आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 118
पालाश की प्रतिमा, सच्चे तीर्थ और कृष्ण का द्वारका-गमन
कृष्ण परदेश में मरे हुए ब्राह्मण के लिए पालाश की प्रतिमा की विधि बताते हैं, जिसमें देह की अस्थियों का अंगों में विभाजन किया जाता है, और सच्चे तीर्थ गिनाते हैं: सत्य, अहिंसा, तप, दया, शील, तथा भक्त और यतिजन। वे शूद्र के लिए द्विजसेवा के धर्म, पापी को भी मुक्त करने वाली भक्ति और सच्चे भागवत के लक्षण बताते हैं, और इस उपदेश के श्रवण का फल कहकर समाप्त करते हैं। फिर वैशम्पायन बताते हैं कि ऋषि लौट गए और कृष्ण ने पाण्डवों से विदा ली; पाण्डव उनके रथ के पीछे चले, फिर वे द्वारका चले गए, और वैष्णव उपदेश पूरा होता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (14.118.1)
देशान्तरगते विप्रे संयुक्ते कालधर्मणा । शरीरनाशे संप्राप्ते कथं प्रेतत्वकल्पना ॥
deśāntaragate vipre saṃyukte kāladharmaṇā | śarīranāśe saṃprāpte kathaṃ pretatvakalpanā
जब कोई ब्राह्मण परदेश में कालधर्म को प्राप्त हो जाए और उसका शरीर नष्ट हो जाए, तब उसके प्रेतत्व की विधि कैसे निर्धारित की जाती है?
भगवानुवाच
श्लोक 2 (14.118.2)
श्रूयतामाहिताग्नेस्तु तथाभूतस्य संस्क्रिया । पालाशबृन्दैः प्रतिमा कर्तव्या कल्पचोदिता ॥
śrūyatāmāhitāgnestu tathābhūtasya saṃskriyā | pālāśabṛndaiḥ pratimā kartavyā kalpacoditā
जिसने अग्नि की स्थापना की थी, ऐसे मनुष्य का संस्कार सुनो: कल्पसूत्र के आदेश के अनुसार पलाश के डंठलों के गुच्छों से प्रतिमा बनानी चाहिए।
श्लोक 3 (14.118.3)
त्रीणि षष्टिशतान्याहुरस्थीन्यस्य युधिष्ठिर । तेषां विकल्पना कार्या यथाशास्त्रं विनिश्चितम् ॥
trīṇi ṣaṣṭiśatānyāhurasthīnyasya yudhiṣṭhira | teṣāṃ vikalpanā kāryā yathāśāstraṃ viniścitam
हे युधिष्ठिर, कहते हैं कि मनुष्य की तीन सौ साठ हड्डियाँ होती हैं; शास्त्र के निश्चय के अनुसार उनका विभाजन करना चाहिए।
श्लोक 4 (14.118.4)
अशीत्यर्धं शिरसि च ग्रीवायां दश एव च । बाह्वोश्चापि शतं दद्यादङ्गुलीषु पुनर्दश ॥
aśītyardhaṃ śirasi ca grīvāyāṃ daśa eva ca | bāhvoścāpi śataṃ dadyādaṅgulīṣu punardaśa
सिर में चालीस (अस्सी का आधा), गर्दन में दस, दोनों भुजाओं में सौ और अँगुलियों में फिर दस रखे।
श्लोक 5 (14.118.5)
उरसि त्रिंशतं दद्याज्जठरे वाऽपि विंशतिम् । वृषणे द्वादशार्धं तु शिश्ने चाष्टार्धमेव च ॥
urasi triṃśataṃ dadyājjaṭhare vā'pi viṃśatim | vṛṣaṇe dvādaśārdhaṃ tu śiśne cāṣṭārdhameva ca
छाती में तीस, पेट में बीस, अण्डकोश में छह (बारह का आधा) और लिंग में चार (आठ का आधा) रखे।
श्लोक 6 (14.118.6)
दद्यात्तु शतमूर्वोस्तु षष्ट्यर्थं जानुजङ्घयोः । दश दद्याच्चरणयोरेषा प्रेतस्य निष्कृतिः ॥
dadyāttu śatamūrvostu ṣaṣṭyarthaṃ jānujaṅghayoḥ | daśa dadyāccaraṇayoreṣā pretasya niṣkṛtiḥ
जाँघों में सौ, घुटनों और पिंडलियों में तीस (साठ का आधा) और पैरों में दस रखे। यही मृत व्यक्ति का प्रायश्चित्त-विधान है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 7 (14.118.7)
विशेषतीर्थं सर्वेषामशक्तानामनुग्रहात् । भक्तानां तारणार्थं तु वक्तुमर्हसि धर्मतः ॥
viśeṣatīrthaṃ sarveṣāmaśaktānāmanugrahāt | bhaktānāṃ tāraṇārthaṃ tu vaktumarhasi dharmataḥ
जो भक्त असमर्थ हैं, उनकी कृपापूर्वक रक्षा के लिए और उन्हें तारने के लिए आप धर्मानुसार कोई विशेष तीर्थ बताइए।
भगवानुवाच
श्लोक 8 (14.118.8)
पावनं सर्वतीर्थानां सत्यं गायन्ति सामगाः । सत्यस्य वचनं तीर्थमहिंसा तीर्थमुच्यते ॥
pāvanaṃ sarvatīrthānāṃ satyaṃ gāyanti sāmagāḥ | satyasya vacanaṃ tīrthamahiṃsā tīrthamucyate
सामगान करने वाले कहते हैं कि सत्य सब तीर्थों को पवित्र करने वाला है। सत्य वचन तीर्थ है; अहिंसा को तीर्थ कहा जाता है।
श्लोक 9 (14.118.9)
तपस्तीर्थं दया तीर्थं शीलं तीर्थं युधिष्ठिर । अल्पसंतोषकं तीर्थं नारी तीर्थं पतिव्रता ॥
tapastīrthaṃ dayā tīrthaṃ śīlaṃ tīrthaṃ yudhiṣṭhira | alpasaṃtoṣakaṃ tīrthaṃ nārī tīrthaṃ pativratā
हे युधिष्ठिर, तप तीर्थ है, दया तीर्थ है, शील तीर्थ है; थोड़े में सन्तोष तीर्थ है और पतिव्रता नारी तीर्थ है।
श्लोक 10 (14.118.10)
संतुष्टो ब्राह्मणस्तीर्थं ज्ञानं वा तीर्थमुच्यते । मद्भक्तः सततं तीर्थं शङ्करस्य विशेषतः ॥
saṃtuṣṭo brāhmaṇastīrthaṃ jñānaṃ vā tīrthamucyate | madbhaktaḥ satataṃ tīrthaṃ śaṅkarasya viśeṣataḥ
सन्तुष्ट ब्राह्मण तीर्थ है, अथवा ज्ञान को तीर्थ कहा जाता है; मेरा भक्त सदा तीर्थ है, और विशेषतः शंकर का भक्त।
श्लोक 11 (14.118.11)
यतयस्तीर्थमित्येवं विद्वांसस्तीर्थमुच्यते । शरण्यपुरुषस्तीर्थमभयं तीर्थमुच्यते ॥
yatayastīrthamityevaṃ vidvāṃsastīrthamucyate | śaraṇyapuruṣastīrthamabhayaṃ tīrthamucyate
यति तीर्थ हैं — ऐसा कहा जाता है; विद्वान् तीर्थ कहे जाते हैं। शरण देने वाला पुरुष तीर्थ है; अभय को तीर्थ कहा जाता है।
श्लोक 12 (14.118.12)
त्रैलोक्येऽस्मिन्निरुद्विग्नो न बिभेमि कुतश्चन । न दिवा यदि वा रात्रावुद्वेगः शूद्रलङ्घनात् ॥
trailokye'sminnirudvigno na bibhemi kutaścana | na divā yadi vā rātrāvudvegaḥ śūdralaṅghanāt
इन तीनों लोकों में मैं उद्वेगरहित हूँ और किसी से नहीं डरता; फिर भी दिन हो या रात, शूद्र के उल्लंघन से मुझे उद्वेग होता है।
श्लोक 13 (14.118.13)
न भयं देवदैत्येभ्यो रक्षोभ्यश्चैव मे नृप । शूद्रवक्त्राच्च्युतं ब्रह्म भयं तु मम सर्वदा ॥
na bhayaṃ devadaityebhyo rakṣobhyaścaiva me nṛpa | śūdravaktrāccyutaṃ brahma bhayaṃ tu mama sarvadā
हे राजन्, देवताओं, दैत्यों और राक्षसों से मुझे भय नहीं है; किन्तु शूद्र के मुख से निकले हुए ब्रह्म (वेदवचन) से मुझे सदा भय रहता है।
श्लोक 14 (14.118.14)
तस्मात्सप्रणवं शूद्रो मन्नामापि न कीर्तयेत् । प्रणवं हि परं लोके ब्रह्म ब्रह्मविदो विदुः ॥
tasmātsapraṇavaṃ śūdro mannāmāpi na kīrtayet | praṇavaṃ hi paraṃ loke brahma brahmavido viduḥ
इसलिए शूद्र को प्रणव के साथ मेरा नाम भी नहीं लेना चाहिए। ब्रह्मवेत्ता लोक में प्रणव को ही परब्रह्म जानते हैं।
श्लोक 15 (14.118.15)
द्विजशुश्रूषणं धर्मः शूद्राणां भक्तितो मयि । तेन गच्छन्ति ते स्वर्गं चिन्तयन्तो हि मां सदा ॥
dvijaśuśrūṣaṇaṃ dharmaḥ śūdrāṇāṃ bhaktito mayi | tena gacchanti te svargaṃ cintayanto hi māṃ sadā
शूद्रों का धर्म मुझमें भक्ति रखकर द्विजों की सेवा करना है; उसी से वे सदा मेरा चिन्तन करते हुए स्वर्ग को जाते हैं।
श्लोक 16 (14.118.16)
द्विजशुश्रूषया शूद्रः परं श्रेयोऽधिगच्छति । द्विजशुश्रूषणादन्यन्नास्ति शूद्रस्य निष्कृतिः ॥
dvijaśuśrūṣayā śūdraḥ paraṃ śreyo'dhigacchati | dvijaśuśrūṣaṇādanyannāsti śūdrasya niṣkṛtiḥ
द्विजों की सेवा से शूद्र परम कल्याण को प्राप्त होता है; द्विजसेवा के अतिरिक्त शूद्र के लिए कोई निस्तार नहीं है।
श्लोक 17 (14.118.17)
रागो द्वेषश्च मोहश्च पारुष्यं च नृशंसता । शाठ्यं च दीर्घवैरित्वमतिमानमनार्जवम् ॥
rāgo dveṣaśca mohaśca pāruṣyaṃ ca nṛśaṃsatā | śāṭhyaṃ ca dīrghavairitvamatimānamanārjavam
राग, द्वेष और मोह, कठोरता और क्रूरता, शठता, लम्बे समय तक वैर रखना, अत्यधिक अभिमान और कुटिलता,
श्लोक 18 (14.118.18)
अनृतं चापवादं च पैशुन्यमतिलोभता । हिंसा स्तेयो मृषावादो वञ्चना रोषलोभता ॥
anṛtaṃ cāpavādaṃ ca paiśunyamatilobhatā | hiṃsā steyo mṛṣāvādo vañcanā roṣalobhatā
असत्य, निन्दा, चुगली, अत्यधिक लोभ, हिंसा, चोरी, मिथ्या भाषण, छल, क्रोध और लालच,
श्लोक 19 (14.118.19)
अबुद्धिता च नास्तिक्यं भयमालस्यमेव च । अशौचं चाकृतज्ञत्वं डंभता स्तंभ एव च । निकृतिश्चाप्यविज्ञानं जातके शूद्रमाविशेत् ॥
abuddhitā ca nāstikyaṃ bhayamālasyameva ca | aśaucaṃ cākṛtajñatvaṃ ḍaṃbhatā staṃbha eva ca | nikṛtiścāpyavijñānaṃ jātake śūdramāviśet
बुद्धिहीनता, नास्तिकता, भय और आलस्य, अपवित्रता, कृतघ्नता, दम्भ, जड़ता, धोखा और अज्ञान — ये दोष जन्म के समय शूद्र में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 20 (14.118.20)
सृष्ट्वा पितामहः शूद्रमभिभूतं तु तामसैः । द्विजशुश्रूषणं धर्मं शूद्राणां तु प्रयुक्तवान् । नश्यन्ति तामसा भावाः शूद्रस्य द्विजभक्तितः ॥
sṛṣṭvā pitāmahaḥ śūdramabhibhūtaṃ tu tāmasaiḥ | dvijaśuśrūṣaṇaṃ dharmaṃ śūdrāṇāṃ tu prayuktavān | naśyanti tāmasā bhāvāḥ śūdrasya dvijabhaktitaḥ
तमोगुण से दबे हुए शूद्र की सृष्टि करके पितामह ने शूद्रों के लिए द्विजसेवा का धर्म नियत किया। द्विजों की भक्ति से शूद्र के तामसिक भाव नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 21 (14.118.21)
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतं मूर्ध्ना गृह्णामि शूद्रतः ॥
patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ yo me bhaktyā prayacchati | tadahaṃ bhaktyupahṛtaṃ mūrdhnā gṛhṇāmi śūdrataḥ
जो मनुष्य मुझे भक्ति से पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, भक्ति से लाए हुए उस उपहार को मैं शूद्र से भी सिर पर ग्रहण करता हूँ।
श्लोक 22 (14.118.22)
अग्रजो वाऽपि यः कश्चित्सर्वपापसमन्वितः । यदि मां सततं ध्यायेत्सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
agrajo vā'pi yaḥ kaścitsarvapāpasamanvitaḥ | yadi māṃ satataṃ dhyāyetsarvapāpaiḥ pramucyate
पहले जन्मा हुआ (अग्रज) कोई भी, यदि वह सब पापों से युक्त हो और निरन्तर मेरा ध्यान करे, तो सब पापों से छूट जाता है।
श्लोक 23 (14.118.23)
विद्याविनयसंपन्ना ब्राह्मणा वेदपारगाः । मयि भक्ति न कुर्वन्ति चण्डालसदृशा हि ते ॥
vidyāvinayasaṃpannā brāhmaṇā vedapāragāḥ | mayi bhakti na kurvanti caṇḍālasadṛśā hi te
विद्या और विनय से सम्पन्न, वेदों के पारगामी ब्राह्मण भी यदि मुझमें भक्ति नहीं करते, तो वे चाण्डाल के समान ही हैं।
श्लोक 24 (14.118.24)
वृथा दानं वृथा तप्तं वृथा चेष्टं वृथा हुतम् । वृथाऽऽतिथ्यं च तत्तस्य यो न भक्तो मम द्विजः ॥
vṛthā dānaṃ vṛthā taptaṃ vṛthā ceṣṭaṃ vṛthā hutam | vṛthā''tithyaṃ ca tattasya yo na bhakto mama dvijaḥ
जो ब्राह्मण मेरा भक्त नहीं है, उसका दान व्यर्थ है, तप व्यर्थ है, कर्म व्यर्थ है, हवन व्यर्थ है और अतिथि-सत्कार भी व्यर्थ है।
श्लोक 25 (14.118.25)
यत्कृतं च हुतं चापि यदिष्टं दत्तमेव च । अभक्तिमत्कृतं सर्वं राक्षसा एव भुञ्जते ॥
yatkṛtaṃ ca hutaṃ cāpi yadiṣṭaṃ dattameva ca | abhaktimatkṛtaṃ sarvaṃ rākṣasā eva bhuñjate
जो कुछ भक्तिरहित होकर किया, हवन किया, यज्ञ किया या दान दिया जाता है, उस सबको राक्षस ही खा जाते हैं।
श्लोक 26 (14.118.26)
स्थावरे जङ्गमे वाऽपि सर्वभूतेषु पाण्डव । समत्वेन यदा कुर्यान्मद्भक्तो मित्रशत्रुषु ॥
sthāvare jaṅgame vā'pi sarvabhūteṣu pāṇḍava | samatvena yadā kuryānmadbhakto mitraśatruṣu
हे पाण्डव, जब मेरा भक्त स्थावर और जंगम सब प्राणियों के प्रति, मित्र और शत्रुओं के प्रति समभाव रखता है,
श्लोक 27 (14.118.27)
आनृशंस्यमहिंसा च यथा सत्यं तथाऽऽर्जवम् । अद्रोहश्चैव भूतानां मद्गतानां व्रतं नृप ॥
ānṛśaṃsyamahiṃsā ca yathā satyaṃ tathā''rjavam | adrohaścaiva bhūtānāṃ madgatānāṃ vrataṃ nṛpa
तो दया, अहिंसा, सत्य, सरलता और प्राणियों से द्रोह न करना — हे राजन्, यही मुझमें स्थित जनों का व्रत है।
श्लोक 28 (14.118.28)
नम इत्येव यो ब्रूयान्मद्भक्तं श्रद्धयाऽन्वितः । तस्याक्षयाऽभवँल्लोकाः श्वपाकस्यापि पार्थिव ॥
nama ityeva yo brūyānmadbhaktaṃ śraddhayā'nvitaḥ | tasyākṣayā'bhavam̐llokāḥ śvapākasyāpi pārthiva
हे राजन्, जो श्रद्धापूर्वक मेरे भक्त को 'नमः' कह देता है, वह श्वपाक भी हो तो उसके लोक अक्षय हो जाते हैं।
श्लोक 29 (14.118.29)
किं पुनर्ये यजन्ते मां सदारं विधिपूर्वकम् । मद्भक्ता मद्गतप्राणाः कथयन्तश्च मां सदा ॥
kiṃ punarye yajante māṃ sadāraṃ vidhipūrvakam | madbhaktā madgataprāṇāḥ kathayantaśca māṃ sadā
फिर उनका तो कहना ही क्या, जो अपनी पत्नी सहित विधिपूर्वक मेरा यजन करते हैं, जो मेरे भक्त हैं, मुझमें प्राण लगाए हुए हैं और सदा मेरी ही चर्चा करते हैं?
श्लोक 30 (14.118.30)
बहुवर्षसहस्राणि तपस्तप्यति यो नरः । नासौ पदमवाप्नोति मद्भक्तैर्यदवाप्यते ॥
bahuvarṣasahasrāṇi tapastapyati yo naraḥ | nāsau padamavāpnoti madbhaktairyadavāpyate
जो मनुष्य अनेक सहस्र वर्षों तक तप करता है, वह उस पद को नहीं पाता जो मेरे भक्तों को मिलता है।
श्लोक 31 (14.118.31)
मामेव तस्माद्राजेन्द्र ध्यायन्नित्यमतन्द्रितः । अवाप्स्यति ततः सिद्धिं द्रक्ष्यत्येव परं पदम् ॥
māmeva tasmādrājendra dhyāyannityamatandritaḥ | avāpsyati tataḥ siddhiṃ drakṣyatyeva paraṃ padam
इसलिए, हे राजेन्द्र, तुम आलस्यरहित होकर नित्य मेरा ही ध्यान करते रहो; तब तुम सिद्धि पाओगे और परम पद को देखोगे।
श्लोक 32 (14.118.32)
अपार्थकं प्रभाषन्तः शूद्रा भागवता इति । न शूद्रा भगवद्भक्ता विप्रा भागवताः स्मृताः ॥
apārthakaṃ prabhāṣantaḥ śūdrā bhāgavatā iti | na śūdrā bhagavadbhaktā viprā bhāgavatāḥ smṛtāḥ
जो शूद्र व्यर्थ बकते हुए कहते हैं कि 'हम भागवत हैं', वे भगवान् के भक्त नहीं हैं; भागवत ब्राह्मण ही माने गए हैं।
श्लोक 33 (14.118.33)
द्वादशाक्षरतत्वज्ञश्चतुर्व्यूहविभागवित् । अच्छिद्रपञ्चकालज्ञः स वै भागवतः स्मृतः ॥
dvādaśākṣaratatvajñaścaturvyūhavibhāgavit | acchidrapañcakālajñaḥ sa vai bhāgavataḥ smṛtaḥ
जो द्वादशाक्षर मन्त्र का तत्त्व जानता है, चतुर्व्यूह के विभाग को जानता है, निर्दोष है और पाँचों कालों को जानता है — वही भागवत माना गया है।
श्लोक 34 (14.118.34)
ऋग्वेदेनैव होता च यजुषाऽध्वर्युरेव च । सामवेदेन चोद्गाता पुण्येनाभिष्टुवन्ति माम् ॥
ṛgvedenaiva hotā ca yajuṣā'dhvaryureva ca | sāmavedena codgātā puṇyenābhiṣṭuvanti mām
होता ऋग्वेद से, अध्वर्यु यजुर्वेद से और उद्गाता सामवेद से पवित्र मन्त्रों द्वारा मेरी स्तुति करते हैं।
श्लोक 35 (14.118.35)
अथर्वशिरसा चैव नित्यमाथर्वाणा द्विजाः । स्तुवन्ति सततं ये मां ते वै भागवताः स्मृताः ॥
atharvaśirasā caiva nityamātharvāṇā dvijāḥ | stuvanti satataṃ ye māṃ te vai bhāgavatāḥ smṛtāḥ
और जो अथर्ववेदी द्विज अथर्वशिरस् से नित्य मेरी स्तुति करते हैं, वे भी भागवत माने गए हैं।
श्लोक 36 (14.118.36)
वेदाधीनाः सदा यज्ञा यज्ञाधीनास्तु देवताः । देवता ब्राह्मणाधीनास्तस्माद्विप्रास्तु देवताः ॥
vedādhīnāḥ sadā yajñā yajñādhīnāstu devatāḥ | devatā brāhmaṇādhīnāstasmādviprāstu devatāḥ
यज्ञ सदा वेदों के अधीन हैं, देवता यज्ञों के अधीन हैं और देवता ब्राह्मणों के अधीन हैं; इसलिए ब्राह्मण ही देवता हैं।
श्लोक 37 (14.118.37)
अनाश्रित्योच्छ्रयं नास्ति मुख्यमाश्रयमाश्रयेत् । रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ॥
anāśrityocchrayaṃ nāsti mukhyamāśrayamāśrayet | rudraṃ samāśritā devā rudro brahmāṇamāśritaḥ
आश्रय के बिना उन्नति नहीं होती, इसलिए प्रधान आश्रय का सहारा लेना चाहिए। देवता रुद्र के आश्रित हैं, रुद्र ब्रह्मा के आश्रित हैं।
श्लोक 38 (14.118.38)
ब्रह्मा मामाश्रितो राजन्नाहं कंचिदुपाश्रितः । ममाश्रयो न कश्चित्तु सर्वेषामाश्रयो ह्यहम् ॥
brahmā māmāśrito rājannāhaṃ kaṃcidupāśritaḥ | mamāśrayo na kaścittu sarveṣāmāśrayo hyaham
हे राजन्, ब्रह्मा मेरे आश्रित हैं; मैं किसी के आश्रित नहीं हूँ। मेरा कोई आश्रय नहीं, किन्तु मैं सबका आश्रय हूँ।
श्लोक 39 (14.118.39)
एवमेतन्मया प्रोक्तं रहस्यमिदमुत्तमम् । धर्मप्रियस्य ते नित्यं राजन्नेवं समाचर ॥
evametanmayā proktaṃ rahasyamidamuttamam | dharmapriyasya te nityaṃ rājannevaṃ samācara
इस प्रकार मैंने तुम्हें यह परम रहस्य बताया। हे राजन्, तुम धर्मप्रिय हो, इसलिए सदा इसी के अनुसार आचरण करो।
श्लोक 40 (14.118.40)
इदं पवित्रमाख्यानं पुण्यं वेदेन संमितम् । यः पठेन्मामकं धर्ममहन्यहनि पाण्डव ॥
idaṃ pavitramākhyānaṃ puṇyaṃ vedena saṃmitam | yaḥ paṭhenmāmakaṃ dharmamahanyahani pāṇḍava
यह पवित्र आख्यान पुण्यदायक है और वेद के समान है; हे पाण्डव, जो प्रतिदिन मेरे इस धर्म का पाठ करता है,
श्लोक 41 (14.118.41)
धर्मो विवर्धते तस्य बुद्धिश्चापि प्रसीदति । पापक्षयमुपेत्यैवं कल्याणं च विवर्धते ॥
dharmo vivardhate tasya buddhiścāpi prasīdati | pāpakṣayamupetyaivaṃ kalyāṇaṃ ca vivardhate
उसका धर्म बढ़ता है, उसकी बुद्धि प्रसन्न होती है, पाप नष्ट हो जाते हैं और कल्याण बढ़ता है।
श्लोक 42 (14.118.42)
एतत्पुण्यं पवित्रं च पापनाशनमुत्तमम् । श्रोतव्यं श्रद्धया युक्तैः श्रोत्रियैश्च विशेषतः ॥
etatpuṇyaṃ pavitraṃ ca pāpanāśanamuttamam | śrotavyaṃ śraddhayā yuktaiḥ śrotriyaiśca viśeṣataḥ
यह पुण्यदायक, पवित्र और पापों का सर्वोत्तम नाशक है; श्रद्धायुक्त जनों को, और विशेषतः श्रोत्रियों को इसे सुनना चाहिए।
श्लोक 43 (14.118.43)
श्रावयेद्यस्त्विदं भक्त्या प्रयतोथ शृणोति वा । स गच्छेन्मम सायुज्यं नात्र कार्या विचारणा ॥
śrāvayedyastvidaṃ bhaktyā prayatotha śṛṇoti vā | sa gacchenmama sāyujyaṃ nātra kāryā vicāraṇā
जो भक्ति से इसे सुनाता है, अथवा संयमपूर्वक सुनता है, वह मेरे सायुज्य को प्राप्त होता है; इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।
श्लोक 44 (14.118.44)
यश्चेमं श्रावयेच्छ्राद्धे मद्भक्तो मत्परायणः । पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदाभूतसंप्लवम् ॥
yaścemaṃ śrāvayecchrāddhe madbhakto matparāyaṇaḥ | pitarastasya tṛpyanti yāvadābhūtasaṃplavam
जो मेरा भक्त, मुझमें परायण होकर, श्राद्ध में इसे सुनाता है, उसके पितर प्रलयकाल तक तृप्त रहते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 45 (14.118.45)
श्रुत्वा भागवतान्धर्मान्साक्षाद्विष्णोर्जगद्गुरोः । प्रहृष्टमनसो भूत्वा चिन्तयन्तोद्भुताः कथाः ॥
śrutvā bhāgavatāndharmānsākṣādviṣṇorjagadguroḥ | prahṛṣṭamanaso bhūtvā cintayantodbhutāḥ kathāḥ
जगद्गुरु विष्णु से साक्षात् भागवत धर्म सुनकर वे सब प्रसन्नचित्त हुए और उन अद्भुत कथाओं का चिन्तन करने लगे।
श्लोक 46 (14.118.46)
ऋषयः पाण्डवाश्चैव प्रणेमुस्तं जनार्दनम् । पूजयामास गोविन्दं धर्मपुत्रः पुनः पुनः ॥
ṛṣayaḥ pāṇḍavāścaiva praṇemustaṃ janārdanam | pūjayāmāsa govindaṃ dharmaputraḥ punaḥ punaḥ
ऋषियों और पाण्डवों ने जनार्दन को प्रणाम किया, और धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने गोविन्द की बार-बार पूजा की।
श्लोक 47 (14.118.47)
देवा ब्रह्मर्षयः सिद्धा गन्धर्वाप्सरसस्तथा । ऋषयश्च महात्मानो गुह्यका भुजगास्तथा ॥
devā brahmarṣayaḥ siddhā gandharvāpsarasastathā | ṛṣayaśca mahātmāno guhyakā bhujagāstathā
देवता, ब्रह्मर्षि, सिद्ध, गन्धर्व और अप्सराएँ, तथा महात्मा ऋषि, गुह्यक और नाग भी,
श्लोक 48 (14.118.48)
वालखिल्या महात्मानो योगिनस्तत्वदर्शिनः । तथा भागवताश्चापि पञ्चकालमुपासकाः ॥
vālakhilyā mahātmāno yoginastatvadarśinaḥ | tathā bhāgavatāścāpi pañcakālamupāsakāḥ
महात्मा वालखिल्य, तत्त्व को देखने वाले योगी, और पाँचों कालों में उपासना करने वाले भागवत भी,
श्लोक 49 (14.118.49)
कौतूहलसमायुक्ता भगवद्भक्तिमागताः । श्रुत्वा तु परमं पुण्यं वैष्णवं धर्मशासनम् ॥
kautūhalasamāyuktā bhagavadbhaktimāgatāḥ | śrutvā tu paramaṃ puṇyaṃ vaiṣṇavaṃ dharmaśāsanam
उत्सुकता से भरे हुए भगवान् की भक्ति को प्राप्त हुए, उस परम पवित्र वैष्णव धर्मोपदेश को सुनकर।
श्लोक 50 (14.118.50)
विमुक्तपापाः पूतास्ते संवृत्तास्तत्क्षणेन तु । प्रणम्य शिरसा विष्णुं प्रतिनन्द्य च ताः कथाः ॥
vimuktapāpāḥ pūtāste saṃvṛttāstatkṣaṇena tu | praṇamya śirasā viṣṇuṃ pratinandya ca tāḥ kathāḥ
वे उसी क्षण पापरहित और पवित्र हो गए। सिर झुकाकर विष्णु को प्रणाम करके और उन कथाओं का अभिनन्दन करके,
श्लोक 51 (14.118.51)
द्रष्टारो द्वारकायां वै वयं सर्वे जगद्गुरुम् । इति प्रहृष्टमनसो ययुर्देवगणैः सह । सर्वे ऋषिगणा राजन्ययुः स्वंस्वं निवेशनम् ॥
draṣṭāro dvārakāyāṃ vai vayaṃ sarve jagadgurum | iti prahṛṣṭamanaso yayurdevagaṇaiḥ saha | sarve ṛṣigaṇā rājanyayuḥ svaṃsvaṃ niveśanam
'हम सब द्वारका में जगद्गुरु के दर्शन करेंगे' — ऐसा कहकर वे प्रसन्न मन से देवगणों के साथ चले गए; हे राजन्, सब ऋषिगण अपने-अपने निवास को गए।
श्लोक 52 (14.118.52)
गतेषु तेषु सर्वेषु केशवः केशिहा हरिः । सस्मार दारुकं राजन्स च सात्यकिना सह । समीपस्थोऽभवत्सूतो याहि देवेति चाब्रवीत् ॥
gateṣu teṣu sarveṣu keśavaḥ keśihā hariḥ | sasmāra dārukaṃ rājansa ca sātyakinā saha | samīpastho'bhavatsūto yāhi deveti cābravīt
उन सबके चले जाने पर, हे राजन्, केशिहन्ता केशव हरि ने सात्यकि के साथ दारुक का स्मरण किया। सारथि समीप आकर खड़ा हुआ और बोला, 'हे देव, चलिए।'
श्लोक 53 (14.118.53)
ततो विषण्णवदनाः पाण्डवाः पुरुषोत्तमम् । अञ्जलिं मूर्ध्नि संधाय नेत्रैरश्रुपरिप्लुतैः । पिबन्तः सततं कृष्णं नोचुरार्ततरास्तदा ॥
tato viṣaṇṇavadanāḥ pāṇḍavāḥ puruṣottamam | añjaliṃ mūrdhni saṃdhāya netrairaśrupariplutaiḥ | pibantaḥ satataṃ kṛṣṇaṃ nocurārtatarāstadā
तब उदास मुख वाले पाण्डव हाथ जोड़कर मस्तक से लगाए, आँसुओं से भरी आँखों से पुरुषोत्तम कृष्ण को निरन्तर निहारते हुए, पहले से भी अधिक व्यथित होकर कुछ न बोले।
श्लोक 54 (14.118.54)
कृष्णोपि भगवान्देवः पृथामामन्त्र्य चार्तवत् । धृतराष्ट्रं च गान्धारीं विदुरं द्रौपदीं तथा ॥
kṛṣṇopi bhagavāndevaḥ pṛthāmāmantrya cārtavat | dhṛtarāṣṭraṃ ca gāndhārīṃ viduraṃ draupadīṃ tathā
भगवान् देव कृष्ण ने भी मानो दुःखी होकर पृथा, धृतराष्ट्र, गान्धारी, विदुर और द्रौपदी से विदा ली,
श्लोक 55 (14.118.55)
कृष्णद्वैपायनं व्यासमृषीनन्यांश्च मन्त्रिणः । सुभद्रामात्मजयुतामुत्तरां स्पृश्य पाणिना । निर्गत्य वेश्मनस्तस्मादारुरोह तदा रथम् ॥
kṛṣṇadvaipāyanaṃ vyāsamṛṣīnanyāṃśca mantriṇaḥ | subhadrāmātmajayutāmuttarāṃ spṛśya pāṇinā | nirgatya veśmanastasmādāruroha tadā ratham
कृष्ण द्वैपायन व्यास, अन्य ऋषियों और मन्त्रियों से भी; सुभद्रा और पुत्र सहित उत्तरा को हाथ से स्पर्श किया, और उस भवन से निकलकर तब रथ पर चढ़े,
श्लोक 56 (14.118.56)
वाजिभिः शैव्यसुग्रीवमेघपुष्पबलाहकैः । युक्तं तु ध्वजभूतेन पतगेन्द्रेण धीमता ॥
vājibhiḥ śaivyasugrīvameghapuṣpabalāhakaiḥ | yuktaṃ tu dhvajabhūtena patagendreṇa dhīmatā
जिसमें शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामक घोड़े जुते थे और जिसकी ध्वजा के रूप में बुद्धिमान् पक्षिराज गरुड़ विराजमान थे।
श्लोक 57 (14.118.57)
अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः । अपास्य चाशु यन्तारं दारुकं सूतसत्तमम् । अभीशून्प्रतिजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा ॥
anvāruroha cāpyenaṃ premṇā rājā yudhiṣṭhiraḥ | apāsya cāśu yantāraṃ dārukaṃ sūtasattamam | abhīśūnpratijagrāha svayaṃ kurupatistadā
प्रेम से राजा युधिष्ठिर भी उनके पीछे रथ पर चढ़े; उन्होंने सूतश्रेष्ठ सारथि दारुक को शीघ्र हटाकर कुरुपति ने स्वयं लगामें सँभाल लीं।
श्लोक 58 (14.118.58)
उपारुह्यार्जुनश्चापि चामरव्यजनं शुभम् । रुक्मदण्डं बृहन्मूर्ध्नि दुधावाभिप्रदक्षिणम् ॥
upāruhyārjunaścāpi cāmaravyajanaṃ śubham | rukmadaṇḍaṃ bṛhanmūrdhni dudhāvābhipradakṣiṇam
अर्जुन ने भी चढ़कर सोने की डण्डी वाला सुन्दर चँवर उनके सिर के ऊपर प्रदक्षिणा-क्रम में डुलाया।
श्लोक 59 (14.118.59)
तथैव भीमसेनोपि रथमारुह्य वीर्यवान् । छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम् ॥
tathaiva bhīmasenopi rathamāruhya vīryavān | chatraṃ śataśalākaṃ ca divyamālyopaśobhitam
इसी प्रकार पराक्रमी भीमसेन ने भी रथ पर चढ़कर दिव्य मालाओं से सुशोभित सौ शलाकाओं वाला छत्र पकड़ा,
श्लोक 60 (14.118.60)
वैडूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम् । दधार तरसा भीमश्छत्रं तच्छार्ङ्गधन्वनः ॥
vaiḍūryamaṇidaṇḍaṃ ca cāmīkaravibhūṣitam | dadhāra tarasā bhīmaśchatraṃ tacchārṅgadhanvanaḥ
जिसकी डण्डी वैदूर्य मणि की थी और जो स्वर्ण से सजा था — भीम ने शार्ङ्गधनुषधारी के ऊपर वह छत्र शीघ्रता से तान दिया।
श्लोक 61 (14.118.61)
उपारुह्य रथं शीघ्रं चामरव्यजने सिते । नकुलः सहदेवश्च धूयमानौ जनार्दनम् ॥
upāruhya rathaṃ śīghraṃ cāmaravyajane site | nakulaḥ sahadevaśca dhūyamānau janārdanam
नकुल और सहदेव ने शीघ्र रथ पर चढ़कर जनार्दन के ऊपर दो श्वेत चँवर डुलाए।
श्लोक 62 (14.118.62)
भीमसेनोऽर्जुनश्चैव यमावप्यरिसूदनौ । पृष्ठतोऽनुययुः कृष्णं माशब्द इति हर्षिताः ॥
bhīmaseno'rjunaścaiva yamāvapyarisūdanau | pṛṣṭhato'nuyayuḥ kṛṣṇaṃ māśabda iti harṣitāḥ
भीमसेन, अर्जुन और शत्रुओं का संहार करने वाले दोनों जुड़वाँ भाई हर्षित होकर 'शब्द मत करो' कहते हुए कृष्ण के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 63 (14.118.63)
त्रियोजने व्यतीते तु परिष्वज्य च पाण्डवान् । विसृज्य कृष्णस्तान्सर्वान्प्रणतान्द्वारका ययौ ॥
triyojane vyatīte tu pariṣvajya ca pāṇḍavān | visṛjya kṛṣṇastānsarvānpraṇatāndvārakā yayau
तीन योजन चल लेने पर कृष्ण ने पाण्डवों को गले लगाया और प्रणाम करते हुए उन सबको विदा करके द्वारका चले गए।
श्लोक 64 (14.118.64)
तथा प्रणम्य गोविन्दं तदाप्रभृति पाण्डवाः । कपिलाद्यानि दानानि ददुर्धर्मपरायणाः ॥
tathā praṇamya govindaṃ tadāprabhṛti pāṇḍavāḥ | kapilādyāni dānāni dadurdharmaparāyaṇāḥ
उसी समय से गोविन्द को प्रणाम करके धर्मपरायण पाण्डवों ने कपिला गौ आदि के दान देने आरम्भ किए।
श्लोक 65 (14.118.65)
मधुसूदनवाक्यानि स्मृत्वास्मृत्वा पुनःपुनः । मनसा पूजयामासुर्हदयस्थानि पाण्डवाः ॥
madhusūdanavākyāni smṛtvāsmṛtvā punaḥpunaḥ | manasā pūjayāmāsurhadayasthāni pāṇḍavāḥ
मधुसूदन के वचनों का बार-बार स्मरण करके पाण्डव अपने हृदय में स्थित उन वचनों की मन से पूजा करते रहे।
श्लोक 66 (14.118.66)
युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा हृदि कृत्वा जनार्दनम् । तद्भक्तस्तन्मना युक्तस्तद्याजी तत्परोऽभवत् ॥
yudhiṣṭhirastu dharmātmā hṛdi kṛtvā janārdanam | tadbhaktastanmanā yuktastadyājī tatparo'bhavat
और धर्मात्मा युधिष्ठिर जनार्दन को हृदय में बसाकर उनके भक्त हुए, उनमें मन लगाए हुए, उन्हीं का यजन करने वाले और उन्हीं के परायण हो गए।
श्लोक 67 (14.118.67)
एवमुक्तं पुरावृत्तं वैष्णवं धर्मशासनम् । मया ते कथितं राजन्पवित्रं पापनाशनम् ॥
evamuktaṃ purāvṛttaṃ vaiṣṇavaṃ dharmaśāsanam | mayā te kathitaṃ rājanpavitraṃ pāpanāśanam
हे राजन्, इस प्रकार मैंने तुम्हें यह पुरातन वैष्णव धर्मोपदेश सुनाया, जो पवित्र और पापनाशक है।
श्लोक 68 (14.118.68)
तच्छृणुष्व महाराज विष्णुप्रोक्तं कुरूद्वह । तेन गच्छसि नान्येन तद्विष्णोः परमं पदम् ॥
tacchṛṇuṣva mahārāja viṣṇuproktaṃ kurūdvaha | tena gacchasi nānyena tadviṣṇoḥ paramaṃ padam
हे महाराज, कुरुवंश के वीर, विष्णु द्वारा कहे हुए इस उपदेश को सुनो; इसी से, और किसी अन्य से नहीं, तुम विष्णु के उस परम पद को जाओगे।