आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 110
आपद्धर्म, सुपात्र ब्राह्मण और गुरुओं के प्रति कर्तव्य
युधिष्ठिर आपत्काल के धर्म के विषय में पूछते हैं, और कृष्ण वे अवस्थाएँ बताते हैं जिनमें भोजन और प्रायश्चित्त के नियम शिथिल हो जाते हैं। फिर वे भोजन कराने योग्य और अयोग्य ब्राह्मणों का, निराश्रित मृत ब्राह्मण को ले जाने के फल का, पितृकर्म के उपयुक्त कालों का तथा परलोक की उपेक्षा करनेवाले धनिकों की गति का वर्णन करते हैं। अन्त में वे मनु द्वारा कहा गया धर्म का सार बताते हैं: पवित्र देश, सदाचार, संस्कार, और गुरु, उपाध्याय, आचार्य, पिता तथा माता के प्रति कर्तव्य।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (14.110.1)
समुच्चयं च धर्माणां भोज्याभोज्यं तथैव च । श्रुतं मया त्वत्प्रसादादापद्धर्मं ब्रवीहि मे ॥
samuccayaṃ ca dharmāṇāṃ bhojyābhojyaṃ tathaiva ca | śrutaṃ mayā tvatprasādādāpaddharmaṃ bravīhi me
आपकी कृपा से मैंने धर्मों का समुच्चय तथा भक्ष्य और अभक्ष्य का विधान सुन लिया है। अब मुझे आपद्धर्म बताइए।
भगवानुवाच
श्लोक 2 (14.110.2)
दुर्भिक्षे राष्ट्रसंबाधेऽप्याशौचे मृतसूतके । धर्मकालेऽध्वनि तथा नियमो येन लुप्यते ॥
durbhikṣe rāṣṭrasaṃbādhe'pyāśauce mṛtasūtake | dharmakāle'dhvani tathā niyamo yena lupyate
अकाल में, राष्ट्र पर संकट आने पर, जन्म और मृत्यु के अशौच में, धर्मकार्य के समय और यात्रा में नियम का पालन शिथिल हो जाता है।
श्लोक 3 (14.110.3)
दूराध्वगमनात्खिन्नो द्विजालाभेऽथ शूद्रतः । अकृतान्नं तु यत्किंचिद्गृह्णीयादात्मवृत्तये ॥
dūrādhvagamanātkhinno dvijālābhe'tha śūdrataḥ | akṛtānnaṃ tu yatkiṃcidgṛhṇīyādātmavṛttaye
लम्बी यात्रा से थका हुआ मनुष्य, यदि उसे कोई द्विज न मिले, तो अपना जीवन चलाने के लिए शूद्र से भी जो कुछ कच्चा अन्न मिले, ले सकता है।
श्लोक 4 (14.110.4)
आतुरो दुःखितो वाऽपि तथाऽऽर्तो वा बुभुक्षितः । भुञ्जन्नविधिना विप्रः प्रायश्चित्तीयते न च ॥
āturo duḥkhito vā'pi tathā''rto vā bubhukṣitaḥ | bhuñjannavidhinā vipraḥ prāyaścittīyate na ca
रोगी, दुःखी, पीड़ित अथवा भूखा ब्राह्मण यदि विधि के विरुद्ध भोजन कर ले, तो उसे प्रायश्चित्त नहीं लगता।
श्लोक 5 (14.110.5)
निमन्त्रितस्तु यो विप्रो विधिवद्धव्यकव्ययोः । मांसादीन्यपि भुञ्जानः प्रायश्चित्तीयते न च ॥
nimantritastu yo vipro vidhivaddhavyakavyayoḥ | māṃsādīnyapi bhuñjānaḥ prāyaścittīyate na ca
देवकार्य और पितृकार्य में विधिपूर्वक निमन्त्रित ब्राह्मण यदि मांस आदि भी खा ले, तो उसे प्रायश्चित्त नहीं लगता।
श्लोक 6 (14.110.6)
अष्टौ तान्यव्रतघ्नानि आपो मूलं घृतं पयः । हविर्ब्राह्मणकाम्या च गुरोर्वचनमौषधम् ॥
aṣṭau tānyavrataghnāni āpo mūlaṃ ghṛtaṃ payaḥ | havirbrāhmaṇakāmyā ca gurorvacanamauṣadham
ये आठ व्रत को भंग नहीं करते: जल, कन्द-मूल, घी, दूध, हविष्य, ब्राह्मण की इच्छा से किया गया भोजन, गुरु का वचन और औषधि।
श्लोक 7 (14.110.7)
अशक्तो विधिवत्कर्तुं प्रायश्चित्तानि यो नरः । विदुषां वचनेनापि दानेनापि विशुद्ध्यति ॥
aśakto vidhivatkartuṃ prāyaścittāni yo naraḥ | viduṣāṃ vacanenāpi dānenāpi viśuddhyati
जो मनुष्य विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करने में असमर्थ है, वह विद्वानों के वचन से अथवा दान से भी शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 8 (14.110.8)
अनृतावृतुकाले वा दिवा रात्रौ तथाऽपि वा । प्रोषितस्तु स्त्रियं गच्छेत्प्रायश्चित्तीयते न च ॥
anṛtāvṛtukāle vā divā rātrau tathā'pi vā | proṣitastu striyaṃ gacchetprāyaścittīyate na ca
परदेश से लौटा हुआ पुरुष यदि ऋतुकाल में या उससे बाहर, दिन में या रात में अपनी स्त्री के पास जाए, तो उसे प्रायश्चित्त नहीं लगता।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 9 (14.110.9)
प्रशस्याः कीदृशा विप्रा निन्द्याश्चापि सुरेश्वर । अष्टकायाश्च कः कालस्तन्मे कथय सुव्रत ॥
praśasyāḥ kīdṛśā viprā nindyāścāpi sureśvara | aṣṭakāyāśca kaḥ kālastanme kathaya suvrata
हे सुरेश्वर, कैसे ब्राह्मण प्रशंसा के योग्य हैं और कैसे निन्दा के योग्य? और अष्टका श्राद्ध का समय कौन-सा है? हे सुव्रत, यह मुझे बताइए।
भगवानुवाच
श्लोक 10 (14.110.10)
सत्यसन्धं द्विजं दृष्ट्वा स्थानाद्वेपति भास्करः । एष मे मण्डलं भित्त्वा याति ब्रह्म सनातनम् ॥
satyasandhaṃ dvijaṃ dṛṣṭvā sthānādvepati bhāskaraḥ | eṣa me maṇḍalaṃ bhittvā yāti brahma sanātanam
सत्यप्रतिज्ञ ब्राह्मण को देखकर सूर्य अपने स्थान पर काँप उठते हैं, यह सोचकर कि "यह मेरे मण्डल को भेदकर सनातन ब्रह्म को चला जाएगा।"
श्लोक 11 (14.110.11)
कुलीनः कर्मकृद्वैद्यस्तथा चाप्यानृशंस्यवान् । श्रीमानृजुः सत्यवादी पात्रं सर्व इमे द्विजाः ॥
kulīnaḥ karmakṛdvaidyastathā cāpyānṛśaṃsyavān | śrīmānṛjuḥ satyavādī pātraṃ sarva ime dvijāḥ
कुलीन, कर्मनिष्ठ, विद्वान्, क्रूरता से रहित, श्रीमान्, सरल और सत्यवादी: ये सब ब्राह्मण सुपात्र हैं।
श्लोक 12 (14.110.12)
एते चाग्रासनस्थास्ते भुञ्जानाः प्रथमं द्विजाः । तस्यां पङ्क्त्यां तु ये वान्ये तान्पुनत्येव दर्शनात् ॥
ete cāgrāsanasthāste bhuñjānāḥ prathamaṃ dvijāḥ | tasyāṃ paṅktyāṃ tu ye vānye tānpunatyeva darśanāt
ये ब्राह्मण प्रथम आसनों पर बैठकर सबसे पहले भोजन करते हुए, उस पंक्ति में बैठे अन्य सब लोगों को अपने दर्शन मात्र से पवित्र कर देते हैं।
श्लोक 13 (14.110.13)
मद्भक्ता ये द्विजश्रेष्ठा मद्भक्ता मत्परायणाः । तान्पङ्क्तिपावनान्विद्धि पूज्यांश्चैव विशेषतः ॥
madbhaktā ye dvijaśreṣṭhā madbhaktā matparāyaṇāḥ | tānpaṅktipāvanānviddhi pūjyāṃścaiva viśeṣataḥ
जो श्रेष्ठ ब्राह्मण मेरे भक्त हैं, मेरे भक्त और मुझे ही परम आश्रय माननेवाले हैं, उन्हें पंक्ति को पवित्र करनेवाला और विशेष रूप से पूजनीय जानो।
श्लोक 14 (14.110.14)
निन्द्याञ्शृणु द्विजान्राजन्नपि वा वेदपारगान् । ब्राह्मणच्छद्मना लोके चरतः पापकारिणः ॥
nindyāñśṛṇu dvijānrājannapi vā vedapāragān | brāhmaṇacchadmanā loke carataḥ pāpakāriṇaḥ
हे राजन्, अब उन ब्राह्मणों के विषय में सुनो जो निन्दनीय हैं, चाहे वे वेदों के पारंगत ही क्यों न हों: जो ब्राह्मण का वेष धारण करके संसार में विचरते और पाप करते हैं।
श्लोक 15 (14.110.15)
अनग्निरनधीयानः प्रतिग्रहरुचिस्तु यः । यतस्ततस्तु भुञ्जानस्तं विद्याद्ब्रह्मदूषकम् ॥
anagniranadhīyānaḥ pratigraharucistu yaḥ | yatastatastu bhuñjānastaṃ vidyādbrahmadūṣakam
जो अग्नि की स्थापना नहीं करता, अध्ययन नहीं करता, दान लेने में रुचि रखता है और जहाँ-तहाँ भोजन करता है, उसे ब्राह्मणों को दूषित करनेवाला जानो।
श्लोक 16 (14.110.16)
मृतसूतकपुष्टाङ्गो यश्च शूद्रान्नभुग्द्विजः । अहं चापि न जानामि गतिं तस्य नराधिप ॥
mṛtasūtakapuṣṭāṅgo yaśca śūdrānnabhugdvijaḥ | ahaṃ cāpi na jānāmi gatiṃ tasya narādhipa
जो द्विज मरण या जन्म के अशौचवाले घर के अन्न से पुष्ट शरीरवाला है अथवा शूद्र का अन्न खाता है, हे नरेश्वर, उसकी गति मैं भी नहीं जानता।
श्लोक 17 (14.110.17)
शूद्रान्नरसपुष्टाङ्गोऽप्यधीयानो हि नित्यशः । जपतो जुह्वतो वाऽपि गतिरूर्ध्वं न विद्यते ॥
śūdrānnarasapuṣṭāṅgo'pyadhīyāno hi nityaśaḥ | japato juhvato vā'pi gatirūrdhvaṃ na vidyate
जिसका शरीर शूद्र के अन्न के रस से पुष्ट हुआ है, वह प्रतिदिन अध्ययन करे और जप तथा होम भी करे, तो भी उसकी ऊर्ध्व गति नहीं होती।
श्लोक 18 (14.110.18)
आहिताग्निश्च यो विप्रः शूद्रान्नान्न निवर्तते । पञ्च तस्य प्रणश्यन्ति आत्मा ब्रह्म त्रयोऽग्नयः ॥
āhitāgniśca yo vipraḥ śūdrānnānna nivartate | pañca tasya praṇaśyanti ātmā brahma trayo'gnayaḥ
जो अग्निहोत्री ब्राह्मण शूद्र के अन्न से निवृत्त नहीं होता, उसके पाँच नष्ट हो जाते हैं: आत्मा, ब्रह्म और तीनों अग्नियाँ।
श्लोक 19 (14.110.19)
शूद्रप्रेषणकर्तुश्च ब्राह्मणस्य विशेषतः । भूमावन्नं प्रदातव्यं श्वसृगालसमो हि सः ॥
śūdrapreṣaṇakartuśca brāhmaṇasya viśeṣataḥ | bhūmāvannaṃ pradātavyaṃ śvasṛgālasamo hi saḥ
जो ब्राह्मण शूद्र का प्रेषण (दूत का कार्य) करता है, उसे विशेष रूप से भूमि पर अन्न देना चाहिए; वह कुत्ते और सियार के समान है।
श्लोक 20 (14.110.20)
प्रेतभूतं तु यः शूद्रं ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः । अनुगच्छेन्नीयमानं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥
pretabhūtaṃ tu yaḥ śūdraṃ brāhmaṇo jñānadurbalaḥ | anugacchennīyamānaṃ trirātramaśucirbhavet
जो ज्ञान में दुर्बल ब्राह्मण ले जाए जाते हुए मृत शूद्र के पीछे चलता है, वह तीन रात तक अशुद्ध रहता है।
श्लोक 21 (14.110.21)
त्रिरात्रे तु ततः पूर्णे नदीं गत्वा समुद्रगाम् । प्राणायामशतं कृत्वा घृतं प्राश्य विशुद्ध्यति ॥
trirātre tu tataḥ pūrṇe nadīṃ gatvā samudragām | prāṇāyāmaśataṃ kṛtvā ghṛtaṃ prāśya viśuddhyati
तीन रात पूरी होने पर वह समुद्र में मिलनेवाली नदी पर जाकर सौ प्राणायाम करे और घी का प्राशन करे; इससे वह शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 22 (14.110.22)
अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजोत्तमाः । पदेपदेऽश्वमेधस्य फलं ते प्राप्नुवन्ति हि ॥
anāthaṃ brāhmaṇaṃ pretaṃ ye vahanti dvijottamāḥ | padepade'śvamedhasya phalaṃ te prāpnuvanti hi
जो श्रेष्ठ द्विज किसी अनाथ ब्राह्मण के शव को उठाकर ले जाते हैं, वे पग-पग पर अश्वमेध यज्ञ का फल पाते हैं।
श्लोक 23 (14.110.23)
न तेषामशुभं किंचित्पापं वा शुभकर्मणाम् । जलावगाहनादेव सद्यः शौचं विधीयते ॥
na teṣāmaśubhaṃ kiṃcitpāpaṃ vā śubhakarmaṇām | jalāvagāhanādeva sadyaḥ śaucaṃ vidhīyate
उन शुभ कर्म करनेवालों के लिए कुछ भी अशुभ अथवा पाप नहीं होता; केवल जल में स्नान करने से ही उनकी तत्काल शुद्धि विहित है।
श्लोक 24 (14.110.24)
शूद्रवेश्मनि विप्रेण क्षीरं वा यदि वा दधि । निवृत्तेन न भोक्तव्यं विद्धि शूद्रान्नमेव तत् ॥
śūdraveśmani vipreṇa kṣīraṃ vā yadi vā dadhi | nivṛttena na bhoktavyaṃ viddhi śūdrānnameva tat
शूद्र के घर में दूध या दही भी, जिस ब्राह्मण को आवश्यकता न हो, उसे नहीं खाना चाहिए; उसे शूद्र का अन्न ही जानो।
श्लोक 25 (14.110.25)
विप्राणां भोक्तुकामानामत्यन्तं चान्नकाङ्क्षिणाम् । यो विघ्नं कुरुते मर्त्यस्ततो नान्योस्ति पापकृत् ॥
viprāṇāṃ bhoktukāmānāmatyantaṃ cānnakāṅkṣiṇām | yo vighnaṃ kurute martyastato nānyosti pāpakṛt
जो मनुष्य भोजन की इच्छा रखनेवाले और अन्न के लिए अत्यन्त उत्सुक ब्राह्मणों के भोजन में विघ्न डालता है, उससे बढ़कर पापी दूसरा कोई नहीं।
श्लोक 26 (14.110.26)
सर्वे च वेदाः सहषड्भिरङ्गैः । साङ्ख्यं पुराणं च कुले च जन्म । नैतानि सर्वाणि गतिर्भवन्ति । शीलव्यपेतस्य नृप द्विजस्य ॥
sarve ca vedāḥ sahaṣaḍbhiraṅgaiḥ | sāṅkhyaṃ purāṇaṃ ca kule ca janma | naitāni sarvāṇi gatirbhavanti | śīlavyapetasya nṛpa dvijasya
छहों अंगों सहित सारे वेद, सांख्य, पुराण और उत्तम कुल में जन्म: हे राजन्, शील से रहित ब्राह्मण के लिए इनमें से कोई भी गति (आश्रय) नहीं बनता।
श्लोक 27 (14.110.27)
ग्रहोपरागे विषुवेऽयनान्ते । पित्र्ये मघासु स्वसुते च जाते । गयेषु पिण्डेषु च पाण्डुपुत्र । दत्तं भवेन्निष्कसहस्रतुल्यम् ॥
grahoparāge viṣuve'yanānte | pitrye maghāsu svasute ca jāte | gayeṣu piṇḍeṣu ca pāṇḍuputra | dattaṃ bhavenniṣkasahasratulyam
ग्रहण के समय, विषुव में, अयन के अन्त में, मघा नक्षत्र में पितृकर्म के समय, अपने पुत्र के जन्म पर और गया में पिण्डदान के समय, हे पाण्डुपुत्र, दिया हुआ दान एक हज़ार निष्क (स्वर्ण-मुद्राओं) के बराबर होता है।
श्लोक 28 (14.110.28)
वैशाखमासस्य तु या तृतीयाऽ । नवद्याऽसौ कार्तिकशुक्लपक्षे । नभस्यमासस्य च कृष्णपक्षे । त्रयोदशी पञ्चदशी न माघे ॥
vaiśākhamāsasya tu yā tṛtīyā' | navadyā'sau kārtikaśuklapakṣe | nabhasyamāsasya ca kṛṣṇapakṣe | trayodaśī pañcadaśī na māghe
वैशाख मास की तृतीया निर्दोष है; इसी प्रकार कार्तिक के शुक्ल पक्ष की तिथि भी; और नभस्य मास के कृष्ण पक्ष में त्रयोदशी और पञ्चदशी, माघ में नहीं।
श्लोक 29 (14.110.29)
उपप्लवे चन्द्रमसो रवेश्च । श्राद्धस्य कालो ह्ययनद्वये च । रहस्यमेतत्पितरो वदन्ति ॥
upaplave candramaso raveśca | śrāddhasya kālo hyayanadvaye ca | rahasyametatpitaro vadanti
चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण में तथा दोनों अयनों में श्राद्ध का काल होता है। यह रहस्य पितर बताते हैं।
श्लोक 30 (14.110.30)
यस्त्वेकपङ्क्त्यां विषमं ददाति । स्नेहाद्भयाद्वा यदि वाऽर्थहेतोः । क्रूरं दुराचारमनात्मवन्तं । ब्रह्मघ्नमेनं कवयो वदन्ति ॥
yastvekapaṅktyāṃ viṣamaṃ dadāti | snehādbhayādvā yadi vā'rthahetoḥ | krūraṃ durācāramanātmavantaṃ | brahmaghnamenaṃ kavayo vadanti
जो एक ही पंक्ति में स्नेह, भय अथवा धन के लोभ से विषम (भेदभावपूर्ण) दान देता है, उस क्रूर, दुराचारी और असंयमी को ज्ञानी लोग ब्रह्मघाती कहते हैं।
श्लोक 31 (14.110.31)
धनानि येषां विपुलानि सन्ति । नित्यं रमन्ते परलोकमूढाः । तेषामयं शत्रुवरघ्नलोको । नान्यत्सुखं देहसुखे रतानाम् ॥
dhanāni yeṣāṃ vipulāni santi | nityaṃ ramante paralokamūḍhāḥ | teṣāmayaṃ śatruvaraghnaloko | nānyatsukhaṃ dehasukhe ratānām
जिनके पास विपुल धन है और जो परलोक के विषय में मूढ़ होकर सदा भोग में रमते हैं, उनके लिए केवल यही लोक है, हे शत्रुओं में श्रेष्ठ को मारनेवाले; देह के सुख में लगे हुए लोगों के लिए अन्य कोई सुख नहीं है।
श्लोक 32 (14.110.32)
ये चैव मुक्तास्तपसि प्रयुक्ताः । स्वाध्यायशीला जरयन्ति देहम् । जितेन्द्रिया भूतहिते निविष्ट । स्तेषामसौ चापि परश्च लोकः ॥
ye caiva muktāstapasi prayuktāḥ | svādhyāyaśīlā jarayanti deham | jitendriyā bhūtahite niviṣṭa | steṣāmasau cāpi paraśca lokaḥ
किन्तु जो आसक्ति से मुक्त होकर तप में लगे हैं, स्वाध्याय में रत रहकर देह को क्षीण करते हैं, इन्द्रियों को जीत चुके हैं और प्राणियों के हित में तत्पर हैं, उनके लिए यह लोक भी है और परलोक भी।
श्लोक 33 (14.110.33)
ये चैव विद्यां न तपो न दानं । न चापि मूढाः प्रजने यतन्ते । न चापि गच्छन्ति सुखानि भोगां । स्तेषामयं चापि परश्च नास्ति ॥
ye caiva vidyāṃ na tapo na dānaṃ | na cāpi mūḍhāḥ prajane yatante | na cāpi gacchanti sukhāni bhogāṃ | steṣāmayaṃ cāpi paraśca nāsti
जो न विद्या के लिए, न तप के लिए, न दान के लिए यत्न करते हैं, जो मूढ़ होकर सन्तान के लिए भी प्रयत्न नहीं करते और सुख-भोग भी नहीं पाते, उनके लिए न यह लोक है, न परलोक।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 34 (14.110.34)
नारायण पुराणेश लोकावास नमोस्तु ते । श्रोतुमिच्छामि कार्त्स्न्येन धर्मसारसमुच्चयम् ॥
nārāyaṇa purāṇeśa lokāvāsa namostu te | śrotumicchāmi kārtsnyena dharmasārasamuccayam
हे नारायण, हे पुराणों के ईश्वर, हे लोकों के आश्रय, आपको नमस्कार है। मैं धर्म के सार का सम्पूर्ण समुच्चय सुनना चाहता हूँ।
भगवानुवाच
श्लोक 35 (14.110.35)
धर्मसारं महाप्राज्ञ मनुना प्रोक्तमादितः । प्रवक्ष्यामि मनुप्रोक्तं पौराणं श्रुतिसंहितम् ॥
dharmasāraṃ mahāprājña manunā proktamāditaḥ | pravakṣyāmi manuproktaṃ paurāṇaṃ śrutisaṃhitam
हे महाप्राज्ञ, धर्म का सार आरम्भ में मनु ने कहा था। मैं तुम्हें वही मनु का कहा हुआ पुरातन उपदेश बताऊँगा, जो श्रुति के अनुरूप है।
श्लोक 36 (14.110.36)
अग्निचित्कपिला सत्री राजा भिक्षुर्महोदधिः । दृष्टमात्रात्पुनत्येते तस्मात्पश्येत तान्सदा ॥
agnicitkapilā satrī rājā bhikṣurmahodadhiḥ | dṛṣṭamātrātpunatyete tasmātpaśyeta tānsadā
अग्निचयन करनेवाला, कपिला गाय, सत्र करनेवाला, राजा, भिक्षु और महासागर: ये दृष्टि पड़ने मात्र से पवित्र करते हैं; इसलिए इन्हें सदा देखना चाहिए।
श्लोक 37 (14.110.37)
गौरेकस्यैव दातव्या न बहूनां युधिष्ठिर । सा गौर्विक्रयमापन्ना दहत्यासप्तमं कुलम् ॥
gaurekasyaiva dātavyā na bahūnāṃ yudhiṣṭhira | sā gaurvikrayamāpannā dahatyāsaptamaṃ kulam
हे युधिष्ठिर, गाय एक ही व्यक्ति को देनी चाहिए, बहुतों को नहीं। वह गाय यदि बेच दी जाए तो सातवीं पीढ़ी तक कुल को जला देती है।
श्लोक 38 (14.110.38)
बहूनां न प्रदातव्या गौर्वस्त्रं शयनं स्त्रियः । तादृग्भूतं तु तद्दानं दातारं नोपतिष्ठति ॥
bahūnāṃ na pradātavyā gaurvastraṃ śayanaṃ striyaḥ | tādṛgbhūtaṃ tu taddānaṃ dātāraṃ nopatiṣṭhati
गाय, वस्त्र, शय्या और स्त्री बहुतों को नहीं देनी चाहिए; ऐसा दान देनेवाले के काम नहीं आता।
श्लोक 39 (14.110.39)
आक्रम्य ब्राह्मणैर्भुक्तमनार्याणां च वेश्मनि । गोभिश्च पुण्यं तत्तेषां राजसूयाद्विशिष्यते ॥
ākramya brāhmaṇairbhuktamanāryāṇāṃ ca veśmani | gobhiśca puṇyaṃ tatteṣāṃ rājasūyādviśiṣyate
अनार्यों के घर में बलपूर्वक पहुँचकर ब्राह्मणों ने जो भोजन किया हो, उसका तथा गौओं के द्वारा प्राप्त उनका वह पुण्य राजसूय यज्ञ से भी बढ़कर है।
श्लोक 40 (14.110.40)
मा ददात्विति यो ब्रूयाद्ब्राह्मणेषु च गोषु च । तिर्यग्योनिशतं गत्वा चण्डालेषूपजायते ॥
mā dadātviti yo brūyādbrāhmaṇeṣu ca goṣu ca | tiryagyoniśataṃ gatvā caṇḍāleṣūpajāyate
जो ब्राह्मणों और गौओं के विषय में कहता है कि "मत दो", वह सौ पशुयोनियों में भटककर चाण्डालों में जन्म लेता है।
श्लोक 41 (14.110.41)
ब्राह्मणस्वं च यद्दैवं दरिद्रस्यैव यद्धनम् । गुरोश्चापि हृतं राजन्स्वर्गस्थानपि पातयेत् ॥
brāhmaṇasvaṃ ca yaddaivaṃ daridrasyaiva yaddhanam | guroścāpi hṛtaṃ rājansvargasthānapi pātayet
ब्राह्मण का धन, देवता का धन, निर्धन का धन अथवा गुरु का धन, हे राजन्, यदि हर लिया जाए तो वह स्वर्ग में स्थित व्यक्ति को भी नीचे गिरा देता है।
श्लोक 42 (14.110.42)
धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः । द्वितीयं धर्मशास्त्राणि तृतीयं लोकसंग्रहः ॥
dharmaṃ jijñāsamānānāṃ pramāṇaṃ paramaṃ śrutiḥ | dvitīyaṃ dharmaśāstrāṇi tṛtīyaṃ lokasaṃgrahaḥ
धर्म को जानने की इच्छा रखनेवालों के लिए सबसे बड़ा प्रमाण श्रुति है, दूसरा धर्मशास्त्र और तीसरा लोकव्यवहार।
श्लोक 43 (14.110.43)
आसमुद्राच्च यत्पूर्वादासमुद्राच्च पश्चिमात् । हिमाद्रिविन्ध्ययोर्मध्यमार्यावर्तं प्रचक्षते ॥
āsamudrācca yatpūrvādāsamudrācca paścimāt | himādrivindhyayormadhyamāryāvartaṃ pracakṣate
पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्र तक, हिमालय और विन्ध्य के बीच का प्रदेश आर्यावर्त कहलाता है।
श्लोक 44 (14.110.44)
सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् । तद्देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ॥
sarasvatīdṛṣadvatyordevanadyoryadantaram | taddevanirmitaṃ deśaṃ brahmāvartaṃ pracakṣate
सरस्वती और दृषद्वती इन दोनों देवनदियों के बीच का देवनिर्मित प्रदेश ब्रह्मावर्त कहलाता है।
श्लोक 45 (14.110.45)
यस्मिन्देशे य आचारः पारंपर्यक्रमागतः । वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ॥
yasmindeśe ya ācāraḥ pāraṃparyakramāgataḥ | varṇānāṃ sāntarālānāṃ sa sadācāra ucyate
जिस देश में वर्णों और मिश्र वर्णों का जो आचार परम्परा के क्रम से चला आया है, वह सदाचार कहलाता है।
श्लोक 46 (14.110.46)
कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पाञ्चालाः शूरसेनयः । एते ब्रह्मर्षिदेशास्तु ब्रह्मावर्तादनन्तराः ॥
kurukṣetraṃ ca matsyāśca pāñcālāḥ śūrasenayaḥ | ete brahmarṣideśāstu brahmāvartādanantarāḥ
कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पाञ्चाल और शूरसेन: ये ब्रह्मावर्त के बाद आनेवाले ब्रह्मर्षि-देश हैं।
श्लोक 47 (14.110.47)
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं चारित्रं च गृह्णीयुः पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥
etaddeśaprasūtasya sakāśādagrajanmanaḥ | svaṃ cāritraṃ ca gṛhṇīyuḥ pṛthivyāṃ sarvamānavāḥ
इन देशों में उत्पन्न ब्राह्मण से पृथ्वी के सब मनुष्य अपना-अपना आचरण सीखें।
श्लोक 48 (14.110.48)
हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यं यत्प्राग्विशसनादपि । प्रत्यगेव प्रयागात्तु मध्यदेशः प्रकीर्तितः ॥
himavadvindhyayormadhyaṃ yatprāgviśasanādapi | pratyageva prayāgāttu madhyadeśaḥ prakīrtitaḥ
हिमालय और विन्ध्य के बीच, विशसन के पूर्व और प्रयाग के पश्चिम का प्रदेश मध्यदेश कहा गया है।
श्लोक 49 (14.110.49)
कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः । स ज्ञेयो याज्ञिको देशो म्लेच्छदेशस्ततः परम् ॥
kṛṣṇasārastu carati mṛgo yatra svabhāvataḥ | sa jñeyo yājñiko deśo mlecchadeśastataḥ param
जिस देश में कृष्णसार मृग स्वभाव से विचरता है, उसे यज्ञ के योग्य देश जानना चाहिए; उसके आगे म्लेच्छों का देश है।
श्लोक 50 (14.110.50)
एतान्विज्ञाय देशांस्तु संश्रयेरन्द्विजातयः । शूद्रस्तु यस्मिन्कस्मिन्वा निवसेद्वृत्तिकर्शितः ॥
etānvijñāya deśāṃstu saṃśrayerandvijātayaḥ | śūdrastu yasminkasminvā nivasedvṛttikarśitaḥ
इन देशों को जानकर द्विजातियों को इन्हीं में निवास करना चाहिए; किन्तु आजीविका से क्षीण हुआ शूद्र जिस किसी देश में भी रह सकता है।
श्लोक 51 (14.110.51)
आचारः प्रथमो धर्मो ह्यहिंसा सत्यमेव च । दानं चैव यथाशक्ति नियमाश्च यमैः सह ॥
ācāraḥ prathamo dharmo hyahiṃsā satyameva ca | dānaṃ caiva yathāśakti niyamāśca yamaiḥ saha
आचार पहला धर्म है; उसके साथ अहिंसा, सत्य, यथाशक्ति दान, तथा यमों सहित नियम भी धर्म हैं।
श्लोक 52 (14.110.52)
वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् । कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ॥
vaidikaiḥ karmabhiḥ puṇyairniṣekādirdvijanmanām | kāryaḥ śarīrasaṃskāraḥ pāvanaḥ pretya ceha ca
द्विजों के शरीर का संस्कार पवित्र वैदिक कर्मों से निषेक (गर्भाधान) आदि से आरम्भ करके करना चाहिए; वह इस लोक में और परलोक में पवित्र करनेवाला है।
श्लोक 53 (14.110.53)
गर्भहोमैर्जातकर्मनामचौलोपनायनैः । स्वाध्यायैस्तद्व्रतैश्चैव विवाहस्नातकव्रतैः । महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥
garbhahomairjātakarmanāmacaulopanāyanaiḥ | svādhyāyaistadvrataiścaiva vivāhasnātakavrataiḥ | mahāyajñaiśca yajñaiśca brāhmīyaṃ kriyate tanuḥ
गर्भ-संस्कार, जातकर्म, नामकरण, चूड़ाकरण और उपनयन से, वेदाध्ययन और उसके व्रतों से, विवाह और स्नातक-व्रतों से तथा महायज्ञों और अन्य यज्ञों से यह शरीर ब्रह्म के योग्य बनाया जाता है।
श्लोक 54 (14.110.54)
धर्मार्थौ यदि न स्यातां शुश्रुषा वाऽपि तद्विधा । विद्या तस्मिन्नवप्तव्या शुभं बीजमिवोषरे ॥
dharmārthau yadi na syātāṃ śuśruṣā vā'pi tadvidhā | vidyā tasminnavaptavyā śubhaṃ bījamivoṣare
यदि किसी में न धर्म हो, न अर्थ, और न वैसी सेवा ही, तो उसमें विद्या नहीं बोनी चाहिए, जैसे ऊसर भूमि में अच्छा बीज नहीं बोया जाता।
श्लोक 55 (14.110.55)
लौकिकं वैदिकं वाऽपि तथाऽऽध्यात्मिकमेव वा । यस्माज्ज्ञानमिदं प्राप्तं तं पूर्वमभिवादयेत् ॥
laukikaṃ vaidikaṃ vā'pi tathā''dhyātmikameva vā | yasmājjñānamidaṃ prāptaṃ taṃ pūrvamabhivādayet
जिससे यह ज्ञान प्राप्त हुआ हो, चाहे वह लौकिक हो, वैदिक हो या आध्यात्मिक, उसे सबसे पहले प्रणाम करना चाहिए।
श्लोक 56 (14.110.56)
सव्येन सव्यं संगृह्य दक्षिणेन तु दक्षिणम् । न कुर्यादेकहस्तेन गुरोः पादाभिवादनम् ॥
savyena savyaṃ saṃgṛhya dakṣiṇena tu dakṣiṇam | na kuryādekahastena guroḥ pādābhivādanam
बाएँ हाथ से बायाँ पैर और दाएँ हाथ से दायाँ पैर पकड़कर प्रणाम करना चाहिए; गुरु के चरणों को एक हाथ से प्रणाम नहीं करना चाहिए।
श्लोक 57 (14.110.57)
निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि । अध्यापयति चैवेनं स विप्रो गुरुरुच्यते ॥
niṣekādīni karmāṇi yaḥ karoti yathāvidhi | adhyāpayati caivenaṃ sa vipro gururucyate
जो ब्राह्मण विधिपूर्वक निषेक आदि कर्म कराता है और बालक को पढ़ाता भी है, वह गुरु कहलाता है।
श्लोक 58 (14.110.58)
कृत्वोपनयनं वेदान्योध्यापयति नित्यशः । सकल्पान्सरहस्यांश्च स चोपाध्याय उच्यते ॥
kṛtvopanayanaṃ vedānyodhyāpayati nityaśaḥ | sakalpānsarahasyāṃśca sa copādhyāya ucyate
जो उपनयन कराकर कल्पसूत्रों और रहस्यों सहित नित्य वेदों का अध्यापन करता है, वह उपाध्याय कहलाता है।
श्लोक 59 (14.110.59)
साङ्गांश्च वेदानध्याप्य शिक्षयित्वा व्रतानि च । विवृणोति च मन्त्रार्थानाचार्यः सोभिधीयते ॥
sāṅgāṃśca vedānadhyāpya śikṣayitvā vratāni ca | vivṛṇoti ca mantrārthānācāryaḥ sobhidhīyate
जो अंगों सहित वेद पढ़ाकर और व्रतों की शिक्षा देकर मन्त्रों के अर्थ का विवेचन करता है, वह आचार्य कहलाता है।
श्लोक 60 (14.110.60)
उपाध्यायाद्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता । पितुः शतगुणं माता गौरवेणातिरिच्यते ॥
upādhyāyāddaśācārya ācāryāṇāṃ śataṃ pitā | pituḥ śataguṇaṃ mātā gauraveṇātiricyate
एक आचार्य दस उपाध्यायों के बराबर है, पिता सौ आचार्यों के बराबर है, और माता गौरव में पिता से सौ गुनी बढ़कर है।
श्लोक 61 (14.110.61)
एतेषामपि सर्वेषां गरीयान्ज्ञानदो गुरुः । गुरोः परतरं किंचिन्न भूतं न भविष्यति ॥
eteṣāmapi sarveṣāṃ garīyānjñānado guruḥ | guroḥ parataraṃ kiṃcinna bhūtaṃ na bhaviṣyati
इन सबमें भी ज्ञान देनेवाला गुरु सबसे महान् है; गुरु से बढ़कर कुछ न हुआ है, न होगा।
श्लोक 62 (14.110.62)
तस्मात्तेषां वशे तिष्ठेच्छुश्रूषापरमो भवेत् । अवमानाद्धि तेषां तु नरकं स्यान्न संशयः ॥
tasmātteṣāṃ vaśe tiṣṭhecchuśrūṣāparamo bhavet | avamānāddhi teṣāṃ tu narakaṃ syānna saṃśayaḥ
इसलिए उनके अधीन रहे और उनकी सेवा में तत्पर रहे; उनके अपमान से निस्सन्देह नरक की प्राप्ति होती है।
श्लोक 63 (14.110.63)
हीनाङ्गानतिरिक्ताङ्गान्विद्याहीनान्वयोधिकान् । रूपद्रविणहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत् ॥
hīnāṅgānatiriktāṅgānvidyāhīnānvayodhikān | rūpadraviṇahīnāṃśca jātihīnāṃśca nākṣipet
अंगहीन, अधिक अंगवाले, विद्याहीन, अधिक आयुवाले, रूप या धन से हीन तथा नीच जाति के लोगों का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।
श्लोक 64 (14.110.64)
शपता यत्कृतं पुण्यं शप्यमानं तु गच्छति । शप्यमानस्य यत्पापं शपन्तमनुगच्छति ॥
śapatā yatkṛtaṃ puṇyaṃ śapyamānaṃ tu gacchati | śapyamānasya yatpāpaṃ śapantamanugacchati
शाप देनेवाले का कमाया हुआ पुण्य शाप पानेवाले को चला जाता है, और शाप पानेवाले का पाप शाप देनेवाले के पीछे लग जाता है।
श्लोक 65 (14.110.65)
नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् । द्वेषं डंभं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं विवर्जयेत् ॥
nāstikyaṃ vedanindāṃ ca devatānāṃ ca kutsanam | dveṣaṃ ḍaṃbhaṃ ca mānaṃ ca krodhaṃ taikṣṇyaṃ vivarjayet
नास्तिकता, वेदों की निन्दा, देवताओं का अपमान, द्वेष, दम्भ, अभिमान, क्रोध और कठोरता का त्याग करना चाहिए।