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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 46

ब्रह्मा द्वारा ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी के धर्म का उपदेश

ब्रह्मा पहले ब्रह्मचारी के नियम बताते हैं, फिर वानप्रस्थ के। इसके बाद वे मोक्ष चाहने वाले परिव्राजक संन्यासी का मार्ग समझाते हैं: बिना लालसा के भिक्षा से निर्वाह, कोई संचय नहीं, किसी प्राणी को पीड़ा नहीं, और अपने धर्म को सीधे-सादे आचरण की आड़ में छिपाए रखना। अन्त में वे बताते हैं कि जो इन्द्रियों, महाभूतों, मन, बुद्धि, अहंकार और अव्यक्त की गणना करके एकान्त में ध्यान करता है, वह मुक्त हो जाता है।

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

ब्रह्मोवाच

श्लोक 1 (14.46.1)

एवमेतेन मार्गेण पूर्वोक्तेन यथाविधि । अधीतवान्यथाशक्ति तथैव ब्रह्मचर्यवान् ॥

evametena mārgeṇa pūrvoktena yathāvidhi | adhītavānyathāśakti tathaiva brahmacaryavān

इसी प्रकार, पहले बताए हुए मार्ग से और विधि के अनुसार, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला विद्यार्थी अपनी शक्ति भर अध्ययन करे।

श्लोक 2 (14.46.2)

स्वधर्मनिरतो विद्वान्सर्वेन्द्रिययतो मुनिः । गुरोः प्रियहिते युक्तः सत्यधर्मपरः शुचिः ॥

svadharmanirato vidvānsarvendriyayato muniḥ | guroḥ priyahite yuktaḥ satyadharmaparaḥ śuciḥ

वह अपने धर्म में लगा रहे, विद्वान् हो, सब इन्द्रियों को वश में रखे, मननशील हो, गुरु का प्रिय और हित करने में तत्पर रहे, सत्य और धर्म में दृढ़ तथा पवित्र हो,

श्लोक 3 (14.46.3)

गुरुणा समनुज्ञातो भुञ्जीतान्नमकुत्सयन् । हविष्यभैक्ष्यभुक् चापि स्थानासनविहारवान् ॥

guruṇā samanujñāto bhuñjītānnamakutsayan | haviṣyabhaikṣyabhuk cāpi sthānāsanavihāravān

और गुरु की आज्ञा पाकर अन्न की निन्दा किए बिना भोजन करे; वह हवि के योग्य अन्न और भिक्षा पर निर्वाह करे और स्थान, आसन तथा विहार के नियमों का पालन करे।

श्लोक 4 (14.46.4)

द्विकालमग्निं जुह्वानः शुचिर्भूत्वा समाहितः । धारयीत सदा दण्डं बैल्वं पालाशमेव वा ॥

dvikālamagniṃ juhvānaḥ śucirbhūtvā samāhitaḥ | dhārayīta sadā daṇḍaṃ bailvaṃ pālāśameva vā

वह पवित्र और एकाग्र होकर दोनों सन्ध्याओं में अग्नि में आहुति दे और सदा बेल या पलाश का दण्ड धारण करे।

श्लोक 5 (14.46.5)

क्षौमं कार्पासिकं वाऽपि मृगाजिनमथापि वा । सर्वं काषायरक्तं वा वासो वाऽपि द्विजस्य ह ॥

kṣaumaṃ kārpāsikaṃ vā'pi mṛgājinamathāpi vā | sarvaṃ kāṣāyaraktaṃ vā vāso vā'pi dvijasya ha

द्विज के वस्त्र रेशमी या सूती हों, अथवा मृगचर्म हो, या कोई भी गेरुए रंग का कपड़ा हो।

श्लोक 6 (14.46.6)

मेखला च भवेन्मौञ्जी जटी नित्योदकस्तथा । यज्ञोपवीती स्वाध्यायी अलुप्तनियतव्रतः ॥

mekhalā ca bhavenmauñjī jaṭī nityodakastathā | yajñopavītī svādhyāyī aluptaniyatavrataḥ

उसकी कमर में मूँज की मेखला हो, जटाएँ हों, वह प्रतिदिन जल से स्नान करे, यज्ञोपवीत पहने, वेदाध्ययन करे और अपने नियत व्रतों को कभी भंग न होने दे।

श्लोक 7 (14.46.7)

पूताभिश्च तथैवाद्भिः सदा दैवततर्पणम् । भावेन नियतः कुर्वन्ब्रह्मचारी प्रशस्यते ॥

pūtābhiśca tathaivādbhiḥ sadā daivatatarpaṇam | bhāvena niyataḥ kurvanbrahmacārī praśasyate

वह सदा पवित्र जल से देवताओं का तर्पण करे; इस प्रकार भक्तिपूर्वक नियम निभाने वाला ब्रह्मचारी प्रशंसा पाता है।

श्लोक 8 (14.46.8)

एवं युक्तो जयेत्स्वर्गमूर्ध्वरेताः समाहितः । न संसरति जातीषु परमं स्थानमाश्रितः ॥

evaṃ yukto jayetsvargamūrdhvaretāḥ samāhitaḥ | na saṃsarati jātīṣu paramaṃ sthānamāśritaḥ

इस प्रकार संयमी, ऊर्ध्वरेता और एकाग्र रहने वाला स्वर्ग जीत लेता है; परम स्थान का आश्रय लेकर वह फिर योनियों में नहीं भटकता।

श्लोक 9 (14.46.9)

संस्कृतः सर्वसंस्कारैस्तथैव ब्रह्मचर्यवान् । ग्रामान्निष्क्रम्य चारण्ये मुनिः प्रव्रजितो वसेत् ॥

saṃskṛtaḥ sarvasaṃskāraistathaiva brahmacaryavān | grāmānniṣkramya cāraṇye muniḥ pravrajito vaset

जो सब संस्कारों से संस्कृत हो चुका हो और ब्रह्मचर्य का पालन कर चुका हो, वह गाँव से निकलकर वन में मुनि बनकर रहे।

श्लोक 10 (14.46.10)

चर्मवल्कलसंवासी सायं प्रातरुपस्पृशेत् । अरण्यगोचरो नित्यं न ग्रामं प्रविशेत्पुनः ॥

carmavalkalasaṃvāsī sāyaṃ prātarupaspṛśet | araṇyagocaro nityaṃ na grāmaṃ praviśetpunaḥ

वह वल्कल और चर्म पहने, सायं और प्रातः स्नान करे, सदा वन में ही विचरे और फिर कभी गाँव में प्रवेश न करे।

श्लोक 11 (14.46.11)

अर्चयन्नतिथीन्काले दद्याच्चापि प्रतिश्रयम् । फलपत्रावरैर्मूलैः श्यामाकेन च वर्तयन् ॥

arcayannatithīnkāle dadyāccāpi pratiśrayam | phalapatrāvarairmūlaiḥ śyāmākena ca vartayan

वह समय पर अतिथियों का सत्कार करे और उन्हें आश्रय दे; फल, पत्ते, छोटी-छोटी जड़ों और श्यामाक (साँवा) से अपना निर्वाह करे।

श्लोक 12 (14.46.12)

स नित्यमुदकं वायुं सर्वं वानेयमाश्रयेत् । प्राश्नीयादानुपूर्व्येण यथादीक्षमतन्द्रितः ॥

sa nityamudakaṃ vāyuṃ sarvaṃ vāneyamāśrayet | prāśnīyādānupūrvyeṇa yathādīkṣamatandritaḥ

वह जल, वायु और वन की सब उपज का सदा आश्रय ले, और आलस्य छोड़कर अपनी दीक्षा के अनुसार क्रम से भोजन करे।

श्लोक 13 (14.46.13)

समूलफलशाकाद्यैरर्चेदतिथिमागतम् । यद्भक्षः स्यात्ततो दद्याद्भिक्षां नित्यमतन्द्रितः ॥

samūlaphalaśākādyairarcedatithimāgatam | yadbhakṣaḥ syāttato dadyādbhikṣāṃ nityamatandritaḥ

आए हुए अतिथि का वह मूल, फल और शाक आदि से सत्कार करे; और जो कुछ वह स्वयं खाता है, उसी में से आलस्य रहित होकर सदा भिक्षा दे।

श्लोक 14 (14.46.14)

देवतातिथिपूर्वं च सदा प्राश्नीत वाग्यतः । अस्कन्दितमनाश्चैव लघ्वाशी देवताश्रयः ॥

devatātithipūrvaṃ ca sadā prāśnīta vāgyataḥ | askanditamanāścaiva laghvāśī devatāśrayaḥ

वह देवताओं और अतिथियों को पहले देकर सदा मौन होकर भोजन करे; उसका मन अविचल रहे, वह थोड़ा खाए और देवताओं का आश्रय ले।

श्लोक 15 (14.46.15)

दान्तो मैत्रः क्षमायुक्तः केशश्मश्रु च धारयन् । जुह्वन्स्वाध्यायशीलश्च सत्यधर्मपरायणः ॥

dānto maitraḥ kṣamāyuktaḥ keśaśmaśru ca dhārayan | juhvansvādhyāyaśīlaśca satyadharmaparāyaṇaḥ

वह जितेन्द्रिय, सबका मित्र और क्षमाशील हो, केश और दाढ़ी-मूँछ बढ़ाए रखे, हवन करे, स्वाध्याय में लगा रहे और सत्य तथा धर्म में दृढ़ रहे;

श्लोक 16 (14.46.16)

न्यस्तदेहः सदा दक्षो वननित्यः समाहितः । एवं युक्तो जयेत्स्वर्गं वानप्रस्थो जितेन्द्रियः ॥

nyastadehaḥ sadā dakṣo vananityaḥ samāhitaḥ | evaṃ yukto jayetsvargaṃ vānaprastho jitendriyaḥ

देह की चिन्ता छोड़े हुए, सदा कुशल, वन में नित्य रहने वाला और एकाग्र — इस प्रकार संयमी जितेन्द्रिय वानप्रस्थ स्वर्ग को जीत लेता है।

श्लोक 17 (14.46.17)

गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थोऽथवा पुनः । य इच्छेन्मोक्षमास्थातुमुत्तमां वृत्तिमाश्रयेत् ॥

gṛhastho brahmacārī ca vānaprastho'thavā punaḥ | ya icchenmokṣamāsthātumuttamāṃ vṛttimāśrayet

गृहस्थ हो, ब्रह्मचारी हो या वानप्रस्थ, जो भी मोक्ष की साधना करना चाहे, वह सर्वोत्तम वृत्ति का आश्रय ले।

श्लोक 18 (14.46.18)

अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत् । सर्वभूतहितो मैत्रः सर्वेन्द्रिययतो मुनिः ॥

abhayaṃ sarvabhūtebhyo dattvā naiṣkarmyamācaret | sarvabhūtahito maitraḥ sarvendriyayato muniḥ

सब प्राणियों को अभय देकर वह निष्कर्मता का आचरण करे; सब प्राणियों का हित चाहने वाला और मित्रभाव रखने वाला मुनि सब इन्द्रियों को वश में रखे।

श्लोक 19 (14.46.19)

अयाचितमसंक्लृप्तमुपपन्नं यदृच्छया । कृत्वा प्राह्णे चरेद्भैक्ष्यं विधूमे भुक्तवज्जने ॥

ayācitamasaṃklṛptamupapannaṃ yadṛcchayā | kṛtvā prāhṇe caredbhaikṣyaṃ vidhūme bhuktavajjane

जो बिना माँगे, बिना सोचे और संयोग से मिल जाए, उसे लेकर वह पूर्वाह्न में भिक्षा के लिए जाए, जब रसोई का धुआँ शान्त हो गया हो और लोग भोजन कर चुके हों।

श्लोक 20 (14.46.20)

वृत्ते शरावसम्पाते भैक्ष्यं लिप्सेत मोक्षवित् । लाभेन च न हृष्येत नालाभे विमना भवेत् । न चातिभिक्षां भिक्षेत केवलं प्राणयात्रिकः ॥

vṛtte śarāvasampāte bhaikṣyaṃ lipseta mokṣavit | lābhena ca na hṛṣyeta nālābhe vimanā bhavet | na cātibhikṣāṃ bhikṣeta kevalaṃ prāṇayātrikaḥ

जब बर्तनों की खटपट थम जाए, तब मोक्ष को जानने वाला भिक्षा चाहे। लाभ होने पर प्रसन्न न हो और न मिलने पर उदास न हो; और अधिक भिक्षा न माँगे, केवल प्राण-यात्रा भर के लिए ले।

श्लोक 21 (14.46.21)

यात्रार्थी कालमाकाङ्क्षंश्चरेद्भैक्ष्यं समाहितः । लाभं साधारणं नेच्छेन्न भुञ्जीताभिपूजितः ॥

yātrārthī kālamākāṅkṣaṃścaredbhaikṣyaṃ samāhitaḥ | lābhaṃ sādhāraṇaṃ necchenna bhuñjītābhipūjitaḥ

केवल निर्वाह चाहने वाला वह उचित समय की प्रतीक्षा करता हुआ एकाग्र मन से भिक्षा के लिए जाए; सबके साझे का लाभ न चाहे और सम्मानपूर्वक दिया हुआ भोजन न करे।

श्लोक 22 (14.46.22)

अभिपूजितलाभाद्धि विजुगुप्सेत भिक्षुकः । भुक्तान्यन्नानि तिक्तानि कषायकटुकानि च ॥

abhipūjitalābhāddhi vijugupseta bhikṣukaḥ | bhuktānyannāni tiktāni kaṣāyakaṭukāni ca

भिक्षु को सम्मान के साथ मिलने वाले लाभ से घृणा करनी चाहिए। जो अन्न वह खाए, चाहे वे कड़वे, कसैले या तीखे हों,

श्लोक 23 (14.46.23)

नास्वादयीत भुञ्जानो रसांश्च मधुरांस्तथा । यात्रामात्रं च भुञ्जीत केवलं प्राणधारणम् ॥

nāsvādayīta bhuñjāno rasāṃśca madhurāṃstathā | yātrāmātraṃ ca bhuñjīta kevalaṃ prāṇadhāraṇam

उन्हें खाते समय स्वाद ले-लेकर न खाए, और मीठे रसों का भी स्वाद न ले; वह केवल निर्वाह भर खाए, मात्र प्राण धारण करने के लिए।

श्लोक 24 (14.46.24)

असंरोधेन भूतानां वृत्तिं लिप्सेत मोक्षवित् । न चान्यमन्नं लिप्सेत भिक्षमाणः कथञ्चन ॥

asaṃrodhena bhūtānāṃ vṛttiṃ lipseta mokṣavit | na cānyamannaṃ lipseta bhikṣamāṇaḥ kathañcana

मोक्ष को जानने वाला ऐसी जीविका चाहे जिससे किसी प्राणी की रुकावट न हो, और भिक्षा माँगते हुए किसी तरह दूसरा अन्न न माँगे।

श्लोक 25 (14.46.25)

न सन्निकाशयेद्धर्मं विविक्ते विरजाश्चरेत् । शून्यागारमरण्यं वा वृक्षमूलं नदीं तथा ॥

na sannikāśayeddharmaṃ vivikte virajāścaret | śūnyāgāramaraṇyaṃ vā vṛkṣamūlaṃ nadīṃ tathā

वह अपने धर्म को प्रकट न करे; एकान्त में और राग से रहित होकर रहे; आश्रय के लिए सूना घर, वन, वृक्ष की जड़ या नदी का तट ले,

श्लोक 26 (14.46.26)

प्रतिश्रयार्थं सेवेत पार्वतीं वा पुनर्गुहाम् । ग्रामैकरात्रिको ग्रीष्मे वर्षास्वेकत्र वा वसेत् ॥

pratiśrayārthaṃ seveta pārvatīṃ vā punarguhām | grāmaikarātriko grīṣme varṣāsvekatra vā vaset

या फिर पर्वत की गुफा। ग्रीष्म में वह किसी गाँव में एक ही रात ठहरे; वर्षा के दिनों में एक ही स्थान पर रहे।

श्लोक 27 (14.46.27)

अध्वा सूर्येण निर्दिष्टः कीटवच्च चरेन्महीम् । दयार्थं चैव भूतानां समीक्ष्य पृथिवीं चरेत् ॥

adhvā sūryeṇa nirdiṣṭaḥ kīṭavacca carenmahīm | dayārthaṃ caiva bhūtānāṃ samīkṣya pṛthivīṃ caret

उसका मार्ग सूर्य बताए, और वह कीड़े की तरह धीरे-धीरे पृथ्वी पर चले; प्राणियों पर दया करके वह भूमि को भली-भाँति देखकर चले।

श्लोक 28 (14.46.28)

सञ्चयांश्च न कुर्वीत स्नेहवासं च वर्जयेत् । पूताभिरद्भिर्नित्यं वै कार्यं कुर्वीत मोक्षवित् ॥

sañcayāṃśca na kurvīta snehavāsaṃ ca varjayet | pūtābhiradbhirnityaṃ vai kāryaṃ kurvīta mokṣavit

वह कोई संचय न करे और स्नेह-बन्धन में रहना छोड़े; मोक्ष को जानने वाला अपना सब आवश्यक कार्य शुद्ध जल से करे।

श्लोक 29 (14.46.29)

उपस्पृशेदुद्धृताभिरद्भिश्च पुरुषः सदा । अहिंसा ब्रह्मचर्यं च सत्यमार्जवमेव च ॥

upaspṛśeduddhṛtābhiradbhiśca puruṣaḥ sadā | ahiṃsā brahmacaryaṃ ca satyamārjavameva ca

मनुष्य सदा कुएँ आदि से निकाले हुए जल से आचमन करे। अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य और सरलता,

श्लोक 30 (14.46.30)

अक्रोधश्चानसूया च दमो नित्यमपैशुनम् । अष्टस्वेतेषु युक्तः स्याद्व्रतेषु नियतेन्द्रियः ॥

akrodhaścānasūyā ca damo nityamapaiśunam | aṣṭasveteṣu yuktaḥ syādvrateṣu niyatendriyaḥ

क्रोध न करना, दोष न निकालना, इन्द्रिय-दमन और चुगली न करना — इन आठ व्रतों में वह इन्द्रियों को वश में रखकर लगा रहे।

श्लोक 31 (14.46.31)

अपापमशठं वृत्तमजिह्मं नित्यमाचरेत् । जोषयेत सदा भोज्यं ग्रासमागतमस्पृहः ॥

apāpamaśaṭhaṃ vṛttamajihmaṃ nityamācaret | joṣayeta sadā bhojyaṃ grāsamāgatamaspṛhaḥ

वह सदा निष्पाप, निश्छल और सीधा आचरण करे; और लालसा छोड़कर जो भोजन अपने आप, ग्रास-ग्रास करके मिल जाए, उसे प्रसन्नता से स्वीकार करे।

श्लोक 32 (14.46.32)

यात्रामात्रं च भुञ्जीत केवलं प्राणयात्रिकम् । धर्मलब्धमथाश्नीयान्न काममनुवर्तयेत् ॥

yātrāmātraṃ ca bhuñjīta kevalaṃ prāṇayātrikam | dharmalabdhamathāśnīyānna kāmamanuvartayet

वह निर्वाह भर ही खाए, केवल प्राण-रक्षा के लिए; धर्म से प्राप्त अन्न ही खाए और इच्छा के पीछे न चले।

श्लोक 33 (14.46.33)

ग्रासादाच्छादनादन्यन्न गृह्णीयात्कथञ्चन । यावदाहारयेत्तावत्प्रतिगृह्णीत नाधिकम् ॥

grāsādācchādanādanyanna gṛhṇīyātkathañcana | yāvadāhārayettāvatpratigṛhṇīta nādhikam

वह अन्न और वस्त्र के सिवा कभी कुछ न ले; जितना खा सके उतना ही ले, उससे अधिक नहीं।

श्लोक 34 (14.46.34)

परेभ्यो न प्रतिग्राह्यं न च देयं कदाचन । दैन्यभावाच्च भूतानां संविभज्य सदा बुधः ॥

parebhyo na pratigrāhyaṃ na ca deyaṃ kadācana | dainyabhāvācca bhūtānāṃ saṃvibhajya sadā budhaḥ

दूसरों से कुछ लेना नहीं चाहिए और किसी को कभी कुछ देना भी नहीं चाहिए; और ज्ञानी प्राणियों की दीनता पर दया करके सदा अपने हिस्से में से बाँटता रहे।

श्लोक 35 (14.46.35)

नाददीत परस्वानि न गृह्णीयान्न याचयेत् । न किञ्चिद्विषयं भुक्त्वा स्पृहयेत्तस्य वै पुनः ॥

nādadīta parasvāni na gṛhṇīyānna yācayet | na kiñcidviṣayaṃ bhuktvā spṛhayettasya vai punaḥ

वह दूसरों की वस्तुएँ न ले, न छीने, न माँगे; और किसी विषय का एक बार भोग कर लेने पर फिर उसकी इच्छा न करे।

श्लोक 36 (14.46.36)

मृदमापस्तथाऽन्नानि पत्रपुष्पफलानि च । असंवृतानि गृह्णीयात्प्रवृत्तानि च कार्यवान् ॥

mṛdamāpastathā'nnāni patrapuṣpaphalāni ca | asaṃvṛtāni gṛhṇīyātpravṛttāni ca kāryavān

मिट्टी, जल, अन्न, पत्ते, फूल और फल — जो घिरे हुए न हों और सहज सुलभ हों, उन्हें आवश्यकता होने पर वह ले सकता है।

श्लोक 37 (14.46.37)

न शिल्पजीविकां जीवेद्द्विरन्नं नोत कामयेत् । न द्वेष्टा नोपदेष्टा च भवेच्च निरुपस्कृतः ॥

na śilpajīvikāṃ jīveddvirannaṃ nota kāmayet | na dveṣṭā nopadeṣṭā ca bhavecca nirupaskṛtaḥ

वह किसी शिल्प से जीविका न चलाए, दूसरा भोजन न चाहे; न किसी से द्वेष करे, न उपदेशक बने, और सीधा-सादा, बिना बनाव-शृंगार के रहे।

श्लोक 38 (14.46.38)

श्रद्धापूतानि भुञ्जीत निमित्तानि च वर्जयेत् । मुधावृत्तिरसक्तश्च सर्वभूतैरसंधितः ॥

śraddhāpūtāni bhuñjīta nimittāni ca varjayet | mudhāvṛttirasaktaśca sarvabhūtairasaṃdhitaḥ

वह श्रद्धा से पवित्र किया हुआ अन्न खाए और शकुन-निमित्त आदि से बचे; बिना माँगे मिले पर निर्वाह करे, अनासक्त रहे और किसी प्राणी से बँधा न हो।

श्लोक 39 (14.46.39)

आशीर्युक्तानि सर्वाणि हिंसायुक्तानि यानि च । लोकसङ्ग्रहधर्मं च नैव कुर्यान्न कारयेत् ॥

āśīryuktāni sarvāṇi hiṃsāyuktāni yāni ca | lokasaṅgrahadharmaṃ ca naiva kuryānna kārayet

जो सब कर्म फल की आशा से जुड़े हैं, जो हिंसा से जुड़े हैं, और लोकसंग्रह का धर्म भी — इन्हें वह न स्वयं करे, न दूसरों से करवाए।

श्लोक 40 (14.46.40)

सर्वभावानतिक्रम्य लघुमात्रः परिव्रजेत् । समः सर्वेषु भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च ॥

sarvabhāvānatikramya laghumātraḥ parivrajet | samaḥ sarveṣu bhūteṣu sthāvareṣu careṣu ca

सब भावों को पार करके, हल्का होकर वह विचरे और चर-अचर सब प्राणियों में समान भाव रखे।

श्लोक 41 (14.46.41)

परं नोद्वेजयेत्कञ्चिन्न च कस्यचिदुद्विजेत् । विश्वास्यः सर्वभूतानामग्र्यो मोक्षविदुच्यते ॥

paraṃ nodvejayetkañcinna ca kasyacidudvijet | viśvāsyaḥ sarvabhūtānāmagryo mokṣaviducyate

वह किसी दूसरे को उद्विग्न न करे और न स्वयं किसी से उद्विग्न हो; जो सब प्राणियों का विश्वासपात्र हो, वही मोक्ष जानने वालों में अग्रणी कहा जाता है।

श्लोक 42 (14.46.42)

अनागतं च न ध्यायेन्नातीतमनुचिन्तयेत् । वर्तमानमुपेक्षेत कालाकाङ्क्षी समाहितः ॥

anāgataṃ ca na dhyāyennātītamanucintayet | vartamānamupekṣeta kālākāṅkṣī samāhitaḥ

वह भविष्य का चिन्तन न करे, बीती बात को न सोचे; वर्तमान की उपेक्षा करे और एकाग्र रहकर केवल अपने समय की प्रतीक्षा करे।

श्लोक 43 (14.46.43)

न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूषयेत्क्वचित् । न प्रत्यक्षं परोक्षं वा किञ्चिद्दुष्टं समाचरेत् ॥

na cakṣuṣā na manasā na vācā dūṣayetkvacit | na pratyakṣaṃ parokṣaṃ vā kiñcidduṣṭaṃ samācaret

वह आँख, मन या वाणी से कभी किसी को दूषित न करे, और प्रत्यक्ष या परोक्ष में कोई बुरा कर्म न करे।

श्लोक 44 (14.46.44)

इन्द्रियाण्युपसंहृत्य कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । क्षीणेन्द्रियमनोबुद्धिर्निरीहः सर्वतत्त्ववित् ॥

indriyāṇyupasaṃhṛtya kūrmo'ṅgānīva sarvaśaḥ | kṣīṇendriyamanobuddhirnirīhaḥ sarvatattvavit

कछुआ जैसे अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही वह इन्द्रियों को सब ओर से समेटकर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि को शान्त कर, चेष्टारहित और सब तत्त्वों का ज्ञाता होकर रहे;

श्लोक 45 (14.46.45)

निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निःस्वाहाकार एव च । निर्ममो निरहङ्कारो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥

nirdvandvo nirnamaskāro niḥsvāhākāra eva ca | nirmamo nirahaṅkāro niryogakṣema ātmavān

वह द्वन्द्वों से रहित हो, न किसी को नमस्कार करे, न स्वाहाकार करे, ममता और अहंकार से मुक्त हो, योग-क्षेम की चिन्ता से रहित हो और आत्मवान् हो;

श्लोक 46 (14.46.46)

निराशीर्निर्गुणः शान्तो निरासक्तो निराश्रयः । आत्मसङ्गी च तत्त्वज्ञो मुच्यते नात्र संशयः ॥

nirāśīrnirguṇaḥ śānto nirāsakto nirāśrayaḥ | ātmasaṅgī ca tattvajño mucyate nātra saṃśayaḥ

आशा से रहित, गुणों से परे, शान्त, अनासक्त, निराश्रय, आत्मा के साथ रहने वाला और तत्त्व को जानने वाला मुक्त हो जाता है; इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 47 (14.46.47)

अपादपाणिपृष्ठं तदशिरस्कमनूदरम् । अभिन्नगुणकर्माणं केवलं विमलं स्थिरम् ॥

apādapāṇipṛṣṭhaṃ tadaśiraskamanūdaram | abhinnaguṇakarmāṇaṃ kevalaṃ vimalaṃ sthiram

उस परम तत्त्व के न पैर हैं, न हाथ, न पीठ, न सिर, न पेट; उसके गुण और कर्म अभिन्न हैं; वह अकेला, निर्मल और स्थिर है;

श्लोक 48 (14.46.48)

अगन्धमरसस्पर्शमरूपाशब्दमेव च । अनुगम्यमनासक्तममांसमपि चैव यत् ॥

agandhamarasasparśamarūpāśabdameva ca | anugamyamanāsaktamamāṃsamapi caiva yat

उसमें न गन्ध है, न रस, न स्पर्श, न रूप, न शब्द; वह अनुसरण करने योग्य और अनासक्त है, और मांस से भी रहित है।

श्लोक 49 (14.46.49)

निश्चिन्तमव्ययं दिव्यं गृहस्थमपि सर्वदा । सर्वभूतस्थमात्मानं ये पश्यन्ति न ते मृताः ॥

niścintamavyayaṃ divyaṃ gṛhasthamapi sarvadā | sarvabhūtasthamātmānaṃ ye paśyanti na te mṛtāḥ

जो चिन्ता से रहित, अविनाशी और दिव्य है तथा सदा इस देह-रूपी घर में स्थित है — सब प्राणियों में स्थित उस आत्मा को जो देखते हैं, वे मरते नहीं।

श्लोक 50 (14.46.50)

न तत्र क्रमते बुद्धिर्नेन्द्रियाणि न देवताः । वेदा यज्ञाश्च लोकाश्च न तपो न व्रतानि च ॥

na tatra kramate buddhirnendriyāṇi na devatāḥ | vedā yajñāśca lokāśca na tapo na vratāni ca

वहाँ न बुद्धि की पहुँच है, न इन्द्रियों की, न देवताओं की; वेद, यज्ञ, लोक, तप और व्रत भी वहाँ नहीं पहुँचते।

श्लोक 51 (14.46.51)

यत्र ज्ञानवतां प्राप्तिरलिङ्गग्रहणा स्मृता । तस्मादलिङ्गधर्मज्ञो धर्मतत्त्वमुपाचरेत् ॥

yatra jñānavatāṃ prāptiraliṅgagrahaṇā smṛtā | tasmādaliṅgadharmajño dharmatattvamupācaret

यही वह स्थान है जहाँ ज्ञानियों की प्राप्ति बिना किसी बाहरी चिह्न के बताई गई है। इसलिए चिह्नरहित धर्म को जानने वाला धर्म के सार का ही आचरण करे।

श्लोक 52 (14.46.52)

गूढधर्माश्रितो विद्वान्विज्ञानचरितं चरेत् । अमूढो मूढरूपेण चरेद्धर्ममदूषयन् ॥

gūḍhadharmāśrito vidvānvijñānacaritaṃ caret | amūḍho mūḍharūpeṇa careddharmamadūṣayan

विद्वान् गूढ़ धर्म का आश्रय लेकर ज्ञान से भरा जीवन जिए; स्वयं मोह से रहित होकर भी मूढ़ के रूप में विचरे और धर्म को दूषित न करे।

श्लोक 53 (14.46.53)

यथैनमवमन्येरन्परे सततमेव हि । तथावृत्तश्चरेच्छान्तः सतां धर्मानकुत्सयन् ॥

yathainamavamanyeranpare satatameva hi | tathāvṛttaścarecchāntaḥ satāṃ dharmānakutsayan

वह ऐसा आचरण करे कि दूसरे लोग उसका निरन्तर तिरस्कार करें, और शान्त रहकर सज्जनों के धर्म की निन्दा न करे।

श्लोक 54 (14.46.54)

य एवं वृत्तसम्पन्नः स मुनिः श्रेष्ठ उच्यते । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च महाभूतानि पञ्च च ॥

ya evaṃ vṛttasampannaḥ sa muniḥ śreṣṭha ucyate | indriyāṇīndriyārthāṃśca mahābhūtāni pañca ca

जो ऐसे आचरण से युक्त है, वही श्रेष्ठ मुनि कहलाता है। इन्द्रियाँ और उनके विषय तथा पाँच महाभूत,

श्लोक 55 (14.46.55)

मनो बुद्धिरहङ्कारमव्यक्तं पुरुषं तथा । एतत्सर्वं प्रसङ्ख्याय यथावत्तत्त्वनिश्चयात् ॥

mano buddhirahaṅkāramavyaktaṃ puruṣaṃ tathā | etatsarvaṃ prasaṅkhyāya yathāvattattvaniścayāt

मन, बुद्धि, अहंकार, अव्यक्त और पुरुष — इन सबकी तत्त्वों के निश्चय से यथार्थ गणना करके,

श्लोक 56 (14.46.56)

ततः स्वर्गमवाप्नोति विमुक्तः सर्वबन्धनैः । एतावदन्तवेलायां परिसङ्ख्याय तत्त्ववित् ॥

tataḥ svargamavāpnoti vimuktaḥ sarvabandhanaiḥ | etāvadantavelāyāṃ parisaṅkhyāya tattvavit

वह सब बन्धनों से मुक्त होकर स्वर्ग पाता है। अन्त समय में इस प्रकार गणना करके तत्त्व को जानने वाला

श्लोक 57 (14.46.57)

ध्यायेदेकान्तमास्थाय मुच्यतेऽथ निराश्रयः । निर्मुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो वायुराकाशगो यथा ॥

dhyāyedekāntamāsthāya mucyate'tha nirāśrayaḥ | nirmuktaḥ sarvasaṅgebhyo vāyurākāśago yathā

एकान्त का आश्रय लेकर ध्यान करे और तब निराश्रय होकर मुक्त हो जाता है; सब आसक्तियों से छूटकर वह आकाश में चलने वाली वायु के समान हो जाता है,

श्लोक 58 (14.46.58)

क्षीणकोशो निरातङ्कस्तथेदं प्राप्नुयात्परम् ॥

kṣīṇakośo nirātaṅkastathedaṃ prāpnuyātparam

उसका संचित कोश क्षीण हो जाता है और वह भयरहित होकर इस परम पद को प्राप्त करता है।

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