आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 114
वर्षव्रत और बारह द्वादशी-पूजन
युधिष्ठिर पूछते हैं कि पूरे एक वर्ष तक दिन में एक बार भोजन करने का क्या फल है। कृष्ण उस व्रत की विधि, अन्त में दी जाने वाली दक्षिणा और दस जन्मों के पापों के नाश का वर्णन करते हैं। फिर वे अपनी पंचमी बताकर मार्गशीर्ष से कार्तिक तक प्रत्येक मास की द्वादशी पर पूजनीय विष्णु-रूप और उपवास से मिलने वाले यज्ञ-फल गिनाते हैं। युधिष्ठिर स्तोत्र से उनकी वन्दना करते हैं, कृष्ण उन्हें रोक देते हैं और कृष्णपक्ष की द्वादशी के पूजन का फल बताते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (14.114.1)
एवं संवत्सरं पूर्णमेकभुक्तेन यः क्षिपेत् । तस्य पुण्यफलं यद्वै तन्ममाचक्ष्व केशव ॥
evaṃ saṃvatsaraṃ pūrṇamekabhuktena yaḥ kṣipet | tasya puṇyaphalaṃ yadvai tanmamācakṣva keśava
हे केशव, जो मनुष्य इस प्रकार पूरे एक वर्ष तक दिन में केवल एक बार भोजन करके बिताता है, उसे जो पुण्यफल मिलता है, वह मुझे बताइए।
भगवानुवाच
श्लोक 2 (14.114.2)
शृणु पाण्डव तत्त्वं मे वचनं पुण्यमुत्तमम् । यदकृत्वाऽथवा कृत्वा नरः पापैः प्रमुच्यते ॥
śṛṇu pāṇḍava tattvaṃ me vacanaṃ puṇyamuttamam | yadakṛtvā'thavā kṛtvā naraḥ pāpaiḥ pramucyate
हे पाण्डव, मेरा यह सत्य, पवित्र और सर्वोत्तम वचन सुनो, जिससे मनुष्य, चाहे उसने पाप किया हो या न किया हो, पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 3 (14.114.3)
एकभुक्तेन वर्तेत नरः संवत्सरं तु यः । ब्रह्मचारी जितक्रोधो ह्यधश्शायी जितेन्द्रियः ॥
ekabhuktena varteta naraḥ saṃvatsaraṃ tu yaḥ | brahmacārī jitakrodho hyadhaśśāyī jitendriyaḥ
जो मनुष्य एक वर्ष तक दिन में एक ही बार भोजन करके रहता है, ब्रह्मचारी रहता है, भूमि पर सोता है और क्रोध तथा इन्द्रियों को जीत लेता है,
श्लोक 4 (14.114.4)
शुचिः स्नानरतो व्यग्रः सत्यवागनसूयकः । अर्चन्नेव तु मां नित्यं मद्गतेनान्तरात्मना । सन्ध्ययोस्तु जपेन्नित्यं मद्गायत्रीं समाहितः ॥
śuciḥ snānarato vyagraḥ satyavāganasūyakaḥ | arcanneva tu māṃ nityaṃ madgatenāntarātmanā | sandhyayostu japennityaṃ madgāyatrīṃ samāhitaḥ
पवित्र रहता है, स्नान में निरत रहता है, एकाग्रचित्त, सत्यवादी और असूया से रहित है, अपने अन्तःकरण को मुझमें लगाकर नित्य मेरी पूजा करता है और दोनों सन्ध्याओं में एकाग्र होकर मेरी गायत्री का जप करता है,
श्लोक 5 (14.114.5)
नमो ब्रह्मण्यदेवायेत्यसकृन्मां प्रणम्य च । विप्रमग्रासने कृत्वा यावकं भैक्षमेव वा ॥
namo brahmaṇyadevāyetyasakṛnmāṃ praṇamya ca | vipramagrāsane kṛtvā yāvakaṃ bhaikṣameva vā
जो "ब्राह्मणों के देव को नमस्कार" कहकर बार-बार मुझे प्रणाम करता है और ब्राह्मण को प्रथम आसन पर बैठाकर उसे जौ की लपसी अथवा भिक्षा का अन्न अर्पित करता है,
श्लोक 6 (14.114.6)
भुक्त्वा तु वाग्यतो भूमावाचान्तस्य द्विजन्मनः । नमोऽस्तु वासुदेवायेत्युक्त्वा तु चरणौ स्पृशेत् ॥
bhuktvā tu vāgyato bhūmāvācāntasya dvijanmanaḥ | namo'stu vāsudevāyetyuktvā tu caraṇau spṛśet
और जब द्विज मौन होकर भोजन कर चुकता है और भूमि पर आचमन कर लेता है, तब "वासुदेव को नमस्कार" कहकर उसके चरण छूता है,
श्लोक 7 (14.114.7)
मासेमासे समाप्ते तु भोजयित्वा द्विजाञ्शुचीन् । संवत्सरे ततः पूर्णे दद्यात्तु व्रतदक्षिणाम् ॥
māsemāse samāpte tu bhojayitvā dvijāñśucīn | saṃvatsare tataḥ pūrṇe dadyāttu vratadakṣiṇām
प्रत्येक मास के पूर्ण होने पर शुद्ध ब्राह्मणों को भोजन कराता है और वर्ष पूरा होने पर व्रत की दक्षिणा देता है:
श्लोक 8 (14.114.8)
नवनीतमयीं गां वा तिलधेनुमथापि वा । विप्रहस्तच्युतैस्तोयैः सहिरण्यैः समुक्षितः । तस्य पुण्यफलं राजन्कथ्यमानं मया शृणु ॥
navanītamayīṃ gāṃ vā tiladhenumathāpi vā | viprahastacyutaistoyaiḥ sahiraṇyaiḥ samukṣitaḥ | tasya puṇyaphalaṃ rājankathyamānaṃ mayā śṛṇu
मक्खन की बनी गाय अथवा तिलों की गाय, और ब्राह्मण के हाथ से गिरते जल तथा सुवर्ण के साथ वह अभिषिक्त किया जाता है। हे राजन्, उसके पुण्य का फल मैं बताता हूँ, सुनो।
श्लोक 9 (14.114.9)
दशजन्मकृतं पापं ज्ञानतोऽज्ञानतोपि वा । तद्विनश्यति तस्याशु नात्र कार्या विचारणा ॥
daśajanmakṛtaṃ pāpaṃ jñānato'jñānatopi vā | tadvinaśyati tasyāśu nātra kāryā vicāraṇā
उसने दस जन्मों में जाने या अनजाने जो पाप किया है, वह शीघ्र नष्ट हो जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं करना चाहिए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 10 (14.114.10)
सर्वेषामुपवासानां यच्छ्रेयः सुमहत्फलम् । यच्च निःश्रेयसं लोके तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥
sarveṣāmupavāsānāṃ yacchreyaḥ sumahatphalam | yacca niḥśreyasaṃ loke tadbhavānvaktumarhati
सब उपवासों में जो श्रेष्ठ और महान् फल देने वाला है तथा संसार में जो परम कल्याणकारी है, वह आप मुझे बताने में समर्थ हैं, कृपया बताइए।
भगवानुवाच
श्लोक 11 (14.114.11)
शृणु राजन्यथापूर्वं मयाऽभीष्टं तु मोदते । तथा ते कथयिष्यामि मद्भक्ताय युधिष्ठिर ॥
śṛṇu rājanyathāpūrvaṃ mayā'bhīṣṭaṃ tu modate | tathā te kathayiṣyāmi madbhaktāya yudhiṣṭhira
हे राजन्, सुनो। जैसे पहले कहा था, वैसे ही मैं तुम्हें, अपने भक्त युधिष्ठिर को, बताऊँगा कि मेरे प्रिय कर्म से मनुष्य कैसे आनन्दित होता है।
श्लोक 12 (14.114.12)
यस्तु भक्त्या शुचिर्भूत्वा पञ्चम्यां मे नराधिप । उपवासव्रतं कुर्यात्त्रिकालं चार्चयंस्तु माम् । सर्वक्रतुफलं लब्ध्वा मम लोके महीयते ॥
yastu bhaktyā śucirbhūtvā pañcamyāṃ me narādhipa | upavāsavrataṃ kuryāttrikālaṃ cārcayaṃstu mām | sarvakratuphalaṃ labdhvā mama loke mahīyate
हे राजन्, जो मनुष्य पवित्र होकर भक्तिपूर्वक मेरी पंचमी के दिन उपवास-व्रत करता है और तीनों कालों में मेरी पूजा करता है, वह सब यज्ञों का फल पाकर मेरे लोक में सम्मानित होता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 13 (14.114.13)
भगवन्देवदेवेश पञ्चमी नाम का तव । तामहं श्रोतुमिच्छामि कथयस्व ममानघ ॥
bhagavandevadeveśa pañcamī nāma kā tava | tāmahaṃ śrotumicchāmi kathayasva mamānagha
हे भगवन्, देवों के देव, आपकी यह पंचमी कौन-सी है? मैं उसे सुनना चाहता हूँ। हे निष्पाप, मुझे बताइए।
भगवानुवाच
श्लोक 14 (14.114.14)
पर्वद्वयं च द्वादश्यां श्रवणं च नराधिप । मत्पञ्चमीति विख्याता मत्प्रिया च विशेषतः ॥
parvadvayaṃ ca dvādaśyāṃ śravaṇaṃ ca narādhipa | matpañcamīti vikhyātā matpriyā ca viśeṣataḥ
हे राजन्, दो पर्व, द्वादशी और श्रवण नक्षत्र, ये मेरी पंचमी के नाम से प्रसिद्ध हैं और मुझे विशेष प्रिय हैं।
श्लोक 15 (14.114.15)
तस्मात्तु ब्राह्मणश्रेष्ठैर्मन्निवेशितबुद्धिभिः । उपवासस्तु कर्तव्यो मत्प्रियार्थं विशेषतः ॥
tasmāttu brāhmaṇaśreṣṭhairmanniveśitabuddhibhiḥ | upavāsastu kartavyo matpriyārthaṃ viśeṣataḥ
इसलिए जिनकी बुद्धि मुझमें लगी है, ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों को विशेष रूप से मेरी प्रसन्नता के लिए उपवास करना चाहिए।
श्लोक 16 (14.114.16)
द्वादश्यामेव वा कुर्यादुपवासमशक्नुवन् । तेनाहं परमां प्रीतिं यास्यामि नरपुङ्गव ॥
dvādaśyāmeva vā kuryādupavāsamaśaknuvan | tenāhaṃ paramāṃ prītiṃ yāsyāmi narapuṅgava
अथवा यदि वह असमर्थ हो, तो केवल द्वादशी को ही उपवास करे। हे पुरुषश्रेष्ठ, उससे मैं परम प्रसन्न होऊँगा।
श्लोक 17 (14.114.17)
अहोरात्रेण द्वादश्यां मार्गशीर्षेण केशवम् । उपोष्य पूजयेद्यो मां सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥
ahorātreṇa dvādaśyāṃ mārgaśīrṣeṇa keśavam | upoṣya pūjayedyo māṃ so'śvamedhaphalaṃ labhet
जो मार्गशीर्ष मास की द्वादशी को एक दिन-रात उपवास करके मुझ केशव की पूजा करता है, वह अश्वमेध का फल पाता है।
श्लोक 18 (14.114.18)
द्वादश्यां पुष्यमासे तु नाम्ना नारायणं तु माम् । उपोष्य पूजयेद्यो मां वाजिमेधफलं लभेत् ॥
dvādaśyāṃ puṣyamāse tu nāmnā nārāyaṇaṃ tu mām | upoṣya pūjayedyo māṃ vājimedhaphalaṃ labhet
पौष मास की द्वादशी को जो उपवास करके नारायण नाम से मेरी पूजा करता है, वह वाजिमेध का फल पाता है।
श्लोक 19 (14.114.19)
द्वादश्यां माघमासे तु मामुपोष्य तु माधवम् । पूजयेद्यः समाप्नोति राजसूयफलं नृप ॥
dvādaśyāṃ māghamāse tu māmupoṣya tu mādhavam | pūjayedyaḥ samāpnoti rājasūyaphalaṃ nṛpa
माघ मास की द्वादशी को जो उपवास करके मेरी माधव रूप में पूजा करता है, हे राजन्, वह राजसूय का फल पाता है।
श्लोक 20 (14.114.20)
द्वादश्यां फाल्गुने मासि गोविन्दाख्यमुपोष्य माम् । पूजयेद्यः समाप्नोति ह्यतिरात्रफलं नृप ॥
dvādaśyāṃ phālgune māsi govindākhyamupoṣya mām | pūjayedyaḥ samāpnoti hyatirātraphalaṃ nṛpa
फाल्गुन मास की द्वादशी को जो उपवास करके गोविन्द नाम वाले मेरी पूजा करता है, हे राजन्, वह अतिरात्र का फल पाता है।
श्लोक 21 (14.114.21)
द्वादश्यां मासि चैत्रे तु मां विष्णुं समुपोष्य यः । पूजयंस्तदवाप्नोति पौण्डरीकस्य यत्फलम् ॥
dvādaśyāṃ māsi caitre tu māṃ viṣṇuṃ samupoṣya yaḥ | pūjayaṃstadavāpnoti pauṇḍarīkasya yatphalam
चैत्र मास की द्वादशी को जो उपवास करके विष्णु रूप में मेरी पूजा करता है, वह पौण्डरीक यज्ञ का फल पाता है।
श्लोक 22 (14.114.22)
द्वादश्यां मासि वैशाखे मधुसूदनसंज्ञितम् । उपोष्य पूजयेद्यो मां सोग्निष्टोमस्य पाण्डव ॥
dvādaśyāṃ māsi vaiśākhe madhusūdanasaṃjñitam | upoṣya pūjayedyo māṃ sogniṣṭomasya pāṇḍava
वैशाख मास की द्वादशी को जो उपवास करके मधुसूदन नाम वाले मेरी पूजा करता है, हे पाण्डव, वह अग्निष्टोम का फल पाता है।
श्लोक 23 (14.114.23)
द्वादश्यां ज्येष्ठमासे तु मामुपोष्य त्रिविक्रमम् । अर्चयेद्यः समाप्नोति गवां मेधफलं नृप ॥
dvādaśyāṃ jyeṣṭhamāse tu māmupoṣya trivikramam | arcayedyaḥ samāpnoti gavāṃ medhaphalaṃ nṛpa
ज्येष्ठ मास की द्वादशी को जो उपवास करके त्रिविक्रम रूप में मेरी पूजा करता है, हे राजन्, वह गोमेध का फल पाता है।
श्लोक 24 (14.114.24)
आषाढे वामनाख्यं मां द्वादश्यां समुपोष्य यः । नरमेधस्य स फलं प्राप्नोति भरतर्षभ ॥
āṣāḍhe vāmanākhyaṃ māṃ dvādaśyāṃ samupoṣya yaḥ | naramedhasya sa phalaṃ prāpnoti bharatarṣabha
आषाढ़ मास की द्वादशी को जो उपवास करके वामन नाम वाले मेरी पूजा करता है, हे भरतश्रेष्ठ, वह नरमेध का फल पाता है।
श्लोक 25 (14.114.25)
द्वादश्यां श्रावणे मासि श्रीधराख्यमुपोष्य माम् । पूजयेद्यः समाप्नोति पञ्चयज्ञफलं नृप ॥
dvādaśyāṃ śrāvaṇe māsi śrīdharākhyamupoṣya mām | pūjayedyaḥ samāpnoti pañcayajñaphalaṃ nṛpa
श्रावण मास की द्वादशी को जो उपवास करके श्रीधर नाम वाले मेरी पूजा करता है, हे राजन्, वह पाँच यज्ञों का फल पाता है।
श्लोक 26 (14.114.26)
मासे भाद्रपदे यो मां हृषीकेशाख्यमर्चयेत् । उपोष्य स समाप्नोति सौत्रामणिफलं नृप ॥
māse bhādrapade yo māṃ hṛṣīkeśākhyamarcayet | upoṣya sa samāpnoti sautrāmaṇiphalaṃ nṛpa
भाद्रपद मास में जो उपवास करके हृषीकेश नाम वाले मेरी पूजा करता है, हे राजन्, वह सौत्रामणि का फल पाता है।
श्लोक 27 (14.114.27)
द्वादश्यामाश्वयुङ्मासे पद्मनाभमुपोष्य माम् । अर्चयेद्यः समाप्नोति गोसहस्रफलं नृप ॥
dvādaśyāmāśvayuṅmāse padmanābhamupoṣya mām | arcayedyaḥ samāpnoti gosahasraphalaṃ nṛpa
आश्विन मास की द्वादशी को जो उपवास करके पद्मनाभ रूप में मेरी पूजा करता है, हे राजन्, वह एक सहस्र गायों के दान का फल पाता है।
श्लोक 28 (14.114.28)
द्वादश्यां कार्तिके मासि मां दामोदरसंज्ञितम् । उपोष्य पूजयेद्यस्तु सर्वक्रतुफलं नृप ॥
dvādaśyāṃ kārtike māsi māṃ dāmodarasaṃjñitam | upoṣya pūjayedyastu sarvakratuphalaṃ nṛpa
कार्तिक मास की द्वादशी को जो उपवास करके दामोदर नाम वाले मेरी पूजा करता है, हे राजन्, वह सब यज्ञों का फल पाता है।
श्लोक 29 (14.114.29)
केवलेनोपवासेन द्वादश्यां पाण्डुनन्दन । यत्फलं पूर्वमुद्दिष्टं तस्यार्धं लभते नृप ॥
kevalenopavāsena dvādaśyāṃ pāṇḍunandana | yatphalaṃ pūrvamuddiṣṭaṃ tasyārdhaṃ labhate nṛpa
हे पाण्डुनन्दन, केवल द्वादशी को उपवास करने से मनुष्य ऊपर बताए गए फल का आधा पाता है।
श्लोक 30 (14.114.30)
श्रावणेऽप्येवमेवं मामर्चयेद्भक्तिमान्नरः । मम सालोक्यमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥
śrāvaṇe'pyevamevaṃ māmarcayedbhaktimānnaraḥ | mama sālokyamāpnoti nātra kāryā vicāraṇā
श्रवण (श्रावण) में भी इसी प्रकार जो भक्त मेरी पूजा करता है, वह मेरे लोक में स्थान पाता है। इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए।
श्लोक 31 (14.114.31)
मासेमासे समभ्यर्च्य क्रमशो मामतन्द्रितः । पूर्णे संवत्सरे कुर्यात्पुनः संवत्सरं तु माम् ॥
māsemāse samabhyarcya kramaśo māmatandritaḥ | pūrṇe saṃvatsare kuryātpunaḥ saṃvatsaraṃ tu mām
इस प्रकार बिना थके मास-मास क्रम से मेरी पूजा करके, वर्ष पूर्ण होने पर वह फिर एक वर्ष तक मेरी पूजा करे।
श्लोक 32 (14.114.32)
एवं द्वादशवर्षं यो मद्भक्तो मत्परायणः । अविघ्नमर्चयानस्तु मम सायुज्यमाप्नुयात् ॥
evaṃ dvādaśavarṣaṃ yo madbhakto matparāyaṇaḥ | avighnamarcayānastu mama sāyujyamāpnuyāt
जो भक्त मुझमें ही परायण होकर इस प्रकार बारह वर्ष तक निर्विघ्न मेरी पूजा करता है, वह मेरा सायुज्य प्राप्त करता है।
श्लोक 33 (14.114.33)
अर्चयेत्प्रीतिमान्यो मां द्वादश्यां वेदसंहिताम् । स पूर्वोक्तफलं राजँल्लभते नात्र संशयः ॥
arcayetprītimānyo māṃ dvādaśyāṃ vedasaṃhitām | sa pūrvoktaphalaṃ rājam̐llabhate nātra saṃśayaḥ
जो प्रीतिपूर्वक द्वादशी को वेदसंहिता से मेरी पूजा करता है, हे राजन्, वह पहले कहे हुए फल को पाता है। इसमें संशय नहीं है।
श्लोक 34 (14.114.34)
गन्धं पुष्पं फलं तोयं पत्रं वा मूलमेव वा । द्वादश्यां मम यो दद्यात्तत्समो नास्ति मत्प्रियः ॥
gandhaṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ patraṃ vā mūlameva vā | dvādaśyāṃ mama yo dadyāttatsamo nāsti matpriyaḥ
जो द्वादशी को मुझे गन्ध, पुष्प, फल, जल, पत्र अथवा मूल भी अर्पित करता है, उसके समान मेरा प्रिय कोई नहीं है।
श्लोक 35 (14.114.35)
एतेन विधिना सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः । मद्भक्ता नरशार्दूल स्वर्गलोकं तु भुञ्जते ॥
etena vidhinā sarve devāḥ śakrapurogamāḥ | madbhaktā naraśārdūla svargalokaṃ tu bhuñjate
हे नरशार्दूल, इसी विधि से इन्द्र आदि सब देवता, जो मेरे भक्त हैं, स्वर्गलोक का भोग करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 36 (14.114.36)
एवं वदति देवेशे केशवे पाण्डुनन्दनः । कृताञ्जलिः स्तोत्रमिदं भक्त्या धर्मात्मजोऽब्रवीत् ॥
evaṃ vadati deveśe keśave pāṇḍunandanaḥ | kṛtāñjaliḥ stotramidaṃ bhaktyā dharmātmajo'bravīt
देवेश्वर केशव के इस प्रकार कहते समय पाण्डुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक यह स्तोत्र कहा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 37 (14.114.37)
सर्वलोकेश देवेश हृषीकेश नमोस्तु ते । सहस्रशिरसे नित्यं सहस्राक्ष नमोस्तु ते ॥
sarvalokeśa deveśa hṛṣīkeśa namostu te | sahasraśirase nityaṃ sahasrākṣa namostu te
हे सब लोकों के स्वामी, देवों के देव, हृषीकेश, आपको नमस्कार! हे सहस्र शिरों वाले, सहस्र नेत्रों वाले, आपको नित्य नमस्कार!
श्लोक 38 (14.114.38)
त्रयीमय त्रयीनाथ त्रयीस्तुत नमोनमः । यज्ञात्मन्यज्ञसंभूत यज्ञनाथ नमोनमः ॥
trayīmaya trayīnātha trayīstuta namonamaḥ | yajñātmanyajñasaṃbhūta yajñanātha namonamaḥ
हे त्रयीमय, त्रयी के नाथ, त्रयी से स्तुत, आपको बारम्बार नमस्कार! हे यज्ञस्वरूप, यज्ञ से उत्पन्न, यज्ञ के स्वामी, आपको बारम्बार नमस्कार!
श्लोक 39 (14.114.39)
चतुर्मूर्ते चतुर्बाहो चतुर्व्यूह नमोनमः । लोकात्मँल्लोककृन्नाथ लोकावास नमोनमः ॥
caturmūrte caturbāho caturvyūha namonamaḥ | lokātmam̐llokakṛnnātha lokāvāsa namonamaḥ
हे चार मूर्तियों वाले, चार भुजाओं वाले, चतुर्व्यूह, आपको बारम्बार नमस्कार! हे लोकों के आत्मा, लोकों के रचयिता और स्वामी, लोकों के आश्रय, आपको बारम्बार नमस्कार!
श्लोक 40 (14.114.40)
सृष्टिसंहारकर्त्रे तु नरसिंह नमोनमः । भक्तप्रिय नमस्तेऽस्तु कृष्ण नाथ नमोनमः ॥
sṛṣṭisaṃhārakartre tu narasiṃha namonamaḥ | bhaktapriya namaste'stu kṛṣṇa nātha namonamaḥ
हे सृष्टि और संहार के कर्ता, नृसिंह, आपको बारम्बार नमस्कार! हे भक्तप्रिय, आपको नमस्कार; हे कृष्ण, हे नाथ, आपको बारम्बार नमस्कार!
श्लोक 41 (14.114.41)
लोकप्रिय नमस्तेऽस्तु भक्तवत्सल ते नमः । ब्रह्मवास नमस्तेऽस्तु ब्रह्मनाथ नमोनमः ॥
lokapriya namaste'stu bhaktavatsala te namaḥ | brahmavāsa namaste'stu brahmanātha namonamaḥ
हे लोकप्रिय, आपको नमस्कार; हे भक्तवत्सल, आपको नमस्कार! हे ब्रह्म में निवास करने वाले, आपको नमस्कार; हे ब्रह्म के स्वामी, आपको बारम्बार नमस्कार!
श्लोक 42 (14.114.42)
रुद्ररूप नमस्तेऽस्तु रुद्रकर्मरताय ते । पञ्चयज्ञ नमस्तेऽस्तु सर्वयज्ञ नमोनमः ॥
rudrarūpa namaste'stu rudrakarmaratāya te | pañcayajña namaste'stu sarvayajña namonamaḥ
हे रुद्ररूप, आपको नमस्कार, जो आप रुद्र के कर्मों में रत हैं! हे पंचयज्ञ-स्वरूप, आपको नमस्कार; हे सर्वयज्ञ, आपको बारम्बार नमस्कार!
श्लोक 43 (14.114.43)
कृष्णप्रिय नमस्तेऽस्तु कृष्णनाथ नमोनमः । योगिप्रिय नमस्तेऽस्तु योगिनाथ नमोनमः ॥
kṛṣṇapriya namaste'stu kṛṣṇanātha namonamaḥ | yogipriya namaste'stu yoginātha namonamaḥ
हे कृष्णप्रिय, आपको नमस्कार; हे कृष्ण के स्वामी, आपको बारम्बार नमस्कार! हे योगियों के प्रिय, आपको नमस्कार; हे योगियों के नाथ, आपको बारम्बार नमस्कार!
श्लोक 44 (14.114.44)
हयवक्त्र नमस्तेऽस्तु चक्रपाणे नमोनमः । पञ्चभूत नमस्तेऽस्तु पञ्चायुध नमोनमः ॥
hayavaktra namaste'stu cakrapāṇe namonamaḥ | pañcabhūta namaste'stu pañcāyudha namonamaḥ
हे हयग्रीव (अश्वमुख), आपको नमस्कार; हे चक्रधारी, आपको बारम्बार नमस्कार! हे पंचभूतस्वरूप, आपको नमस्कार; हे पाँच आयुधों वाले, आपको बारम्बार नमस्कार!
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 45 (14.114.45)
भक्तिगद्गदया वाचा स्तुवत्येवं युधिष्ठिरे । गृहीत्वा केशवो हस्ते प्रीतात्मा तं न्यवारयत् ॥
bhaktigadgadayā vācā stuvatyevaṃ yudhiṣṭhire | gṛhītvā keśavo haste prītātmā taṃ nyavārayat
जब युधिष्ठिर भक्ति से गद्गद वाणी में इस प्रकार स्तुति कर रहे थे, तब प्रसन्नचित्त केशव ने उनका हाथ पकड़कर उन्हें रोक दिया।
श्लोक 46 (14.114.46)
निवार्य च पुनर्वाचा भक्तिनम्रं युधिष्ठिरम् । वक्तुमेव नरश्रेष्ठ धर्मपुत्रं प्रचक्रमे ॥
nivārya ca punarvācā bhaktinamraṃ yudhiṣṭhiram | vaktumeva naraśreṣṭha dharmaputraṃ pracakrame
भक्ति से विनम्र युधिष्ठिर को रोककर, हे नरश्रेष्ठ, वे धर्मपुत्र से फिर बोलने लगे।
भगवानुवाच
श्लोक 47 (14.114.47)
अन्यवत्किमिदं राजन्मां स्तौषि नरपुङ्गव । तिष्ठ पृच्छ यथापूर्वं धर्मपुत्र युधिष्ठिर ॥
anyavatkimidaṃ rājanmāṃ stauṣi narapuṅgava | tiṣṭha pṛccha yathāpūrvaṃ dharmaputra yudhiṣṭhira
हे राजन्, हे पुरुषश्रेष्ठ, आप मुझे किसी पराये की तरह क्यों स्तुति करते हैं? ठहरिए, और हे धर्मपुत्र युधिष्ठिर, पहले की तरह पूछिए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 48 (14.114.48)
भगवंस्त्वत्प्रसादात्तु धर्मं स्मृत्वा पुनःपुनः । न शान्तिरस्ति मे देव नृत्यतीव च मे मनः ॥
bhagavaṃstvatprasādāttu dharmaṃ smṛtvā punaḥpunaḥ | na śāntirasti me deva nṛtyatīva ca me manaḥ
भगवन्, आपकी कृपा से धर्म का बार-बार स्मरण करके भी मुझे शान्ति नहीं है, हे देव, मेरा मन मानो नाच रहा है।
श्लोक 49 (14.114.49)
इदं च धर्मसंपन्नं वक्तुमर्हसि माधव । कृष्णपक्षेषु द्वादश्यामर्चनीयः कथं भवेत् ॥
idaṃ ca dharmasaṃpannaṃ vaktumarhasi mādhava | kṛṣṇapakṣeṣu dvādaśyāmarcanīyaḥ kathaṃ bhavet
हे माधव, यह धर्मयुक्त बात भी आप मुझे बताइए: कृष्णपक्षों की द्वादशी को आपकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिए?
भगवानुवाच
श्लोक 50 (14.114.50)
शृणु राजन्यथापूर्वं तत्सर्वं कथयामि ते । परमं कृष्णद्वादश्यामर्चनायां फलं मम ॥
śṛṇu rājanyathāpūrvaṃ tatsarvaṃ kathayāmi te | paramaṃ kṛṣṇadvādaśyāmarcanāyāṃ phalaṃ mama
हे राजन्, सुनो; जैसे पहले, वैसे ही मैं तुम्हें वह सब बताता हूँ: कृष्णपक्ष की द्वादशी को मेरी पूजा करने का परम फल।
श्लोक 51 (14.114.51)
एकादश्यामुपोष्याथ द्वादश्यामर्चयेत्तु माम् । विप्रानपि यथालाभं पूजयेद्भक्तिमान्नरः ॥
ekādaśyāmupoṣyātha dvādaśyāmarcayettu mām | viprānapi yathālābhaṃ pūjayedbhaktimānnaraḥ
एकादशी को उपवास करके द्वादशी को मेरी पूजा करे, और भक्त मनुष्य यथाशक्ति ब्राह्मणों का भी पूजन करे।
श्लोक 52 (14.114.52)
स गच्छेद्दक्षिणामूर्तिं मां वा नात्र विचारणा । चन्द्रसालोक्यमथवा ग्रहनक्षत्रपूजितः ॥
sa gaccheddakṣiṇāmūrtiṃ māṃ vā nātra vicāraṇā | candrasālokyamathavā grahanakṣatrapūjitaḥ
वह निःसन्देह मेरे दक्षिणामूर्ति रूप को प्राप्त होता है, अथवा ग्रह-नक्षत्रों से पूजित होकर चन्द्रलोक को जाता है।