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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 111

अग्निहोत्र: तीन अग्नियाँ, उनके नाम और उनका फल

युधिष्ठिर कृष्ण से अग्निहोत्र के विषय में पूछते हैं: प्रत्येक वर्ण उसे कैसे करे, अग्नि की स्थापना कब हो, और उसकी उपेक्षा करनेवालों का क्या होता है। कृष्ण बताते हैं कि अग्नि की सृष्टि उनके अपने मुख से हुई, और गार्हपत्य, दक्षिण, आहवनीय, आवसथ्य तथा सभ्य अग्नियों के नाम, रूप और स्थापना की ऋतुएँ समझाते हैं। वे कहते हैं कि वेद, विद्याएँ, पशु और सारा जगत् अग्निहोत्र के लिए ही हैं, यज्ञ में पशु का पक्ष लेते हैं, और अग्निहोत्रियों को मिलनेवाले स्वर्ग तथा उसका तिरस्कार करनेवालों के नरक का वर्णन करते हैं।

अध्याय 110अध्याय-सूचीअध्याय 112

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (14.111.1)

स्वभक्तस्य हृषीकेश धर्माधर्ममजानतः । धर्मं पुण्यतमं देव पृच्छतः कथयस्व मे ॥

svabhaktasya hṛṣīkeśa dharmādharmamajānataḥ | dharmaṃ puṇyatamaṃ deva pṛcchataḥ kathayasva me

हे हृषीकेश, मैं आपका भक्त हूँ और धर्म-अधर्म को नहीं जानता। हे देव, मैं पूछ रहा हूँ; मुझे सबसे पुण्यप्रद धर्म बताइए।

भगवानुवाच

श्लोक 2 (14.111.2)

यदेतदग्निहोत्रं वै सृष्टं वर्णत्रयस्य तु । मन्त्रवद्यद्धुतं सम्यग्विधिना चाप्युपासितम् । आहिताग्निं नयत्यूर्ध्वं सपत्नीकं सबान्धवम् ॥

yadetadagnihotraṃ vai sṛṣṭaṃ varṇatrayasya tu | mantravadyaddhutaṃ samyagvidhinā cāpyupāsitam | āhitāgniṃ nayatyūrdhvaṃ sapatnīkaṃ sabāndhavam

तीनों वर्णों के लिए रचा गया यह अग्निहोत्र, जब मन्त्रों के साथ भली-भाँति होम किया जाता है और विधि से उसकी उपासना की जाती है, तब अग्नि की स्थापना करनेवाले को उसकी पत्नी और बन्धुओं सहित ऊपर के लोकों में ले जाता है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 3 (14.111.3)

कथं तद्ब्राह्मणैर्देव होतव्यं क्षत्रियैः कथम् । वैश्यैर्वा देवदेवेश कथं वा सुहुतं भवेत् ॥

kathaṃ tadbrāhmaṇairdeva hotavyaṃ kṣatriyaiḥ katham | vaiśyairvā devadeveśa kathaṃ vā suhutaṃ bhavet

हे देव, ब्राह्मण इसका होम कैसे करें और क्षत्रिय कैसे? अथवा हे देवदेवेश, वैश्य कैसे करें, जिससे होम भली-भाँति सम्पन्न हो?

श्लोक 4 (14.111.4)

कस्मिन्काले कथं कस्य आधेयोऽग्निः सुरोत्तम । आहितस्य कथं वाऽपि सम्यगाचरणं भवेत् ॥

kasminkāle kathaṃ kasya ādheyo'gniḥ surottama | āhitasya kathaṃ vā'pi samyagācaraṇaṃ bhavet

हे सुरोत्तम, किस समय, किस प्रकार और किसके द्वारा अग्नि की स्थापना करनी चाहिए? और अग्नि स्थापित करनेवाले का सम्यक् आचरण कैसा होना चाहिए?

श्लोक 5 (14.111.5)

कत्यग्नयः किमात्मानः स्थानं किं कस्य वा विभो । कतरस्मिन्हुते स्थाने कं व्रजेदाग्निहोत्रिकः ॥

katyagnayaḥ kimātmānaḥ sthānaṃ kiṃ kasya vā vibho | katarasminhute sthāne kaṃ vrajedāgnihotrikaḥ

हे विभो, अग्नियाँ कितनी हैं, उनका स्वरूप क्या है और किसका कौन-सा स्थान है? किस स्थान में होम करने पर अग्निहोत्री किस गति को प्राप्त होता है?

श्लोक 6 (14.111.6)

अग्निहोत्रनिमित्तं च किमुत्पन्नं पुराऽनघ । कथमेवाथ हूयन्ते प्रीयन्ते च सुराः कथम् ॥

agnihotranimittaṃ ca kimutpannaṃ purā'nagha | kathamevātha hūyante prīyante ca surāḥ katham

हे निष्पाप, प्राचीन काल में अग्निहोत्र का कारण क्या उत्पन्न हुआ? आहुतियाँ कैसे दी जाती हैं और देवता कैसे प्रसन्न होते हैं?

श्लोक 7 (14.111.7)

विधिवन्मन्त्रवत्कृत्वा पूजितास्त्वग्नयः कथम् । कां गतिं वदतांश्रेष्ठ नयन्ति ह्यग्निहोत्रिणः ॥

vidhivanmantravatkṛtvā pūjitāstvagnayaḥ katham | kāṃ gatiṃ vadatāṃśreṣṭha nayanti hyagnihotriṇaḥ

विधि और मन्त्रों के साथ अग्नियों की पूजा कैसे की जाती है? और हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, अग्निहोत्र करनेवालों को वे किस गति में ले जाती हैं?

श्लोक 8 (14.111.8)

दुर्हुताश्चापि भगवन्नविज्ञातास्त्रयोऽग्नयः । किमाहिताग्नेः कुर्वन्ति दुश्चीर्णा वाऽपि केशव ॥

durhutāścāpi bhagavannavijñātāstrayo'gnayaḥ | kimāhitāgneḥ kurvanti duścīrṇā vā'pi keśava

और हे केशव, यदि तीनों अग्नियों में ठीक से होम न किया जाए, वे भली-भाँति जानी न गई हों, या उनकी उपासना दोषपूर्ण हो, तो वे अग्नि स्थापित करनेवाले का क्या करती हैं?

श्लोक 9 (14.111.9)

उत्सन्नाग्निस्तु पापात्मा कां योनिं देव गच्छति । एतत्सर्वं समासेन भक्त्या ह्युपगतस्य मे । वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ सर्वाधिक नमोस्तु ते ॥

utsannāgnistu pāpātmā kāṃ yoniṃ deva gacchati | etatsarvaṃ samāsena bhaktyā hyupagatasya me | vaktumarhasi sarvajña sarvādhika namostu te

हे देव, जिसकी अग्नि बुझ गई हो, ऐसा पापी किस योनि को प्राप्त होता है? मैं भक्ति से आपकी शरण में आया हूँ; हे सर्वज्ञ, हे सबसे श्रेष्ठ, यह सब संक्षेप में कहने की कृपा कीजिए। आपको नमस्कार है।

भगवानुवाच

श्लोक 10 (14.111.10)

शृणु राजन्महापुण्यमिदं धर्मामृतं परम् । यत्तु तारयते युक्तान्ब्राह्मणानग्निहोत्रिणः ॥

śṛṇu rājanmahāpuṇyamidaṃ dharmāmṛtaṃ param | yattu tārayate yuktānbrāhmaṇānagnihotriṇaḥ

हे राजन्, धर्म का यह परम अमृत सुनो, जो महान् पुण्य देनेवाला है और जो संयमी अग्निहोत्री ब्राह्मणों को पार लगाता है।

श्लोक 11 (14.111.11)

ब्रह्मत्वेनासृजं लोकानहमादौ महाद्युते । सृष्टोऽग्निर्मुखतः पूर्वं लोकानां हितकाम्यया ॥

brahmatvenāsṛjaṃ lokānahamādau mahādyute | sṛṣṭo'gnirmukhataḥ pūrvaṃ lokānāṃ hitakāmyayā

हे महातेजस्वी, आदि में मैंने ब्रह्मा के रूप में लोकों की सृष्टि की; और लोकों के हित की इच्छा से सबसे पहले मेरे मुख से अग्नि की सृष्टि हुई।

श्लोक 12 (14.111.12)

यस्मादग्रे स भूतानां सर्वेषां निर्मितो मया । तस्मादग्नीत्यभिहितः पुराणज्ञैर्मनीषिभिः ॥

yasmādagre sa bhūtānāṃ sarveṣāṃ nirmito mayā | tasmādagnītyabhihitaḥ purāṇajñairmanīṣibhiḥ

क्योंकि वह मेरे द्वारा सब प्राणियों से पहले रचा गया, इसलिए पुराणों के ज्ञाता विद्वान् उसे "अग्नि" कहते हैं।

श्लोक 13 (14.111.13)

यस्मात्तु सर्वकृत्येषु पूर्वमस्मै प्रदीयते । आहुतिर्दीप्यमानाय तस्मादग्नीति कथ्यते ॥

yasmāttu sarvakṛtyeṣu pūrvamasmai pradīyate | āhutirdīpyamānāya tasmādagnīti kathyate

और क्योंकि सब कर्मों में प्रज्वलित होते हुए उसी को सबसे पहले आहुति दी जाती है, इसलिए वह अग्नि कहलाता है।

श्लोक 14 (14.111.14)

यस्माच्च तु नयत्यग्रां गतिं विप्रान्सुपूजितः । यस्माच्च नयनाद्राजन्देवेष्वग्नीति कथ्यते ॥

yasmācca tu nayatyagrāṃ gatiṃ viprānsupūjitaḥ | yasmācca nayanādrājandeveṣvagnīti kathyate

और क्योंकि भली-भाँति पूजित होने पर वह ब्राह्मणों को सर्वोत्तम गति तक ले जाता है, इस 'ले जाने' के कारण, हे राजन्, वेदों में वह अग्नि कहा जाता है।

श्लोक 15 (14.111.15)

तस्माच्च दुर्हुतः सोयमलं भक्षयितुं क्षणात् । यजमानं नरश्रेष्ठ क्रव्यादोऽग्निस्ततः स्मृतः ॥

tasmācca durhutaḥ soyamalaṃ bhakṣayituṃ kṣaṇāt | yajamānaṃ naraśreṣṭha kravyādo'gnistataḥ smṛtaḥ

और क्योंकि ठीक से होम न किए जाने पर वह क्षण भर में यजमान को खा जाने में समर्थ है, हे नरश्रेष्ठ, इसलिए वह क्रव्याद अग्नि भी कहा जाता है।

श्लोक 16 (14.111.16)

सर्वभूतात्मको राजन्देवानामेष वै मुखम् । प्रथमं मन्मुखात्सृष्टो लोकार्थे पचनः प्रभुः ॥

sarvabhūtātmako rājandevānāmeṣa vai mukham | prathamaṃ manmukhātsṛṣṭo lokārthe pacanaḥ prabhuḥ

हे राजन्, वह सब प्राणियों का आत्मा है और देवताओं का मुख है। पकानेवाले उस प्रभु की सृष्टि लोक के हित के लिए पहले मेरे मुख से हुई।

श्लोक 17 (14.111.17)

सृष्टमात्रो जगत्सर्वमत्तुमैच्छत्पुरा खलु । ततः प्रशमितः सोग्निरूपास्यैव मया पुरा ॥

sṛṣṭamātro jagatsarvamattumaicchatpurā khalu | tataḥ praśamitaḥ sognirūpāsyaiva mayā purā

रचे जाते ही उसने पूर्वकाल में सारे जगत् को खा जाना चाहा। तब मैंने उसकी उपासना करके उस अग्नि को शान्त किया।

श्लोक 18 (14.111.18)

सततोपासनात्सोयमौपासन इति स्मृतः ॥

satatopāsanātsoyamaupāsana iti smṛtaḥ

निरन्तर उपासना के कारण वह औपासन नाम से स्मरण किया जाता है।

श्लोक 19 (14.111.19)

आहुतिः सर्वमाख्याति तस्मिन्वसति सोनलः । आवसथ्य इति ख्यातस्तेनासौ ब्रह्मवादिभिः ॥

āhutiḥ sarvamākhyāti tasminvasati sonalaḥ | āvasathya iti khyātastenāsau brahmavādibhiḥ

आहुति सब कुछ कहती है; उसी में वह अग्नि निवास करता है। इसीलिए ब्रह्मवादी उसे आवसथ्य कहते हैं।

श्लोक 20 (14.111.20)

तस्मात्पञ्च महायज्ञा वर्तन्ते यस्य धर्मतः । सोममण्डलमध्येन गतिस्तस्य द्विजन्मनः ॥

tasmātpañca mahāyajñā vartante yasya dharmataḥ | somamaṇḍalamadhyena gatistasya dvijanmanaḥ

इसलिए जिस द्विज के घर में धर्मपूर्वक पाँच महायज्ञ होते हैं, उसकी गति चन्द्रमण्डल के मध्य से होकर जाती है।

श्लोक 21 (14.111.21)

ते च सप्तर्षयः सिद्धाः संयतेन्द्रियबुद्धयः । गता ह्यमरसायुज्यं ते ह्यग्न्यर्चनतत्पराः ॥

te ca saptarṣayaḥ siddhāḥ saṃyatendriyabuddhayaḥ | gatā hyamarasāyujyaṃ te hyagnyarcanatatparāḥ

और वे सप्तर्षि सिद्ध, जिनकी इन्द्रियाँ और बुद्धि संयत थीं और जो अग्नि की उपासना में तत्पर थे, देवताओं के सायुज्य को प्राप्त हुए।

श्लोक 22 (14.111.22)

अपरे चावसथ्यं च पचनाग्निं प्रचक्षते । तस्मिन्पञ्च महायज्ञा वैश्वदेवश्च वर्तते ॥

apare cāvasathyaṃ ca pacanāgniṃ pracakṣate | tasminpañca mahāyajñā vaiśvadevaśca vartate

अन्य लोग आवसथ्य को पचनाग्नि कहते हैं। उसी में पाँच महायज्ञ और वैश्वदेव सम्पन्न होते हैं।

श्लोक 23 (14.111.23)

स्थलीपाकं च गार्हं च सर्वे चास्मिन्प्रतिष्ठिताः । गृह्यकर्मवहो यस्मात्तस्माद्गृहपतिस्तु सः ॥

sthalīpākaṃ ca gārhaṃ ca sarve cāsminpratiṣṭhitāḥ | gṛhyakarmavaho yasmāttasmādgṛhapatistu saḥ

स्थालीपाक, गृहस्थ के कर्म और अन्य सब उसी में प्रतिष्ठित हैं। क्योंकि वह गृह्य कर्मों का वहन करता है, इसलिए वह गृहपति कहलाता है।

श्लोक 24 (14.111.24)

औपासनं चावसथ्यं सभ्यं पचनपावकम् । आहुर्ब्रह्मविदः केचिन्मतमेतन्ममापि च ॥

aupāsanaṃ cāvasathyaṃ sabhyaṃ pacanapāvakam | āhurbrahmavidaḥ kecinmatametanmamāpi ca

कुछ ब्रह्मज्ञानी औपासन, आवसथ्य, सभ्य और पचनाग्नि का उल्लेख करते हैं; यह मेरा भी मत है।

श्लोक 25 (14.111.25)

अग्निहोत्रप्रकारं च शृणु राजन्समाहितः । त्रयाणां गुणनामानां वह्नीनामुच्यते मया ॥

agnihotraprakāraṃ ca śṛṇu rājansamāhitaḥ | trayāṇāṃ guṇanāmānāṃ vahnīnāmucyate mayā

हे राजन्, अब ध्यान से अग्निहोत्र की विधि सुनो। मैं तीनों अग्नियों के गुण और नाम बताता हूँ।

श्लोक 26 (14.111.26)

गृहाणां हि पतित्वं हि गृहपत्यमिति स्मृतम् । गृहपत्यं तु यस्यासीत्तत्तस्माद्गार्हपत्यता ॥

gṛhāṇāṃ hi patitvaṃ hi gṛhapatyamiti smṛtam | gṛhapatyaṃ tu yasyāsīttattasmādgārhapatyatā

गृहों के स्वामित्व को गृहपत्य कहा गया है; जिसके पास गृहपत्य था, उसी से उसका नाम गार्हपत्य हुआ।

श्लोक 27 (14.111.27)

यजमानं तु यस्मात्तु दक्षिणां तु गतिं नयेत् । दक्षिणाग्निं तमाहुस्ते दक्षिणायतनं द्विजाः ॥

yajamānaṃ tu yasmāttu dakṣiṇāṃ tu gatiṃ nayet | dakṣiṇāgniṃ tamāhuste dakṣiṇāyatanaṃ dvijāḥ

क्योंकि वह यजमान को दक्षिण मार्ग की गति में ले जाता है, इसलिए द्विज उसे दक्षिणाग्नि और दक्षिणायतन कहते हैं।

श्लोक 28 (14.111.28)

आहुतिः सर्वमाख्याति हव्यं वै वहनं स्मृतम् । सर्वहव्यवहो वह्निर्गतश्चाहवनीयताम् ॥

āhutiḥ sarvamākhyāti havyaṃ vai vahanaṃ smṛtam | sarvahavyavaho vahnirgataścāhavanīyatām

आहुति सब कुछ कहती है, और हव्य का वहन करना 'वहन' कहा गया है। सब हव्यों को वहन करनेवाली वह अग्नि आहवनीय नाम को प्राप्त हुई।

श्लोक 29 (14.111.29)

यं चावसथ्यं जुहुयान्मूलाग्निं विधिवद्द्विजः । आवसथ्यं तु तं चाग्निं पचनाग्निं प्रचक्षते ॥

yaṃ cāvasathyaṃ juhuyānmūlāgniṃ vidhivaddvijaḥ | āvasathyaṃ tu taṃ cāgniṃ pacanāgniṃ pracakṣate

जिस मूलाग्नि में द्विज विधि से आवसथ्य के रूप में होम करता है, उस अग्नि को आवसथ्य और पचनाग्नि कहते हैं।

श्लोक 30 (14.111.30)

तेषां स भागतो वह्निः सभ्य इत्यभिधीयते । आवसथ्यस्तु यो वह्निः प्रथमः स प्रजापतिः ॥

teṣāṃ sa bhāgato vahniḥ sabhya ityabhidhīyate | āvasathyastu yo vahniḥ prathamaḥ sa prajāpatiḥ

अपने भाग के कारण वह अग्नि सभ्य कहलाती है। जो आवसथ्य अग्नि है, वह पहली है और वही प्रजापति है।

श्लोक 31 (14.111.31)

ब्रह्मा च गार्हपत्योऽग्निस्तस्मिन्नेव हि सोभवत् । दक्षिणाग्निस्त्वयं रुद्रः क्रोधात्मा चण्ड एव सः ॥

brahmā ca gārhapatyo'gnistasminneva hi sobhavat | dakṣiṇāgnistvayaṃ rudraḥ krodhātmā caṇḍa eva saḥ

ब्रह्मा गार्हपत्य अग्नि है और वह उसी अग्नि में स्थित है। दक्षिणाग्नि रुद्र है, जो क्रोधस्वरूप और उग्र है।

श्लोक 32 (14.111.32)

अहमाहवनीयोऽग्निराहोमाद्यस्य वै मुखे । सभ्योऽग्निः पञ्चमो यस्तु स्कन्द एव नराधिप ॥

ahamāhavanīyo'gnirāhomādyasya vai mukhe | sabhyo'gniḥ pañcamo yastu skanda eva narādhipa

मैं आहवनीय अग्नि हूँ, जिसके मुख में होम की आहुति दी जाती है। जो पाँचवीं अग्नि सभ्य है, हे नराधिप, वह स्वयं स्कन्द है।

श्लोक 33 (14.111.33)

पृथिवी गार्हपत्योऽग्निरन्तरिक्षं च दक्षिणः । स्वर्गमाहवनीयोऽग्निरेवमग्नित्रयं स्मृतम् ॥

pṛthivī gārhapatyo'gnirantarikṣaṃ ca dakṣiṇaḥ | svargamāhavanīyo'gnirevamagnitrayaṃ smṛtam

पृथ्वी गार्हपत्य अग्नि है, अन्तरिक्ष दक्षिणाग्नि है और स्वर्ग आहवनीय अग्नि है; इस प्रकार तीन अग्नियाँ मानी गई हैं।

श्लोक 34 (14.111.34)

वृत्तश्च गार्हपत्योऽग्निर्यस्माद्वृत्ता च मेदिनी । अर्धचन्द्राकृतिस्तं वै दक्षिणाग्निस्तथा भवेत् ॥

vṛttaśca gārhapatyo'gniryasmādvṛttā ca medinī | ardhacandrākṛtistaṃ vai dakṣiṇāgnistathā bhavet

गार्हपत्य अग्नि गोल है, क्योंकि पृथ्वी गोल है; और इसी प्रकार दक्षिणाग्नि अर्धचन्द्र के आकार की होनी चाहिए।

श्लोक 35 (14.111.35)

चतुरश्रं ततः स्वर्गं निर्मलं तु निरामयम् । तस्मादाहवनीयोऽग्निश्चतुरश्रो भवेन्नृप ॥

caturaśraṃ tataḥ svargaṃ nirmalaṃ tu nirāmayam | tasmādāhavanīyo'gniścaturaśro bhavennṛpa

स्वर्ग चौकोर, निर्मल और रोगरहित है; इसलिए, हे राजन्, आहवनीय अग्नि चौकोर होनी चाहिए।

श्लोक 36 (14.111.36)

जुहुयाद्गार्हपत्यं यो भुवं जयति स द्विजः । जुहोति दक्षिणं यस्तु स जयत्यन्तरिक्षकम् ॥

juhuyādgārhapatyaṃ yo bhuvaṃ jayati sa dvijaḥ | juhoti dakṣiṇaṃ yastu sa jayatyantarikṣakam

जो द्विज गार्हपत्य अग्नि में होम करता है, वह पृथ्वी को जीतता है; जो दक्षिणाग्नि में होम करता है, वह अन्तरिक्ष को जीतता है।

श्लोक 37 (14.111.37)

पृथिवीमन्तरिक्षं च दिवं ऋषिगणैः सह । जयत्याहवनीयं यो जुहुयाद्भक्तिमान्नरः ॥

pṛthivīmantarikṣaṃ ca divaṃ ṛṣigaṇaiḥ saha | jayatyāhavanīyaṃ yo juhuyādbhaktimānnaraḥ

जो भक्तिमान् मनुष्य आहवनीय अग्नि में होम करता है, वह ऋषिगणों सहित पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग को जीतता है।

श्लोक 38 (14.111.38)

आभिमुख्येन होमस्तु यस्य यज्ञेषु वर्तते । तेनाप्याहवनीयत्वं गतो वह्निर्महाद्युतिः ॥

ābhimukhyena homastu yasya yajñeṣu vartate | tenāpyāhavanīyatvaṃ gato vahnirmahādyutiḥ

क्योंकि जिसके यज्ञों में उसी अग्नि के सम्मुख होम किया जाता है, इसलिए भी वह महातेजस्वी अग्नि आहवनीय भाव को प्राप्त हुई।

श्लोक 39 (14.111.39)

आहोमादग्निहोत्रेषु यज्ञैर्वा यत्र सर्वशः । यस्मात्तस्मात्प्रवर्तन्ते ततो ह्याहवनीयता ॥

āhomādagnihotreṣu yajñairvā yatra sarvaśaḥ | yasmāttasmātpravartante tato hyāhavanīyatā

क्योंकि अग्निहोत्रों में अथवा यज्ञों में, जहाँ कहीं भी, आहुति से आरम्भ करके सब कुछ उसी से चलता है, इसलिए उसका आहवनीय नाम है।

श्लोक 40 (14.111.40)

यस्त्वावसथ्यं जुहुयान्मूलाग्निं विधिवद्द्विजः । स तु सप्तर्षिलोकेषु सपत्नीकः प्रमोदते ॥

yastvāvasathyaṃ juhuyānmūlāgniṃ vidhivaddvijaḥ | sa tu saptarṣilokeṣu sapatnīkaḥ pramodate

जो द्विज आवसथ्य, मूलाग्नि में विधिपूर्वक होम करता है, वह अपनी पत्नी सहित सप्तर्षियों के लोकों में आनन्द करता है।

श्लोक 41 (14.111.41)

इष्टो भवति सर्वाग्नेरग्निहोत्रं च तद्भवेत् । त्राणाद्वै यजमानस्य ह्यग्निहोत्रमिति स्मृतम् ॥

iṣṭo bhavati sarvāgneragnihotraṃ ca tadbhavet | trāṇādvai yajamānasya hyagnihotramiti smṛtam

वह सब अग्नियों का यजन करनेवाला हो जाता है, और वही अग्निहोत्र होगा। यजमान की रक्षा करने के कारण ही इसे अग्निहोत्र कहा गया है।

श्लोक 42 (14.111.42)

हो इत्येव विषादो वै विषादो दुःखमुच्यते । दुःखं तापत्रयं प्रोक्तं तापं हि नरकं विदुः ॥

ho ityeva viṣādo vai viṣādo duḥkhamucyate | duḥkhaṃ tāpatrayaṃ proktaṃ tāpaṃ hi narakaṃ viduḥ

"हो" का अर्थ विषाद है, और विषाद को दुःख कहा जाता है। दुःख तीन प्रकार का ताप कहा गया है, और ताप को ज्ञानी नरक जानते हैं।

श्लोक 43 (14.111.43)

आध्यात्मिकं चाधिदैवमाधिभौतिकमेव च । एतत्तापत्रयं प्रोक्तमात्मविद्भिर्नराधिप ॥

ādhyātmikaṃ cādhidaivamādhibhautikameva ca | etattāpatrayaṃ proktamātmavidbhirnarādhipa

आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक: हे नराधिप, आत्मज्ञानी इसे तीन प्रकार का ताप कहते हैं।

श्लोक 44 (14.111.44)

यस्माद्वै त्रायते दुःखाद्यजमानं हुतोऽनलः । तस्मात्तु विधिवत्प्रोक्तमग्निहोत्रमिति श्रुतौ ॥

yasmādvai trāyate duḥkhādyajamānaṃ huto'nalaḥ | tasmāttu vidhivatproktamagnihotramiti śrutau

क्योंकि होम की हुई अग्नि यजमान को दुःख से बचाती है, इसीलिए श्रुति में विधिपूर्वक इसे 'अग्निहोत्र' कहा गया है।

श्लोक 45 (14.111.45)

तदग्निहोत्रं सृष्टं वै ब्रह्मणा लोककर्तृणा । वेदाश्चाप्यग्निहोत्रं तु जज्ञिरे स्वयमेव तु ॥

tadagnihotraṃ sṛṣṭaṃ vai brahmaṇā lokakartṛṇā | vedāścāpyagnihotraṃ tu jajñire svayameva tu

उस अग्निहोत्र की सृष्टि लोककर्ता ब्रह्मा ने की; और वेद भी अग्निहोत्र के लिए स्वयं ही प्रकट हुए।

श्लोक 46 (14.111.46)

अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवृत्तफलं श्रुतम् । रतिपुत्रफला दारा दत्तभुक्तफलं धनम् ॥

agnihotraphalā vedāḥ śīlavṛttaphalaṃ śrutam | ratiputraphalā dārā dattabhuktaphalaṃ dhanam

वेदों का फल अग्निहोत्र है, और विद्या का फल शील तथा सदाचरण सुना गया है। स्त्रियों का फल रति और पुत्र है, और धन का फल दान तथा भोग है।

श्लोक 47 (14.111.47)

त्रिवेदमन्त्रसंयोगादग्निहोत्रं प्रवर्तते । ऋग्यजुःसामभिः पुण्यैः स्थाप्यते सूत्रसंयुतैः ॥

trivedamantrasaṃyogādagnihotraṃ pravartate | ṛgyajuḥsāmabhiḥ puṇyaiḥ sthāpyate sūtrasaṃyutaiḥ

तीनों वेदों के मन्त्रों के संयोग से अग्निहोत्र चलता है; पवित्र ऋक्, यजुः और साम मन्त्रों से, सूत्रों के साथ, उसकी स्थापना की जाती है।

श्लोक 48 (14.111.48)

वसन्ते ब्राह्मणस्य स्यादाधेयोऽग्निर्नराधिप । वसन्तो ब्राह्मणो ज्ञेयो वेदयोनिः स उच्यते ॥

vasante brāhmaṇasya syādādheyo'gnirnarādhipa | vasanto brāhmaṇo jñeyo vedayoniḥ sa ucyate

हे नराधिप, ब्राह्मण के लिए अग्नि की स्थापना वसन्त में होनी चाहिए; वसन्त को ब्राह्मण जानना चाहिए, और उसे वेद की योनि कहा जाता है।

श्लोक 49 (14.111.49)

अग्न्याधेयं तु येनाथ वसन्ते क्रियतेऽनघ । तस्य श्रीर्ब्रह्मवृद्धिश्च ब्राह्मणस्य विवर्धते ॥

agnyādheyaṃ tu yenātha vasante kriyate'nagha | tasya śrīrbrahmavṛddhiśca brāhmaṇasya vivardhate

हे निष्पाप, जो ब्राह्मण वसन्त में अग्नि की स्थापना करता है, उसकी श्री और ब्रह्मवृद्धि बढ़ती है।

श्लोक 50 (14.111.50)

क्षत्रियस्याग्निराधेयो ग्रीष्मे श्रेष्ठः स वै नृप । येनाधानं तु वै ग्रीष्मे क्रियते तस्य वर्धते । श्रीः प्रजाः पशवश्चैव वित्तं तेजो बलं यशः ॥

kṣatriyasyāgnirādheyo grīṣme śreṣṭhaḥ sa vai nṛpa | yenādhānaṃ tu vai grīṣme kriyate tasya vardhate | śrīḥ prajāḥ paśavaścaiva vittaṃ tejo balaṃ yaśaḥ

हे राजन्, क्षत्रिय के लिए अग्नि की स्थापना ग्रीष्म में श्रेष्ठ है। जो ग्रीष्म में स्थापना करता है, उसकी वृद्धि होती है: श्री, सन्तान, पशु, धन, तेज, बल और यश।

श्लोक 51 (14.111.51)

शरदृतौ तु वैश्यस्य ह्याधानीयो हुताशनः । शरद्रात्रं स्वयं वैश्यो वैश्ययोनिः स उच्यते ॥

śaradṛtau tu vaiśyasya hyādhānīyo hutāśanaḥ | śaradrātraṃ svayaṃ vaiśyo vaiśyayoniḥ sa ucyate

वैश्य के लिए अग्नि की स्थापना शरद् ऋतु में होनी चाहिए; शरद् स्वयं वैश्य है, और उसे वैश्यों की योनि कहा जाता है।

श्लोक 52 (14.111.52)

शरद्याधानमेवं वै क्रियते येन पाण्डव । तस्यापि श्रीः प्रजाऽऽयुश्च पशवोऽर्थश्च वर्धते ॥

śaradyādhānamevaṃ vai kriyate yena pāṇḍava | tasyāpi śrīḥ prajā''yuśca paśavo'rthaśca vardhate

हे पाण्डव, जो शरद् में स्थापना करता है, उसकी भी श्री, सन्तान, आयु, पशु और धन बढ़ते हैं।

श्लोक 53 (14.111.53)

पशवः सर्व एवैते त्रिभिः सर्वैरलङ्कृताः । अग्निहोत्राद्धि वर्तन्ते तैरेव ध्रियते जगत् ॥

paśavaḥ sarva evaite tribhiḥ sarvairalaṅkṛtāḥ | agnihotrāddhi vartante taireva dhriyate jagat

तीनों वेदों से अलंकृत ये सब पशु अग्निहोत्र से उत्पन्न होते हैं; उन्हीं से यह जगत् धारण किया जाता है।

श्लोक 54 (14.111.54)

ग्राम्यारण्याश्च पशवो वृक्षाश्चैव तृणानि च । फलान्योषधयश्चापि अग्निहोत्रकृते हविः ॥

grāmyāraṇyāśca paśavo vṛkṣāścaiva tṛṇāni ca | phalānyoṣadhayaścāpi agnihotrakṛte haviḥ

ग्राम्य और वन्य पशु, वृक्ष और तृण, फल और ओषधियाँ: ये सब अग्निहोत्र के लिए हविष्य के रूप में हैं।

श्लोक 55 (14.111.55)

रसाः स्नेहास्तथा गन्धा रत्नानि मणयस्तथा । काञ्चनानि च लोहानि ह्यग्निहोत्रकृतेऽभवन् ॥

rasāḥ snehāstathā gandhā ratnāni maṇayastathā | kāñcanāni ca lohāni hyagnihotrakṛte'bhavan

रस, स्नेह (चिकने पदार्थ) और गन्ध, रत्न और मणियाँ, स्वर्ण और धातुएँ: ये सब अग्निहोत्र के लिए ही उत्पन्न हुए।

श्लोक 56 (14.111.56)

आयुर्वेदो धनुर्वेदो मीमांसा न्यायविस्तरः । धर्मशास्त्रं च तत्सर्वमग्निहोत्रकृते कृतम् ॥

āyurvedo dhanurvedo mīmāṃsā nyāyavistaraḥ | dharmaśāstraṃ ca tatsarvamagnihotrakṛte kṛtam

आयुर्वेद, धनुर्वेद, मीमांसा, न्याय का विस्तार और धर्मशास्त्र: यह सब अग्निहोत्र के लिए ही रचा गया।

श्लोक 57 (14.111.57)

छन्दः शिक्षा च कल्पश्च तथा व्याकरणानि च । शास्त्रं ज्योतिर्निरुक्तं चाप्यग्निहोत्रकृते कृतम् ॥

chandaḥ śikṣā ca kalpaśca tathā vyākaraṇāni ca | śāstraṃ jyotirniruktaṃ cāpyagnihotrakṛte kṛtam

छन्द, शिक्षा, कल्प और व्याकरण, शास्त्र, ज्योतिष और निरुक्त: ये सब अग्निहोत्र के लिए ही रचे गए।

श्लोक 58 (14.111.58)

इतिहासपुराणं च गाथाश्चोपनिषत्तथा । आथर्वणानि कर्माणि चाग्निहोत्रकृते कृतम् ॥

itihāsapurāṇaṃ ca gāthāścopaniṣattathā | ātharvaṇāni karmāṇi cāgnihotrakṛte kṛtam

इतिहास और पुराण, गाथाएँ और उपनिषद्, तथा आथर्वण कर्म: ये अग्निहोत्र के लिए ही रचे गए।

श्लोक 59 (14.111.59)

यच्चैतस्यां पृथिव्यां वै किंचिदस्ति चराचरम् । तत्सर्वमग्निहोत्रस्य कृते सृष्टं स्वयंभुवा ॥

yaccaitasyāṃ pṛthivyāṃ vai kiṃcidasti carācaram | tatsarvamagnihotrasya kṛte sṛṣṭaṃ svayaṃbhuvā

इस पृथ्वी पर जो कुछ भी चर-अचर है, वह सब स्वयम्भू ने अग्निहोत्र के लिए ही रचा है।

श्लोक 60 (14.111.60)

अग्निहोत्रस्य दर्शस्य पूर्णमासस्य चाप्यथ । यूपेष्टिपशुबन्धानां सोमपानक्रियावताम् ॥

agnihotrasya darśasya pūrṇamāsasya cāpyatha | yūpeṣṭipaśubandhānāṃ somapānakriyāvatām

अग्निहोत्र, दर्श और पौर्णमास यज्ञ, यूप, इष्टि और पशुबन्ध तथा सोमपान की क्रियाओं के लिए:

श्लोक 61 (14.111.61)

तिथिनक्षत्रयोगानां मुहूर्तकरणात्मकम् । कालस्य वेदनार्थं तु ज्योतिर्ज्ञानं पुराऽनघ ॥

tithinakṣatrayogānāṃ muhūrtakaraṇātmakam | kālasya vedanārthaṃ tu jyotirjñānaṃ purā'nagha

तिथि, नक्षत्र, योग, मुहूर्त और करण से युक्त काल को जानने के लिए, हे निष्पाप, पूर्वकाल में ज्योतिष का ज्ञान रचा गया।

श्लोक 62 (14.111.62)

ऋग्यजुः साममन्त्राणां श्लोकतत्वार्थचिन्तनात् । प्रत्यापत्तिविकल्पानां छन्दोज्ञानं प्रकल्पितम् ॥

ṛgyajuḥ sāmamantrāṇāṃ ślokatatvārthacintanāt | pratyāpattivikalpānāṃ chandojñānaṃ prakalpitam

ऋक्, यजुः और साम मन्त्रों के श्लोकों के तत्त्वार्थ पर विचार करके, उनके प्रयोग-भेदों को निश्चित करने के लिए छन्दों का ज्ञान रचा गया।

श्लोक 63 (14.111.63)

वर्णाक्षरपदार्थानां सन्धिलिङ्गं प्रकीर्तितम् । नामधातुविवेकार्थं पुरा व्याकरणं स्मृतम् ॥

varṇākṣarapadārthānāṃ sandhiliṅgaṃ prakīrtitam | nāmadhātuvivekārthaṃ purā vyākaraṇaṃ smṛtam

वर्ण, अक्षर, पद और अर्थ की सन्धि और लिंग-व्यवस्था बताई गई है; और नाम तथा धातु का भेद जानने के लिए पूर्वकाल में व्याकरण रचा गया।

श्लोक 64 (14.111.64)

यूपवेद्यध्वरार्थं तु प्रोक्षणश्रवणाय तु । यज्ञदैवतयोगार्थं शिक्षाज्ञानं प्रकल्पितम् ॥

yūpavedyadhvarārthaṃ tu prokṣaṇaśravaṇāya tu | yajñadaivatayogārthaṃ śikṣājñānaṃ prakalpitam

यूप, वेदी और यज्ञ के लिए, प्रोक्षण और श्रवण के लिए तथा यज्ञ का देवताओं से सम्बन्ध जोड़ने के लिए शिक्षा का ज्ञान रचा गया।

श्लोक 65 (14.111.65)

यज्ञपात्रपवित्रार्थं द्रव्यसंभारणाय च । सर्वयज्ञविकल्पाय पुराकल्पं प्रकल्पितम् ॥

yajñapātrapavitrārthaṃ dravyasaṃbhāraṇāya ca | sarvayajñavikalpāya purākalpaṃ prakalpitam

यज्ञ-पात्रों और पवित्रों के लिए, सामग्री जुटाने के लिए और सब यज्ञों के विकल्पों के लिए प्राचीन कल्प रचा गया।

श्लोक 66 (14.111.66)

नामधातुविकल्पानां तत्वार्थनियमाय च । सर्ववेदनिरुक्तानां निरुक्तमृषिभिः कृतम् ॥

nāmadhātuvikalpānāṃ tatvārthaniyamāya ca | sarvavedaniruktānāṃ niruktamṛṣibhiḥ kṛtam

नाम और धातुओं के विकल्पों का तत्त्वार्थ निश्चित करने के लिए ऋषियों ने सब वेदों का निरुक्त रचा।

श्लोक 67 (14.111.67)

वेद्यर्थं पृथिवी सृष्टा संभारार्थं तथैव च । इध्मार्थमथ यूपार्थं ब्रह्मा चक्रे वनस्पतिम् ॥

vedyarthaṃ pṛthivī sṛṣṭā saṃbhārārthaṃ tathaiva ca | idhmārthamatha yūpārthaṃ brahmā cakre vanaspatim

वेदी के लिए और सामग्री के संग्रह के लिए पृथ्वी रची गई; समिधा और यूप के लिए ब्रह्मा ने वृक्षों को बनाया।

श्लोक 68 (14.111.68)

ग्राम्यारण्याश्च पशवो जायन्ते यज्ञकारणात् । मन्त्राणां विनियोगं च प्रोक्षितं श्रपणं तथा ॥

grāmyāraṇyāśca paśavo jāyante yajñakāraṇāt | mantrāṇāṃ viniyogaṃ ca prokṣitaṃ śrapaṇaṃ tathā

ग्राम्य और वन्य पशु यज्ञ के कारण उत्पन्न होते हैं; मन्त्रों का विनियोग, प्रोक्षण और पकाना भी इसी के लिए है।

श्लोक 69 (14.111.69)

अनुयाजप्रयाजाश्च मरुतां शंसिनस्तथा । औद्गात्रं चैव साम्नां वै प्रतिप्रस्थानमेव च ॥

anuyājaprayājāśca marutāṃ śaṃsinastathā | audgātraṃ caiva sāmnāṃ vai pratiprasthānameva ca

अनुयाज और प्रयाज, मरुतों के शंसी, साम मन्त्रों में उद्गाता का कर्म और प्रतिप्रस्थान,

श्लोक 70 (14.111.70)

विष्णुक्रमाणां क्रमणं दक्षिणावभृथं तथा । त्रिकालमर्चनं चैव स्थानेषूपहृतं तथा ॥

viṣṇukramāṇāṃ kramaṇaṃ dakṣiṇāvabhṛthaṃ tathā | trikālamarcanaṃ caiva sthāneṣūpahṛtaṃ tathā

विष्णु के क्रमण, दक्षिणा और अवभृथ स्नान, तीनों कालों की अर्चना और स्थानों पर लाई गई आहुतियाँ,

श्लोक 71 (14.111.71)

देवताग्रहणं मोक्षं हविषां श्रपणं तथा । नावबुद्ध्यन्ति ये विप्रा निन्दन्ति च पशोर्वधम् । ते यान्ति नरकं घोरं रौरवं तमसाऽऽवृतम् ॥

devatāgrahaṇaṃ mokṣaṃ haviṣāṃ śrapaṇaṃ tathā | nāvabuddhyanti ye viprā nindanti ca paśorvadham | te yānti narakaṃ ghoraṃ rauravaṃ tamasā''vṛtam

देवताओं का आवाहन, हविष्यों का मोचन और पाक: जो ब्राह्मण इसे नहीं समझते और पशु-वध की निन्दा करते हैं, वे अन्धकार से ढके भयंकर रौरव नरक में जाते हैं।

श्लोक 72 (14.111.72)

शतवर्षसहस्राणि तत्र स्थित्वा नराधमाः । कृमिभिर्भक्ष्यमाणाश्च तिष्ठेयुः पूयशोणिते ॥

śatavarṣasahasrāṇi tatra sthitvā narādhamāḥ | kṛmibhirbhakṣyamāṇāśca tiṣṭheyuḥ pūyaśoṇite

वहाँ लाखों वर्ष रहकर वे अधम मनुष्य कीड़ों से खाए जाते हुए मवाद और रक्त में पड़े रहते हैं।

श्लोक 73 (14.111.73)

वृक्षा यूपत्वमिच्छन्ति पशुत्वं पशवस्तथा । तृणानीच्छन्ति बर्हिष्ट्वमोषध्यश्च हविष्यताम् । सोमत्वं च लताः सर्वा वेदित्वं च वसुंधरा ॥

vṛkṣā yūpatvamicchanti paśutvaṃ paśavastathā | tṛṇānīcchanti barhiṣṭvamoṣadhyaśca haviṣyatām | somatvaṃ ca latāḥ sarvā veditvaṃ ca vasuṃdharā

वृक्ष यूप होना चाहते हैं और पशु बलि-पशु होना चाहते हैं; तृण बिछाया जानेवाला कुश होना चाहते हैं और ओषधियाँ हविष्य; सारी लताएँ सोम होना चाहती हैं और पृथ्वी वेदी।

श्लोक 74 (14.111.74)

यस्मात्पशुत्वमिच्छन्ति पशवः स्वर्गलिप्सया । तस्मात्पशुवधे हिंसा नास्ति यज्ञेषु पाण्डव ॥

yasmātpaśutvamicchanti paśavaḥ svargalipsayā | tasmātpaśuvadhe hiṃsā nāsti yajñeṣu pāṇḍava

क्योंकि पशु स्वर्ग की इच्छा से बलि-पशु होना चाहते हैं, इसलिए हे पाण्डव, यज्ञों में पशु-वध में हिंसा नहीं है।

श्लोक 75 (14.111.75)

यूपास्तन्मन्त्रसंस्कारैर्दर्भाश्च पशवस्तथा । यजमानेन सहिताः स्वर्गं यान्ति नरेश्वर ॥

yūpāstanmantrasaṃskārairdarbhāśca paśavastathā | yajamānena sahitāḥ svargaṃ yānti nareśvara

यूप अपने मन्त्र-संस्कारों से शुद्ध होकर, और कुश तथा पशु भी, हे नरेश्वर, यजमान के साथ स्वर्ग को जाते हैं।

श्लोक 76 (14.111.76)

यावत्कालं हि यज्वा वै स्वर्गलोके महीयते । तावत्कालं प्रमोदन्ते पशवो ह्यध्वरे हताः ॥

yāvatkālaṃ hi yajvā vai svargaloke mahīyate | tāvatkālaṃ pramodante paśavo hyadhvare hatāḥ

जितने समय तक यजमान स्वर्गलोक में सम्मानित होता है, उतने समय तक यज्ञ में मारे गए पशु आनन्द करते हैं।

श्लोक 77 (14.111.77)

अहिंसा वैदिकं कर्म ब्रह्मकर्मेति तत्कृतम् । वेदोक्तं ये न कुर्वन्ति हिंसाबुद्ध्या क्रतून्द्विजाः । सद्यः शूद्रत्वमायान्ति प्रेत्य चण्डालतामपि ॥

ahiṃsā vaidikaṃ karma brahmakarmeti tatkṛtam | vedoktaṃ ye na kurvanti hiṃsābuddhyā kratūndvijāḥ | sadyaḥ śūdratvamāyānti pretya caṇḍālatāmapi

अहिंसा वैदिक कर्म है, उसे ब्रह्मकर्म कहा गया है। जो द्विज हिंसा की बुद्धि से वेद में कहे यज्ञों को नहीं करते, वे तुरन्त शूद्रत्व को प्राप्त होते हैं और मरने के बाद चाण्डालत्व को भी।

श्लोक 78 (14.111.78)

गावो यज्ञार्थमुत्पन्ना दक्षिणार्थं तथैव च । सुवर्णं रजतं चैव पात्रीकुम्भार्थमेव च ॥

gāvo yajñārthamutpannā dakṣiṇārthaṃ tathaiva ca | suvarṇaṃ rajataṃ caiva pātrīkumbhārthameva ca

गौएँ यज्ञ और दक्षिणा के लिए उत्पन्न हुईं; इसी प्रकार सोना, चाँदी, पात्र और घड़े भी।

श्लोक 79 (14.111.79)

दर्भाः संस्तरणार्थं तु रक्षसां रक्षणाय च । यजनार्थं द्विजाः सृष्टास्तारका दिवि देवताः ॥

darbhāḥ saṃstaraṇārthaṃ tu rakṣasāṃ rakṣaṇāya ca | yajanārthaṃ dvijāḥ sṛṣṭāstārakā divi devatāḥ

कुश बिछाने के लिए और राक्षसों से रक्षा के लिए बने; द्विज यज्ञ कराने के लिए रचे गए; और तारे आकाश में देवता के रूप में।

श्लोक 80 (14.111.80)

क्षत्रिया रक्षणार्थं तु वैश्या वार्तानिमित्ततः । शुश्रूषार्थं त्रयाणां वै शूद्राः सृष्टाः स्वयंभुवा ॥

kṣatriyā rakṣaṇārthaṃ tu vaiśyā vārtānimittataḥ | śuśrūṣārthaṃ trayāṇāṃ vai śūdrāḥ sṛṣṭāḥ svayaṃbhuvā

स्वयम्भू ने क्षत्रियों को रक्षा के लिए, वैश्यों को आजीविका के लिए और शूद्रों को तीनों की सेवा के लिए रचा।

श्लोक 81 (14.111.81)

एवमेतज्जगत्सर्वमग्निहोत्रकृते कृतम् । नावबुध्यन्ति ये चैव नरास्तु तमसा वृताः ॥

evametajjagatsarvamagnihotrakṛte kṛtam | nāvabudhyanti ye caiva narāstu tamasā vṛtāḥ

इस प्रकार यह सारा जगत् अग्निहोत्र के लिए रचा गया है। जो मनुष्य अज्ञान के अन्धकार से ढके हुए इसे नहीं समझते,

श्लोक 82 (14.111.82)

ते यान्ति नरकं घोरं रौरवं नाम विश्रुतम् । रौरवाद्विप्रयुक्तास्तु कृमियोनिं व्रजन्ति ते ॥

te yānti narakaṃ ghoraṃ rauravaṃ nāma viśrutam | rauravādviprayuktāstu kṛmiyoniṃ vrajanti te

वे रौरव नामक प्रसिद्ध भयंकर नरक में जाते हैं; और रौरव से छूटने पर कीड़ों की योनि में जाते हैं।

श्लोक 83 (14.111.83)

यथोक्तमग्निहोत्राणां शुश्रूषन्ति च ये द्विजाः । तैर्दत्तं सहुतं चेष्टं दत्तमध्यापितं भवेत् ॥

yathoktamagnihotrāṇāṃ śuśrūṣanti ca ye dvijāḥ | tairdattaṃ sahutaṃ ceṣṭaṃ dattamadhyāpitaṃ bhavet

जो द्विज विधि के अनुसार अग्निहोत्रों की सेवा करते हैं, उनके द्वारा दान दिया, होम भली-भाँति किया, यज्ञ किया और अध्यापन भी किया हुआ माना जाता है।

श्लोक 84 (14.111.84)

एवमिष्टं च पूर्तं च यद्विप्रैः क्रियते नृप । तत्सर्वं सम्यगाहृत्य चादित्ये स्थापयाम्यहम् ॥

evamiṣṭaṃ ca pūrtaṃ ca yadvipraiḥ kriyate nṛpa | tatsarvaṃ samyagāhṛtya cāditye sthāpayāmyaham

इस प्रकार, हे राजन्, ब्राह्मण जो भी इष्ट और पूर्त कर्म करते हैं, उस सबको मैं भली-भाँति एकत्र करके सूर्य में स्थापित कर देता हूँ।

श्लोक 85 (14.111.85)

मया स्थापितमादित्ये लोकस्य सुकृतं हि तत् । धारयेद्यत्सहस्रांशुः सुकृतं ह्यग्निहोत्रिणाम् ॥

mayā sthāpitamāditye lokasya sukṛtaṃ hi tat | dhārayedyatsahasrāṃśuḥ sukṛtaṃ hyagnihotriṇām

मेरे द्वारा सूर्य में रखा गया वह संसार का पुण्य है; सहस्र किरणोंवाले सूर्य अग्निहोत्रियों के उस पुण्य को धारण करते हैं।

श्लोक 86 (14.111.86)

यावत्कालं तु तिष्ठन्ति लोके चाप्यग्निहोत्रिणः । तावदेव हि पुण्येन दीप्यते रविणाऽम्बरे ॥

yāvatkālaṃ tu tiṣṭhanti loke cāpyagnihotriṇaḥ | tāvadeva hi puṇyena dīpyate raviṇā'mbare

जब तक अग्निहोत्री लोक में रहते हैं, तब तक सूर्य उनके पुण्य से आकाश में दीप्त रहता है।

श्लोक 87 (14.111.87)

स्वर्गे स्वर्गं गतानां तु वीर्याद्भवति वीर्यवान् । तत्र ते ह्युपभुञ्जन्ति ह्यग्निहोत्रस्य तत्फलम् । समानरूपा देवानां तिष्ठन्त्याभूतसंप्लवम् ॥

svarge svargaṃ gatānāṃ tu vīryādbhavati vīryavān | tatra te hyupabhuñjanti hyagnihotrasya tatphalam | samānarūpā devānāṃ tiṣṭhantyābhūtasaṃplavam

स्वर्ग को गए हुए लोगों में बलवान् अपने बल से वहाँ और बलवान् होता है। वहाँ वे अग्निहोत्र का फल भोगते हैं और प्राणियों के प्रलय तक देवताओं के समान रूप में रहते हैं।

श्लोक 88 (14.111.88)

वृथाऽग्निना च ये केचिद्दह्यन्ते ह्यग्निहोत्रिणः । न तेऽग्निहोत्रिणां लोके मनसाऽपि व्रजन्ति ते ॥

vṛthā'gninā ca ye keciddahyante hyagnihotriṇaḥ | na te'gnihotriṇāṃ loke manasā'pi vrajanti te

जो अग्निहोत्री व्यर्थ ही अग्नि से जलाए जाते हैं, वे अग्निहोत्रियों के लोक में मन से भी नहीं पहुँच पाते।

श्लोक 89 (14.111.89)

वीरघ्रास्तु दुराचारा दरिद्रास्तु नराधमाः । विकला व्याधिताश्चापि जायन्ते शूद्रयोनिषु ॥

vīraghrāstu durācārā daridrāstu narādhamāḥ | vikalā vyādhitāścāpi jāyante śūdrayoniṣu

वीरों के हत्यारे, दुराचारी, दरिद्र और अधम मनुष्य विकलांग और रोगी होकर शूद्र योनियों में जन्म लेते हैं।

श्लोक 90 (14.111.90)

तस्मादप्रोषितैर्नित्यमग्निहोत्रं द्विजातिभिः । होतव्यं विधिवद्राजन्नूर्ध्वामिच्छन्ति ये गतिम् ॥

tasmādaproṣitairnityamagnihotraṃ dvijātibhiḥ | hotavyaṃ vidhivadrājannūrdhvāmicchanti ye gatim

इसलिए, हे राजन्, जो द्विज ऊर्ध्व गति चाहते हैं, उन्हें परदेश में न रहते हुए नित्य विधिपूर्वक अग्निहोत्र करना चाहिए।

श्लोक 91 (14.111.91)

आत्मवन्नावमन्तव्यमग्निहोत्रं युधिष्ठिर । न त्याज्यं क्षणमप्येतदग्निहोत्रं युधिष्ठिर ॥

ātmavannāvamantavyamagnihotraṃ yudhiṣṭhira | na tyājyaṃ kṣaṇamapyetadagnihotraṃ yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर, आत्मसंयमी मनुष्य को अग्निहोत्र का तिरस्कार नहीं करना चाहिए; हे युधिष्ठिर, इसे क्षण भर के लिए भी नहीं छोड़ना चाहिए।

श्लोक 92 (14.111.92)

वृद्धत्वेऽप्यग्निहोत्रं ये गृह्णन्ति विधिवद्द्विजाः । शूद्रान्नाद्विरता दान्ताः संयतेन्द्रियबुद्धयः ॥

vṛddhatve'pyagnihotraṃ ye gṛhṇanti vidhivaddvijāḥ | śūdrānnādviratā dāntāḥ saṃyatendriyabuddhayaḥ

जो द्विज वृद्धावस्था में भी विधिपूर्वक अग्निहोत्र ग्रहण करते हैं, शूद्र के अन्न से विरत हैं, जितेन्द्रिय हैं और जिनकी इन्द्रियाँ तथा बुद्धि संयत हैं,

श्लोक 93 (14.111.93)

पञ्चयज्ञपरा नित्यं लोभक्रोधविवर्जिताः । द्विकालमतिथींश्चैव पूजयन्ति च भक्तितः ॥

pañcayajñaparā nityaṃ lobhakrodhavivarjitāḥ | dvikālamatithīṃścaiva pūjayanti ca bhaktitaḥ

जो सदा पाँच यज्ञों में तत्पर हैं, लोभ और क्रोध से रहित हैं और दोनों समय भक्तिपूर्वक अतिथियों की पूजा करते हैं,

श्लोक 94 (14.111.94)

तेऽपि सूर्योदयप्रख्यैर्विमानैर्वायुवेगिभिः । मम लोके प्रमोदन्ते दृष्ट्वा मां च युधिष्ठिर ॥

te'pi sūryodayaprakhyairvimānairvāyuvegibhiḥ | mama loke pramodante dṛṣṭvā māṃ ca yudhiṣṭhira

वे भी उदय होते सूर्य के समान चमकनेवाले और वायु के समान वेगवान् विमानों में बैठकर, हे युधिष्ठिर, मेरे लोक में मेरा दर्शन करके आनन्द करते हैं।

श्लोक 95 (14.111.95)

मन्वन्तरं च तत्रैकं मोदिता द्विजसत्तमाः । इह मानुष्यके लोके जायन्ते द्विजसत्तमाः ॥

manvantaraṃ ca tatraikaṃ moditā dvijasattamāḥ | iha mānuṣyake loke jāyante dvijasattamāḥ

वहाँ एक मन्वन्तर तक वे श्रेष्ठ ब्राह्मण आनन्द करते हैं; फिर वे इस मनुष्यलोक में श्रेष्ठ ब्राह्मण के रूप में जन्म लेते हैं।

श्लोक 96 (14.111.96)

बालाहिताग्नयो ये च शूद्रान्नाद्विरताः सदा । क्रोधलोभविनिर्मुक्ताः प्रातस्स्नानपरायणाः । यथोक्तमग्निहोत्रं वै जुह्वते विजितेन्द्रियाः ॥

bālāhitāgnayo ye ca śūdrānnādviratāḥ sadā | krodhalobhavinirmuktāḥ prātassnānaparāyaṇāḥ | yathoktamagnihotraṃ vai juhvate vijitendriyāḥ

जो युवावस्था में ही अग्नि की स्थापना करते हैं, सदा शूद्र के अन्न से दूर रहते हैं, क्रोध और लोभ से मुक्त हैं, प्रातःस्नान में तत्पर हैं, और इन्द्रियों को जीतकर विधि के अनुसार अग्निहोत्र करते हैं,

श्लोक 97 (14.111.97)

आतिथेयाः सदा सौम्या द्विकालं मत्परायणाः । ते यान्त्यपुनरावृत्तिं भित्त्वा चादित्यमण्डलम् ॥

ātitheyāḥ sadā saumyā dvikālaṃ matparāyaṇāḥ | te yāntyapunarāvṛttiṃ bhittvā cādityamaṇḍalam

अतिथि-सत्कार करनेवाले, सदा सौम्य और दोनों समय मुझमें लगे रहनेवाले वे सूर्यमण्डल को भेदकर अपुनरावृत्ति की गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 98 (14.111.98)

मम लोकं सपत्नीका यानैः सूर्योदयप्रभैः । तत्र बालार्कसङ्काशाः कामगाः कामरूपिणः ॥

mama lokaṃ sapatnīkā yānaiḥ sūryodayaprabhaiḥ | tatra bālārkasaṅkāśāḥ kāmagāḥ kāmarūpiṇaḥ

वे अपनी पत्नियों सहित उदयकालीन सूर्य की प्रभावाले यानों में मेरे लोक को जाते हैं; वहाँ वे बाल-सूर्य के समान कान्तिमान्, इच्छानुसार विचरनेवाले और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले होते हैं।

श्लोक 99 (14.111.99)

ऐश्वर्यगुणसंपन्नाः क्रीडन्ति च यथासुखम् । इत्येषामाहिताग्नीनां विभूतिः पाण्डुनन्दन ॥

aiśvaryaguṇasaṃpannāḥ krīḍanti ca yathāsukham | ityeṣāmāhitāgnīnāṃ vibhūtiḥ pāṇḍunandana

ऐश्वर्य के गुणों से सम्पन्न होकर वे सुखपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। हे पाण्डुनन्दन, अग्नि स्थापित करनेवालों की यही विभूति है।

श्लोक 100 (14.111.100)

श्रुतिं केचिन्निन्दमानाः श्रुतिं दूष्यन्त्यबुद्धयः । प्रमाणं न च कुर्वन्ति ये यान्तीहापि दुर्गतिम् ॥

śrutiṃ kecinnindamānāḥ śrutiṃ dūṣyantyabuddhayaḥ | pramāṇaṃ na ca kurvanti ye yāntīhāpi durgatim

कुछ अज्ञानी लोग श्रुति की निन्दा करते हैं और उसमें दोष निकालते हैं; जो उसे प्रमाण नहीं मानते, वे यहीं भी दुर्गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 101 (14.111.101)

प्रमाणमितिहासं च वेदान्कुर्वन्ति ये द्विजाः । ते यान्त्यमरसायुज्यं नित्यमास्तिक्यबुद्धयः ॥

pramāṇamitihāsaṃ ca vedānkurvanti ye dvijāḥ | te yāntyamarasāyujyaṃ nityamāstikyabuddhayaḥ

जो द्विज इतिहास और वेदों को प्रमाण मानते हैं और सदा आस्तिक बुद्धिवाले हैं, वे देवताओं के सायुज्य को प्राप्त होते हैं।

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