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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 112

चान्द्रायण व्रत की विधि

युधिष्ठिर कृष्ण से चान्द्रायण व्रत की विधि पूछते हैं। कृष्ण क्रम से उसका वर्णन करते हैं: तैयारी, अग्नि में आहुतियाँ, स्नान और मन्त्र-जप, प्रतिदिन की भिक्षा और चन्द्रमा के साथ बढ़ते-घटते ग्रास, तथा आचरण के नियम। फिर वे उन पापों को गिनाते हैं जिन्हें यह व्रत भस्म कर देता है और उन दोषों को भी जिनका यह प्रायश्चित्त है, और अन्त में इससे मिलने वाले स्वर्ग का फल बताते हैं।

अध्याय 111अध्याय-सूचीअध्याय 113

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (14.112.1)

चक्रायुध नमस्तेऽस्तु देवेश गरुडध्वज । चान्द्रायणविधिं पुण्यमाख्याहि भगवन्मम ॥

cakrāyudha namaste'stu deveśa garuḍadhvaja | cāndrāyaṇavidhiṃ puṇyamākhyāhi bhagavanmama

हे चक्रधारी, देवेश्वर, गरुडध्वज, आपको नमस्कार है। हे भगवन्, मुझे चान्द्रायण व्रत की पवित्र विधि बताइए।

भगवानुवाच

श्लोक 2 (14.112.2)

शृणु पाण्डव तत्वेन सर्वपापप्रणाशनम् । पापिनो येन शुद्ध्यन्ति तत्ते वक्ष्यामि सर्वशः ॥

śṛṇu pāṇḍava tatvena sarvapāpapraṇāśanam | pāpino yena śuddhyanti tatte vakṣyāmi sarvaśaḥ

हे पाण्डव, सब पापों का नाश करने वाली इस विधि को ठीक-ठीक सुनो, जिससे पापी लोग शुद्ध हो जाते हैं। मैं तुम्हें यह पूरी बताता हूँ।

श्लोक 3 (14.112.3)

ब्राह्मणः क्षत्रियो वाऽपि वैश्यो वा चरितव्रतः । यथावत्कर्तुकामो वै तस्यैवं प्रथमा क्रिया ॥

brāhmaṇaḥ kṣatriyo vā'pi vaiśyo vā caritavrataḥ | yathāvatkartukāmo vai tasyaivaṃ prathamā kriyā

ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो या वैश्य, जो व्रतों का पालन कर चुका हो और इसे विधिपूर्वक करना चाहता हो, उसके लिए पहला कर्म यही है।

श्लोक 4 (14.112.4)

शोधयेत्तु शरीरं स्वं पञ्चगव्येन यन्त्रितः । सशिरः कृष्णपक्षस्य ततः कुर्वीत वापनम् ॥

śodhayettu śarīraṃ svaṃ pañcagavyena yantritaḥ | saśiraḥ kṛṣṇapakṣasya tataḥ kurvīta vāpanam

संयमी होकर वह पंचगव्य से अपने शरीर को शुद्ध करे, और फिर कृष्णपक्ष में सिर सहित मुण्डन कराए।

श्लोक 5 (14.112.5)

शुक्लवासाः शुचिर्भूत्वा मौञ्जीं बध्नीत मेखलाम् । पालाशदण्डमादाय ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ॥

śuklavāsāḥ śucirbhūtvā mauñjīṃ badhnīta mekhalām | pālāśadaṇḍamādāya brahmacārivrate sthitaḥ

श्वेत वस्त्र पहनकर और पवित्र होकर वह मूँज की मेखला बाँधे, पलाश का दण्ड हाथ में ले और ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित रहे।

श्लोक 6 (14.112.6)

कृतोपवासः पूर्वं तु शुक्लप्रतिपदि द्विजः । नदीसंगमतीर्थेषु शुचौ देशे गृहेऽपि वा । गोमयेनोपलिप्तेऽथ स्थण्डिलेऽग्निं निधापयन् ॥

kṛtopavāsaḥ pūrvaṃ tu śuklapratipadi dvijaḥ | nadīsaṃgamatīrtheṣu śucau deśe gṛhe'pi vā | gomayenopalipte'tha sthaṇḍile'gniṃ nidhāpayan

द्विज पहले शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को उपवास करे, फिर नदियों के संगम, किसी तीर्थ, किसी स्वच्छ स्थान अथवा अपने घर में ही गोबर से लीपी हुई वेदी पर अग्नि की स्थापना करे।

श्लोक 7 (14.112.7)

आघारावाज्यभागौ च प्रणवं व्याहृतीस्तथा । वारुणं चैव पञ्चैव हुत्वा सर्वान्यथाक्रमम् ॥

āghārāvājyabhāgau ca praṇavaṃ vyāhṛtīstathā | vāruṇaṃ caiva pañcaiva hutvā sarvānyathākramam

फिर वह क्रम से आहुतियाँ दे: आघार और आज्यभाग, प्रणव, व्याहृतियाँ तथा वारुण आहुति, इस प्रकार कुल पाँच।

श्लोक 8 (14.112.8)

सत्याय विष्णवे चेति ब्रह्मर्षिभ्योऽथ ब्रह्मणे । विश्वेभ्यो हि च देवेभ्यः सप्रजापतये तथा ॥

satyāya viṣṇave ceti brahmarṣibhyo'tha brahmaṇe | viśvebhyo hi ca devebhyaḥ saprajāpataye tathā

तदनन्तर सत्य को, विष्णु को, ब्रह्मर्षियों को, ब्रह्मा को, विश्वेदेवों को और प्रजापति को भी—

श्लोक 9 (14.112.9)

षडुक्त्वा जुहुयात्पश्चात्प्रायश्चित्ताहुतिं द्विजः । अतः समापयेदग्निं शान्तिं कृत्वाऽथ पौष्टिकम् ॥

ṣaḍuktvā juhuyātpaścātprāyaścittāhutiṃ dvijaḥ | ataḥ samāpayedagniṃ śāntiṃ kṛtvā'tha pauṣṭikam

इन छहों का नाम लेकर द्विज बाद में प्रायश्चित्त की आहुति दे। फिर शान्ति और पुष्टि के कर्म करके अग्नि का विसर्जन करे।

श्लोक 10 (14.112.10)

प्रणम्य चाग्निं सोमं च भस्म दिग्ध्वा यथाविधि । नदीं गत्वा विशुद्धात्मा सोमाय वरुणाय च । आदित्याय नमस्कृत्वा ततः स्नायात्समाहितः ॥

praṇamya cāgniṃ somaṃ ca bhasma digdhvā yathāvidhi | nadīṃ gatvā viśuddhātmā somāya varuṇāya ca | ādityāya namaskṛtvā tataḥ snāyātsamāhitaḥ

अग्नि और सोम को प्रणाम करके तथा विधि के अनुसार भस्म लगाकर वह शुद्ध मन से नदी पर जाए, सोम, वरुण और आदित्य को नमस्कार करे और फिर एकाग्र होकर स्नान करे।

श्लोक 11 (14.112.11)

उत्तीर्योदकमाचम्य चासीनः पूर्वतोमुखः । प्राणायामं ततः कृत्वा पवित्रैरभिषेचनम् ॥

uttīryodakamācamya cāsīnaḥ pūrvatomukhaḥ | prāṇāyāmaṃ tataḥ kṛtvā pavitrairabhiṣecanam

जल से बाहर आकर और आचमन करके वह पूर्व की ओर मुख करके बैठे, प्राणायाम करे और फिर पवित्र जल से अपना अभिषेक करे।

श्लोक 12 (14.112.12)

आचान्तस्त्वभिवीक्षेत ऊर्ध्वबाहुर्दिवाकरम् । कृताञ्जलिपुटः स्थित्वा कुर्याच्चैव प्रदक्षिणम् ॥

ācāntastvabhivīkṣeta ūrdhvabāhurdivākaram | kṛtāñjalipuṭaḥ sthitvā kuryāccaiva pradakṣiṇam

आचमन करके वह दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सूर्य को देखे, फिर हाथ जोड़कर खड़ा हो और प्रदक्षिणा करे।

श्लोक 13 (14.112.13)

नारायणं वा रुद्रं वा ब्रह्माणमथवाऽपि च । वारुणं मन्त्रसूक्तं वा प्राग्भोजनमथापि वा ॥

nārāyaṇaṃ vā rudraṃ vā brahmāṇamathavā'pi ca | vāruṇaṃ mantrasūktaṃ vā prāgbhojanamathāpi vā

फिर वह नारायण, रुद्र या ब्रह्मा का मन्त्र, वरुण का सूक्त अथवा भोजन से पहले बोला जाने वाला मन्त्र जपे,

श्लोक 14 (14.112.14)

वीरघ्नमृषभं वाऽपि तथा चाप्यघमर्षणम् । गायत्रीं मम देवीं वा सावित्रीं वा जपेत्ततः । शतं वाऽष्टशतं वाऽपि सहस्रमथवा परम् ॥

vīraghnamṛṣabhaṃ vā'pi tathā cāpyaghamarṣaṇam | gāyatrīṃ mama devīṃ vā sāvitrīṃ vā japettataḥ | śataṃ vā'ṣṭaśataṃ vā'pi sahasramathavā param

अथवा वीरघ्न, ऋषभ या अघमर्षण का जप करे, या मेरी देवी गायत्री अथवा सावित्री का—सौ बार, एक सौ आठ बार, या हजार बार और उससे भी अधिक।

श्लोक 15 (14.112.15)

ततो मध्याह्नकाले वै पायसं यावकं हि वा । पाचयित्वा प्रयत्नेन प्रयतः सुसमाहितः ॥

tato madhyāhnakāle vai pāyasaṃ yāvakaṃ hi vā | pācayitvā prayatnena prayataḥ susamāhitaḥ

फिर मध्याह्न के समय वह संयत और एकाग्र होकर यत्नपूर्वक खीर या यवागू पकाए।

श्लोक 16 (14.112.16)

पात्रं तु सुसमादाय सौवर्णं राजतं तु वा । ताम्रं वा मृन्मयं वापि औदुंबरमथापि वा ॥

pātraṃ tu susamādāya sauvarṇaṃ rājataṃ tu vā | tāmraṃ vā mṛnmayaṃ vāpi auduṃbaramathāpi vā

फिर सोने, चाँदी, ताँबे, मिट्टी या गूलर की लकड़ी का पात्र लेकर—

श्लोक 17 (14.112.17)

वृक्षाणां याज्ञियानां तु पर्णैरार्द्रैरकुत्सितैः । पुटकेन तु गुप्तेन चरेद्भैक्षं समाहितः ॥

vṛkṣāṇāṃ yājñiyānāṃ tu parṇairārdrairakutsitaiḥ | puṭakena tu guptena caredbhaikṣaṃ samāhitaḥ

अथवा यज्ञ के योग्य वृक्षों के ताज़े और निर्दोष पत्तों का ढका हुआ दोना बनाकर, एकाग्र मन से भिक्षा माँगने जाए।

श्लोक 18 (14.112.18)

ब्राह्मणानां गृहाणां तु सप्तानां नापरं व्रजेत् । गोदोहमात्रं तिष्ठेत्तु वाग्यतः संयतेन्द्रियः ॥

brāhmaṇānāṃ gṛhāṇāṃ tu saptānāṃ nāparaṃ vrajet | godohamātraṃ tiṣṭhettu vāgyataḥ saṃyatendriyaḥ

वह ब्राह्मणों के सात घरों से आगे न जाए, और प्रत्येक द्वार पर केवल उतनी देर ठहरे जितनी देर में गाय दुही जाती है; मौन रहे और इन्द्रियों को वश में रखे।

श्लोक 19 (14.112.19)

न हसेन्न च वीक्षेत नाभिभाषेत वा स्त्रियम् ॥

na hasenna ca vīkṣeta nābhibhāṣeta vā striyam

वह न हँसे, न किसी स्त्री की ओर देखे और न उससे बात करे।

श्लोक 20 (14.112.20)

दृष्ट्वा मूत्रं पुरीषं वा चण्डालं वा रजस्वलाम् । पतितं च तथा श्वानमादित्यमवलोकयेत् ॥

dṛṣṭvā mūtraṃ purīṣaṃ vā caṇḍālaṃ vā rajasvalām | patitaṃ ca tathā śvānamādityamavalokayet

यदि वह मूत्र या मल, चाण्डाल, रजस्वला स्त्री, पतित मनुष्य अथवा कुत्ते को देख ले, तो सूर्य की ओर देखे।

श्लोक 21 (14.112.21)

यो हि पादुकमारुह्य सर्वदा प्रचरेद्द्विजः । तं दृष्ट्वा पापकर्माणमादित्यमवलोकयेत् ॥

yo hi pādukamāruhya sarvadā pracareddvijaḥ | taṃ dṛṣṭvā pāpakarmāṇamādityamavalokayet

जो द्विज सदा खड़ाऊँ पर चढ़कर चलता है, वह पापकर्म करने वाला है; उसे देखकर भी वह सूर्य को देखे।

श्लोक 22 (14.112.22)

ततस्त्वावसथं प्राप्तो भिक्षां निक्षिप्य भूतले । प्रक्षाल्य पादावाजान्वोर्हस्तावाकूर्परं पुनः । आचम्य वारिणा तेन वह्निं विप्रांश्च पूजयेत् ॥

tatastvāvasathaṃ prāpto bhikṣāṃ nikṣipya bhūtale | prakṣālya pādāvājānvorhastāvākūrparaṃ punaḥ | ācamya vāriṇā tena vahniṃ viprāṃśca pūjayet

फिर अपने निवास पर पहुँचकर वह भिक्षा को भूमि पर रखे, घुटनों तक पैर और कोहनियों तक हाथ धोए, आचमन करे और उसी जल से अग्नि तथा ब्राह्मणों का पूजन करे।

श्लोक 23 (14.112.23)

पञ्च सप्ताथवा कुर्याद्भागान्भैक्षस्य तस्य वै । तेषामन्यतमं पिण्डमादित्याय निवेदयेत् ॥

pañca saptāthavā kuryādbhāgānbhaikṣasya tasya vai | teṣāmanyatamaṃ piṇḍamādityāya nivedayet

वह उस भिक्षा के पाँच या सात भाग करे और उनमें से एक भाग सूर्य को अर्पित करे।

श्लोक 24 (14.112.24)

ब्रह्मणे चाग्नये चैव सोमाय वरुणाय च । विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो दद्यादन्नं यथाक्रमम् ॥

brahmaṇe cāgnaye caiva somāya varuṇāya ca | viśvebhyaścaiva devebhyo dadyādannaṃ yathākramam

ब्रह्मा, अग्नि, सोम, वरुण और विश्वेदेवों को वह क्रम से अन्न दे।

श्लोक 25 (14.112.25)

अवशिष्टमथैकं तु वक्त्रमात्रं प्रकल्पयेत् ॥

avaśiṣṭamathaikaṃ tu vaktramātraṃ prakalpayet

जो एक भाग बचे, उसे केवल एक ग्रास के बराबर बनाए।

श्लोक 26 (14.112.26)

अङ्गुल्यग्रे स्थितं पिण्डं गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत् । अङ्गुलीभिस्त्रिभिः पिण्डं प्राश्नीयात्प्राङ्मुखः शुचिः ॥

aṅgulyagre sthitaṃ piṇḍaṃ gāyatryā cābhimantrayet | aṅgulībhistribhiḥ piṇḍaṃ prāśnīyātprāṅmukhaḥ śuciḥ

उँगली के सिरे पर रखे हुए ग्रास को वह गायत्री से अभिमन्त्रित करे; फिर पवित्र होकर पूर्वमुख बैठे और तीन उँगलियों से उस ग्रास को खाए।

श्लोक 27 (14.112.27)

यथा च वर्धते सोमो ह्रसते च यथा पुनः । तथा पिण्डाश्च वर्धन्ते ह्रसन्ते च दिनेदिने ॥

yathā ca vardhate somo hrasate ca yathā punaḥ | tathā piṇḍāśca vardhante hrasante ca dinedine

जैसे चन्द्रमा बढ़ता है और फिर घटता है, वैसे ही ग्रास भी दिन-प्रतिदिन बढ़ते और घटते हैं।

श्लोक 28 (14.112.28)

त्रिकालं स्नानमस्योक्तं द्विकालमथवा सकृत् । ब्रह्मचारी सदा वाऽपि न च वस्त्रं प्रपीडयेत् ॥

trikālaṃ snānamasyoktaṃ dvikālamathavā sakṛt | brahmacārī sadā vā'pi na ca vastraṃ prapīḍayet

उसके लिए दिन में तीन बार स्नान बताया गया है, अथवा दो बार या एक बार; वह सदा ब्रह्मचारी रहे और अपने वस्त्र को निचोड़े नहीं।

श्लोक 29 (14.112.29)

स्थाने न दिवसं तिष्ठेद्रात्रौ वीरासनं व्रजेत् । भवेत्स्थण्डिलशायी वाऽप्यथ वा वृक्षमूलिकः ॥

sthāne na divasaṃ tiṣṭhedrātrau vīrāsanaṃ vrajet | bhavetsthaṇḍilaśāyī vā'pyatha vā vṛkṣamūlikaḥ

दिन में वह एक स्थान पर न टिके, रात में वीरासन में बैठे। अथवा वह खुली भूमि पर सोए या वृक्ष के नीचे रहे।

श्लोक 30 (14.112.30)

वल्कलं यदि वा क्षौमं शाणं कार्पासकं तथा । आच्छादनं भवेत्तस्य वस्त्रार्थं पाण्डुनन्दन ॥

valkalaṃ yadi vā kṣaumaṃ śāṇaṃ kārpāsakaṃ tathā | ācchādanaṃ bhavettasya vastrārthaṃ pāṇḍunandana

हे पाण्डुपुत्र, उसका आच्छादन वल्कल, क्षौम, सन या सूती वस्त्र हो सकता है।

श्लोक 31 (14.112.31)

एवं चान्द्रायणे पूर्णे मासस्यान्ते प्रयत्नवान् । ब्राह्मणान्भोजयेद्भक्त्या दद्याच्चैव च दक्षिणाम् ॥

evaṃ cāndrāyaṇe pūrṇe māsasyānte prayatnavān | brāhmaṇānbhojayedbhaktyā dadyāccaiva ca dakṣiṇām

इस प्रकार चान्द्रायण पूरा होने पर महीने के अन्त में वह यत्नपूर्वक भक्ति से ब्राह्मणों को भोजन कराए और उन्हें दक्षिणा दे।

श्लोक 32 (14.112.32)

चान्द्रायणेन चीर्णेन यत्कृतं तेन दुष्कृतम् । तत्सर्वं तत्क्षणादेव भस्मीभवति काष्ठवत् ॥

cāndrāyaṇena cīrṇena yatkṛtaṃ tena duṣkṛtam | tatsarvaṃ tatkṣaṇādeva bhasmībhavati kāṣṭhavat

चान्द्रायण का पालन कर लेने पर जो भी पाप किया गया हो, वह उसी क्षण लकड़ी की तरह जलकर भस्म हो जाता है।

श्लोक 33 (14.112.33)

ब्रह्महत्या च गोहत्या सुवर्णस्तैन्यमेव च । भ्रूणहत्या सुरापानं गुरोर्दारव्यतिक्रमः ॥

brahmahatyā ca gohatyā suvarṇastainyameva ca | bhrūṇahatyā surāpānaṃ gurordāravyatikramaḥ

ब्रह्महत्या, गोहत्या, सोने की चोरी, भ्रूणहत्या, मदिरापान और गुरुपत्नी के साथ अनाचार—

श्लोक 34 (14.112.34)

एवमन्यानि पापानि पातकीयानि यानि च । चान्द्रायणेन नश्यन्ति वायुना पांसवो यथा ॥

evamanyāni pāpāni pātakīyāni yāni ca | cāndrāyaṇena naśyanti vāyunā pāṃsavo yathā

ये तथा इसी प्रकार के और जो भी पातक हैं, वे चान्द्रायण से वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे हवा से धूल उड़ जाती है।

श्लोक 35 (14.112.35)

अनिर्दशाया गोः क्षीरमौष्ठ्रमाविकमेव च । मृतसूतकयोश्चान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

anirdaśāyā goḥ kṣīramauṣṭhramāvikameva ca | mṛtasūtakayoścānnaṃ bhuktvā cāndrāyaṇaṃ caret

जिस गाय को ब्याए दस दिन न हुए हों उसका दूध, ऊँटनी या भेड़ का दूध, अथवा जन्म या मृत्यु के सूतक वाले घर का अन्न खाकर चान्द्रायण करना चाहिए।

श्लोक 36 (14.112.36)

उपपातकिनश्चान्नं पतितान्नं तथैव च । शूद्रस्योच्छेषणं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

upapātakinaścānnaṃ patitānnaṃ tathaiva ca | śūdrasyoccheṣaṇaṃ caiva bhuktvā cāndrāyaṇaṃ caret

उपपातकी का अन्न, पतित का अन्न तथा शूद्र का जूठन खाकर चान्द्रायण करना चाहिए।

श्लोक 37 (14.112.37)

आकाशस्थं तु हस्तस्थमधः स्रस्तं तथैव च । परहस्तस्थितं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

ākāśasthaṃ tu hastasthamadhaḥ srastaṃ tathaiva ca | parahastasthitaṃ caiva bhuktvā cāndrāyaṇaṃ caret

जो अन्न आकाश में रखा हो, हाथ में रखा हो, नीचे गिर पड़ा हो या दूसरे के हाथ में टिका हो, उसे खाकर चान्द्रायण करना चाहिए।

श्लोक 38 (14.112.38)

अथाग्रेधिषोरन्नं दिधिषूपपतेस्तथा । परिवेत्तुस्तथा चान्नं परिवित्तान्नमेव च ॥

athāgredhiṣorannaṃ didhiṣūpapatestathā | parivettustathā cānnaṃ parivittānnameva ca

अग्रेदिधिषू का अन्न, दिधिषूपति का अन्न, परिवेत्ता का अन्न और परिवित्त का अन्न,

श्लोक 39 (14.112.39)

कुण्डान्नं गोलकान्नं च देवलान्नं तथैव च । तथा पुरोहितस्यान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

kuṇḍānnaṃ golakānnaṃ ca devalānnaṃ tathaiva ca | tathā purohitasyānnaṃ bhuktvā cāndrāyaṇaṃ caret

कुण्ड का अन्न, गोलक का अन्न, देवल का अन्न और पुरोहित का अन्न खाकर चान्द्रायण करना चाहिए।

श्लोक 40 (14.112.40)

सुराऽऽसवं विषं सर्पिर्लाक्षा लवणमेव च । तैलं चापि च विक्रीणन्द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥

surā''savaṃ viṣaṃ sarpirlākṣā lavaṇameva ca | tailaṃ cāpi ca vikrīṇandvijaścāndrāyaṇaṃ caret

जो द्विज मदिरा, विष, घी, लाख, नमक या तेल बेचता है, उसे चान्द्रायण करना चाहिए।

श्लोक 41 (14.112.41)

एकोद्दिष्टं तु यो भुङ्क्ते जनमध्यगतोऽपि यः । भिन्नभाण्डेषु यो भुङ्क्ते द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥

ekoddiṣṭaṃ tu yo bhuṅkte janamadhyagato'pi yaḥ | bhinnabhāṇḍeṣu yo bhuṅkte dvijaścāndrāyaṇaṃ caret

जो द्विज एकोद्दिष्ट का भोजन करता है, या लोगों के बीच बैठकर खाता है, या टूटे हुए बर्तनों में खाता है, उसे चान्द्रायण करना चाहिए।

श्लोक 42 (14.112.42)

यो भुङ्क्तेऽनुपनीतेन यो भुङ्क्ते च स्त्रिया सह । कन्यया सह यो भुङ्क्ते द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥

yo bhuṅkte'nupanītena yo bhuṅkte ca striyā saha | kanyayā saha yo bhuṅkte dvijaścāndrāyaṇaṃ caret

जो द्विज अनुपनीत के साथ खाता है, स्त्री के साथ खाता है, या कन्या के साथ खाता है, उसे चान्द्रायण करना चाहिए।

श्लोक 43 (14.112.43)

उच्छिष्टं स्थापयेद्विप्रो यो मोहाद्भोजनान्तरे । दद्याद्वा यदि वा मोहाद्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥

ucchiṣṭaṃ sthāpayedvipro yo mohādbhojanāntare | dadyādvā yadi vā mohādvijaścāndrāyaṇaṃ caret

जो ब्राह्मण मोहवश भोजन के बीच में अपना जूठा अलग रख देता है या मोहवश उसे किसी को दे देता है, उसे चान्द्रायण करना चाहिए।

श्लोक 44 (14.112.44)

तुम्बकोशातकं चैव पलाण्डुं गृञ्जनं तथा । छत्राकं लशुनं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

tumbakośātakaṃ caiva palāṇḍuṃ gṛñjanaṃ tathā | chatrākaṃ laśunaṃ caiva bhuktvā cāndrāyaṇaṃ caret

लौकी, तोरई, प्याज, गाजर-जाति का गृञ्जन, कुकुरमुत्ता या लहसुन खाकर चान्द्रायण करना चाहिए।

श्लोक 45 (14.112.45)

द्विजः पर्युषितं चान्नं पक्वं परगृहागतम् । विपक्वं च तथा मांसं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

dvijaḥ paryuṣitaṃ cānnaṃ pakvaṃ paragṛhāgatam | vipakvaṃ ca tathā māṃsaṃ bhuktvā cāndrāyaṇaṃ caret

बासी अन्न, दूसरे के घर से आया हुआ पका अन्न, या ठीक से न पका मांस खाकर द्विज को चान्द्रायण करना चाहिए।

श्लोक 46 (14.112.46)

उदक्यया शुना वाऽपि चण्डालैर्वा द्विजोत्तमः । दृष्टमन्नं तु भुञ्जानो द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥

udakyayā śunā vā'pi caṇḍālairvā dvijottamaḥ | dṛṣṭamannaṃ tu bhuñjāno dvijaścāndrāyaṇaṃ caret

जो श्रेष्ठ द्विज रजस्वला स्त्री, कुत्ते या चाण्डालों की दृष्टि पड़ा हुआ अन्न खाता है, उसे चान्द्रायण करना चाहिए।

श्लोक 47 (14.112.47)

तत्पुरा विशुद्ध्यर्थमृषिभिश्चरितं व्रतम् । पावनं सर्वभूतानां पुण्यं पाण्डवचोदितम् ॥

tatpurā viśuddhyarthamṛṣibhiścaritaṃ vratam | pāvanaṃ sarvabhūtānāṃ puṇyaṃ pāṇḍavacoditam

यह व्रत प्राचीन काल में ऋषियों ने शुद्धि के लिए किया था। हे पाण्डव, यह सब प्राणियों को पवित्र करने वाला और पुण्यदायी बताया गया है।

श्लोक 48 (14.112.48)

एतेन वसवो रुद्राश्चादित्याश्च दिवं गताः । एतदद्य परं गुह्यं पवित्रं पापनाशनम् ॥

etena vasavo rudrāścādityāśca divaṃ gatāḥ | etadadya paraṃ guhyaṃ pavitraṃ pāpanāśanam

इसी से वसु, रुद्र और आदित्य स्वर्ग को गए। यह परम गोपनीय, पवित्र करने वाला और पाप का नाश करने वाला है।

श्लोक 49 (14.112.49)

यथोक्तमेतद्यः कुर्याद्द्विजः पापप्रणाशनम् । स दिवं याति पूतात्मा निर्मलादित्यसंनिभः ॥

yathoktametadyaḥ kuryāddvijaḥ pāpapraṇāśanam | sa divaṃ yāti pūtātmā nirmalādityasaṃnibhaḥ

जो द्विज पापों का नाश करने वाले इस व्रत को जैसा कहा गया है वैसा करता है, वह शुद्ध आत्मा वाला होकर निर्मल सूर्य के समान तेजस्वी रूप में स्वर्ग को जाता है।

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