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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 107

ब्रह्मघात के समान कर्म, अभोज्य अन्न और दानों के फल

युधिष्ठिर पूछते हैं कि बिना हिंसा किए भी मनुष्य ब्रह्महत्या का दोषी कैसे होता है, और कृष्ण ब्रह्मघात के समान माने गए कर्म गिनाते हैं। सबसे उत्तम दान के विषय में पूछे जाने पर कृष्ण अन्न की प्रशंसा करते हैं, जिनका अन्न ब्राह्मण को नहीं खाना चाहिए उनके नाम बताते हैं और जल, अन्न, तिल, दीप, भूमि, सोना, गृह, वस्त्र, गौ तथा ब्रह्मविद्या के दान के फल कहते हैं। अंत में वे सिखाते हैं कि मृत्यु के बाद केवल धर्म ही साथ जाता है।

अध्याय 106अध्याय-सूचीअध्याय 108

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (14.107.1)

इदं मे तत्वतो देव वक्तुमर्हस्यशेषतः । हिंसामकृत्वा यो मर्त्यो ब्रह्महत्यामवाप्नुयात् ॥

idaṃ me tatvato deva vaktumarhasyaśeṣataḥ | hiṃsāmakṛtvā yo martyo brahmahatyāmavāpnuyāt

हे देव, यह मुझे यथार्थ रूप से और पूरा-पूरा बताइए कि कोई मनुष्य हिंसा किए बिना ही ब्रह्महत्या का भागी कैसे हो जाता है?

भगवानुवाच

श्लोक 2 (14.107.2)

ब्राह्मणं स्वयमाहूय भिक्षार्थं वृत्तिकर्शितम् । ब्रूयान्नास्तीति यः पश्चात्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥

brāhmaṇaṃ svayamāhūya bhikṣārthaṃ vṛttikarśitam | brūyānnāstīti yaḥ paścāttamāhurbrahmaghātakam

जो मनुष्य जीविका के अभाव से क्षीण हुए ब्राह्मण को स्वयं भिक्षा के लिए बुलाकर बाद में कह दे कि "कुछ नहीं है," उसे ब्रह्मघाती कहते हैं।

श्लोक 3 (14.107.3)

मध्यस्थस्येह विप्रस्य योऽनूचानस्य भारत । वृत्तिं हरति दुर्बुद्धिस्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥

madhyasthasyeha viprasya yo'nūcānasya bhārata | vṛttiṃ harati durbuddhistamāhurbrahmaghātakam

हे भारत, जो मूर्ख इस लोक में वेदों के ज्ञाता, निष्पक्ष ब्राह्मण की जीविका छीन लेता है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं।

श्लोक 4 (14.107.4)

आश्रमे वाऽऽलये वाऽपि ग्रामे वा नगरेऽपि वा । अग्निं यः प्रक्षिपेत्क्रुद्धस्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥

āśrame vā''laye vā'pi grāme vā nagare'pi vā | agniṃ yaḥ prakṣipetkruddhastamāhurbrahmaghātakam

जो क्रोध में आकर किसी आश्रम, घर, गाँव या नगर में आग लगा देता है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं।

श्लोक 5 (14.107.5)

गोकुलस्य तृषार्तस्य जलान्ते वसुधाधिप । उत्पादयति यो विघ्नं तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥

gokulasya tṛṣārtasya jalānte vasudhādhipa | utpādayati yo vighnaṃ tamāhurbrahmaghātakam

हे पृथ्वीपते, जो प्यास से व्याकुल गौओं के झुंड के जल पीने में पानी के किनारे विघ्न डालता है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं।

श्लोक 6 (14.107.6)

यः प्रवृत्तां श्रुतिं सम्यक्छास्त्रं वा मुनिभिः कृतम् । दूषयत्यनभिज्ञाय तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥

yaḥ pravṛttāṃ śrutiṃ samyakchāstraṃ vā munibhiḥ kṛtam | dūṣayatyanabhijñāya tamāhurbrahmaghātakam

जो बिना समझे ठीक प्रकार से प्रचलित वेद की अथवा मुनियों के रचे शास्त्र की निंदा करता है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं।

श्लोक 7 (14.107.7)

चक्षुषा वाऽपि हीनस्य पङ्गोर्वाऽपि जडस्य वा । हरेद्वै यस्तु सर्वस्वं तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥

cakṣuṣā vā'pi hīnasya paṅgorvā'pi jaḍasya vā | haredvai yastu sarvasvaṃ tamāhurbrahmaghātakam

जो अंधे, लँगड़े अथवा जड़बुद्धि मनुष्य का सारा धन हर लेता है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं।

श्लोक 8 (14.107.8)

गुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य अतिक्रम्य च शासनम् । वर्तते यस्तु मूढात्मा तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥

guruṃ tvaṃkṛtya huṃkṛtya atikramya ca śāsanam | vartate yastu mūḍhātmā tamāhurbrahmaghātakam

जो मूढ़ मनुष्य गुरु को "तू" कहकर और "हुँ" कहकर तिरस्कार से पुकारता है तथा उनकी आज्ञा का उल्लंघन करके चलता है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं।

श्लोक 9 (14.107.9)

क्रोधाद्वा यदि वा द्वेषादाक्रुष्टस्तर्जितोपि वा । ऋतौ स्त्रियं वा नोपेयात्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥

krodhādvā yadi vā dveṣādākruṣṭastarjitopi vā | ṛtau striyaṃ vā nopeyāttamāhurbrahmaghātakam

जो क्रोध या द्वेष से, अथवा गाली खाने या धमकाए जाने के कारण, ऋतुकाल में अपनी स्त्री के पास नहीं जाता, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं।

श्लोक 10 (14.107.10)

यावत्सारो भवेद्दीनस्तन्नाशे यस्य दुःस्थितिः । तत्सर्वस्वं हरेद्यो वै तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥

yāvatsāro bhaveddīnastannāśe yasya duḥsthitiḥ | tatsarvasvaṃ haredyo vai tamāhurbrahmaghātakam

जो दरिद्र मनुष्य का वह सारा धन हर लेता है जिसके नष्ट होने पर उसकी दुर्दशा हो जाती है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 11 (14.107.11)

सर्वेषामपि दानानां यत्तु दानं विशिष्यते । अभोज्यान्नाश्च ये विप्रास्तान्ब्रवीहि सुरोत्तम ॥

sarveṣāmapi dānānāṃ yattu dānaṃ viśiṣyate | abhojyānnāśca ye viprāstānbravīhi surottama

हे देवश्रेष्ठ, सब दानों में कौन-सा दान सबसे उत्तम है? और जिन ब्राह्मणों का अन्न नहीं खाना चाहिए, उनके विषय में भी मुझे बताइए।

भगवानुवाच

श्लोक 12 (14.107.12)

अन्नमेव प्रशंसन्ति देवा ब्रह्मपुरस्सराः । अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति ॥

annameva praśaṃsanti devā brahmapurassarāḥ | annena sadṛśaṃ dānaṃ na bhūtaṃ na bhaviṣyati

ब्रह्मा आदि देवता अन्न की ही प्रशंसा करते हैं। अन्न के समान दान न कभी हुआ है, न कभी होगा।

श्लोक 13 (14.107.13)

अन्नमूर्जस्करं लोके ह्यन्नात्प्राणाः प्रतिष्ठिताः । अभोज्यान्नान्मया राजन्वक्ष्यमाणान्निबोध मे ॥

annamūrjaskaraṃ loke hyannātprāṇāḥ pratiṣṭhitāḥ | abhojyānnānmayā rājanvakṣyamāṇānnibodha me

अन्न संसार में बल देनेवाला है और प्राण अन्न पर ही टिके हैं। हे राजन्, अब जिनका अन्न नहीं खाना चाहिए, उनके विषय में मुझसे सुनो।

श्लोक 14 (14.107.14)

दीक्षितस्य कदर्यस्य क्रुद्धस्य निकृतस्य च । अभिशप्तस्य षण्डस्य पाकभेदकरस्य च ॥

dīkṣitasya kadaryasya kruddhasya nikṛtasya ca | abhiśaptasya ṣaṇḍasya pākabhedakarasya ca

दीक्षा लिए हुए का, कंजूस का, क्रोधी का, छली का, शापित का, नपुंसक का और पके हुए अन्न में भेद करनेवाले का अन्न;

श्लोक 15 (14.107.15)

चिकित्सकस्य दूतस्य तथा चोच्छिष्टभोजिनः । उग्रान्नं सूतकान्नं च शूद्रोच्छेषणमेव च ॥

cikitsakasya dūtasya tathā cocchiṣṭabhojinaḥ | ugrānnaṃ sūtakānnaṃ ca śūdroccheṣaṇameva ca

वैद्य का, दूत का, जूठा खानेवाले का, उग्र मनुष्य का अन्न, सूतक वाले घर का अन्न और शूद्र का जूठन;

श्लोक 16 (14.107.16)

द्विषदन्नं न भोक्तव्यं पतितान्नं च यच्छ्रुतम् । तथा च पिशुनस्यान्नं यज्ञविक्रयिणस्तथा ॥

dviṣadannaṃ na bhoktavyaṃ patitānnaṃ ca yacchrutam | tathā ca piśunasyānnaṃ yajñavikrayiṇastathā

शत्रु का अन्न नहीं खाना चाहिए और जो पतित के नाम से सुना गया हो वह अन्न भी नहीं; इसी प्रकार चुगलखोर का और यज्ञ बेचनेवाले का अन्न भी नहीं;

श्लोक 17 (14.107.17)

शैलूषं तन्तुवायान्नं कृतघ्नस्यान्नमेव च । अंबष्ठकनिषादानां रङ्गावतरकस्य च ॥

śailūṣaṃ tantuvāyānnaṃ kṛtaghnasyānnameva ca | aṃbaṣṭhakaniṣādānāṃ raṅgāvatarakasya ca

नट का, जुलाहे का, कृतघ्न का, अम्बष्ठों और निषादों का तथा रंगमंच पर उतरनेवाले का अन्न;

श्लोक 18 (14.107.18)

सुवर्णकर्तुर्वैणस्य शस्त्रविक्रयिणस्तथा । सूतानां शौण्डिकानां च वैद्यस्य रजकस्य च ॥

suvarṇakarturvaiṇasya śastravikrayiṇastathā | sūtānāṃ śauṇḍikānāṃ ca vaidyasya rajakasya ca

सुनार का, बाँस का काम करनेवाले का, शस्त्र बेचनेवाले का, सूतों का, कलालों का, वैद्य का और धोबी का अन्न;

श्लोक 19 (14.107.19)

स्त्रीजितस्य नृशंसस्य तथा माहिषिकस्य च । अनिर्दशानां प्रेतानां गणिकानां तथैव च ॥

strījitasya nṛśaṃsasya tathā māhiṣikasya ca | anirdaśānāṃ pretānāṃ gaṇikānāṃ tathaiva ca

स्त्री के वश में रहनेवाले का, क्रूर का, भैंसें पालनेवाले का, शोक के दिन पूरे हुए बिना मृतकों का और वैसे ही गणिकाओं का अन्न;

श्लोक 20 (14.107.20)

बन्दिनो द्यूतकर्तुश्च तथा द्यूतविदामपि । परिवित्तस्य यच्चान्नं परिवेत्तुस्तथैव च ॥

bandino dyūtakartuśca tathā dyūtavidāmapi | parivittasya yaccānnaṃ parivettustathaiva ca

बन्दी का, जुआरी का और द्यूत में निपुणों का; जिसके छोटे भाई का विवाह उससे पहले हो गया हो उसका, और उस छोटे भाई का भी अन्न;

श्लोक 21 (14.107.21)

यश्चाग्रदिधिषुर्विप्रो दिधिषूपतिस्तथा । तयोरप्युभयोरन्नं राज्ञां चापि विवर्जयेत् ॥

yaścāgradidhiṣurvipro didhiṣūpatistathā | tayorapyubhayorannaṃ rājñāṃ cāpi vivarjayet

अग्रेदिधिषु नामक ब्राह्मण का और इसी प्रकार दिधिषू के पति का: इन दोनों का तथा राजाओं का भी अन्न छोड़ देना चाहिए।

श्लोक 22 (14.107.22)

राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम् । आयुः सुवर्णकारान्नं यशश्चर्मावकृन्तिनः ॥

rājānnaṃ teja ādatte śūdrānnaṃ brahmavarcasam | āyuḥ suvarṇakārānnaṃ yaśaścarmāvakṛntinaḥ

राजा का अन्न तेज हर लेता है, शूद्र का अन्न ब्रह्मतेज; सुनार का अन्न आयु हर लेता है और चमड़ा काटनेवाले का अन्न यश।

श्लोक 23 (14.107.23)

गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकीर्तितम् । पूयं चिकित्सकस्यान्नं शुक्लं तु वृषलीपतेः ॥

gaṇānnaṃ gaṇikānnaṃ ca lokebhyaḥ parikīrtitam | pūyaṃ cikitsakasyānnaṃ śuklaṃ tu vṛṣalīpateḥ

गण का अन्न और गणिका का अन्न लोगों के लिए वर्जित बताया गया है। वैद्य का अन्न मवाद है और शूद्रा के पति का अन्न वीर्य है।

श्लोक 24 (14.107.24)

विष्ठा वार्धुषिकस्यान्नं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् । तेषां त्वगस्थिरोमाणि भुङ्क्ते योऽन्नं तु भक्षयेत् ॥

viṣṭhā vārdhuṣikasyānnaṃ tasmāttatparivarjayet | teṣāṃ tvagasthiromāṇi bhuṅkte yo'nnaṃ tu bhakṣayet

सूदखोर का अन्न विष्ठा है, इसलिए उसे त्याग देना चाहिए। जो ऐसा अन्न खाता है, वह उन लोगों की त्वचा, हड्डियाँ और रोम खाता है।

श्लोक 25 (14.107.25)

अमात्यान्नमथैतेषां भुक्त्वा तु त्रियहं क्षिपेत् । मत्या भुक्त्वा सकृद्वाऽपि प्राजापत्यं चरेद्द्विजः ॥

amātyānnamathaiteṣāṃ bhuktvā tu triyahaṃ kṣipet | matyā bhuktvā sakṛdvā'pi prājāpatyaṃ careddvijaḥ

यदि कोई इनका अथवा मंत्री का अन्न खा ले तो तीन दिन के भीतर उसे उगल दे; और जान-बूझकर एक बार भी खा ले तो द्विज प्राजापत्य व्रत करे।

श्लोक 26 (14.107.26)

दानानां च फलं यद्वै शृणु पाण्डव तत्वतः । जलदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षयमन्नदः ॥

dānānāṃ ca phalaṃ yadvai śṛṇu pāṇḍava tatvataḥ | jaladastṛptimāpnoti sukhamakṣayamannadaḥ

हे पाण्डव, अब दानों का फल यथार्थ रूप से सुनो। जल देनेवाला तृप्ति पाता है और अन्न देनेवाला अक्षय सुख।

श्लोक 27 (14.107.27)

तिलदश्च प्रजामिष्टां दीपदश्चक्षुरुत्तमम् । भूमदो भूमिमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः ॥

tiladaśca prajāmiṣṭāṃ dīpadaścakṣuruttamam | bhūmado bhūmimāpnoti dīrghamāyurhiraṇyadaḥ

तिल देनेवाला मनचाही संतान पाता है, दीप देनेवाला उत्तम नेत्र, भूमि देनेवाला भूमि पाता है और सोना देनेवाला लंबी आयु।

श्लोक 28 (14.107.28)

गृहदोऽग्र्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम् । वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः ॥

gṛhado'gryāṇi veśmāni rūpyado rūpamuttamam | vāsodaścandrasālokyamaśvisālokyamaśvadaḥ

घर देनेवाला श्रेष्ठ भवन पाता है, चाँदी देनेवाला उत्तम रूप, वस्त्र देनेवाला चन्द्रलोक में स्थान पाता है और घोड़ा देनेवाला अश्विनीकुमारों के लोक में।

श्लोक 29 (14.107.29)

अनडुद्दः श्रियं जुष्टां गोदो गोलोकमश्नुते । यानशय्याप्रदो भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः ॥

anaḍuddaḥ śriyaṃ juṣṭāṃ godo golokamaśnute | yānaśayyāprado bhāryāmaiśvaryamabhayapradaḥ

बैल देनेवाला प्रिय लक्ष्मी पाता है, गौ देनेवाला गोलोक पाता है, सवारी और शय्या देनेवाला पत्नी पाता है और अभय देनेवाला ऐश्वर्य।

श्लोक 30 (14.107.30)

धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्मसाम्यताम् । सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते ॥

dhānyadaḥ śāśvataṃ saukhyaṃ brahmado brahmasāmyatām | sarveṣāmeva dānānāṃ brahmadānaṃ viśiṣyate

अन्न देनेवाला शाश्वत सुख पाता है और वेद का दान देनेवाला ब्रह्म की समानता। सब दानों में ब्रह्मदान सबसे श्रेष्ठ है।

श्लोक 31 (14.107.31)

हिरण्यभूगवाश्वाजवस्त्रशय्यासनादिषु । योर्चितः प्रतिगृह्णाति दद्यादुचितमेव च । तावुभौ गच्छतः स्वर्गं नरकं च विपर्यये ॥

hiraṇyabhūgavāśvājavastraśayyāsanādiṣu | yorcitaḥ pratigṛhṇāti dadyāducitameva ca | tāvubhau gacchataḥ svargaṃ narakaṃ ca viparyaye

सोना, भूमि, गौ, घोड़े, बकरियाँ, वस्त्र, शय्या, आसन आदि वस्तुओं को जो सम्मानित होकर ग्रहण करता है और जो उचित दान देता है, वे दोनों स्वर्ग जाते हैं; इसके विपरीत होने पर दोनों नरक में जाते हैं।

श्लोक 32 (14.107.32)

अनृतं न वदेद्विद्वांस्तपस्तप्त्वा न विस्मयेत् । नार्तोप्यभिभवेद्विप्रान्न दत्त्वा परिकीर्तयेत् ॥

anṛtaṃ na vadedvidvāṃstapastaptvā na vismayet | nārtopyabhibhavedviprānna dattvā parikīrtayet

विद्वान् झूठ न बोले, तप करके अभिमान न करे, दुःख में भी ब्राह्मणों का अपमान न करे और दान देकर उसे गाकर न सुनाए।

श्लोक 33 (14.107.33)

यज्ञोऽनृतेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात् । आयुर्विप्रावमानेन दानं तु परिकीर्तनात् ॥

yajño'nṛtena kṣarati tapaḥ kṣarati vismayāt | āyurviprāvamānena dānaṃ tu parikīrtanāt

झूठ से यज्ञ क्षीण होता है, अभिमान से तप, ब्राह्मणों के अपमान से आयु और बखान करने से दान।

श्लोक 34 (14.107.34)

एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रमीयते । एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेकश्चाप्नोति दुष्कृतम् ॥

ekaḥ prajāyate jantureka eva pramīyate | eko'nubhuṅkte sukṛtamekaścāpnoti duṣkṛtam

प्राणी अकेला जन्म लेता है और अकेला ही मरता है; अकेला ही अपने पुण्य का फल भोगता है और अकेला ही पाप का फल पाता है।

श्लोक 35 (14.107.35)

मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं क्षितौ । विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुवर्तते ॥

mṛtaṃ śarīramutsṛjya kāṣṭhaloṣṭasamaṃ kṣitau | vimukhā bāndhavā yānti dharmastamanuvartate

मरे हुए शरीर को लकड़ी और ढेले के समान भूमि पर छोड़कर बंधु-बांधव मुँह फेरकर चले जाते हैं; केवल धर्म ही उसके पीछे चलता है।

श्लोक 36 (14.107.36)

अनागतानि कार्याणि कर्तुं गणयते मनः । शरीरकं समुद्दिश्य स्मयते नूनमन्तकः ॥

anāgatāni kāryāṇi kartuṃ gaṇayate manaḥ | śarīrakaṃ samuddiśya smayate nūnamantakaḥ

मन भविष्य के कामों को करने का हिसाब लगाता रहता है, पर मृत्यु इस छोटे-से शरीर को लक्ष्य करके निश्चय ही हँसती है।

श्लोक 37 (14.107.37)

तस्माद्धर्मसहायस्तु धर्मं संचिनुयात्सदा । धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ॥

tasmāddharmasahāyastu dharmaṃ saṃcinuyātsadā | dharmeṇa hi sahāyena tamastarati dustaram

इसलिए धर्म को सहायक बनाकर सदा धर्म का संचय करना चाहिए, क्योंकि धर्म की सहायता से मनुष्य उस अंधकार को पार कर लेता है जिसे पार करना कठिन है।

श्लोक 38 (14.107.38)

येषां तटाकानि बहूदकानि । सभाश्च कूपाश्च शुभाः प्रपाश्च । अन्नप्रदानं मधुरा च वाणी । यमस्य ते निर्विषया भवन्ति ॥

yeṣāṃ taṭākāni bahūdakāni | sabhāśca kūpāśca śubhāḥ prapāśca | annapradānaṃ madhurā ca vāṇī | yamasya te nirviṣayā bhavanti

जिनके पास बहुत जल से भरे तालाब, सभा-भवन, कुएँ और सुंदर प्याऊ हैं, जो अन्न दान करते हैं और मीठा बोलते हैं, उनके लिए यमलोक भयरहित हो जाता है।

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