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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 106

कपिला की उत्पत्ति, उसमें देवताओं का वास और दान के पात्र-अपात्र

युधिष्ठिर पूछते हैं कि कपिला के अंगों में देवता कैसे रहते हैं और दस कपिलाओं में कौन-सी श्रेष्ठ हैं। कृष्ण दान का उचित समय, दान तथा इस कथा के पाठ का फल और चार श्रेष्ठ कपिलाएँ बताते हैं; फिर वे कहते हैं कि ब्रह्मा ने उसे अग्निकुण्ड से कैसे रचा, देवताओं ने उसे कैसे वर दिया, और उसके प्रत्येक अंग में कौन-कौन देवता व शक्तियाँ रहती हैं। हव्य-कव्य के समय के विषय में पूछे जाने पर वे श्राद्ध में सत्कार के योग्य और अयोग्य ब्राह्मणों की गणना करते हैं, और अन्त में नरक तथा स्वर्ग जाने वालों का वर्णन करते हैं।

अध्याय 105अध्याय-सूचीअध्याय 107

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.106.1)

एवं श्रुत्वा परं पुण्यं कपिलादानमुत्तमम् । धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ॥

evaṃ śrutvā paraṃ puṇyaṃ kapilādānamuttamam | dharmaputraḥ prahṛṣṭātmā keśavaṃ punarabravīt

कपिला-दान का यह परम पवित्र उत्तम माहात्म्य सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने प्रसन्न मन से केशव से फिर कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (14.106.2)

देवदेवेश कपिला यदा विप्राय दीयते । कथं सर्वेषु चाङ्गेषु तस्यास्तिष्ठन्ति देवताः ॥

devadeveśa kapilā yadā viprāya dīyate | kathaṃ sarveṣu cāṅgeṣu tasyāstiṣṭhanti devatāḥ

हे देवदेवेश! जब कपिला ब्राह्मण को दी जाती है, तब उसके सब अंगों में देवता किस प्रकार स्थित रहते हैं?

श्लोक 3 (14.106.3)

याश्चैताः कपिलाः प्रोक्ता दश चैव त्वया मम । तासां कति सुरश्रेष्ठ कपिलाः पुण्यलक्षणाः ॥

yāścaitāḥ kapilāḥ proktā daśa caiva tvayā mama | tāsāṃ kati suraśreṣṭha kapilāḥ puṇyalakṣaṇāḥ

आपने मुझे जिन दस कपिलाओं के विषय में बताया, हे सुरश्रेष्ठ! उनमें से कितनी पुण्य लक्षणों वाली हैं?

श्लोक 4 (14.106.4)

कथं वाऽनुगृहीतास्ताः सुरैः पितृगणैरपि । केन युक्ताश्च वर्णेन श्रोतुं कौतूहलं मे ॥

kathaṃ vā'nugṛhītāstāḥ suraiḥ pitṛgaṇairapi | kena yuktāśca varṇena śrotuṃ kautūhalaṃ me

और वे देवताओं तथा पितरों से किस प्रकार अनुगृहीत हैं? और वे किस रंग की हैं? मुझे यह सुनने की उत्सुकता है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (14.106.5)

युधिष्ठिरेणैवमुक्तः केशवः सत्यवाक्तदा । गुह्यानां परमं गुह्यं वक्तुमेवोपचक्रमे ॥

yudhiṣṭhireṇaivamuktaḥ keśavaḥ satyavāktadā | guhyānāṃ paramaṃ guhyaṃ vaktumevopacakrame

युधिष्ठिर के ऐसा कहने पर सत्यवादी केशव ने तब गुह्यों में परम गुह्य बात कहनी आरम्भ की।

वासुदेव उवाच

श्लोक 6 (14.106.6)

शृणु राजन्पवित्रं वै रहस्यं धर्ममुत्तमम् । ग्रहणीयं सत्यमिदं न श्राव्यं हेतुवादिभिः ॥

śṛṇu rājanpavitraṃ vai rahasyaṃ dharmamuttamam | grahaṇīyaṃ satyamidaṃ na śrāvyaṃ hetuvādibhiḥ

हे राजन्! यह पवित्र रहस्य और उत्तम धर्म सुनो। यह सत्य ग्रहण करने योग्य है; तर्क करने वालों को इसे नहीं सुनाना चाहिए।

श्लोक 7 (14.106.7)

यदा वत्सस्य पादौ द्वौ प्रसवे शिरसा सह । दृश्येते दानकालं तत्तमाहुर्मुनिसत्तमाः ॥

yadā vatsasya pādau dvau prasave śirasā saha | dṛśyete dānakālaṃ tattamāhurmunisattamāḥ

जब प्रसव के समय बछड़े के दोनों पैर सिर के साथ दिखाई दें, तब श्रेष्ठ मुनि उसे दान का समय बताते हैं।

श्लोक 8 (14.106.8)

अन्तरिक्षगतो वत्सो यावद्भूमिं न यास्यति । गौस्तावत्पृथिवी ज्ञेया तस्माद्देया तु तादृशी ॥

antarikṣagato vatso yāvadbhūmiṃ na yāsyati | gaustāvatpṛthivī jñeyā tasmāddeyā tu tādṛśī

जब तक अन्तरिक्ष में स्थित बछड़ा भूमि पर नहीं आता, तब तक वह गौ पृथ्वी ही समझी जानी चाहिए; इसलिए वैसी गौ का दान करना चाहिए।

श्लोक 9 (14.106.9)

यावन्ति धेन्वा रोमाणि सवत्साया युधिष्ठिर । यावत्यः सिकताश्चापि गर्भोदकपरिप्लुताः । तावद्वर्षसहस्राणि दाता स्वर्गे महीयते ॥

yāvanti dhenvā romāṇi savatsāyā yudhiṣṭhira | yāvatyaḥ sikatāścāpi garbhodakapariplutāḥ | tāvadvarṣasahasrāṇi dātā svarge mahīyate

हे युधिष्ठिर! बछड़े वाली गौ के शरीर पर जितने रोम होते हैं और गर्भ के जल से भीगे हुए जितने बालू के कण होते हैं, उतने हजार वर्षों तक दाता स्वर्ग में सम्मानित होता है।

श्लोक 10 (14.106.10)

सुवर्णाभरणां कृत्वा सवत्सां कपिलां तिलैः । प्रच्छाद्य तां तु दद्याद्वै सर्वरत्नैरलङ्कृताम् ॥

suvarṇābharaṇāṃ kṛtvā savatsāṃ kapilāṃ tilaiḥ | pracchādya tāṃ tu dadyādvai sarvaratnairalaṅkṛtām

बछड़े सहित कपिला को सोने के आभूषणों से सजाकर और तिलों से ढककर, सब प्रकार के रत्नों से अलंकृत करके दान करे।

श्लोक 11 (14.106.11)

ससमुद्रा मही तेन सशैलवनकानना । चतुरन्ता भवेद्दत्ता नात्र कार्या विचारणा ॥

sasamudrā mahī tena saśailavanakānanā | caturantā bhaveddattā nātra kāryā vicāraṇā

उस दान से समुद्र, पर्वत, वन और उपवनों सहित चारों ओर समुद्र से घिरी हुई पृथ्वी का दान हो जाता है — इसमें कोई शंका नहीं।

श्लोक 12 (14.106.12)

पृथिवीदानतुल्येन तेन दानेन मानवः । संसारसागरात्तीर्णो याति लोकं प्रजापतेः ॥

pṛthivīdānatulyena tena dānena mānavaḥ | saṃsārasāgarāttīrṇo yāti lokaṃ prajāpateḥ

पृथ्वी-दान के समान उस दान से मनुष्य संसार-सागर को पार कर प्रजापति के लोक को जाता है।

श्लोक 13 (14.106.13)

ब्रह्महा भ्रूणहा गोघ्नो यदि वा गुरुतल्पगः । महापातकयुक्तोपि एतद्दानेन शुद्ध्यति ॥

brahmahā bhrūṇahā goghno yadi vā gurutalpagaḥ | mahāpātakayuktopi etaddānena śuddhyati

ब्राह्मण की हत्या करने वाला, भ्रूणहत्यारा, गौहत्यारा अथवा गुरुपत्नीगामी — महापातकों से युक्त होने पर भी इस दान से शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 14 (14.106.14)

इदं पठति यः पुण्यं कपिलादानमुत्तमम् । प्रातरुत्थाय मद्भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

idaṃ paṭhati yaḥ puṇyaṃ kapilādānamuttamam | prātarutthāya madbhaktyā tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

जो प्रातःकाल उठकर मेरी भक्ति से कपिला-दान के इस उत्तम पुण्य-प्रसंग का पाठ करता है, उसके पुण्यफल को सुनो।

श्लोक 15 (14.106.15)

मनसा कर्मणा वाचा मतिपूर्वं युधिष्ठिर । पापं रात्रिकृतं हन्यादस्याध्यायस्य पाठकः ॥

manasā karmaṇā vācā matipūrvaṃ yudhiṣṭhira | pāpaṃ rātrikṛtaṃ hanyādasyādhyāyasya pāṭhakaḥ

हे युधिष्ठिर! इस अध्याय का पाठक मन, कर्म या वाणी से जान-बूझकर किए हुए रात्रि के पाप को भी नष्ट कर देता है।

श्लोक 16 (14.106.16)

इदमावर्तमानस्तु श्राद्धे यस्तर्पयेद्द्विजान् । तस्याप्यमृतमश्नन्ति पितरोऽत्यन्तहर्षिताः ॥

idamāvartamānastu śrāddhe yastarpayeddvijān | tasyāpyamṛtamaśnanti pitaro'tyantaharṣitāḥ

जो इसका पाठ करते हुए श्राद्ध में द्विजों को तृप्त करता है, उसके पितर अत्यन्त प्रसन्न होकर अमृत का भोजन करते हैं।

श्लोक 17 (14.106.17)

यश्चेदं शृणुयाद्भक्त्या मद्गतेनान्तरात्मना । तस्य रात्रिकृतं सर्वं पापमाशु प्रणश्यति ॥

yaścedaṃ śṛṇuyādbhaktyā madgatenāntarātmanā | tasya rātrikṛtaṃ sarvaṃ pāpamāśu praṇaśyati

और जो मुझमें मन लगाकर भक्तिपूर्वक इसे सुनता है, उसका रात्रि में किया हुआ सब पाप शीघ्र नष्ट हो जाता है।

श्लोक 18 (14.106.18)

अतः परं विशेषं तु कपिलानां ब्रवीमि ते । याश्चैताः कपिलाः प्रोक्ता दश राजन्मया तव । तासां चतस्रः प्रवराः पुण्याः पापप्रणाशनाः ॥

ataḥ paraṃ viśeṣaṃ tu kapilānāṃ bravīmi te | yāścaitāḥ kapilāḥ proktā daśa rājanmayā tava | tāsāṃ catasraḥ pravarāḥ puṇyāḥ pāpapraṇāśanāḥ

अब मैं तुम्हें कपिलाओं की विशेषता बताता हूँ। हे राजन्! जिन दस कपिलाओं का मैंने तुमसे वर्णन किया, उनमें चार श्रेष्ठ, पुण्यमयी और पापनाशिनी हैं।

श्लोक 19 (14.106.19)

सुवर्णकपिला पुण्या तथा रक्ताक्षिपिङ्गला । पिङ्गलाक्षी च या गौश्च या स्यात्पिङ्गलपिङ्गला ॥

suvarṇakapilā puṇyā tathā raktākṣipiṅgalā | piṅgalākṣī ca yā gauśca yā syātpiṅgalapiṅgalā

पुण्यमयी स्वर्ण-कपिला; रक्त-पिंगल नेत्रों वाली; पिंगल नेत्रों वाली गौ; और जो पिंगल-पिंगला हो।

श्लोक 20 (14.106.20)

एताश्चतस्रः प्रवराः पवित्राः पापनाशनाः । नमस्कृता वा दृष्टा वा घ्नन्ति पापं नरस्य तु ॥

etāścatasraḥ pravarāḥ pavitrāḥ pāpanāśanāḥ | namaskṛtā vā dṛṣṭā vā ghnanti pāpaṃ narasya tu

ये चारों श्रेष्ठ, पवित्र और पापनाशक हैं। इन्हें प्रणाम करने या देख लेने से मनुष्य का पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 21 (14.106.21)

यस्यैताः कपिलाः सन्ति गृहे पापप्रणाशनाः । तत्र श्रीर्विजयः कीर्तिः स्फीता नित्यं युधिष्ठिर ॥

yasyaitāḥ kapilāḥ santi gṛhe pāpapraṇāśanāḥ | tatra śrīrvijayaḥ kīrtiḥ sphītā nityaṃ yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर! जिसके घर में ये पापनाशिनी कपिलाएँ रहती हैं, वहाँ श्री, विजय और कीर्ति सदा बढ़ती हुई निवास करती हैं।

श्लोक 22 (14.106.22)

एतासां प्रीतिमायाति क्षीरेण तु वृषध्वजः । दध्ना च त्रिदशाः सर्वे घृतेन तु हुताशनः ॥

etāsāṃ prītimāyāti kṣīreṇa tu vṛṣadhvajaḥ | dadhnā ca tridaśāḥ sarve ghṛtena tu hutāśanaḥ

इनके दूध से वृषध्वज शिव प्रसन्न होते हैं, दही से सब देवता, और घी से अग्निदेव।

श्लोक 23 (14.106.23)

पितरः पितामहाश्चैव तथैव प्रपितामहाः । सकृद्दत्तेन तुष्यन्ति वर्षकोटिं युधिष्ठिर ॥

pitaraḥ pitāmahāścaiva tathaiva prapitāmahāḥ | sakṛddattena tuṣyanti varṣakoṭiṃ yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर! पितर, पितामह और प्रपितामह एक बार दिए हुए दान से करोड़ वर्षों तक तृप्त रहते हैं।

श्लोक 24 (14.106.24)

कपिलाया घृतं क्षीरं दधि पायसमेव वा । श्रोत्रियेभ्यः सकृद्दत्त्वा नरः पापैः प्रमुच्यते ॥

kapilāyā ghṛtaṃ kṣīraṃ dadhi pāyasameva vā | śrotriyebhyaḥ sakṛddattvā naraḥ pāpaiḥ pramucyate

कपिला का घी, दूध, दही अथवा खीर वेदपाठी ब्राह्मणों को एक बार देकर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 25 (14.106.25)

उपवासं तु यः कृत्वाऽप्यहोरात्रं जितेन्द्रियः । कपिलापञ्चगव्यं तु पीत्वा चान्द्रायणात्परम् ॥

upavāsaṃ tu yaḥ kṛtvā'pyahorātraṃ jitendriyaḥ | kapilāpañcagavyaṃ tu pītvā cāndrāyaṇātparam

जो जितेन्द्रिय पुरुष एक दिन-रात उपवास करके कपिला का पंचगव्य पीता है — जो चान्द्रायण से भी श्रेष्ठ है —

श्लोक 26 (14.106.26)

सौम्ये मुहूर्ते तत्प्राश्य शुद्धात्मा शुद्धमानसः । क्रोधानृतविनिर्मुक्तो मद्गतेनान्तरात्मना ॥

saumye muhūrte tatprāśya śuddhātmā śuddhamānasaḥ | krodhānṛtavinirmukto madgatenāntarātmanā

शुभ मुहूर्त में उसे ग्रहण करके, शुद्ध आत्मा और शुद्ध मन से, क्रोध और असत्य से रहित होकर, मुझमें अन्तःकरण लगाकर,

श्लोक 27 (14.106.27)

कपिलापञ्चगव्येन सुमन्त्रेण पृथक्पृथक् । यो मत्प्रतिकृतिं वाऽपि शङ्कराकृतिमेव वा । स्नापयेद्विषुवे यस्तु सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥

kapilāpañcagavyena sumantreṇa pṛthakpṛthak | yo matpratikṛtiṃ vā'pi śaṅkarākṛtimeva vā | snāpayedviṣuve yastu so'śvamedhaphalaṃ labhet

और कपिला के पंचगव्य के प्रत्येक भाग से अलग-अलग उत्तम मन्त्रों के साथ जो विषुव के दिन मेरी प्रतिमा को या शंकर की मूर्ति को स्नान कराता है, वह अश्वमेध का फल पाता है।

श्लोक 28 (14.106.28)

स मुक्तपापः शुद्धात्मा यानेनांबरशोभिना । मम लोकं व्रजेन्मुक्तो रुद्रलोकमथापि वा ॥

sa muktapāpaḥ śuddhātmā yānenāṃbaraśobhinā | mama lokaṃ vrajenmukto rudralokamathāpi vā

वह पापमुक्त और शुद्ध आत्मा मनुष्य आकाश में शोभित विमान से मेरे लोक को जाता है, अथवा रुद्रलोक को।

श्लोक 29 (14.106.29)

ब्रह्मणा तु पुरा सृष्टा कपिला काञ्चनप्रभा । अग्निकुण्डात्परैर्मन्त्रैर्होमधेनुर्महाप्रभा ॥

brahmaṇā tu purā sṛṣṭā kapilā kāñcanaprabhā | agnikuṇḍātparairmantrairhomadhenurmahāprabhā

पूर्वकाल में ब्रह्मा ने उत्तम मन्त्रों से अग्निकुण्ड से स्वर्ण-आभा वाली कपिला की सृष्टि की — वह महातेजस्विनी होमधेनु थी।

श्लोक 30 (14.106.30)

सृष्टमात्रां तु तां दृष्ट्वा देवा रुद्रादयो दिवि । सिद्धा ब्रह्मर्षयश्चैव वेदाः साङ्गाः सहाध्वरैः ॥

sṛṣṭamātrāṃ tu tāṃ dṛṣṭvā devā rudrādayo divi | siddhā brahmarṣayaścaiva vedāḥ sāṅgāḥ sahādhvaraiḥ

उसे अभी उत्पन्न हुई देखकर रुद्र आदि स्वर्ग के देवता, सिद्ध, ब्रह्मर्षि, अंगों सहित वेद और यज्ञ,

श्लोक 31 (14.106.31)

सागराः सरितश्चैव पर्वताः सबलाहकाः । गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः पन्नगाश्चाप्युपस्थिताः ॥

sāgarāḥ saritaścaiva parvatāḥ sabalāhakāḥ | gandharvāpsaraso yakṣāḥ pannagāścāpyupasthitāḥ

सागर, नदियाँ, मेघों सहित पर्वत, गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष और नाग भी वहाँ उपस्थित हुए।

श्लोक 32 (14.106.32)

सर्वे विस्मयमापन्नाः शिखिमध्ये महाप्रभाम् । मन्त्रैश्च विविधैस्तां तु तुष्टुवुस्तामनेकशः ॥

sarve vismayamāpannāḥ śikhimadhye mahāprabhām | mantraiśca vividhaistāṃ tu tuṣṭuvustāmanekaśaḥ

सब अग्नि के बीच उस महातेजस्विनी को देखकर विस्मय में पड़ गए और अनेक प्रकार के मन्त्रों से बार-बार उसकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 33 (14.106.33)

कृताञ्जलिपुटाः सर्वे ताम्रशृङ्गीं त्रिलोचनाम् । मूर्ध्ना प्रणम्य तां भूमौ सवत्साममृतारणिम् ॥

kṛtāñjalipuṭāḥ sarve tāmraśṛṅgīṃ trilocanām | mūrdhnā praṇamya tāṃ bhūmau savatsāmamṛtāraṇim

सबने हाथ जोड़कर, ताम्रवर्ण सींगों और तीन नेत्रों वाली, अमृत की अरणि-स्वरूपा उस बछड़े सहित गौ को सिर झुकाकर भूमि पर प्रणाम किया।

श्लोक 34 (14.106.34)

ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे चतुर्वक्त्रं पितामहम् । आज्ञापय महादेव किं ते कुर्मः कथं विभो ॥

ūcuḥ prāñjalayaḥ sarve caturvaktraṃ pitāmaham | ājñāpaya mahādeva kiṃ te kurmaḥ kathaṃ vibho

वे सब हाथ जोड़कर चतुर्मुख पितामह से बोले — "हे महादेव! आज्ञा दीजिए; हे विभो, हम क्या करें और कैसे करें?"

श्लोक 35 (14.106.35)

एवमुक्तः सुरैः सर्वैर्ब्रह्मा वचनमब्रवीत् । भवन्तोप्यनुगृह्णन्तु दोग्ध्रीमेनां पयस्विनीम् ॥

evamuktaḥ suraiḥ sarvairbrahmā vacanamabravīt | bhavantopyanugṛhṇantu dogdhrīmenāṃ payasvinīm

सब देवताओं के ऐसा कहने पर ब्रह्मा ने कहा — "आप लोग भी इस दूध देने वाली गौ पर अनुग्रह कीजिए।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 36 (14.106.36)

होमधेनुरियं ज्ञेया ह्यग्नीन्संतर्पयिष्यति । अतोऽग्निस्तर्पितः सर्वान्भवतस्तर्पयिष्यति ॥

homadhenuriyaṃ jñeyā hyagnīnsaṃtarpayiṣyati | ato'gnistarpitaḥ sarvānbhavatastarpayiṣyati

इसे होमधेनु समझो; यह अग्नियों को तृप्त करेगी। तब तृप्त हुए अग्नि आप सबको तृप्त करेंगे।

श्लोक 37 (14.106.37)

प्रीताः क्षीरामृतेनास्या जातवीर्यपराक्रमाः । जयिष्यथ यथाकामं दानवान्सर्व एव तु ॥

prītāḥ kṣīrāmṛtenāsyā jātavīryaparākramāḥ | jayiṣyatha yathākāmaṃ dānavānsarva eva tu

इसके दूध-रूपी अमृत से तृप्त होकर, बल और पराक्रम से सम्पन्न होकर आप सब इच्छानुसार दानवों को जीतेंगे।

श्लोक 38 (14.106.38)

जातवीर्यबलैर्युक्ताः सत्ववन्तो जितेन्द्रियाः । असङ्ख्येयबलाः सर्वे पालयिष्यथ वै प्रजाः ॥

jātavīryabalairyuktāḥ satvavanto jitendriyāḥ | asaṅkhyeyabalāḥ sarve pālayiṣyatha vai prajāḥ

बल और वीर्य से युक्त, सत्त्वशील, जितेन्द्रिय और असंख्य बल वाले होकर आप सब प्रजाओं का पालन करेंगे।

श्लोक 39 (14.106.39)

पालिताश्च प्रजाः सर्वा भवद्भिरिह धर्मतः । पूजयिष्यन्ति वो नित्यं यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ॥

pālitāśca prajāḥ sarvā bhavadbhiriha dharmataḥ | pūjayiṣyanti vo nityaṃ yajñairvividhadakṣiṇaiḥ

और आपसे यहाँ धर्मपूर्वक पाली गई सब प्रजाएँ नाना प्रकार की दक्षिणा वाले यज्ञों से सदा आपकी पूजा करेंगी।

वासुदेव उवाच

श्लोक 40 (14.106.40)

एवमुक्ताः सुराः सर्वे ब्रह्मणा परमेष्ठिना । ततः संहृष्टवदनाः कपिलायै वरं ददुः ॥

evamuktāḥ surāḥ sarve brahmaṇā parameṣṭhinā | tataḥ saṃhṛṣṭavadanāḥ kapilāyai varaṃ daduḥ

परमेष्ठी ब्रह्मा के ऐसा कहने पर सब देवताओं ने हर्षित मुख होकर कपिला को वरदान दिया।

देवता ऊचुः

श्लोक 41 (14.106.41)

यस्माल्लोकहितायाद्य ब्रह्मणा त्वं विनिर्मिता । तस्मात्पूता पवित्रा च भव पापव्यपोहिनी ॥

yasmāllokahitāyādya brahmaṇā tvaṃ vinirmitā | tasmātpūtā pavitrā ca bhava pāpavyapohinī

क्योंकि आज ब्रह्मा ने तुम्हें लोकहित के लिए बनाया है, इसलिए तुम पवित्र और पावन होओ तथा पापों को दूर करने वाली बनो।

श्लोक 42 (14.106.42)

ये त्वां दृष्ट्वा नमस्यन्ति स्पृष्ट्वा चापि करैर्नराः । तेषां वर्षकृतं पापं त्वद्भक्तानां प्रणश्यति ॥

ye tvāṃ dṛṣṭvā namasyanti spṛṣṭvā cāpi karairnarāḥ | teṣāṃ varṣakṛtaṃ pāpaṃ tvadbhaktānāṃ praṇaśyati

जो मनुष्य तुम्हें देखकर प्रणाम करते हैं या हाथों से तुम्हें छूते हैं, तुम्हारे उन भक्तों का एक वर्ष का किया हुआ पाप नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 43 (14.106.43)

अकामकृतमज्ञानमदृष्टं यच्च पातकम् । त्वां दृष्ट्वा ये नमस्यन्ति नराः सर्वसहेति च । तेषां तद्विलयं याति तमः सूर्योदये यथा ॥

akāmakṛtamajñānamadṛṣṭaṃ yacca pātakam | tvāṃ dṛṣṭvā ye namasyanti narāḥ sarvasaheti ca | teṣāṃ tadvilayaṃ yāti tamaḥ sūryodaye yathā

अनिच्छा से, अज्ञान से या अनजाने में जो भी पाप हुआ हो — जो मनुष्य तुम्हें देखकर प्रणाम करते हैं और तुम्हें "सर्वसहा" कहते हैं, उनका वह पाप वैसे ही विलीन हो जाता है जैसे सूर्योदय पर अन्धकार।

वासुदेव उवाच

श्लोक 44 (14.106.44)

इत्युक्त्वाऽस्यै वरं दत्त्वा प्रययुस्ते यथागतम् । लोकनिस्तरणार्थाय सा च लोकांश्चचार ह ॥

ityuktvā'syai varaṃ dattvā prayayuste yathāgatam | lokanistaraṇārthāya sā ca lokāṃścacāra ha

यह कहकर और उसे वर देकर वे जैसे आए थे वैसे ही चले गए; और वह लोकों के उद्धार के लिए संसार में विचरने लगी।

श्लोक 45 (14.106.45)

तस्यामेव समुद्भूता ह्येताश्च कपिला नव । विचरन्ति महीमेनां लोकानुग्रहकारणात् । तस्मात्तु कपिला देया परत्र हितमिच्छता ॥

tasyāmeva samudbhūtā hyetāśca kapilā nava | vicaranti mahīmenāṃ lokānugrahakāraṇāt | tasmāttu kapilā deyā paratra hitamicchatā

उसी से ये अन्य नौ कपिलाएँ उत्पन्न हुईं; वे लोकों पर अनुग्रह करने के लिए इस पृथ्वी पर विचरती हैं। इसलिए परलोक में हित चाहने वाले को कपिला का दान करना चाहिए।

श्लोक 46 (14.106.46)

यदा च दीयते राजन्कपिला ह्यग्निहोत्रिणे । तदा च शृङ्गयोस्तस्या विष्णुरिन्द्रश्च तिष्ठति ॥

yadā ca dīyate rājankapilā hyagnihotriṇe | tadā ca śṛṅgayostasyā viṣṇurindraśca tiṣṭhati

हे राजन्! जब अग्निहोत्री को कपिला दी जाती है, तब उसके दोनों सींगों में विष्णु और इन्द्र स्थित होते हैं।

श्लोक 47 (14.106.47)

चन्द्रवज्रधरौ चापि तिष्ठतः शृङ्गमूलयोः । शृङ्गमध्ये तथा ब्रह्मा ललाटे गोवृषध्वजः ॥

candravajradharau cāpi tiṣṭhataḥ śṛṅgamūlayoḥ | śṛṅgamadhye tathā brahmā lalāṭe govṛṣadhvajaḥ

सींगों की जड़ों में चन्द्रमा और वज्रधारी भी स्थित हैं; सींगों के बीच ब्रह्मा हैं और ललाट में वृषध्वज शिव।

श्लोक 48 (14.106.48)

कर्णयोरश्विनौ देवौ चक्षुषी शशिभास्करौ । दन्तेषु मरुतो देवा जिह्वायां वाक्सरस्वती ॥

karṇayoraśvinau devau cakṣuṣī śaśibhāskarau | danteṣu maruto devā jihvāyāṃ vāksarasvatī

कानों में दोनों अश्विनीकुमार, नेत्रों में चन्द्रमा और सूर्य, दाँतों में मरुद्गण, और जिह्वा में वाणी-रूप सरस्वती हैं।

श्लोक 49 (14.106.49)

रोमकूपेषु मुनयश्चर्मण्येव प्रजापतिः । निश्श्वासेषु स्थिता वेदाः सषडङ्गपदक्रमाः ॥

romakūpeṣu munayaścarmaṇyeva prajāpatiḥ | niśśvāseṣu sthitā vedāḥ saṣaḍaṅgapadakramāḥ

रोमकूपों में मुनि हैं, चर्म में प्रजापति; और उसके श्वासों में छह अंगों और पद-क्रम सहित वेद स्थित हैं।

श्लोक 50 (14.106.50)

नासापुटे स्थिता गन्धाः पुष्पाणि सुरभीणि च । अधरे वसवः सर्वे मुखे चाग्निः प्रतिष्ठितः ॥

nāsāpuṭe sthitā gandhāḥ puṣpāṇi surabhīṇi ca | adhare vasavaḥ sarve mukhe cāgniḥ pratiṣṭhitaḥ

नासापुटों में गन्ध और सुगन्धित पुष्प स्थित हैं; अधर में सब वसु हैं और मुख में अग्नि प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 51 (14.106.51)

साध्या देवाः स्थिताः कक्षे ग्रीवायां पार्वती स्थिता । पृष्ठे च नक्षत्रगणाः ककुद्देशे नभस्स्थलम् ॥

sādhyā devāḥ sthitāḥ kakṣe grīvāyāṃ pārvatī sthitā | pṛṣṭhe ca nakṣatragaṇāḥ kakuddeśe nabhassthalam

कक्ष में साध्य देवता स्थित हैं, ग्रीवा में पार्वती; पीठ पर नक्षत्रगण और ककुद् (कूबड़) के स्थान में आकाश है।

श्लोक 52 (14.106.52)

अपाने सर्वतीर्थानि गोमूत्रे जाह्नवी स्वयम् । इष्टतुष्टमया लक्ष्मीर्गोमये वसती तदा ॥

apāne sarvatīrthāni gomūtre jāhnavī svayam | iṣṭatuṣṭamayā lakṣmīrgomaye vasatī tadā

अपान में सब तीर्थ हैं, गोमूत्र में स्वयं गंगा हैं; गोबर में इच्छित सिद्धि और सन्तोष-स्वरूपा लक्ष्मी निवास करती हैं।

श्लोक 53 (14.106.53)

नासिकायां सदा देवी ज्येष्ठा वसति भामिनी । श्रोणीतटस्थाः पितरो रमा लाङ्गूलमाश्रिता ॥

nāsikāyāṃ sadā devī jyeṣṭhā vasati bhāminī | śroṇītaṭasthāḥ pitaro ramā lāṅgūlamāśritā

नासिका में सदा देवी ज्येष्ठा निवास करती हैं; कटि-प्रदेश में पितर स्थित हैं और पूँछ का आश्रय रमा (लक्ष्मी) ने लिया है।

श्लोक 54 (14.106.54)

पार्श्वयोरुभयोः सर्वे विश्वेदेवाः प्रतिष्ठिताः । तिष्ठत्युरसि तासां तु प्रीतः शक्तिधरो गुहः ॥

pārśvayorubhayoḥ sarve viśvedevāḥ pratiṣṭhitāḥ | tiṣṭhatyurasi tāsāṃ tu prītaḥ śaktidharo guhaḥ

दोनों पार्श्वों में सब विश्वेदेव प्रतिष्ठित हैं; और इन गौओं के वक्ष पर शक्तिधारी गुह (कार्तिकेय) प्रसन्न होकर विराजते हैं।

श्लोक 55 (14.106.55)

जानुजङ्घोरुदेशेषु पञ्च तिष्ठन्ति वायवः । खुरमध्येषु गन्धर्वाः खुराग्रेषु च पन्नगाः ॥

jānujaṅghorudeśeṣu pañca tiṣṭhanti vāyavaḥ | khuramadhyeṣu gandharvāḥ khurāgreṣu ca pannagāḥ

घुटनों, पिंडलियों और जंघाओं में पाँच वायु स्थित हैं; खुरों के बीच गन्धर्व और खुरों के अग्रभाग पर नाग हैं।

श्लोक 56 (14.106.56)

चत्वारः सागराः पूर्णास्तस्या एव पयोधराः । रतिर्मेधा क्षमा स्वाहा श्रद्धा शान्तिर्धृतिः स्मृतिः । कीर्तिर्दीप्तिः क्रिया कान्तिस्तुष्टिः पुष्टिश्च सन्ततिः । दिशश्च प्रदिशश्चैव सेवन्ते कपिलां सदा ॥

catvāraḥ sāgarāḥ pūrṇāstasyā eva payodharāḥ | ratirmedhā kṣamā svāhā śraddhā śāntirdhṛtiḥ smṛtiḥ | kīrtirdīptiḥ kriyā kāntistuṣṭiḥ puṣṭiśca santatiḥ | diśaśca pradiśaścaiva sevante kapilāṃ sadā

चारों भरे हुए सागर उसके थन हैं। रति, मेधा, क्षमा, स्वाहा, श्रद्धा, शान्ति, धृति, स्मृति, कीर्ति, दीप्ति, क्रिया, कान्ति, तुष्टि, पुष्टि और सन्तति — ये तथा दिशाएँ और उपदिशाएँ सदा कपिला की सेवा करती हैं।

श्लोक 57 (14.106.57)

देवाः पितृगणाश्चापि गन्धर्वाप्सरसां गणाः । लोका द्वीपार्णवाश्चैव गङ्गाद्याः सरितस्तथा ॥

devāḥ pitṛgaṇāścāpi gandharvāpsarasāṃ gaṇāḥ | lokā dvīpārṇavāścaiva gaṅgādyāḥ saritastathā

देवता, पितृगण, गन्धर्वों और अप्सराओं के समूह, लोक, द्वीप और सागर, तथा गंगा आदि नदियाँ —

श्लोक 58 (14.106.58)

देवाः पितृगणाश्चापि वेदाः साङ्गाः सहाध्वरैः । वेदोक्तैर्विविधैर्मन्त्रैः स्तुवन्ति हृषितास्तथा ॥

devāḥ pitṛgaṇāścāpi vedāḥ sāṅgāḥ sahādhvaraiḥ | vedoktairvividhairmantraiḥ stuvanti hṛṣitāstathā

देवता और पितृगण, अंगों सहित वेद और यज्ञ — ये सब वैदिक मन्त्रों से नाना प्रकार से हर्षित होकर उसकी स्तुति करते हैं।

श्लोक 59 (14.106.59)

विद्याधराश्च ये सिद्धा भूतास्तारागणास्तथा । पुष्पवृष्टिं च वर्षन्ति प्रनृत्यन्ति च हर्षिताः ॥

vidyādharāśca ye siddhā bhūtāstārāgaṇāstathā | puṣpavṛṣṭiṃ ca varṣanti pranṛtyanti ca harṣitāḥ

विद्याधर, सिद्ध, भूत और तारागण पुष्प-वर्षा करते और हर्ष से नाचते हैं।

श्लोक 60 (14.106.60)

ब्रह्मणोत्पादिता देवी वह्निकुण्डान्महाप्रभा । नमस्ते कपिले पुण्ये सर्वदेवैर्नमस्कृते ॥

brahmaṇotpāditā devī vahnikuṇḍānmahāprabhā | namaste kapile puṇye sarvadevairnamaskṛte

ब्रह्मा द्वारा अग्निकुण्ड से उत्पन्न की गई महातेजस्विनी देवी! हे पुण्यमयी कपिले, तुम्हें नमस्कार है; सब देवताओं ने तुम्हें प्रणाम किया है।

देवता ऊचुः

श्लोक 61 (14.106.61)

कपिलेऽथ महासत्वे सर्वतीर्थमये शुभे । दातारं स्वजनोपेतं ब्रह्मलोकं नय स्वयम् ॥

kapile'tha mahāsatve sarvatīrthamaye śubhe | dātāraṃ svajanopetaṃ brahmalokaṃ naya svayam

हे महासत्त्वशालिनी, सर्वतीर्थमयी, शुभे कपिले! दाता को उसके स्वजनों सहित तुम स्वयं ब्रह्मलोक में पहुँचा दो।

वासुदेव उवाच

श्लोक 62 (14.106.62)

अहो रत्नमिदं पुण्यं सर्वदुःखघ्नमुत्तमम् । अहो धर्मार्जितं शुद्धमिदमग्र्यं महाधनम् । इत्याकाशस्थितास्ते तु सर्वदेवा जपन्ति च ॥

aho ratnamidaṃ puṇyaṃ sarvaduḥkhaghnamuttamam | aho dharmārjitaṃ śuddhamidamagryaṃ mahādhanam | ityākāśasthitāste tu sarvadevā japanti ca

"अहा! यह पुण्य रत्न सब दुःखों का नाश करने वाला सर्वोत्तम है! अहा! धर्म से अर्जित यह शुद्ध, श्रेष्ठ महाधन!" — इस प्रकार आकाश में स्थित सब देवता कहते हैं।

श्लोक 63 (14.106.63)

तस्याः प्रतिग्रहीता च भुङ्क्ते यावद्द्विजोत्तमः । तावद्देवगणाः सर्वे कपिलामर्चयन्ति च । स्वर्णशृङ्गीं रूप्यखुरां गन्धैः पुष्पैः सुपूजिताम् ॥

tasyāḥ pratigrahītā ca bhuṅkte yāvaddvijottamaḥ | tāvaddevagaṇāḥ sarve kapilāmarcayanti ca | svarṇaśṛṅgīṃ rūpyakhurāṃ gandhaiḥ puṣpaiḥ supūjitām

उसे ग्रहण करने वाला श्रेष्ठ द्विज जब तक उसका उपभोग करता है, तब तक सब देवगण सोने के सींगों और चाँदी के खुरों वाली, गन्ध और पुष्पों से भली-भाँति पूजित कपिला की अर्चना करते हैं।

श्लोक 64 (14.106.64)

वस्त्राभ्यामहताभ्यां तु यावत्तिष्ठत्यलङ्कृता । तावद्यदिच्छेत्कपिला मन्त्रपूता सुसंस्कृता । भूलोकवासिनः सर्वान्ब्रह्मलोकं नयेत्स्वयम् ॥

vastrābhyāmahatābhyāṃ tu yāvattiṣṭhatyalaṅkṛtā | tāvadyadicchetkapilā mantrapūtā susaṃskṛtā | bhūlokavāsinaḥ sarvānbrahmalokaṃ nayetsvayam

जब तक वह दो नए वस्त्रों से अलंकृत रहती है, तब तक — यदि कपिला चाहे — मन्त्रों से पवित्र और भली-भाँति संस्कृत होकर वह पृथ्वी पर रहने वाले सब लोगों को स्वयं ब्रह्मलोक पहुँचा सकती है।

श्लोक 65 (14.106.65)

भूरश्वः कनकं गावो रूप्यमन्नं तिला यवाः । दीयमानानि विप्राय प्रहृष्यन्ति दिनेदिने ॥

bhūraśvaḥ kanakaṃ gāvo rūpyamannaṃ tilā yavāḥ | dīyamānāni viprāya prahṛṣyanti dinedine

भूमि, घोड़े, सोना, गौएँ, चाँदी, अन्न, तिल और जौ — ये ब्राह्मण को दिए जाते हुए दिन-प्रतिदिन प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 66 (14.106.66)

अथ त्वश्रोत्रियेभ्यो वै तानि दत्तानि पाण्डव । तथा निन्दन्त्यथात्मानमशुभं किंनु नः कृतं ॥

atha tvaśrotriyebhyo vai tāni dattāni pāṇḍava | tathā nindantyathātmānamaśubhaṃ kiṃnu naḥ kṛtaṃ

किन्तु हे पाण्डव! जब वे अश्रोत्रियों को दे दिए जाते हैं, तब वे अपने को कोसते हैं — "हमने क्या अशुभ कर्म किया?"

श्लोक 67 (14.106.67)

अहो रक्षःपिशाचैश्च लुप्यमानाः समन्ततः । यास्यामो निरयं शीघ्रमिति शोचन्ति तानि वै ॥

aho rakṣaḥpiśācaiśca lupyamānāḥ samantataḥ | yāsyāmo nirayaṃ śīghramiti śocanti tāni vai

"हाय! राक्षसों और पिशाचों द्वारा चारों ओर से लूटे जाते हुए हम शीघ्र नरक में जाएँगे" — यह सोचकर वे शोक करते हैं।

श्लोक 68 (14.106.68)

एतान्यपि द्विजेभ्यो वै श्रोत्रियेभ्यो विशेषतः । दीयमानानि वर्धन्ते दातारं तारयन्ति च ॥

etānyapi dvijebhyo vai śrotriyebhyo viśeṣataḥ | dīyamānāni vardhante dātāraṃ tārayanti ca

परन्तु विशेषकर श्रोत्रिय द्विजों को दिए जाने पर ये ही वस्तुएँ बढ़ती हैं और दाता को तार देती हैं।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 69 (14.106.69)

देवदेवेश दैत्यघ्न कालः को हव्यकव्ययोः । के तत्र पूजामर्हन्ति वर्जनीयाश्च के द्विजाः ॥

devadeveśa daityaghna kālaḥ ko havyakavyayoḥ | ke tatra pūjāmarhanti varjanīyāśca ke dvijāḥ

हे देवदेवेश! हे दैत्यनाशक! हव्य और कव्य का समय कौन-सा है? उसमें कौन पूजा के योग्य हैं और कौन-से द्विज त्याज्य हैं?

वासुदेव उवाच

श्लोक 70 (14.106.70)

दैवं पूर्वाह्णिकं ज्ञेयं पैतृकं चापराह्णिकम् । कालहीनं च यद्दानं तद्दानं राजसं विदुः ॥

daivaṃ pūrvāhṇikaṃ jñeyaṃ paitṛkaṃ cāparāhṇikam | kālahīnaṃ ca yaddānaṃ taddānaṃ rājasaṃ viduḥ

देवकर्म पूर्वाह्न में और पितृकर्म अपराह्न में जानना चाहिए। समय बीत जाने पर दिया हुआ दान रजोगुणी (राजस) कहा जाता है।

श्लोक 71 (14.106.71)

अवघुष्टं च यद्भुक्तमनृतेन च भारत । परामृष्टं शुना वाऽपि तद्भागं राक्षसं विदुः ॥

avaghuṣṭaṃ ca yadbhuktamanṛtena ca bhārata | parāmṛṣṭaṃ śunā vā'pi tadbhāgaṃ rākṣasaṃ viduḥ

हे भारत! जो भोजन शोर-गुल के बीच, झूठ बोलते हुए, या कुत्ते से छू जाने पर खाया जाए, उस अंश को राक्षसों का भाग कहते हैं।

श्लोक 72 (14.106.72)

यावन्तः पतिता विप्रा जडोन्मत्तादयोपि च । दैवे च पित्र्ये ते विप्रा राजन्नार्हन्ति सत्क्रियां ॥

yāvantaḥ patitā viprā jaḍonmattādayopi ca | daive ca pitrye te viprā rājannārhanti satkriyāṃ

पतित ब्राह्मण, जड़, उन्मत्त आदि — ऐसे सब विप्र देवकर्म और पितृकर्म में, हे राजन्, सत्कार के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 73 (14.106.73)

क्लीबः प्लीही च कुष्ठी च राजयक्ष्मान्वितश्च यः । अपस्मारी च यश्चापि पित्र्ये नार्हति सत्कृतिम् ॥

klībaḥ plīhī ca kuṣṭhī ca rājayakṣmānvitaśca yaḥ | apasmārī ca yaścāpi pitrye nārhati satkṛtim

नपुंसक, तिल्ली-रोग वाला, कोढ़ी, क्षयरोगी और मिर्गी का रोगी पितृकर्म में सत्कार के योग्य नहीं है।

श्लोक 74 (14.106.74)

चिकित्सका देवलका मिथ्यानियमधारिणः । सोमविक्रयिणश्चापि श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम् ॥

cikitsakā devalakā mithyāniyamadhāriṇaḥ | somavikrayiṇaścāpi śrāddhe nārhanti satkṛtim

वैद्य, देवल (मन्दिर के पुजारी), झूठे नियम धारण करने वाले और सोम बेचने वाले श्राद्ध में सत्कार के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 75 (14.106.75)

एकोद्दिष्टे च ये चान्नं भुञ्जते विधिवद्द्विजाः । चान्द्रायणमकृत्वा ते पुनर्नार्हन्ति सत्कृतिम् ॥

ekoddiṣṭe ca ye cānnaṃ bhuñjate vidhivaddvijāḥ | cāndrāyaṇamakṛtvā te punarnārhanti satkṛtim

जो द्विज एकोद्दिष्ट श्राद्ध का अन्न विधिपूर्वक खाते हैं, वे चान्द्रायण किए बिना फिर सत्कार के योग्य नहीं होते।

श्लोक 76 (14.106.76)

गायका नर्तकाश्चैव प्लवका वादकास्तथा । कथका यौधिकाश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम् ॥

gāyakā nartakāścaiva plavakā vādakāstathā | kathakā yaudhikāścaiva śrāddhe nārhanti satkṛtim

गायक, नर्तक, कलाबाज, वादक, कथावाचक और योद्धा श्राद्ध में सत्कार के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 77 (14.106.77)

अनग्नयश्च ये विप्राः शवनिर्यातकाश्च ये । स्तेनाश्चापि विकर्मस्था राजन्नार्हन्ति सत्कृतिम् ॥

anagnayaśca ye viprāḥ śavaniryātakāśca ye | stenāścāpi vikarmasthā rājannārhanti satkṛtim

जो ब्राह्मण अग्निहीन हैं, जो शव ढोने वाले हैं, और जो चोर तथा निषिद्ध कर्म में लगे हैं, वे, हे राजन्, सत्कार के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 78 (14.106.78)

अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपुत्राश्च ये द्विजाः । पुत्रिकापुत्रकाश्चापि श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम् ॥

aparijñātapūrvāśca gaṇaputrāśca ye dvijāḥ | putrikāputrakāścāpi śrāddhe nārhanti satkṛtim

जिनका पूर्व परिचय न हो, जो गण के पुत्र हों, और पुत्रिकापुत्र द्विज भी श्राद्ध में सत्कार के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 79 (14.106.79)

रणकर्ता च यो विप्रो यश्च वाणिज्यको द्विजः । प्राणिविक्रयवृत्तिश्च श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम् ॥

raṇakartā ca yo vipro yaśca vāṇijyako dvijaḥ | prāṇivikrayavṛttiśca śrāddhe nārhanti satkṛtim

जो ब्राह्मण युद्ध करने वाला हो, जो व्यापारी द्विज हो, और जो प्राणियों को बेचकर जीविका चलाता हो, वह श्राद्ध में सत्कार के योग्य नहीं।

श्लोक 80 (14.106.80)

चीर्णव्रतगुणैर्युक्ता नित्यं स्वाध्यायतत्पराः । सावित्रीज्ञाः क्रियावन्तस्ते श्राद्धे सत्कृतिक्षमाः ॥

cīrṇavrataguṇairyuktā nityaṃ svādhyāyatatparāḥ | sāvitrījñāḥ kriyāvantaste śrāddhe satkṛtikṣamāḥ

जो व्रतों और गुणों से सम्पन्न हैं, नित्य स्वाध्याय में लगे रहते हैं, सावित्री (गायत्री) के ज्ञाता और क्रियावान् हैं, वे श्राद्ध में सत्कार के योग्य हैं।

श्लोक 81 (14.106.81)

श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः प्राप्तं दधि घृतं तथा । दर्भाः सुमनसः क्षेत्रं तत्काले श्राद्धदो भवेत् ॥

śrāddhasya brāhmaṇaḥ kālaḥ prāptaṃ dadhi ghṛtaṃ tathā | darbhāḥ sumanasaḥ kṣetraṃ tatkāle śrāddhado bhavet

श्राद्ध का समय ब्राह्मण (के आने) का है; साथ ही दही-घी का प्राप्त होना, कुश, फूल और उपयुक्त स्थान — उसी समय श्राद्ध करने वाला श्राद्ध दे।

श्लोक 82 (14.106.82)

चारित्रनिरता राजन्कृशा ये कृशवृत्तयः । अर्थिनश्चोपगच्छन्ति तेभ्यो दत्तं महत्फलम् ॥

cāritraniratā rājankṛśā ye kṛśavṛttayaḥ | arthinaścopagacchanti tebhyo dattaṃ mahatphalam

हे राजन्! जो सदाचार में लगे, दुबले और अल्प वृत्ति वाले हैं और याचक बनकर आते हैं, उन्हें दिया हुआ दान महान् फल देता है।

श्लोक 83 (14.106.83)

तपस्विनश्च ये विप्रास्तथा भैक्षचराश्च ये । अर्थिनः केचिदिच्छन्ति तेषां दत्तं महत्फलम् ॥

tapasvinaśca ye viprāstathā bhaikṣacarāśca ye | arthinaḥ kecidicchanti teṣāṃ dattaṃ mahatphalam

जो तपस्वी ब्राह्मण हैं, जो भिक्षा से जीवन चलाते हैं और जो कुछ पाने की इच्छा रखते हैं, उन्हें दिया हुआ दान महान् फल देता है।

श्लोक 84 (14.106.84)

एवं धर्मभृतां श्रेष्ठ ज्ञात्वा सर्वात्मना तदा । श्रोत्रियाय दरिद्राय प्रयच्छानुपकारिणे ॥

evaṃ dharmabhṛtāṃ śreṣṭha jñātvā sarvātmanā tadā | śrotriyāya daridrāya prayacchānupakāriṇe

हे धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ! यह सब पूरी तरह जानकर किसी दरिद्र वेदपाठी ब्राह्मण को दान दो जिसने तुम्हारा कोई उपकार न किया हो।

श्लोक 85 (14.106.85)

दानं यत्ते प्रियं किंचिच्छ्रोत्रियाणां च यत्प्रियम् । तत्प्रयच्छस्व धर्मज्ञ यदीच्छसि तदक्षयम् ॥

dānaṃ yatte priyaṃ kiṃcicchrotriyāṇāṃ ca yatpriyam | tatprayacchasva dharmajña yadīcchasi tadakṣayam

जो वस्तु तुम्हें प्रिय हो और जो वेदपाठी ब्राह्मणों को प्रिय हो, हे धर्मज्ञ, वही दो — यदि तुम चाहते हो कि वह अक्षय हो।

श्लोक 86 (14.106.86)

निरयं ये च गच्छन्ति तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ॥

nirayaṃ ye ca gacchanti tacchṛṇuṣva yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर! अब सुनो कि कौन नरक में जाते हैं।

श्लोक 87 (14.106.87)

गुर्वर्थं वा भयार्थं वा नोचेदन्यत्र पाण्डव । वदन्ति येऽनृतं विप्रास्ते वै निरयगामिनः ॥

gurvarthaṃ vā bhayārthaṃ vā nocedanyatra pāṇḍava | vadanti ye'nṛtaṃ viprāste vai nirayagāminaḥ

हे पाण्डव! जो ब्राह्मण गुरु के लिए या भय के कारण के सिवा अन्यत्र झूठ बोलते हैं, वे निश्चय नरक में जाने वाले हैं।

श्लोक 88 (14.106.88)

परदारापहर्तारः परदाराभिमर्शकाः । परदारप्रयोक्तारस्ते वै निरयगामिनः ॥

paradārāpahartāraḥ paradārābhimarśakāḥ | paradāraprayoktāraste vai nirayagāminaḥ

जो दूसरों की स्त्रियों का हरण करते हैं, जो दूसरों की स्त्रियों का स्पर्श करते हैं, और जो पराई स्त्रियों में दूसरों को प्रेरित करते हैं — वे निश्चय नरक में जाने वाले हैं।

श्लोक 89 (14.106.89)

सूचकाः संधिभेत्तारः परद्रव्योपजीविनः । अकृतज्ञाश्च मित्राणां ते वै निरयगामिनः ॥

sūcakāḥ saṃdhibhettāraḥ paradravyopajīvinaḥ | akṛtajñāśca mitrāṇāṃ te vai nirayagāminaḥ

चुगलखोर, मैत्री तोड़ने वाले, दूसरों के धन पर जीने वाले और मित्रों के प्रति कृतघ्न — वे निश्चय नरक में जाने वाले हैं।

श्लोक 90 (14.106.90)

वर्णाश्रमाणां ये बाह्याः पाषण्डाश्चैव पापिनः । उपासते च तानेव ते सर्वे नरकालयाः ॥

varṇāśramāṇāṃ ye bāhyāḥ pāṣaṇḍāścaiva pāpinaḥ | upāsate ca tāneva te sarve narakālayāḥ

जो वर्णाश्रम से बाहर हैं, जो पाखण्डी और पापी हैं, और जो उन्हीं की उपासना करते हैं — वे सब नरक के निवासी हैं।

श्लोक 91 (14.106.91)

वेदविक्रयिणश्चैव वेदानां चैव दूषकाः । वेदानां लेखकाश्चैव ते वै निरयगामिनः ॥

vedavikrayiṇaścaiva vedānāṃ caiva dūṣakāḥ | vedānāṃ lekhakāścaiva te vai nirayagāminaḥ

वेद बेचने वाले, वेदों की निन्दा करने वाले और वेदों के लेखक — वे निश्चय नरक में जाने वाले हैं।

श्लोक 92 (14.106.92)

रसविक्रयिणो राजन्विषविक्रयिणश्च ये । क्षीरविक्रयिणश्चापि ते वै निरयगामिनः ॥

rasavikrayiṇo rājanviṣavikrayiṇaśca ye | kṣīravikrayiṇaścāpi te vai nirayagāminaḥ

हे राजन्! रस बेचने वाले, विष बेचने वाले और दूध बेचने वाले भी निश्चय नरक में जाने वाले हैं।

श्लोक 93 (14.106.93)

चण्डालेभ्यश्च ये क्षीरं प्रयच्छन्ति नराधमाः । अर्थार्थमथवा स्नेहात्ते वै निरयगामिनः ॥

caṇḍālebhyaśca ye kṣīraṃ prayacchanti narādhamāḥ | arthārthamathavā snehātte vai nirayagāminaḥ

जो नीच मनुष्य धन के लिए अथवा स्नेह से चाण्डालों को दूध देते हैं, वे निश्चय नरक में जाने वाले हैं।

श्लोक 94 (14.106.94)

पशूनां दमकाश्चैव तथा नासानुवेधकाः । पुंस्त्वहिंसाकराश्चैव ते वै निरयगामिनः ॥

paśūnāṃ damakāścaiva tathā nāsānuvedhakāḥ | puṃstvahiṃsākarāścaiva te vai nirayagāminaḥ

पशुओं को वश में करने वाले, नाक छेदने वाले और पुंसत्व को हानि पहुँचाने वाले — वे निश्चय नरक में जाने वाले हैं।

श्लोक 95 (14.106.95)

अदातारः समर्था ये द्रव्याणां लोभकारणात् । दीनानन्धान्न पश्यन्ति ते वै निरयगामिनः ॥

adātāraḥ samarthā ye dravyāṇāṃ lobhakāraṇāt | dīnānandhānna paśyanti te vai nirayagāminaḥ

जो समर्थ होकर भी लोभ के कारण धन का दान नहीं करते और दीन-अन्धों की ओर नहीं देखते, वे निश्चय नरक में जाने वाले हैं।

श्लोक 96 (14.106.96)

क्षान्तान्दान्तान्कृशान्प्राज्ञान्दीर्घकालं सहोषितान् । त्यजन्ति कृतकृत्या ये ते वै निरयगामिनः ॥

kṣāntāndāntānkṛśānprājñāndīrghakālaṃ sahoṣitān | tyajanti kṛtakṛtyā ye te vai nirayagāminaḥ

जो अपना काम निकल जाने पर क्षमाशील, संयमी, दुबले, बुद्धिमान और बहुत समय से साथ रहे हुए लोगों को छोड़ देते हैं, वे निश्चय नरक में जाने वाले हैं।

श्लोक 97 (14.106.97)

बालानामपि वृद्धानां श्रान्तानां चापि ये नराः । अदत्त्वाऽश्नन्ति मृष्टान्नं ते वै निरयगामिनः ॥

bālānāmapi vṛddhānāṃ śrāntānāṃ cāpi ye narāḥ | adattvā'śnanti mṛṣṭānnaṃ te vai nirayagāminaḥ

जो मनुष्य बालकों, वृद्धों और थके हुओं को दिए बिना स्वादिष्ट अन्न खा लेते हैं, वे निश्चय नरक में जाने वाले हैं।

श्लोक 98 (14.106.98)

एते पूर्वर्षिभिः प्रोक्ता नरा निरयगामिनः । ये स्वर्गं समनुप्राप्तास्ताञ्शृणुष्व युधिष्ठिर ॥

ete pūrvarṣibhiḥ proktā narā nirayagāminaḥ | ye svargaṃ samanuprāptāstāñśṛṇuṣva yudhiṣṭhira

प्राचीन ऋषियों ने इन्हें नरकगामी मनुष्य कहा है। अब, हे युधिष्ठिर, उन्हें सुनो जिन्होंने स्वर्ग प्राप्त किया है।

श्लोक 99 (14.106.99)

दानेन तपसा चैव सत्येन च दमेन च । ये धर्ममनुवर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥

dānena tapasā caiva satyena ca damena ca | ye dharmamanuvartante te narāḥ svargagāminaḥ

जो दान, तप, सत्य और दम के द्वारा धर्म का पालन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं।

श्लोक 100 (14.106.100)

शुश्रूषयाऽप्युपाध्यायाच्छ्रुतमादाय पाण्डव । ये प्रतिग्रहनिस्स्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥

śuśrūṣayā'pyupādhyāyācchrutamādāya pāṇḍava | ye pratigrahanissnehāste narāḥ svargagāminaḥ

हे पाण्डव! जो गुरु की सेवा से विद्या प्राप्त कर दान लेने में निःस्पृह रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं।

श्लोक 101 (14.106.101)

मधुमांसासवेभ्यस्तु निवृत्ता व्रतवत्तु ये । परदारनिवृत्ता ये ते नराः स्वर्गगामिनः ॥

madhumāṃsāsavebhyastu nivṛttā vratavattu ye | paradāranivṛttā ye te narāḥ svargagāminaḥ

जो मधु, मांस और मद्य से निवृत्त होकर व्रत का पालन करते हैं और परस्त्री से दूर रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं।

श्लोक 102 (14.106.102)

मातरं पितरं चैव शुश्रूषन्ति च ये नराः । भ्रातॄणामपि सस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥

mātaraṃ pitaraṃ caiva śuśrūṣanti ca ye narāḥ | bhrātṝṇāmapi sasnehāste narāḥ svargagāminaḥ

जो मनुष्य माता-पिता की सेवा करते हैं और भाइयों से भी स्नेह रखते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं।

श्लोक 103 (14.106.103)

ये तु भोजनकाले तु नियताश्चातिथिप्रियाः । द्वाररोधं न कुर्वन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥

ye tu bhojanakāle tu niyatāścātithipriyāḥ | dvārarodhaṃ na kurvanti te narāḥ svargagāminaḥ

जो भोजन के समय संयमी और अतिथिप्रिय होते हैं और द्वार नहीं रोकते, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं।

श्लोक 104 (14.106.104)

वैवाहिकं तु कन्यानां दरिद्राणां च ये नराः । कारयन्ति च कुर्वन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥

vaivāhikaṃ tu kanyānāṃ daridrāṇāṃ ca ye narāḥ | kārayanti ca kurvanti te narāḥ svargagāminaḥ

जो मनुष्य दरिद्र कन्याओं के विवाह कराते और करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं।

श्लोक 105 (14.106.105)

रसानामथ बीजानामोषधीनां तथैव च । दातारः श्रद्धयोपेतास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥

rasānāmatha bījānāmoṣadhīnāṃ tathaiva ca | dātāraḥ śraddhayopetāste narāḥ svargagāminaḥ

जो श्रद्धापूर्वक रस, बीज और ओषधियाँ दान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं।

श्लोक 106 (14.106.106)

क्षेमाक्षेमं च मार्गेषु समानि विषमाणि च । अर्थिनां ये च वक्ष्यन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥

kṣemākṣemaṃ ca mārgeṣu samāni viṣamāṇi ca | arthināṃ ye ca vakṣyanti te narāḥ svargagāminaḥ

जो मार्गों के विषय में पूछने वालों को बताते हैं कि कौन-सा क्षेम का है और कौन-सा संकट का, कहाँ सम है और कहाँ विषम, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं।

श्लोक 107 (14.106.107)

पर्वद्वये चतुर्दश्यामष्टम्यां संध्ययोर्द्वयोः । आर्द्रायां जन्मनक्षत्रे विषुवे श्रवणेऽथवा । ये ग्राम्यधर्मविरतास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥

parvadvaye caturdaśyāmaṣṭamyāṃ saṃdhyayordvayoḥ | ārdrāyāṃ janmanakṣatre viṣuve śravaṇe'thavā | ye grāmyadharmaviratāste narāḥ svargagāminaḥ

जो दोनों पर्वों में, चतुर्दशी और अष्टमी को, दोनों सन्ध्याओं में, आर्द्रा नक्षत्र में, जन्म-नक्षत्र में, विषुव में अथवा श्रवण में ग्राम्यधर्म (स्त्री-सहवास) से विरत रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं।

श्लोक 108 (14.106.108)

हव्यकव्यविधानं च नरकस्वर्गगामिनौ । धर्माधर्मौ च कथितौ किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

havyakavyavidhānaṃ ca narakasvargagāminau | dharmādharmau ca kathitau kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

हव्य-कव्य की विधि, नरक और स्वर्ग में जाने वाले, धर्म और अधर्म — ये सब कहे गए। अब और क्या सुनना चाहते हो?

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