नरान्सदा ॥

navamī pāṭalā jñeyā daśamī pucchapiṅgalā | daśaitāḥ kapilāḥ proktāstārayanti narānsadā

नौवीं पाटला (हल्के लाल रंग की) जाननी चाहिए और दसवीं पुच्छ-पिंगला। ये दस कपिलाएँ बताई गई हैं, जो मनुष्यों को सदा तारती हैं।

श्लोक 52 (14.105.52)

मङ्गल्याश्च पवित्राश्च सर्वपापप्रणाशनाः । एवमेव ह्यनड्वाहो दश प्रोक्ता नरेश्वर ॥

maṅgalyāśca pavitrāśca sarvapāpapraṇāśanāḥ | evameva hyanaḍvāho daśa proktā nareśvara

ये मंगलमयी, पवित्र और सब पापों का नाश करने वाली हैं। हे नरेश्वर! इसी प्रकार दस बैल भी बताए गए हैं।

श्लोक 53 (14.105.53)

ब्राह्मणो वाहयेत्तांस्तु नान्यो वर्णः कथंचन । न वाहयेच्च कपिलां क्षेत्रे वाऽध्वनि वा द्विजः ॥

brāhmaṇo vāhayettāṃstu nānyo varṇaḥ kathaṃcana | na vāhayecca kapilāṃ kṣetre vā'dhvani vā dvijaḥ

उन्हें ब्राह्मण ही जोते, किसी भी प्रकार अन्य वर्ण नहीं; और द्विज कपिला को न खेत में जोते, न मार्ग में।

श्लोक 54 (14.105.54)

वाहयेद्धुङ्कृतेनैव शाखया वा सपत्रया । न दण्डेन न वा यष्ट्या न पाशेन न वा पुनः ॥

vāhayeddhuṅkṛtenaiva śākhayā vā sapatrayā | na daṇḍena na vā yaṣṭyā na pāśena na vā punaḥ

वह उन्हें केवल "हुँ" की ध्वनि से अथवा पत्तों वाली टहनी से हाँके — न डंडे से, न लाठी से, और न रस्सी से।

श्लोक 55 (14.105.55)

न क्षुत्तृष्णाश्रमश्रान्तान्वाहयेद्विकलेन्द्रियान् । अतृप्तेषु न भुञ्जीयात्पिबेत्पीतेषु चोदकम् ॥

na kṣuttṛṣṇāśramaśrāntānvāhayedvikalendriyān | atṛpteṣu na bhuñjīyātpibetpīteṣu codakam

जो भूख, प्यास और थकान से व्याकुल हों या जिनकी इन्द्रियाँ विकल हों, उन्हें न जोते। जब तक वे तृप्त न हों तब तक स्वयं भोजन न करे, और जब तक वे पी न लें तब तक जल न पिए।

श्लोक 56 (14.105.56)

शुश्रूषोर्मातरश्चैताः पितरस्ते प्रकीर्तिताः । अह्नां पूर्वत्र भागे च धुर्याणां वाहनं स्मृतम् ॥

śuśrūṣormātaraścaitāḥ pitaraste prakīrtitāḥ | ahnāṃ pūrvatra bhāge ca dhuryāṇāṃ vāhanaṃ smṛtam

सेवा की इच्छा रखने वाले के लिए ये गौएँ माताएँ हैं और बैल पिता कहे गए हैं। दिन के पूर्व भाग में जोतने वाले पशुओं से काम लेना बताया गया है।

श्लोक 57 (14.105.57)

विश्रामेन्मध्यमे भागे भागे चान्ते यथासुखम् । यत्र च त्वरया कृत्यं संशयो यत्र वाऽध्वनि । वाहयेत्तत्र धुर्यांस्तु न स पापेन लिप्यते ॥

viśrāmenmadhyame bhāge bhāge cānte yathāsukham | yatra ca tvarayā kṛtyaṃ saṃśayo yatra vā'dhvani | vāhayettatra dhuryāṃstu na sa pāpena lipyate

मध्य भाग में और दिन के अन्त में उन्हें इच्छानुसार विश्राम दे। परन्तु जहाँ कार्य शीघ्र करना हो या मार्ग में संकट का भय हो, वहाँ वह जोतने वाले पशुओं को चला सकता है; वह पाप से लिप्त नहीं होता।

श्लोक 58 (14.105.58)

भ्रूणहत्यासमं पापं तस्य स्यात्पाण्डुनन्दन । अन्यथा वाहयन्राजन्निरयं याति रौरवम् ॥

bhrūṇahatyāsamaṃ pāpaṃ tasya syātpāṇḍunandana | anyathā vāhayanrājannirayaṃ yāti rauravam

अन्यथा, हे पाण्डुनन्दन, उसे भ्रूणहत्या के समान पाप लगेगा; और हे राजन्! जो उन्हें अन्य प्रकार से हाँकता है, वह रौरव नरक में जाता है।

श्लोक 59 (14.105.59)

रुधिरं पातयेत्तेषां यस्तु मोहान्नराधिप । तेन पापेन पापात्मा नरकं यात्यसंशयम् ॥

rudhiraṃ pātayetteṣāṃ yastu mohānnarādhipa | tena pāpena pāpātmā narakaṃ yātyasaṃśayam

हे नराधिप! जो मोहवश उनका रक्त बहाता है, वह पापात्मा उस पाप से निश्चय ही नरक में जाता है।

श्लोक 60 (14.105.60)

नरकेषु च सर्वेषु समाः स्थित्वा शतंशतम् । इह मानुष्यके लोके बलीवर्दो भविष्यति ॥

narakeṣu ca sarveṣu samāḥ sthitvā śataṃśatam | iha mānuṣyake loke balīvardo bhaviṣyati

सब नरकों में सौ-सौ वर्ष रहकर वह इस मनुष्यलोक में बैल बनता है।

श्लोक 61 (14.105.61)

तस्मात्तु मुक्तिमन्विच्छन्दद्यात्तु कपिलां नरः ॥

tasmāttu muktimanvicchandadyāttu kapilāṃ naraḥ

इसलिए मुक्ति चाहने वाला मनुष्य कपिला का दान करे।

श्लोक 62 (14.105.62)

कपिलां वाहयेद्यस्तु वृषलो लोभमोहितः । तेन देवास्त्रयस्त्रिंशत्पितरश्चापि वाहिताः ॥

kapilāṃ vāhayedyastu vṛṣalo lobhamohitaḥ | tena devāstrayastriṃśatpitaraścāpi vāhitāḥ

जो लोभ से मोहित शूद्र कपिला को जोतता है, उसके द्वारा तैंतीस देवता और पितर भी जोत दिए जाते हैं।

श्लोक 63 (14.105.63)

स देवैः पितृभिर्नित्यं वध्यमानस्तु दुर्मतिः । नरकान्नरकं घोरं गच्छेदाप्रलयं नृप ॥

sa devaiḥ pitṛbhirnityaṃ vadhyamānastu durmatiḥ | narakānnarakaṃ ghoraṃ gacchedāpralayaṃ nṛpa

हे राजन्! वह दुर्बुद्धि देवताओं और पितरों से सदा ताड़ित होकर प्रलय तक एक भयंकर नरक से दूसरे नरक में जाता रहता है।

श्लोक 64 (14.105.64)

ब्रह्मा रुद्रस्तथाऽग्निश्च कपिलानां गतिं गताः । तस्मात्ते न निहन्तव्याः पूज्याश्चैव न संशयः । निःश्वसन्ति यदा श्रान्तास्तदा हन्युश्च तत्कुलं ॥

brahmā rudrastathā'gniśca kapilānāṃ gatiṃ gatāḥ | tasmātte na nihantavyāḥ pūjyāścaiva na saṃśayaḥ | niḥśvasanti yadā śrāntāstadā hanyuśca tatkulaṃ

ब्रह्मा, रुद्र और अग्नि कपिलाओं की शरण में गए हैं; इसलिए उन्हें मारना नहीं चाहिए, वे निःसंदेह पूजनीय हैं। थकी हुई वे जब उच्छ्वास भरती हैं, तब उस (उन्हें कष्ट देने वाले) के कुल का नाश कर देती हैं।

श्लोक 65 (14.105.65)

यावन्ति तेषां रोमाणि तावद्वर्षशतं नृप । नरकेषूपपच्यन्ते तत्र तद्वाहका नराः ॥

yāvanti teṣāṃ romāṇi tāvadvarṣaśataṃ nṛpa | narakeṣūpapacyante tatra tadvāhakā narāḥ

हे राजन्! उनके शरीर में जितने रोम हैं, उतने सौ वर्षों तक उन्हें जोतने वाले मनुष्य नरकों में पकाए जाते हैं।

श्लोक 66 (14.105.66)

कपिला सर्वयज्ञेषु दक्षिणार्थं विधीयते । तस्मात्तद्दक्षिणा देया यज्ञेष्वेव द्विजातिभिः ॥

kapilā sarvayajñeṣu dakṣiṇārthaṃ vidhīyate | tasmāttaddakṣiṇā deyā yajñeṣveva dvijātibhiḥ

सब यज्ञों में कपिला दक्षिणा के लिए निर्धारित है; इसलिए द्विजातियों को यज्ञों में वही दक्षिणा के रूप में देनी चाहिए।

श्लोक 67 (14.105.67)

होमार्थं चाग्निहोत्रस्य यां प्रयच्छेत्प्रयत्नतः । श्रोत्रियाय दरिद्राय श्रान्तायामिततेजसे । तेन दानेन पूतात्मा मम लोके महीयते ॥

homārthaṃ cāgnihotrasya yāṃ prayacchetprayatnataḥ | śrotriyāya daridrāya śrāntāyāmitatejase | tena dānena pūtātmā mama loke mahīyate

जो अग्निहोत्र के होम के लिए यत्नपूर्वक किसी दरिद्र, थके हुए, अपार तेजस्वी वेदपाठी ब्राह्मण को कपिला दान करता है, वह उस दान से पवित्र आत्मा होकर मेरे लोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 68 (14.105.68)

यावन्ति चैव रोमाणि कपिलाङ्गे युधिष्ठिर । तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥

yāvanti caiva romāṇi kapilāṅge yudhiṣṭhira | tāvadvarṣasahasrāṇi svargaloke mahīyate

हे युधिष्ठिर! कपिला के शरीर में जितने रोम होते हैं, उतने हजार वर्षों तक दाता स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 69 (14.105.69)

सुवर्णखुरशृङ्गीं च कपिलां यः प्रयच्छति । विषुवे चायने चापि सोऽश्वमेधफलं लभेत् । तेनाश्वमेधतुल्येन मम लोकं स गच्छति ॥

suvarṇakhuraśṛṅgīṃ ca kapilāṃ yaḥ prayacchati | viṣuve cāyane cāpi so'śvamedhaphalaṃ labhet | tenāśvamedhatulyena mama lokaṃ sa gacchati

जो विषुव या अयन के समय सोने के खुरों और सींगों वाली कपिला का दान करता है, वह अश्वमेध का फल पाता है; और अश्वमेध के समान उस दान से वह मेरे लोक को जाता है।

श्लोक 70 (14.105.70)

स्वर्णशृङ्गीं रूप्यखुरां सवत्सां कांस्यदोहिनीम् । वस्त्रैरलङ्कृतां पुष्टां गन्धैर्माल्यैश्च शोभिताम् ॥

svarṇaśṛṅgīṃ rūpyakhurāṃ savatsāṃ kāṃsyadohinīm | vastrairalaṅkṛtāṃ puṣṭāṃ gandhairmālyaiśca śobhitām

सोने के सींगों और चाँदी के खुरों वाली, बछड़े सहित, काँसे की दोहनी के साथ, वस्त्रों से सजी, पुष्ट, गन्ध और मालाओं से शोभित —

श्लोक 71 (14.105.71)

पवित्रं हि पवित्राणां सुवर्णमिति मे मतिः । तस्मात्सुवर्णाभरणा दातव्या साऽग्निहोत्रिणे ॥

pavitraṃ hi pavitrāṇāṃ suvarṇamiti me matiḥ | tasmātsuvarṇābharaṇā dātavyā sā'gnihotriṇe

पवित्रों में सोना पवित्र है — ऐसा मेरा मत है। इसलिए उसे सोने के आभूषणों से सजाकर अग्निहोत्री को देना चाहिए।

श्लोक 72 (14.105.72)

एवं दत्त्वा तु राजेन्द्र सप्तपूर्वान्परानपि । तारयिष्यति राजेन्द्र नात्र कार्या विचारणा ॥

evaṃ dattvā tu rājendra saptapūrvānparānapi | tārayiṣyati rājendra nātra kāryā vicāraṇā

हे राजेन्द्र! इस प्रकार दान करके वह अपने सात पूर्वजों और उनके बाद के वंशजों को भी तार देगा; इसमें कोई शंका नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 73 (14.105.73)

अग्निष्टोमसहस्रस्य वाजपेयं च तत्समम् । वाजपेयसहस्रस्य अश्वमेधं च तत्समम् । अश्वमेधसहस्रस्य राजसूयं च तत्समम् ॥

agniṣṭomasahasrasya vājapeyaṃ ca tatsamam | vājapeyasahasrasya aśvamedhaṃ ca tatsamam | aśvamedhasahasrasya rājasūyaṃ ca tatsamam

हजार अग्निष्टोमों के समान एक वाजपेय है; हजार वाजपेयों के समान एक अश्वमेध है; और हजार अश्वमेधों के समान एक राजसूय है।

श्लोक 74 (14.105.74)

कपिलानां सहस्रेण विधिदत्तेन पाण्डव । राजसूयफलं प्राप्य मम लोके महीयते । न तस्य पुनरावृत्तिर्विद्यते कुरुपुङ्गव ॥

kapilānāṃ sahasreṇa vidhidattena pāṇḍava | rājasūyaphalaṃ prāpya mama loke mahīyate | na tasya punarāvṛttirvidyate kurupuṅgava

हे पाण्डव! विधिपूर्वक हजार कपिलाओं का दान करके मनुष्य राजसूय का फल पाकर मेरे लोक में सम्मानित होता है। हे कुरुश्रेष्ठ! उसका फिर लौटना नहीं होता।

श्लोक 75 (14.105.75)

प्रयच्छते यः कपिलां सवत्सां कांस्यदोहिनीम् । सुवर्णखुरशृङ्गाङ्गीं सर्वालङ्कारशोभिताम् । तैस्तैर्गुणैः कामदुघा च भूत्वा । नरं प्रदातारमुपैति सा गौः ॥

prayacchate yaḥ kapilāṃ savatsāṃ kāṃsyadohinīm | suvarṇakhuraśṛṅgāṅgīṃ sarvālaṅkāraśobhitām | taistairguṇaiḥ kāmadughā ca bhūtvā | naraṃ pradātāramupaiti sā gauḥ

जो बछड़े सहित, काँसे की दोहनी वाली, सोने के खुरों और सींगों से युक्त तथा सब अलंकारों से शोभित कपिला का दान करता है, उस दाता मनुष्य के पास वह गौ अपने उन-उन गुणों से कामधेनु बनकर पहुँचती है।

श्लोक 76 (14.105.76)

स्वकर्मभिश्चाप्यनुबध्यमानं । तीव्रान्धकारे नरके पतन्तम् । महार्णवे नौरिव वायुनीता । दत्ता हि गौस्तारयते मनुष्यम् ॥

svakarmabhiścāpyanubadhyamānaṃ | tīvrāndhakāre narake patantam | mahārṇave nauriva vāyunītā | dattā hi gaustārayate manuṣyam

अपने कर्मों से बँधे हुए और घोर अन्धकार वाले नरक में गिरते हुए मनुष्य को, दी हुई गौ उसी प्रकार तार देती है जैसे वायु से चलाई हुई नाव महासागर से पार करा देती है।

श्लोक 77 (14.105.77)

पुत्रांश्च पौत्रांश्च कुलं च सर्व- । मासप्तमं तारयते यथावत् । यावन्मनुष्यान्पृथिवी बिभर्ति । तावत्प्रदातारमृतं परत्र ॥

putrāṃśca pautrāṃśca kulaṃ ca sarva- | māsaptamaṃ tārayate yathāvat | yāvanmanuṣyānpṛthivī bibharti | tāvatpradātāramṛtaṃ paratra

पुत्रों, पौत्रों और सारे कुल को वह सातवीं पीढ़ी तक यथावत् तार देती है। जब तक पृथ्वी मनुष्यों को धारण करती है, तब तक परलोक में दाता अमर बना रहता है।

श्लोक 78 (14.105.78)

यथौषधं मन्त्रकृतं नरस्य । प्रयुक्तमात्रं विनिहन्ति रोगान् । तथैव दत्ता कपिला सुपात्रे । पापं नरस्याशु निहन्ति सर्वम् ॥

yathauṣadhaṃ mantrakṛtaṃ narasya | prayuktamātraṃ vinihanti rogān | tathaiva dattā kapilā supātre | pāpaṃ narasyāśu nihanti sarvam

जैसे मन्त्र से अभिमन्त्रित औषधि प्रयोग करते ही मनुष्य के रोगों को नष्ट कर देती है, वैसे ही सुपात्र को दी गई कपिला मनुष्य के सब पाप शीघ्र नष्ट कर देती है।

श्लोक 79 (14.105.79)

यथैव दृष्ट्वा भुजगाः सुपर्णं । नश्यन्ति दूराद्विवशा भयार्ताः । तथैव दृष्ट्वा कपिलाप्रदाना- । न्नश्यन्ति पापानि नरस्य शीघ्रम् ॥

yathaiva dṛṣṭvā bhujagāḥ suparṇaṃ | naśyanti dūrādvivaśā bhayārtāḥ | tathaiva dṛṣṭvā kapilāpradānā- | nnaśyanti pāpāni narasya śīghram

जैसे गरुड़ को देखकर भयभीत और विवश सर्प दूर से ही भाग जाते हैं, वैसे ही कपिला-दान को देखकर मनुष्य के पाप शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 80 (14.105.80)

यथा त्वचं वै भुजगो विहाय । पुनर्नवं रूपमुपैति पुण्यम् । तथैव मुक्तः पुरुषः स्वपापै- । र्विरज्यते वै कपिलाप्रदानात् ॥

yathā tvacaṃ vai bhujago vihāya | punarnavaṃ rūpamupaiti puṇyam | tathaiva muktaḥ puruṣaḥ svapāpai- | rvirajyate vai kapilāpradānāt

जैसे साँप अपनी केंचुली छोड़कर फिर नया सुन्दर रूप पा लेता है, वैसे ही मनुष्य कपिला-दान से अपने पापों से मुक्त होकर निर्मल हो जाता है।

श्लोक 81 (14.105.81)

यथाऽन्धकारं भवने विलग्नं । दीप्तो हि निर्यातयति प्रदीपः । तथा नरः पापमपि प्रलीनं । निष्क्रामयेद्वै कपिलाप्रदानात् ॥

yathā'ndhakāraṃ bhavane vilagnaṃ | dīpto hi niryātayati pradīpaḥ | tathā naraḥ pāpamapi pralīnaṃ | niṣkrāmayedvai kapilāpradānāt

जैसे जलता हुआ दीपक घर में छिपे अन्धकार को निकाल देता है, वैसे ही मनुष्य कपिला-दान से अपने भीतर गहरे छिपे हुए पाप को भी निकाल बाहर करता है।

श्लोक 82 (14.105.82)

यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या । वत्सान्वितायाश्च शरीरजानि । तावत्प्रदाता युगवर्षकोटिं । स ब्रह्मलोके रमते मनुष्यः ॥

yāvanti romāṇi bhavanti tasyā | vatsānvitāyāśca śarīrajāni | tāvatpradātā yugavarṣakoṭiṃ | sa brahmaloke ramate manuṣyaḥ

बछड़े सहित उस गौ के शरीर में जितने रोम होते हैं, उतने करोड़ युगवर्षों तक वह दाता मनुष्य ब्रह्मलोक में आनन्द करता है।

श्लोक 83 (14.105.83)

यस्याहिताग्नेरतिथिप्रियस्य । शूद्रान्नदूरस्य जितेन्द्रियस्य । सत्यव्रतस्याध्ययनान्वितस्य । दत्ता हि गौस्तारयते परत्र ॥

yasyāhitāgneratithipriyasya | śūdrānnadūrasya jitendriyasya | satyavratasyādhyayanānvitasya | dattā hi gaustārayate paratra

जो अग्निहोत्री हो, अतिथिप्रिय हो, शूद्र के अन्न से दूर रहता हो, जितेन्द्रिय, सत्यव्रती और स्वाध्यायशील हो — उसे दी हुई गौ परलोक में दाता को तार देती है।

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