आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 116
सच्चा ब्राह्मण कौन है, और भगवान् की प्रतिमा की उपासना
युधिष्ठिर पूछते हैं कि किन ब्राह्मणों के कर्म सफल होते हैं। कृष्ण बताते हैं कि शुद्ध हृदय के बिना व्रत, तपस्वी चिह्न और यज्ञ व्यर्थ हैं, मनुष्य जन्म से नहीं बल्कि गुण और आचरण से आदर पाता है; वे पाँच प्रकार की शुद्धि और अपवित्र मानी गई वस्तुओं की गणना करते हैं। वे कहते हैं कि उनके भक्तों का तिरस्कार करने वाले नरक में गिरते हैं, कि वे भक्ति से अर्पित पत्र, पुष्प, फल या जल स्वीकार करते हैं, और कि उनके अवतारों की मिट्टी, रत्न, ताँबे, चाँदी या सोने की प्रतिमा पूजी जा सकती है, जिसका पुण्य हर क्रम में दस गुना बढ़ता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (14.116.1)
कीदृशा ब्राह्मणाः पुण्या भावशुद्धाः सुरेश्वर । यत्कर्म सफलं नेति कथयस्य ममानघ ॥
kīdṛśā brāhmaṇāḥ puṇyā bhāvaśuddhāḥ sureśvara | yatkarma saphalaṃ neti kathayasya mamānagha
हे देवेश्वर, कैसे ब्राह्मण पुण्यात्मा और भाव से शुद्ध होते हैं? हे निष्पाप, मुझे बताइए कि किसका कर्म सफल होता है और किसका नहीं।
भगवानुवाच
श्लोक 2 (14.116.2)
शृणु पाण्डव तत्सर्वं ब्राह्मणानां यथाक्रमम् । सफलं निष्फलं चैव तेषां कर्म ब्रवीमि ते ॥
śṛṇu pāṇḍava tatsarvaṃ brāhmaṇānāṃ yathākramam | saphalaṃ niṣphalaṃ caiva teṣāṃ karma bravīmi te
हे पाण्डव, ब्राह्मणों के विषय में सब कुछ क्रम से सुनो। मैं तुम्हें बताता हूँ कि उनके कौन-से कर्म सफल होते हैं और कौन-से निष्फल।
श्लोक 3 (14.116.3)
त्रिदण्डधारणं मौनं जटाधारणमुण्डनम् । वल्कलाजिनसंवासो व्रतचर्याऽभिषेचनम् ॥
tridaṇḍadhāraṇaṃ maunaṃ jaṭādhāraṇamuṇḍanam | valkalājinasaṃvāso vratacaryā'bhiṣecanam
त्रिदण्ड धारण करना, मौन रहना, जटा रखना या सिर मुँडाना, वल्कल और मृगचर्म में रहना, व्रतों का आचरण और स्नान-अभिषेक;
श्लोक 4 (14.116.4)
अग्निहोत्रं गृहे वासः स्वाध्यायं दारसत्क्रिया । सर्वाण्येतानि वै मिथ्या यदि भावो न निर्मलः ॥
agnihotraṃ gṛhe vāsaḥ svādhyāyaṃ dārasatkriyā | sarvāṇyetāni vai mithyā yadi bhāvo na nirmalaḥ
अग्निहोत्र, घर में रहना, वेदाध्ययन और पत्नी का सत्कार — ये सब मिथ्या हैं, यदि भाव निर्मल नहीं है।
श्लोक 5 (14.116.5)
अग्निहोत्रं वृथा राजन्वृथा वेदास्तथैव च । शीलेन देवास्तुष्यन्ति श्रुतयस्तत्र कारणम् ॥
agnihotraṃ vṛthā rājanvṛthā vedāstathaiva ca | śīlena devāstuṣyanti śrutayastatra kāraṇam
हे राजन्, अग्निहोत्र व्यर्थ है और वेद भी व्यर्थ हैं। देवता शील से प्रसन्न होते हैं; इसमें श्रुतियाँ ही प्रमाण हैं।
श्लोक 6 (14.116.6)
क्षान्तं दान्तं जितक्रोधं जितात्मानं जितेन्द्रियम् । तमग्र्यं ब्राह्मणं मन्ये शेषाः शूद्रा इति स्मृताः ॥
kṣāntaṃ dāntaṃ jitakrodhaṃ jitātmānaṃ jitendriyam | tamagryaṃ brāhmaṇaṃ manye śeṣāḥ śūdrā iti smṛtāḥ
जो क्षमाशील है, संयमी है, जिसने क्रोध को जीत लिया है, जो आत्मजयी और जितेन्द्रिय है — उसे मैं श्रेष्ठ ब्राह्मण मानता हूँ; शेष को शूद्र कहा गया है।
श्लोक 7 (14.116.7)
अग्निहोत्रव्रतपरान्स्वाध्यायनिरताञ्शुचीन् । उपवासरतान्दान्तांस्तान्देवा ब्राह्मणान्विदुः ॥
agnihotravrataparānsvādhyāyaniratāñśucīn | upavāsaratāndāntāṃstāndevā brāhmaṇānviduḥ
जो अग्निहोत्र के व्रत में तत्पर, स्वाध्याय में लीन, पवित्र, उपवास-प्रिय और संयमी हैं — उन्हें देवता ब्राह्मण जानते हैं।
श्लोक 8 (14.116.8)
न जात्या पूजितो राजन्गुणाः कल्याणकारणाः । चण्डालमपि वृत्तस्थं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥
na jātyā pūjito rājanguṇāḥ kalyāṇakāraṇāḥ | caṇḍālamapi vṛttasthaṃ taṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ
हे राजन्, मनुष्य जन्म से पूजित नहीं होता; कल्याण के कारण गुण हैं। सदाचार में स्थित चाण्डाल को भी देवता ब्राह्मण जानते हैं।
श्लोक 9 (14.116.9)
मनश्शौचं कर्मशौचं कुलशौचं च भारत । शरीरशौचं वाक्छौचं शौचं पञ्चविधं स्मृतम् ॥
manaśśaucaṃ karmaśaucaṃ kulaśaucaṃ ca bhārata | śarīraśaucaṃ vākchaucaṃ śaucaṃ pañcavidhaṃ smṛtam
हे भारत, मन की शुद्धि, कर्म की शुद्धि, कुल की शुद्धि, शरीर की शुद्धि और वाणी की शुद्धि — इस प्रकार शुद्धि पाँच प्रकार की मानी गई है।
श्लोक 10 (14.116.10)
पञ्चस्वेतेषु शौचेषु हृदि शौचं विशिष्यते । हृदयस्य च शौचेन स्वर्गं गच्छन्ति मानवाः ॥
pañcasveteṣu śauceṣu hṛdi śaucaṃ viśiṣyate | hṛdayasya ca śaucena svargaṃ gacchanti mānavāḥ
इन पाँचों शुद्धियों में हृदय की शुद्धि सबसे श्रेष्ठ है; हृदय की शुद्धि से मनुष्य स्वर्ग को जाते हैं।
श्लोक 11 (14.116.11)
अग्निहोत्रपरिभ्रष्टः प्रसक्तः क्रयविक्रयैः । वर्णसङ्करकर्ता च ब्राह्मणो वृषलैः समः ॥
agnihotraparibhraṣṭaḥ prasaktaḥ krayavikrayaiḥ | varṇasaṅkarakartā ca brāhmaṇo vṛṣalaiḥ samaḥ
जो ब्राह्मण अग्निहोत्र से भ्रष्ट हो गया है, क्रय-विक्रय में लगा है और वर्णसंकर करता है, वह वृषलों के समान है।
श्लोक 12 (14.116.12)
यस्य वेदश्रुतिर्नष्टा कर्षकश्चापि यो द्विजः । विकर्मसेवी कौन्तेय स वै वृषल उच्यते ॥
yasya vedaśrutirnaṣṭā karṣakaścāpi yo dvijaḥ | vikarmasevī kaunteya sa vai vṛṣala ucyate
हे कुन्तीपुत्र, जिसका वेदज्ञान नष्ट हो गया है, अथवा जो द्विज खेती करता है और निषिद्ध कर्मों का सेवन करता है, वही वृषल कहलाता है।
श्लोक 13 (14.116.13)
वृषो हि धर्मो विज्ञेयस्तस्य यः कुरुते लयम् । वृषलं तं विदुर्देवा निकृष्टं श्वपचादपि ॥
vṛṣo hi dharmo vijñeyastasya yaḥ kurute layam | vṛṣalaṃ taṃ vidurdevā nikṛṣṭaṃ śvapacādapi
धर्म को ही 'वृष' जानना चाहिए; जो उसका नाश करता है, उसे देवता वृषल जानते हैं, जो श्वपच से भी अधिक नीच है।
श्लोक 14 (14.116.14)
स्तुतिभिर्ब्रह्मगीताभिर्यः शूद्रं स्तौति मानवः । न तु मां स्तौति पापात्मा स तु चण्डालतः समः ॥
stutibhirbrahmagītābhiryaḥ śūdraṃ stauti mānavaḥ | na tu māṃ stauti pāpātmā sa tu caṇḍālataḥ samaḥ
जो मनुष्य वेदमय स्तुतियों से किसी शूद्र की स्तुति करता है और मेरी स्तुति नहीं करता, वह पापात्मा चाण्डाल के समान है।
श्लोक 15 (14.116.15)
श्वदृतौ तु यथा क्षीरं ब्रह्म वै वृषले तथा । दुष्टतामेति तत्सर्वं शुना लीढं हविर्यथा ॥
śvadṛtau tu yathā kṣīraṃ brahma vai vṛṣale tathā | duṣṭatāmeti tatsarvaṃ śunā līḍhaṃ haviryathā
जैसे कुत्ते के चमड़े की थैली में रखा दूध बिगड़ जाता है, वैसे ही वृषल में वेदज्ञान दूषित हो जाता है — जैसे कुत्ते का चाटा हुआ हविष्य।
श्लोक 16 (14.116.16)
अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसान्यायविस्तरः । धर्मशास्त्रं पुराणं च विद्या ह्येताश्चतुर्दश ॥
aṅgāni vedāścatvāro mīmāṃsānyāyavistaraḥ | dharmaśāstraṃ purāṇaṃ ca vidyā hyetāścaturdaśa
वेदांग, चारों वेद, मीमांसा और न्याय का विस्तार, धर्मशास्त्र और पुराण — ये चौदह विद्याएँ हैं।
श्लोक 17 (14.116.17)
यान्युक्तानि मया सम्यग्विद्यास्थानानि भारत । उत्पन्नानि पवित्राणि भुवनार्थं तथैव च ॥
yānyuktāni mayā samyagvidyāsthānāni bhārata | utpannāni pavitrāṇi bhuvanārthaṃ tathaiva ca
हे भारत, विद्या के ये जो आधार मैंने भली-भाँति बताए हैं, वे पवित्र रूप में उत्पन्न हुए हैं और जगत् के कल्याण के लिए भी।
श्लोक 18 (14.116.18)
तस्मात्तानि न शूद्रस्य स्प्रष्टव्यानि युधिष्ठिर । सर्वं त्रीण्यपवित्राणि पञ्चामेध्यानि भारत ॥
tasmāttāni na śūdrasya spraṣṭavyāni yudhiṣṭhira | sarvaṃ trīṇyapavitrāṇi pañcāmedhyāni bhārata
इसलिए, हे युधिष्ठिर, शूद्र को उन्हें नहीं छूना चाहिए। हे भारत, कुल मिलाकर तीन वस्तुएँ अपवित्र हैं और पाँच अशुद्ध।
श्लोक 19 (14.116.19)
श्वा च शूद्रः श्वपाकश्च अपवित्राणि पाण्डव । गायकः कुक्कुटो यूपो ह्युदक्या वृषलीपतिः ॥
śvā ca śūdraḥ śvapākaśca apavitrāṇi pāṇḍava | gāyakaḥ kukkuṭo yūpo hyudakyā vṛṣalīpatiḥ
हे पाण्डव, कुत्ता, शूद्र और श्वपाक अपवित्र हैं। और गायक, मुर्गा, यूप, रजस्वला स्त्री तथा वृषली का पति —
श्लोक 20 (14.116.20)
पञ्चैते स्युरमेध्याश्च स्प्रष्टव्या न कदातन । स्पृष्ट्वैतानष्ट वै विप्रः सचेलो जलमाविशेत् ॥
pañcaite syuramedhyāśca spraṣṭavyā na kadātana | spṛṣṭvaitānaṣṭa vai vipraḥ sacelo jalamāviśet
ये पाँच अशुद्ध हैं और इन्हें कभी नहीं छूना चाहिए। इन आठों को छूकर ब्राह्मण को वस्त्र सहित जल में स्नान करना चाहिए।
श्लोक 21 (14.116.21)
मद्भक्ताञ्शूद्रसामान्यादवमन्यन्ति ये नराः । नरकेष्वेव तिष्ठन्ति वर्षकोटिं नराधमाः ॥
madbhaktāñśūdrasāmānyādavamanyanti ye narāḥ | narakeṣveva tiṣṭhanti varṣakoṭiṃ narādhamāḥ
जो मनुष्य मेरे भक्तों को शूद्रों के समान समझकर उनका अपमान करते हैं, वे अधम नर करोड़ वर्षों तक नरकों में पड़े रहते हैं।
श्लोक 22 (14.116.22)
चण्डालमपि मद्भक्तं नावमन्येत बुद्धिमान् । अवमानात्पतन्त्येव नरके रौरवे नराः ॥
caṇḍālamapi madbhaktaṃ nāvamanyeta buddhimān | avamānātpatantyeva narake raurave narāḥ
बुद्धिमान् को मेरे भक्त चाण्डाल का भी अपमान नहीं करना चाहिए; अपमान करने वाले मनुष्य रौरव नरक में गिरते ही हैं।
श्लोक 23 (14.116.23)
मम भक्तस्य भक्तेषु प्रीतिरभ्यधिका मम । तस्मान्मद्भक्तभक्ताश्च पूजनीया विशेषतः ॥
mama bhaktasya bhakteṣu prītirabhyadhikā mama | tasmānmadbhaktabhaktāśca pūjanīyā viśeṣataḥ
मेरे भक्त के भक्तों पर मेरी प्रीति और भी अधिक है; इसलिए मेरे भक्तों के भक्त विशेष रूप से पूजनीय हैं।
श्लोक 24 (14.116.24)
कीटपक्षिमृगाणां च मयि संन्यस्तचेतसाम् । ऊर्ध्वामेव गतिं विद्धि किं पुनर्ज्ञानिनां नृणाम् ॥
kīṭapakṣimṛgāṇāṃ ca mayi saṃnyastacetasām | ūrdhvāmeva gatiṃ viddhi kiṃ punarjñānināṃ nṛṇām
जान लो कि मुझमें मन समर्पित करने वाले कीट, पक्षी और पशुओं की भी ऊर्ध्व गति होती है — तब ज्ञानी मनुष्यों का तो कहना ही क्या।
श्लोक 25 (14.116.25)
पत्रं वाऽप्यथवा पुष्पं फलं वाऽप्यप एव वा । ददाति मम शूद्रो यच्छिरसा धारयामि तत् ॥
patraṃ vā'pyathavā puṣpaṃ phalaṃ vā'pyapa eva vā | dadāti mama śūdro yacchirasā dhārayāmi tat
पत्र हो, पुष्प हो, फल हो या जल ही हो — जो कुछ शूद्र भी मुझे देता है, उसे मैं सिर पर धारण करता हूँ।
श्लोक 26 (14.116.26)
विप्रानेवार्चयेद्भक्त्या शूद्रप्रायांश्च मत्प्रियान् । तेषां तेनैव रूपेण पूजां गृह्णामि भारत ॥
viprānevārcayedbhaktyā śūdraprāyāṃśca matpriyān | teṣāṃ tenaiva rūpeṇa pūjāṃ gṛhṇāmi bhārata
भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए, और मेरे उन प्रिय जनों की भी जो प्रायः शूद्र हैं; हे भारत, उसी रूप से मैं उनकी पूजा ग्रहण करता हूँ।
श्लोक 27 (14.116.27)
वेदोक्तेनैव मार्गेण सर्वभूतहृदि स्थितम् । मामर्चयन्ति ये विप्रा मत्सायुज्यं व्रजन्ति ते ॥
vedoktenaiva mārgeṇa sarvabhūtahṛdi sthitam | māmarcayanti ye viprā matsāyujyaṃ vrajanti te
जो ब्राह्मण समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित मेरी वेदोक्त मार्ग से पूजा करते हैं, वे मेरे सायुज्य को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 28 (14.116.28)
मद्भक्तानां हितायैव प्रादुर्भावः कृतो मया । प्रादुर्भावकृता काचिदर्चनीया युधिष्ठिर ॥
madbhaktānāṃ hitāyaiva prādurbhāvaḥ kṛto mayā | prādurbhāvakṛtā kācidarcanīyā yudhiṣṭhira
मैंने अपने भक्तों के हित के लिए ही अवतार लिए हैं; हे युधिष्ठिर, इन अवतारों की बनाई हुई कोई मूर्ति पूजनीय है।
श्लोक 29 (14.116.29)
आसामन्यतमां मूर्तिं यो मद्भक्त्या समर्चति । तेनैव परितुष्टोऽहं भविष्यामि न संशयः ॥
āsāmanyatamāṃ mūrtiṃ yo madbhaktyā samarcati | tenaiva parituṣṭo'haṃ bhaviṣyāmi na saṃśayaḥ
जो मेरी भक्ति से इन मूर्तियों में से किसी एक की भी पूजा करता है, उसी से मैं परम प्रसन्न हो जाऊँगा; इसमें संशय नहीं।
श्लोक 30 (14.116.30)
मृदा च मणिरत्नैश्च ताम्रेण रजतेन च । कृत्वा प्रतिकृतिं कुर्यादर्चनां काञ्चनेन वा । पुण्यं दशगुणं विद्यादेतेषामुत्तरोत्तरम् ॥
mṛdā ca maṇiratnaiśca tāmreṇa rajatena ca | kṛtvā pratikṛtiṃ kuryādarcanāṃ kāñcanena vā | puṇyaṃ daśaguṇaṃ vidyādeteṣāmuttarottaram
मिट्टी, मणि-रत्न, ताँबे या चाँदी की प्रतिमा बनाकर पूजा करे, अथवा सोने की; इनमें से प्रत्येक का पुण्य अगले की अपेक्षा दस गुना जानना चाहिए।
श्लोक 31 (14.116.31)
जयकामो भवेद्राजा विद्याकामो द्विजोत्तमः । वैश्यो वा धनकामस्तु शूद्रः सुखफलप्रियः । सर्वकामाः स्त्रियो वाऽपि सर्वान्कामानवाप्नुयुः ॥
jayakāmo bhavedrājā vidyākāmo dvijottamaḥ | vaiśyo vā dhanakāmastu śūdraḥ sukhaphalapriyaḥ | sarvakāmāḥ striyo vā'pi sarvānkāmānavāpnuyuḥ
विजय चाहने वाला राजा, विद्या चाहने वाला श्रेष्ठ ब्राह्मण, धन चाहने वाला वैश्य, सुखरूप फल का इच्छुक शूद्र, अथवा सब कामनाओं वाली स्त्रियाँ — सभी अपनी सब कामनाएँ प्राप्त करेंगे।