आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 115
विषुव-दान, अश्वत्थ, तीर्थ और प्रायश्चित्त
युधिष्ठिर के दान के उचित समय पूछने पर कृष्ण विषुव का वर्णन करते हैं, जब ब्रह्मा, शंकर और वे एक हो जाते हैं, और विषुव तथा ग्रहण में दान, स्नान और जप का महान् फल बताते हैं। वे अश्वत्थ को अपना ही रूप कहते हैं और सच्चे तीर्थ गिनाते हैं: व्रत, माता-पिता और गुरु की सेवा, आतिथ्य, ज्ञान और सबसे बढ़कर क्षमा। सरल प्रायश्चित्त पूछे जाने पर वे एक गुप्त विधि बताते हैं: ब्राह्मण का सम्मान, पवित्र मिट्टी और जल से स्नान, चौदह अंगों वाले शिंशुमार को नमन, और ब्रह्मकूर्च सहित पंचगव्य का पान।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.115.1)
केशवेनैवमाख्याते धर्मपुत्रः पुनःपुनः । पप्रच्छ दानकालस्य विशेषं च विधिं नृप ॥
keśavenaivamākhyāte dharmaputraḥ punaḥpunaḥ | papraccha dānakālasya viśeṣaṃ ca vidhiṃ nṛpa
केशव के इस प्रकार कहने पर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने, हे राजन्, दान के उचित समय की विशेषता और उसकी विधि के विषय में बार-बार पूछा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (14.115.2)
देव किं फलमाख्यातं विषुवेष्वमरेश्वर । सूर्येन्दूपप्लवे चैव वक्तुमर्हसि तत्फलम् ॥
deva kiṃ phalamākhyātaṃ viṣuveṣvamareśvara | sūryendūpaplave caiva vaktumarhasi tatphalam
हे देव, हे देवेश्वर, विषुव के समय दान का क्या फल कहा गया है? और सूर्य-चन्द्र के ग्रहण में दान करने का फल भी आप मुझे बताइए।
भगवानुवाच
श्लोक 3 (14.115.3)
शृणुष्व राजन्विषुवे सोमार्कग्रहणेषु च । व्यतीपातेऽयने चैव दानं स्यादक्षयं फलम् ॥
śṛṇuṣva rājanviṣuve somārkagrahaṇeṣu ca | vyatīpāte'yane caiva dānaṃ syādakṣayaṃ phalam
हे राजन्, सुनो: विषुव, चन्द्र-सूर्य ग्रहण, व्यतीपात और अयन के समय किया हुआ दान अक्षय फल देने वाला होता है।
श्लोक 4 (14.115.4)
राजन्नयनयोर्मध्ये विषुवं सम्प्रचक्षते । समे रात्रिदिने तत्र सन्ध्यायां विषुवे नृप ॥
rājannayanayormadhye viṣuvaṃ sampracakṣate | same rātridine tatra sandhyāyāṃ viṣuve nṛpa
हे राजन्, दोनों अयनों के बीच के समय को विषुव कहते हैं। उस समय दिन और रात समान होते हैं, यह विषुव की सन्ध्या का समय है।
श्लोक 5 (14.115.5)
ब्रह्माऽहं शङ्करश्चापि तिष्ठामः सहिताः सकृत् । क्रियाकरणकार्याणामेकीभावत्वकारणात् ॥
brahmā'haṃ śaṅkaraścāpi tiṣṭhāmaḥ sahitāḥ sakṛt | kriyākaraṇakāryāṇāmekībhāvatvakāraṇāt
उस समय ब्रह्मा, शंकर और मैं एक साथ ठहरते हैं, क्योंकि क्रिया, करण और कार्य एकरूप हो जाते हैं।
श्लोक 6 (14.115.6)
अस्माकमेकीभूतानां निष्कलं परमं पदम् । तन्मुहूर्तं परं पुण्यं राजन्विषुवसंज्ञितम् ॥
asmākamekībhūtānāṃ niṣkalaṃ paramaṃ padam | tanmuhūrtaṃ paraṃ puṇyaṃ rājanviṣuvasaṃjñitam
एकरूप हुए हम लोगों का वह अखण्ड परम पद है। हे राजन्, विषुव नामक वह मुहूर्त परम पवित्र है।
श्लोक 7 (14.115.7)
तदेवाद्यक्षरं ब्रह्म परं ब्रह्मेति कीर्तितम् । तस्मिन्मुहूर्ते सर्वे तु चिन्तयन्ति परं पदम् ॥
tadevādyakṣaraṃ brahma paraṃ brahmeti kīrtitam | tasminmuhūrte sarve tu cintayanti paraṃ padam
वही आदि अक्षर ब्रह्म है, जिसे परब्रह्म कहा गया है। उस मुहूर्त में सभी परम पद का ध्यान करते हैं।
श्लोक 8 (14.115.8)
देवाश्च वसवो रुद्राः पितरश्चाश्विनौ तथा । साध्याश्च विश्वे गन्धर्वाः सिद्धा ब्रह्मर्षयस्तथा ॥
devāśca vasavo rudrāḥ pitaraścāśvinau tathā | sādhyāśca viśve gandharvāḥ siddhā brahmarṣayastathā
देवता, वसु, रुद्र, पितर और अश्विनीकुमार, साध्य, विश्वेदेव, गन्धर्व, सिद्ध और ब्रह्मर्षि,
श्लोक 9 (14.115.9)
सोमादयो ग्रहाश्चैव सरितः सागरास्तथा । मरुतोऽप्सरसो नागा यक्षराक्षसगुह्यकाः ॥
somādayo grahāścaiva saritaḥ sāgarāstathā | maruto'psaraso nāgā yakṣarākṣasaguhyakāḥ
चन्द्रमा आदि ग्रह, नदियाँ और समुद्र, मरुद्गण, अप्सराएँ, नाग, यक्ष, राक्षस और गुह्यक,
श्लोक 10 (14.115.10)
एते चान्ये च राजेन्द्र विषुवे संयतेन्द्रियाः । सोपवासाः प्रयत्नेन भवन्ति ध्यानतत्पराः ॥
ete cānye ca rājendra viṣuve saṃyatendriyāḥ | sopavāsāḥ prayatnena bhavanti dhyānatatparāḥ
ये और दूसरे भी, हे राजेन्द्र, विषुव के समय इन्द्रियों को संयत करके उपवास रखते हैं और प्रयत्नपूर्वक ध्यान में तत्पर हो जाते हैं।
श्लोक 11 (14.115.11)
अन्नं गावस्तिलान्भूमिं कन्यादानं तथैव च । गृहमायतनं धान्यं वाहनं शयनं तथा ॥
annaṃ gāvastilānbhūmiṃ kanyādānaṃ tathaiva ca | gṛhamāyatanaṃ dhānyaṃ vāhanaṃ śayanaṃ tathā
अन्न, गायें, तिल, भूमि और कन्यादान, तथा घर, निवासस्थान, धान्य, वाहन और शय्या,
श्लोक 12 (14.115.12)
यच्चान्यच्च मया प्रोक्तं तत्प्रयच्छ युधिष्ठिर । दीयते विषुवेष्वेवं श्रोत्रियेभ्यो विशेषतः ॥
yaccānyacca mayā proktaṃ tatprayaccha yudhiṣṭhira | dīyate viṣuveṣvevaṃ śrotriyebhyo viśeṣataḥ
और जो कुछ और भी मैंने कहा है, वह दो, युधिष्ठिर। विषुव के समय यह दान विशेष रूप से श्रोत्रिय ब्राह्मणों को दिया जाता है।
श्लोक 13 (14.115.13)
तस्य दानस्य कौन्तेय क्षयं नैवोपपद्यते । वर्धतेऽहरहः पुण्यं तद्दानं कोटिसंमितम् ॥
tasya dānasya kaunteya kṣayaṃ naivopapadyate | vardhate'harahaḥ puṇyaṃ taddānaṃ koṭisaṃmitam
हे कुन्तीपुत्र, उस दान का फल कभी क्षीण नहीं होता। प्रतिदिन पुण्य बढ़ता है; वह दान करोड़ गुना माना जाता है।
श्लोक 14 (14.115.14)
विषुवे स्नपनं यस्तु मम कुर्याद्धरस्य वा । अर्चनां च यथान्यायं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
viṣuve snapanaṃ yastu mama kuryāddharasya vā | arcanāṃ ca yathānyāyaṃ tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
जो विषुव के दिन मेरा अथवा हर का अभिषेक-स्नान कराता है और विधिपूर्वक पूजा करता है, उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 15 (14.115.15)
दशजन्मकृतं पापं तस्य सद्यो विनश्यति । दशानामश्वमेधानामिष्टानां लभते फलम् ॥
daśajanmakṛtaṃ pāpaṃ tasya sadyo vinaśyati | daśānāmaśvamedhānāmiṣṭānāṃ labhate phalam
उसका दस जन्मों का पाप तुरन्त नष्ट हो जाता है और वह दस अनुष्ठित अश्वमेध यज्ञों का फल पाता है।
श्लोक 16 (14.115.16)
विमानं दिव्यमारूढः कामरूपी यथासुखम् । स याति मामकं लोकं रुद्रलोकमथापि वा ॥
vimānaṃ divyamārūḍhaḥ kāmarūpī yathāsukham | sa yāti māmakaṃ lokaṃ rudralokamathāpi vā
दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर, इच्छानुसार रूप धारण करने वाला वह सुखपूर्वक मेरे लोक को जाता है, अथवा रुद्रलोक को।
श्लोक 17 (14.115.17)
तत्रस्थैर्देवगन्धर्वैर्गीयमानो यथासुखम् । दिव्यवर्षसहस्राणि कोटिमेकं तु मोदते ॥
tatrasthairdevagandharvairgīyamāno yathāsukham | divyavarṣasahasrāṇi koṭimekaṃ tu modate
वहाँ देवताओं और गन्धर्वों से गाया जाता हुआ वह सुखपूर्वक एक करोड़ सहस्र दिव्य वर्षों तक आनन्द करता है।
श्लोक 18 (14.115.18)
ततश्चापि च्युतः कालादिह लोके द्विजोत्तमः । चतुर्णामपि वेदानां पारगो ब्रह्मविद्भवेत् ॥
tataścāpi cyutaḥ kālādiha loke dvijottamaḥ | caturṇāmapi vedānāṃ pārago brahmavidbhavet
फिर समय पूरा होने पर वहाँ से च्युत होकर वह इस लोक में श्रेष्ठ ब्राह्मण होता है, चारों वेदों का पारंगत और ब्रह्मज्ञानी।
श्लोक 19 (14.115.19)
चन्द्रसूर्यग्रहे व्योम्नि मम वा शङ्करस्य वा । गायत्रीं मामिकां वाऽपि जपेद्यः शङ्करस्य वा ॥
candrasūryagrahe vyomni mama vā śaṅkarasya vā | gāyatrīṃ māmikāṃ vā'pi japedyaḥ śaṅkarasya vā
आकाश में चन्द्र या सूर्य के ग्रहण के समय जो मेरी गायत्री का अथवा शंकर की गायत्री का जप करता है,
श्लोक 20 (14.115.20)
शङ्खतूर्यस्वनैश्चैव कांस्यघण्टास्वनैरपि । कारयेत्तु ध्वनिं भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
śaṅkhatūryasvanaiścaiva kāṃsyaghaṇṭāsvanairapi | kārayettu dhvaniṃ bhaktyā tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
और शंख, तूर्य, काँसे के घण्टों आदि की ध्वनि भक्तिपूर्वक कराता है, उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 21 (14.115.21)
गान्धर्वैर्होमजप्यैश्च जप्तैरुत्कृष्टनामभिः । दुर्बलोपि भवेद्राहुः सोमश्च बलवान्भवेत् ॥
gāndharvairhomajapyaiśca japtairutkṛṣṭanāmabhiḥ | durbalopi bhavedrāhuḥ somaśca balavānbhavet
गान्धर्व संगीत, हवन और जप तथा उत्कृष्ट नामों के जप से राहु दुर्बल हो जाता है और चन्द्रमा बलवान् हो जाता है।
श्लोक 22 (14.115.22)
सूर्येन्दूपप्लवे चैव श्रोत्रियेभ्यः प्रदीयते । तत्सहस्रगुणं भूत्वा दांतारमुपतिष्ठति ॥
sūryendūpaplave caiva śrotriyebhyaḥ pradīyate | tatsahasraguṇaṃ bhūtvā dāṃtāramupatiṣṭhati
सूर्य और चन्द्र के ग्रहण के समय श्रोत्रिय ब्राह्मणों को जो दिया जाता है, वह सहस्र गुना होकर दाता के पास आता है।
श्लोक 23 (14.115.23)
महापातकयुक्तोपि यद्यपि स्यान्नरोत्तम । निष्पापस्तत्क्षणादेव तेन दानेन जायते ॥
mahāpātakayuktopi yadyapi syānnarottama | niṣpāpastatkṣaṇādeva tena dānena jāyate
हे नरोत्तम, महापातकों से युक्त मनुष्य भी उस दान से उसी क्षण निष्पाप हो जाता है।
श्लोक 24 (14.115.24)
चन्द्रसूर्यप्रकाशेन विमानेन विराजता । याति सोमपुरं रम्यं सेव्यमानोप्सरोगणैः ॥
candrasūryaprakāśena vimānena virājatā | yāti somapuraṃ ramyaṃ sevyamānopsarogaṇaiḥ
चन्द्र और सूर्य के समान प्रकाशमान, शोभायमान विमान से वह सुन्दर सोमपुर को जाता है, जहाँ अप्सराओं के समूह उसकी सेवा करते हैं।
श्लोक 25 (14.115.25)
यावदृक्षाणि तिष्ठन्ति गगने शशिना सह । तावत्कालं स राजेन्द्र सोमलोके महीयते ॥
yāvadṛkṣāṇi tiṣṭhanti gagane śaśinā saha | tāvatkālaṃ sa rājendra somaloke mahīyate
जब तक आकाश में चन्द्रमा के साथ नक्षत्र स्थित रहते हैं, तब तक, हे राजेन्द्र, वह चन्द्रलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 26 (14.115.26)
ततश्चापि च्युतः कालादिह लोके युधिष्ठिर । वेदवेदाङ्गविद्विप्रः कोटीधनपतिर्भवेत् ॥
tataścāpi cyutaḥ kālādiha loke yudhiṣṭhira | vedavedāṅgavidvipraḥ koṭīdhanapatirbhavet
फिर समय पूरा होने पर वहाँ से च्युत होकर, हे युधिष्ठिर, वह इस लोक में वेद-वेदांग का ज्ञाता ब्राह्मण और करोड़ों धन का स्वामी होता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 27 (14.115.27)
भगवंस्तव गायत्री जप्यते च कथं विभो । किं वा तस्य फलं देव ममाचक्ष्व सुरेश्वर ॥
bhagavaṃstava gāyatrī japyate ca kathaṃ vibho | kiṃ vā tasya phalaṃ deva mamācakṣva sureśvara
हे विभो, आपकी गायत्री का जप किस प्रकार किया जाता है? और हे देव, उसका फल क्या है? हे सुरेश्वर, मुझे बताइए।
भगवानुवाच
श्लोक 28 (14.115.28)
द्वादश्यां विषुवे चैव चन्द्रसूर्यग्रहे तथा । अयने श्रवणे चैव व्यतीपाते तथैव च ॥
dvādaśyāṃ viṣuve caiva candrasūryagrahe tathā | ayane śravaṇe caiva vyatīpāte tathaiva ca
द्वादशी को, विषुव में, चन्द्र-सूर्य ग्रहण में, अयन में, श्रवण नक्षत्र में और व्यतीपात में,
श्लोक 29 (14.115.29)
अश्वत्थदर्शने चैव तथा मद्दर्शनेऽपि च । जप्या तु मम गायत्री चाथवाऽष्टाक्षरं नृप । आर्जितं दुष्कृतं तस्य नाशयेन्नात्र संशयः ॥
aśvatthadarśane caiva tathā maddarśane'pi ca | japyā tu mama gāyatrī cāthavā'ṣṭākṣaraṃ nṛpa | ārjitaṃ duṣkṛtaṃ tasya nāśayennātra saṃśayaḥ
और अश्वत्थ के दर्शन के समय तथा मेरे दर्शन के समय, हे राजन्, मेरी गायत्री अथवा अष्टाक्षर मन्त्र का जप करना चाहिए। वह उसके अर्जित पाप को नष्ट कर देता है, इसमें संशय नहीं है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 30 (14.115.30)
अश्वत्थदर्शनं चैव किं त्वद्दर्शनसंमितम् । एतत्कथय मे देव परं कौतूहलं हि मे ॥
aśvatthadarśanaṃ caiva kiṃ tvaddarśanasaṃmitam | etatkathaya me deva paraṃ kautūhalaṃ hi me
क्या अश्वत्थ का दर्शन आपके दर्शन के समान है? हे देव, यह मुझे बताइए, क्योंकि मुझे बड़ी जिज्ञासा है।
भगवानुवाच
श्लोक 31 (14.115.31)
अहमश्वत्थरूपेण पालयामि जगत्त्रयम् । अश्वत्थो न स्थितो यत्र नाहं तत्र प्रतिष्ठितः ॥
ahamaśvattharūpeṇa pālayāmi jagattrayam | aśvattho na sthito yatra nāhaṃ tatra pratiṣṭhitaḥ
अश्वत्थ के रूप में मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ। जहाँ अश्वत्थ नहीं है, वहाँ मैं प्रतिष्ठित नहीं हूँ।
श्लोक 32 (14.115.32)
यत्राहं संस्थितो राजन्नश्वत्थश्चापि तिष्ठति । यस्त्वेनमर्चयेद्भक्त्या स मां साक्षात्समर्चति ॥
yatrāhaṃ saṃsthito rājannaśvatthaścāpi tiṣṭhati | yastvenamarcayedbhaktyā sa māṃ sākṣātsamarcati
हे राजन्, जहाँ मैं स्थित हूँ, वहाँ अश्वत्थ भी स्थित है। जो इसकी भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह साक्षात् मेरी ही पूजा करता है।
श्लोक 33 (14.115.33)
यस्त्वेनं प्रहरेत्कोपान्मामेव प्रहरेत्तु सः । तस्मात्प्रदक्षिणं कुर्यान्न छिन्द्यादेनमन्वहम् ॥
yastvenaṃ praharetkopānmāmeva praharettu saḥ | tasmātpradakṣiṇaṃ kuryānna chindyādenamanvaham
जो क्रोध से इस पर प्रहार करता है, वह मुझ पर ही प्रहार करता है। इसलिए इसकी प्रदक्षिणा करे, और इसे कभी न काटे।
श्लोक 34 (14.115.34)
व्रतस्य पारणं तीर्थमार्जवं तीर्थमुच्यते । देवशुश्रूषणं तीर्थं गुरुशुश्रूषणं तथा ॥
vratasya pāraṇaṃ tīrthamārjavaṃ tīrthamucyate | devaśuśrūṣaṇaṃ tīrthaṃ guruśuśrūṣaṇaṃ tathā
व्रत का पारण तीर्थ है और सरलता तीर्थ कही जाती है। देवों की सेवा तीर्थ है, और गुरु की सेवा भी वैसे ही।
श्लोक 35 (14.115.35)
पितृशुश्रूषणं तीर्थं मातृशुश्रूषणं तथा । दाराणां तोषणं तीर्थं गार्हस्थ्यं तीर्थमुच्यते ॥
pitṛśuśrūṣaṇaṃ tīrthaṃ mātṛśuśrūṣaṇaṃ tathā | dārāṇāṃ toṣaṇaṃ tīrthaṃ gārhasthyaṃ tīrthamucyate
पिता की सेवा तीर्थ है और माता की सेवा भी वैसे ही। पत्नी को सन्तुष्ट रखना तीर्थ है; गृहस्थ-जीवन तीर्थ कहा जाता है।
श्लोक 36 (14.115.36)
आतिथेयः परं तीर्थं ब्रह्मतीर्थं सनातनम् । ब्रह्मचर्यं परं तीर्थं त्रेताग्निस्तीर्थमुच्यते ॥
ātitheyaḥ paraṃ tīrthaṃ brahmatīrthaṃ sanātanam | brahmacaryaṃ paraṃ tīrthaṃ tretāgnistīrthamucyate
आतिथ्य परम तीर्थ है, सनातन ब्रह्मतीर्थ। ब्रह्मचर्य परम तीर्थ है; तीनों अग्नियाँ तीर्थ कही जाती हैं।
श्लोक 37 (14.115.37)
मूलं धर्मं तु विज्ञाय मनस्तत्रावधार्यताम् । गच्छ तीर्थानि कौन्तेय धर्मो धर्मेण वर्धते ॥
mūlaṃ dharmaṃ tu vijñāya manastatrāvadhāryatām | gaccha tīrthāni kaunteya dharmo dharmeṇa vardhate
धर्म को मूल जानकर उसी में मन लगाओ। हे कुन्तीपुत्र, तीर्थों में जाओ, क्योंकि धर्म धर्म से ही बढ़ता है।
श्लोक 38 (14.115.38)
द्विविधं तीर्थमित्याहुः स्थावरं जङ्गमं तथा । स्थावराज्जङ्गमं तीर्थं ततो ज्ञानपरिग्रहः ॥
dvividhaṃ tīrthamityāhuḥ sthāvaraṃ jaṅgamaṃ tathā | sthāvarājjaṅgamaṃ tīrthaṃ tato jñānaparigrahaḥ
कहते हैं कि तीर्थ दो प्रकार का है, स्थावर और जंगम। स्थावर से जंगम तीर्थ श्रेष्ठ है, क्योंकि उससे ज्ञान की प्राप्ति होती है।
श्लोक 39 (14.115.39)
कर्मणाऽपि विशुद्धस्य पुरुषस्येह भारत । हृदये सर्वतीर्थानि तीर्थभूतः स उच्यते ॥
karmaṇā'pi viśuddhasya puruṣasyeha bhārata | hṛdaye sarvatīrthāni tīrthabhūtaḥ sa ucyate
हे भारत, जो पुरुष कर्म से भी शुद्ध हो गया है, उसके हृदय में सब तीर्थ रहते हैं और वह स्वयं तीर्थरूप कहा जाता है।
श्लोक 40 (14.115.40)
गुरुतीर्थं परं ज्ञानमतस्तीर्थं न विद्यते । ज्ञानतीर्थं परं तीर्थं ब्रह्मतीर्थं सनातनम् ॥
gurutīrthaṃ paraṃ jñānamatastīrthaṃ na vidyate | jñānatīrthaṃ paraṃ tīrthaṃ brahmatīrthaṃ sanātanam
गुरु तीर्थ है और ज्ञान परम है; इससे बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है। ज्ञानतीर्थ ही परम तीर्थ है, सनातन ब्रह्मतीर्थ।
श्लोक 41 (14.115.41)
क्षमा तु परमं तीर्थं सर्वतीर्थेषु पाण्डव । क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् ॥
kṣamā tu paramaṃ tīrthaṃ sarvatīrtheṣu pāṇḍava | kṣamāvatāmayaṃ lokaḥ paraścaiva kṣamāvatām
हे पाण्डव, सब तीर्थों में क्षमा परम तीर्थ है। यह लोक क्षमाशीलों का है, और परलोक भी क्षमाशीलों का है।
श्लोक 42 (14.115.42)
मानितोऽमानितो वाऽपि पूजितोऽपूजितोपि वा । आक्रुष्टस्तर्जितो वाऽपि क्षमावांस्तीर्थमुच्यते ॥
mānito'mānito vā'pi pūjito'pūjitopi vā | ākruṣṭastarjito vā'pi kṣamāvāṃstīrthamucyate
सम्मानित हो या अपमानित, पूजित हो या अपूजित, गाली दिया गया हो या धमकाया गया हो, क्षमाशील मनुष्य तीर्थ कहा जाता है।
श्लोक 43 (14.115.43)
क्षमा यशः क्षमा दानं क्षमा यज्ञः क्षमा दमः । क्षमाऽहिंसा क्षमा धर्मः क्षमा चेन्द्रियनिग्रहः ॥
kṣamā yaśaḥ kṣamā dānaṃ kṣamā yajñaḥ kṣamā damaḥ | kṣamā'hiṃsā kṣamā dharmaḥ kṣamā cendriyanigrahaḥ
क्षमा यश है, क्षमा दान है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा दम है; क्षमा अहिंसा है, क्षमा धर्म है, क्षमा इन्द्रियों का संयम है।
श्लोक 44 (14.115.44)
क्षमा दया क्षमा यज्ञः क्षमयैव धृतं जगत् । क्षमावान्ब्राह्मणो देवः क्षमावान्ब्राह्मणो वरः ॥
kṣamā dayā kṣamā yajñaḥ kṣamayaiva dhṛtaṃ jagat | kṣamāvānbrāhmaṇo devaḥ kṣamāvānbrāhmaṇo varaḥ
क्षमा दया है, क्षमा यज्ञ है; क्षमा से ही जगत् धारण किया हुआ है। क्षमाशील ब्राह्मण देवता है; क्षमाशील ब्राह्मण श्रेष्ठ है।
श्लोक 45 (14.115.45)
क्षमावानाप्नुयात्स्वर्गं क्षमावानाप्नुयाद्यशः । क्षमावान्प्राप्नुयान्मोक्षं तस्मात्साधुः स उच्यते ॥
kṣamāvānāpnuyātsvargaṃ kṣamāvānāpnuyādyaśaḥ | kṣamāvānprāpnuyānmokṣaṃ tasmātsādhuḥ sa ucyate
क्षमाशील स्वर्ग पाता है, क्षमाशील यश पाता है, क्षमाशील मोक्ष पाता है; इसलिए वह साधु कहा जाता है।
श्लोक 46 (14.115.46)
आत्मा नदी भारतपुण्यतीर्थम् । आत्मा तीर्थं सर्वतीर्थप्रधानम् । आत्मा यज्ञः सततं मन्यते वै । स्वर्गो मोक्षः सर्वमात्मन्यधीनम् ॥
ātmā nadī bhāratapuṇyatīrtham | ātmā tīrthaṃ sarvatīrthapradhānam | ātmā yajñaḥ satataṃ manyate vai | svargo mokṣaḥ sarvamātmanyadhīnam
हे भारत, आत्मा ही नदी है, आत्मा ही पुण्य तीर्थ है; आत्मा सब तीर्थों में प्रधान तीर्थ है। आत्मा ही सदा किया जाने वाला यज्ञ माना जाता है; स्वर्ग, मोक्ष, सब कुछ आत्मा के अधीन है।
श्लोक 47 (14.115.47)
आचारनैर्मल्यमुपागतेन । सत्यक्षमानिस्तुलशीतलेन । ज्ञानांबुना स्नाति हि नित्यमेवं । किं तस्य भूयः सलिलेन तीर्थम् ॥
ācāranairmalyamupāgatena | satyakṣamānistulaśītalena | jñānāṃbunā snāti hi nityamevaṃ | kiṃ tasya bhūyaḥ salilena tīrtham
जो आचार की निर्मलता को प्राप्त है, सत्य, क्षमा और अतुल शान्ति से शीतल है और सदा ज्ञान-जल में स्नान करता है, उसे तीर्थ के जल से और क्या प्रयोजन?
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 48 (14.115.48)
भगवन्सर्वपापघ्नं प्रायश्चित्तमदुष्करम् । त्वद्भक्तस्य सुरश्रेष्ठ मम त्वं वक्तुमर्हसि ॥
bhagavansarvapāpaghnaṃ prāyaścittamaduṣkaram | tvadbhaktasya suraśreṣṭha mama tvaṃ vaktumarhasi
भगवन्, हे सुरश्रेष्ठ, मुझ अपने भक्त को आप ऐसा प्रायश्चित्त बताइए जो सब पापों का नाश करने वाला और करने में सरल हो।
भगवानुवाच
श्लोक 49 (14.115.49)
रहस्यमिदमत्यर्थमश्राव्यं पापकर्मणाम् । अधार्मिकाणामश्राव्यं प्रायश्चित्तं ब्रवीमि ते ॥
rahasyamidamatyarthamaśrāvyaṃ pāpakarmaṇām | adhārmikāṇāmaśrāvyaṃ prāyaścittaṃ bravīmi te
यह अत्यन्त गुप्त बात है, पापकर्म करने वालों को सुनाने योग्य नहीं है। अधार्मिकों को भी यह नहीं सुनाना चाहिए; मैं तुम्हें यह प्रायश्चित्त बताता हूँ।
श्लोक 50 (14.115.50)
पावनं ब्राह्मणं दृष्ट्वा मद्गतेनान्तरात्मना । नमो ब्रह्मण्यदेवायेत्यभिवादनमाचरेत् ॥
pāvanaṃ brāhmaṇaṃ dṛṣṭvā madgatenāntarātmanā | namo brahmaṇyadevāyetyabhivādanamācaret
पवित्र करने वाले ब्राह्मण को देखकर मुझमें अन्तःकरण लगाए हुए वह "ब्राह्मणों के देव को नमस्कार" कहकर अभिवादन करे।
श्लोक 51 (14.115.51)
प्रदक्षिणं च यः कुर्यात्पुनरष्टाक्षरेण तु । तेन तुष्टेन विप्रेण तत्पापं क्षपयाम्यहम् ॥
pradakṣiṇaṃ ca yaḥ kuryātpunaraṣṭākṣareṇa tu | tena tuṣṭena vipreṇa tatpāpaṃ kṣapayāmyaham
और जो अष्टाक्षर मन्त्र से उसकी प्रदक्षिणा भी करता है, उस ब्राह्मण के सन्तुष्ट होने पर मैं उसके उस पाप का क्षय कर देता हूँ।
श्लोक 52 (14.115.52)
पोत्रकृष्टां वराहस्य मृत्तिकां शिरसा वहन् । प्राणायामशतं कृत्वा नरः पापैः प्रमुच्यते ॥
potrakṛṣṭāṃ varāhasya mṛttikāṃ śirasā vahan | prāṇāyāmaśataṃ kṛtvā naraḥ pāpaiḥ pramucyate
वराह की थूथन से खोदी गई मिट्टी को सिर पर धारण करके और सौ प्राणायाम करके मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 53 (14.115.53)
दक्षिणावर्तशङ्खाद्वा कपिलाशृङ्गतोपि वा । प्राक्स्रोतसं नदीं गत्वा ममायतनसंनिधौ ॥
dakṣiṇāvartaśaṅkhādvā kapilāśṛṅgatopi vā | prāksrotasaṃ nadīṃ gatvā mamāyatanasaṃnidhau
दक्षिणावर्त शंख अथवा कपिला गाय के सींग से, पूर्व की ओर बहने वाली नदी पर मेरे मन्दिर के निकट जाकर,
श्लोक 54 (14.115.54)
सलिलेन तु यः स्नायात्सकृदेव रविग्रहे । तस्य यत्संचितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥
salilena tu yaḥ snāyātsakṛdeva ravigrahe | tasya yatsaṃcitaṃ pāpaṃ tatkṣaṇādeva naśyati
जो उस जल से सूर्यग्रहण के समय एक बार भी स्नान करता है, उसने जो पाप संचित किया है, वह उसी क्षण नष्ट हो जाता है।
श्लोक 55 (14.115.55)
मस्तकान्निस्सृतैस्तोयैः कपिलाया युधिष्ठिर । गोमूत्रेणापि यः स्नायाद्रोहिण्यां मम वा दिने । विप्रपादच्युतैर्वाऽपि तोयैः पापं प्रणश्यति ॥
mastakānnissṛtaistoyaiḥ kapilāyā yudhiṣṭhira | gomūtreṇāpi yaḥ snāyādrohiṇyāṃ mama vā dine | viprapādacyutairvā'pi toyaiḥ pāpaṃ praṇaśyati
अथवा हे युधिष्ठिर, कपिला गाय के मस्तक से बहे जल से, या रोहिणी नक्षत्र में अथवा मेरे दिन गोमूत्र से स्नान करने वाले का, या ब्राह्मण के चरणों से गिरे जल से भी, पाप पूर्णतः नष्ट हो जाता है।
श्लोक 56 (14.115.56)
नमस्येद्यस्तु मद्भक्त्या शिंशुमारं प्रजापतिम् । चतुर्दशाङ्गसंयुक्तं तस्य पापं प्रणश्यति ॥
namasyedyastu madbhaktyā śiṃśumāraṃ prajāpatim | caturdaśāṅgasaṃyuktaṃ tasya pāpaṃ praṇaśyati
जो मेरी भक्ति से चौदह अंगों वाले प्रजापति शिंशुमार को नमस्कार करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है।
श्लोक 57 (14.115.57)
ततश्चतुर्दशाङ्गानि शृणु तस्य युधिष्ठिर । शिरो धर्मो हनुर्ब्रह्मा वृषावुत्तरदक्षिणौ ॥
tataścaturdaśāṅgāni śṛṇu tasya yudhiṣṭhira | śiro dharmo hanurbrahmā vṛṣāvuttaradakṣiṇau
अब, हे युधिष्ठिर, उसके चौदह अंग सुनो: सिर धर्म है, ठुड्डी ब्रह्मा है, उत्तर और दक्षिण के दोनों वृष उसके पार्श्व हैं।
श्लोक 58 (14.115.58)
हृदयं तु भवेद्विष्णुरंसौ स्यातां तथाऽश्विनौ । अत्रिर्मध्यं भवेद्राजँल्लिङ्गं संवत्सरं भवेत् ॥
hṛdayaṃ tu bhavedviṣṇuraṃsau syātāṃ tathā'śvinau | atrirmadhyaṃ bhavedrājam̐lliṅgaṃ saṃvatsaraṃ bhavet
हृदय विष्णु है, दोनों कन्धे अश्विनीकुमार हैं, हे राजन्, मध्य भाग अत्रि है और लिंग संवत्सर है।
श्लोक 59 (14.115.59)
मित्रावरुणकौ पादावूरुद्वन्द्वं हुताशनः । ततः पश्चाद्भवेदिन्द्रस्ततः पश्चात्प्रजापतिः ॥
mitrāvaruṇakau pādāvūrudvandvaṃ hutāśanaḥ | tataḥ paścādbhavedindrastataḥ paścātprajāpatiḥ
दोनों चरण मित्र और वरुण हैं, दोनों जंघाएँ अग्नि हैं; उसके पीछे इन्द्र है और उसके पीछे प्रजापति।
श्लोक 60 (14.115.60)
अभयं च ततः पश्चात्स एव ध्रुवसंज्ञिकः । एतान्यङ्गानि सर्वाणि शिंशुमारप्रजापतेः ॥
abhayaṃ ca tataḥ paścātsa eva dhruvasaṃjñikaḥ | etānyaṅgāni sarvāṇi śiṃśumāraprajāpateḥ
उसके पश्चात् अभय है, वही ध्रुव नाम वाला है। ये सब शिंशुमार प्रजापति के अंग हैं।
श्लोक 61 (14.115.61)
पिबेत्तु पञ्चगव्यं यः पौर्णमास्यामुपोष्य तु । तस्य नश्यति यत्पापं तत्पापं पूर्वसंचितम् । तथैव ब्रह्मकूर्चं तु समन्त्रं तु पृथक्पृथक् ॥
pibettu pañcagavyaṃ yaḥ paurṇamāsyāmupoṣya tu | tasya naśyati yatpāpaṃ tatpāpaṃ pūrvasaṃcitam | tathaiva brahmakūrcaṃ tu samantraṃ tu pṛthakpṛthak
जो पूर्णिमा को उपवास करके पंचगव्य पीता है, उसका पहले संचित पाप नष्ट हो जाता है; और वैसे ही ब्रह्मकूर्च भी, प्रत्येक अपने-अपने मन्त्र के साथ।
श्लोक 62 (14.115.62)
मासिमासि पिबेद्यस्तु तस्य पापं प्रणश्यति । पात्रं च ब्रह्मकूर्चं च शृणु तत्र च भारत ॥
māsimāsi pibedyastu tasya pāpaṃ praṇaśyati | pātraṃ ca brahmakūrcaṃ ca śṛṇu tatra ca bhārata
जो मास-मास इसे पीता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है। हे भारत, अब पात्र और ब्रह्मकूर्च के विषय में सुनो।
श्लोक 63 (14.115.63)
पालाशं पद्मपत्रं च ताम्रं वाऽथ हिरण्ययम् । सादयित्वा तु गृह्णीयात्तत्तु पात्रमुदाहृतम् ॥
pālāśaṃ padmapatraṃ ca tāmraṃ vā'tha hiraṇyayam | sādayitvā tu gṛhṇīyāttattu pātramudāhṛtam
पलाश का, कमल-पत्र का, ताँबे का अथवा सोने का पात्र लेकर, उसमें सब वस्तुएँ रखकर ग्रहण करे; वही पात्र कहा गया है।
श्लोक 64 (14.115.64)
गायत्र्या गृह्णते मूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम् । आप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णेति वै दधि ॥
gāyatryā gṛhṇate mūtraṃ gandhadvāreti gomayam | āpyāyasveti ca kṣīraṃ dadhikrāvṇeti vai dadhi
गायत्री से गोमूत्र लेता है, "गन्धद्वारा" से गोमय, "आप्यायस्व" से दूध और "दधिक्राव्णो" से दही,
श्लोक 65 (14.115.65)
तेजोसिशुक्रमित्याज्यं देवस्यत्वेति कुशोदकम् । आपोहिष्ठेत्यृचा गृह्य यवचूर्णं यथाविधि ॥
tejosiśukramityājyaṃ devasyatveti kuśodakam | āpohiṣṭhetyṛcā gṛhya yavacūrṇaṃ yathāvidhi
"तेजोऽसि शुक्रम्" से घी, "देवस्य त्वा" से कुशोदक; और "आपो हि ष्ठा" ऋचा से विधिपूर्वक जौ का चूर्ण लेकर,
श्लोक 66 (14.115.66)
ब्रह्मणे च यथा हुत्वा समिद्धे च हुताशने । आलोड्य प्रणवेनैव निर्मथ्य प्रणवेन तु ॥
brahmaṇe ca yathā hutvā samiddhe ca hutāśane | āloḍya praṇavenaiva nirmathya praṇavena tu
और प्रज्वलित अग्नि में ब्रह्मा के निमित्त आहुति देकर, प्रणव से उसे घोले, प्रणव से ही मथे,
श्लोक 67 (14.115.67)
उद्धृत्य प्रणवेनैव पिबेत्तु प्रणवेन तु । महताऽपि स पापेन त्वचेवाहिर्विमुच्यते ॥
uddhṛtya praṇavenaiva pibettu praṇavena tu | mahatā'pi sa pāpena tvacevāhirvimucyate
प्रणव से ही उठाए और प्रणव से ही पिए। वह महान् पाप से भी वैसे मुक्त हो जाता है, जैसे सर्प अपनी केंचुली से।
श्लोक 68 (14.115.68)
भद्रं न इति यः पादं पठन्नृक्सहितां तदा । अन्तर्जले वाऽभ्यादित्ये तस्य पापं प्रणश्यति ॥
bhadraṃ na iti yaḥ pādaṃ paṭhannṛksahitāṃ tadā | antarjale vā'bhyāditye tasya pāpaṃ praṇaśyati
जो ऋग्वेद संहिता का "भद्रं न" से आरम्भ होने वाला पाद जल में खड़े होकर अथवा सूर्य के सम्मुख पढ़ता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है।
श्लोक 69 (14.115.69)
मम सूक्तं जपेद्यस्तु नित्यं मद्गतमानसः । न पापेन स लिप्येत पद्मपत्रमिवांभसा ॥
mama sūktaṃ japedyastu nityaṃ madgatamānasaḥ | na pāpena sa lipyeta padmapatramivāṃbhasā
जो मुझमें मन लगाकर नित्य मेरे सूक्त का जप करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता जल से नहीं भीगता।