आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 108
धर्म के लक्षण, यति और अग्नि का सम्मान, सुपात्र ब्राह्मण और अन्नदान
धर्म के लक्षण पूछे जाने पर कृष्ण उन गुणों को गिनाते हैं जिनसे धर्म पहचाना जाता है, और बताते हैं कि यतियों का सम्मान कैसे किया जाए तथा अग्नि की पवित्रता कैसे बनाए रखी जाए। फिर वे उस ब्राह्मण का स्वरूप बताते हैं जिसे दिया दान महान फल देता है, और अतिथि-सत्कार का धर्म कहते हैं, जिसमें अन्न को सब प्राणियों का आधार बताया गया है। अंत में वे सूर्य, वायु, मेघ और वर्षा के चक्र से अन्न की उत्पत्ति और अन्नदाताओं के लिए स्वर्ग के भवनों का वर्णन करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (14.108.1)
अनेकान्तं बहुद्वारं धर्ममाहुर्मनीषिणः । किंलक्षणोसौ भवति तन्मे ब्रूहि जनार्दन ॥
anekāntaṃ bahudvāraṃ dharmamāhurmanīṣiṇaḥ | kiṃlakṣaṇosau bhavati tanme brūhi janārdana
मनीषी लोग धर्म को अनेक पक्षोंवाला और बहुत द्वारोंवाला कहते हैं। हे जनार्दन, उसका लक्षण क्या है? वह मुझे बताइए।
भगवानुवाच
श्लोक 2 (14.108.2)
शृणु राजन्समासेन धर्मशौचविधिक्रमम् । अहिंसा शौचमक्रोधमानृशंस्यं दमः शमः । आर्जवं चैव राजेन्द्र निश्चितं धर्मलक्षणम् ॥
śṛṇu rājansamāsena dharmaśaucavidhikramam | ahiṃsā śaucamakrodhamānṛśaṃsyaṃ damaḥ śamaḥ | ārjavaṃ caiva rājendra niścitaṃ dharmalakṣaṇam
हे राजन्, धर्म और शौच की विधि का क्रम संक्षेप में सुनो। अहिंसा, शौच, क्रोध का अभाव, क्रूरता का अभाव, दम, शम और सरलता; हे राजेन्द्र, ये ही धर्म के निश्चित लक्षण हैं।
श्लोक 3 (14.108.3)
ब्रह्मचर्यं तपः क्षान्तिर्मधुमांसस्य वर्जनम् । मर्यादायां स्थितिश्चैव शमः शौचस्य लक्षणम् ॥
brahmacaryaṃ tapaḥ kṣāntirmadhumāṃsasya varjanam | maryādāyāṃ sthitiścaiva śamaḥ śaucasya lakṣaṇam
ब्रह्मचर्य, तप, क्षमा, मधु और मांस का त्याग, मर्यादा में स्थित रहना और शम; ये शौच के लक्षण हैं।
श्लोक 4 (14.108.4)
बाल्ये विद्यां निषेवेत यौवने दारसंग्रहम् । वार्धके मौनमातिष्ठेत्सर्वदा धर्ममाचरेत् ॥
bālye vidyāṃ niṣeveta yauvane dārasaṃgraham | vārdhake maunamātiṣṭhetsarvadā dharmamācaret
बचपन में मनुष्य विद्या का अभ्यास करे, यौवन में विवाह करे, बुढ़ापे में मौन धारण करे और सदा धर्म का आचरण करे।
श्लोक 5 (14.108.5)
ब्राह्मणान्नावमन्येत गुरुन्परिवदेन्न च । यतीनामनुकूलः स्यादेष धर्मः सनातनः ॥
brāhmaṇānnāvamanyeta gurunparivadenna ca | yatīnāmanukūlaḥ syādeṣa dharmaḥ sanātanaḥ
वह ब्राह्मणों का अपमान न करे, गुरुजनों की निंदा न करे और यतियों के अनुकूल रहे। यही सनातन धर्म है।
श्लोक 6 (14.108.6)
यतिर्गुरुर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः । पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वेषां पार्थिवो गुरुः ॥
yatirgururdvijātīnāṃ varṇānāṃ brāhmaṇo guruḥ | patireva guruḥ strīṇāṃ sarveṣāṃ pārthivo guruḥ
द्विजातियों के लिए यति गुरु है, वर्णों के लिए ब्राह्मण गुरु है, स्त्रियों के लिए पति ही गुरु है और सबके लिए राजा गुरु है।
श्लोक 7 (14.108.7)
यद्गृहस्थार्जितं पापं ज्ञानतोऽज्ञानतोपि वा । निर्दहिष्यति तत्सर्वमेकरात्रोषितो यतिः ॥
yadgṛhasthārjitaṃ pāpaṃ jñānato'jñānatopi vā | nirdahiṣyati tatsarvamekarātroṣito yatiḥ
गृहस्थ ने जाने या अनजाने जो पाप कमाया हो, उस सबको एक रात ठहरा हुआ यति जला डालता है।
श्लोक 8 (14.108.8)
दुर्वृत्ता वा सुवृत्ता वा ज्ञानिनोऽज्ञानिनोपि वा । गृहस्थैर्यतयः पूज्याः परत्र हितकाङ्क्षिभिः ॥
durvṛttā vā suvṛttā vā jñānino'jñāninopi vā | gṛhasthairyatayaḥ pūjyāḥ paratra hitakāṅkṣibhiḥ
आचरण में बुरे हों या अच्छे, ज्ञानी हों या अज्ञानी, परलोक में अपना हित चाहनेवाले गृहस्थों को यतियों का सम्मान करना चाहिए।
श्लोक 9 (14.108.9)
एकदण्डी त्रिदण्डी वा शिखी वा मुण्डितोपि वा । काषायदण्डधारोपि यतिः पूज्यो न संशयः ॥
ekadaṇḍī tridaṇḍī vā śikhī vā muṇḍitopi vā | kāṣāyadaṇḍadhāropi yatiḥ pūjyo na saṃśayaḥ
एकदण्डी हो या त्रिदण्डी, शिखावाला हो या मुंडित सिरवाला, अथवा केवल गेरुआ वस्त्र और दण्ड धारण करनेवाला; यति पूजनीय है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 10 (14.108.10)
अपूजितो गृहस्थैर्वा तथा चाप्यवमानितः । यतिर्वाऽप्यतिथिर्वाऽपि नरके पातयिष्यतः ॥
apūjito gṛhasthairvā tathā cāpyavamānitaḥ | yatirvā'pyatithirvā'pi narake pātayiṣyataḥ
यति अथवा अतिथि, यदि गृहस्थों से सम्मान न पाए अथवा अपमानित हो, तो वह उन्हें नरक में गिरा देता है।
श्लोक 11 (14.108.11)
तस्मात्तु यत्नतः पूज्या मद्भक्ता मत्परायणाः । मयि संन्यस्तकर्माणः परत्र हितकाङ्क्षिभिः ॥
tasmāttu yatnataḥ pūjyā madbhaktā matparāyaṇāḥ | mayi saṃnyastakarmāṇaḥ paratra hitakāṅkṣibhiḥ
इसलिए परलोक में हित चाहनेवालों को चाहिए कि जो मेरे भक्त हैं, मुझे ही परम आश्रय माननेवाले हैं और जिन्होंने अपने कर्म मुझमें अर्पित कर दिए हैं, उनका यत्नपूर्वक सम्मान करें।
श्लोक 12 (14.108.12)
प्रहरेन्न द्विजान्विप्रो गां न हन्यात्कदाचन । भ्रूणहत्यासमं चैव उभयं यो निषेवते ॥
praharenna dvijānvipro gāṃ na hanyātkadācana | bhrūṇahatyāsamaṃ caiva ubhayaṃ yo niṣevate
ब्राह्मण द्विजों पर प्रहार न करे और कभी गौ का वध न करे। जो इन दोनों का सेवन करता है, उसे भ्रूणहत्या के समान पाप लगता है।
श्लोक 13 (14.108.13)
नाग्निं मुखेनोपधमेन्न च पादौ प्रतापयेत् । नाधः कुर्यात्कदाचित्तु न पृष्ठं परितापयेत् ॥
nāgniṃ mukhenopadhamenna ca pādau pratāpayet | nādhaḥ kuryātkadācittu na pṛṣṭhaṃ paritāpayet
मुँह से फूँककर आग को न सुलगाए, उस पर पैर न तपाए, उसे कभी अपने नीचे न रखे और उस पर पीठ न तपाए।
श्लोक 14 (14.108.14)
नान्तरा गमनं कुर्यान्न चामेध्यं विनिक्षिपेत् । उच्छिष्टो न स्पृशेदग्निमाशौचस्थो न जातुचित् ॥
nāntarā gamanaṃ kuryānna cāmedhyaṃ vinikṣipet | ucchiṣṭo na spṛśedagnimāśaucastho na jātucit
आग और किसी मनुष्य के बीच से न निकले, उसमें कोई अपवित्र वस्तु न डाले। जूठे मुँहवाला अथवा अशुद्ध अवस्था में स्थित मनुष्य कभी आग को न छुए।
श्लोक 15 (14.108.15)
श्वचण्डालादिभिः स्पृष्टो नाङ्गमग्नौ प्रतापयेत् । सर्वदेवमयो वह्निस्तस्माच्छुद्धः सदा स्पृशेत् ॥
śvacaṇḍālādibhiḥ spṛṣṭo nāṅgamagnau pratāpayet | sarvadevamayo vahnistasmācchuddhaḥ sadā spṛśet
कुत्तों, चाण्डालों आदि से छू जाने पर अपना अंग आग पर न तपाए। अग्नि सब देवताओं से युक्त है, इसलिए शुद्ध होकर ही उसे छूए।
श्लोक 16 (14.108.16)
प्राप्तमूत्रपुरीषस्तु न स्पृशेद्वह्निमात्मवान् । यावत्तु धारयेद्वेगं तावदप्रयतो भवेत् ॥
prāptamūtrapurīṣastu na spṛśedvahnimātmavān | yāvattu dhārayedvegaṃ tāvadaprayato bhavet
जिसे मल-मूत्र की बाधा हुई हो, वह संयमी पुरुष अग्नि को न छुए; जब तक वह वेग को रोके रखता है, तब तक अशुद्ध रहता है।
श्लोक 17 (14.108.17)
पचनाग्निं न गृह्णीयात्परवेश्मनि जातुचित् । तस्मिन्पक्वेन चान्नेन यत्कर्म कुरुते शुभम् ॥
pacanāgniṃ na gṛhṇīyātparaveśmani jātucit | tasminpakvena cānnena yatkarma kurute śubham
दूसरे के घर में रसोई की आग कभी न ले। उस आग पर पके हुए अन्न से मनुष्य जो भी शुभ कर्म करता है,
श्लोक 18 (14.108.18)
तस्यैव तच्छुभस्यार्धमग्निदस्य भवेन्नृप । तस्माद्गृहगतं वह्निं प्रकुर्यादविनाशितम् ॥
tasyaiva tacchubhasyārdhamagnidasya bhavennṛpa | tasmādgṛhagataṃ vahniṃ prakuryādavināśitam
हे राजन्, उस शुभ कर्म का आधा फल आग देनेवाले को मिलता है। इसलिए घर की आग को बुझने न दे।
श्लोक 19 (14.108.19)
प्रमादाद्यदि वाऽज्ञानात्तस्य नाशो भविष्यति । गृह्णीयात्तु मथित्वा वा श्रोत्रियागारतोपि वा ॥
pramādādyadi vā'jñānāttasya nāśo bhaviṣyati | gṛhṇīyāttu mathitvā vā śrotriyāgāratopi vā
यदि प्रमाद या अज्ञान से वह नष्ट हो जाए तो अरणि-मंथन से अथवा किसी श्रोत्रिय के घर से आग ले आए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 20 (14.108.20)
कीदृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् । कीदृशेभ्यो हि दातव्यं तन्मे ब्रूहि जनार्दन ॥
kīdṛśāḥ sādhavo viprāstebhyo dattaṃ mahāphalam | kīdṛśebhyo hi dātavyaṃ tanme brūhi janārdana
कैसे ब्राह्मण साधु हैं जिन्हें दिया हुआ दान महान फल देता है? कैसे पात्रों को दान देना चाहिए? हे जनार्दन, यह मुझे बताइए।
भगवानुवाच
श्लोक 21 (14.108.21)
अक्रोधनाः सत्यपरा धर्मनित्या जितेन्द्रियाः । तादृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
akrodhanāḥ satyaparā dharmanityā jitendriyāḥ | tādṛśāḥ sādhavo viprāstebhyo dattaṃ mahāphalam
जो क्रोध से रहित, सत्य में तत्पर, धर्म में नित्य स्थित और जितेन्द्रिय हैं, ऐसे ब्राह्मण साधु हैं; उन्हें दिया हुआ दान महान फल देता है।
श्लोक 22 (14.108.22)
अमानिनः सर्वसहा दृष्टार्था विजितेन्द्रियाः । सर्वभूतहिता मैत्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
amāninaḥ sarvasahā dṛṣṭārthā vijitendriyāḥ | sarvabhūtahitā maitrāstebhyo dattaṃ mahāphalam
जो अभिमानरहित हैं, सब कुछ सह लेते हैं, तत्त्व को देख चुके हैं, जिन्होंने इन्द्रियों को पूरी तरह जीत लिया है, जो सब प्राणियों का हित करनेवाले और मित्रभाव रखनेवाले हैं, उन्हें दिया हुआ दान महान फल देता है।
श्लोक 23 (14.108.23)
अलुब्धाः शुचयो वैद्या हीमन्तः सत्यवादिनः । स्वधर्मनिरता ये तु तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
alubdhāḥ śucayo vaidyā hīmantaḥ satyavādinaḥ | svadharmaniratā ye tu tebhyo dattaṃ mahāphalam
जो लोभरहित, पवित्र, विद्वान्, लज्जाशील और सत्यवादी हैं तथा अपने धर्म में लगे रहते हैं, उन्हें दिया हुआ दान महान फल देता है।
श्लोक 24 (14.108.24)
साङ्गांश्च चतुरो वेदान्योऽधीयेत दिनेदिने । शूद्रान्नं यस्य नो देहे तत्पात्रमृषयो विदुः ॥
sāṅgāṃśca caturo vedānyo'dhīyeta dinedine | śūdrānnaṃ yasya no dehe tatpātramṛṣayo viduḥ
जो प्रतिदिन अंगों सहित चारों वेदों का अध्ययन करता है और जिसकी देह में शूद्र का अन्न नहीं है, उसे ऋषि दान का सुपात्र जानते हैं।
श्लोक 25 (14.108.25)
प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च समन्वितः । तारयेत्तत्कुलं सर्वमेकोपीह युधिष्ठिर ॥
prajñāśrutābhyāṃ vṛttena śīlena ca samanvitaḥ | tārayettatkulaṃ sarvamekopīha yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर, जो मनुष्य प्रज्ञा और शास्त्रज्ञान से, सदाचार और शील से युक्त होता है, वह अकेला भी अपने समूचे कुल को तार देता है।
श्लोक 26 (14.108.26)
गामश्वमन्नं वित्तं वा तद्विधे प्रतिपादयेत् । निशम्य तु गुणोपेतं ब्राह्मणं साधुसंमतम् । दूरादाहृत्य सत्कृत्य तं प्रयत्नेन पूजयेत् ॥
gāmaśvamannaṃ vittaṃ vā tadvidhe pratipādayet | niśamya tu guṇopetaṃ brāhmaṇaṃ sādhusaṃmatam | dūrādāhṛtya satkṛtya taṃ prayatnena pūjayet
ऐसे पात्र को गौ, घोड़ा, अन्न अथवा धन देना चाहिए। गुणों से युक्त और सज्जनों के माने हुए ब्राह्मण के विषय में सुनकर उसे दूर से बुलाकर, सत्कार करके यत्न से पूजे।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 27 (14.108.27)
धर्माधर्मविधिस्त्वेवं भीमं भीष्मेण भाषितम् । भीष्मवाक्यात्सारभूतं वद धर्मं सुरेश्वर ॥
dharmādharmavidhistvevaṃ bhīmaṃ bhīṣmeṇa bhāṣitam | bhīṣmavākyātsārabhūtaṃ vada dharmaṃ sureśvara
भीष्म ने मुझसे धर्म और अधर्म की यह विधि इस प्रकार कही है, जो बड़ी भयंकर-सी है। हे सुरेश्वर, अब आप भीष्म के वचनों में से सारभूत धर्म को कहिए।
भगवानुवाच
श्लोक 28 (14.108.28)
अन्नेन धार्यते सर्वं जगदेतच्चराचरम् । अन्नात्प्रभवति प्राणः प्रत्यक्षं नास्ति संशयः ॥
annena dhāryate sarvaṃ jagadetaccarācaram | annātprabhavati prāṇaḥ pratyakṣaṃ nāsti saṃśayaḥ
यह सारा चराचर जगत् अन्न से ही धारण किया जाता है। अन्न से प्राण उत्पन्न होता है; यह प्रत्यक्ष है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 29 (14.108.29)
कलत्रं पीडयित्वा तु देशे काले च शक्तितः । दातव्यं भिक्षवे चान्नमात्मनो भूतिमिच्छता ॥
kalatraṃ pīḍayitvā tu deśe kāle ca śaktitaḥ | dātavyaṃ bhikṣave cānnamātmano bhūtimicchatā
अपनी उन्नति चाहनेवाले मनुष्य को देश, काल और सामर्थ्य के अनुसार, पत्नी और परिवार को कष्ट देकर भी, भिक्षु को अन्न देना चाहिए।
श्लोक 30 (14.108.30)
विप्रमध्वपरिश्रान्तं बालं वृद्धमथापि वा । अर्चयेद्गुरुवत्प्रीतो गृहस्थो गृहमागतम् ॥
vipramadhvapariśrāntaṃ bālaṃ vṛddhamathāpi vā | arcayedguruvatprīto gṛhastho gṛhamāgatam
मार्ग से थका हुआ ब्राह्मण घर आए, चाहे बालक हो या वृद्ध, तो गृहस्थ प्रसन्न होकर गुरु के समान उसका सत्कार करे।
श्लोक 31 (14.108.31)
क्रोधमुत्पतितं हित्वा सुशीलो वीतमत्सरः । अर्चयेदतिथिं प्रीतः परत्र हितभूतये ॥
krodhamutpatitaṃ hitvā suśīlo vītamatsaraḥ | arcayedatithiṃ prītaḥ paratra hitabhūtaye
उठे हुए क्रोध को छोड़कर, सुशील और ईर्ष्यारहित होकर, परलोक में अपने कल्याण के लिए प्रसन्न मन से अतिथि का सत्कार करे।
श्लोक 32 (14.108.32)
अतिथिं नावमन्येत नानृतां गिरमीरयेत् । न पृच्छेद्गोत्रचरणं नाधीतं वा कदाचन ॥
atithiṃ nāvamanyeta nānṛtāṃ giramīrayet | na pṛcchedgotracaraṇaṃ nādhītaṃ vā kadācana
अतिथि का अपमान न करे, उससे झूठ न बोले और उसके गोत्र, शाखा अथवा अध्ययन के विषय में कभी न पूछे।
श्लोक 33 (14.108.33)
चण्डालो वा श्वपाको वा काले यः कश्चिदागतः । अन्नेन पूजनीयः स्यात्परत्र हितमिच्छता ॥
caṇḍālo vā śvapāko vā kāle yaḥ kaścidāgataḥ | annena pūjanīyaḥ syātparatra hitamicchatā
चाण्डाल हो या श्वपाक, जो कोई भी उचित समय पर आ जाए, परलोक में हित चाहनेवाले को उसे अन्न से पूजना चाहिए।
श्लोक 34 (14.108.34)
पिधाय तु गृहद्वारं भुक्ते योऽन्नं प्रहृष्टवान् । स्वर्गद्वारपिधानं वै कृतं तेन युधिष्ठिर ॥
pidhāya tu gṛhadvāraṃ bhukte yo'nnaṃ prahṛṣṭavān | svargadvārapidhānaṃ vai kṛtaṃ tena yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर, जो घर का द्वार बंद करके प्रसन्न होकर अकेला भोजन करता है, उसने स्वर्ग का द्वार बंद कर दिया।
श्लोक 35 (14.108.35)
पितॄन्देवानृषीन्विप्रानतिथींश्च निराश्रयान् । यो नरः प्रीणयत्यन्नैस्तस्य पुण्यफलं महत् ॥
pitṝndevānṛṣīnviprānatithīṃśca nirāśrayān | yo naraḥ prīṇayatyannaistasya puṇyaphalaṃ mahat
जो मनुष्य अन्न से पितरों, देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों और आश्रयहीन अतिथियों को तृप्त करता है, उसे महान पुण्य का फल मिलता है।
श्लोक 36 (14.108.36)
कृत्वा तु पापं बहुशो यो दद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणाय विशेषेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
kṛtvā tu pāpaṃ bahuśo yo dadyādannamarthine | brāhmaṇāya viśeṣeṇa sarvapāpaiḥ pramucyate
जिसने अनेक बार पाप किया हो, वह भी यदि याचक को, और विशेषकर ब्राह्मण को, अन्न दे तो सब पापों से छूट जाता है।
श्लोक 37 (14.108.37)
अन्नदः प्राणदो लोके प्राणदः सर्वदो भवेत् । तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता ॥
annadaḥ prāṇado loke prāṇadaḥ sarvado bhavet | tasmādannaṃ viśeṣeṇa dātavyaṃ bhūtimicchatā
अन्न देनेवाला संसार में प्राण देनेवाला है और प्राण देनेवाला सब कुछ देनेवाला होता है। इसलिए उन्नति चाहनेवाले को विशेष रूप से अन्न का दान करना चाहिए।
श्लोक 38 (14.108.38)
अन्नं ह्यमृतमित्याहुरन्नं प्रजननं स्मृतम् । अन्नप्रणाशे सीदन्ति शरीरे पञ्च धातवः ॥
annaṃ hyamṛtamityāhurannaṃ prajananaṃ smṛtam | annapraṇāśe sīdanti śarīre pañca dhātavaḥ
अन्न को अमृत कहते हैं और अन्न को ही उत्पत्ति का साधन माना गया है। अन्न के नष्ट होने पर शरीर की पाँचों धातुएँ शिथिल हो जाती हैं।
श्लोक 39 (14.108.39)
बलं बलवतो नश्येदन्नहीनस्य देहिनः । तस्मादन्नं प्रदातव्यं श्रद्धयाऽश्रद्धयापि वा ॥
balaṃ balavato naśyedannahīnasya dehinaḥ | tasmādannaṃ pradātavyaṃ śraddhayā'śraddhayāpi vā
अन्न से रहित देहधारी का बलवान् होने पर भी बल नष्ट हो जाता है। इसलिए श्रद्धा से अथवा बिना श्रद्धा के भी अन्न का दान करना चाहिए।
श्लोक 40 (14.108.40)
आदत्ते हि रसं सर्वमादित्यः स्वगभस्तिभिः । वायुस्तस्मात्समादाय रसं मेघेषु धारयेत् ॥
ādatte hi rasaṃ sarvamādityaḥ svagabhastibhiḥ | vāyustasmātsamādāya rasaṃ megheṣu dhārayet
सूर्य अपनी किरणों से सारा रस खींच लेता है; फिर वायु उसे लेकर मेघों में धारण करता है।
श्लोक 41 (14.108.41)
तत्तु मेघगतं भूमौ शक्रो वर्षति तादृशम् । तेन दिग्धा भवेद्देवी मही प्रीता च पाण्डव ॥
tattu meghagataṃ bhūmau śakro varṣati tādṛśam | tena digdhā bhaveddevī mahī prītā ca pāṇḍava
वही रस मेघ से इन्द्र पृथ्वी पर बरसाते हैं; हे पाण्डव, उससे देवी पृथ्वी सिंच जाती है और प्रसन्न हो उठती है।
श्लोक 42 (14.108.42)
तस्यां सस्यानि रोहन्ति यैर्जीवन्त्यखिलाः प्रजाः । मांसमेदोस्थिमज्जानां सम्भवस्तेभ्य एव हि ॥
tasyāṃ sasyāni rohanti yairjīvantyakhilāḥ prajāḥ | māṃsamedosthimajjānāṃ sambhavastebhya eva hi
उसमें अन्न उगते हैं, जिनसे सारी प्रजा जीवित रहती है; उन्हीं से मांस, मेद, अस्थि और मज्जा की उत्पत्ति होती है।
श्लोक 43 (14.108.43)
एवं सूर्यश्च पवनो मेघः शक्रस्तथैव च । एक एव स्थितो राशिर्यतो भूतानि जज्ञिरे ॥
evaṃ sūryaśca pavano meghaḥ śakrastathaiva ca | eka eva sthito rāśiryato bhūtāni jajñire
इस प्रकार सूर्य, वायु, मेघ और इन्द्र एक ही राशि हैं, जिससे सब प्राणी उत्पन्न हुए हैं।
श्लोक 44 (14.108.44)
भवनानि च दिव्यानि दिवि तेषां महात्मनाम् । नानासंस्थानि भूतानि नानाभूमिगतानि च ॥
bhavanāni ca divyāni divi teṣāṃ mahātmanām | nānāsaṃsthāni bhūtāni nānābhūmigatāni ca
स्वर्ग में उन महात्माओं के दिव्य भवन हैं, जो अनेक आकृतियों के हैं, और वहाँ अनेक लोकों से आए नाना प्रकार के प्राणी रहते हैं।
श्लोक 45 (14.108.45)
चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किङ्किणीजालवन्ति च । तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च ॥
candramaṇḍalaśubhrāṇi kiṅkiṇījālavanti ca | taruṇādityavarṇāni sthāvarāṇi carāṇi ca
वे चन्द्रमण्डल के समान श्वेत हैं, घुँघरुओं की जालियों से सजे हैं, बाल सूर्य के समान कांतिमान हैं और कुछ स्थिर तथा कुछ चलनेवाले हैं।
श्लोक 46 (14.108.46)
अनेकशतसङ्ख्यानि सान्तर्जलवनानि च । तत्र पुष्पफलोपेताः कामदाः सुरपादपाः ॥
anekaśatasaṅkhyāni sāntarjalavanāni ca | tatra puṣpaphalopetāḥ kāmadāḥ surapādapāḥ
वे अनेक सैकड़ों की संख्या में हैं और उनके भीतर जल और वन हैं; वहाँ फूल-फलों से लदे, सब कामनाएँ पूरी करनेवाले कल्पवृक्ष हैं।
श्लोक 47 (14.108.47)
वाप्यो बद्धसभाः कूपा दीर्घिकाश्च सहस्रशः । भक्ष्यभोज्यमयाः शैला वासांस्याभरणानि च ॥
vāpyo baddhasabhāḥ kūpā dīrghikāśca sahasraśaḥ | bhakṣyabhojyamayāḥ śailā vāsāṃsyābharaṇāni ca
वहाँ हजारों बावड़ियाँ, सभा-भवन, कुएँ और लंबी झीलें हैं; भक्ष्य-भोज्य पदार्थों के बने पर्वत हैं और वस्त्र तथा आभूषण हैं।
श्लोक 48 (14.108.48)
क्षीरस्रवन्त्यः सरितस्तथा चैवान्नपर्वताः । घोषवन्ति च यानानि युक्तान्यथ सहस्रशः ॥
kṣīrasravantyaḥ saritastathā caivānnaparvatāḥ | ghoṣavanti ca yānāni yuktānyatha sahasraśaḥ
वहाँ दूध बहानेवाली नदियाँ हैं और अन्न के पर्वत हैं; और हजारों जुते हुए, घोष करते हुए रथ-यान हैं।
श्लोक 49 (14.108.49)
प्रासादप्रवराः शुभ्राः शय्याश्च कनकोज्ज्वलाः । अन्नदास्तत्र तिष्ठन्ति तस्मादन्नप्रदो भवेत् ॥
prāsādapravarāḥ śubhrāḥ śayyāśca kanakojjvalāḥ | annadāstatra tiṣṭhanti tasmādannaprado bhavet
वहाँ उत्तम श्वेत महल हैं और सोने से दमकती शय्याएँ हैं। अन्न का दान करनेवाले वहाँ निवास करते हैं; इसलिए मनुष्य को अन्नदाता होना चाहिए।