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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 109

भोजन की विधि, गौ के लिए ग्रास, तथा तिल और ईख का माहात्म्य

युधिष्ठिर भोजन की विधि पूछते हैं और कृष्ण बताते हैं कि द्विज को किस प्रकार तैयारी करनी, बैठना, भोजन करना और आचमन करना चाहिए; वे अभोज्य अन्न गिनाते हैं और उसे खाने पर चान्द्रायण व्रत का विधान कहते हैं। फिर वे गौओं को मुट्ठी भर चारा देने और उसके पुण्य का वर्णन करते हैं, तिल को पवित्र और पापनाशक बताते हैं, तथा कोल्हू में तिल या ईख पेरने का निषेध करते हैं।

अध्याय 108अध्याय-सूचीअध्याय 110

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (14.109.1)

अन्नदानफलं श्रुत्वा प्रीतोस्मि मधुसूदन । भोजनस्य विधिं वक्तुं देवदेव त्वमर्हसि ॥

annadānaphalaṃ śrutvā prītosmi madhusūdana | bhojanasya vidhiṃ vaktuṃ devadeva tvamarhasi

हे मधुसूदन, अन्नदान का फल सुनकर मैं प्रसन्न हूँ। हे देवदेव, अब आप मुझे भोजन की विधि बताइए।

भगवानुवाच

श्लोक 2 (14.109.2)

बोजनस्य द्विजातीनां विधानं शृणु पाण्डव । स्नातः शुचिः शुचौ देशे निर्जने हुतपावकः ॥

bojanasya dvijātīnāṃ vidhānaṃ śṛṇu pāṇḍava | snātaḥ śuciḥ śucau deśe nirjane hutapāvakaḥ

हे पाण्डव, द्विजातियों के भोजन की विधि सुनो। स्नान करके पवित्र होकर, पवित्र और एकान्त स्थान में अग्नि में आहुति देकर,

श्लोक 3 (14.109.3)

मण्डलं कारयित्वा च चतुरश्रं द्विजोत्तमः । क्षत्रियश्चेत्ततो वृत्तं वैश्योऽर्धेन्दुसमाकृतिम् ॥

maṇḍalaṃ kārayitvā ca caturaśraṃ dvijottamaḥ | kṣatriyaścettato vṛttaṃ vaiśyo'rdhendusamākṛtim

श्रेष्ठ द्विज चौकोर मण्डल बनवाए; यदि क्षत्रिय हो तो गोल, और वैश्य हो तो अर्धचन्द्र के आकार का मण्डल बनवाए।

श्लोक 4 (14.109.4)

आर्द्रपादस्तु भुञ्जीयात्प्राङ्मुखश्चासने शुचौ । पादाभ्यां धरणीं स्पृष्ट्वा पादेनैकेन वा पुनः ॥

ārdrapādastu bhuñjīyātprāṅmukhaścāsane śucau | pādābhyāṃ dharaṇīṃ spṛṣṭvā pādenaikena vā punaḥ

वह गीले पैर, पूर्व की ओर मुख करके, स्वच्छ आसन पर बैठकर, दोनों पैरों से अथवा एक पैर से पृथ्वी को छूते हुए भोजन करे।

श्लोक 5 (14.109.5)

नैकवासास्तु भुञ्जीयान्न चान्तर्धाय वा द्विजः । न भिन्नपात्रे भुञ्जीत पर्णपृष्ठे तथैव च ॥

naikavāsāstu bhuñjīyānna cāntardhāya vā dvijaḥ | na bhinnapātre bhuñjīta parṇapṛṣṭhe tathaiva ca

द्विज एक ही वस्त्र पहनकर भोजन न करे, न अपने को ओट में करके, न टूटे पात्र में और न पत्ते की पीठ पर भोजन करे।

श्लोक 6 (14.109.6)

अन्नं पूर्वं नमस्कुर्यात्प्रहृष्टेनान्तरात्मना । नान्यदालोकयेदन्नान्न जुगुप्सेन तत्परः ॥

annaṃ pūrvaṃ namaskuryātprahṛṣṭenāntarātmanā | nānyadālokayedannānna jugupsena tatparaḥ

वह प्रसन्न मन से पहले अन्न को नमस्कार करे। अन्न में लगा हुआ वह अन्न के सिवा और कुछ न देखे और उससे घृणा न करे।

श्लोक 7 (14.109.7)

जुगुप्सितं च यच्चान्नं राक्षसा एव भुञ्जते । पाणिना जलमुद्धृत्य कुर्यादन्नं प्रदक्षिणम् ॥

jugupsitaṃ ca yaccānnaṃ rākṣasā eva bhuñjate | pāṇinā jalamuddhṛtya kuryādannaṃ pradakṣiṇam

जिस अन्न से घृणा की जाती है उसे राक्षस ही खाते हैं। हाथ में जल लेकर वह अन्न के चारों ओर प्रदक्षिणा-रूप में जल घुमाए।

श्लोक 8 (14.109.8)

अपेयं तद्विजानीयात्पीत्वा चान्द्रायणं चरेत् । परिवेषजलादन्यत्पेयमेव तु मन्त्रवत् ॥

apeyaṃ tadvijānīyātpītvā cāndrāyaṇaṃ caret | pariveṣajalādanyatpeyameva tu mantravat

उस जल को पीने योग्य न जाने; जो उसे पी ले वह चान्द्रायण व्रत करे। परोसने के जल को छोड़कर शेष जल मंत्र के साथ पीना चाहिए।

श्लोक 9 (14.109.9)

पञ्च प्राणाहुतीः कुर्यात्समन्त्रं तु पृथक्पृथक् ॥

pañca prāṇāhutīḥ kuryātsamantraṃ tu pṛthakpṛthak

वह पाँच प्राणाहुतियाँ मंत्र सहित अलग-अलग दे।

श्लोक 10 (14.109.10)

यथा रसं न जानाति जिह्वा प्राणाहुतौ नृप । तथा समाहितः कुर्यात्प्राणाहुतिमतन्द्रितः ॥

yathā rasaṃ na jānāti jihvā prāṇāhutau nṛpa | tathā samāhitaḥ kuryātprāṇāhutimatandritaḥ

हे राजन्, जैसे प्राणाहुति के समय जीभ स्वाद नहीं जानती, वैसे ही वह एकाग्र और आलस्यरहित होकर प्राणाहुति दे।

श्लोक 11 (14.109.11)

विदित्वाऽन्नमथान्नादं पञ्च प्राणांश्च पाण्डव । यः कुर्यादाहुतीः पञ्च तेनेष्टाः पञ्चवायवः ॥

viditvā'nnamathānnādaṃ pañca prāṇāṃśca pāṇḍava | yaḥ kuryādāhutīḥ pañca teneṣṭāḥ pañcavāyavaḥ

हे पाण्डव, जो अन्न, अन्न खानेवाले और पाँच प्राणों को जानकर पाँच आहुतियाँ देता है, उसने पाँचों वायुओं का यजन कर लिया।

श्लोक 12 (14.109.12)

अतोऽन्यथा तु भुञ्जानो ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः । तेनान्नेनासुरान्प्रेतान्राक्षसांस्तर्पयिष्यति ॥

ato'nyathā tu bhuñjāno brāhmaṇo jñānadurbalaḥ | tenānnenāsurānpretānrākṣasāṃstarpayiṣyati

किंतु जो ज्ञान में दुर्बल ब्राह्मण इससे अन्यथा भोजन करता है, वह उस अन्न से असुरों, प्रेतों और राक्षसों को तृप्त करेगा।

श्लोक 13 (14.109.13)

वक्त्रप्रमाणान्पिण्डांश्च ग्रसेदेकैकशः पुनः । वक्त्राधिकं तु यत्पिण्डमात्मोच्छिष्टं तदुच्यते ॥

vaktrapramāṇānpiṇḍāṃśca grasedekaikaśaḥ punaḥ | vaktrādhikaṃ tu yatpiṇḍamātmocchiṣṭaṃ taducyate

वह मुख के माप के कौर एक-एक करके निगले। मुख से बड़ा जो कौर हो, उसे अपना उच्छिष्ट कहा जाता है।

श्लोक 14 (14.109.14)

पिण्डावशिष्टमन्यच्च वक्त्रान्निस्सृतमेव च । अभोज्यं तद्विजानीयाद्भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

piṇḍāvaśiṣṭamanyacca vaktrānnissṛtameva ca | abhojyaṃ tadvijānīyādbhuktvā cāndrāyaṇaṃ caret

कौर का बचा हुआ भाग और जो मुख से बाहर निकल आया हो, उसे अभोज्य जाने; जो उसे खा ले वह चान्द्रायण व्रत करे।

श्लोक 15 (14.109.15)

स्वमुच्छिष्टं तु यो भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते मुक्तभोजनम् । चान्द्रायणं चरेत्कृच्छ्रं प्राजापत्यमथापि वा ॥

svamucchiṣṭaṃ tu yo bhuṅkte yo bhuṅkte muktabhojanam | cāndrāyaṇaṃ caretkṛcchraṃ prājāpatyamathāpi vā

जो अपना उच्छिष्ट खाता है, अथवा दूसरे का छोड़ा हुआ भोजन खाता है, वह चान्द्रायण, कृच्छ्र अथवा प्राजापत्य व्रत करे।

श्लोक 16 (14.109.16)

स्त्रीपात्रभुङ्नरः पापः स्त्रीणामुच्छिष्टभुक्तथा । तया सह च यो भुङ्क्ते स भुङ्क्ते मद्यमेव हि । न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा मुनिभिस्तत्वदर्शिभिः ॥

strīpātrabhuṅnaraḥ pāpaḥ strīṇāmucchiṣṭabhuktathā | tayā saha ca yo bhuṅkte sa bhuṅkte madyameva hi | na tasya niṣkṛtirdṛṣṭā munibhistatvadarśibhiḥ

जो पुरुष स्त्री के पात्र में खाता है वह पापी है, और स्त्रियों का जूठा खानेवाला भी। जो उसके साथ बैठकर खाता है, वह मानो मद्य ही खाता है; तत्त्वदर्शी मुनियों ने उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं देखा।

श्लोक 17 (14.109.17)

पिबतः पतिते तोये भोजने मुखनिस्सृते । अभोज्यं तद्विजानीयाद्भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

pibataḥ patite toye bhojane mukhanissṛte | abhojyaṃ tadvijānīyādbhuktvā cāndrāyaṇaṃ caret

पीते समय पानी गिर पड़े अथवा मुख से भोजन बाहर निकल आए, तो उस अन्न को अभोज्य जाने; जो उसे खा ले वह चान्द्रायण व्रत करे।

श्लोक 18 (14.109.18)

पीतशेषं तु तन्नाम न पेयं पाण्डुनन्दन । पिबेद्यदि हि तन्मोहाद्द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥

pītaśeṣaṃ tu tannāma na peyaṃ pāṇḍunandana | pibedyadi hi tanmohāddvijaścāndrāyaṇaṃ caret

हे पाण्डुनन्दन, पीने से बचा हुआ जल फिर नहीं पीना चाहिए। यदि द्विज मोह से उसे पी ले तो चान्द्रायण व्रत करे।

श्लोक 19 (14.109.19)

पानीयानि पिबेद्येन तत्पात्रं द्विजसत्तमः । अनुच्छिष्टं भवेत्तावद्यावद्भूमौ न निक्षिपेत् ॥

pānīyāni pibedyena tatpātraṃ dvijasattamaḥ | anucchiṣṭaṃ bhavettāvadyāvadbhūmau na nikṣipet

हे द्विजश्रेष्ठ, जिस पात्र से जल पिया गया हो, वह तभी तक उच्छिष्ट नहीं होता जब तक उसे भूमि पर न रखा जाए।

श्लोक 20 (14.109.20)

मौनी वाऽप्यथवा भूमौ नावलोक्य दिशस्तथा । भुञ्जीत विधिवद्विप्रो न चोच्छिष्टं प्रदापयेत् ॥

maunī vā'pyathavā bhūmau nāvalokya diśastathā | bhuñjīta vidhivadvipro na cocchiṣṭaṃ pradāpayet

मौन रहकर अथवा न रहकर, भूमि और दिशाओं की ओर न देखता हुआ ब्राह्मण विधिपूर्वक भोजन करे और अपना उच्छिष्ट दूसरे को न दिलाए।

श्लोक 21 (14.109.21)

सदा चात्यशनं नाद्यान्नातिहीनं च कर्हिचित् । यथाऽन्नेन व्यथा न स्यात्तथा भुञ्जीत नित्यशः ॥

sadā cātyaśanaṃ nādyānnātihīnaṃ ca karhicit | yathā'nnena vyathā na syāttathā bhuñjīta nityaśaḥ

वह न कभी अधिक खाए, न कभी बहुत कम; जिस प्रकार अन्न से उसे कष्ट न हो, उसी प्रकार सदा भोजन करे।

श्लोक 22 (14.109.22)

उदक्यामपि चण्डालं श्वानं सूकरमेव वा । भुञ्जानो यदि वा पश्येत्तदन्नं च परित्यजेत् । भुञ्जानो ह्यत्यजन्मोहाद्द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥

udakyāmapi caṇḍālaṃ śvānaṃ sūkarameva vā | bhuñjāno yadi vā paśyettadannaṃ ca parityajet | bhuñjāno hyatyajanmohāddvijaścāndrāyaṇaṃ caret

भोजन करते समय यदि वह रजस्वला स्त्री, चाण्डाल, कुत्ते अथवा सूअर को देख ले तो उस अन्न को छोड़ दे। मोह से न छोड़कर खाए तो द्विज चान्द्रायण व्रत करे।

श्लोक 23 (14.109.23)

केशकीटोपपन्नं च मुखमारुतवीजितम् । अभोज्यं तद्विजानीयाद्भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

keśakīṭopapannaṃ ca mukhamārutavījitam | abhojyaṃ tadvijānīyādbhuktvā cāndrāyaṇaṃ caret

जिस अन्न में बाल या कीड़ा पड़ गया हो, अथवा जिस पर मुख की साँस की हवा लगी हो, उसे अभोज्य जाने; जो उसे खा ले वह चान्द्रायण व्रत करे।

श्लोक 24 (14.109.24)

उत्थाय च पुनः स्पृष्टं पादस्पृष्टं च लङ्घितम् । अन्नं तद्राक्षसं विद्यात्तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥

utthāya ca punaḥ spṛṣṭaṃ pādaspṛṣṭaṃ ca laṅghitam | annaṃ tadrākṣasaṃ vidyāttasmāttatparivarjayet

उठकर फिर छुआ हुआ, पैर से छुआ हुआ और लाँघा हुआ अन्न राक्षसी अन्न जाने; इसलिए उसे त्याग दे।

श्लोक 25 (14.109.25)

राक्षसोच्छिष्टभुग्विप्रः सप्त पूर्वान्परानपि । नरके रौरवे घोर स पितॄन्पातयिष्यति ॥

rākṣasocchiṣṭabhugvipraḥ sapta pūrvānparānapi | narake raurave ghora sa pitṝnpātayiṣyati

राक्षस का जूठा खानेवाला ब्राह्मण अपने आगे और पीछे की सात-सात पीढ़ियों को तथा पितरों को भयानक रौरव नरक में गिरा देता है।

श्लोक 26 (14.109.26)

तस्मिन्नाचमनं कुर्याद्यस्मिन्पात्रे स भुक्तवान् । यद्युत्तिष्ठत्यनाचान्तो भुक्तवानासनात्ततः । स्नानं सद्यः प्रकुर्वीत सोन्यथाऽप्रयतो भवेत् ॥

tasminnācamanaṃ kuryādyasminpātre sa bhuktavān | yadyuttiṣṭhatyanācānto bhuktavānāsanāttataḥ | snānaṃ sadyaḥ prakurvīta sonyathā'prayato bhavet

जिस पात्र में उसने भोजन किया हो, उसी में आचमन करे। यदि बिना आचमन किए आसन से उठ जाए तो तुरंत स्नान करे; नहीं तो वह अपवित्र रहता है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 27 (14.109.27)

तृणमुष्टिविधानं च तृणमाहात्म्यमेव च । इक्षोः सोमसमुद्भूतिं वक्तुमर्हसि मानद ॥

tṛṇamuṣṭividhānaṃ ca tṛṇamāhātmyameva ca | ikṣoḥ somasamudbhūtiṃ vaktumarhasi mānada

हे मानद, अब आप मुझे तृणमुष्टि की विधि, तृण का माहात्म्य और ईख की सोम से उत्पत्ति बताइए।

भगवानुवाच

श्लोक 28 (14.109.28)

पितरो वृषभा ज्ञेया गावो लोकस्य मातरः । तासां तु पूजया राजन्पूजिताः पितृदेवताः ॥

pitaro vṛṣabhā jñeyā gāvo lokasya mātaraḥ | tāsāṃ tu pūjayā rājanpūjitāḥ pitṛdevatāḥ

पितरों को वृषभ और गौओं को लोक की माता जानना चाहिए। हे राजन्, उनकी पूजा करने से पितर और देवता पूजित होते हैं।

श्लोक 29 (14.109.29)

सभा प्रपा गृहाश्चापि देवतायतनानि च । शुद्ध्यन्ति शकृता यासां किं भूतमधिकं ततः ॥

sabhā prapā gṛhāścāpi devatāyatanāni ca | śuddhyanti śakṛtā yāsāṃ kiṃ bhūtamadhikaṃ tataḥ

सभा-भवन, प्याऊ, घर और देवालय जिनके गोबर से शुद्ध होते हैं, उनसे बढ़कर पवित्र और क्या है?

श्लोक 30 (14.109.30)

ग्रासमुष्टिं परगवे दद्यात्संवत्सरं तु यः । अकृत्वा स्वयमाहारं प्राप्तस्तत्सार्वकालिकम् ॥

grāsamuṣṭiṃ paragave dadyātsaṃvatsaraṃ tu yaḥ | akṛtvā svayamāhāraṃ prāptastatsārvakālikam

जो एक वर्ष तक पहले स्वयं भोजन किए बिना दूसरे की गौ को एक मुट्ठी चारा देता है, उसने वह व्रत पा लिया जो सब कालों के लिए है।

श्लोक 31 (14.109.31)

गावो मे मातरः सर्वाः पितरश्चैव गोवृषाः । ग्रासमुष्टिं मया दत्तं प्रतिगृह्णीत मातरः ॥

gāvo me mātaraḥ sarvāḥ pitaraścaiva govṛṣāḥ | grāsamuṣṭiṃ mayā dattaṃ pratigṛhṇīta mātaraḥ

"सब गौएँ मेरी माताएँ हैं और साँड़ मेरे पिता हैं। हे माताओ, मेरा दिया हुआ यह मुट्ठी भर चारा स्वीकार करो।"

श्लोक 32 (14.109.32)

इत्युक्त्वाऽनेन मन्त्रेण गायत्र्या वा समाहितः । अभिमन्त्र्य ग्रासमुष्टिं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

ityuktvā'nena mantreṇa gāyatryā vā samāhitaḥ | abhimantrya grāsamuṣṭiṃ tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

इस मंत्र से अथवा गायत्री से एकाग्र होकर इस प्रकार कहकर और चारे की मुट्ठी को अभिमंत्रित करके देनेवाले को जो पुण्यफल मिलता है, उसे सुनो।

श्लोक 33 (14.109.33)

यत्कृतं दुष्कृतं तेन ज्ञानतोऽज्ञानतोपि वा । तस्य नश्यति तत्सर्वं दुःस्वप्नं च विनश्यति ॥

yatkṛtaṃ duṣkṛtaṃ tena jñānato'jñānatopi vā | tasya naśyati tatsarvaṃ duḥsvapnaṃ ca vinaśyati

उसने जाने या अनजाने जो पाप किया हो, वह सब नष्ट हो जाता है और बुरे स्वप्न भी नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 34 (14.109.34)

तिलाः पवित्राः पापघ्ना नारायणसमुद्भवाः । तिलाञ्श्राद्धे प्रशंसन्ति दानमेतदनुत्तमम् ॥

tilāḥ pavitrāḥ pāpaghnā nārāyaṇasamudbhavāḥ | tilāñśrāddhe praśaṃsanti dānametadanuttamam

तिल पवित्र हैं, पापों का नाश करनेवाले हैं और नारायण से उत्पन्न हुए हैं। श्राद्ध में तिल की प्रशंसा की जाती है; यह दान अनुपम है।

श्लोक 35 (14.109.35)

तिलान्दद्यात्तिलान्भक्ष्यात्तिलान्प्रातरुपस्पृशेत् । तिलंतिलमिति ब्रूयात्तिलाः पापहरा हि ते ॥

tilāndadyāttilānbhakṣyāttilānprātarupaspṛśet | tilaṃtilamiti brūyāttilāḥ pāpaharā hi te

तिल दे, तिल खाए और प्रातःकाल तिल का स्पर्श करे; "तिल, तिल" कहे, क्योंकि तिल पापों को हरनेवाले हैं।

श्लोक 36 (14.109.36)

क्रीत्वा प्रतिगृहीत्वा वा न विक्रेया द्विजातिभिः । भोजनाभ्यञ्जनाद्दानाद्योन्यत्तु कुरुते तिलैः । कृमिर्भूत्वा श्वविष्ठायां पितृभिः सह मज्जति ॥

krītvā pratigṛhītvā vā na vikreyā dvijātibhiḥ | bhojanābhyañjanāddānādyonyattu kurute tilaiḥ | kṛmirbhūtvā śvaviṣṭhāyāṃ pitṛbhiḥ saha majjati

द्विजों को तिल खरीदकर या दान में पाकर बेचना नहीं चाहिए। जो भोजन, उबटन और दान के सिवा किसी और काम में तिल का उपयोग करता है, वह कुत्ते की विष्ठा में कीड़ा बनकर पितरों सहित डूबता है।

श्लोक 37 (14.109.37)

तिलान्नपीडयेद्विप्रो यन्त्रचक्रे स्वयं नृप । पीडयन्हि द्विजो मोहान्नरकं याति रौरवम् ॥

tilānnapīḍayedvipro yantracakre svayaṃ nṛpa | pīḍayanhi dvijo mohānnarakaṃ yāti rauravam

हे राजन्, ब्राह्मण स्वयं कोल्हू में तिल न पेरे; जो द्विज मोह से उन्हें पेरता है वह रौरव नरक में जाता है।

श्लोक 38 (14.109.38)

इक्षुवंशोद्भवः सोमः सोमवंशोद्भवा द्विजाः । इक्षुं न पीडयेत्तस्मादिक्षुघात्यात्मघातकः ॥

ikṣuvaṃśodbhavaḥ somaḥ somavaṃśodbhavā dvijāḥ | ikṣuṃ na pīḍayettasmādikṣughātyātmaghātakaḥ

सोम इक्षुवंश से उत्पन्न है और ब्राह्मण सोमवंश से उत्पन्न हैं। इसलिए ईख को न पेरे; ईख को नष्ट करनेवाला अपना ही नाश करनेवाला है।

श्लोक 39 (14.109.39)

इक्षुदण्डसहस्राणामेकैकेन युधिष्ठिर । ब्रह्महत्यामवाप्नोति द्विजश्चेद्यन्त्रपीडकः । तस्मान्न पीडयेदिक्षुं यन्त्रचक्रे द्विजोत्तमः ॥

ikṣudaṇḍasahasrāṇāmekaikena yudhiṣṭhira | brahmahatyāmavāpnoti dvijaścedyantrapīḍakaḥ | tasmānna pīḍayedikṣuṃ yantracakre dvijottamaḥ

हे युधिष्ठिर, यदि द्विज कोल्हू में ईख पेरे तो हजार डंठलों में से प्रत्येक के लिए उसे ब्रह्महत्या का पाप लगता है। इसलिए श्रेष्ठ द्विज कोल्हू में ईख न पेरे।

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