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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 45

कालचक्र और गृहस्थ के कर्तव्य

ब्रह्मा उस कालचक्र का वर्णन करते हैं जो जरा, शोक, भूख, सुख और दुःख के बीच घूमता है, और कहते हैं कि जो उसकी प्रवृत्ति और निवृत्ति को जानता है वह प्राणियों के बीच मोहित नहीं होता और परम गति पाता है। वे चार आश्रमों को गिनाते हैं, जिनका मूल गृहस्थ है, और गृहस्थ का आचरण बताते हैं—संस्कार, पाँच महायज्ञ, जीविका के तीन साधन तथा दान, अध्ययन और यज्ञ के तीन कर्तव्य। इन व्रतों का पालन करने वाला गृहस्थ स्वर्ग जीतता है।

अध्याय 44अध्याय-सूचीअध्याय 46

ब्रह्मोवाच

श्लोक 1 (14.45.1)

बुद्धिसारं मनस्तम्भमिन्द्रियग्रामबन्धनम् । महाभूतारविष्कम्भं निमेषपरिवेष्टनम् ॥

buddhisāraṃ manastambhamindriyagrāmabandhanam | mahābhūtāraviṣkambhaṃ nimeṣapariveṣṭanam

बुद्धि जिसका सार है, मन जिसका स्तम्भ है, इन्द्रियों का समूह जिसका बन्धन है, महाभूत जिसके आरे और आधार हैं और पलकों का झपकना जिसका घेरा है,

श्लोक 2 (14.45.2)

जराशोकसमाविष्टं व्याधिव्यसनसञ्चरम् । देशकालविचारीदं श्रमव्यायामनिःस्वनम् ॥

jarāśokasamāviṣṭaṃ vyādhivyasanasañcaram | deśakālavicārīdaṃ śramavyāyāmaniḥsvanam

जो जरा और शोक से घिरा है, रोग और विपत्ति के बीच चलता है, देश और काल का विचार करता है और थकान तथा परिश्रम की ध्वनि से गूँजता है,

श्लोक 3 (14.45.3)

अहोरात्रपरिक्षेपं शीतोष्णपरिमण्डलम् । सुखदुःखान्तसंश्लेषं क्षुत्पिपासावकीलकम् ॥

ahorātraparikṣepaṃ śītoṣṇaparimaṇḍalam | sukhaduḥkhāntasaṃśleṣaṃ kṣutpipāsāvakīlakam

जो दिन-रात से घिरा है, सर्दी-गर्मी के मण्डल से घिरा है, सुख और दुःख के छोरों से जुड़ा है और भूख-प्यास की कीलों से जड़ा है,

श्लोक 4 (14.45.4)

छायातपविलेखं च निमेषोन्मेषविह्वलम् । शोकमोहजराकीर्णं वर्तमानमचेतनम् ॥

chāyātapavilekhaṃ ca nimeṣonmeṣavihvalam | śokamohajarākīrṇaṃ vartamānamacetanam

जिस पर छाया और धूप की रेखाएँ खिंची हैं, जो पलकों के खुलने-मिचने से काँपता है, जो शोक, मोह और जरा से भरा है और वर्तमान रहते हुए भी अचेतन है,

श्लोक 5 (14.45.5)

मासार्धमासगुणितं विषमं लोकसञ्चरम् । तमोनिचयपङ्कं च रजोवेगप्रवर्तकम् ॥

māsārdhamāsaguṇitaṃ viṣamaṃ lokasañcaram | tamonicayapaṅkaṃ ca rajovegapravartakam

जो मासों और पक्षों से गिना जाता है, ऊँचा-नीचा है, लोकों में विचरता है, जिसमें अन्धकार के ढेर का कीचड़ है और जो रजोगुण के वेग से चलता है,

श्लोक 6 (14.45.6)

सत्त्वालङ्कारदीप्तं च गुणसंघातमण्डलम् । विरतिग्रहणाभीकं शोकसंहारवर्तनम् ॥

sattvālaṅkāradīptaṃ ca guṇasaṃghātamaṇḍalam | viratigrahaṇābhīkaṃ śokasaṃhāravartanam

जो सत्त्व के आभूषण से दीप्त है, गुणों के समूह का मण्डल है, जिसकी नाभि विरति और ग्रहण से बनी है और जो शोकों के संहार में घूमता है,

श्लोक 7 (14.45.7)

क्रियाकारणसंयुक्तं रागविस्तारमायतम् । लोभेप्सापरिविक्षोभं विविक्तज्ञानसम्भवम् ॥

kriyākāraṇasaṃyuktaṃ rāgavistāramāyatam | lobhepsāparivikṣobhaṃ viviktajñānasambhavam

जो क्रिया और कारण से युक्त है, राग के विस्तार से फैला हुआ है, लोभ और इच्छा से क्षुब्ध है और विवेकपूर्ण ज्ञान से उत्पन्न होता है,

श्लोक 8 (14.45.8)

भयमोहपरीवारं भूतसंमोहकारकम् । आनन्दप्रीतिचारं च कामक्रोधपरिग्रहम् ॥

bhayamohaparīvāraṃ bhūtasaṃmohakārakam | ānandaprīticāraṃ ca kāmakrodhaparigraham

जो भय और मोह से घिरा है, प्राणियों को मोहित करता है, आनन्द और प्रीति में विचरता है और काम तथा क्रोध को पकड़े रहता है,

श्लोक 9 (14.45.9)

महदादिविशेषान्तमव्यक्तं प्रभवाप्ययम् । मनोजवनमश्रान्तं कालचक्रं प्रवर्तते ॥

mahadādiviśeṣāntamavyaktaṃ prabhavāpyayam | manojavanamaśrāntaṃ kālacakraṃ pravartate

जो महत्तत्त्व से लेकर विशेष तत्त्वों तक फैला है, अव्यक्त है, उत्पत्ति और लय का स्थान है, मन के समान वेग वाला और अथक है—ऐसा कालचक्र घूमता रहता है।

श्लोक 10 (14.45.10)

एतद्द्वन्द्वसमायुक्तं कालचक्रमचेतनम् । विसृजेत्संक्षिपेच्चापि बोधयेत्स्वापयेज्जगत् ॥

etaddvandvasamāyuktaṃ kālacakramacetanam | visṛjetsaṃkṣipeccāpi bodhayetsvāpayejjagat

द्वन्द्वों से युक्त यह अचेतन कालचक्र जगत् को रच भी सकता है, समेट भी सकता है, जगा भी सकता है और सुला भी सकता है।

श्लोक 11 (14.45.11)

कालचक्रप्रवृत्तिं च निवृत्तिं चैव तत्त्वतः । यस्तु वेद नरो नित्यं न स भूतेषु मुह्यति ॥

kālacakrapravṛttiṃ ca nivṛttiṃ caiva tattvataḥ | yastu veda naro nityaṃ na sa bhūteṣu muhyati

जो मनुष्य कालचक्र की प्रवृत्ति और निवृत्ति को यथार्थ रूप से सदा जानता है, वह प्राणियों के बीच मोह में नहीं पड़ता।

श्लोक 12 (14.45.12)

विमुक्तः सर्वसङ्क्लेशैः सर्वद्वन्द्वातिगो मुनिः । विमुक्तः सर्वपापेभ्यः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥

vimuktaḥ sarvasaṅkleśaiḥ sarvadvandvātigo muniḥ | vimuktaḥ sarvapāpebhyaḥ prāpnoti paramāṃ gatim

सब क्लेशों से मुक्त, सब द्वन्द्वों से पार हुआ और सब पापों से छूटा हुआ मुनि परम गति को पाता है।

श्लोक 13 (14.45.13)

गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः । चत्वार आश्रमाः प्रोक्ताः सर्वे गार्हस्थ्यमूलकाः ॥

gṛhastho brahmacārī ca vānaprastho'tha bhikṣukaḥ | catvāra āśramāḥ proktāḥ sarve gārhasthyamūlakāḥ

गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और भिक्षु—ये चार आश्रम बताए गए हैं, और सभी का मूल गृहस्थाश्रम है।

श्लोक 14 (14.45.14)

यः कश्चिदिह लोकेऽस्मिन्नाश्रमः परिकीर्तितः । तस्यान्तगमनं श्रेयः कीर्तिरेषा सनातनी ॥

yaḥ kaścidiha loke'sminnāśramaḥ parikīrtitaḥ | tasyāntagamanaṃ śreyaḥ kīrtireṣā sanātanī

इस लोक में जो भी आश्रम बताया गया है, उसके अन्त तक पहुँचना श्रेयस्कर है; यही सनातन कीर्ति है।

श्लोक 15 (14.45.15)

संस्कारैः संस्कृतः पूर्वं यथावच्चरितव्रतः । जातौ गुणविशिष्टायां समावर्तेत वेदवित् ॥

saṃskāraiḥ saṃskṛtaḥ pūrvaṃ yathāvaccaritavrataḥ | jātau guṇaviśiṣṭāyāṃ samāvarteta vedavit

पहले संस्कारों से शुद्ध होकर और विधिपूर्वक व्रतों का पालन करके वेद का ज्ञाता गुणों से श्रेष्ठ कुल में लौटकर गृहस्थ बने।

श्लोक 16 (14.45.16)

स्वदारनिरतो नित्यं शिष्टाचारो जितेन्द्रियः । पञ्चभिश्च महायज्ञैः श्रद्दधानो यजेदिह ॥

svadāranirato nityaṃ śiṣṭācāro jitendriyaḥ | pañcabhiśca mahāyajñaiḥ śraddadhāno yajediha

वह सदा अपनी ही पत्नी में अनुरक्त रहे, सदाचारी और जितेन्द्रिय हो, और श्रद्धापूर्वक पाँच महायज्ञों से यहाँ यजन करे।

श्लोक 17 (14.45.17)

देवतातिथिशिष्टाशी निरतो वेदकर्मसु । इज्याप्रदानयुक्तश्च यथाशक्ति यथाविधि ॥

devatātithiśiṣṭāśī nirato vedakarmasu | ijyāpradānayuktaśca yathāśakti yathāvidhi

वह देवताओं और अतिथियों के बाद बचा हुआ भोजन करे, वैदिक कर्मों में लगा रहे और सामर्थ्य तथा विधि के अनुसार यज्ञ और दान करता रहे।

श्लोक 18 (14.45.18)

न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलो मुनिः । न च वागङ्गचपल इति शिष्टस्य गोचरः ॥

na pāṇipādacapalo na netracapalo muniḥ | na ca vāgaṅgacapala iti śiṣṭasya gocaraḥ

मुनि हाथ-पैर से चंचल न हो, नेत्रों से चंचल न हो, और वाणी तथा अंगों से भी चंचल न हो—यही शिष्ट पुरुष का आचरण है।

श्लोक 19 (14.45.19)

नित्यं यज्ञोपवीती स्याच्छुक्लवासाः शुचिव्रतः । नियतो यमदानाभ्यां सदा शिष्टैश्च संविशेत् ॥

nityaṃ yajñopavītī syācchuklavāsāḥ śucivrataḥ | niyato yamadānābhyāṃ sadā śiṣṭaiśca saṃviśet

वह सदा यज्ञोपवीत धारण करे, श्वेत वस्त्र पहने, शुद्ध व्रत रखे, यम और दान से संयमी रहे और सदा शिष्ट लोगों के साथ उठे-बैठे।

श्लोक 20 (14.45.20)

जितशिश्नोदरो मैत्रः शिष्टाचारसमन्वितः । वैणवीं धारयेद्यष्टिं सोदकं च कमण्डलुम् ॥

jitaśiśnodaro maitraḥ śiṣṭācārasamanvitaḥ | vaiṇavīṃ dhārayedyaṣṭiṃ sodakaṃ ca kamaṇḍalum

पेट और उपस्थ को जीते हुए, मित्रभाव वाला और शिष्ट आचार से युक्त होकर वह बाँस की लाठी और जल से भरा कमण्डलु धारण करे।

श्लोक 21 (14.45.21)

त्रीणि धारयते नित्यं कमण्डलुमतन्द्रितः । एकमाचमनार्थाय एकं वै पादधावनम् । एकं शौचविधानार्थमित्येतत्त्रितयं तथा ॥

trīṇi dhārayate nityaṃ kamaṇḍalumatandritaḥ | ekamācamanārthāya ekaṃ vai pādadhāvanam | ekaṃ śaucavidhānārthamityetattritayaṃ tathā

आलस्य छोड़कर वह कमण्डलु के साथ सदा तीन वस्तुएँ रखे—एक आचमन के लिए, एक पैर धोने के लिए और एक शुद्धि के कार्य के लिए; इस प्रकार यह तीनों हैं।

श्लोक 22 (14.45.22)

अधीत्याध्यापनं कुर्यात्तथा यजनयाजने । दानं प्रतिग्रहं वाऽपि षङ्गुणां वृत्तिमाचरेत् ॥

adhītyādhyāpanaṃ kuryāttathā yajanayājane | dānaṃ pratigrahaṃ vā'pi ṣaṅguṇāṃ vṛttimācaret

अध्ययन करके वह अध्यापन करे, तथा यजन और याजन करे, दान दे और दान ले—इस प्रकार छह कर्मों वाली जीविका का पालन करे।

श्लोक 23 (14.45.23)

त्रीणि कर्माणि जानीत ब्राह्मणानां तु जीविकाः । याजनाध्यापने चोभे शुद्धाच्चापि प्रतिग्रहः ॥

trīṇi karmāṇi jānīta brāhmaṇānāṃ tu jīvikāḥ | yājanādhyāpane cobhe śuddhāccāpi pratigrahaḥ

जानो कि ब्राह्मणों की जीविका के तीन कर्म हैं—यज्ञ कराना, पढ़ाना और शुद्ध व्यक्ति से दान लेना।

श्लोक 24 (14.45.24)

अथ शेषाणि चान्यानि त्रीणि कर्माणि यानि तु । दानमध्ययनं यज्ञो धर्मयुक्तानि तानि तु ॥

atha śeṣāṇi cānyāni trīṇi karmāṇi yāni tu | dānamadhyayanaṃ yajño dharmayuktāni tāni tu

और शेष जो तीन कर्म हैं—दान, अध्ययन और यज्ञ—वे धर्म से युक्त हैं।

श्लोक 25 (14.45.25)

तेष्वप्रमादं कुर्वीत त्रिषु कर्मसु धर्मवित् । दान्तो मैत्रः क्षमायुक्तः सर्वभूतसमो मुनिः ॥

teṣvapramādaṃ kurvīta triṣu karmasu dharmavit | dānto maitraḥ kṣamāyuktaḥ sarvabhūtasamo muniḥ

धर्म को जानने वाला इन तीनों कर्मों में प्रमाद न करे; जो इन्द्रियों को जीते हुए, मित्रभाव वाला, क्षमाशील और सब प्राणियों में सम है, वही मुनि है।

श्लोक 26 (14.45.26)

सर्वमेतद्यथाशक्ति विप्रो निर्वर्तयञ्शुचिः । एवं युक्तो जयेत्स्वर्गं गृहस्थः संशितव्रतः ॥

sarvametadyathāśakti vipro nirvartayañśuciḥ | evaṃ yukto jayetsvargaṃ gṛhasthaḥ saṃśitavrataḥ

पवित्र ब्राह्मण यह सब अपनी शक्ति के अनुसार पूरा करता हुआ, इस प्रकार संयमी और दृढ़ व्रत वाला गृहस्थ स्वर्ग को जीत लेता है।

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