आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 113
बारह मासों में एकभुक्त व्रत और उसका फल
युधिष्ठिर कृष्ण से ऐसा धर्म पूछते हैं जो सब प्राणियों का हित करे। कृष्ण कार्तिक से आश्वयुज तक, प्रत्येक मास में दिन में एक बार भोजन करने का व्रत बताते हैं। हर मास के लिए वे उसके साथ की पूजा और दान तथा उसका फल कहते हैं: कपिला गौ, अग्निहोत्र, अग्निष्टोम, राजसूय और अश्वमेध का पुण्य, फिर संसार के किसी वर्ष में जन्म और अन्त में ब्राह्मण या राजा के रूप में जन्म।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.113.1)
केशवेनैवमुक्ते तु चान्द्रायणविधिक्रमे । अपृच्छत्पुनरन्यांश्च धर्मान्धर्मात्मजो नृप ॥
keśavenaivamukte tu cāndrāyaṇavidhikrame | apṛcchatpunaranyāṃśca dharmāndharmātmajo nṛpa
केशव के चान्द्रायण की विधि इस प्रकार बता चुकने पर, हे राजन्, धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने फिर दूसरे धर्मों के विषय में पूछा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (14.113.2)
सर्वभूतपते श्रीमन्सर्वभूतनमस्कृत । सर्वभूतहितं धर्मं सर्वज्ञ कथयस्व नः ॥
sarvabhūtapate śrīmansarvabhūtanamaskṛta | sarvabhūtahitaṃ dharmaṃ sarvajña kathayasva naḥ
हे सब प्राणियों के स्वामी, श्रीमान्, सब प्राणियों से नमस्कृत, सर्वज्ञ, हमें वह धर्म बताइए जो सब प्राणियों का हित करने वाला है।
भगवानुवाच
श्लोक 3 (14.113.3)
यद्दरिद्रजनस्यापि स्वर्ग्यं सुखकरं भवेत् । सर्वपापप्रशमनं तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ॥
yaddaridrajanasyāpi svargyaṃ sukhakaraṃ bhavet | sarvapāpapraśamanaṃ tacchṛṇuṣva yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर, सुनो—वह धर्म जो दरिद्र मनुष्य को भी स्वर्ग और सुख देने वाला है और सब पापों को शान्त करने वाला है।
श्लोक 4 (14.113.4)
कार्तिकाद्यास्तु ये मासा द्वादशैव प्रकीर्तिताः । तेष्वेकभुक्तनियमः सर्वेषामुच्यते मया ॥
kārtikādyāstu ye māsā dvādaśaiva prakīrtitāḥ | teṣvekabhuktaniyamaḥ sarveṣāmucyate mayā
कार्तिक से आरम्भ होने वाले बारह ही मास कहे गए हैं; उन सबके लिए मैं एक बार भोजन करने का नियम बताता हूँ।
श्लोक 5 (14.113.5)
कार्तिके यस्तु वै मासे नन्दायां संयतेन्द्रियः । एकभुक्तेन मद्भक्तो मासमेकं तु वर्तते ॥
kārtike yastu vai māse nandāyāṃ saṃyatendriyaḥ | ekabhuktena madbhakto māsamekaṃ tu vartate
जो मनुष्य कार्तिक मास में नन्दा तिथि पर इन्द्रियों को संयम में रखकर, मेरा भक्त होकर, एक महीने तक दिन में एक ही बार भोजन करता है,
श्लोक 6 (14.113.6)
जलं वा न पिबेन्मासे नान्तरं भोजनात्परम् । आदित्यरूपं मां नित्यमर्चयन्सुसमाहितः ॥
jalaṃ vā na pibenmāse nāntaraṃ bhojanātparam | ādityarūpaṃ māṃ nityamarcayansusamāhitaḥ
वह उस मास में जल भी न पिए और भोजन के सिवा बीच में कुछ न ले, तथा एकाग्र मन से सूर्य रूप में मेरी नित्य पूजा करे।
श्लोक 7 (14.113.7)
व्रतान्ते भोजयेद्विप्रान्दक्षिणां सम्प्रदाय च । क्रोधलोभविनिर्मुक्तस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
vratānte bhojayedviprāndakṣiṇāṃ sampradāya ca | krodhalobhavinirmuktastasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
व्रत के अन्त में वह क्रोध और लोभ से मुक्त होकर ब्राह्मणों को भोजन कराए और दक्षिणा दे। अब उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 8 (14.113.8)
विधिवत्कपिलादाने यत्पुण्यं समुदाहृतम् । तत्पुण्यं समनुप्राप्य सूर्यलोके महीयते । ततश्चापि च्युतः कालात्पुरुषेषूपजायते ॥
vidhivatkapilādāne yatpuṇyaṃ samudāhṛtam | tatpuṇyaṃ samanuprāpya sūryaloke mahīyate | tataścāpi cyutaḥ kālātpuruṣeṣūpajāyate
विधिपूर्वक कपिला गौ के दान का जो पुण्य बताया गया है, वही पुण्य पाकर वह सूर्यलोक में सम्मानित होता है; फिर समय आने पर वहाँ से च्युत होकर वह मनुष्यों में जन्म लेता है।
श्लोक 9 (14.113.9)
मार्गशीर्षं तु यो मासमेकभुक्तेन वर्तते । कामं क्रोधं च लोभं च परित्यज्य यथाविधि ॥
mārgaśīrṣaṃ tu yo māsamekabhuktena vartate | kāmaṃ krodhaṃ ca lobhaṃ ca parityajya yathāvidhi
जो मनुष्य मार्गशीर्ष मास को विधिपूर्वक काम, क्रोध और लोभ को त्यागकर दिन में एक बार भोजन करके बिताता है,
श्लोक 10 (14.113.10)
स्नात्वा चादित्यरूपं मामर्चयेन्नियतेन्द्रियः । जपेच्चैव च गायत्रीं मामिकां वाग्यतेन्द्रियः ॥
snātvā cādityarūpaṃ māmarcayenniyatendriyaḥ | japeccaiva ca gāyatrīṃ māmikāṃ vāgyatendriyaḥ
और जो स्नान के बाद इन्द्रियों को वश में रखकर सूर्य रूप में मेरी पूजा करता है तथा मौन रहकर मेरी गायत्री का जप करता है,
श्लोक 11 (14.113.11)
मासे परिसमाप्ते तु भोजयित्वा द्विजाञ्शुचिः । तानर्चयति मद्भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
māse parisamāpte tu bhojayitvā dvijāñśuciḥ | tānarcayati madbhaktyā tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
और मास के पूरा होने पर पवित्र होकर पवित्र ब्राह्मणों को भोजन कराता और मेरी भक्ति से उनका सम्मान करता है—उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 12 (14.113.12)
अग्निहोत्रे कृते पुण्यमाहिताग्नेस्तु यद्भवेत् । तत्पुण्यं फलमासाद्य यानेनाम्बरशोभिना । सह सप्तर्षिलोकेषु यथाकामं यथासुखम् ॥
agnihotre kṛte puṇyamāhitāgnestu yadbhavet | tatpuṇyaṃ phalamāsādya yānenāmbaraśobhinā | saha saptarṣilokeṣu yathākāmaṃ yathāsukham
अग्निहोत्र करने से आहिताग्नि को जो पुण्य मिलता है, उस पुण्य का फल पाकर वह आकाश को सुशोभित करने वाले विमान में बैठकर सप्तर्षियों के लोकों में अपनी इच्छा के अनुसार सुखपूर्वक विचरता है।
श्लोक 13 (14.113.13)
ततश्चापि च्युतः कालाद्धरिवर्षेषु जायते । तत्र प्रकामं क्रीडित्वा राजा पश्चाद्भविष्यति ॥
tataścāpi cyutaḥ kālāddharivarṣeṣu jāyate | tatra prakāmaṃ krīḍitvā rājā paścādbhaviṣyati
फिर समय आने पर वहाँ से च्युत होकर वह हरिवर्ष में जन्म लेता है; वहाँ इच्छानुसार क्रीड़ा करके बाद में राजा होता है।
श्लोक 14 (14.113.14)
पौषमासं क्षिपेदेवमेकभुक्तेन यो नरः । अर्चयन्नेव मां नित्यं मद्गतेनान्तरात्मना ॥
pauṣamāsaṃ kṣipedevamekabhuktena yo naraḥ | arcayanneva māṃ nityaṃ madgatenāntarātmanā
जो मनुष्य पौष मास को इसी प्रकार दिन में एक बार भोजन करके बिताता है और मुझमें लगे अन्तःकरण से नित्य मेरी पूजा करता है,
श्लोक 15 (14.113.15)
अहिंसासत्यसहितः क्रोधहर्षविवर्जितः । एवं युक्तस्य राजेन्द्र शृणु यत्फलमुत्तमम् ॥
ahiṃsāsatyasahitaḥ krodhaharṣavivarjitaḥ | evaṃ yuktasya rājendra śṛṇu yatphalamuttamam
जो अहिंसा और सत्य से युक्त तथा क्रोध और हर्ष से रहित है—हे राजेन्द्र, ऐसे संयमी को जो उत्तम फल मिलता है उसे सुनो।
श्लोक 16 (14.113.16)
विप्रातिथ्यसहस्रेषु यत्पुण्यं समुदाहृतम् । तत्पुण्यं समनुप्राप्य शक्रलोके महीयते ॥
viprātithyasahasreṣu yatpuṇyaṃ samudāhṛtam | tatpuṇyaṃ samanuprāpya śakraloke mahīyate
हजारों ब्राह्मणों के आतिथ्य का जो पुण्य बताया गया है, उस पुण्य को पाकर वह इन्द्रलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 17 (14.113.17)
अवतीर्णस्ततः कालादिलावर्षेषु जायते । तत्र स्थित्वा चिरं कालमस्मिन्विप्रो भविष्यति ॥
avatīrṇastataḥ kālādilāvarṣeṣu jāyate | tatra sthitvā ciraṃ kālamasminvipro bhaviṣyati
समय आने पर वहाँ से उतरकर वह इलावर्ष में जन्म लेता है; वहाँ बहुत काल रहकर इस लोक में ब्राह्मण होगा।
श्लोक 18 (14.113.18)
माघमासं सदा यस्तु वर्तते चैकभुक्ततः । मदर्चनपरो भूत्वा डंभक्रोधविवर्जितः । मामिकामपि सावित्रीं सन्ध्यायां तु जपेद्बुधः ॥
māghamāsaṃ sadā yastu vartate caikabhuktataḥ | madarcanaparo bhūtvā ḍaṃbhakrodhavivarjitaḥ | māmikāmapi sāvitrīṃ sandhyāyāṃ tu japedbudhaḥ
जो ज्ञानी पुरुष माघ मास में सदा दिन में एक बार भोजन करता है, मेरी पूजा में तत्पर रहता है, दम्भ और क्रोध से रहित है, और सन्ध्या के समय मेरी सावित्री का जप करता है,
श्लोक 19 (14.113.19)
दत्त्वा तु दक्षिणामन्ते भोजयित्वा द्विजानपि । नमस्करोति तान्भक्त्या मद्गतेनान्तरात्मना । त्रिकालस्नानयुक्तस्य तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
dattvā tu dakṣiṇāmante bhojayitvā dvijānapi | namaskaroti tānbhaktyā madgatenāntarātmanā | trikālasnānayuktasya tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
और अन्त में दक्षिणा देकर ब्राह्मणों को भोजन कराके, मुझमें लगे अन्तःकरण से भक्तिपूर्वक उन्हें नमस्कार करता है तथा दिन में तीन बार स्नान करता है—उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 20 (14.113.20)
नीलकण्ठप्रयुक्तेन यानेनाम्बरशोभिना । पितृलोकं व्रजेच्छ्रीमान्सेव्यमानोऽप्सरोगणैः ॥
nīlakaṇṭhaprayuktena yānenāmbaraśobhinā | pitṛlokaṃ vrajecchrīmānsevyamāno'psarogaṇaiḥ
मोरों से जुते हुए, आकाश को सुशोभित करने वाले विमान में बैठकर वह श्रीमान् पुरुष पितृलोक को जाता है, जहाँ अप्सराओं के समूह उसकी सेवा करते हैं।
श्लोक 21 (14.113.21)
तत्र प्रकामं क्रीडित्वा भद्राश्वेषूपजायते । ततश्च्युतश्चतुर्वेदी विप्रो भवति भूतले ॥
tatra prakāmaṃ krīḍitvā bhadrāśveṣūpajāyate | tataścyutaścaturvedī vipro bhavati bhūtale
वहाँ इच्छानुसार क्रीड़ा करके वह भद्राश्व में जन्म लेता है; वहाँ से च्युत होकर पृथ्वी पर चारों वेदों का ज्ञाता ब्राह्मण होता है।
श्लोक 22 (14.113.22)
यश्चरेत्फाल्गुनं मासमेकभुक्तो जितेन्द्रियः । नमो ब्रह्मण्यदेवायेत्येतन्मन्त्रं जपेत्सदा ॥
yaścaretphālgunaṃ māsamekabhukto jitendriyaḥ | namo brahmaṇyadevāyetyetanmantraṃ japetsadā
जो मनुष्य इन्द्रियों को जीतकर फाल्गुन मास दिन में एक बार भोजन करके बिताता है और सदा "ब्राह्मणों के प्रिय देव को नमस्कार" यह मन्त्र जपता है,
श्लोक 23 (14.113.23)
पायसं भोजयेद्विप्रान्व्रतान्ते संयतेन्द्रियः । मदर्चनपरोऽक्रोधस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
pāyasaṃ bhojayedviprānvratānte saṃyatendriyaḥ | madarcanaparo'krodhastasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
और व्रत के अन्त में संयमी होकर ब्राह्मणों को खीर खिलाता है, मेरी पूजा में लगा रहता और क्रोध से रहित है—उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 24 (14.113.24)
विमानं सारसैर्युक्तमारूढः कामगामि च । नक्षत्रलोके रमते नक्षत्रसदृशाकृतिः ॥
vimānaṃ sārasairyuktamārūḍhaḥ kāmagāmi ca | nakṣatraloke ramate nakṣatrasadṛśākṛtiḥ
सारसों से जुते हुए, इच्छानुसार चलने वाले विमान पर आरूढ़ होकर वह तारों के लोक में तारे के समान रूप वाला होकर आनन्द करता है।
श्लोक 25 (14.113.25)
ततश्चापि च्युतः कालात्केतुमालेषु जायते । तत्र प्रकामं क्रीडित्वा मानुषेषु मुनिर्भवेत् ॥
tataścāpi cyutaḥ kālātketumāleṣu jāyate | tatra prakāmaṃ krīḍitvā mānuṣeṣu munirbhavet
फिर समय आने पर वहाँ से च्युत होकर वह केतुमाल में जन्म लेता है; वहाँ इच्छानुसार क्रीड़ा करके मनुष्यों में मुनि होता है।
श्लोक 26 (14.113.26)
चैत्रमासं तु यो राजन्नेकभुक्तेन वर्तते । ब्रह्मचारी च मद्भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
caitramāsaṃ tu yo rājannekabhuktena vartate | brahmacārī ca madbhaktyā tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
हे राजन्, जो मनुष्य चैत्र मास में ब्रह्मचारी रहकर मेरी भक्ति से दिन में एक बार भोजन करके व्रत करता है—उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 27 (14.113.27)
यदग्निहोत्रिणः पुण्यं यथोक्तं व्रतचारिणः । तत्पुण्यफलमासाद्य चन्द्रलोके महीयते ॥
yadagnihotriṇaḥ puṇyaṃ yathoktaṃ vratacāriṇaḥ | tatpuṇyaphalamāsādya candraloke mahīyate
व्रत करने वाले अग्निहोत्री का जो पुण्य बताया गया है, उस पुण्य का फल पाकर वह चन्द्रलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 28 (14.113.28)
ततोऽवतीर्णो जायेत वर्षे रमणके पुनः । भुक्त्वा कामांस्ततस्तस्मिन्निह राजा भविष्यति ॥
tato'vatīrṇo jāyeta varṣe ramaṇake punaḥ | bhuktvā kāmāṃstatastasminniha rājā bhaviṣyati
वहाँ से उतरकर वह फिर रमणक वर्ष में जन्म लेता है; वहाँ भोग भोगकर वह इस लोक में राजा होगा।
श्लोक 29 (14.113.29)
वैशाखे यस्तु मासे वै ह्येकभुक्तेन वर्तते । द्विजमग्रासने कृत्वा भुञ्जन्भूमौ च वाग्यतः ॥
vaiśākhe yastu māse vai hyekabhuktena vartate | dvijamagrāsane kṛtvā bhuñjanbhūmau ca vāgyataḥ
जो मनुष्य वैशाख मास में दिन में एक बार भोजन करता है, किसी ब्राह्मण को प्रथम आसन पर बैठाकर स्वयं मौन रहकर भूमि पर बैठे हुए भोजन करता है,
श्लोक 30 (14.113.30)
नमो ब्रह्मण्यदेवायेत्यर्चयित्वा दिवाकरम् । व्रतान्ते भोजयेद्विप्रांस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
namo brahmaṇyadevāyetyarcayitvā divākaram | vratānte bhojayedviprāṃstasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
और "ब्राह्मणों के प्रिय देव को नमस्कार" कहकर सूर्य की पूजा करके व्रत के अन्त में ब्राह्मणों को भोजन कराता है—उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 31 (14.113.31)
फलं यद्विधिवत्प्रोक्तमग्निष्टोमातिरात्रयोः । तत्पुण्यफलमासाद्य देवलोके महीयते ॥
phalaṃ yadvidhivatproktamagniṣṭomātirātrayoḥ | tatpuṇyaphalamāsādya devaloke mahīyate
अग्निष्टोम और अतिरात्र का जो फल विधिपूर्वक बताया गया है, उस पुण्य का फल पाकर वह देवलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 32 (14.113.32)
ततो हैमवते वर्षे जायते कालपर्ययात् । तत्र प्रकामं क्रीडित्वा विप्रः पश्चाद्भविष्यति ॥
tato haimavate varṣe jāyate kālaparyayāt | tatra prakāmaṃ krīḍitvā vipraḥ paścādbhaviṣyati
फिर समय के फेर से वह हैमवत वर्ष में जन्म लेता है; वहाँ इच्छानुसार क्रीड़ा करके बाद में ब्राह्मण होता है।
श्लोक 33 (14.113.33)
ज्येष्ठमासं तु यो विप्रो ह्येकभुक्तेन वर्तते । विप्रमग्रासने कृत्वा भूमौ भुञ्जन्यथाविधि ॥
jyeṣṭhamāsaṃ tu yo vipro hyekabhuktena vartate | vipramagrāsane kṛtvā bhūmau bhuñjanyathāvidhi
जो ब्राह्मण ज्येष्ठ मास में दिन में एक बार भोजन करता है, किसी ब्राह्मण को प्रथम आसन पर बैठाकर विधिपूर्वक भूमि पर भोजन करता है,
श्लोक 34 (14.113.34)
नमो ब्रह्मण्यदेवायेत्युच्चरन्मां समाहितः । डंभानृतविनिर्मुक्तस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
namo brahmaṇyadevāyetyuccaranmāṃ samāhitaḥ | ḍaṃbhānṛtavinirmuktastasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
और एकाग्र मन से मुझे "ब्राह्मणों के प्रिय देव को नमस्कार" कहता है, तथा दम्भ और असत्य से रहित है—उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 35 (14.113.35)
चीर्णे चान्द्रायणे सम्यग्यत्पुण्यं समुदाहृतम् । तत्पुण्यफलमासाद्य देवलोके महीयते ॥
cīrṇe cāndrāyaṇe samyagyatpuṇyaṃ samudāhṛtam | tatpuṇyaphalamāsādya devaloke mahīyate
चान्द्रायण के भली-भाँति पूर्ण करने का जो पुण्य बताया गया है, उस पुण्य का फल पाकर वह देवलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 36 (14.113.36)
अथोत्तरकुरौ वर्षे जायते निर्गतस्ततः । ततश्चापि च्युतः कालादिह लोके द्विजो भवेत् ॥
athottarakurau varṣe jāyate nirgatastataḥ | tataścāpi cyutaḥ kālādiha loke dvijo bhavet
फिर वहाँ से निकलकर वह उत्तरकुरु वर्ष में जन्म लेता है; वहाँ से समय आने पर च्युत होकर इस लोक में द्विज होता है।
श्लोक 37 (14.113.37)
आषाढमासं यो राजन्नेकभुक्तेन वर्तते । ब्रह्मचारी जितक्रोधो मदर्चनपरायणः ॥
āṣāḍhamāsaṃ yo rājannekabhuktena vartate | brahmacārī jitakrodho madarcanaparāyaṇaḥ
हे राजन्, जो मनुष्य आषाढ़ मास में दिन में एक बार भोजन करता है, ब्रह्मचारी है, क्रोध को जीत चुका है और मेरी पूजा में लगा रहता है,
श्लोक 38 (14.113.38)
विप्रमग्रासने कृत्वा भूमौ भुञ्जञ्जितेन्द्रियः । कृत्वा त्रिषवणं स्नानमष्टाक्षरविधानतः ॥
vipramagrāsane kṛtvā bhūmau bhuñjañjitendriyaḥ | kṛtvā triṣavaṇaṃ snānamaṣṭākṣaravidhānataḥ
जो ब्राह्मण को प्रथम आसन पर बैठाकर इन्द्रियों को जीते हुए भूमि पर भोजन करता है, और अष्टाक्षर मन्त्र की विधि से तीनों सन्ध्याओं में स्नान करता है,
श्लोक 39 (14.113.39)
व्रतान्ते भोजयेद्विद्वान्पायसेन युधिष्ठिर । गुडोदनेन राजेन्द्र तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
vratānte bhojayedvidvānpāyasena yudhiṣṭhira | guḍodanena rājendra tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
और जो विद्वान् व्रत के अन्त में, हे युधिष्ठिर, ब्राह्मणों को खीर से और, हे राजेन्द्र, गुड़ के भात से भोजन कराता है—उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 40 (14.113.40)
कपिलाशतदानस्य यत्पुण्यं पाण्डुनन्दन । तत्पुण्यफलमासाद्य देवलोके महीयते ॥
kapilāśatadānasya yatpuṇyaṃ pāṇḍunandana | tatpuṇyaphalamāsādya devaloke mahīyate
हे पाण्डुनन्दन, सौ कपिला गौओं के दान का जो पुण्य है, उस पुण्य का फल पाकर वह देवलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 41 (14.113.41)
ततोऽवतीर्णः काले तु शाकद्वीपे तु जायते । ततश्चापि च्युतः कालादिह विप्रो भविष्यति ॥
tato'vatīrṇaḥ kāle tu śākadvīpe tu jāyate | tataścāpi cyutaḥ kālādiha vipro bhaviṣyati
समय आने पर वहाँ से उतरकर वह शाकद्वीप में जन्म लेता है; फिर समय आने पर वहाँ से च्युत होकर यहाँ ब्राह्मण होगा।
श्लोक 42 (14.113.42)
श्रावणं यः क्षिपेन्मासमेकभुक्तेन वर्तते । नमो ब्रह्मण्यदेवायेत्युक्त्वा मामर्चयेत्सदा । विप्रमग्रासने कृत्वा भूमौ भुञ्जन्यथाविधि ॥
śrāvaṇaṃ yaḥ kṣipenmāsamekabhuktena vartate | namo brahmaṇyadevāyetyuktvā māmarcayetsadā | vipramagrāsane kṛtvā bhūmau bhuñjanyathāvidhi
जो मनुष्य श्रावण मास दिन में एक बार भोजन करके बिताता है, "ब्राह्मणों के प्रिय देव को नमस्कार" कहकर सदा मेरी पूजा करता है, और ब्राह्मण को प्रथम आसन पर बैठाकर विधि के अनुसार भूमि पर भोजन करता है,
श्लोक 43 (14.113.43)
पायसेनार्चयन्विप्राञ्जितक्रोधो जितेन्द्रियः । लोभमोहविनिर्मुक्तस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
pāyasenārcayanviprāñjitakrodho jitendriyaḥ | lobhamohavinirmuktastasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
जो क्रोध और इन्द्रियों को जीतकर ब्राह्मणों का खीर से सत्कार करता है तथा लोभ और मोह से मुक्त है—उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 44 (14.113.44)
कपिलादानस्य यत्पुण्यं विधिदत्तस्य पाण्डव । तत्पुण्यं समनुप्राप्य शक्रलोके महीयते ॥
kapilādānasya yatpuṇyaṃ vidhidattasya pāṇḍava | tatpuṇyaṃ samanuprāpya śakraloke mahīyate
हे पाण्डव, विधिपूर्वक दी गई कपिला गौ के दान का जो पुण्य है, उसे पाकर वह इन्द्रलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 45 (14.113.45)
ततश्चापि च्युतः कालात्कुशद्वीपे प्रजायते । तत्र प्रकामं क्रीडित्वा विप्रो भवति मानुषे ॥
tataścāpi cyutaḥ kālātkuśadvīpe prajāyate | tatra prakāmaṃ krīḍitvā vipro bhavati mānuṣe
फिर समय आने पर वहाँ से च्युत होकर वह कुशद्वीप में जन्म लेता है; वहाँ इच्छानुसार क्रीड़ा करके मनुष्यों में ब्राह्मण होता है।
श्लोक 46 (14.113.46)
यस्तु भाद्रपदं मासमेकभुक्तेन वर्तते । ब्रह्मचारी जितक्रोधः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥
yastu bhādrapadaṃ māsamekabhuktena vartate | brahmacārī jitakrodhaḥ satyasandho jitendriyaḥ
जो मनुष्य भाद्रपद मास में दिन में एक बार भोजन करके रहता है, ब्रह्मचारी है, क्रोध को जीत चुका है, सत्य पर दृढ़ है और इन्द्रियों को जीत चुका है,
श्लोक 47 (14.113.47)
विप्रमग्रासने कृत्वा पाकभेदविवर्जितः । नमो ब्रह्मण्यदेवायेत्युक्त्वाऽस्य चरणौ स्पृशेत् ॥
vipramagrāsane kṛtvā pākabhedavivarjitaḥ | namo brahmaṇyadevāyetyuktvā'sya caraṇau spṛśet
जो ब्राह्मण को प्रथम आसन पर बैठाकर भोजन-पकवानों के भेद से दूर रहता है और "ब्राह्मणों के प्रिय देव को नमस्कार" कहकर उसके चरण छूता है,
श्लोक 48 (14.113.48)
तिलानपि घृतं वाऽपि व्रतान्ते दक्षिणां ददत् । मद्भक्तस्य नरश्रेष्ठ तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
tilānapi ghṛtaṃ vā'pi vratānte dakṣiṇāṃ dadat | madbhaktasya naraśreṣṭha tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
और जो व्रत के अन्त में तिल या घी की दक्षिणा देता है, मेरा भक्त है—हे नरश्रेष्ठ, उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 49 (14.113.49)
यत्फलं विधिवत्प्रोक्तं राजसूयाश्वमेधयोः । तत्पुण्यफलमासाद्य शक्रलोके महीयते ॥
yatphalaṃ vidhivatproktaṃ rājasūyāśvamedhayoḥ | tatpuṇyaphalamāsādya śakraloke mahīyate
राजसूय और अश्वमेध का जो फल विधिपूर्वक बताया गया है, उस पुण्य का फल पाकर वह इन्द्रलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 50 (14.113.50)
ततश्चापि च्युतः कालाज्जायते धनदालये । तत्र प्रकामं क्रीडित्वा राजा भवति मानुषे ॥
tataścāpi cyutaḥ kālājjāyate dhanadālaye | tatra prakāmaṃ krīḍitvā rājā bhavati mānuṣe
फिर समय आने पर वहाँ से च्युत होकर वह कुबेर के घर में जन्म लेता है; वहाँ इच्छानुसार क्रीड़ा करके मनुष्यों में राजा होता है।
श्लोक 51 (14.113.51)
यश्चाप्याश्वयुजं मासमेकभुक्तेन वर्तते । मद्गायत्रीं जपेद्भक्त्या मद्गतेनान्तरात्मना । द्विसन्ध्यं वा त्रिसन्ध्यं वा शतमष्टोत्तरं तु वा ॥
yaścāpyāśvayujaṃ māsamekabhuktena vartate | madgāyatrīṃ japedbhaktyā madgatenāntarātmanā | dvisandhyaṃ vā trisandhyaṃ vā śatamaṣṭottaraṃ tu vā
जो मनुष्य आश्वयुज मास में दिन में एक बार भोजन करके रहता है और भक्ति से, मुझमें लगे अन्तःकरण से, मेरी गायत्री का जप करता है—दो सन्ध्याओं में या तीन में, या एक सौ आठ बार—
श्लोक 52 (14.113.52)
विप्रमग्रासने कृत्वा संयतेन्द्रियमानसः । व्रतान्ते भोजयेद्विप्रांस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
vipramagrāsane kṛtvā saṃyatendriyamānasaḥ | vratānte bhojayedviprāṃstasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
जो इन्द्रियों और मन को संयम में रखकर ब्राह्मण को प्रथम आसन पर बैठाता है और व्रत के अन्त में ब्राह्मणों को भोजन कराता है—उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 53 (14.113.53)
अश्वमेधस्य यत्पुण्यं विधिवत्पाण्डुनन्दन । तत्पुण्यफलमासाद्य मम लोके महीयते ॥
aśvamedhasya yatpuṇyaṃ vidhivatpāṇḍunandana | tatpuṇyaphalamāsādya mama loke mahīyate
हे पाण्डुनन्दन, विधिपूर्वक किए गए अश्वमेध का जो पुण्य है, उस पुण्य का फल पाकर वह मेरे लोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 54 (14.113.54)
ततश्चापि च्युतः कालाच्छ्वेतद्वीपे प्रजायते । तत्र भुक्त्वा च भोगांश्च ततो विप्रवरो भवेत् ॥
tataścāpi cyutaḥ kālācchvetadvīpe prajāyate | tatra bhuktvā ca bhogāṃśca tato vipravaro bhavet
फिर समय आने पर वहाँ से च्युत होकर वह श्वेतद्वीप में जन्म लेता है; वहाँ भोगों को भोगकर फिर श्रेष्ठ ब्राह्मण होता है।