आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 44
ब्रह्मा द्वारा प्रत्येक वर्ग के आदि का वर्णन; कर्म नष्ट होते हैं, ज्ञान नहीं
ब्रह्मा ऋषियों को उपदेश देते हुए बताते हैं कि प्रत्येक वर्ग में आदि क्या है—तत्त्व और उनके गुण, ज्योतियाँ, छन्द, यज्ञ, युग, पर्वत और नदियाँ—और सारे जगत् के आदि विष्णु हैं। फिर वे कहते हैं कि सब सुख, संचय, संयोग और जीवन समाप्त हो जाते हैं, यज्ञ, दान, तप और अध्ययन भी, परन्तु ज्ञान का अन्त नहीं है। शुद्ध ज्ञान से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 1 (14.44.1)
यदादिमध्यपर्यन्तं ग्रहणोपायमेव च । नामलक्षणसंयुक्तं सर्वं वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥
yadādimadhyaparyantaṃ grahaṇopāyameva ca | nāmalakṣaṇasaṃyuktaṃ sarvaṃ vakṣyāmi tattvataḥ
जो आदि, मध्य और अन्त है, तथा उसे ग्रहण करने का उपाय भी—यह सब नामों और लक्षणों सहित मैं तुम्हें यथार्थ रूप से कहूँगा।
श्लोक 2 (14.44.2)
अहः पूर्वं ततो रात्रिर्मासाः शुक्लादयः स्मृताः । श्रवणादीनि ऋक्षाणि ऋतवः शिशिरादयः ॥
ahaḥ pūrvaṃ tato rātrirmāsāḥ śuklādayaḥ smṛtāḥ | śravaṇādīni ṛkṣāṇi ṛtavaḥ śiśirādayaḥ
पहले दिन है, फिर रात; मास शुक्ल पक्ष से आरम्भ होने वाले माने गए हैं; नक्षत्र श्रवण से आरम्भ होते हैं और ऋतुएँ शिशिर से।
श्लोक 3 (14.44.3)
भूमिरादिस्तु गन्धानां रसानामाप एव च । रूपाणामादिरग्निस्तु स्पर्शादिर्वायुरुच्यते ॥
bhūmirādistu gandhānāṃ rasānāmāpa eva ca | rūpāṇāmādiragnistu sparśādirvāyurucyate
गन्धों का आदि भूमि है, रसों का जल; रूपों का आदि अग्नि है और स्पर्शों का आदि वायु कहा जाता है।
श्लोक 4 (14.44.4)
शब्दस्यादिस्तथाऽऽकाशमेष भूतकृतो गुणः । अतः परं प्रवक्ष्यामि भूतानामादिमुत्तमम् ॥
śabdasyādistathā''kāśameṣa bhūtakṛto guṇaḥ | ataḥ paraṃ pravakṣyāmi bhūtānāmādimuttamam
शब्द का आदि आकाश है—यह भूतों से बना गुण है। अब मैं प्राणियों के सर्वोत्तम आदि को कहूँगा।
श्लोक 5 (14.44.5)
आदित्यो ज्योतिषामादिरग्निर्भूतादिरुच्यते । सावित्री सर्वविद्यानां देवतानां प्रजापतिः ॥
ādityo jyotiṣāmādiragnirbhūtādirucyate | sāvitrī sarvavidyānāṃ devatānāṃ prajāpatiḥ
ज्योतियों का आदि आदित्य है और प्राणियों का आदि अग्नि कहा जाता है; सब विद्याओं का आदि सावित्री है और देवताओं का प्रजापति।
श्लोक 6 (14.44.6)
ओङ्कारः सर्ववेदानां वचसां प्राण एव च । यदस्मिन्नियतं लोके सर्वं सावित्रमुच्यते ॥
oṅkāraḥ sarvavedānāṃ vacasāṃ prāṇa eva ca | yadasminniyataṃ loke sarvaṃ sāvitramucyate
समस्त वेदों का आदि ओंकार है और वाणी का प्राण भी वही है; इस लोक में जो कुछ स्थिर है, वह सब सावित्र कहा जाता है।
श्लोक 7 (14.44.7)
गायत्री च्छन्दसामादिः प्रजानां सर्ग उच्यते । गावश्चतुष्पदामादिर्मनुष्याणां द्विजातयः ॥
gāyatrī cchandasāmādiḥ prajānāṃ sarga ucyate | gāvaścatuṣpadāmādirmanuṣyāṇāṃ dvijātayaḥ
छन्दों का आदि गायत्री है और प्राणियों में सृष्टि को आदि कहा जाता है; चौपायों में आदि गौएँ हैं और मनुष्यों में द्विज।
श्लोक 8 (14.44.8)
श्येनः पतत्रिणामादिर्यज्ञानां हुतमुत्तमम् । प्रसर्पिणां तु सर्वेषां ज्येष्ठः सर्पो द्विजोत्तमाः ॥
śyenaḥ patatriṇāmādiryajñānāṃ hutamuttamam | prasarpiṇāṃ tu sarveṣāṃ jyeṣṭhaḥ sarpo dvijottamāḥ
पक्षियों में आदि बाज है और यज्ञों में हवन सर्वोत्तम है; समस्त रेंगने वालों में सबसे ज्येष्ठ सर्प है, हे द्विजश्रेष्ठो।
श्लोक 9 (14.44.9)
कृतमादिर्युगानां च सर्वेषां नात्र संशयः । हिरण्यं सर्वरत्नानामोषधीनां यवास्तथा ॥
kṛtamādiryugānāṃ ca sarveṣāṃ nātra saṃśayaḥ | hiraṇyaṃ sarvaratnānāmoṣadhīnāṃ yavāstathā
सब युगों में आदि कृतयुग है, इसमें संशय नहीं; सब रत्नों में सोना और ओषधियों में जौ आदि है।
श्लोक 10 (14.44.10)
सर्वेषां भक्ष्यभोज्यानामन्नं परममुच्यते । द्रवाणां चैव सर्वेषां पेयानामाप उत्तमाः ॥
sarveṣāṃ bhakṣyabhojyānāmannaṃ paramamucyate | dravāṇāṃ caiva sarveṣāṃ peyānāmāpa uttamāḥ
समस्त खाद्य और भोज्य पदार्थों में अन्न सर्वोत्तम कहा जाता है; सब द्रवों और पेयों में जल उत्तम है।
श्लोक 11 (14.44.11)
स्थावराणां तु भूतानां सर्वेषामविशेषतः । ब्रह्मक्षेत्रं सदा पुण्यं प्लक्षः प्रवरजः स्मृतः ॥
sthāvarāṇāṃ tu bhūtānāṃ sarveṣāmaviśeṣataḥ | brahmakṣetraṃ sadā puṇyaṃ plakṣaḥ pravarajaḥ smṛtaḥ
समस्त स्थावर प्राणियों में, बिना किसी भेद के, ब्रह्म का क्षेत्र सदा पवित्र है और प्लक्ष को सबसे श्रेष्ठ में उत्पन्न माना गया है।
श्लोक 12 (14.44.12)
अहं प्रजापतीनां च सर्वेषां नात्र संशयः । मम विष्णुरचिन्त्यात्मा स्वयंभूरिति संस्मृतः ॥
ahaṃ prajāpatīnāṃ ca sarveṣāṃ nātra saṃśayaḥ | mama viṣṇuracintyātmā svayaṃbhūriti saṃsmṛtaḥ
समस्त प्रजापतियों में मैं आदि हूँ, इसमें संशय नहीं; और अचिन्त्य स्वरूप वाले विष्णु मेरे द्वारा स्वयम्भू माने गए हैं।
श्लोक 13 (14.44.13)
पर्वतानां महामेरुः सर्वेषामग्रजः स्मृतः । दिशां च प्रदिशां चोर्ध्वं दिक्पूर्वा प्रथमा तथा ॥
parvatānāṃ mahāmeruḥ sarveṣāmagrajaḥ smṛtaḥ | diśāṃ ca pradiśāṃ cordhvaṃ dikpūrvā prathamā tathā
पर्वतों में महामेरु सबसे बड़ा माना गया है; दिशाओं और उपदिशाओं में ऊर्ध्व दिशा कही गई है और पूर्व दिशा भी प्रथम है।
श्लोक 14 (14.44.14)
तथा त्रिपथगा गङ्गा नदीनामग्रजा स्मृता । तथा सरोदपानानां सर्वेषां सागरोऽग्रजः ॥
tathā tripathagā gaṅgā nadīnāmagrajā smṛtā | tathā sarodapānānāṃ sarveṣāṃ sāgaro'grajaḥ
इसी प्रकार तीन मार्गों से बहने वाली गंगा नदियों में ज्येष्ठ मानी गई है; और सब सरोवरों तथा कूपों में सागर ज्येष्ठ है।
श्लोक 15 (14.44.15)
देवदानवभूतानां पिशाचोरगरक्षसाम् । नरकिन्नरयक्षाणां सर्वेषामीश्वरः प्रभुः ॥
devadānavabhūtānāṃ piśācoragarakṣasām | narakinnarayakṣāṇāṃ sarveṣāmīśvaraḥ prabhuḥ
देवों, दानवों और भूतों का, पिशाचों, उरगों और राक्षसों का तथा मनुष्यों, किन्नरों और यक्षों का—इन सबका वही ईश्वर और प्रभु है।
श्लोक 16 (14.44.16)
आदिर्विश्वस्य जगतो विष्णुर्ब्रह्ममयो महान् । ततः परतरं यस्मात्त्रैलोक्ये नेह विद्यते ॥
ādirviśvasya jagato viṣṇurbrahmamayo mahān | tataḥ parataraṃ yasmāttrailokye neha vidyate
ब्रह्ममय महान् विष्णु सारे जगत् के आदि हैं; तीनों लोकों में उनसे बढ़कर कोई नहीं है।
श्लोक 17 (14.44.17)
आश्रमाणां च सर्वेषां गार्हस्थ्यं नात्र संशयः । लोकानामादिरव्यक्तं सर्वस्यान्तस्तदेव च ॥
āśramāṇāṃ ca sarveṣāṃ gārhasthyaṃ nātra saṃśayaḥ | lokānāmādiravyaktaṃ sarvasyāntastadeva ca
सब आश्रमों में गृहस्थाश्रम आदि है, इसमें संशय नहीं; लोकों का आदि अव्यक्त है और सबका अन्त भी वही है।
श्लोक 18 (14.44.18)
अहान्यस्तमयान्तानि उदयान्ता च शर्वरी । सुखस्यान्तं सदा दुःखं दुःखस्यान्तं सदा सुखम् ॥
ahānyastamayāntāni udayāntā ca śarvarī | sukhasyāntaṃ sadā duḥkhaṃ duḥkhasyāntaṃ sadā sukham
दिन अस्त होने पर समाप्त होते हैं और रात उदय होने पर; सुख का अन्त सदा दुःख है और दुःख का अन्त सदा सुख।
श्लोक 19 (14.44.19)
सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः । संयोगाश्च वियोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥
sarve kṣayāntā nicayāḥ patanāntāḥ samucchrayāḥ | saṃyogāśca viyogāntā maraṇāntaṃ ca jīvitam
सब संचय क्षय में समाप्त होते हैं, सब ऊँचाइयाँ पतन में; संयोग वियोग में समाप्त होते हैं और जीवन मृत्यु में।
श्लोक 20 (14.44.20)
सर्वं कृतं विनाशान्तं जातस्य मरणं ध्रुवम् । अशाश्वतं हि लोकेऽस्मिन्सदा स्थावरजङ्गमम् ॥
sarvaṃ kṛtaṃ vināśāntaṃ jātasya maraṇaṃ dhruvam | aśāśvataṃ hi loke'sminsadā sthāvarajaṅgamam
जो कुछ बना है उसका अन्त विनाश है, और जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है; इस लोक में सारा स्थावर-जंगम अनित्य है।
श्लोक 21 (14.44.21)
इष्टं दत्तं तपोऽधीतं व्रतानि नियमाश्च ये । सर्वमेतद्विनाशान्तं ज्ञानस्यान्तो न विद्यते ॥
iṣṭaṃ dattaṃ tapo'dhītaṃ vratāni niyamāśca ye | sarvametadvināśāntaṃ jñānasyānto na vidyate
यज्ञ, दान, तप, अध्ययन, व्रत और नियम—यह सब नाश में समाप्त होता है, किन्तु ज्ञान का अन्त नहीं है।
श्लोक 22 (14.44.22)
तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः । निर्ममो निरहंकारो मुच्यते सर्वपाप्मभिः ॥
tasmājjñānena śuddhena praśāntātmā jitendriyaḥ | nirmamo nirahaṃkāro mucyate sarvapāpmabhiḥ
इसलिए शुद्ध ज्ञान से, शान्त चित्त और जितेन्द्रिय होकर, ममता और अहंकार से रहित मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।